मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

अग्निबीज डिरोजियो





सरला माहेश्वरी


(‘‘बुद्धिमानों की मंत्रणा ने नहीं बल्कि विक्षिप्त लोगों के ‘पागलपन‘ ने मनुष्य के चिंतन और कर्म में, उसके अंदर और बाहर, उसके दर्शन और साहित्य में युग-युग में नये ढ़ग से सृष्टि की है।‘‘ -रवीन्द्रनाथ)
                 
आज हम जिन डिरोजियो के 200 वर्ष पूर्ति पर उनका स्मरण करते हुए बंग समाज के सांस्कृतिक विकास में उनके अभूतपूर्व योगदान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर रहे हैं, वे डिरोजिये जब सिर्फ 22 वर्ष के ही थे तभी काल के निष्ठुर हाथों ने उन्हें इस संसार से उठा लिया था। मात्र 22 वर्ष की उम्र का एक नौजवान कोई प्रकांड पंडित नहीं हो सकता था। उनके आवेग, स्वतंत्र चिंतन और न्याय-अन्याय के तीव्र बोध ने ही उन्हें साधारण जन में एक अतिविशिष्ट जन बना दिया था। वे असाधारण थे क्योंकि उन्होंने गुलामी के उन दुर्दिनों में पूरी तरह से मुक्त और स्वतंत्र मनुष्य का घ्वज फहराया था। उन्होंने हर दबे कुचले इंसान को, समाज के हर पीडि़त तबके को उठ खड़े होने और मनुष्य की गरिमा के साथ जिंदा रहने की शिक्षा देने की कोशिश की थी। और उनकी इन प्रबल, जबरदस्त कोशिशों ने भारत में आकर बसे एक पोर्तुगीज परिवार के वशंधर को भारत के एक पक्के देशभक्त कवि और भारत की जनता के सच्चे दोस्त और भविष्यदृष्टा शिक्षक बना दिया। सचमुच वे एक स्फुर्लिंग की तरह आए और पांच-सात वर्षों के अपने तूफानी क्रिया-कलापों तथा उत्कट विद्रोही विचारों की छटा दिखाकर लुप्त हो गये, लेकिन उनकी चमक बंगाल के सांस्कृतिक आकाश पर जैसे एक अमर सितारे की तरह हमेशा के लिए अंकित हो गयी। सिर्फ 22 वर्ष की उम्र में चला गया नौजवान आश्चर्यजनक रूप में आज भी एक असाधारण शिक्षक और महान विद्रोही पथप्रदर्शक के रूप में याद किया जाता है।

18 अप्रैल 1809 के दिन कोलकाता की एक तत्कालीन व्यापारिक कंपनी जे.स्काट कंपनी के एक बड़े अधिकारी के घर में जन्मे हेनरी लुईस विवियन डिरोजियो का मूल पुर्तगाली नाम डिरोजारियो था। उनके पिता एक युरेशियाई थे और मां अंग्रेज थीं। पिता युरेशियाई इसलिये कहे जाते थे क्योंकि उनकी मां भारतीय और पिता पुर्तगाली थे।

डिरोजियो के व्यक्तित्व के निर्माण में जिस व्यक्ति की सबसे अधिक चर्चा की जाती है वे थे उनके शिक्षक डेविड ड्रमंड। सिर्फ पांच वर्ष की उम्र में डिरोजियो को डेविड ड्रमंड के स्कूल, धर्मतल्ला एकेडमी ऑफ डेविड ड्रमंड में भर्ती कर दिया गया था। इसी स्कूल में उन्होंने 1815-1823 तक शिक्षा प्राप्त की। ड्रमंड इसके सिर्फ दो वर्ष पहले सन् 1813 में स्कॉटलैंड से बंगाल आये थे। ड्रमंड वास्तव में एक भिन्न प्रकृति के इंसान थे। पश्चिमी स्वातंत्र्य चेतना और प्रगतिशील चेतना उनके व्यक्तित्व से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई थी। शिवनाथ शास्त्री ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रामतनु लाहिड़ी ओ तत्कालीन बंगसमाज’ में उनके बारे में लिखा है कि जिस स्वतंत्र चिंतन के प्रभाव से फ्रांसीसी क्रांति का उदय हुआ, वही स्वतंत्र चिंतन उनके अंतर में पूरी तरह से काम कर रहा था। उन्होंने ही इस बात का भी उल्लेख किया है कि अपने निकट के लोगों के साथ धर्म के विषय को लेकर मतभेद होने की वजह से ही वे हमेशा के लिये अपनी जन्मभूमि को छोड़ कर  इस देश में आगये। भारत वे अपना भविष्य बनाने अर्थात धनोपार्जन के लिये ही आये थे, लेकिन चंद दिनों के अंदर ही उन्होंने अपने कुछ मित्रों की मदद से कोलकाता के धर्मतल्ला इलाके में धर्मतल्ला एकेडमी नाम से एक विद्यालय की स्थापना की।

ड्रमंड मनमौजी इंसान थे। उनका यह मानना था कि सामाजिक अनुशासन को बनाये रखते हुए, मनुष्य की रुचियों को बिना विकृत किये अपनी तृप्ति और अपने विकास के लिये हर व्यक्ति को अपनी मन मर्जी के अनुसार जीने का हक होना चाहिये। यदि इस दुनिया में ईश्वर कहीं है तो वे लोग उसकी खोज करें जिनके पास उसे खोजने के लिये बेइंतिहा समय है, लेकिन उनके अनुसार, इस संसार में मनुष्य ही ईश्वर है, मनुष्य ही खुद सर्वव्यापी प्रभु है और ईश्वर चिंता का ही दूसरा नाम मानव चिंता है। मनुष्य से बड़ा इस धरती पर दूसरा कोई सत्य नहीं है। इसप्रकार के विचारों के हामी डेविड ड्रमंड अपने छात्रों को कैसी शिक्षा देते होंगे इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। तत्कालीन भारत के अंग्रेज समाज में भी ड्रमंड एक विवादास्पद व्यक्ति थे। वे कहते थे कि उनके स्कूल में बच्चों को पढ़ाने से बच्चे नास्तिक हो जायेंगे। विनय घोष ने अपनी पुस्तक ‘विद्रोही डिरोजियो’ में ड्रमंड के बारे में लिखते हुए बताया है कि ‘अखबारों की स्वतंत्रता‘ के बारे में उनकी एक कविता उन दिनों भारी चर्चा का विषय बनी थी।

19 वीं सदी के तत्कालीन कोलकाता के समाज में ड्रमंड की तरह के अनूठे शिक्षक की स्मृतियों के और तो कोई अवशेष नहीं मिलते लेकिन कोलकाता के सर्कुलर रोड पर स्थित कब्रिस्तान में उनकी एक समाधी आज भी कायम है जिसके समाधिफलक पर जो पहली पंक्ति लिखी हुई है वह है-

Beneath lie the mortal remains of
David Drummond, a native of Scotland
and for many years a successful teacher of youth
in this city, he departed this life on the
28th April 1843, aged 56 years

The monument was erected to the memory
of the deceased by a few of his friends and
pupils who respected his character admired
his talents and esteemed his worth.

‘नौजवानों का एक सफल शिक्षक’  (a successful teacher of youth)-इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण था उनका छात्र, हेनरी लुईस विवियन डिरोजियो। इस स्कॉटिश स्वतंत्रचेता विद्वान शिक्षक का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही डिरोजियो में जैसे समंजित होकर एक नये आवेग और ऊर्जा के साथ अवतरित हुआ था। और खुद डिरोजियो ने अपने विद्यार्थी जीवन के बाद जब कर्म जीवन में अपने कदम रखे तो 17 वर्ष की उम्र में ही तत्कालीन हिंदू कॉलेज में एक शिक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई और 1826 से लेकर 1831 तक का सिर्फ 6 वर्षों का उनका जीवन काल ही कुछ इतना विस्मयकारी, रुढि़बद्ध समाज के लिए इतना चुनौतीभरा और गुलाम मस्तिष्कों को मुक्ति के लिये झकझोर देने वाला ऐसा उत्तेजक काल रहा है कि जिसकी स्मृतियों से समूचा बंग समाज आज तक उद्वेलित और प्रेरित होता है।

डिरोजियो के वक्त का कोलकाता सामंतों और व्यापारियों का एक उदीयमान शहर था। अंग्रेजों ने ग्रीक दास प्रथा की तरह कोलकाता को भी दासों की एक मंडी बना रखा था। विलियम जोन्स ने यहां के गुलामों की दुर्दशा देखकर लिखा था-‘‘यहां के गुलामों की दुरावस्था की जो बात मैं जानता हूं वो इतनी मार्मिक है कि उसे बताने में भी संकोच होता है। हर दिन मेरे कानों तक गुलामों पर निष्ठुर जुल्मों की जो कहानी पहुंचती है, उन्हें सुनना भी मुझे महापाप की तरह लगता है। इस काफी आबादी वाले शहर कोलकाता में ऐसे पुरुष या स्त्रियां बहुत कम ही हैं जिनके घर में कम से कम एक बेटा या बेटी गुलाम न हो।‘‘
कोलकाता से प्रकाशित होने वाले तत्कालीन ‘कलकत्ता गजट‘, ‘समाचार दर्पण‘ की तरह के अखबारों में इस शहर के गुलामों के बारे में कई तरह की खबरें प्रकाशित होती रहती थी। और इसी शहर में डिरोजियो ने अपने गुरू से स्वतंत्रता और मुक्त मन तथा आजाद मस्तिष्क की शिक्षा ली थी। कोलकाता में सर्वत्र दिखाई देने वाली गुलामी की प्रथा ने उस नौजवान हृदय को बुरी तरह झकझोरा था और सिर्फ 18 वर्ष की उम्र में ही कैम्पबैल की इस प्रसिद्ध पंक्ति-
And as the slave departs, the man returns के हवाले के साथ उन्होंने जो कविता लिखी, वह इसप्रकार थी:

How felt he when he first was told
A slave he ceased to be;
How proudly beat his heart, when first
He knew that he was free!
...
Oh freedom! there is something dear
e’en in the very name
...
success attend the patriot sword,
That is unsheathed for thee!
...
Blest be the generous hand that breaks
The chain a tyrant gave
And feeling for degraded man
Gives freedom to the slave.

गुलाम को जब पता चला कि वह दासता के दंड से मुक्त हो गया है तो उसको कैसा महसूस हुआ होगा, कैसे गर्व से उसका हृदय धड़कने लगा होगा जब उसे पहली बार पता चला होगा कि वह मुक्त हो गया है...‘स्वतंत्रता‘ नाम की ऐसी महत्ता है कि जो भी देशभक्त इस पवित्र नाम का संकल्प लेकर तलवार उठाता है वह कभी पराजित नहीं होता। जिस हृदय से रक्त झरता है, वही हृदय आत्मोत्सर्ग के गर्व से भर उठता है, जो हाथ अत्याचारियों की बेडि़यों को काटकर पराधीन, लांछित मनुष्य को आत्मसम्मान प्रदान कर सकता है, वह हाथ धन्य है।

डिरोजियो की इस कविता का शीर्षक था, ‘गुलाम की मुक्ति‘। 19 वीं सदी का तत्कालीन कोलकाता का बंग समाज किस प्रकार सामंती पतनशीलता और पोंगापंथी विचारों की गिरफ्त में पूरी तरह फंसा हुआ था, इसका विवरण 18वीं और 19वीं सदी के बंगाल के इतिहास में सर्वत्र मिलता है। शिवनाथ शास्त्री के शब्दों में तब झूठ, प्रवंचना, घूस, धोखा, फरेब आदि के जरिये रुपये इके करके धनी बनने में शर्म की कोई बात नहीं थी। उल्टे निकट के पांच जन इके होने पर इसीप्रकार के लोगों की चतुराई और बुद्धिमानी की तारीफ हुआ करती थी। धनी लोग अपने माता-पिता के श्राद्ध पर, बेटे-बेटियों की शादी में, पूजा त्यौहारों में भारी धन खर्च करके आपस में प्रतियोगिता किया करते थे। ...धनी गृहस्थ खुले आम वैश्याओं के साथ मौज-मस्ती में कोई शर्म नहीं करते थे। तब उत्तर पश्चिम तथा मध्य भारत से गायिकाओं और नर्तकियों के दल शहर में आते थे, जिन्हें बाईजी के संभ्रांत संबोधन से संबोधित किया जाता था। ...किस रईस ने किस प्रसिद्ध बाईजी पर कितने हजार रुपये बहाये, शहर के भद्रजनों की महफिलों में ऐसी खबरें काफी चला करती थी और इसमें कोई किसी प्रकार की बुराई नहीं देखता था।

यह खास प्रकार के बाबुओं का जमाना था जिनके बारे में शिवनाथ शास्त्री लिखते हैं: ये बाबू दिन में सोते, पतंग उड़ाते, बुलबुल की लड़ाई देखते, सितार इसराज बीन आदि बजा कर, कविताएं, हाफ आखड़ाई (संगीत की छोटी महफिल), पांचाली (गीत प्रतियोगिता) आदि को सुन कर, रात को वारांगनाओं के घर घर में गीत संगीत सुन कर तथा मौज मस्ती करके समय बीताते थे। इसीप्रकार शास्त्रीजी ने गांजे के ओं और धार्मिक कर्मकांडों की भरमार का भी विस्तार से चित्र खींचा है।

ऐसे समय में सन् 1809 में जब डिरोजियो का जन्म हुआ था, राममोहन राय तब तक कोलकाता शहर में रहने के लिये नहीं आये थे। डिरोजियो जब ड्रमंड के धर्मतल्ला एकेडमी में भर्ती हुए उसी समय सन् 1814 के मध्य में राममोहन राय ने कोलकाता में रहना शुरू किया। एक ओर डिरोजियो की शि़क्षा का क्रम चल रहा था और दूसरी ओर बंग समाज में नये युग के आदर्श और मूल्यों के प्रणेता के रूप में राममोहन उभर कर सामने आ रहे थे और इससे वस्तुत: पूरा हिंदू समाज कांप रहा था। राममोहन की ‘आत्मीय सभा‘ की स्थापना हो चुकी थी। डिरोजियो जब सिर्फ 9 वर्ष के विद्यार्थी थे उसी समय सती प्रथा विरोधी राममोहन के लेख प्रकाशित होने लगे थे। और इसप्रकार जब डिरोजियो ड्रमंड स्कूल से एक स्वतंत्रचेता मनुष्य के रूप में निकलकर आये, उस समय तक राममोहन राय तथा बांग्ला नवजागरण के अन्य अग्रदूतों ने वह जमीन बनानी शुरू कर दी थी जिस जमीन पर डिरोजियो की तरह के परम विद्रोही मस्तिष्क के लिए भी पांव रखने की थोड़ी सी जगह हो सकती थी।

डिरोजियो ने 1823 में अपनी शिक्षा पूरी की और उसके बाद कुछ दिनों तक उन्होंने उसी वाणिज्यिक कंपनी में क्लर्क की नौकरी की जहां उनके पिता काम करते थे। एक क्लर्क का सीमित जीवन डिरोजियो को कत्तई रास नहीं आ सकता था। और सिर्फ दो वर्ष की नौकरी के बाद ही नौकरी से पल्ला झाड़कर वे भागलपुर में घूमने के लिये अपनी मौसी के घर चले गये। गंगा नदी के तटों पर भागलपुर, डालटनगंज की गिरि श्रंखलाओं के प्राकृतिक सौंदर्य ने डिरोजियो के युवा मन को एक कवि मन में रूपांतरित कर दिया। उसी दौरान, प्राकृतिक सौंदर्य की अन्य कविताओं के साथ ही कवि डिरोजियो ने ‘द फकीर ऑफ जंगीरा‘ की तरह की ऐसी अमर रचनाओं का सृजन किया जिसे भारत में लिखे गये अंग्रेजी साहित्य में सदा आदर के साथ रखा जायेगा।

डिरोजियो के शैक्षणिक जीवन काल में ही कोलकाता में 20 जनवरी 1817 के दिन हिंदू कॉलेज की स्थापना हुई थी। भारत में अंग्रेजी शिक्षा का यह पहला सरकारी प्रतिष्ठान था जिसका उद्धेश्य भारत के युवको को यूरोपीयन विज्ञान, साहित्य और पश्चिमी विचारों से परिचित करवाना था। हिंदू कालेज की स्थापना में नेतृत्वकारी भूमिका सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर हाइड ईस्ट और डेविड हेयर ने अदा की थी। लेकिन इसे खास तौर पर राममोहन राय का सहयोग प्राप्त था। हांलाकि शिवनाथ शास्त्री के ब्यौरे के अनुसार राममोहन राय और डेविड हेयर ने मूलत: इस प्रकार के कालेज की स्थापना की योजना बनायी थी और राममोहन के ‘आत्मीय सभा’ के एक सदस्य बैद्यनाथ मुखर्जी ने इस योजना की खबर सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सर हाइड ईस्ट को दी। हाइड ने इस योजना का हार्दिक स्वागत किया हाइड के घर पर हुई एक सभा में हाइड और हेयर ने ऐसे कालेज की स्थापना का प्रस्ताव तत्कालीन हिंदू समाज के प्रमुख लोगों के सामने रखा। इस प्रस्ताव का सबने काफी उत्साह के साथ स्वागत किया। लेकिन शिवनाथ शास्त्री ने ही बताया है कि जब करपंथी हिंदू नेताओं को इस बात का पता चला कि अंग्रेजों की इस पहलकदमी के पीछे राममोहन राय का भी हाथ है तो वे यकबयक बिदक गये और उन्होंने यह शर्त रखी कि जब तक राममोहन राय को इस कॉलेज की स्थापना के लिये बनाई गयी समिति से हटाया नहीं जाता, तब तक वे खुद इस समिति का समर्थन नहीं करेंगें। प्यारेचंद मित्र ने डेविड हेयर की जीवनी में इस घटना का जिक्र इस प्रकार किया है : ‘‘प्रस्तावित कालेज के साथ अपना संबंध तोड़ने के लिये राममोहन को मनाने में कोई कठिनाई नहीं थी, क्योंकि वे समिति के सदस्य के रूप में अपने नाम के खोखले दिखावे की अपेक्षा अपने देशवासियों की शिक्षा को अधिक मूल्यवान समझते थे। ‘‘

इस पूरे प्रसंग को यहां उठाने का तात्पर्य यह बताना है कि जब डिरोजियो ने अपने कर्म जीवन में प्रवेश किया और सन् 1826 में इसी हिंदू कॉलेज में जब एक शिक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई, उस समय के बंग बौद्धिक समाज में पहले से ही किसप्रकार की उत्तेजना फैली हुई थी और विचारों की टकराहट से पैदा होने वाला सामाजिक आलोड़न साफ दिखाई दे रहा था। कट्टरपंथियों और उदारपंथियों के बीच की तकरारों ने उस समय के बौद्धिक जगत को पूरी तरह से उद्वेलित कर रखा था और कहना न होगा कि नये और पुराने विचारों, नयी और पुरानी संस्थाओं के बीच टकरावों और तकरारों का परिवेश ही वस्तुत: वह परिवेश होता है जिसे किसी भी समाज के लिये नवजागरण का काल कहा जा सकता है। डिरोजियो को भी नवजागरणकालीन इस व्यापक आंदोलन की उत्पत्ति कहा जा सकता है। डिरोजियो अपने जिन विद्रोही विचारों के लिए विख्यात हुए उन विचारों के लिए तत्कालीन समाज में पहले ही बारूद बिछ चुकी थी, सिर्फ एक चिंगारी की जरूरत थी। और कहना न होगा कि डिरोजियो ने उसी चिंगारी की भूमिका अदा की थी।
हिंदू कॉलेज, जिसे एंग्लो-इंडियन कॉलेज, महापाठशाला, नैटिव हिंदू कॉलेज और विद्यालय आदि कई नामों से जाना जाता था, के उद्धेश्यों के बारे में तत्कालीन शिक्षा निरीक्षक विल्सन ने कहा था कि ‘‘यह कॉलजे वह प्रमुख स्रोत होगा जिसके जरिये यूरोपीय स्रोतों से प्राप्त होने वाले सच्चे ज्ञान को हिंदुस्तान के बौद्धिक जीवन में रूपांतरित किया जा सकेगा।‘‘ नौजवान शिक्षक डिरोजियो की सारी गतिविधयां हिंदू कॉलेज के इस घोषित उद्धेश्य के साथ मेल खाती थी। लेकिन मजे की बात यह है कि इसी नौजवान शिक्षक ने जब नवजागरण के सच्चे आदर्शों, स्वतंत्रता, हर विषय पर सवाल उठा कर संशय व्यक्त करने की प्रश्न चेतना और रुढि़बद्ध स्थापित विचारों को चुनौती देने के नवजागरणकालीन मूल्यों को यथार्थ में प्रतिष्ठित करना शुरू किया तो हिंदू कॉलेज के तमाम अधिकारीगण को डिरोजिये की गतिविधियां नागवार गुजरी। डिरोजियो ने शिक्षा के स्तर को जितना ऊंचा बनाये रखा था, इसका पता तो विल्सन की रिपोर्ट से ही लग जाता है। विल्सन ने सन् 1828 की अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि कॉलेज के सीनियर छात्रों की अंग्रेजी रचना शक्ति को देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये थे। कॉलेज के अव्वल दर्जे के छात्रों में पोप की कविता, मिल्टन के पैराडाइज लोस्ट और शेक्सपीयर के अच्छे-अच्छे नाटकों के बारे में जानकारी के स्तर को देखकर वे चमत्कृत थे। इतिहास, दर्शन, गणित और विज्ञान के विषयों में भी उन्होंने छात्रों को पारंगत पाया था।

