(छात्र आंदोलन, भारतीय संविधान और सत्य-प्रक्रिया पर एक टिप्पणी)
−अरुण माहेश्वरी
छात्र आंदोलन के वर्तमान स्वरूप ने अनायास फ़्रांस के 1968 के कैंपस विद्रोह की याद ताज़ा कर दी है।
फ्रांस का वह आंदोलन तत्काल सत्ता-परिवर्तन का कारण नहीं बना था, लेकिन उसने फ़्रांस ही नहीं, पूरे विश्व के बौद्धिक और राजनीतिक चिंतन में एक गहरा भूचाल पैदा कर दिया। संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद, समकालीन मार्क्सवाद और ऐलेन बाद्यू, मिशेल फूको जैसे विचारकों की वैचारिक यात्रा उसी ऐतिहासिक उथल-पुथल की पृष्ठभूमि में विकसित हुई।
बाद्यू का इवेंट और सत्य-प्रक्रिया का सिद्धांत भी उसी अनुभव से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है।
यह सच है कि फ्रांस की तुलना में भारत के वर्तमान छात्र आंदोलन की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग है । यहाँ छात्र आंदोलन किसी विश्वविद्यालय या परिसर तक सीमित नहीं है। दिल्ली में अभूतपूर्व दमन, राजधानी की घेराबंदी और उसके बावजूद देश के विभिन्न राज्यों से छात्रों का लगातार दिल्ली की ओर बढ़ना, अनेक शहरों में व्यापक प्रतिरोध और उसे जनतांत्रिक शक्तियों का व्यापक समर्थन—ये सब इसी बात के संकेत हैं कि यहां का आंदोलन एक व्यापक राष्ट्रीय अर्थ ग्रहण करता जा रहा है।
सामान्यतः राज्य का दमन जनता को भयभीत करता है, पर यहाँ भय के विपरीत दमन के अनुपात में ही ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी की तस्वीरें सामने आ रही हैं। यदि यह सिलसिला यूं ही जारी रहा तो यह आंदोलन किसी जुल्म के खिलाफ कोई क्षणिक और सीमित राजनीतिक प्रतिक्रिया भर नहीं रहेगा ।
यहीं से यह गहरा सवाल उठता है कि क्या हम केवल एक और आंदोलन को देख रहे हैं, या किसी सत्य-प्रक्रिया के प्रारंभिक संकेतों को?
ऐलेन बाद्यू के अनुसार इवेंट किसी सामान्य राजनीतिक घटना का नाम नहीं है। वह इतिहास में उस क्षण का नाम है जब मौजूदा व्यवस्था के ज्ञान, वर्गीकरण और गिनती से परे कोई नई सार्वभौमिक संभावना जन्म लेती है। उस संभावना के प्रति विकासमान निष्ठा ही धीरे-धीरे एक नए Subject— हमारी शब्दावली में नए प्रमाता—का निर्माण करती है। नए मनुष्यों का निर्माण होता है ।
गौर करने की बात है कि भारत में यह निष्ठा भारत के संविधान के प्रति निष्ठा के पुनर्जन्म के रूप में दिखाई दे रही है । राहुल गांधी पिछले कई सालों से अपने कार्यक्रमों में संविधान की प्रति लेकर घूमते देखे जाते हैं और उसके प्रति निष्ठा का आह्वान करते हैं । इस छात्र आंदोलन के समर्थन में भी विपक्ष के सभी नेताओं के हाथ में कल हमने उसी संविधान की प्रतियां देखी है ।
भारत के लोगों ने जिस संविधान को पचहत्तर साल पहले अपनाया था, उसी के प्रति निष्ठा को जब हम एक नए प्रमाता के आविर्भाव के रूप में देखते हैं, तो किसी के लिए भी यह एक चौंकाने वाली बात हो सकती है । आम तौर पर संविधान को महज एक विधिक दस्तावेज़ या शासन-व्यवस्था की रूपरेखा के रूप में पढ़ा जाता है। किंतु आज जब हम बाद्यू की अवधारणा के आलोक में देखते हैं, तो आश्चर्यजनक रूप से हमें भारतीय संविधान स्वयं एक ऐतिहासिक इवेंट जैसा दिखाई देता है।
