सोमवार, 15 सितंबर 2014

सनातनपंथ और साईं भक्तों के प्रसंग पर एक सोच

अरुण माहेश्वरी

टेलिविजन के कुछ चैनलों पर सनातनपंथियों और साईं भक्तों के बीच धर्म की दुनिया में चल रही वर्चस्व की लड़ाई के दृश्य बेहद दिलचस्प है। मंदिरों से साईं बाबा की मूर्तियों को हटाने, उनकी पूजा-अर्चना पर रोक लगाने का जैसे एक पुरजोर अभियान चल रहा है। 33 करोड़ देवी-देवताओं के सनातन धर्म के पास अब एक भी नये देवता को रखने की जगह नहीं है!

जो लोग सनातन धर्म की सर्वसमावेशी उदारता के प्रमाण के तौर पर बुद्ध और महावीर को भी उसके देवताओं की कतार में शामिल करने की बात कहते हैं, उसी के इस आक्रामक रुख की उनके पास कोई विशेष व्याख्या नहीं है। साईं के चरित्र को लेकर नाना प्रकार के मनगढ़ंत किस्सों को जरूर हवा में उछाला जा रहा है, जैसा कभी ब्राह्मणवाद और बौद्ध दर्शन के बीच अथवा शैव और वैष्णवों के बीच के खूनी संघर्षों के समय में भी किया गया होगा। क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इतिहास के न्याय में दमन और भक्षण ही ‘समावेशी उदारता’ की प्रक्रिया के लक्षण होते हैं?

इसीलिये जो लोग धर्म के राज में नीति-नैतिकता और शांति को देखते हैं, उनके लिये तो यह दृश्य और भी ज्यादा आंख खोलने वाला हैं। सनातन धर्म की वृहत प्रभुसत्ताओं के बाहर हिन्दू धर्म की ही नवोदित प्रभुसत्ताओं के साथ एक प्रकार का लघु ‘सीया-सुन्नी’ संघर्ष!

दरअसल, यह समूचा प्रसंग धर्म-निरपेक्ष भारत में धर्मों की प्रभुसत्ता के विस्तार की एक ऐसी कहानी कहता है, जो ज्यादा चिंतनीय है। जब हम आधुनिक भारत में राजनीति अथवा सत्ता-विमर्श में धर्म के प्रवेश के इतिहास को देखते हैं तो अनायास ही हमारा सबसे पहले ध्यान आरएसएस की ओर चला जाता है। आधुनिक भारत में आरएसएस एक ऐसा प्रमुख राजनीतिक उद्देश्यों वाला संगठन है, जो धर्म के जरिये राजनीति करने के साथ ही धर्म के क्षेत्र में भी प्रत्यक्ष दखलंदाजी को अपनी घोषित रणनीति का हिस्सा बनाये हुए हैं।

आरएसएस के इतिहासकार जनसंघ के बाद विश्व हिन्दू परिषद के गठन को आरएसएस के जीवन की एक बहुत बड़ी घटना मानते रहे हैं। गंगाधर इन्दूरकर ने अपनी किताब ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अतीत और वर्तमान’ में लिखा है : ’’संघ द्वारा स्थापित अन्य संस्थाओं की अपेक्षा इस संस्था (विश्व हिन्दू परिषद, विहिप) के विषय में गुरु जी को अ​धिक आत्मीयता थी। ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अतिरिक्त किसी अन्य संस्था के साथ गुरु जी का नाम नहीं जुड़ा, किन्तु विश्व हिन्दू परिषद के लिए 22 व्यक्तियों का जो प्रथम ट्रस्ट बना, उसमें तेरहवें क्रमांक पर श्री माधव सदाशिव गोलवलकर, यह नाम दिखाई देता है।’’ (पृ. 138)

आर एस एस का ’एकचालाकानुवर्तित्व’ का सिद्धांत सिर्फ राजनीति के लिये नहीं, धर्म के क्षेत्र में भी हिन्दू समाज के सभी धार्मिक संस्थानों को एक कमान के अधीन लाने का सिद्धांत है। विहिप का गठन हिन्दू धर्म को एक पैगम्बरी धर्म में तब्दील करने के लिये हिन्दुओं की सभी धार्मिक संस्थाओं में दखल देने के लिये ही किया गया था। आर एस एस भारतीय धर्म-दर्शन की वैविध्यमय विशिष्टता को अपने रास्ते की एक बड़ी बाधा मानता रहा है और इसीलिये उसने गिरजाघरों और मस्जिदों की तरह किसी एक संस्था के द्वारा हिन्दुओं के धार्मिक जीवन को चालित करने का बीड़ा उठा रखा है।

विहिप की घोषित मान्यताओं में कहा गया है कि ’’परिवर्तित सन्दभो में मठ, मन्दिर आदि धार्मिक केन्द्रों को केवल भक्ति, पूजा, उपासना केन्द्रों के रूप में नहीं अपितु सेवा तथा सामाजिक प्रगति के आधार-बिन्दु के रूप में देखा जाएँ।’’