सन् 1826 के बाद से ही हिंदू कॉलेज की छात्र संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि देखी गयी थी। हिंदू कॉलेज में पैसे देकर पढ़ने वालों को पे-स्कॉलर कहा जाता था और बाकी के लोग बिना शुल्क के पढ़ाई किया करते थे। विनय घोष की पुस्तक में उल्लेखित आंकड़ों के अनुसार, 1824 तक इस कॉलेज के छात्रों की कुल संख्या औसतन 100 से अधिक नहीं थी जिनमें पे-स्कॉलर सिर्फ 24 थे। 1825 के बाद धीरे-धीरे पे-स्कॉलरों की संख्या बढ़ने लगी और 1826, 1827 तथा 1828 में इनकी संख्या क्रमश: 223, 300 और 336 हो गयी। सन् 1828 में हिंदू कॉलेज के कुल छा़त्रों की संख्या 436 थी। 1850 तक आते-आते ऐसे पे-स्कॉलरों की संख्या औसतन 450 तक पंहुच गयी थी। गौर करने लायक बात यह है कि 1825 से लेकर 1850-51 तक के इन 25 वर्षों में हिंदू कॉलेज में छात्रों की संख्या में जो लगातार वद्धि हो रही थी उनमें अचानक 1829-30 के दो-तीन वर्षों में कुछ गिरावट भी देखी गयी। इन दो-तीन वर्षों में छात्रों की संख्या में गिरावट के कारणों की व्याख्या करते हुए मि. जे. कर ने लिखा है-‘‘इस गिरावट के पीछे अशत: तो कुछ और स्कूलों की स्थापना काम कर रही थी, अंशत: उस काल की वाणिज्यिक दुरावस्था भी एक कारण थी और आंशिक तौर पर नैटिव्स के बीच पैदा हुआ वह डर भी था कि उनके बच्चों के धर्म में हस्तक्षेप किया जा रहा है और श्रीमान डिरोजियो के प्रभाव के कारण उनके बच्चे अपने पूर्वजों के सम्मानित रीति-रिवाजों के प्रति तेजी से अपनी श्रद्धा को गंवा रहे हैं।

छात्रों पर डिरोजियो का प्रभाव और परम्परागत रीति-रिवाजों के प्रति छात्रों के मन में पैदा हो रही विद्रोही मानसिकता, यह एक ऐसा विषय था जिस पर पोंगापंथी हिंदू अभिभावकों के बीच गहरी शंकाएं पैदा हो गयी थीं। और कहना न होगा कि कोलकाता के व्यापक समाज में तब डिरोजियो के प्रति असंतोष और नफरत की एक आंधी बह रही थी।

हिंदू कॉलेज में एक ओर शिक्षा का बढ़ता हुआ स्तर जिसकी वजह से वहां छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही थी और जिसमें डिरोजियो की प्रमुख भूमिका थी, वहीं दूसरी ओर डिरोजियो के प्रति ही हिंदू समाज में तीव्र आक्रोश का पैदा होना-इस अस्वाभाविक से दिखाई देने वाले घटनाक्रम के मूल में क्या बात थी, यह किसी के लिए भी गहरी दिलचस्पी का विषय हो सकता है। विनय घोष ने अपनी पुस्तक ‘विद्रोही डिरोजियो‘ में इस घटनाक्रम के मूल कारण की व्याख्या करते हुए इसके लिये डिरोजियो के अनोखे और चुम्बकीय व्यक्तित्व को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने लिखा है कि हिंदू कॉलेज में पंडितों की कमी नहीं थी लेकिन डिरोजियो की तरह का चुम्बकीय व्यक्तित्व, किसी को भी चमत्क्रृत कर देने वाली उसकी प्रतिभा उन सबमें अन्यतम थी।

‘‘जो छात्र उनके करीब आते वे सिर्फ विद्या की बर्फ समान शीतल चट्टान के दबाव को ही सहन नहीं करते थे, प्रतिभा की चिंगारी के ताप का भी अनुभव करते थे। गुरु-शिष्य, छात्र-शिक्षक के बीच तो रहता ही है, मनुष्य और मनुष्य के संबंधों के बीच भी जहां सिर्फ मजबूरियों का दबाव रहता है, हृदय की कोई उष्मा नहीं होती, जहां परस्पर संबंधों में अकृत्रिम कुछ नहीं होता . . . वहीं डिरोजियो के साथ उसके छात्रों के जो आंतरिक संबंध विकसित हुए थे वे अकृत्रिम मानवीय संबंधों की तरह ही बहुत ही अंतरंग थें और इसीलिये बाहर के जनसमाज में वे संबंध आंखों को चौंधिया देने वाली बिजली की चमक के साथ प्रकट हुए थे। खुद डिरोजियो के छात्रों ने अपने शिक्षक के बारे में जो लिखा वे उस अनोखे व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के लिये काफी है। उनका एक छात्र राधानाथ सिकदर लिखता है कि सिर्फ किताबी पांडित्य से ही उनकी शिक्षा समाप्त नहीं हो गयी थी, मनुष्य के जीवन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण शिक्षा सत्य के प्रति अटल निष्ठा और अन्याय के प्रति तीव्र घृणा और इसे उन्होंने अपने नौजवान शिक्षक डिरोजियो से ही हासिल किया था।

डिरोजियो और उनके छात्रों को इतिहास में ‘यंग बंगाल‘ के नाम से जाना जाता है। सन् 1834 में जब डिरोजियो की मृत्यु को तीन वर्ष हो चुके थे, लाल बिहारी दे पढ़ाई के लिये कोलकाता आये थे। इस वक्त तक डिरोजियन युग का हल्ला शांत नहीं हुआ था। गुरू की मृत्यु के बाद ‘यंग बंगाल‘ समूह ने और ज्यादा उत्साह के साथ उनके आदर्शों का प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया था। लाल बिहारी दे खुद एक प्रतिभाशाली छात्र थे और कोलकाता में कदम रखने के साथ ही उनका परिचय यहां के इस नये वातावरण के साथ हुआ था। डिरोजियो के छात्रों से उन्होंने डिरोजियो के बारे में कई कहानियां सुनी थीं। बाद में इसके बारे में लिखते हुए लाल बिहारी दे ने लिखा है :

‘‘हिंदू कॉलेज के तरुण छात्र बेकन, लॉक, बर्कले, ह्यूम, रीड, स्टीवर्ट आदि पश्चिमी दार्शनिकों के श्रेष्ठ साहित्य से परिचित हुए। इस परिचय से उनके गतानुगतिक सोच में एक क्रांतिकारी आलोड़न का सूत्रपात हुआ। प्रत्येक विषय के संदर्भ में उन्होंने प्रश्न उठाना तथा तर्क करना शुरू कर दिया। इसके चलते उनमें अनेक प्रचलित जड़ धारणाओं की जड़ें हिल गयी, युगों पुराने उनके आस्था के स्तम्भ हिलने लगे। इस नयी शिक्षा के अप्रतिद्वंद्वी शिक्षक थे, डिरोजियो। हिंदू कॉलेज में वे छात्रों की जो क्लास करते उसकी आबोहवा ही सबसे अलग थी। उनके पढ़ाने का ढ़ंग एकदम स्वतंत्र था। छात्रों को उनकी कक्षा में शिक्षा का जो नया आस्वादन मिलता, वह और कहीं विशेष मिलता नहीं था। डिरोजियो का प्रधान लक्ष्य था, छात्रों के अंदर ज्ञानेच्छा जागृत करना। हो सकता है यह छोटे विषय के साथ बड़े की तुलना हों, लेकिन ऐसा होने पर भी डिरोजियो क्लब के साथ एकमात्र प्लेटो और अरस्तू के ‘एकेडमी‘ की तुलना की जा सकती है। क्लास रूम के बंद परिवेश में स्वाभाविक रूप में ही विषय वस्तु पर आलोचना की स्वतंत्रता और गंभीरता रखना कठिन होता। डिरोजियो ने इसीलिये कॉलेज के बाहर अपने घर के बैठकखाने में छात्रों को बुलाना शुरू कर दिया। वहां के मुक्त परिवेश में विचार-विमर्श बहुत अच्छी तरह जम जाता, शिक्षक और उनके छात्र सभी को मन खोलकर अबाध रूप में बातचीत का मौका मिलता। कुछ ही दिनों में बैठकखाने का परिवेश भी बातचीत के लिये पूरी तरह उपयुक्त नहीं लगा। तब उन्होंने छात्रों को लेकर बाहर एक अघ्ययन चक्र और वाद-विवाद सभा गठित की।‘‘

डिरोजियो की शिक्षा पद्धति क्या थी, उनके छात्रों ने उनसे क्या गृहण किया, उनके छात्र सिर्फ शिक्षित ही नहीं बल्कि समाज के चरित्रवान, शक्तिशाली लोग थे, उन्होंने प्रश्न उठाना सीखा था। इन सबका एक परिचय लाल बिहारी दे के उपरोक्त कथन से मिलता है।

जाहिर है कि इसप्रकार के एक पूरी तरह से स्वतंत्र और मुक्त मस्तिष्क के लोगों के लिये कॉलेज के क्लास रूम बहुत ही संकुचित प्रतीत होने लगे। इन गुरू और शिष्यों की गोष्ठियां अब कॉलेज से निकल कर पहले डिरोजियो के घर में और फिर उनके एक छात्र, कृष्ण बिहारी सिंह की मानिकतल्ला स्थित बगानबाड़ी में होने लगी। इन गोष्ठियों का नामकरण किया गया, ‘एकेडेमिक एसोसियेशन‘। नौजवान छात्रों की इन विचार-गोष्ठियों की चर्चा तब पूरे समाज में होने लगी थी। लाल बिहारी दे ने लिखा है कि अकादमीशियनों की इस वाटिका में हफ्ते-दर-हफ्ते होने वाले वाद-विवाद में नौजवान कोलकाता उस वक्त के सामाजिक, नैतिक और धार्मिक विषयों को उठाया करता था। इन बहसों की मुख्य धार स्थापित धार्मिक संस्थाओं के विरुद्ध सुचिंतित विद्रोह पर केंद्रित होती थी। शिक्षा क्षेत्र के ये नौजवान सिंह (यंग लॉयंस ऑॅफ बंगाल) हर हफ्ते हिंदू धर्म का नाश हो, पोंगापंथ का नाश हो, के नारों के साथ दहाड़ा करते थे।

बंगाल के इन नौजवानों ने अपने वक्त के धार्मिक पिछड़ेपन, नैतिक मिथ्याचार और घिनौनेपन के खिलाफ, कुप्रथाओं और कुसंस्कारों के विरुद्ध, विवेकहीन शास्त्र-वचनों के खिलाफ, जात-पांत और मूर्ति-पूजा के विरुद्ध, राष्ट्रीय आर्थिक और मानसिक जड़ता के खिलाफ और यहां तक कि ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध भी इन गोष्ठियों में जो गर्जन-तर्जन हुआ करता था, उसकी ध्वनि-प्रतिघ्वनि समाज के विभिन्न स्तरों में सुनाई देने लगी थी। पारम्परिक समाज में इन चुनौतियों के सम्मुख एक प्रकार का आतंक पैदा हो गया था। डिरोजियंस की गोष्ठियों में तब कौन नहीं आता था। इनमें आने वालों में डेविड हेयर भी शामिल थे, विलियम बैंटिक के निजी सचिव भी आते थे, बिशप कॉलेज के अध्यक्ष, कोलकाता के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, कितने ही अखबारों के संपादक और शिक्षा प्रेमी लोग यहां इकट्ठा हुआ करते थे और यहां से नौजवानों की गरमा-गरम बातों से खुद के अंदर तारुण्य की स्फूर्ति भरकर जाया करते थे। विभिन्न सूत्रों से इन गोष्ठियों का जो विवरण मिलता है उनसे पता चलता है कि ये गोष्ठियां पूरी तरह से अनुशासित और इतने विद्वतापूर्ण वातावरण में आयोजित की जाती थी कि जिनमें गंभीर से गंभीर बहस के बावजूद कभी किसी को निजी स्तर पर कोई ठेस नहीं पंहुचाई जाती थी। ये सत्य के संधान की गोष्ठियां थीं। बहस में कोई भी पक्ष और विपक्ष नहीं होता था। एसोसियेशन के सदस्यों के अलावा श्रोताओं को भी बहस में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया जाता था। और, जैसा कि एक प्रत्यक्षदर्शी एलेक्जेंडर डफ के दिये गये विवरण से पता चलता है-‘‘इन बहसों में शामिल होकर कोई भी अपने को धन्य समझता था।‘‘ बहस का स्तर इतना ऊंचा होता था कि किसी को भी यह नौजवानों की गोष्ठी प्रतीत नहीं होती थी और इसलिये तत्कालीन समाज का हर उम्र, ओहदे और प्रकांड पंडित समझा जाने वाला व्यक्ति भी इन गोष्ठियों में उत्साह के साथ शामिल हुआ करता था। वक्तागण अपने वक्तव्यों के दौरान अनायास ही अंग्रेजी साहित्य की लम्बी उद्धृतियां दिया करते थे। ऐतिहासिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक सभी विषयों पर बहसें हुआ करती थी।। विनय घोष ने ऐसे कुछ विषयों को गिनाते हुए लिखा है कि ऐतिहासिक विषय होता तो रॉबर्टसन और गिबन की, राजनीतिक विषय होता तो एडम स्मिथ और जेरेम बेंथम की, वैज्ञानिक विषय होता तो न्यूटन और डेवी की, धार्मिक विषय होता तो ह्यूम और टामस पेइन, आध्यात्मिक विषय होता तो लॉक, रीड और स्टीवर्ट और ब्राउन की तरह के मनीषियों की रचनाओं का इन नौजवान सदस्यों द्वारा अपने पक्ष में बखूबी इस्तेमाल किया जाता था। उनके भाषण उस वक्त के प्रसिद्ध अंग्रेज कवियों, बायरन, वाल्टर स्काट की तरह के प्रमुख रचनाकारों की पंक्तियों से सुसज्जित हुआ करते थे। यहां एक अद्भुत सम्मोहक वातावरण हुआ करता था जिसमें पांडित्य और वाग्मिता का अपूर्व मिश्रण दिखाई देता था। ईश्वर के अस्तित्व, जाति प्रथा की अच्छाई और बुराई, मूर्ति-पूजा का पक्ष और विपक्ष, अंधविश्वास बड़ा है न कि तर्क और विवेक, अबाध व्यक्ति स्वातं़़त्र्य या बाधित, समष्टि-प्रभुत्व के बीच क्या काम्य है क्या वर्जनीय - ये सारे विषय बिल्कुल शास्त्रीय स्तर के वाद-विवाद में तारुण्य के आवेग के साथ उठा करते थे।


डिरोजियो युरेशियाई थे, लेकिन वे भारत की एक सच्ची संतान थे। भारत को ही वे अपना देश मानते थे। उनकी ‘जंगीरा का फकीर‘ कविता की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं, इसके अलावा अनेक छोटी-बड़ी कविताओं में उनकी देशभक्ति के स्वर साफ तौर पर सुने जा सकते थे। बंगाल के ये युवा सिंह सिर्फ सामाजिक कूपमंडूकता के विरुद्ध ही नहीं, विदेशी गुलामी के विरुद्ध भी गरजा करते थे।

मानिकतल्ला की इन अकादमिक सभाओं में जब डिरोजियो और उनके छात्र विचारोत्तेजक गोष्ठियां और विद्रोही चिंतन का सिंहनाद किया करते थे, उस समय तक बंगाल के नवजागरण के अग्रदूत राममोहन राय ने समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था। 4 दिसम्बर 1829 के दिन विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को प्रतिबंधित घोषित कर दिया था। बैंटिक की इस घोषणा से तत्कालीन पुरातनपंथी समाज में जो भारी हलचल मची थी उसे सभी जानते हैं। धर्म गया, जात गयी, का आतंक फैलाकर सारे धर्मघ्वजाधारी लोग सड़कों पर उतर आये थे। सरकार के पास नाना प्रकार के प्रतिवाद, प्रतिवेदन भेजे जा रहे थे। इसी संरक्षणवादी आंदोलन को चलाने के लिये 17 जनवरी 1830 को ‘धर्मसभा’ की स्थापना की गयी थी। पोंगापंथियों का सारा गुस्सा अब स्वतंत्र चेतना और पश्चिमी विचारों के विरुद्ध केंद्रित हो गया था। सरकार का तो वे बाल भी बांका नहीं कर सके लेकिन उन्होंने अपने गुस्से का निशाना हिंदू कॉलेज के प्रतिभाशाली विद्रोही नवशिक्षित नौजवानों को बनाया। उन्हीं दिनों पादरी अलेक्जेंडर डफ ने राजा राममोहन राय के सहयोग से जनरल एसेम्बली इंस्टीट्यूशन की स्थापना की जिसे भारत में ईसाई शिक्षा की आधारशिला बताया गया था। एलेक्जेंडर डफ ने खासतौर पर ‘यंग बंगाल’ के छात्रों को अपना लक्ष्य बना रखा था। उनकी मान्यता थी कि अगर इन प्रतिभाशाली छात्रों के बीच ईसाई धर्म का बीजारोपण किया जा सका तो उससे हिंदू समाज के कुसंस्कारों और उसकी जड़ता की अभेद्य दीवार को तोड़ना ज्यादा आसान होगा। डफ की गतिविधियों ने हिंदू कॉलेज के अधिकारियों के बीच हड़कंप पैदा कर दिया था। उस ईसाई पादरी के प्रभाव से छात्रों को बचाने के लिये कॉलेज की कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित किया कि जिसमें बताया गया कि कॉलेज के छात्रों के अशालीन आचरण से कॉलेज के अघ्यक्ष और अभिभावक अत्यंत क्षुब्ध और विचलित हैं और इसी बिनाह पर धर्म संबंधी किसी भी विचार-गोष्ठी या वक्तव्य में छात्रों की भागीदारी पर उन्होंने रोक लगा दी।

यह समूचा घटनाक्रम कोलकाता के तत्कालीन हिंदू समाज के अभिभावकों की मन:स्थिति को बताने के लिये काफी है। आतंकित अभिभावकों ने अपने बच्चों को कॉलेज से निकालना भी शुरू कर दिया था। औार इसीलिये 1829-32 के बीच हिंदू कॉलेज के छात्रों की संख्या में भी गिरावट आई, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है।

हिंदू कॉलेज की कमेटी द्वारा छात्रों पर लगाये गये प्रतिबंध को तत्कालीन अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं ने ‘धृष्टता‘, ‘निरकुंशता‘, ‘मूर्खता,‘ और ‘हास्यास्पद‘ आदि बताया था। जिस ‘इिंडया गेजेट‘ पत्रिका में कमेटी के इस निर्णय के विरुद्ध कड़े शब्दों में संपादकीय लिखा गया था, उसके सहयोगी संपादक डिरोजियो ही थे। संपादकीय की भाषा को देखकर लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि यह संपादकीय डिरोजियो का ही लिखा हुआ है। इसमें लिखा गया था-‘‘डेविड हेयर और रसोमय दत्त जैसे व्यक्तियों के नाम एक ऐसे दस्तावेज में देखकर हम दुखी हैं जो दस्तावेज राजनीतिक और धार्मिक मसलों पर निजी निर्णय के अधिकार में नाक घुसेड़ने की धृष्टता, निष्ठुरता और मूर्खता का एक उदाहरण पेश करता है।‘‘

