(छात्र आंदोलन के वर्तमान चरण पर एक अवलोकन )
-अरुण माहेश्वरी
छात्र आंदोलन का वर्तमान रूप भारत की राजनीति के सामने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न रख रहा है। वह यह कि जब स्थापित राजनीतिक संरचनाएँ फासीवादी प्रवृत्तियों से जूझने में क्रमशः निष्प्रभावी होती जाती हैं, तब प्रतिकार की शक्ति कहाँ से जन्म लेती है?
पिछले कुछ दिनों की घटनाएँ इस प्रश्न को नए ढंग से हमारे सामने रखती हैं। दिल्ली में छात्रों पर अभूतपूर्व दमन, धर-पकड़, बैरिकेड, मेट्रो स्टेशनों का बंद होना, राजधानी की घेराबंदी, और उसके बावजूद देश के विभिन्न राज्यों से लगातार दिल्ली की ओर बढ़ते छात्र—ये सभी घटनाएँ किसी सामान्य विरोध-प्रदर्शन की सीमाओं से बाहर निकल चुकी हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में समानांतर प्रदर्शन तथा दिल्ली पहुँचने की तैयारी इस बात का संकेत हैं कि आंदोलन अपने मूल केंद्र से आगे बढ़कर एक राष्ट्रीय आयाम ग्रहण कर रहा है।
इतिहास में ऐसे क्षण बार-बार नहीं आते जब दमन स्वयं प्रतिरोध की ऊर्जा का स्रोत बनने लगे। सामान्यतः राज्य का दमन आंदोलनों को भयभीत करता है; परंतु यहाँ दिखाई पड़ रहा है कि हर नए दमन के साथ नए नौजवान जुड़ रहे हैं। यह वही बिंदु है जहाँ राजनीति केवल संगठनात्मक गणित नहीं रह जाती; वह एक नैतिक-ऐतिहासिक निष्ठा का रूप लेने लगती है।
यहीं से इस आंदोलन को ऐलेन बाद्यू की सत्य-प्रक्रिया (truth procedure) की अवधारणा के आलोक में पढ़ा जा सकता है। बाद्यू के अनुसार इवेंट किसी पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम का परिणाम नहीं होता। वह उस बिंदु पर जन्म लेता है जहाँ विद्यमान व्यवस्था किसी नए सत्य को पहचानने में असमर्थ हो जाती है। उस क्षण सत्य का अस्तित्व केवल उन लोगों की निष्ठा में होता है जो उसके प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं। यही निष्ठा धीरे-धीरे एक नए प्रमाता (Subject) का निर्माण करती है।
भारतीय छात्र आंदोलन में आज जो स्वतःस्फूर्त विस्तार दिखाई दे रहा है, उसे इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। यह केवल सरकार-विरोध नहीं है। यह उस ऐतिहासिक रिक्ति को भरने का प्रयास है जिसे पारंपरिक राजनीतिक संरचनाएँ भर पाने में असफल रही हैं। जब संस्थागत राजनीति पीछे हटती है, तब इतिहास अनेक बार अपने नए वाहक स्वयं उत्पन्न करता है। आज का छात्र उसी संभावना का वाहक दिखाई देता है।
यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि सत्य की पूरी प्रक्रिया अपने निष्कर्ष तक पहुँच चुकी है। लेकिन यह कहना कठिन नहीं कि उसके प्रारंभिक लक्षण स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। सत्य की हर प्रक्रिया की तरह यहाँ भी कोई तैयार प्रमाता पहले से मौजूद नहीं था; वह संघर्ष की प्रक्रिया में ही बन रहा है। हर नया जत्था, हर नया शहर, हर नई गिरफ़्तारी और उसके बाद भी न टूटने वाला उत्साह उसी निर्माण की एक नई कड़ी है।
फासीवाद की सबसे बड़ी शक्ति भय है। सत्य की सबसे बड़ी शक्ति निष्ठा। यदि भय के निरंतर विस्तार के बावजूद निष्ठा का विस्तार अधिक तीव्र गति से होता है, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं रह जाती; यह इतिहास में सत्य के प्रवेश का संकेत बन जाती है।
संभव है कि हम आज उसी आरंभिक क्षण के साक्षी हों—जब सत्य स्वयं अपना प्रमाता गढ़ना शुरू करता है।
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