अपने अस्तित्व के इन तमाम सालों में विहिप धर्म-संस्थाओं पर अपनी जकड़बंदी के विस्तार में कितना सफल रहा, कितना विफल - यह एक अलग शोध का विषय है। लेकिन एक बात साफ है कि उसने धार्मिक मठों, बाबाओं-गुरुओं को सत्ता की राजनीति का अंग बना कर धर्म के पूरे क्षेत्र को आत्मिक उत्थान या आस्था के बजाय वर्चस्व कायम करने के तमाम कुत्सित झगड़ों और विवादों का रण-क्षेत्र जरूर बना दिया। आये दिन मठों के अंदर के खूनी संघर्षों के किस्से अखबारों में पढ़ने को मिलते रहते हैं। सत्ता के पक्ष-विपक्ष के खेल में शामिल करके संघी राजनीति ने तमाम मठाधीशों, बाबाओं-गुरुओं में सत्ता का नया मद जागृत किया है। इससे जुड़े उन्माद ने सनातन धर्म के कई मठाधीशों में क्रमश: एक भिन्न प्रकार की उग्रता और आक्रामकता भी पैदा की है।

कहना न होगा, साईं प्रसंग में किसी न किसी रूप में सनातनपंथियों की यही आक्रामकता खुल कर सामने आरही है।

आने वाले समय में यह पूरा प्रसंग क्या रूप लेगा कहना मुश्किल है। लेकिन इतिहास गवाह है कि वर्णाश्रमी सनातन धर्म के झंडाबरदारों के जरिये यदि समाज में पुरातनपंथी विचारों और भावनाओं को किसी भी रूप में बल मिलता है तो अन्तत: इसका निश्चित प्रभाव भारत में सामाजिक न्याय की लड़ाई पर, भारतीय जनतंत्र पर पड़ेगा। और, इसके लिये दोषी होगा - संघ परिवार और उसकी धर्म-आधारित राजनीतिक सोच। इस बारे में संघ परिवार को सफाई देनी होगी !

रविवार, 14 सितंबर 2014

विनय कोनार नहीं रहे





(आज पश्चिम बंगाल के किसान आंदोलन के एक किंवदंती नेता विनय कोनार का देहावसान हो गया। वे पिछले कुछ अरसे से बीमार चल रहे थे । विनय दा की मृत्यु बंगाल के किसान आंदोलन के एक युग के अवसान की तरह है । एक अत्यंत प्रभावशाली वक़्ता और उतने ही अच्छे लेखक विनय दा कम्युनिस्ट आंदोलन के नेतृत्व की उस परंपरा के प्रतिनिधि थे, जो मेहनतकशों के हित में संघर्ष के लिये अकूत त्याग-बलिदानों की परंपरा के रूप में जानी जाती है ।
आज उनका न रहना संकट की इस घड़ी में देश के किसान आंदोलन के लिये एक बड़ी क्षति है । उनकी स्मृति में हम आंतरिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।)


विनय कोनार का लिखा एक संस्मरण 
आलो
(मधुर यादों की कल्पना)
             