छात्रों पर किसी भी धर्म संबंधी विचार गोष्ठी में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाने वाले कमेटी के निर्देश पर इस तीखी टिप्पणी पत्रिका में यह भी लिखा गया कि डफ साहब को अपने भाषण जारी रखने चाहिये।
जाहिर है कि ये तमाम घटनाएं हिंदू कॉलेज में डिरोजियो के विरुद्ध एक नफरत का वातावरण तैयार करने के लिये काफी थी। और चंद दिनों बाद ही इसके परिणाम भी सामने आने लगे।

23 अप्रैल 1831 के दिन हिंदू कॉलेज के गर्वनर चंद्र कुमार ठाकुर, सह सभापति विल्सन, राधाकांत देव, राधामाधव बंद्योपाध्याय, रामकमल सेन, डेविड हेयर, रसोमय दत्त, प्रसन्नकुमार ठाकुर, श्री कृष्ण सिंह और कॉलेज के सचिव लक्ष्मीनारायण मुखोपाध्याय की उपस्थिति में कालेज कमेटी की सभा हुई और इसमें मुख्य रूप से डिरोजियो को ही लक्ष्य बनाकर उनकी विचित्र शिक्षा पद्धति की वजह से नौजवानों के नैतिक पतन के बारे में चिंता जाहिर की गयी। इस सभा के अंत में विचार के लिये जो 14 सूत्री प्रस्ताव पेश किया गया, उसका पहला सूत्र ही था-‘‘चूंकि डिरोजियो सारे अनर्थ की जड़ है तथा आम लोगों में वह आंतक का विषय हो गया है, इसलिये उसे कॉलेज से निकालना उचित है और छात्रों के साथ उसके सीधे सम्पर्कों को तत्काल तोड़ना जरूरी है।‘‘

इसी में एक और प्रस्ताव यह भी था कि ‘‘जो तमाम छात्र हिंदू धर्म विरोधी आचरण करते हैं और इस देश के सामाजिक रीति-रिवाजों को मानकर नहीं चलते, उन्हें भी कॉलेज से बाहर कर देना जरूरी है।‘‘
इसके अलावा छात्रों की भरती के समय उनके स्वभाव और चरित्र के बारे में पूरी तरह खोज-खबर लेने का भी एक प्रस्ताव किया गया था।

एक प्रस्ताव यह भी था कि ‘‘यदि कोई छात्र बाहर की किसी सभा-समिति या भाषण में शामिल होता है तो उसे कॉलेज से निकाल दिया जायेगा।‘‘

इसके अलावा यह भी कहा गया कि ऐसे किसी भी विषय का पठन-पाठन नहीं होगा जिससे छात्रों के नैतिक चरित्र का पतन होता हो। इसके साथ ही फारसी और बांग्ला की पढ़ाई पर अधिक ध्यान देने तथा सीनियर क्लास के छात्रों को संस्कृत पढ़ाने का प्रस्ताव भी रखा गया था।

इस सभा में उपरोक्त प्रस्तावों पर जो बहस हुई उसके मिनिट्स विनय घोष की पुस्तक में दिये गये हैं। सभा में उपस्थित 9 लोगों में 6 ने डिरोजियो के पक्ष में राय दी थी और 3 ने विरोध में मत व्यक्त किया था। विरोध में मत देने वालों में धर्म सभा के नेता, राधाकांत देव प्रमुख थे जिन्होंने कहा कि वे नौजवानों को शिक्षा देने के मामले में डिरोजियो को एक पूरी तरह से अयोग्य शिक्षक मानते हैं। जबकि कमेटी के सह-सभापति विल्सन ने कहा कि डिरोजियो की शिक्षा के कुपरिणामों के कोई प्रमाण कम से कम उन्हें नहीं मिले हैं और वे उसे एक योग्य और शक्तिशाली शिक्षक ही मानते हैं। डेविड हेयर ने भी कहा था कि डिरोजियो की तरह का एक सुयोग्य शिक्षक आज के जमाने में मिलना दुर्लभ है और उनका मानना है कि उसकी सुशिक्षा के कारण छात्र विशेष तौर पर उपकृत हो रहे हैं। रसोमय दत्त और प्रसन्नकुमार ठाकुर ने भी डिरोजियो के खिलाफ किसी भी प्रकार के अभियोग की जानकारी से इंकार किया था। श्री कृष्ण सिंह ने तो साफ शब्दों में कहा कि डिरोजियो के खिलाफ सारे अभियोग आधारहीन हैं, उनकी योग्यता पर किसी तरह का कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है।

बहरहाल, इस समूची बहस का अंतिम परिणाम यह निकला कि डिरोजियो को उसकी नौकरी से तो हटा दिया जाय लेकिन इसके साथ ही उसकी योग्यता को उचित स्वीकृति भी प्रदान की जाय -
“Resolved that the measure of Mr.Derozio’s removal be carried into effect with due consideration for his merits and services.”

कमेटी की ओर से डिरोजियो को कहा गया कि बेहतर होगा कि वे खुद ही कॉलेज से इस्तीफा दे दें। गौर करने लायक बात यह है कि डिरोजियो ने खुद से इस्तीफा देने के प्रस्ताव को एक सिरे से खारिज कर दिया। कमेटी के अध्यक्ष विल्सन के पत्र का जवाब देते हुए उन्होंने लिखा : ‘‘ महोदय, आपके निर्देश के अनुसार इस पत्र के साथ मैंने त्यागपत्र भेज दिया है। इस पत्र को पढ़ने से जाहिर होगा कि अपनी मर्जी से पद त्याग करने के बारे में आपके प्रस्ताव को मैं पूरी तरह से स्वीकार नहीं पाया हूं। यदि मैं यह मानता कि मेरे अध्यापन के समय में कॉलेज का कोई अनिष्ट हुआ है या इसके बारे में कोई विश्वसनीय प्रमाण भी होता तो मैं बिना कोई प्रतिवाद किये इस्तीफा देने के तर्क को जरूर मान लेता। लेकिन अपने आत्मसम्मान की तिलांजलि देकर किसी सामयिक घटनाक्रम के हमले को स्वीकार करना मैं विवेकसम्मत नहीं मानता हूं। इस बात से मैं कैसे इंकार कर सकता हूं कि आप लोग मुझे इस्तीफा देने के लिये मजबूर कर रहे हैं। इसीलिये बिना किसी विवाद के इस्तीफा देना कत्तई संभव नहीं है। आप एक सम्माननीय व्यक्ति हैं। अपने सम्मान की रक्षा के लिये आपने यह अनुरोध किया है। लेकिन इस सांत्वना से मेरे अपमान की पीड़ा कहां कम हो रही है। प्रवीण और प्रज्ञावान लोग यदि मुझे हटाकर अपमानित करने पर तुले हैं तब मैं भी इस अपमान को सहने की शक्ति रखना वांछनीय नहीं समझता।

“कॉलेज के कुछ हिंदू प्रबंधकों ने मेरे खिलाफ जिस प्रकार का असंयत क्रोध व्यक्त किया है वो आसानी से शांत होता दिखाई नहीं देता। इसीलिये कॉलेज में फिर से शिक्षक के रूप में काम करने की संभावना तो फिलहाल नहीं देख रहा हूं। इसके अलावा कर्म जीवन के प्रवाह में बहते-बहते जिंदगी की नाव कौनसे किनारे जाकर लगेगी, वह तय नहीं है। संभव है कि जीवन में अब आपके सान्निध्य का सुअवसर प्राप्त नहीं होगा। इसलिये आज ऐसा सुअवसर प्रदान करने के लिये आपके प्रति अपनी पूरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। कॉलेज में काम करने के दौरान आपसे जैसा हार्दिक व्यवहार मिला, उसे जीवन में कभी भी नहीं भूलूंगा। -एच.एल.वी.डिरोजियो ‘‘

विल्सन को लिखे इस पत्र के साथ डिरोजियो ने जो त्यागपत्र भेजा था उसमें उन्होंने साफ शब्दों में लिखा था-प्रबंध कमेटी की बैठक में जो प्रस्ताव लिया गया उससे मजबूर होकर यह त्यागपत्र दे रहा हूं। वे कहते हैं कि मेरे विरुद्ध लाये गये एक भी अभियोग को आप प्रमाणित नहीं कर पाये हैं, यहां तक कि मुझे सफाई देने के अधिकार से भी वंचित किया गया। कमेटी का बहुमत मुझे एक योग्य शिक्षक मानता है, इसके बावजूद आप येन-केन-प्रकारेण मुझे हटाने के लिये तुले हुए हैं। इसप्रकार यह एकतरफा विचार करके मुझे दंड दिया गया है। आशा है कि इस सच्चाई को स्वीकारने में आपको कोई संकोच नहीं होगा।

डिरोजियो ने लिखा कि वे इससे ही बहुत खुश हो जाएंगें।

डिरोजियो के इस खत के जवाब में अब विल्सन साहब ने उनपर लगाये गये अभियोगों को उन्हें लिखकर भेजा। विल्सन ने उनके सामने तीन गंभीर सवाल रखे और लिखा कि इन सवालों का जवाब आप दे भी सकते हैं और नहीं भी दे सकते हैं। उनका पहला सवाल था - क्या आप ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं ?

दूसरा प्रश्न था कि क्या आप यह मानते हैं कि पिता-माता के आदेशों का पालन करना अथवा उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति दिखाना किसी के भी नैतिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं होता ?

तीसरा सवाल था कि क्या आपकी राय में भाई -बहन के बीच विवाह सामाजिक अपराध नहीं है ? क्या आप इन विषयों पर छात्रों के साथ खुलकर बातचीत किया करते हैं ?

विल्सन साहब के इन गंभीर अभियोगों भरे सवालों के जवाब में डिरोजियो ने एक काफी लम्बा पत्र लिखा जिसे विनय घोष ने अपनी पुस्तक में बिल्कुल सही, उनके जीवन के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की संज्ञा दी है। इस पत्र में उन्होंने एक-एक करके हर सवाल का माकूल जवाब दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि मैंने कभी अपने को नास्तिक के रूप में पेश नहीं किया, लेकिन ईश्वर के अस्तित्व या अनअस्तित्व के बारे में खुलकर बहस करना अपराध है तो इस अपराध को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है। इस बारे में दुनिया में अनेक मत है और उनको लेकर मैंने छात्रों के साथ खुले मन से बहस की है। मैंने आस्तिकों की बात भी कही है और नास्तिकों की भी। इसके अलावा उन लोगों की बात भी कही है जो इसप्रकार के सवालों को बेमानी मानते हैं। इसी सिलसिले में डिरोजियो की राय थी -‘‘किसी का कुछ भी विश्वास क्यों न हो, यदि विरोधी की राय का विश्लेषण नहीं किया जाता है तो उस विश्वास का आधार कैसे दृढ़ हो सकता है। ‘‘

इसी क्रम में डिरोजियो ने लार्ड बैकन को उद्धृत किया कि ‘‘if a man will begin with certainities, he shall end in doubts.”

डिरोजियो ने पश्चिम के और भी कई विद्वानों का इसमें जिक्र किया और निष्कर्ष के तौर पर लिखा कि - ‘‘ सच कहूं तो मनुष्य के ज्ञान की सीमा और उसके विचारों की परिवर्तनशीलता के बारे में मैं खुद इतना अधिक संवेदनशील हूं कि बहुत से मामूली किस्म के विषयों पर भी मैं अपनी एक निश्चित राय व्यक्त नहीं करता हूं। किसी अन्वेषक की तरह अनन्त समुद्र में अज्ञेय सत्य के द्वीप की यात्रा करना ही ज्ञानान्वेषण का श्रेष्ठ पथ है, यही मेरी धारणा है।

मेरे खुद का मानस कुछ ऐसा ही है। प्रश्नविहीन, संशयहीन मन जितना जल्दी जड़ता के जाल में फंसकर असमय मानसिक मृत्यु को प्राप्त करता है, प्रश्नाकुल, संशयों से भरा हुआ मन मनुष्य को उतनी आसानी से संदेहवादी या नकारवादी नहीं बनाता है। सत्य वह या जो हम विश्वास करते हैं वही ध्रुव सत्य है, कोई भी सत्यान्वेषी मनुष्य हलफ लेकर इसप्रकार की बात नहीं करेगा।‘‘

जहां तक माता-पिता के प्रति श्रद्धा और उनके आदेशों को मानने का सवाल था, डिरोजियो ने इसपर गहरा आश्चर्य व्यक्त किया और इसे अपने विरुद्ध एक घिनौना दुष्प्रचार भी बताया। उन्होंने लिखा कि - ‘‘ मैं यदि पितृहीन नहीं होता तो खुद मेरे पिता ही इस दुष्प्रचार का उचित जवाब दे देते।‘‘ उन्होंने बहुत ही कड़े शब्दों में लिखा कि जो लोग उन पर ऐसा अभियोग लगा रहे हैं उन सभी महात्माओं की तुलना में वे कम मातृभक्त नहीं हैं।

अपने पत्र में डिरोजियो ने ऐसे कई उदाहरण तक गिनाये हैं जिनसे पता चलता है कि किसप्रकार उन्होंने अपने माता-पिता का निरादर करने वाले छात्रों के अशोभनीय आचरण का तिरस्कार किया था और उन्हें अपने माता-पिता से माफी मांगने को मजबूर किया था।

विल्सन द्वारा उठाये गये तीसरे सवाल, अर्थात भाई-बहन के बीच विवाह के प्रश्न पर डिरोजियो की कड़ी टिप्पणी थी कि इसप्रकार के एक अजूबे सवाल पर वे छात्रों के साथ बात कर सकते हैं, ऐसा उन्होंने सोचा भी कैसे! उन्होंने इस अभियोग को किसी उर्वर मस्तिष्क की उपज बताया और कहा कि कोइ्र्र कापुरुष, चरित्रहीन व्यक्ति ही उनके खिलाफ इसप्रकार के झूठे दुष्प्रचार में उतर सकता है। ऐसे लोग झूठ के बल पर ही जिंदा रहते हैं। डिरोजियो ने विल्सन साहब को इसप्रकार की अफवाह फैलाने वालों को यह संदेश भेजने का आग्रह किया कि - ‘I am not a greater monster than most people’.

डिरोजियो ने इस पत्र में उनके तथा उनके परिवार के बारे में फैलाई जा रही मनगढ़ंत कहानियों और गंदी-गंदी बातों का हवाला दिया। अपने इस पत्र के अंत में उन्होंने विल्सन साहब से पूछा था कि क्या झूठी अफवाहों के डर से या निंदकों को खुश करने की गरज से मुझे कॉलेज से निकाल बाहर करना आप जैसे विवेकवान व्यक्ति के लिये उचित था ? डिरोजियो का कहना था कि जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध झूठी अफवाहें फैलाई जाती है, तब उन्हीं अफवाहों के आधार पर उस व्यक्ति को कठोर दंड देना क्या झूठ को प्रश्रय देने के समान नहीं है ?

डिरोजियो के चिर प्रश्नाकुल अधीर मन-मस्तिष्क ने कभी भी शांत होना तो सीखा ही नहीं था। हिंदू कॉलेज से इसतरह निकाले जाने के बाद भी न तो डिरोजियो और न ही उनके शिष्य किसी तरह की निराशा या पस्तहिम्मती का शिकार हुए। डिरोजियो ने ‘ईस्ट इंडियन‘ नामक दैनिक पत्र का संपादन शुरू कर दिया और अपने शिष्यों को भी पत्रकारिता से जुड़ने के लिये प्रेरित किया। जाहिर है उस समय वैचारिक संघर्ष के लिये अखबार से बड़ा और दूसरा माध्यम क्या हो सकता था ? उनके छात्र कृष्णमोहन बंद्योपाध्याय, जो उस समय मात्र 18 वर्ष के थे, ने 1831 की मई में ‘द एनक्वायरर‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन और संपादन किया और 17 वर्ष के दक्षिणारंजन ने बांग्ला साप्ताहिक पत्र, ‘ज्ञानान्वेषण‘ का संपादन किया। सत्य और ज्ञान की खोज ही इन अखबारों का उद्देश्य बताया गया। उधर डिरोजियो के हिंदू कॉलेज से निकाले जाने के बाद भी हिंदू कट्टरपंथियों का उनके प्रति आक्रामक अभियान खत्म नहीं हुआ था। अखबारों में रोज डिरोजियो के विरुद्ध झूठी अफवाहें छपती रहती थीं कि किसप्रकार उनकी शिक्षा नौजवानों को बिगाड़ रही है और वे अपनी सभ्यता और संस्कृति का अनादर कर रहे हैं। इन हमलों के जवाब में जुलाई महीने के अंत में डिरोजियो के शिष्य कृष्णमोहन ने ‘एनक्वायरर’ में लिखा-

‘‘अभियोगकर्ताओं का गुस्सा अभी भी उतना ही उग्र बना हुआ है। सारे कट्टरपंथी अभी निंदा गर्जन में लगे हुए हैं। गुरुम सभा का ताप हिंसक बना हुआ है और वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। धर्मान्ध लोग समाज से बहिष्कार करने की हुंकारे भर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इसके प्रति सहनशीलता उदारपंथियों का जवाब होगा। गुरुम सभा का ताप बढ़ा हुआ हो, उसे उबाल बिंदु तक जाने दिया जाय। पोंगापंथी क्रुद्ध हैं; उन्हें आग के रूप में विस्फोटित होने दिया जाय। उदारपंथियों की आवाज उन रोमन लोगों की तरह हो जो सिर्फ कर्म करना ही नहीं जानते हैं, बल्कि उसके लिये दुख भी बरदाश्त करना जानते हैं। समाज बहिष्कार का डंका घर-घर बजे। सैकड़ों लोग समाज से बाहर हों; वे सब एकजुट होकर एक पार्टी बनायेंगे, तभी हमारा उद्देश्य सफल होगा।‘‘

लाल बिहारी दे ने इस संबंध में लिखा है कि सप्ताह-दर -सप्ताह इसीतरह ‘एन्क्वायरर’ के पन्नों पर रूढि़वादी हिंदुओं के विरुद्ध प्रचार चलता रहता। यह अखबार अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने का एक हथियार बन गया था। कृष्णबिहारी विद्रोही युवकों के नेता बन गये थे। उनका घर उन तरुण नौजवानों का एक अड्डा बन गया था जो जात-पांत की दीवारों को तोड़कर आगे बढ़ रहे थे।

अपने गुरू के इस तरह कालेज से निकाले जाने तथा धर्म सभा के हमलों ने इन छात्रों को और उद्वेलित कर दिया था। इन सभी नौजवानों का अड्डा अब कृष्णमोहन के घर जमता, जहां विभिन्न विषयों पर जमकर चर्चाएं होतीं और संघर्ष के नये-नये तरीके ईजाद किये जाते। ‘एन्क्वायरर’ और ‘ज्ञानान्वेषण’ में इन गोष्ठियों की खबरें छपती रहतीं।

विनय घोष ने उन दिनों की एक घटना का जिक्र अपनी पुस्तक में किया है कि किस तरह 23 अगस्त 1831 के दिन कृष्णमोहन की अनुपस्थिति में उनके घर में हिंदुओं की धर्मान्धता पर चर्चा करते हुए इतनी उत्तेजना पैदा हुई कि उसी उत्तेजना में एक छात्र मछुआ बाजार की मुस्लिम दुकान से रोटी और गोमांस खरीद कर ले आया। वहीं पर सब छात्रों ने उसे खाया और हड्डियां पास के चक्रवर्ती परिवार में फेंक कर चिल्लाने लगे, गाय की हड्डी, गाय की हड्डी। गाय की हड्डी की आवाजें सुनकर चक्रवर्ती परिवार में हड़कंप मच गया। सारे पड़ौसी इका हो गये और उन नौजवानों को मारने के लिये लपके। उस समय किसी तरह ये नौजवान अपनी जान बचाकर भाग निकलने में सफल हुए। कृष्णमोहन जब घर लौटे तो इस बात को जानकर बहुत दुखी हुए, सबको समझाने की बहुत कोशिशें की लेकिन मामला किसी तरह शांत नहीं हुआ। सभी का कहना था कि कृष्णमोहन को घर और मोहल्ला छोड़ना होगा। और इसप्रकार अपने घर से आग उठाने वाले कृष्णमोहन ही सबसे पहले इस आग में झुलस गये, उन्हें अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। लेकिन कट्टरपंथियों का गुस्सा इससे भी शांत नहीं हुआ, वे उन्हें हर गली, मोहल्ले में अपमानित करते और यहां तक कि गुप्त रूप से उन्हें मारने की साजिशें भी रची जाने लगी।