हम देखते हैं कि हमारा संविधान कभी भी हमारे समाज में प्रचलित संहिताओं की प्रतिलिपि नहीं रहा जिस समाज के लिए उसे बनाया गया था। इसी बिनाह पर तो आरएसएस इस संविधान के जन्म काल से ही इसका विरोध कर रहा था । जब संविधान का निर्माण हुआ, भारत के समाज का बड़ा हिस्सा सामंती संबंधों, जातिगत पदानुक्रम, पितृसत्तात्मक संरचनाओं और पूर्व-पूंजीवादी सामाजिक चेतना से संचालित था। आरएसएस उन्हीं प्रचलित प्रथाओं को अक्षुण्ण रखना चाहता था । लोकतांत्रिक नागरिकता का विचार तब इस समाज के लिए एक बिल्कुल नया ऐतिहासिक अनुभव था।
हमारे संविधान-निर्माता अपने समय के अत्यंत प्रबुद्ध विधिवेत्ता, राजनीतिक चिंतक और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक धाराओं से परिचित लोग थे। उन्होंने आधुनिक संवैधानिक परंपराओं, मानवाधिकारों, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और सार्वभौमिक नागरिकता की उन उपलब्धियों को भारतीय संविधान में समाहित किया, जिनका भारतीय समाज में सामाजिक आधार तब तक पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ था।
इसी अर्थ में हम कहते हैं कि भारतीय संविधान अपने समय से आगे की ऐतिहासिक चेतना का दस्तावेज़ है। उसने तत्कालीन भारत का वर्णन नहीं किया; उसने भविष्य के भारत की रूपरेखा प्रस्तुत की। समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और सार्वभौमिक नागरिकता की प्रतिज्ञाएँ उस समय के सामाजिक यथार्थ का विवरण नहीं थीं; वे उस यथार्थ के रूपांतरण का कार्यक्रम थीं।
यहीं हमारे संविधान का इवेंट-स्वरूप प्रकट होता है। वह भारतीय समाज की तत्कालीन संरचना के अंदर से पैदा नहीं हुआ था । उसने उस संरचना के भीतर एक ऐसी सार्वभौमिक सत्य-संभावना का उद्घाटन किया था जो उस संरचना से कहीं आगे जाती थी। उसने पहली बार भारतीय समाज के सामने ऐसे नागरिक की कल्पना रखी जो जन्म, जाति, धर्म, लिंग और परंपरागत पदानुक्रम से परे समान अधिकारों का अधिकारी है।
यही वह विच्छेद है जो हमारे संविधान को मात्र एक संवैधानिक दस्तावेज़ से आगे ले जाकर एक ऐतिहासिक इवेंट का स्वरूप देता है।
यदि हम इस स्थापना को मान लेते हैं तो इसी से यह महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय संविधान की सत्य-प्रक्रिया 26 जनवरी 1950 को समाप्त नहीं हुई थी। वह प्रक्रिया आज भी जारी है। बल्कि 2014 में जब से आरएसएस के नेतृत्व की मोदी सरकार आई, संविधान की मूलभूत प्रतिज्ञाओं पर कुठाराघात ने सत्य-प्रक्रिया के चक्र को पीछे की ओर धकेलना शुरू कर दिया ।
कहना न होगा, यहीं से हमारे संविधान की अहमियत बेहद क्रांतिकारी संभावनाओं से भरे दस्तावेज की हो जाती है । हर वह पीढ़ी जो समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक गरिमा को नए ऐतिहासिक संदर्भ में फिर से अर्जित करती है, वह वस्तुतः संविधान के इसी मूल इवेंट के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करती है।