विनय कोनार

बचपन का दोस्त। हुगली जिले का निवासी, हमारे गांव में उसके मामा का घर था। छुट्टियां मिलने पर ही मामा के घर आजाता था। उम्र में एक साल बड़ा ही होगा, लेकिन पढ़ाई में मुझसे एक क्लास नीचे था। मुझे किसी पाठशाला में नहीं जाना पड़ा था, दस वर्ष का होते ही पिता ने सीधे पांचवी क्लास में भर्ती कर दिया। प्रधानाघ्यापक ने मुझसे सिर्फ दो सवाल पूछे थे, पहला था, ‘हमारे पास एक काली गाय है‘-इसका अंग्रेजी अनुवाद और दूसरा था, ‘ए स्लाई फोक्स मैट ए हेन‘-इसका बांग्ला में अनुवाद। आश्चर्य हुआ कि मैंने दोनों सवालों का ठीक जवाब दिया था।
आश्चर्य इसलिए हुआ क्योंकि मैं पढ़ने-लिखने में एकदम भी अच्छा नहीं था, पाठ्य पुस्तकों की ओर मेरा कोई रुझान ही नहीं था। पिता जिन्हें आमतौर पर अपठनीय समझते थे उन्हीं कहानी-उपन्यासों को पढ़ने की जबरदस्त इच्छा रहती थी। परीक्षा में किसी तरह पास होने से ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था। स्कूल में मेरी ख्याति बदमाशी के लिये थी, अच्छे छात्र के लिये नहीं।
सुधा मुझसे बिल्कुल उल्टा था। बिना मॉं-बाप का गरीब। लेकिन जैसे खेलकूद में अच्छा था उसी तरह पढ़ने में भी तेज था। स्कूल में किसी क्लास में प्रथम नहीं आया हो ऐसा विरल ही होता था। हम दोनों में एक बात मिलती थी। दोनों ही गणित बहुत पसंद करते थे। इसी एक विषय में मेरा लगाव था। मुझे लगता है मेरी स्मृति कमजोर है, गणित याद नहीं करना पड़ता, नियम तर्कसिद्ध है, इसलिए मुझे यही पसंद था। सुधा धीर-धीरे हमारे घर का ही लड़का जैसा हो गया। रेलगाड़ी से 25 मिनट लगते, मौका मिलते ही चला आता। इस तरह 1945 में गणित में बहुत अच्छे नम्बर लाकर भी मैं तीसरे दर्जे में पास हुआ। सुधा इसके एक साल बाद तीन विषयों में विशेष योग्यता के साथ 70 प्रतिशत अंक लेकर प्रथम श्रेणी से पास हुआ। पिता के दबाव से कुछ दिनों तक कालेज जाने का नाटक करता रहा। सुधा भी कालेज में भर्ती हो गया। मामा की हालत भी अच्छी नहीं थी, अनेक कष्ट उठाकर ट्यूशन करके सन् ‘48 में अच्छे नंबरों से आई.एस.सी. पास की।
दोनों के अलग-अलग जगह रहने पर भी हम दोनों की मित्रता परवान चढ़ने लगी। 1945 से ही हम दोनों पर समाजवाद का रंग चढ़ने लगा था और माक्‍​र्सवाद की तरफ आकर्षण भी बढ़ने लगा था। सन् 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी के गैरकानूनी होने के बाद हमारा आग्रह और भी बढ़ गया। दूर रहने पर भी दोनों ने पढ़ना-लिखना शुरू किया। इसी बीच मुझे पार्टी सदस्यता मिल गयी थी तथा मैं गुप्त कामों में लग गया था। सुधा को यह बता नहीं सकता था। सुधा तब अपने दूर के किसी रिश्तेदार की मदद से शांतिपुर में एक अनाम संस्था में काम करने लगा। हमारे यहां तब भी खुले में पार्टी का अस्तित्व नहीं था। लेकिन उस वक्त शांतिपुर में आर.सी.पी.आई का संगठन था। कानाई पाल उसके नेता थे। यह पार्टी गैर-कानूनी नहीं थी। 1948 के 15 अगस्त को कानाई पाल के नेतृत्व में जुलूस के शुरू होते ही पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी। पाल के साथ बहुत से लोग घायल होकर जेल चले गये। जुलूस को देखकर सुधा काफी उत्साहित हुआ और पत्र लिखकर मुझे सब कुछ बताया। सुधा इसी बीच एक क्लब से जुड़ गया था। क्लब और लाईब्रेरी एक साथ थे। अच्छा फुटबॉल खेलता था इसलिए क्लब में उसकी इज्जत थी। सुधा बहुत अच्छी तरह तर्क कर सकता था। बहुत कम शब्दों में वजनदार तर्क देकर लोगों का मन जीत सकता था। शांतिपुर के इस क्लब ने एक विचार-गोष्ठी का आयोजन किया। इस विचार-गोष्ठी का विषय था : नारी का दूसरा विवाह,समाज का अमंगल। सुधा ने बताया कि वह इसमें भाग लेगा और इसके लिए तीन लोगों की एक टीम तैयार की है। कहना न होगा कि सुधा विपक्ष में बोलेगा। ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र‘, ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति‘ उस समय हम पढ़ चुके थे। सुधा ने तब विद्यासागर और डिरोजियो को भी घोट लिया था। उसका कहना था कि मेरे आने पर उसे और भी बल मिलेगा। मैं गया, तीन लोगों की टीम में कौन क्या बोलेगा यह भी ठीक कर लिया गया। शाम को क्लब के प्रांगण में विचार-गोष्ठी तथा उसके बाद गीत-संगीत का कार्यक्रम था। गोष्ठी के शुरू में ही प्राय: चार-पांच सौ लोग जमा हो गये थे। लड़कियों की उपस्थिति भी काफी थी। सुधा की टीम के लोगों ने नारियों के समानाधिकार के सवाल के साथ ही साथ दूसरे विवाह के प्रश्न को भी उठाया : समानता के संबंधों के बिना उच्च और निम्न संबंधों में दया और निर्भरता रह सकती है,लेकिन प्रेम नहीं रह सकता और इसीलिए प्रेम-हीन संबंध व्यभिचार के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। इसीतरह दूसरे विवाह का अधिकार न रहने पर समाज किस तरह कलुषित होता है इसका साहित्य के जरिये विभिन्न उद्धरण देकर उसने सभा को इसतरह मंत्र-मुग्ध किया कि सुधा का दल तो जीत ही गया, साथ में सुधा को श्रेष्ठ तार्किक का ईनाम भी मिला।