तत्कालीन हिंदू समाज और उसके अंदर गहराई तक जमे हुए कुसंस्कार, अंधविश्वास और उनके पोंगापंथ का क्या रूप था, इसकी चर्चा हम शुरू में ही कर आये हैं। यह भयानक पुरातनपंथी समाज था। यह समाज राममोहन राय को भी बरदाश्त नहीं कर पा रहा था। उनकी भी हत्या करने की कम साजिशें नहीं की गयी थीं। ऐसे में डिरोजियो और उनके शिष्यों का यह चरम विद्रोही रूप इस समाज के लिये कितना चुनौती भरा होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। समूचा हिंदू समाज इनके खिलाफ जैसे तलवार लेकर उतर पड़ा था। इसी परिवेश में कृष्णमोहन ने ‘एन्क्वायरर’ में लिखा –

‘‘हम जानते हैं कि हर रोज हमारे विरोधी हम पर हमले की नानाप्रकार की साजिशें कर रहे हैं। हमारे स्वभाव और चरित्र के बारे में भी झूठी बातें फैलाने के लिये पर्चें बांटे जा रहे हैं ... लेकिन हम हरप्रकार के अत्याचार को सहने के लिये तैयार हैं। हम जानते हैं कि किसी राष्ट्र को संस्कारों से मुक्त और विकसित मस्तिष्क का बनाने पर बाहर में कुछ शोर और विभ्रम पैदा होगा ही।‘‘

डिरोजियंस का नीति-मंत्र ही था - ‘‘वह जो विवेक का प्रयोग नहीं करता वह कट्टरपंथी होता है, जो विवेक का इस्तेमाल नहीं कर सकता वह मूर्ख है और जो विवेक का प्रयोग नहीं करता वह गुलाम है।‘‘ जाहिर है कि डिरोजियंस हर कुरबानी और शहादत देकर समाज की इन मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोड़ देना चाहते थे। एक तरफ डिरोजियो के शिष्य समाज की मानसिक बेडि़यों को तोड़ने की लड़ाई लड़ रहे थे और दूसरी तरफ खुद डिरोजियो भी ‘ईस्ट इंडियन‘ अखबार के जरिये अपने समाज के खिलाफ भी लगातार तीखी वैचारिक लड़ाई लड़ रहे थे। अपने अखबार में 1831 के सितम्बर महीने में उन्होंने ‘जॉन बूल ‘ पत्रिका के संपादक के बारे में कुछ टिप्पणियां की थी जिससे तत्कालीन यूरोपियन समाज काफी उद्वेलित हो उठा था। इसका जिक्र करते हुए खुद इस पत्रिका के संपादक मैक्नागैटन ने लिखा है :

‘‘अगले दिन वे एक दोस्त को साथ लेकर डिरोजियो के घर गये। घर में पहुंचने पर हमें एक आफिस में ले जाया गया, जहां दो लोग बैठे हुए थे। मैंने इससे पहले डिरोजियो को कभी देखा नहीं था। इसलिये घर में घुसते ही पूछा, ‘ईस्ट इंडिया‘ के संपादक से मिलना चाहता हूं। कुछ झिझक के बाद एक आदमी ने कहा, मैं ही संपादक हूं। उसके बाद मैंने कहा कि क्या यह लेख आपका ही है? मेरे हाथ से लेख लेकर उसने कुछ देर तक उसे देखा और फिर कुछ हकलाते हुए कहा कि हां, मैंने ही लिखा है। मैंने लेख उसके हाथ से लेकर अपनी जेब में रख लिया। और कहा कि इस लेख में आपने जिस सीमाहीन उदंडता का परिचय दिया है उसके लिये मैं व्यक्तिगत रूप में आपको दंड देने के लिये आया हूं, कहकर मैंने डिरोजियो की कालर पकड़कर हल्के से उसपर दो बेंते जमाई। इच्छा तो थी उसके कंधों पर मारने की लेकिन उसने बचाव में हाथ आगे किये तो बेंत उसके हाथ में ही लगी। डिरोजियो ने मुझे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। वह एकदम पीला पड़ गया था और कांप रहा था। (इंडिया गैजेट, 26 सितम्बर 1831)

तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद डिरोजियो की कलम की धार कम नहीं हुई। वे हिंदू समाज और योरोपीय समाज, दोनों के पोंगापंथ के विरुद्ध लगातार लिखते रहे। उनकी लेखनी साम्राज्यवाद और उसकी नीतियों के खिलाफ भी उठती रही। कहना न होगा कि हिंदू समाज के साथ ही साथ योरोपीय समाज भी इस कारण उनसे भंयकर नाराज रहने लगा। डिरोजियो अपने मित्र कृष्णमोहन का, जो हिुदुओं के कट्टरपंथ और अंधविश्वासों के खिलाफ लगातार अपने अखबार के जरिये वैचारिक संघर्ष चला रहे थे, अपने पत्र के जरिये उत्साह-वद्र्धन करते रहते थे। हिंदू नरमपंथी लोग जो नीतिगत रूप में मूर्तिपूजा का विरोध करते थे, लेकिन घर में मूर्तिपूजक बने रहते थे उनकी इन दोगली नीतियों का भी ये नौजवान विरोध करते थे। सुधारवादियों के नेता, ‘रिफोर्मर’ पत्रिका के संपादक, प्रसन्न कुमार ठाकुर के इस दोगले चरित्र को भी ‘एन्क्वायरर’ के पन्नों पर बेनकाब किया गया था। उस समय के निकलने वाले सुधारवादी या मध्यममार्गी अखबार, ‘इंडिया गैजेट‘, बंगाल हरकरा‘, ‘रिफोर्मर‘ तथा ‘समाचार दर्पण‘ इन तरुणों के खिलाफ लगातार टीका-टिप्पणियां करते और उन्हें गरमपंथ की बजाय नरमपंथी रास्ता अपनाने की सीख दिया करते। ‘इंडिया गैजेट’ का कहना था कि राममोहन के अनुगामी ब्रह्मसभाई हिंदू समाज के मध्यमार्गी हैं और डिरोजियो के स्वतंत्र चिंतन के हिमायती अल्ट्रा लेफ्ट या रैडिकल पार्टी हैं। ये दोनों ही समाज को सुधारना चाहते हैं, उसकी उन्नति और कल्याण की कामना करते हैं तथा हमेशा से प्रचलित शास्त्र-वचनों की तुलना में तर्क और विवेक पर निर्भर रहना चाहते हैं। दोनों दल ही मूर्ति पूजा और निरर्थक कुसंस्कारों का परित्याग करना चाहते हैं, जातिप्रथा को अमानवीय प्रथा समझकर उसे मान्यता नहीं देना चाहते तथा हर विषय में धर्मान्धता से घृणा करते हैं। लेकिन मध्यममार्गी धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहते हैं ...।‘‘ इसी तरह ‘रिफोर्मर’ पत्रिका भी ‘इंडिया गैजेट’ के विचारों के समर्थन में उतरी हुई थी।

तरुण डिरोजियंस सुधारवादियों की हर दलील का जवाब बड़े धीरज और तर्क के साथ देते। ‘एन्क्वायरर’ में ‘इंडिया गैजेट’ की इन बातों का जवाब देते हुए लिखा गया - ‘‘हम आशा करते हैं कि वे यह बात नहीं भूले होंगे कि हमारा लक्ष्य हमारे नौजवान मित्रों को उदार उदाहरण देकर उन्हें प्रभावित करना है और हमने कभी भी पोंगापंथी समुदाय के बुजुर्ग लोगों को समझाने की कोशिश नहीं की है।‘‘

गाय की हड्डियां फेंकने की घटना का बार-बार ‘इंडिया गैजेट’ द्वारा हवाला देकर तरुण डिरोजियंस का अपमान करने के प्रसंग के बारे में ‘एन्क्वायरर’ ने लिखा - ‘‘कुछ दिन पहले एक पोंगापंथी हिंदू के घर में गाय की हड्डी फेंकने की घटना का ‘इंडिया गैजेट‘ के संपादक ने फिर से उल्लेख किया है तरुणों को लोगों को समाज की आंखों से गिराने के लिये। लेकिन जब नौजवानों ने यह स्वीकार कर लिया है कि यह काम करके उन्होंने बहुत बड़ी गल्ती की है, इसके लिये उन्होंने पश्चाताप भी व्यक्त किया है और भविष्य में कभी इसतरह का आचरण नहीं करने का प्रण भी किया है, तब हमारे सहयोगी के लिये यह उचित नहीं था कि इस तरह की घटना का फिर से उल्ल्ेाख करके नौजवानों पर कीचड़ उछाले।‘‘

डिरोजियो और उनके शिष्यों का यह वैचारिक संघर्ष इसी तरह चलता रहा। लेकिन अचानक इस संघर्ष की लौ जलानेवाला, नौजवानों की रगो में, उनकी आंखों में लहू बनकर टपकने वाला डिरोजियो जिस तरह एक तूफान की तरह आया था, उसी तरह अचानक चला भी गया। हिंदू कालेज से निकाले जाने के मात्र 8 महीनों के बाद ही 23 दिसम्बर 1831 को वे इस दुनिया से चले गये। शिवनाथ शास्त्री ने लिखा है कि 17 दिसम्बर को उन्हें कालेरा हो गया। छ: दिनों तक वे बिस्तर पर पड़े रहे। उनकी बीमारी के समय उनके पास उनके शिष्य महेषचन्द्र घोष, कृष्णमोहन बंद्योपाध्याय, रामगोपाल घोष, दक्षिणारंजन मुखोपाघ्याय आदि थे और रात-दिन उनकी सेवा में लगे रहे। लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। 24 दिसम्बर (विनय घोष के अनुसार 23 दिसंबर) को वे इस दुनिया को छोड़ कर चले गये।

अपनी मौत के कुछ दिनों पहले डिरोजियो ने यह कविता लिखी थी -

Expanding. like the petals of young flowers;
I watch the gentle opening of your minds.
And the sweet loosening of the spell that binds
Your intellectual energies and powers,
That stretch (young bird in soft summer hours)
Their wings to try their strength. O how that winds
Of circumstances, and freshening April showers
Of early knowledge, and unnumbered kinds
Of new perceptions shed their influences;
And how you worship Truth’s omnipotence!

What joyance rains upon me, when I see
Fame, in the mirror of futurity,
Weaving the chaplets you are yet to gain,
And then I feel I have not lived in vain.
(The Bengal Annual, 1831)

वास्तव में डिरोजियो अपने तरुण छात्रों के दिमागों की खिड़कियां खुलते हुए देख रहे थे, देख रहे थे कि उनके नन्हें चूजे अब अपने परों में नयी ताकत भरकर उड़ने के लिये तैयार हो रहे है। उनका जीवन वृथा नहीं गया था। यही उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख था।

आज उस तरुण नौजवान के जीवन के 200 वर्ष बाद जब हम उन युवा डिरोजियंस के संघर्ष को याद करते हैं तो लगता है कि क्या वही अक्षत ऊर्जा, वही अदम्य साहस, वही निष्ठा और ईमानदारी हर युग के नवोन्मेष के लिये जरूरी नहीं है? शायद हर युग को इसतरह के अग्निबीजों की जरूरत होती है। अग्निबीज कभी मरते नहीं बस थो़ड़ी सी हवा पानी मिलते ही फिर-फिर अंकुरित और प्रस्फूटित हो उठते हैं और इसी तरह प्रगति की धारा को कभी तेज तो कभी धीमी गति से प्रवहमान बनाये रखते हैं। समाज की बूढ़ी रगों में नया जीवन भरने के लिये डिरोजियंस की तरह के अग्निबीज हमेशा-हमेशा हमारी प्रेरणा के श्रोत बने रहेंगे। डिरोजियो की स्मृतियां अमर रहे।










 



सोमवार, 13 अप्रैल 2015

इडवर्डो ग्यालियानो नहीं रहे



उरुग्वे के अपने जन्म स्थान मोन्तेविदेओ में कल, 13 अप्रैल को लातिन अमेरिका के लोकप्रिय वामपंथी लेखक, गैर-पेशेवर इतिहासकार, राजनीति, अर्थनीति, साहित्य और कला तथा फुटबाल जैसे तमाम विषयों पर भी पूरी दक्षता के साथ लिखने वाले इडवर्डो ग्यालियानो की मृत्यु होगयी। वे 74 साल के थे और लंबे अर्से से फेफड़े के कैंसर से पीडि़त थे।

सन् 2009 में त्रिनिदाद में हुए ‘समिट आफ अमेरिकाज’ में जब अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से वेनेजुएला के राष्ट्रपति उगो सावेज की मुलाकात हुई थी, सावेज ने ओबामा को ग्यालियानो की ही पुस्तक ‘ओपेन वेन्स आफ लैटिन अमेरिका’ की एक प्रति भेंट की थी। लातिन अमेरिका में स्पैनिश औपनिवेशिक युग और परवर्ती पूंजीवादी युग की लूट के इतिहास की कहानी - बोलीविया के गुलाम खदान मजदूरों की करूण स्थिति, ब्राजील के घने जंगलों की तबाही और वेनेजुएला के तेल के मैदानों में छाये हुए प्रदूषण की इस गाथा ने लातिन अमेरिका में वामपंथ के उदय में एक भूमिका अदा की थी। ग्यालियानो पेशेवर इतिहासकार नहीं थे और न कभी उन्होंने ऐसा कोई दावा ही किया, लेकिन वे इतना जरूर कहते थे कि इतिहास के विषय को अकादमिशियनों ने जिसप्रकार अगुआ कर लिया है, उनसे इसे मुक्त कराने के वे साक्षी जरूर रहे हैं।

‘ओपेन वेन्स आफ लैटिन अमेरिका’ 1971 में प्रकाशित हुई थी। कहा जाता है कि इस पुस्तक की भारी लोकप्रियता के बावजूद परवर्ती दिनों में ग्यालियानो  की यह मान्यता थी कि इसे और भी परिपक्वता के साथ लिखा जाना चाहिए था। लेकिन साम्राज्यवाद-विरोधी अपने वामपंथी विचारों से ग्यालियानो कभी जरा सा भी नहीं डिगे थे।

सन् 1973 में उरुग्वे में सामरिक सरकार कायम हुई। ग्यालियानो को उस सरकार ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें निर्वासित जीवन जीने के लिये मजबूर किया। 1973 से 1985 तक वे पहले अर्जेन्तिना में, और फिर स्पेन में रहे। सन् ‘85 में सामरिक शासन के अंत के बाद ही वे अपने देश में वापस लौट पाये थे।
‘मेमरी आफ फायर’ शीर्षक उनकी पुस्तकों की त्रयी भी लातिन अमेरिका के पाठकों के बीच खासी लोकप्रिय रही। उनका साफ कहना था कि वे इतिहास के आख्यानों में तटस्थता के लिये कोई जगह नहीं पाते है। वे अपने को परिस्थितियों से दूर और तटस्थ रखने में असमर्थ रहे हैं। उनकी आत्मजीवनी ‘डेज एंड नाइट आफ लव एंड वार’ में 20वीं सदी की उत्तरार्द्ध में पूरे लातिन अमेरिका में हत्याओं, यातनाओं, लोगों के गुम हो जाने की जो त्रासद परिस्थितियां थी, उनका एक बहुत ही जीवंत चित्र देखने को मिलता है।

इडवर्डो ग्यालियानो फुटबाल प्रेमी भी थे। फुटबाल के प्रति एक प्रेमपत्र के रूप में उन्होंने एक पुस्तक लिखी - ‘सॉकर इन सन एंड शैडो’। इसे खेलों पर लिखी गयी एक श्रेष्ठ पुस्तक माना जाता है। पाठको का कहना हैं कि फुटबाल पर लिखने वालों में ग्यालियानो  सचमुच ‘पेले’ थे।

इडवर्डो ग्यालियानो के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम उनके शोक संतप्त परिवार और लातिन अमेरिका के उनके लाखों प्रिय पाठकों के प्रति अपनी संवेदना प्रेषित करते हैं।
  


क्या यह लातिन अमेरिका के इतिहास के एक नये अध्याय का प्रारंभ है ?


17 दिसंबर 2014, जब 55 साल बाद पहली बार क्यूबा और अमेरिका के राष्ट्रपतियों के बीच टेलिफोन पर वार्ता हुई और दोनों देशों में कूटनीतिक संबंधों की पुनर्बहाली का निर्णय लिया गया। तब हवाना की सड़कों पर नौजवानों के उच्छवास ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। उस ऐतिहासिक फैसले पर हमें भी निराला जी की कविता की पंक्तियां याद आगयी थी - ‘‘बहुत दिनों बाद खुला आसमान/ निकली है धूप, हुआ खुश जहान।’’
17 दिसंबर 2014 को टेलिफोन वार्ता से लातिन अमेरिका के इतिहास में एक नये सफे को जोड़ने का यह जो सिलसिला शुरू हुआ, उसके चार महीना बीतते न बीतते जो बात ध्वनि तरंगों के माध्यम से हुई थी, वही अब आमने-सामने शुरू हुई। मौका था पनामा में शुरू हुए समिट आफ अमेरिकाज (अमेरिकी देशों की शिखर वार्ता) का जिसमें अन्य तमाम लातिन अमेरिकी देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और क्यूबा के राष्ट्रपति रॉउल कैस्त्रो भी पहुंचे थे और यही पर पचास साल में पहली बार दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात हुई और मुलाकात के साथ ही पूरे एक घंटे की लंबी बातचीत भी हुई। इन दो राष्ट्राध्यक्षों के हाथ मिलाने की घटना को ही कूटनीति की दुनिया के लोग लातिन अमेरिका के इतिहास में एक नये चरण के प्रारंभ के रूप में देख रहे है। 
दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच इस बातचीत के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि हमारे बीच मतभेद है, और रहेंगे भी। लेकिन मतभेदों के साथ ही आगे हमारे बीच परस्पर सम्मान और सौजन्य भी बना रहेगा। यही वह तरीका है जिससे हम इतिहास के एक नये पृष्ठ की ओर बढ़ेंगे। ओबामा ने जनतंत्र और मानवाधिकार के सवाल का जिक्र प्रमुख तौर पर किया। 
क्यूबा के राष्ट्रपति रॉउल कैस्त्रो ने कहा कि हम सिर्फ एक नहीं, तमाम विषयों पर आपस में वार्ता को जारी रखना चाहते हैं। लेकिन इसके लिये हमे अपार धीरज बनाये रखना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि मैंने राष्ट्रपति ओबामा से वार्ता के दौरान क्यूबा की क्रांति के बारे में काफी भावावेग के साथ अपनी बात रखी थी। लेकिन ओबामा का तो तब जन्म भी नहीं हुआ था जब अमेरिका ने क्यूबा के साथ संबंधों पर प्रतिबंध लगाये थे। ओबामा व्यक्तिगत रूप से उस कदम के लिये जिम्मेदार नहीं थे, इसीलिये मैंने उनसे क्षमा भी मांगी। 
राष्ट्रपति ओबामा ने राष्ट्रपति कैस्त्रो की बात से सहमति जाहिर करते हुए कहा कि शीत युद्ध का काफी दिन पहले ही अंत हो चुका है। जो लड़ाई मेरे जन्म के पहले शुरू हुई थी, उसे आगे जारी रखने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। 
उन्होंने यह भी कहा कि आज राष्ट्रपति कैस्त्रो और मैं यहां बैठ कर बात कर रहे हैं, यह एक ऐतिहासिक क्षण है। मैं आशावादी हूं। हम अपने संबंधों को सुधारने की प्रक्रिया को जारी रखेंगे और यह सिर्फ क्यूबा के लिये नहीं, इस पूरे क्षेत्र के लिये इतिहास का एक संक्रमणकाल कहलायेगा। हमारे दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहेगी और तमाम मतभेदों के बावजूद, जारी रहेगी। 
इस शिखर वार्ता के दौरान ओबामा ने सिर्फ रॉउल कैस्त्रो से ही नहीं, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलैस मादुरो के साथ भी मुलाकात की। मादुरो ने इस बैठक को एक हार्दिकता के साथ हुई बैठक बताया। इस बैठक के पहले ही ओबामा ने साफ तौर पर यह कह दिया था कि वे वेनेजुएला को खतरनाक नहीं मानते हैं, जबकि महीने भर पहले ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने वेनेजुएला को खतरनाक घोषित किया था।
इस पूरे संदर्भ में याद आती है, नोम चोमस्की की बात। आज की दुनिया में अमेरिका की भूमिका के बारे में उन्होंने कहा था कि अमेरिकी नीतियों में यदि मामूली बदलाव भी होता है तो बाकी दुनिया के लिये उसके काफी बड़े मायने हो सकते हैं। लातिन अमेरिका के देशों ने अपनी राष्ट्रीय सार्वभौमिकता की लंबी लड़ाई के जरिये आज अमेरिकी हुक्मरानों को अपनी लातिन अमेरिकी नीति के बारे में नये सिरे से विचार करने के लिये मजबूर किया है। क्यूबा और वेनेजुएला के राष्ट्रपतियों के साथ राष्ट्रपति ओबामा की इन बैठकों को इसीलिये लातिन अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में एक नये अध्याय के प्रारंभ के तौर पर देखा जा रहा है। 
हम यहां 17 दिसंबर 2014 की अपनी टिप्पणी का लिंक दे रहे हैं :
http://chaturdik.blogspot.in/2014/12/blog-post_18.html

मंगलवार, 31 मार्च 2015

आलोचना के कब्रिस्तान से...