इस दृष्टि से आज का छात्र आंदोलन केवल एक नया प्रतिरोध-आंदोलन नहीं, बल्कि भारतीय संविधान नामक मूल इवेंट की सत्य-प्रक्रिया का एक नया चरण कहला सकता है। यह आंदोलन किसी पहले से तैयारशुदा राजनीतिक एजेंडा का अनुसरण नहीं कर रहा; यह खुद उस नए प्रमाता के निर्माण की प्रक्रिया है जिसकी आवश्यकता भारतीय लोकतंत्र लंबे समय से अनुभव कर रहा है।
यहीं हमें संविधान और क्रांति के संबंध पर भी नए रूप में दृष्टिपात करने की जरूरत लग रही है । सामान्यतः इन्हें दो परस्पर विरोधी ध्रुव माना जाता है । पर भारतीय परिस्थितियों में हमारा संविधान यथास्थिति का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उसके अतिक्रमण की एक सार्वभौमिक प्रतिज्ञा है। उसकी पुनर्प्रतिष्ठा का अर्थ केवल संस्थाओं की मरम्मत नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक परियोजना को आगे बढ़ाना है जिसे संविधान-निर्माताओं ने अपने समय से कहीं आगे की दृष्टि के साथ भारत के सामने रखा था।
यदि आज की पीढ़ी संविधान को अपनी निष्ठा का नाम बना रही है, तो वह किसी स्थापित व्यवस्था की रक्षा भर नहीं कर रही; वह उस भविष्य को पुनः सक्रिय कर रही है जो संविधान में पहले से निहित था, किंतु अभी तक पूरी तरह से साकार नहीं हो पाया है।
आज हम राष्ट्र-व्यापी स्वरूप ग्रहण कर रहे इस छात्र आंदोलन को टकटकी लगाएं देख रहे हैं, क्योंकि संभव है कि शायद इतिहास ऐसे ही क्षणों में चुपचाप दिशा बदल रहा हो।
अभी तो इस आंदोलन के दबाव में सरकार ने कुछ सजावटी कदमों, मामूली प्रशासनिक फेरबदल आदि की घोषणा की है, लेकिन यही वह बिंदु है जहाँ समस्या की वास्तविक गहराई सामने आती है। यहां प्रश्न केवल पेपर लीक तक सीमित होता तो प्रशासनिक उपाय पर्याप्त हो सकते थे, लेकिन संकट तो संस्थागत है । प्रश्न पूरे शिक्षा तंत्र पर आरएसएस के कब्जे, व्यापम जैसे संगठित भ्रष्टाचार और उसके चरम रूढ़िवादी विचारों और संकीर्ण उद्देश्यों का है । जब संस्थागत ढाँचा ही संदेह के घेरे में हो तो उपचार सतही सुधारों से नहीं, गहन संरचनात्मक पुनर्गठन की मांग करता है।
इसीलिए सरकार की चंद घोषणाएँ, भले अभी के राजनीतिक दबाव जरा कम कर दें, इस संकट की ऐतिहासिक और संस्थागत प्रकृति का समाधान ऐसे संभव नहीं होगा । शिक्षा का सवाल आज पूरे समाज को आरएसएस और मोदी जैसे राष्ट्र के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार जोंक से मुक्ति का सवाल बन गया है ।
इसीलिये यह छात्र आंदोलन कहाँ तक जाएगा, इस पर सोचने के बजाय यह देखने की जरूरत है कि कैसे इसके भीतर वह नया प्रमाता जन्म ले रहा है जिसकी भारतीय लोकतंत्र को लंबे समय से प्रतीक्षा है। जरूरत इसमें सभी भाषा, जाति, क्षेत्र, वर्ग और स्तर के लोगों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी को प्रशस्त करने की है । मोदी सरकार तो इस तूफान में तिनकों की तरह उड़ती दिखेगी ।
अब छात्र आंदोलन केवल एक राजनीतिक प्रतिरोध नहीं, भारतीय संविधान नामक ऐतिहासिक इवेंट की सतत सत्य-प्रक्रिया का एक नया अध्याय हो गया है। यह आंदोलन इसी सच को पुष्ट करता है । जो भी इस प्रक्रिया में सहायक बनेगा, वही नये भारत का निर्माता कहलायेगा ।
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