दोनों दोस्त खा-पीकर बतियाने के बात जब बिस्तर में घुसे तो देखा कि मच्छरदानी के अंदर कीड़ों की तरह कुछ चल रहा है। सुधा को पूछा तो बोला कि ‘वो कुछ नहीं है ऐसे ही मच्छर है‘। कुछ-कुछ शरतचन्द्र के श्रीकांत के इंद्रनाथ की तरह का भाव था, ‘वो कुछ नहीं सांप है‘ जैसा ही। समझ गया कि सुधा इन सबका अभ्यस्त है। लेकिन मैंने कहा कि मैं यहां सो नहीं सकूंगा। मैंने कहा कि चलो छत पर चलते हैं वहां दरी बिछाकर पांव पर चादर डालकर सो जाएंगे, हवा चल रही है इसलिए मच्छर भी नहीं काटेगें। वो रात आज भी यादों में तरोताजा है। आकाश में बड़ा सा चमकता हुआ चांद और श्वेत-काले बादलों का खेल । तेज गति से दौड़ रहे बादलों के साथ चांद की लुका-छिपी, मन को लुभाने वाला सौन्दर्य। नजदीक ही एक नाला और उसके पार जमीन। नाले पर एक बांस का मचान और उसपर बैठा हुआ अनजान एक युवक बांसुरी बजा रहा है। रात की गहरी निस्तब्धता, आकाश में बादलों की लुका-छिपी प्रकृति जैसे काव्यमय हो उठी थी -हम भी निस्तब्ध हो गये थे।
        सुधा शांतिपुर में दो-एक वर्ष रहा। उसके बाद प्राईवेट बी.ए. पास किया, किसी तरह संपर्क से उसकी बर्माशेल में नौकरी लग गयी। टे्रन से रोज यातायात करके ही नौकरी करता था। उसे भी अपने इलाके में पार्टी की सदस्यता मिल गयी थी। अलग जिले में होने के बावजूद हमारा संबंध नियमित बना रहा। आपस में एक-दूसरे को पुस्तकें भेजते, अवसर मिलते ही विचार-विमर्श करते। इसी बीच सुधा ने विवाह कर लिया। दो लड़के, आफिस में प्रमोशन हो गया, आफिसर बन गया। नि:संतान मामा अब नहीं रहे, सुधा ने वहीं अपना नया घर बनाया है। सन् ‘64 के विवाद के समय भी हम लोग एकमत ही रहे। लेकिन ‘70 के दशक के हमलों के समय सुधा और ठीक नहीं रह सका, मारपीट खाकर खून-खराबे के उस माहौल में आत्मसमर्पण करके चुपचाप बैठ गया, उसने पार्टी सदस्यता का नवीकरण नहीं कराया। 1977 के चुनाव के बाद सुधा का पत्र मिला-बड़े लड़के की शादी है, जरूर से आना है। बड़े लड़के को हाल ही में बैंक में नौकरी मिली है। बहू गांव की ही है बिना मॉ-बाप की, चाचा के पास रहकर बड़ी हुई है, बी.ए. की परीक्षा दी है। पार्टी छोड़ने के बावजूद आदर्श बचे हुए हैं। इसीलिए विवाह में कोई दहेज या लेन-देन नहीं हुआ, आमंत्रितों को निर्देश के लहजे में ही कहा गया कि वो कोई उपहार न लाएं। सुधा का छोटा लड़का तब इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पढ़ रहा था। छोटा सा सुखी परिवार। मैंने जब फिर से पार्टी का कुछ काम शुरू करने के लिए कहा तो कहने लगा-अब और मत बोलो, मैं हार गया हूं, दुर्दिनों में बचकर निकल गया, आज अब फिर पार्टी करना अवसरवाद ही कहलायेगा। मैं ऐसा नहीं कर सकता। पार्टी के साथ हूं, रहूंगा भी, सदस्य रहते हुए जितनी लेवी देनी पड़ती उतनी लेवी जिला कमेटी के एक सदस्य के पास जमा करवा देता हूं। काम नहीं करने पर भी पढ़ना-लिखना जारी है। सुधा की बातें अच्छी ही लगीं।
सुधा की पत्नी सरला मुझे भाई कहकर ही बुलाती है, मेरा हाथ पकड़कर बोली, भैया, समय मिलने पर बीच-बीच में घर आया करो। उसके बाद से हर वर्ष एकबार वहां चला ही जाता हूं। छोटे लड़के की भी शादी हो गयी है, टाटा में नौकरी मिल गयी है, बहू भी वहीं रहती है। एक बच्चा भी हो गया है। बड़ी बहू सुधा के पास रहती है। बहुत सुंदर लड़की है। प्रतिभावान है, बड़ी फुर्ति से चलती-फिरती है, हर समय चेहरे पर हंसी-खुशी का भाव, किंतु कौन जाने होंठों के ऊपर काली छाया में कहीं कोई विषाद छिपा हुआ है या नहीं। 