अरुण माहेश्वरी








सन् 1984 की बात है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म शताब्दी वर्ष था। कहा जा सकता है - आज की हिन्दी आलोचना के गोमुख का शताब्दी वर्ष। जनवादी लेखक संघ को बने अभी दो साल ही हुए थे। लेखकों में भारी उत्साह था। जलेस के जन्म में प्रेमचंद शताब्दी वर्ष की बड़ी भूमिका थी। ‘84 में शुक्ल शताब्दी वर्ष के पालन से जलेस हिंदी के अकादमिक जगत की मुख्यधारा में प्रवेश करना चाहता था। और बिल्कुल वैसा ही हुआ। जलेस ने शुक्ल शताब्दी वर्ष के पालन का बिगुल बजाया और देश भर के कालेज-विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों और हिंदी-सेवी सरकारी संस्थाओं का पूरा ताना-बाना जाग उठा। जलेस ने शुक्ल जी को अपनाया और विश्वविद्यालयों-अकादमियों में बैठे हिंदी के पेशेवरों ने जलेस को। देखते ही देखते प्रेमचंद शताब्दी वर्ष के जनवादी विमर्श से उत्पन्न संगठन को शुक्ल शताब्दी वर्ष ने साहित्य की परंपरा-पोषित मुख्यधारा से जोड़ दिया।

आज जब हम हिन्दी आलोचना की स्थिति पर विचार करते हैं तब अनायास ही जलेस के इस अभूतपूर्व ‘विस्तार’ की कहानी का वह ‘स्वर्णिम’ अध्याय याद आ जाता है। और, इसके साथ ही कौंध उठती है शुक्ल शताब्दी वर्ष को केंद्र में रखकर जलेस के अंदर, हाशिये पर चल रही बहस की एक और अंतरकथा की यादें। इस कथा के केंद्रीय नायक थे इलाहाबाद के कथाकार, आलोचक नीलकांत।

दर्शनशास्त्र की अकादमिक पृष्ठभूमि से आए सौन्दर्यशास्त्र के अध्येता नीलकांत मार्कण्डेय की ‘कथा’ पत्रिका के पृष्ठों पर कई धारदार टिप्पणियों से सबका ध्यान अपनी ओर पहले ही खींच चुके थे। जलेस की आचार्य रामचंद्र शुक्ल राष्ट्रीय परिसंवाद समिति की ओर से भी नीलकांत को भोपाल में होने वाले राष्ट्रीय परिसंवाद (7-8 सितंबर 1984) के लिये शुक्ल जी की विश्वदृष्टि पर लेख भेजने के लिये कहा गया। नीलकांत ने वह लेख लिख लिया, तभी उनसे कहा गया कि इस विषय पर कोई दूसरा लिख रहा है, इसलिये आप उनकी सौन्दर्यानुभूति पर आलेख तैयार करके भेज दें। नीलकांत ने इस विषय पर भी अपना लेख लिख कर जैसे ही परिसंवाद समिति के पास भेजा, समिति में एक प्रकार का हड़कंप सा मच गया। उनके लेख का शीर्षक था - मृत सौन्दर्य का मसीहा आचार्य रामचंद्र शुक्ल। शुक्ल जी की विश्वदृष्टि वाले लेख को नीलकांत ने नामवर सिंह की मांग पर ‘आलोचना’ के लिये भेज दिया, जिस पर नामवर जी ने टिप्पणी की थी - ‘‘लेख मिला आज ही। एक सांस में पढ़ गया। दृष्टि निर्मम, भाषा तल्ख, निर्णय सख्त, फिर भी संपूर्ण निबंध तर्कसंगत और प्रमाण पुष्ट। बहुत दिनों बाद ऐसा प्रौढ़ निबंध पढ़ने को मिला।’’

शुक्ल जी की सौन्दर्यानुभूति पर नीलकांत का लेख, ‘मृत सौन्दर्य का मसीहा’ विश्वदृष्टि वाले लेख की बुनियादी समझ पर टिका उतना ही ‘तल्ख, तर्कसंगत और प्रमाण पुष्ट निर्मम’ लेख था। लेकिन जलेस का जो आयोजन शुक्ल जी को पूरे भक्तिभाव के साथ दोनों हाथ खोल कर अपनाने के उद्देश्य से किया जा रहा था, जो सामंती रूढि़वाद से बुरी तरह से जकड़े हुए क्षेत्र में नवजागरण के कल्पनाप्रसूत भव्य महल के संस्थापक रामविलास शर्मा से संगति रखते हुए विश्वविद्यालयों के अध्यापकों, प्राचार्यों के मनों को जीतने के लिये किया जा रहा था, उसके आयोजकों को ऐसा ‘निंदापूर्ण’ लेख कैसे रास आ सकता था। हमें अच्छी तरह से याद है, नीलकांत ने उस लेख को आयोजन समिति के पास दिल्ली भेजा था, लेकिन वहां पहुंचने के साथ ही तत्काल उसकी गूंज-अनुगूंज गुजरात, वाराणसी, कोलकाता, भोपाल - सर्वत्र सुनाई देने लगी थी। ‘’शीर्षक प्रतिमा-भंजक, मुद्दआ नकारात्मक और जलेस के रंग में भंग डालने वाला’’। डा. शिवकुमार मिश्र, चंद्रबली सिंह, डा.चंद्रभूषण तिवारी, कुंवरपाल सिंह सबने भरसक कोशिश की कि इस ‘विध्वंसक’ लेख को राष्ट्रीय परिसंवाद में न पढ़ने दिया जाएं। मामला पार्टी के प्रभारी कामरेड बी.टी.रणदिवे की अदालत तक पहुंच गया। हम वहां मौजूद थे। हमें अच्छी तरह से याद है कि कामरेड बीटआर और सुरजीत ने भी सिर्फ मत-भिन्नता के आधार पर लेख को न पढ़ने देने के विचार का सख्त विरोध किया। और अंत में, वह लेख, जलेस के कई प्रमुख नेतृत्वकारी व्यक्तियों की आपत्ति के बावजूद भोपाल में पढ़ा गया।

कुछ निजी कारणों से हम भोपाल के उस परिसंवाद में उपस्थित नहीं हो पाये थे। लेकिन हमें आज भी, परिसंवाद के बाद हुई मुलाकात में इस विषय पर डा.चंद्रभूषण तिवारी, चंद्रबली सिंह, डा.शिवकुमार मिश्र के तमतमाये हुए चेहरे और उनकी बौखलाहट याद है। नीलकांत इन सबकी नजरों में किसी दागी व्यक्ति से कम नहीं थे। तब से तीस साल बाद, आज भी जब हमें उस पूरी घटना की याद आती है, कहना न होगा, उससे आज की हिंदी आलोचना, खास तौर पर मार्क्सवादी आलोचना की दयनीय दशा पर से जैसे एक झटके में पर्दा उठ जाता है। एक वाक्य में कहे तो आज की हिंदी आलोचना शुक्ल जी द्वारा तैयार किये गये ‘छात्रोपयोगी नोट्स’ के आधार पर निर्मित हिंदी साहित्य के इतिहास का आगे और, कोरा इतिवृत्तात्मक विस्तार बन कर रह गयी है।

अभी, हाल में कोलकाता की ‘वागर्थ’ पत्रिका के कई अंकों में हिंदी साहित्य के पचास सालों का उत्सव जिस प्रकार के सपाट और बेजान ब्यौरों के इतिवृत्तों के आधार पर मनाया गया है, इस कलावादी कर्मकांड, समग्रत: हिंदी आलोचना की ऐसी परिणति में डा. शर्मा, नामवर सिंह और पूरे प्रगतिवादी-जनवादी साहित्य आंदोलन का योगदान किसी से कम नहीं है। प्रगतिवादियों की ‘पहल’ और जलेस की पत्रिका ‘नया पथ’ क्रमश: मुर्दा सामग्रियों को चकदक पैकेजिंग में खपाने और व्यवसायिक प्रकाशकों के लिये एक बेचने लायक किताब बन जाने से अधिक कोई भूमिका अदा करती नहीं दिखाई देती है। संकट की इस घड़ी में भी किसी नये विमर्श को पैदा करने में इनकी जरा भी दिलचस्पी नहीं है।

सारी दुनिया में मार्क्सवाद ने ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों को उनकी आत्मलीनता, प्राकृतिक विज्ञान की तरह की सीमाबद्धताओं से मुक्त करने में प्रमुख भूमिका अदा की है। सामान्यत:, सामाजिक आंदोलनों के दबावों से साहित्य अक्सर खुद की सीमाओं से मुक्त होकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ता रहा है। हमारे यहां भक्तिकाल के साहित्य ने व्यापक जन में किसी रीतिकालीन साहित्य को पनपने नहीं दिया तो  राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन ने कथा साहित्य को कोरी तिलस्मी और ऐय्यारों की किस्सागोई से मुक्त किया। छायावादी आत्मवाद ने प्रगतिवाद के लिये जगह छोड़ी। लेकिन खास तौर पर, मार्क्सवाद का स्पर्श दुनिया के पूरे साहित्य और वैचारिक विमर्श को स्थायी तौर पर उसकी आत्मलीनता से मुक्त कराने वाला स्पर्श साबित हुआ है। यह विचारों की दुनिया की एक कोपरनिकस क्रांति है। जो खगोलशास्त्र हजारों सालों से पृथ्वी-केन्द्रित धुरी पर चक्कर काट रहा था, एक कोपरनिकस की सौर-प्रणाली की खोज ने उसे उससे सदा के लिये मुक्त कर दिया। उसी प्रकार, चेतना के माध्यम से प्रतिबिंबित यथार्थ से बनने वाले विचारधारा के सभी क्षेत्रों के अध्ययन को मार्क्स ने सदा के लिये बदल डाला। माल में मूल्य के प्रवेश से जैसे उसका ठोस अस्तित्व लुप्त हो जाता है, वैसे ही यथार्थ के साहित्यिक पाठों में रूपांतरण से सामाजिक यथार्थ असंख्य विखंडित चित्रों में बदल जाता है। माल की आधिभौतिक सत्ता के ब्रह्मांड की तरह ही साहित्य और विचारधारा की दुनिया सामाजिक यथार्थ की असंख्य विरूपित सत्ताओं का एक ब्रह्मांड बन जाती है। साहित्य और कला जगत के अपने स्वतंत्र नियमों का भ्रामक संसार भी तैयार होता है। मार्क्सवादी आलोचना की भूमिका यह रही कि उसने इस विखंडित, विरूपित, चेतना से प्रतिबिंबित यथार्थ को मूल सामाजिक संरचना के आधार पर समग्रत:, परस्पर गुंथे हुए रूप में परखने के औजार दिये, यह मानते हुए कि जो दिखाई देता है, वही सच नहीं होता। मार्क्स कहते थे कि जो दिखाई देता है वही सच हो तो विज्ञान उथला हो जायेगा। उसी प्रकार, दिखाई दे रहे पाठ को ही स्वायत्त सच मान कर बढ़ा जाए तो आलोचना भी उथली हो जायेगी, संधान और सृजन की संभावनाओं का अंत हो जायेगा। यही वजह रही कि ‘कला कला के लिये’ की तरह की सारी सैद्धांतिक शेखियां सामाजिक अंतर्विरोधों की गतिशीलता से बल पाते मार्क्सवादी यथार्थवादी साहित्य विमर्श की तेज आंच के सामने कभी टिक नहीं पायीं।

चिकित्सा विज्ञान में आत्मलीनता (autism) एक बीमारी है, मंद बुद्धि माने जाने वाले लोगों की बीमारी। यह बीमारी जीवन के सभी अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों में समान रूप से पाई जाती है। यह कमजोर आदमी का एक रक्षा कवच भी होती है, सीप में बंद दीन-हीन घोंघा बसंत। मार्क्सवाद ने साहित्य विमर्श को उसकी आत्मलीनता से मुक्त किया, जीवनोन्मुख बनाने की भूमिका अदा की। लेकिन, इसी के समानांतर, मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट आंदोलन से ही जुड़ा इतिहास का एक दूसरा चिंताजनक पहलू भी रहा है, जो पुन: जीवनोन्मुखता के बजाय साहित्य पर खास प्रकार की दलीय प्रतिबद्धता का दबाव पैदा करता है। लेनिन ने जब बोल्शेविक क्रांति के संदर्भ में पार्टी की सेवा करना साहित्यकारों का कत्र्तव्य बताया, वही से सामाजिक क्रांति का अर्थ सीमित होते हुए बोल्शेविक पार्टी में और पार्टी के नेतृत्व और नेता में सिमट जाने की एक उल्टी यात्रा शुरू होगयी। यह पैगंबर की करुणा के गिरिजाघरों, मस्जिदों, मठों में पतित होने वाली प्रक्रिया है। मार्क्स-एंगेल्स की साहित्य संबंधी सारी बातें पृष्ठभूमि में चली गयी। एक दूसरे प्रकार की आत्मलीनता में साहित्य को डुबो देने का उपक्रम शुरू हुआ। ‘साहित्य का उद्देश्य जितना छिपा रहे इसी में साहित्य की भलाई है’ की तरह की मार्क्सवादी सीखें आलोचनात्मक यथार्थवाद और समाजवादी यथार्थवाद की पूरी बहस से गायब हो गयी। लुकाच और ब्रेश्त के बीच, ब्रेश्त और बेंजामिन के बीच, अल्थूसर और लासान के बीच विचारों की जो तनातनी दिखाई देती है, उसके मूल में मार्क्सवाद के नाम पर तात्कालिक राजनीति की सेवा की इसी कुत्सित समझ की बड़ी भूमिका थी। पश्चिमी यूरोप में ग्राम्शी से लेकर लुकाच, बेंजामिन, ब्रेश्त, अल्थूसर, थामसन, कॉडवेल, अन्र्सट फिशर और सार्त्र, हर्बर्ट मार्कूज, दरीदा, जेमिसन तथा एरिक हाब्सवाम और अभी के स्लावोय जिजेक और अम्बर्तो इको तक के लेखन में मार्क्सवाद से उनकी संबद्धता और कम्युनिस्ट आंदोलन के इस पहलू के दबाव की छाप को साफ तौर पर देखा जा सकता है।

हिंदी में भी, डा. शर्मा और नामवर सिंह के लेखन का कुछ-कुछ इसी आधार स्पष्ट काल-विभाजन किया जा सकता है। जब तक वे साहित्य में कलावादियों की आत्मलीनता से लोहा ले रहे थे, उनके लेखन में एक खास प्रकार की धार थी। फिर एक दौर सीधे पार्टी की सेवा का आया। डा. शर्मा की ‘प्रगतिवाद की समस्याएं’ के लेखों को देखिये। लेकिन डा. शर्मा और नामवर सिंह पर से जैसे ही उस दौर का भूत उतरा, वे नये सामाजिक यथार्थ के साथ जुड़ कर साहित्य में स्वतंत्रता और जनतंत्र के मूल्यों के आधार पर मार्क्सवादी आलोचना को एक नये उत्कर्ष की दिशा में लेजाने के बजाय आचार्य शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अतीतोन्मुखी इतिवृत्तात्मकता की शरण में चले गये। नामवर जी अपने ‘इतिहास और आलोचना’ के लेखन के उल्लेख से भी बचने लगे। लेखनी की पुरानी धार भी भोथरी होगयी और हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना स्वतंत्रतापूर्व की कल्पित हिंदी नवजागरण की बहस में उलझ कर रह गयी। आलोचना तालाब के ठहरे हुए बंद पानी की काई का इतिवृत्त बन गयी। धीरे-धीरे, वैचारिक सह-अस्तित्व का आलम यह होगया कि अभी अज्ञेय जन्म शताब्दी पर इसी लेखक ने टिप्पणी की - ‘नामवर का लोप ही अज्ञेय का लोप है’।

‘‘ अज्ञेय जी का शताब्दी वर्ष पूरा होगया। हिंदी जगत में उनके लिये श्रद्धा-सुमनों की कोई कमी नहीं रही। अलग-अलग शहरों में कई आयोजन हुए। अखबारों, पत्रिकाओं में कुछ छोटी-मोटी टिप्पणियां आयीं। उनके निकट के मित्रों, संबंधियों ने एक-दो किताबें भी निकाली। कुछ स्वघोषित ‘सांस्कृतिक दूतों’ के शहर-शहर फेरे लगे। लेकिन गौर करने की बात यह है कि कुल मिला कर यह पूरा वर्ष बिना किसी वैचारिक उत्तेजना और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यग्रता के एक स्निग्ध और शान्त, तनाव-रहित वातावरण में बीत गया। ...हाल के वर्षों तक हिन्दी में सबसे विवादास्पद समझे जाने वाले अज्ञेय की शताब्दी कोई मामूली वैचारिक आलोड़न भी पैदा नहीं कर पाये, यह स्थिति किस बात का संकेत है? क्या यह अज्ञेय पर या आज के समय पर या दोनों पर ही कोई विशेष टिप्पणी है?

‘‘...कुल मिला कर इस पूरे साल ‘अज्ञेयपंथ’ और ‘नामवरपंथ’ की खूब छनी। सब कुछ भले-भले निपट गया। इस ‘भले-भले’ ने ही आज हमारे लिये यह प्रश्न छोड़ दिया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? किसी जमाने में हिंदी में प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के बरक्स अज्ञेय का प्रयोगवाद (परिमल) विचारधारा के एक दूसरे धुर का मंच हुआ करता था। ...इसीलिये स्वाभाविक तौर पर हिंदी में उस काल की सारी साहित्यिक-वैचारिक बहसों के केंद्र में अज्ञेय हुआ करते थे। लेकिन आज वह सारा विवाद कहां रफ्फू-चक्कर होगया? यही एक प्रश्न किसी को भी आज की साहित्यिक दुनिया के सच पर गहराई से नजर डालने के लिये प्रेरित कर सकता है।

‘‘... प्रेमचंद शताब्दी के दौरान प्रेमचंद को केंद्र में रख कर चंद्रबली सिंह ने ‘आलोचनात्मक’ और ‘समाजवादी’ यथार्थवाद के साथ ही यथार्थ की एक और, तीसरी श्रेणी ‘जनवादी क्रांतिकारी यथार्थवाद’ की अवधारणा रखी। प्रगतिशील लेखक संघ वस्तुत: बिखर गया लेकिन हिंदी-उर्दू के लेखकों के एक नये संगठन, जनवादी लेखक संघ (1982) का उदय हुआ। जनतंत्र का सवाल केंद्रीय सवाल बना और भारत की जनता की जनतंत्र की लड़ाई के मोर्चे की जो इंद्रधनुषी तस्वीर पेश की गयी उसमें डा. रामविलास शर्मा से लेकर अज्ञेय तक, सबके लिये समान स्थान का आश्वासन था। ...आंतरिक आपातकाल के पहले और बाद के इस दौर में अज्ञेय जीवित ही नहीं, खासे सक्रिय थे। ... वह पूरा दौर भारत में जनतंत्र की रक्षा के लिये सबसे तीव्र संघर्ष का दौर था और जयप्रकाश के साथ जुड़ कर अपने अखबारों के जरिये अज्ञेय ने उस पूरी लड़ाई में अपनी एक भूमिका अदा की थी। फिर भी आज तक कोई यह प्रश्न क्यों नहीं उठाता है कि जनवादी लेखक संघ के वैचारिक परिप्रेक्ष्य के इंद्रधनुषी दायरे में अज्ञेय को उनके जीवित काल में कभी क्यों नहीं शामिल किया जा सका?

