—अरुण माहेश्वरी
कोकरोच पार्टी के आशुतोष रांका ने आज छात्रों के जमावड़े में दिन-प्रतिदिन व्यापक विस्तार को देखते हुए कहा है कि 20 जुलाई को ट्रेलर था, आगे दिल्ली की सड़कों पर करोड़ों छात्र नजर आयेंगे।
हमारा अनुमान है कि दूसरी ओर मोदी और बीजेपी के लोग भी यह सोच रहे हैं कि 20 जुलाई का पुलिस दमन तो ट्रेलर था, आगे इनको और भी भारी मज़ा चखाया जायेगा।
बीजेपी सरकार के सोच पर हमारा अनुमान हवाई नहीं है । हम जानते हैं कि सरकार के द्वारा वास्तविक हिंसा के पहले उसकी भाषिक तैयारी की जाती है।
जब बीजेपी के सांसद छात्रों को अर्बन नक्सल कह रहे हैं, तभी इस बात का अनुमान मिल जाता है कि सरकारी दमन का आगे क्या रूप सामने आने वाला है । गोली पहले बंदूक में नहीं, राजनीतिक भाषा में भरी जाती है।
“छात्र” कहने पर हमें सामने नागरिक अधिकार वाला युवा दिखाई देता है। पर “अर्बन नक्सल” कह देने पर उसे तत्काल छात्र से “आंतरिक शत्रु” में बदल दिया जाता है।
इस प्रकार का नामकरण जहां आंदोलन की वास्तविक माँगों को अप्रासंगिक बनाता है, वहीं दमन को कानून-व्यवस्था नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का रूप दे देता है और असाधारण बल-प्रयोग के प्रति आम लोगों में जो नैतिक संकोच रहता है, उसे दूर करता है। जब सरकार राजनीतिक संकट को कानून-व्यवस्था की समस्या और फिर “आंतरिक शत्रु” की समस्या के रूप में समझने लगती है, तो उसके खुद के चरित्र में भी रातों-रात एक बुनियादी परिवर्तन आ जाता है।
वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ शुक्ल ने अपने फेसबुक पोस्ट में चीन के तियानआनमेन चौक की याद करते हुए आशंका व्यक्त की है कि यदि सरकार इसी दिशा में बढ़ी तो भारत के छात्र आंदोलन के साथ भी वैसी ही निर्ममता बरती जा सकती है।
ऐसे में कुछ यूट्यूब चैनलों ने जो आशंका जाहिर की है कि यह सरकार अगले प्रदर्शन के समय आर्मी को उतार सकती है, पूरी तरह से बेबुनियाद नहीं है ।
दीपक शर्मा के यू ट्यूब कार्यक्रम सहित कुछ सार्वजनिक मंचों पर यह आशंका व्यक्त की गई है कि यदि टकराव और बढ़ा तो सरकार सेना बुलाने जैसे कदम पर भी विचार कर सकती है।
पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के रहते यदि सरकार निहत्थे छात्र-आंदोलन को कुचलने के लिए सेना को बुलाती है तो वह यह बताने के लिए काफी होगा कि इस सरकार की नागरिक और राजनीतिक सत्ता पूरी तरह से चुक गई है । सेना बुलाना मोदी की शक्ति का प्रदर्शन ही नहीं, उनकी चरम असमर्थता की घोषणा भी होगा ।
नागरिक समाज पर सेना का प्रयोग ऐसा अस्त्र होता है जिसे चलाने के साथ ही चलाने वाला भी अपनी स्वतंत्रता खोकर सेना के ही अधीन हो जाता है।
सेना को बुलाना, सड़कों पर तैनात करना, उससे भीड़ पर नियंत्रण कराना और छात्रों पर गोलियाँ चलाना—सेना को तैनात करने के ये चार अलग-अलग चरण होते हैं। राजनीतिक नेतृत्व सिर्फ पहले चरण तक ही निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होता है । लेकिन अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुंचते पूरी कमान कमांडरों, मैजिस्ट्रेटों, स्थानीय अधिकारियों और मौके पर मौजूद सैनिकों के हाथ में चली जाती है।
सेना के द्वारा छात्रों पर गोली चलवा कर तात्कालिक रूप से भले ही सड़कें खाली करा ली जाए, लेकिन उसी क्षण सरकार की नैतिक वैधता, सेना की निर्विवाद सार्वजनिक प्रतिष्ठा भी ख़ाक में मिल जायेंगे।
और, अगर सरकार के चाहने पर भी सेना निहत्थे छात्रों पर गोली चलाने से इंकार कर देती है, तब तो मोदी का एक क्षण के लिए भी सत्ता पर बना रहना असंभव हो जायेगा।
“अर्बन नक्सल”, “देशद्रोही” “आतंकी” आदि की रट लगाने वाले बीजेपी के विवेक-शून्य सांसदों को शायद यह अनुमान नहीं है कि वे कैसे इस प्रकार की घृणा और हिंसा पैदा करने वाली बातों से खुद अपनी सरकार के अंत को ही क़रीब लाने का काम कर रहे हैं ।
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