7-8 वर्ष हो गये लेकिन अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ। कारण कुछ भी क्यों न रहे हो,बच्चे न होने का दोष लड़कियों पर थोपना तथा इसके लिए लड़कियों में हीनता का बोध यही प्रचलित रीति है। प्रतिमा बड़ी बुद्धिमानी से इस हीनता बोध को दूर रख सकती थी। रिश्तेदार या मित्र मंडली में कोई यदि संतानहीनता के चलते सहानुभूति दिखलाने की कोशिश करता तो साहस के साथ कह उठती-ओ मॉ! मेरे बच्चे नहीं है किसने कहा? मेरे एक लड़का और एक लड़की है। सास-ससुर के पास रहने पर उन्हें पकड़कर कहती,कहो ना क्या तुम मेरे लड़के या लड़की नहीं हो। सुधा-सरला प्यार से इसकी हामी भरते। प्रतिमा सुधा या सरला को कभी भी आप कहकर नहीं पुकारती, हमेशा तुम ही कहकर बुलाती और वे प्रतिमा को ‘बड़ो मॉ‘ कहकर बुलाते। प्रतिमा को वे अपनी बहू नहीं बेटी ही समझते। घर में कब कौनसी चीज चाहिए सब प्रतिमा ही देखती।
लेकिन अचानक घर में एक दुर्घटना हो गयी। सुधा ने तब तक नौकरी से अवकाश नहीं लिया था। हटात पांच दिन के बुखार ने बड़े लड़के की जान ले ली। प्रतिमा विधवा हो गयी। बहुत खतरनाक ढ़ग का एनसेफेलाइटिस हुआ था। शोक का वातावरण कुछ कम होने के एक महीने पश्चात सुधा का बुलावा आया। झमेले में फंसा है। प्रतिमा ने बी.ए. पास की थी। उम्र तब 30 के पास होगी। पति की मृत्यु के कारण बैंक में नौकरी मिलने का मौका है। प्रतिमा नौकरी करना चाहती है। सुधा और सरला नहीं चाहते थे। सुधा का कहना था, क्या जरूरत है मैं तो अभी नौकरी कर रहा हूं,सेवा निवृत होने पर भी पेंशन मिलगी ही। संसार चल ही जायेगा। मैंने सुधा से कहा कि तुम लोग क्या अमर रहोगे? तुम नहीं रहोगे तो पेंशन किसे मिलेगी? इसक अलावा प्रतिमा को भी तो जीवन का एक सहारा चाहिए। सुधा मन से वैसे भी काफी कमजोर हो गया था,मेरी बात पर उसने और आपत्ति नहीं की। प्रतिमा को नौकरी मिल गयी। बीच-बीच में खबर लेता रहता। सुधा रिटायर हो गया। प्राय: तीन वर्ष गुजर गये।
प्रतिमा ने एक दिन फोन करके कहा,काकू मुझे बहुत जरूरत है,एक बार मिलना चाहती हूं। वह आई, साथ में एक लड़का,उम्र 40 से कुछ कम ही होगी। दुविधा और संकोच छोड़कर उसने जो कहा उसका सार इसतरह है-यह लड़का मेरे साथ एक ही बैंक में काम करता है। ट्रेन में यातायात और नौकरी के चलते घनिष्ठता हुई। लड़का भी विधुर है और कोई संतान नहीं है। प्राय: दस वर्ष पहले संतान के जन्म के समय पत्नी की मृत्यु हो गयी थी और उसने इसके बाद शादी नहीं की। अब दोनों शादी करना चाहते हैं। प्रतिम ने सुधा और सरला से अनुमति मांगी थी, लेकिन सुधा ने नाराज होकर उसे घर से निकाल दिया था। तीन दिनों से अपने एक मित्र के यहां रह रही थी। मैंने कहा,तुम लोग शादी कर लो इसमें परेशानी क्या है? उसने कहा वह तो कर सकती हूं, रजिस्ट्रार के पास आवेदन भी करके रखा है, लेकिन मां-बाप को दुखी करके कैसे करूं? वो तो मेरे मॉ-बाप ही हैं। तुम पिताजी सभी तो समानाधिकार की बातें करते हो। पिता तो तुम्हारी बात सुनते हैं,  मुझसे लिपट कर बोली, काकू तुम पिता को समझाओ ना। मैंने स्वीकार किया।
एकबार फिर सुधा के घर गया। सुधा एकदम ढला हुआ, टूटा हुआ। कहा, प्रतिमा के लिए आया हूं। कहा था ना कि सक्रि्रय नहीं रहने पर भी कभी भी आदर्श से मुंह नहीं मोड़ूंगा। चालीस वर्ष पहले शांतिपुर की उस बहस की याद है? आज भी उस ईनाम को सहेज कर रखा है। उसे फेंक दो। आदर्शबोध क्या कोई दामी जूते हैं, जिन्हें सिर्फ बाहर पहना जाता है, घर में नहीं? खुद की पूत्रवधु दूसरे की वधु होगी-यह स्वीकारा नहीं जा रहा, लेकिन प्रतिमा यदि तुम्हारी बेटी होती तो क्या आपत्ति करते? उसे बेटी नहीं मान पा रहे हो?
सुधा मेरा हाथ पकड़कर रोते हुए बोला, चुप करो, तुम अब जाओ। पांच दिन बाद प्रतिमा फिर हाजिर हुई। शर्माते हुए मेरे हाथ में एक पत्र दिया और कहा कि पिताजी ने भेजा है। पढ़ा। सुधा ने लिखा था, स्नेहमयी बड़ी मां,  घर से निकालकर बडा दुखी़ हूं। उम्र हो गयी है, मन का जोर कम हो गया है। जन्मों के संस्कारों को तोड़ने में बड़ा कष्ट हुआ है, अब संभल गया हूं। तुम तो मेरी बेटी हो। बेटी का अवदान क्या कभी भूल सकता हूं? तुम्हारे लिए मेरी शुभकामनाएं हैं। खुद खड़े रहकर सामाजिक रूप में विवाह करवाना ज्यादती होगी। जिस दिन रजिस्ट्रार के पास जाओगी, उस दिन मैं और तुम्हारी मां दोनों ही जाएंगे, काकू को भी कहना। रजिस्ट्री होने के बाद बेटी और जंवाई दोनों को लेकर घर आऊंगा। पत्र मिलते ही घर आजाना। काकू को कहना मैं एकदम खत्म नहीं हुआ हूं। तुम्हारे लिए असंख्य शुभकामनाएं। तुम्हारा पिता।