‘‘इस एक सवाल के जवाब से जहां प्रलेस-जलेस की विचारधारात्मक प्रतिश्रुतियों और निष्ठाओं की सचाई की परख हो सकती है, वहीं अज्ञेय की भी ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ की वास्तविकता को समझा जा सकता है। कहना न होगा कि आज जहां जलेस-प्रलेस प्रकार के संगठन पार्टी की जकड़नों से बेदम होकर अस्तित्वीय संकट के गह्वर में हांफ रहे हैं, और लेखक क्रमश: जयपुर उत्सव की तरह की साहित्य-मंडियों में अपनी कीमत लगवाने को व्याकुल हो रहे हैं, वहीं अज्ञेय की ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ का भी आज कोई दो-कौड़ी का दाम लगाने के लिये तैयार नहीं है। अज्ञेय शताब्दी वर्ष के आयोजनों की रपटों से तो कम से कम यही जाहिर होता है।
‘‘सचमुच यह एक अनोखी विडंबना है। नामवर का लोप ही अज्ञेय का भी लोप है। ऐसे ही ‘विचारधारा का अंत’ विचार मात्र के अंत का भी सबब बनता है।’’

इस टिप्पणी में भी जलेस का प्रसंग आया था। जलेस के निर्माण के समय सन् ‘80 के नये जनवादी उभार के साथ मार्क्सवादी आलोचना ने अपने समय के सामाजिक मुद्दों से जुड़ कर एक नयी धार अर्जित की थी। लेकिन, यह बहुत ही थोड़े से समय की चमक भर साबित हुई। इससे पश्चिम की तरह जनतंत्र और स्वतंत्रता के मूल्यों के आधार पर यहां मार्क्सवादी आलोचना के एक दीर्घस्थायी लगातार विकासमान वैचारिक विमर्श की शुरूआत नहीं हो पायी। इसके जन्म के साथ ही इसकी सीमाएं जाहिर होने लगी थी, जैसा कि इस लेख के शुरू में ही हमने रामचंद्र शुक्ल जन्म शताब्दी पर राष्ट्रीय परिसंवाद की घटना के विषय में बताया है। संगठन का विस्तार प्रमुख लक्ष्य होगया, बदलते हुए यथार्थ के बरक्श आलोचना के औजारों का विकास नहीं। जितनी तेजी के साथ इस नये जनवादी उभार ने प्रेमचंद और मुक्तिबोध के जरिये एक वैचारिक नवोन्मेष की चमक दिखाई थी, उतनी ही तेजी से उसकी चमक बुझती हुई भी नजर आने लगी।

चन्द्रबली सिंह ने नीलकांत को लिखा था - ‘‘ मैं समझता हूं, शुक्ल जी में कुछ ऐसे तत्व हैं जो हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं - पूरी तरह से निषेधात्मक रुख गलत है।’’ और इसप्रकार, मार्क्सवाद के नाम पर संतुलन बनाने अर्थात वैचारिक समझौता करके चलने का एक नया रास्ता खोज लिया गया - सब कुछ संगठन के हित के नाम पर। न रामविलास शर्मा, नामवर सिंह ने शुक्ल जी और द्विवेदी जी की रहस्यवाद में लिपटी भाववादी साहित्य दृष्टि को पूरी तरह से ठुकराते हुए एक नये मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की दिशा में कोई साहसपूर्ण कदम बढ़ाया, जैसा हमें हेगेल के प्रति मार्क्स की दृष्टि में, टालस्टाय के विचारों के प्रति लेनिन के नजरिये में और क्रोचे के विचारों के साथ ग्राम्शी के संघर्ष में दिखाई देती है। और, न ही ऐसी किसी टकराहट का कोई परिचय दिया परवर्ती जनवादी आंदोलन के उभार से जुड़े आलोचकों ने। नीलकांत जैसों ने जिस भिन्न धारा की ओर बढ़ने की कोशिश की, उसे शुरू में ही दबा डालने की भरसक कोशिश की गयी। मार्क्स ने हेगल से मुक्ति पाई उसके दर्शन को पूरी तरह से जानकर। हमारे यहां इस जानने की प्रक्रिया में पुराने रहस्यवाद के बंधन से मुक्ति की नहीं, बल्कि उसे अपना कर समाज में ‘परमहंस’ का सम्मान अर्जित करने की लालसा प्रमुख रही। हिंदी आलोचना हिंदी विभागों में बैठे अध्यापकों की सार-संग्रहवादिता की दासी बन कर रह गयी।

हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना पाठ के प्रत्यक्ष को ही सच मान लेने के उथलेपन की शिकार हुई है। आचार्य शुक्ल ने कहीं ‘रहस्यवाद’ पद का तिरस्कार के साथ उल्लेख कर दिया और इतने भर से उन्हें प्रगतिशील आलोचना का गोमुख मान लिया गया। उनके सनातनपंथी, वर्णवादी पूर्वाग्रहों को देखने से इंकार कर दिया गया। शुक्लजी ने रहस्यवाद का विरोध सिर्फ कबीर के प्रति अपनी वर्णवादी नफरत को व्यक्त करने के लिये किया था, इस नग्न सचाई से भी आंखें मूंद ली गयी।

‘‘यत्क्रतुर्मवति तत् कर्म कुरुते’’। जिसके प्रति मन में मोह होगा, वह वैसा ही कर्म करेगा। मार्क्सवाद पदार्थ की गतिशीलता का विज्ञान है। परंपरा से उसका संबंध समाज की गति को चिन्हित करने के लिये है, न कि उसे ढोने के लिये। लेनिन ने ‘प्रोलेतकुल्त’ के विध्वंसक रुख के प्रत्युत्तर में कहा था कि मानव इतिहास में जो भी श्रेष्ठ तत्व रहे हैं, हमें उन्हें सहेजना होगा। इस ‘सहेजने’ का अर्थ यह नहीं है कि हम अजायबघर को अपना घर बना लें। मार्क्स को देखिये, वे कैसे अपनी कृति ‘जर्मन विचारधारा’ में हेगेलीय दर्शन के विघटन का जश्न मनाते हैं। ‘‘अभूतपूर्व तीव्र गति से सिद्धांत एक दूसरे को धकेल कर उनका स्थान लेते रहे, मस्तिष्कों के सूरमा एक दूसरे को उलटते चले गये और 1842-45 के बीच के तीन वर्षों में जर्मनी से अतीत का जितना सफाया हुआ उतना पहली तीन शताब्दियों के दौरान नहीं हुआ था।...यकीनन यह एक दिलचस्प घटना है - यह है परमचित्त के विघटन की प्रक्रिया।’’ जैसा कि पहले ही कहा गया है, मार्क्सवाद विचारधारा की दुनिया में कोपरनिकस क्रांति है।

जलेस से जुड़े आलोचकों ने इतिवृत्तात्मक लेखन की सबसे बुरी प्रवृत्ति, नाम-गिनाऊ आलोचना के चरम उदाहरण पेश कियें। इस संदर्भ में दृष्टव्य है उस दौर का डा. रमेश कुंतल मेघ का लेखन, जिसके नक्शे-कदम पर आज भी ‘वागर्थ’ जैसी पत्रिकाएं और नन्द किशोर नवल जैसे आलोचक पूरे उत्साह से जुटे हुए हैं। आलोचना की यह ‘सर्वजनहिताय’ वाली बीमारी अब आनुवंशिक रोग का रूप ले चुकी दिखाई देती है। शुक्ल जी और द्विवेदी जी के प्रति श्रद्धा-भक्ति ने न सिर्फ अतीत के साथ बल्कि वर्तमान के साथ भी आलोचना में किसी प्रकार के आलोचनात्मक विवेक के रिश्तों को पनपने नहीं दिया। ‘आलोचना’, ‘वागर्थ’, ‘तद्भव’, ‘वर्तमान साहित्य’ और ‘नया पथ’ जैसी तमाम पत्रिकाएं भले वे मार्क्सवादियों द्वारा निकाली जा रही हो या गैर-मार्क्सवादियों बल्कि मार्क्सवाद-विरोधियों द्वारा, सबमें आलोचना के नाम पर शुक्ल जी की गद्य-पद्य की व्याख्या वाले छात्रोपयोगी अध्यापकीय नोट्स की परंपरा बदस्तूर जारी है। इस मामले में इनके बीच रत्ती भर फर्क करना भी नामुमकिन है।

मार्क्सवादियों की सारी जमातें अपनी पार्टी प्रतिबद्धताओं के प्रति इतनी निष्ठावान है कि भारत में वामपंथ के उदय और अस्त की इतनी प्रकट और विस्फोटक परिघटना से भी इनके कान पर जंू तक नहीं रेंगती। गैर-मार्क्सवादियों के लिये तो वैसे ही साहित्येतर सामाजिक-राजनीतिक प्रपंच सदा के लिये वर्जित है। इसका कुल जमा परिणाम यह है कि इस चक्कर में साहित्य से तात्पर्य और उसकी उत्कृष्टता के विषय भी आज हिंदी आलोचना के दायरे के बाहर जा चुके हैं। कोलकाता से ही हिंदी में भारतीय विद्याभवन की एक पत्रिका निकलती है - ‘वैचारिकी’ । पुरातत्व से लेकर रस सिद्धांत और अलंकारशास्त्र जैसे अर्वाचीन विषयों पर अध्यापकों के आधे-अधूरे नोट्स से भरी पत्रिका। इसे देख कर ऐसे पुरानेपन की अनुभूति होती है जैसे कोई ‘पुरातत्व’ साक्षात उपस्थित हो। कहना न होगा, यही है अभी की हिंदी की तमाम पत्रिकाओं का तात्विक सच।

यह सचमुच इतिहास का परिहास ही है। अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जब राजा होता है, दरबारियों, मनसबदारों का राजकीय तामजाम भी बरकरार रहता है, लेकिन यथार्थ में ऐसे नाटकीय परिवर्तन होते हैं कि वह सारा लाव-लस्कर और साज-सज्जा रातो-रात प्राणहीन पुतलों के कल्पनालोक में बदल जाते हैं। भारत में रियासती राज्यों के भारत में विलय की घोषणा के ठीक बाद प्रत्येक रियासती राजा के राजदरबार का यही दृश्य था। इसीप्रकार, जीवन की सचाई से कट कर जब विचारधाराएं निहायत अप्रासंगिक विषयों में रमी रहती है, लेकिन भान ऐसा करती है जैसे वही एक ऐसी अन्तरदृष्टि प्रदान कर रही है जिसपर मानवता का भविष्य निर्भर करता है, तो उनका पूरा स्वरूप इतिहास के विद्रूप का रूप ले लेता है। वे कोरी छायाओं का रंगमंच बन जाती हैं, जीवन की नपूंसक नकल का रंगमंच। साहित्य के प्रति पूजा भाव वाले ‘वागर्थ’ छाप लेखन का रंगमंच तैयार होता है और उसके अभिनेताओं के तौर पर गर्व के साथ ‘कलावादी’ होने के अनेक पुरस्कारों का तमगा लगाये असीम संधानी, शब्द-ब्रह्म के नाद में बावले रमेश चंद्र शाह जैसे आलोचक पैदा होते हैं। ध्यान से देखें तो नंदकिशोर नवल और रमेश चंद्र शाह में कोई फर्क नहीं दिखाई देगा, सिवाय इसके कि एक ‘प्रगतिशीलता’ का तमगा लगाये हुए हैं तो दूसरा ‘कलावाद’ का। प्रत्यक्ष को ही सच मान लेने की भौंडी कला दृष्टि दोनों में समान रूप से काम कर रही है।

नामवर जी ने ‘कविता के नये प्रतिमान’ के प्रारंभ में ही अभिनव भारती को उद्धृत किया था :
‘‘श्रांति का अनुभव न करने वाली विवेचकों की बुद्धि ऊपर-ऊपर चढ़ते हुए अंत में जिस अर्थ-तत्व को देखती है उस तक पहुंचने वाली परिकल्पित विवेक के प्रारम्भिक सोपानों की परंपरा का क्या महत्व?
‘‘मानता हूं प्रमेय की सिद्धि का प्रथम प्रयास विचित्र और निराधार ही होता है; किंतु उस मार्ग में अग्रसर होने पर उसके ऊपर सेतुओ, नगरों आदि का निर्माण भी विस्मयकारी नहीं रह जाता।
‘‘इसीलिये यहां प्राचीन आचार्यों के मतों का खंडन नहीं, बल्कि संशोधन किया गया है। पूर्व-प्रतिष्ठापित सिद्धांतों की योजना में भी मूल की प्रतिष्ठा का फल मिलता है।’’

क्या है यह आलोचना के पूर्वाधारों के रूप में प्राचीन आचार्यों के मतों में संशोधन का विधान? यही तो हैं सजीव मनुष्य और जीवन के यथार्थ को छोड़ कर शास्त्रों से शास्त्र की रचना का विधान, टीकाओं और भाष्यों का विधान।

मार्क्स जब अपने दर्शनशास्त्र की रचना करते हैं तो वे पारंपरिक जर्मन दर्शन के बिल्कुल विपरीत रास्ता अपनाते हैं। ‘स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने वाले जर्मन दर्शन के विपरीत पृथ्वी से स्वर्ग पर आरोहण का मार्ग पकड़ते हैं। वे किसी पूर्व प्रतिष्ठित सिद्धांत या कल्पना या अनुमान को आधार बनाने के बजाय अपना प्रस्थान-बिंदु बनाते हैं वास्तविक सक्रिय लोगों को, उनकी वास्तविक जीवन-प्रक्रिया को और इनके आधार पर उसकी वैचारिक प्रक्रियाओं और प्रतिध्वनियों को सामने लाते हैं।

मार्क्स के शब्दों में, ‘‘ आदमी के दिमाग में बनने वाले काल्पनिक बिंब भी अनिवार्यत: उस भौतिक जीवन प्रक्रिया के संस्करण है, जिन्हें अनुभव द्वारा परखा जा सकता है और जो भौतिक पूर्वाधारों से संबद्ध है। नैतिकता, धर्म, तत्व मीमांसा, विचारधारा तथा चेतना के तदनुरूपी बाकी सभी रूप अब स्वतंत्रता का नकाब ओढ़े नहीं रह सकते। उनका कोई इतिहास, कोई विकास नहीं है; परंतु मनुष्य अपने भौतिक उत्पादन तथा अपने भौतिक संसर्ग के विकास से अपने इस वास्तविक अस्तित्व को और साथ ही अपने चिंतन और चिंतन के परिणामों को भी बदलता है। जीवन चेतना द्वारा निर्धारित नहीं होता बल्कि चेतना जीवन द्वारा निर्धारित होती है। निरीक्षण की पहली विधि के प्रस्थान बिंदु में चेतना को सजीव व्यक्ति मान कर चला जाता है; दूसरी विधि में स्वयं वास्तविक सजीव मनुष्य, जो वास्तविक जीवन के अनुरूप है, वही प्रस्थान बिंदु है तथा चेतना को पूरी तरह से उसकी चेतना मात्र माना जाता है।
‘‘निरीक्षण की यह विधि पूर्वाधारों से वंचित नहीं है। वह वास्तविक पूर्वाधारों को प्रस्थान बिंदु बनाती है तथा उन्हें एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ती।’’

हिंदी के एक सबसे बड़े मार्क्सवादी आलोचक के पूर्वाधार और सोच की दिशा और मार्क्स की दिशा विपरीत है। मार्क्स अपने निरीक्षण में जीवन के वास्तविक पूर्वाधारों को प्रस्थान बिंदु ही नहीं बनाते, उसे एक क्षण के लिये भी छोड़ने को तैयार नहीं है। और नामवर जी का प्रस्थान बिंदु सिर्फ और सिर्फ विवेचकों का ‘परिकल्पित विवेक’ है और उनकी यात्रा का गंतव्य भी इसी विवेक में किंचित संशोधन भर है। कविता के नये प्रतिमानों की तलाश में तेजी से बदल रहे जीवन की ठोस परिस्थितियों और उसमें साहित्य की भूमिका कोई विचार का बिंदु हो सकता है, इसका कहीं से कोई संकेत नहीं मिलता।

फिर नामवर जी का अशोक वाजपेयी से किस बात पर मतांतर है? अपने लेखन में उनका अद्यीत व्यक्तित्व शुद्ध रूप से साहित्य के स्वायत्त संसार का नागरिक ही होता है। उनकी सर्वसमावेशी दृष्टि में कविता के नये प्रतिमान विचारों की टकराहट से नहीं, ‘नये मूल्यों की खोज और प्रतिष्ठा के सहभागी प्रयास’ से हासिल होंगे। उनके अनुसार ‘मूल्य एक कमाया हुआ सत्य है’, अर्थात सबका समान सत्य! शास्त्रों की पैरवी में लिखते हैं - ‘‘कविता को सीधे अनुभव करने में हर पाठक स्वतंत्र और समर्थ होता तो काव्यानुशासन की जरूरत न पड़ती। ...जो अपने को सामान्य पाठक कहता है वह भी काव्यानुभव में अनजाने ही किसी न किसी काव्य-सिद्धांत से अनुशासित होता है।’’

इसप्रकार, जाहिर है कि कविता के नये प्रतिमान में उन्होंने जिस नये शास्त्र की रचना की है, उसके दायरे से शुरू में ही कविता को सीधे अनुभव करने वाले जन-साधारण को, मजदूरों और किसानों को निकाल कर अलग कर दिया गया है।

पाब्लो नेरुदा के ‘ममायर्स’ में एक अध्याय है - ‘कविता एक पेशा है’। उस अध्याय के शुरू के अंश को ही यहां थोड़ा विस्तार से उद्धृत करना उचित होगा। इस अध्याय की शुरूआत वे इसप्रकार करते हैं : ‘‘युद्धों, क्रांतियों और जबर्दस्त उथल-पुथल के चलते हमारे समय की विशेषता यह रही है कि जितनी किसी ने कल्पना नहीं की होगी, उससे कहीं ज्यादा कविता के लिए जमीन तैयार हुई है।’’
इसमें आगे वे सांतियागो के चिले के सबसे बड़े बाजार के कुलियों के बीच कविता सुनाने के अपने अनुभव का बयान करते हैं। वे लिखते है - ‘‘ जब मैं उस हॉल में घुसा तो मेरे अन्दर जोसे असुनसियन सिल्वा की कविता ‘निशाचर’ की तरह की एक सिहरन दौड़ गई, सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां इतनी ठंड थी, बल्कि इसलिये क्योंकि वहां के परिवेश से मैं सन्न था। लगभग पचास लोग वहां टोकरों पर अथवा कामचलाऊ बेंचों पर बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ ने अपनी कमर पर ऐप्रोन की तरह बोरा बांध रखा था, अन्य पैबंद लगी गंजियां पहने हुए थे, और बाकी लोग बिल्कुल नंगे बदन चिले की जुलाई की ठंड की मार झेल रहे थे। मैं एक छोटी सी मेज के पीछे बैठ गया जो मुझे उन असामान्य श्रोताओं से अलगा रही थी। वे सभी मुझ पर, मेरे देश के लोगों की कोयले की तरह की काली आंखों को गाड़े हुए थे।
...मैं कैसे ऐसे श्रोताओं से निपटूं ? क्या बात करूं? मेरी जिंदगी की ऐसी कौन सी चीज है, जिसमें उनकी दिलचस्पी होगी? मैं तय नहीं कर पाया, लेकिन वहां से भाग खड़े होने की अपनी इच्छा को छिपाते हुए मैंने उनसे कहा : ‘मैं कुछ दिनों पहले स्पेन में था। वहां काफी लड़ाई और गोलाबारी चल रही है। सुनिये, उसके बारे में मैंने क्या लिखा है।
‘‘खुद मुझे मेरी किताब ‘स्पेन मेरे हृदय में’ कभी कोई सरल किताब नहीं लगी। उसमें स्पष्ट होने की कोशिश है, लेकिन वह दुर्दमनीय और वेदनादायी घटनाओं के तूफान में डूबी हुई है।
‘‘बहरहाल, मैंने सोचा कि मैं चंद कविताएं सुनाऊंगा, कुछ बातें कहूंगा और अलविदा कहके चल दूंगा। लेकिन वैसा हुआ नहीं। एक के बाद एक कविता को पढ़ते हुए, मौन के गहरे कुएं को सुनते हुए जिसमें मेरे शब्द गिर रहे थे, मेरी कविताओं को इतनी गंभीरता से पकड़ती उन आंखों और गहरी भवों को निहारते हुए मुझे लगा कि मेरी किताब सही निशाने पर लग रही है। अपनी खुद की कविता की ध्वनि से प्रभावित, उस चुंबकीय शक्ति से मुग्ध जो मेरी कविताओं और उन परित्यक्त आत्माओं को बांधे हुए थी, मैं एक के बाद एक कविता पढ़ता चला गया।
‘‘घंटे भर तक यह पाठ चलता रहा। जब मैं जाने वाला था, उन लोगों में से एक खड़ा हुआ। वह उनमें से एक था जिसकी कमर में बोरा लपेटा हुआ था। उसने कहा, ‘‘मैं आपको हम सबकी ओर से धन्यवाद देना चाहता हूं। मैं आपसे यह भी कहना चाहता हूं कि आज तक किसी और चीज ने हमें इतना प्रभावित नहीं किया।
‘‘उसने जब अपनी बात खत्म की, वह अपनी सुबकियां रोक नहीं पाया। और भी कईं रो रहे थे। मैं नम आंखों और खुरदरी हथेलियों के बीच से बाहर सड़क पर आया।’’
नेरुदा टिप्पणी करते हैं - ‘‘ आग और बर्फ की ऐसी परीक्षाओं से गुजरने के बाद भी क्या कोई कवि पहले जैसा ही रह सकता है।’’