इसके बाद काफी समय गुजर गया। प्रतिमा की शादी के पांचेक वर्ष बाद ही सरला की मृत्यु हो गयी। तीन वर्ष पहले सुधा भी चल बसा। उसके घर के बाहर काफी जगह थी, वहां बगीचा था। सुधा ने उसे प्रतिमा को दे दिया था। प्रतिमा वहीं रहती है। ‘‘आलो‘‘, मेरा ही दिया हुआ नाम है। प्रतिमा मेरी नियमित खोज-खबर लेती रहती है, बीच-बीच में आकर मिल लेती है। वर्ष के शुरू में और पूजा के समय उसके पास से कपड़े आते हैं। अनजाने में ही प्रतिमा लगता है मेरी भी बेटी हो गयी है। लम्बे जीवन में अनेक हार-जीत का सैनिक, प्रतिमा के मामले में हुई जीत को भूल नहीं सकता। बहुत संतोष होता है।

(अनुवाद : सरला माहेश्वरी)                                                                                                                                                                                                    
                                             


   
                                                                                                                                                                                                 
                                             


   

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

शिक्षक दिवस


हम उन सौभाग्यशालियों में नहीं हैं, जिन्हें स्कूल-कालेज का कोई शिक्षक याद हो। फिर भी, गुरू तरु की जिस छाया का अहसास आज भी कायम है, वह डा. महादेव साहा की है, जिनके साथ ही पहली बार नेशनल लाइब्रेरी की सीढि़यां चढ़ा था और उसी परिसर में प्रो.सुनिति चाटुर्ज्या की कुटिया के रोमांच को महसूस किया था। डाक्टर साहब सुनिति बाबू के ऐसे सम्मानित मित्र थे, जिन्हें सुनिति बाबू ने अपनी एक पुस्तक भी समर्पित की थी। जानकार हलकों में सूचनाओं का अकूत खजाना, एक जीवित इनसाइक्लोपीडिया, तथ्यों को लेकर हर शंका का तत्काल समाधान। हमने उन्हें जीवन भर पोस्टकार्ड लिखते और उनके जरिये सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हुए ही देखा।

आज उनकी याद खास तौर पर इसलिये आई क्योंकि प्रधानमंत्री ने विद्यार्थियों को अपने संबोधन का समापन ‘गूगल गुरू’ को याद करके किया और कहा कि वहां सिर्फ सूचना ही सूचना है, ज्ञान नहीं है।
दरअसल, सूचना और ज्ञान के टंटे की यह कहानी बहुत पुरानी है। इससे अब सिवाय घिसे-पिटेपन के और कुछ भी प्रेषित नहीं होता। टी एस इलीयट की तो प्रसिद्ध पंक्तियां है : “Where is the wisdom we have lost in knowledge?/Where is the knowledge we have lost in information?”

सभ्यताओं के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा कि जिन समाजों ने अपने इतिहास, अपने ज्ञान-विज्ञान की सूचनाओं को कायदे से सहेजने से परहेज किया, वे समाज क्रमश: ज्ञान और बुद्धि के सारे मानदंडों पर खोखले होते चले गये। हम भी सूचना-विहीन ज्ञान और ज्ञान-विहीन बुद्धि के खोखलेपन के शिकार हैं। आजादी के बाद इस कमी को दूर करने के लिये ही भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आई एस आई) की तरह के सिर्फ सूचनाएं बंटोरने वाले राष्ट्रीय संस्थान का गठन किया गया। फिर भी, यह दंभ कैसा कि सूचना में क्या रखा है, ज्ञान भी किस काम का - आत्म-ज्ञान और आत्म-मनन ही यथेष्ट है! वैसे, इधर कुछ उल्टी दिशा में गंगा वाराणसी की तरफ जो बह रही है! सांख्यिकी की जरूरत होती है योजना और योजनाबद्ध विकास के लिये। लेकिन जब योजना आयोग ही न होगा तो फिर किसी सांख्यिकी या दूसरे प्रकार के तथ्यमूलक अध्ययन की क्या जरूरत है? ‘जो करे हरि का भजन, वही परम पद पायेगा’।