कहने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि कविता की यह जमीन किसी काव्यानुशासन या काव्यशास्त्र से तैयार नहीं हुई थी। इसे तैयार किया था जीवन की ठोस सचाइयों ने, सजीव मनुष्यों की अनुभूतियों ने। कवि को बदलने वाली ‘आग और बर्फ’ की यह परीक्षा भी कोई काव्यशास्त्र का पारायण नहीं हैं। इसीलिये अचरज नहीं होता, आम पाठक और श्रोता को कविता के क्षेत्र के हाशिये पर ढकेल कर कविता को अभिजनों की चीज बनाने के लिये रचे गये ‘कविता के नये प्रतिमान’ वाले काव्यशास्त्र में नामवर जी बार-बार अपने लिये वर्णवादी शुक्ल जी की सेवा लेने से जरा भी परहेज नहीं करते।

इसमें शक नहीं कि साहित्य कोई प्रयोजनमूलक वस्तु नहीं है। न यह किसी संधि का दस्तावेज है, न संपत्ति का रेकर्ड और न कानूनी कागजात या रेलवे की समय सारिणी। आदमी इसे मुख्यत: अपने आत्मिक जरूरतों के लिये रचता है और बिना किसी बाहरी मजबूरी के पढ़ता भी है। लेकिन किसी भी स्थिति में यह कोई क्रासवर्ड पजल, या सुकोडू भी नहीं है, कोरे मानसिक आरोग्य का साधन। जो अगोचर शक्तियां हमारे भौतिक संसार को घेरे रखती है, उसमें पाठों के ताने-बाने से बुने गये साहित्य के संसार का बड़ा स्थान है। यह हमारे सामूहिक भाषाई संस्कार का एक प्रमुख साधन है। भाषा यदि राजनीतिज्ञों के आदेशों का गुलाम नहीं तो आलोचकों के आदेशों की भी गुलाम नहीं होती। लाख कोशिशें भी डा.रघुवंश के तमाम गढ़े गये पदों को कोरा मजाक का विषय बनने से नहीं रोक पायी हैं। भाषा सबसे अधिक संवेदनशील होती है साहित्य के प्रति और साहित्य निर्मित होता है सजीव मनुष्य के जीवन के चित्रों और बिंबों से। जब जीवन नहीं, कृत्रिम भाषाई प्रयोगों से साहित्य रचा जाता है, उसकी वही दशा होती है, जैसी आज हिंदी के लगभग पूरे अध्यापक-वर्गीय लेखन की है - व्यापक समाज में अप्रासंगिक लेकिन अध्यापकीय मस्तिष्कों के लिये बूझों तो जाने की पहेलियां बुझाने वाला ‘मानसिक आरोग्य’ का साधन। असली हिंदी बनी हुई है टेलिविजन के लोकप्रिय बाजारू सीरियलों की भाषा में।

बहरहाल, नामवर जी ने हाल में यह खुले आम स्वीकार कर अपने बड़प्पन का परिचय दिया है कि ‘कविता के नये प्रतिमान’ किसी पुरस्कार को लपक लेने के लिये जल्दबाजी में लिखी गयी किताब थी। लेकिन पुरस्कार पाने की हड़बड़ी में ही उन्होंने डा. शर्मा की डाली गयी लीक को कुछ ऐसा गाढ़ा कर दिया कि इस जगत के दूसरे सभी सात्विक सूरमाओं (पवित्र सीताओं) के लिये लक्ष्मण की लकीर बन गयी।

सचमुच, यदि हम हिंदी आलोचना के इस मायाजगत की, जो कई ईमानदार साहित्य अध्येताओं तक में एक गौरव का भाव पैदा किये हुए हैं, कोई असली कीमत तय करना चाहे, यदि हम हिंदी आलोचना की तुच्छता को, उसकी अभिजनवादी संकीर्णता को और खास तौर पर उसकी सारी उपलब्धियों के बारे में इस जगत के सारे सूरमाओं के भ्रमों और उपलब्धियों के बीच के करुण वैषम्य को स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहे तो हमें इस जगत से पूरी तरह मुक्त होकर इसका अवलोकन करना होगा। आज तक, इसके नवीनतम प्रयास ने भी शुक्ल जी का दामन नहीं छोड़ा है। शुक्ल जी के विचारों के आधार-बिंदुओं की जांच-परख करना तो दूर, इसकी कोशिशों का पूरा ढांचा उन्हीं की इतिवृत्तात्मक, छात्रोपयोगी पद्धति पर टिका हुआ है। इस मामले में मार्क्सवादी और गैर-मार्क्सवादी सभी एक ही गोत्र के दिखाई देते हैं। भले इनमें से हरेक अपने को शुक्ल जी से आगे बढ़ने का दावा क्यों न करें, इनके उत्तरों में ही नहीं, सवालों पर भी वही शुक्लवादी रहस्यवाद आच्छादित है जो ठोस आधुनिक जीवन की चुनौतियों से उन्हें कोसों दूर रखता है। शुक्ल-द्विवेदी द्वंद्व भी उसीका एक विस्तार है। यह शुक्ल जी की पद्धति के ही किसी एक पक्ष को चुन कर उसे उनकी पूरी पद्धति के खिलाफ, और दूसरे लोगों द्वारा चुने गये किसी दूसरे पहलू के खिलाफ लक्षित करके बूंदी के किले की फतह का झंडा बुलंद करते रहते हैं। चारो ओर कोरे अंधविश्वासों और जड़सूत्रों का बोलबाला है। इसमें अन्त में विद्यानिवास मिश्र-अशोक वाजपेयी- रमेश चंद्र शाह कंपनी ने शुक्ल जी को अधिक से अधिक पवित्र बनाने के उपक्रमों के बीच से उसे पूरी तरह से पवित्र घोषित कर देने और इसप्रकार आलोचना को ही सदा के लिये ठिकाने लगा देने का महान काम संपन्न किया है।

तमाम अवांछित दबावों से मुक्ति के प्रयत्नों के बीच से मार्क्सवादी आलोचना ने पश्चिम में उदीयमान सामाजिक यथार्थ से संगति रखते हुए जनतंत्र और स्वतंत्रता के मूल्यों के आधार पर विकास की नयी दिशा पकड़ी और उपलब्धियों के अनेक नये शिखरों को छुआ है। ग्रीस के वर्तमान वित्तमंत्री, बहुचर्चित अर्थशास्त्री यानिस वैरौफैकिस का हाल के अपने लेख “How I bacame an erratic Marxist” में मार्क्स के आर्थिक विमर्श के केंद्र में समानता और न्याय के बजाय स्वतंत्रता के विचार को रखना मार्क्सवादी वैचारिक विमर्श की इसी प्रक्रिया का अंग है। ऐसा ही है थॉमस पिकेटी का विचार। अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘21वीं सदी में पूंजी’ में वे यह कहने से नहीं चूकते कि मार्क्स ने निजी-पूंजी विहीन विश्व के सभी पक्षों पर सही ढंग से नहीं सोचा था, क्योंकि दुनिया में जो भी निजी पूंजी रहित समाज बने हैं, उन सब जगह राज्य की भूमिका बेहद दमनकारी दिखाई देती है और इसप्रकार, निजी पूंजी और नागरिक की स्वतंत्रता के संबंध के विषय को उन्होंने एक नया आयाम दिया है।

हिंदी साहित्य जगत सजीव मनुष्य के जीवन से पैदा होने वाली चुनौतियों के बरक्स आलोचना के नये मानदंडों के विकास में ऐसी कोई नई उद्भावना के साथ सामने आने के बजाय अभी तो अध्यापकीय जकड़नों में फंसा हुआ आलोचना का एक ऐसा कब्रिस्तान है जिस पर सिर्फ मृतकों का बोलबाला और भूतों का डेरा है।





सोमवार, 30 मार्च 2015

एक नीच ट्रेजेडी


अरुण माहेश्वरी

सचमुच आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक मे जो हुआ वह एक ऐसी नीच ट्रेजेडी का दृश्य है जिसके अंत में सिवाय छुद्रताओं के और कुछ बचा दिखाई नहीं देता। श्आपश् के उदय और विकास के समय उसकी विचारधारा को लेकर सवाल पूछने वालों से हमारी शिकायत होती थी कि इतनी हड़बड़ी क्या है? क्या हम विचारधाराओं वालों की गलाजतों को नहीं जानते!

इसके दो दिन पहले टेलिविजन चैनलों पर केजरीवाल का एक स्टिंग आया था। बेहद चौंकाने वाला । सत्ता इतनी जल्दी उनके सर पर चढ़ कर बोलने लगेगी कि वे सभ्यजनों के साथ उठने-बैठने लायक भी न रह जाए, यह कल्पना के बाहर था। इतनी सी सत्ता से उनकी विनम्रता का आवरण दरक गया] एक और भ्रष्टतम राजनीतिक नेता के उदय का संकेत है?

हम समझ सकते थे, अरविंद केजरीवाल की भाषा हूबहू वैसी ही थी, जैसी सत्ताधारियों की आम तौर पर निजी वार्तालापों में भाषा हुआ करती है । वे अब 67 विधायकों के प्रतिनिधि है, मिल्कियत के बोध के साथ ।
एक शासक अरस्तुओं को उनकी जगह दिखा रहा था। प्लेटो का मानना था कि सत्ता की बीमारियां उस वक़्त तक दूर नहीं हो सकती है जब तक या तो दार्शनिक राजा न बन जाए या राजा दार्शनिक न बन जाए । अरस्तु ने अपने गुरू की बात को सुधारते हुए कहा, राजा का दार्शनिक होना नुक़सानदेह साबित हो सकता है । इसके बजाय राजा को अपने पास बुद्धिमान सलाहकार रखने चाहिए, उनकी बात सुननी चाहिए, लेकिन फैसला अपने विवेक से करना चाहिए । एक अच्छे शासक को बुद्धिमान ज़रूर होना चाहिए । अरस्तु ने शुद्ध सैद्धांतिक राजनीति और व्यवहारिक, समय के अनुसार खपने वाली राजनीति में भेद किया था । दृष्टि मात्र से कुछ भी पैदा नहीं होता । वह तो जो भौतिक रूप में दिखाई देता है, उसे परखने और हमारे कामों की निदेशिका भर की भूमिका अदा करती है ।

हम समझ सकते हैं, अरविंद केजरीवाल की भाषा हूबहू वैसी ही है, जैसी सत्ताधारियों की आम तौर पर निजी वार्तालापों में भाषा हुआ करती है । वे अब 67 विधायकों के प्रतिनिधि है, मिल्कियत के बोध के साथ ।
आम आदमी पार्टी का यह खुला झगड़ा हमें अच्छा लग रहा था, क्योंकि इसमें राजनीतिक पार्टियों के सांगठनिक सिद्धांतों के कुछ बुनियादी प्रश्न जुड़े हुए हैं । ऐसे मसलों पर आम लोगों की नजर से बचते हुए अंदर ही अंदर, गुपचुप सब तय कर लेना और भले -भले में सबकुछ निपटा कर 'वही चाल बेढंगी' पर बने रहना बिल्कुल अवांछनीय है ।


लेकिन, राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में केजरीवाल दुल्लती झाड़ कर बैठक से चले गये । जो उन्होंने स्टिंग वाले टेप में कहा था, उसे कर दिखाया गया।  विरोध से निपटने के लिये बाउंसर्स का प्रयोग किया गया। अब लंपटों और बाउंसर्स राजनीति का सरताज, समाज के तलछट, कूड़े-कर्कट और सभी वर्गों के मैल को अपना आधार बना कर चलने वाले इस असली केजरीवाल ने ‘वैकल्पिक राजनीति’ को जितनी तेजी के साथ माफिया गिरोह वाली गुप्त और हिंसक ढंग की राजनीति के गड्ढे में ले जाकर पटका है, वह कल्पना के परे है। भाजपा का पतन मोदी पार्टी में हुआ, तो कल पैदा हुई आम आदमी पार्टी केजरीवाल पार्टी बन गयी। कल तक जिनमें भविष्य के भारत के सपने दिखाई दे रहे थे, अचानक ही वह संदिग्ध प्रकार के स्टिंगबाज, ठग और लंपट ‘स्वयंसेवकों’ का गिरोह बन गया है।

कल तक टेलिविजन चैनलों पर जिसके सदस्यों की उपस्थिति से तथ्यों और तर्क की चमक दिखाई देती थी, अब वे लोग ही किसी माफिया सरदार के मुंह पर कपड़ा लपेटे लठैत से बेहतर नहीं दिखाई देते। सत्ता की छोटी से कसौटी पर केजरीवाल की असली सूरत सामने आगयी है। यह भी साबित हुआ है कि केजरीवाल की चमक उसके योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे सहयोगियों की बदौलत ही थी। अन्यथा, वे कोरे अंधेरे के प्राणी हैं - अधिक गंभीरता प्रदर्शित करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा किसी संजीदा विदूषक से प्रतीत होंगे।

अब दिल्ली में पूरे पाँच साल 'बाउंसर्स' की सेवा की जायेगी । फिर भी  ग़नीमत यह है कि पुलिस का महकमा पूरी तरह से दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं है । इस मामले में दिल्ली जनतांत्रिक प्रयोगों के लिये कुछ बेहतर जगह है ।

आशुतोष ने एक पत्र लिख कर योगेन्द्र यादव के खिलाफ पाँच आरोप लगाये हैं । पहला यह कि वे हरियाणा में पार्टी की ज़िम्मेदारी लेना चाहते थे । दूसरा, लोकसभा चुनाव में आप की पराजय का कारण उनकी ग़लत राजनीतिक समझ था । तीसरा, हरियाणा में विधान सभा चुनाव में लड़ने का उन्होंने ग़लत राजनीतिक फैसला किया था। चौथा, उन्होंने अरविंद की अनुपस्थिति में लोक सभा चुनाव में पराजय की समीक्षा करने की पेशकश की थी । और अंतिम आरोप यह कि इन सबके बाद ही अख़बारों में पार्टी की छवि बिगाड़ने वाली ख़बरें आने लगी ।

इन अभियोगों में सार की बात एक भी नहीं है। सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि उन्होंने अरविंद की राय पर हमेशा मोहर लगाने से इंकार किया । ऐसे ही कुमार विश्वास राजनीतिक व्यक्तियों की आपस की बातों, गप्पों को योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण पर आरोपों का आधार बना रहे हैं । ऐसे लोग किसी भी जनतांत्रिक पार्टी के लिये घातक है । वे शान के साथ अपनी उच्छृंखलता की भी शेखी बघारते हैं ।

केजरीवाल ने ‘आप’ की गीता के तौर पर अपनी जिस पुस्तिका ‘स्वराज’ को बहुत प्रचारित किया था, उसे पढ़ कर ही उनके सोच के छोटे दायरे का एक अंदाज मिल गया था। इस लेखक ने तभी उसकी एक समीक्षा लिखी थी जिसमें साफ कहा गया था कि ‘इस किताब को पढ़ने के बाद हम सोच भी नहीं सकते कि एक इतनी सीमित दृष्टि की किताब कैसे किसी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा वाली पार्टी का कार्यक्रम बन सकती है।

‘इस किताब का महत्व किसी एनजीओ द्वारा किये गये भारत के पंचायती राज के अध्ययन से अधिक कुछ नहीं है, जिसमें भारत के गांवों के प्रशासन में जन-भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिये कुछ ढांचागत सुधारों के सुझाव दिये गये हैं। अधिक से अधिक, इसे Participatory Democracy की समस्याओं के एक सीमित पक्ष का अध्ययन कहा जा सकता है। पंचायती राज में कैसे जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो, सरकारी कोष और खर्च के मामलों में जनता की आवाज सुनी जाए और सरकारी अधिकारी तथा जन-प्रतिनिधि जनता के निर्देशों का पालन करें, इसके बारे में इसमें ग्राम सभाओं और उसी तर्ज पर शहरों में मोहल्ला सभाओं को शक्ति प्रदान करने के उपाय कुछ ठोस उदाहरणों के साथ बताये गये हैं। जनतंत्र का अर्थ सिर्फ मतदान का अधिकार नहीं, दैनंदिन शासन का अधिकार है। और इसे सुनिश्चित करने के लिये मौजूदा कानूनों में जिन चंद तब्दीलियों की जरूरत है, यह किताब उसके कुछ पक्षों पर प्रकाश डालती है।

‘इसे इसलिये सीमित महत्व की किताब कह रहा हूं क्योंकि इससे हमारी अर्थ-व्यवस्था के बारे में श्रीमान केजरीवाल की समग्र समझ का जरा भी परिचय नहीं मिलता। जिसे अर्थ-व्यवस्था के विकास का इंजन कहा जा सकता है, उस औद्योगिक विकास के बारे में इसमें एक शब्द भी नहीं है। न एक शब्द उन सामाजिक-संबंधों के बारे में कहा गया है जो वर्तमान उत्पादन-संबंधों की उपज है। उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व, संपत्ति के अधिकार की अनुलंघनियता और तमाम राष्ट्रीय संसाधनों को पूंजीपतियों को सुपुर्द करने की नीतियों के चलते हम मुनाफे पर टिका अपना जो समाज तैयार कर रहे हैं, वही तो हमारी तमाम नीति-नैतिकताओं, संस्कृति और सभ्यता के रूप की जड़ में है। गांव, शहर कुछ भी इस बुनियादी, भौतिक सच्चाई के प्रभावों से मुक्त नहीं रह सकता है।

‘यहां तक कि गांव के स्तर पर भी सामंती प्रभुत्व को समाप्त करने के बारे में, सच्चे भूमि-सुधार के बारे में इसमें एक शब्द नहीं कहा गया है। अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों के बारे में सोच तो शायद इस किताब के लिये दूर-दराज का भी कोई विषय नहीं है!

‘केजरीवाल की सबसे प्रमुख चिंता भ्रष्टाचार है। और दूसरी चिंता है - नक्सलवाद। इन दोनों में से किसी का भी स्थायी समाधान पूंजीवाद के रहते तो कभी संभव नहीं है। उन्होंने जिस अमेरिका, स्वीट्जरलैंड और ब्राजील के उदाहरण अपनी इस किताब में दिये हैं, वे समाज भी भ्रष्टाचार और तमाम प्रकार के कदाचारों से मुक्त समाज नहीं है। इन समाजों के यथार्थ के बारे में ऐसे ढेर सारे अध्ययन मौजूद हैं जो केजरीवाल की समझ के विपरीत इन देशों में होने वाले आर्थिक घोटालों, राजनीतिक कदाचारों और सामाजिक विकृतियों की कहानियां कहते हैं।

‘हमारी राय में तो इतनी सीमित और एनजीओ-छाप समझ के बल पर राष्ट्रीय नीतियों में सुधार के क्षेत्र में केजरीवाल और उनकी पार्टी का रत्ती भर योगदान भी संभव नहीं होगा। वामपंथी पार्टियां, कांग्रेस और दूसरी पार्टियां उनसे अपनी मूलभूत नीतियों के खुलासे की जो मांग कर रही है, वह बेजा नहीं है। ‘स्वराज’ को पढ़ने के बाद तो यह सचमुच एक चिंताजनक बात लगती है।‘

आज फिर यह कहना पड़ रहा है कि आम आदमी पार्टी यदि किसी ऐतिहासिक ज़रूरत की उपज है, तो उसके नेता का यह बौनापन ज्यादा दूर तक चल नहीं सकता । भारी बहुमत मात्र इसकी सरकार के स्थायित्व की भी गारंटी नहीं होगा । इतिहास आगे उनके साथ नहीं रहेगा। केजरीवाल गिरोह ने आगे के लिये जो आंदोलन का कार्यक्रम घोषित किया है, उसकी साख अब दो कौड़ी की नहीं रह गयी है, भले ही वे अपने कार्यक्रमों में दूसरी पार्टियों की तरह कितने ही लोग क्यों न जुटा लें।





गुरुवार, 26 मार्च 2015

सरला माहेश्वरी की कविताएं


धारा 66 ए के अंत की रात में लिखी गई  कविता - मन की बात :

मन की बात

कितना आसान है
तुम्हारे लिये
कहना अपने मन की बात
करना अपने मन की बात
काश कि
तुम सुनते मन की बात
मेरी बात
उसकी बात
हम सबकी बात
मुश्किल है
बहुत मुश्किल
मेरे लिये, उसके लिये, हम सबके लिये
कहना अपने 
मन की बात
करना अपने 
मन की बात
यहाँ तो कदम-कदम पर
लगाये बैठा है कोई घात
करने को प्रतिघात
हलक में ही
अटक जाती है
हमारे मन की बात
नहीं, ऐसा नहीं है कि 
हमें आता नहीं बोलना
हमारे मुँह में भी जुबां है
हम भी चाहते हैं
बहुत कुछ कहना
चहकना,जोशो-खरोश से दहाड़ना
हवा में उड़ना
देश-विदेश की सैर करना
एक बार ,बस एक बार
पूछ कर तो देखो
कैसा लगता है हमें
जब पकी-पकाई फ़सल पर 
आसमान टूटता है
प्रलय बनकर
काश, पूछते कि
ठंडे चूल्हे की आग
कैसे जलाकर ख़ाक करती है हमें
काश, पूछते कि 
कैसे हमारे मन की चाहतें नहीं
रोज़-रोज़ की ज़रूरतें 
डराती हैं हमें
रुलाती हैं हमें
एक बार
हमारे मन में झाँक कर तो देखो
चकरा जाओगे तुम भी
देख कर हमारे हौंसलों की उड़ान
पिंजरे का दरवाज़ा एक बार
खोलकर तो देखो
क़सम से भूल जाओगे
बंद करना
टूटना ही है इसे
यही है मेरी, उसकी, हम सबकी
मन की बात
तब तक, हाँ, तब तक 
करते रहो तुम
अपने मन की बात
ख़ैर, 
आज धारा 66 ए के अंत की रात
कह रही हूँ कुछ मन की बात।

2 . इंस्पेक्टर राजेन्द्र धोंदू भोंसले

आज, 19 मार्च 2015 का जनसत्ता
विष्णु नागर बता रहे हैं
मुंबई के दादाभाई नौरोजी थाने के
किसी इंस्पेक्टर राजेन्द्र धोंदू भोंसले की कथा
यह कथा है भोंसले के असाधारण जुनून की
गुमशुदा 166 लड़कियों और 174 लड़कों की खोज की
अपने काम में ऐसा जुटा ये दीवाना
कि 165 लड़कियों और 171 लड़कों को वापस मिल गया अपना ठिकाना
लेकिन वह अब भी बेचैन है
जारी जो है अब भी 166वीं की तलाश
गुमशुदा पूजा की तलाश
क़ायम है उसका विश्वास
जैसे होती है हर पिता की आस
इंस्पेक्टर राजेंद्र धोंदू भोंसले
शुक्र है कि बचे हैं तुम जैसे कुछ पगले
तुम जैसे भोंदू पगलों से ही बचे हैं
जीवन के अनमोल घोंसले
तुम हो जैसे किसी बीहड़ में जलती मशाल
अब तुम सिर्फ एक नाम नहीं हो
जो हो जाये गुमनाम
दफ़्न हो जाय अनाम
हम न होने देंगे तुम्हें लापता
ज़िंदगी ढूँढ ही लायेगी तुम्हारा पता
जैसे ढूँढ लाये थे तुम
गुम हो गयी ज़िंदगियों का
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नीचे की तस्वीर ऊपर उल्लेखित पूजा की है :


ब्राह्मणवाद


अरुण माहेश्वरी

अर्चना वर्मा जी ने अपनी वाल पर ब्राह्मणवाद शीर्षक से सात पोस्ट लगाई है। इसमें उन्होंने बड़ी सरलता से ब्राह्मणवाद के प्रसंग में कुछ मौलिक बातें कही है। उनकी बातों का लुब्बे-लुबाब यह है कि - क्यों ब्राह्मणवाद के नाम पर बेचारी ब्राह्मण जाति को लपेटा जाता है जबकि ब्राह्मणवाद का समानार्थी पद है जातिवाद। यदि जातिवाद कहके उससे अभिहित सारी बातें कही जा सकती है, और कही जाती रही है तो फिर फिजूल में ब्राह्मणवाद का वितंडा खड़ा करने का क्या मतलब है?

हमारा सवाल है कि क्या सचमुच ब्राह्मणवाद और जातिवाद समानार्थी है? ब्राह्मणवाद का इतिहास तो यह बात नहीं कहता। जातिवाद ब्राह्मणवाद की उपज जरूर है लेकिन ब्राह्मणवाद नहीं है। भारतीय दर्शन के इतिहासकारों के अनुसार ईसापूर्व 900 से लेकर ईस्वी सन् 400 के बीच के लंबे काल में वैदिक मंत्रों की संहिताओं, ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद के बाद एक अलग कोटि का साहित्य सामने आया था जिसे ब्राह्मणग्रंथों के रूप में जाना जाता है। इन ग्रंथों में नाना प्रकार के अनुष्ठानों से जुड़े विधि-विधानों, कर्मकांडों, यागयज्ञों, कट्टरपंथी मान्यताओं ओर काल्पनिक प्रतीक योजनाओं की भरमार है। महीनों, सालों, दो-दो साल तक चलने वालें यज्ञों के विधान दिये हुए हैं। इतिहासकार इस काल को भारत की भौतिक उन्नति के साथ ही वर्ण व्यवस्था के उदय का भी काल बताते हैं।

इन ब्राह्मण ग्रंथों का ही आगे विकास आरण्यक ग्रंथों में हुआ। योग, यज्ञ के बजाय इनमें ध्यान और मनन को महत्व दिया गया। फिर आए उपनिषद। इन्हें साधारणतया ब्राह्मण ग्रंथों की परंपरा का अंश मानने पर भी उनके विकास में ब्राह्मणेत्तर चिंतन का पर्याप्त प्रभाव रहा। भारतीय चित्त के विकास के इतिहास में ब्राह्मणों के युग से उपनिषद युग में प्रवेश करना एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। हरप्रसाद शास्त्री तो इसे प्राचीन भारत में हुई एक गौरवशाली बौद्धिक क्रांति कहते थे। ब्राह्मण विचारधारा का आरण्यक विचाराधारा में परिवर्तन भारतीय मूल्यों के परिवर्तन का नया चरण था जिसमें यज्ञानुष्ठान के बजाय ध्यानोपासना पर बल दिया जाने लगा।

वेदांत दर्शन के उत्तरकाल में ब्रह्म के जिस महान स्वरूप की कल्पना की गई थी वह वेदों में प्रयुक्त ब्रह्म शब्द से बिल्कुल अलग थी। वेदों के भाष्यकारों के अनुसार वहां आए ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ है - बलि या अन्नाहुति, सामगान, तंत्र और तंत्र विद्या, सफल याजि्ञक अनुष्ठान, मंत्रोच्चार और आहुतियां, होता द्वारा मंत्र पाठ, महान। इसीलिये, भारतीय इतिहास में ब्राह्मणवाद समानार्थी है कर्मकांडों का, अंध-विश्वासों, धार्मिक रूढि़वाद, पोंगापंथ, का। समाज के कठोर जातिवादि विभाजन, छुआछूत और खास प्रकार के शुचिता बोध का। इन सबके समुच्चय का। ईसापूर्व 900 से ईस्वीं 400 तक चले इस दौर को हरप्रसाद शास्त्री भारत की चरम भौतिक उन्नति से लेकर जातियों में पर्यवसन का दौर कहते हैं। उनके शब्दों में - ‘वैदिक उपद्रव का काल’। मनुस्मृति इसी दौर में रची गयी सामाजिक संरचना से जुड़े कठोर विधानों की संहिता है, ब्राह्मणवादी सनातन धर्म की सामाजिक संहिता, छुआछूत और शुचिता के संस्कार तक जाने वाली एक खास संहिता।

ऐसे में यदि हम अर्चना वर्मा की सलाह मान ले तो हम ‘भारतीय चित्त’ के निर्माण के इस अनोखे शुचिता बोध वाले विशेष विचारधारात्मक पहलू की समझ के सूत्र को ही गंवा देंगे। डा. अंबेडकर ब्राह्मणवाद का जिक्र ऐसे ही नहीं किया करते थे। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि विचारधारा के क्षेत्र में यह एक विशेष भारतीय परिघटना है। इसकी जगह सिर्फ जातिवाद का उल्लेख इस समस्या को उसके वास्तविक इतिहास से काट कर पूरी तरह से अबूझ बना देने का उपक्रम होगा।

कहना न होगा, भारतीय चिंतन के विकास का इतिहास इसी ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लड़ाई का इतिहास है । भारतीय नवजागरण तक का इतिहास भी, जिसके प्रमुख नेता ब्राह्मण जाति के लोग ही थे। आज भी तमाम स्तरों पर यह लड़ाई जारी है।

सोमवार, 23 मार्च 2015

ली क्वान यू


अरुण माहेश्वरी


ली क्वान यू, सिंगापुर के किंवदंती नेता, पूरब का बुद्धिमान व्यक्ति, सन् 1959 में अंग्रेजो से सिंगापुर की मुक्ति के बाद से लगभग छ: दशक से भी ज्यादा समय तक एक जनतांत्रिक प्रणाली में इस द्वीप शहर के एकछत्र नेता, सिंगापुर के निर्माता।  आज वे नहीं रहे। लेकिन एक छोटे से देश की प्रयोगशाला में उन्होंने जो उपलब्धियां की है, उनसे उनके पीछे विकास और शासन से जुड़े कई ऐसे महत्वपूर्ण सवाल छूट गये है, जिनसे आज दुनिया की संभवत: हर सरकार को किसी न किसी रूप में टकराना ही होगा। ली क्वान का सिंगापुर आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र में पूरब और पश्चिम की परस्पर-निर्भरशीलता का एक ऐसा जटिल मॉडल पेश करता है, जिसमें कौन किसके हितों को साध रहा है कहना मुश्किल है, लेकिन वहां की व्यापक जनता के जीवन-स्तर पर इसका गहरा असर पड़ा है। पूरब का एक सबसे गरीब क्षेत्र आज दुनिया का एक सबसे चमचमाता हुआ, मानव विकास के अनेक मानदंडों पर काफी अग्रणी क्षेत्र प्रतीत होता है और इसकी हम तब तक अवहेलना नहीं कर सकते जब तक हम किसी ऐसे सोच में न डूबे हो कि ‘जगत प्रतीति मिथ्या है’।

अंग्रेजों ने अपनी वाणिज्यिक गतिविधियों के बंदरगाह शहर के तौर पर सिंगापुर के अलावा इसी क्षेत्र के और भी दो क्षेत्रों को चुना था - कुआलालमपुर के निकट मेलाका और मलयेशिया के उत्तर-पश्चिमी तट से लगा हुआ पेनांग। 1959 में अंग्रेजों ने सिंगापुर को स्वशासन का अधिकार दिया था और पिपुल्स ऐक्शन पार्टी के नेता ली के हाथ में कमान आई। 1963 में उसके मलय संघ में शामिल होने से मलयेशिया का जन्म हुआ। लेकिन दो साल बाद ही, कुछ जातीय संघर्षों की पृष्ठभूमि में 1965 में सिंगापुर को इस संघ से निकाल दिया गया और वह एक स्वतंत्र गणतंत्र के रूप में सामने आया। और तब से लेकर अब तक वहां ली क्वान की पिपुल्स एक्शन पार्टी का ही शासन रहा है। विपक्ष कभी भी पनप नहीं पाया या उसे पनपने नहीं दिया गया।

कहा जाता है कि सिंगापुर के जन्म की परिस्थितियों और उसके अति-क्षुद्र आकार के चलते ही वहां अस्तित्वीय संकट के बोध पर टिकी ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां तैयार हुई जिनकी वजह से वहां जनतंत्र के आवरण में ही एकदलीय तानाशाही की व्यवस्था कायम हुई। ली ने सख्त हाथों से कमान संभाली और इस नवोदित छोटे से देश को अपने प्रकार का एक खास सुरक्षा कवच प्रदान करने के लिये ही उसे विश्व वित्तीय व्यवस्था का एक अभिन्न अंग बना दिया। देखते ही देखते, यह बंदरगाह, देश पूरब में विश्व पूंजीवाद की नाक बन गया। इससे उसे दुश्मनों की कुनजर से सुरक्षा मिली, तो इसके साथ ही विकास के कामों के लिये जरूरी पूंजी का अबाध प्रवाह। पूरब के बुद्धिमान कहे जाने वाले ली ने सिंगापुर की इस स्थिति को पूरी मजबूती से बनाये रखा - सिंगापुर दिन-प्रतिदिन चमकता रहा और विकास के एक खास शहर-केंद्रित मॉडल के उदाहरण के तौर पर आज वह सारी दुनिया के शासकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

सिंगापुर के साथ अक्सर चीन की तुलना की जाती है। एक देश घोषित तौर पर पूंजीवाद के रास्ते को अपनाए हुए है और दूसरा समाजवाद को। लेकिन दोनों में कुछ अनोखी समानताओं को देखा जाता है। दोनों जगह एकदलीय शासन है और नीतियों के नाम पर शहरीकरण पर अतिरिक्त बल। राजनीति और अर्थनीति के क्षेत्र में विचारकों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो सरकारों को किसी प्रशासनिक औजार से ज्यादा कोई महत्व देने के लिये तैयार नहीं है। शासन के साथ किसी भी देश की आबादी की संरचना के प्रश्नों, सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को वे कोई महत्व नहीं देते हैं। उनकी दृष्टि में विकास का लक्ष्य एक पूर्व-निर्धारित परम सत्य है, जिसे आज की दुनिया में नव-उदारवाद का लक्ष्य कहा जा सकता है। उनके अनुसार, शासन का काम पूरी शक्ति के साथ उस दिशा में तेजी से बढ़ना भर है। यही वजह है कि जब 2008 में अमेरिका में सब-प्राइम संकट के साथ वित्तीय क्षेत्र में भारी उथल-पुथल मची थी, उसके पहले तक अमेरिकी जनतांत्रिक प्रणाली को एक कमजोर प्रणाली बताते हुए अक्सर चीन की सख्त शासन प्रणाली की दुहाइयां दी जाती थी। यह सोच आज भी हमेशा वैकल्पिक शासन प्रणालियों पर विचार के क्रम में किसी न किसी रूप में सामने आता रहता है। इस मामले में सिंगापुर एक बहुत ही छोटे देश के नाते कोई ठोस विकल्प न होने पर भी एक सीमित क्षेत्र के विकास के मॉडल के रूप में वह हमेशा चर्चा के केंद्र में रहा है।

भारत में आज स्मार्ट सिटी की चर्चा जोरों से चल रही है। देश की कई राज्य सरकारें अपने-अपने तरीके से शहरीकरण के इस खास प्रकार के अभियान में ही अपना भविष्य देख रही है। इसमें अक्सर भारत के राजनीतिज्ञ सिंगापुर की यात्रा पर जाते हुए और विकास के ली के बताये हुए मॉडल का अध्ययन करते हुए पाए जाते हैं। मोदी जी ने स्वच्छ भारत का जो नारा दिया है, उसके पीछे भी शहरी स्वच्छता का वही आदर्श किसी न किसी रूप में झलकता हुआ दिखाई देता है, जैसा कि सिंगापुर में दिखाई देता है।

लेकिन हमारी समस्या यह है कि हम सिर्फ नारों और अभियानों में ही विकास का जाप करने पर ज्यादा यकीन करते हैं। देश का निर्माण एक व्यापक सांस्थानिक निर्माण का काम होता है। आजादी के इन 68 सालों में इस प्रकार का एक सांस्थानिक ढांचा हमारे यहां तैयार भी हुआ है। यह हमारे देश की ठोस वास्तविकता से जुड़ा हुआ ढांचा है जिसमें विकास के साथ जनता की लोकतांत्रिक भागीदारी को सुनिश्चित करने की भी व्यवस्थाएं है। बिल्कुल नीचे के स्तर तक स्वशासी संस्थाओं का निर्माण इसी दृष्टि से किया गया है। लेकिन मुसीबतों की जड़ यह है कि भ्रष्टाचार के कैंसर ने इस पूरी लोकतांत्रिक शासन की श्रृंखला को इतना पंगु कर दिया है कि जिसके कारण इसके वांछित परिणाम हासिल करना मुश्किल होगया है। हमारे यहां पंचायतें, नगरपालिकाएं और नगर-निगम  विकास के कामों को साधने के बजाय घनघोर भ्रष्टाचार के अड्डे बन गये हैं।

आज सिंगापुर के प्रयात नेता ली के महत्व को समझते हुए इस तथ्य को कभी भी ओझल नहीं किया जाना चाहिए कि ली ने अपने देश का कायाकल्प हवा में या कोरे नारों और विचारों से नहीं किया था। उन्होंने सिंगापुर को विश्व वित्तीय बाजार और विश्व व्यापार के एक केंद्र के साथ ही एक स्वच्छ और सुंदर देश के रूप में विकसित करने के लिये वहां एक सुनिश्चित सांस्थानिक ढांचा तैयार किया और उसे भ्रष्टाचार की तरह के कैंसर से यथासंभव बचाये रखा। सिंगापुर की सफलता के पीछे कहीं न कहीं ली के आधुनिक धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण, सिंगापुर को जातीय संघर्षों के उसके दर्दनाक इतिहास से मुक्त रखने की सचेत कोशिशों की भी बड़ी भूमिका रही है। सिंगापुर अपनी आजादी के समय जिस प्रकार के चीनी और मलय जातियों के बीच भयंकर जातीय संघर्षों से जर्जर था, वह आज सिंगापुर के लिये सुदूर अतीत की चीज बन गयी है। हर प्रकार की जातीय और सांप्रदायिक संकीर्णता से मुक्ति में भी सिंगापुर के विकास का रहस्य छिपा हुआ है।




उदय प्रकाश को पीटने की धमकी : फासीवाद की पद-ध्वनि


सभी मित्रों का ध्यान एक बेहद चिंताजनक तथ्य की ओर दिलाना चाहता हूँ ।

पंकज कुमार झा नामक एक महोदय ने फ़ेसबुक में उदय प्रकाश की वाल पर प्रतिक्रिया देते हुए सीधे-सीधे उन्हें गंदी गालियाँ दी है और उन्हें सरे-आम पीटने की धमकी के साथ उनके खिलाफ जातिवादी घृणा का ज़हर फैलाने की कोशिश की है । उदयप्रकाश ने ब्राह्मणवाद से जुड़े प्राचीन चातुर्वर्ण्य सनातन धर्म और कर्मकांडों की प्रतिक्रियावादी परंपरा के ऐतिहासिक संदर्भ में आज के आधुनिक भारत को फिर से मध्ययुगीन अंधेरे में ले जाने वाली सांप्रदायिक ताक़तों के विरोध में एक पोस्ट लगाई थी, जिसमें ब्राह्मणवाद को एक राष्ट्र-विरोधी विचार बताया गया था । पंकज कुमार झा ने जान-बूझ कर उनकी इस पोस्ट को विकृत किया और ब्राह्मणवाद से अभिहित उसके विचारधारात्मक संदर्भों के बजाय उसे आज की ब्राह्मण जाति के विरोध का जातिवादी रूप देकर उनके खिलाफ जातिवादी घृणा फैलाने की कोशिश की है ।

उदय प्रकाश हिंदी के आज सबसे प्रतिष्ठित और जनप्रिय कथाकार है । देश और दुनिया की कई भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद हो चुका है और सब जगह बड़े आदर के साथ उनका नाम लिया जाता है । हिंदी के एक ऐसे ख्याति-प्राप्त सम्मानित रचनाकार को जातिवादी और सांप्रदायिक नफ़रत का शिकार बनाने की यह कोशिश साहित्य की अस्मिता पर आरहे ख़तरे का एक बेहद चिंताजनक संकेत देती है । यह समय है जब पूरे लेखक समुदाय को उदय प्रकाश के प्रति एकजुटता जाहिर करते हुए बदनीयती से भरे ऐसे जातिवादी-फासीवादी हमले के खिलाफ अपनी आवाज़ उठानी चाहिये ।