इसीलिये हम तो ऐसे किसी मंतव्य का समर्थन नहीं कर सकते, जो ‘गूगल गुरू’ जैसे सूचनाओं के अन्तहीन खजाने का उपहास करता हो। हमारे प्रधानमंत्री को तो आज के युग के वैश्वीकरण का प्रबल समर्थक माना जाता है। सारी दुनिया से ‘पूंजी’ को आमंत्रित करने की उनकी आतुर गुहारों का कोई अंत नहीं है। पूंजी का स्वागत करते हुए वे जब दुनिया की सूचनाओं और ज्ञान के स्रोतों का उपहास करते हैं, तो यह कोरा शब्दाडंबर नहीं तो और क्या है ? दीगर कारणों से यदि ‘गूगल गुरू’ से कोई शिकायत हो तो इसका स्वदेशी विकल्प बनाओ, लेकिन इसकी उपादेयता से इंकार मत करो।

इसीलिये, हम तो हमारे डाक्टर महादेव साहा, चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया को शिक्षक दिवस के इस मौके पर गहरी श्रद्धा से याद करते हैं।

शनिवार, 30 अगस्त 2014

हिटलर के नक्शे-कदम पर संघ परिवार का ‘लव जेहाद’

- अरुण माहेश्वरी


अगर आपने हिटलर की आत्मकथा ‘माईन काम्फ़  ’ को पढ़ा हो तो इस बात को पकड़ने में शायद आपको एक क्षण भी नहीं लगेगा सांप्रदायिक नफरत फैलाने के उद्देश्य से भारत में अभी चल रहे ‘लव जेहाद’ नामक अनोखे अभियान का मूल स्रोत क्या है। हिटलर यहूदियों के बारे में यही कहा करता था कि ‘‘ये गंदे और कुटिल लोग मासूम ईसाई लड़कियों को बहला-फुसला कर, उनको अपने प्रेम के जाल में फंसा कर उनका खून गंदा किया करते हैं।’’

यहां हम हिटलर के शासन (थर्ड राइख) के दुनिया के सबसे प्रामाणिक इतिहासकार विलियम एल. शिरर की पुस्तक ‘The Rise and Fall of Third Reich’ के एक छोटे से अंश को रख रहे हैं, जिसमें शिरर ने हिटलर की ऐसी ही घृणित बातों को उद्धृत करते हुए उनको विश्लेषित किया है। शायद, इसके बाद भारत में संघ परिवार के लोगों के ‘लव जेहाद’ अभियान की सचाई के बारे में कहने के लिये और कुछ नहीं रह जायेगा। शिरर अपनी इस पुस्तक के पहले अध्याय ‘Birth of the Third Reich’ के अंतिम हिस्से में लिखते हैं :

‘‘ हिटलर एक दिन वियेना शहर के भीतरी हिस्से में घूमने के अपने अनुभव को याद करते हुए कहता है, ‘‘अचानक मेरा सामना बगलबंद वाला काला चोगा पहने एक भूत से होगया। मैंने सोचा, क्या यह यहूदी है? लिंत्स शहर में तो ऐसे नहीं दिखाई देते। मैंने चुपके-चुपके उस आदमी को ध्यान से देखा, उसके विदेशी चेहरे, उसके एक-एक नाक-नक्शे को जितना ध्यान से देखता गया, मेरे अंदर पहले सवाल ने नया रूप ले लिया। क्या वह जर्मन है?’’(अडोल्फ हिटलर, ‘माईन काम्फ़ ’, अमरीकी संस्करण, बोस्तोन, 1943, पृष्ठ : 56)

‘‘हिटलर के जवाब का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। फिर भी वह कहता है, जवाब के पहले उसने ‘‘किताबों के जरिये अपने संदेह को दूर करने का फैसला किया।’’ उन दिनों वियेना में जो यहूदी-विरोधी साहित्य काफी बिक रहा था, वह उसमें खो गया। फिर सड़कों पर सारी स्थितियों को करीब से देखने लगा। वह कहता है, ‘‘मैं जहां भी जाता, हर जगह मुझे यहूदी नजर आने लगे और मैं उन्हें जितना अधिक देखता, वे मुझे बाकी लोगों से अलग दिखाई देने लगे। ...बाद में चोगा पहने लोगों की गंध से मैं बीमार सा होने लगा।’’(वही, पृ : 56-57)

‘‘इसके बाद, वह कहता है, ‘‘उसने उन ‘चुनिंदा लोगों’ के शरीर पर नैतिक धब्बों को देख लिया। ...खास तौर पर पाया कि सांस्कृतिक जीवन में ऐसी कोई गंदगी या लंपटगिरी नहीं है, जिसके साथ कोई न कोई यहूदी न जुड़ा हुआ हो। इस मवाद को यदि आप सावधानी से छेड़े तो रोशनी गिरते ही किसी सड़े हुए अंग के कीड़ों की तरह चौंधिया कर ये किलबिलाते दिख जायेंगे।’’ वह कहता है, उसने पाया कि वैश्यावृत्ति और गोरे गुलामों के व्यापार के लिये मुख्यत: यहूदी जिम्मेदार हैं। इसे ही आगे बढ़ाते हुए कहता है, ‘‘पहली बार जब मैंने बड़े शहर की गंदगी में इस भयानक धंधे को चलाने वाला घुटा हुआ, बेशर्म और शातिर यहूदी को देखा तो मेरी पीठ में एक सनसनी दौड़ गयी।’’(वही, पृ : 59)

‘‘यहूदियों के बारे में हिटलर की इन उत्तेजक बातों का काफी संबंध उसकी एक प्रकार की विकृत कामुकता से है। उस समय वियेना के यहूदी-विरोधी प्रकाशनों का यह खास चरित्र था। जैसाकि बाद में फ्रंखोनिया के हिटलर के एक खास चमचे, न्यूरेमबर्ग के अश्लील साप्ताहिक ‘Der Stuermer’ के मालिक में देखा गया, वह एक घोषित विकृत मानसिकता का व्यक्ति था और हिटलर के शासन (थर्ड राइख) का सबसे घृणास्पद व्यक्ति था। मीन कैम्फ में यहूदियों की ऐसी-तैसी करने के लिये जघन्य संकेतों वाली बातें भरी हुई हैं कि यहूदी मासूम ईसाई लड़कियों को फांसते हैं और इसप्रकार उनके खून को गंदा करते हैं। हिटलर ही ‘‘घिनौने, कुटिल, चालबाज हरामी यहूदियों द्वारा सैकड़ों हजारों लड़कियों को फुसलाने की डरावनी कहानियां’’ लिख सकता है। रूडोल्फ ओल्डेन कहता है कि हिटलर के इस यहूदी-विरोध की जड़ में उसकी दमित कामुक वासनाएं हो सकती है। यद्यपि तब वह बीस-पच्चीस साल का था। जहां तक जानकारी है, वियेना की उसकी यात्रा में उसका औरतों से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं हुआ था।

‘‘हिटलर आगे कहता है, ‘‘धीरे-धीरे मैं उनसे नफरत करने लगा। यही वह समय था जब मेरे जीवन में सबसे बड़ा आत्मिक भूचाल आया था। मैं अब कमजोर घुटनों वाला शहरी नहीं रह गया। यहूदी-विरोधी होगया।’’ (वही, पृ : 63-64)

‘‘अपने बुरे अंत के समय तक वह एक अंधा उन्मादी ही बना रहा। मौत के कुछ घंटे पहले लिखी गयी अपनी अन्तिम वसीयत में भी उसने युद्ध के लिये यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि इस युद्ध को उसीने शुरू किया था जो अब उसे और थर्ड राइख को खत्म कर रहा था। यह धधकती हुई नफरत, जिसने उस साम्राज्य के इतने सारे जर्मनों को ग्रस लिया था, अंतत: इतने भयंकर और इतने बड़े पैमाने के कत्ले-आम का कारण बनी कि उसने सभ्यता के शरीर पर ऐसा बदनुमा दाग छोड़ दिया है जो उस समय तक कायम रहेगा जब तक इस धरती पर इंसान रहेगा।’’ (William L. Shirer, The Rise and Fall of the Third Reich, Fawcett Crest, New York, छठा संस्करण, जून 1989, पृष्ठ : 47-48)

यहां उल्लेखनीय है कि भारत में संघ परिवारियों के बीच हिटलर की आत्मकथा ‘माईन काम्फ़ ’ एक लोकप्रिय किताब है, जबकि साधारण तौर पर इस किताब को दुनिया में बहुत ही उबाऊ और अपठनीय किताब माना जाता है। लेकिन, जर्मन इतिहासकार वर्नर मेसर के शब्दों में, ‘‘लोगों ने हिटलर की उस अपठनीय पुस्तक को गंभीरता से नहीं पढ़ा। यदि ऐसा किया गया होता तो दुनिया अनेक बर्बादियों से बच सकती थी।’’ (देखें, हिटलर्स माईन काम्फ़  : ऐन एनालिसिस)

पूरी तरह से हिटलर के ही नक्शे-कदम पर चलते हुए भारत में सांप्रदायिक नफरत के आधार पर एक फासिस्ट और विस्तारवादी शासन की स्थापना के उद्देश्य से आरएसएस का जन्म हुआ था। इसके पहले सरसंघचालक, गुरू गोलवलकर के शब्दों में, "अपनी जाति ओर संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए जर्मनी ने देश से सामी जातियों - यहूदियों का सफाया करके विश्व को चौंका दिया है। जाति पर गर्वबोध यहां अपने सर्वोंच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फर्क हो, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता है। हिंदुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिए यह एक अच्छा सबक है।’’(एम.एस.गोलवलकर, वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड, पृष्ठ : 35)

‘लव जेहाद’ के मौजूदा प्रसंग से फिर एक बार यही पता चलता है कि संघ परिवार के लोग आज भी कितनी गंभीरता से हिटलर की दानवीय करतूतों से अपना ‘सबक’ लेकर ‘मूलगामी फर्क वाली जातियों और संस्कृतियों के सफाये’ के घिनौने रास्ते पर चलना चाहते हैं।