( सीमित बुद्धि की राजनीति और बारिश में डूब गये मानसून सत्र का सबक)
—अरुण माहेश्वरी
ऐलेन बाद्यू की यह एक बेहद महत्वपूर्ण स्थापना है कि सत्य के बारे में सीमित (finite) और असीम (infinite) चिंतन के परिणाम बिल्कुल भिन्न होते हैं। यह बात राजनीतिक चिंतन पर भी समान रूप से लागू होती है।
सीमित चिंतन दुनिया को उन्हीं रूपों में देखता है जिन्हें तुरंत गिना, मापा और जोड़-घटाकर समझा जा सकता है। राजनीति में यह दृष्टि सांसदों की संख्या, दलों के समीकरण, वोटों के जोड़-घटाव और गठबंधनों की तात्कालिक स्थिति तक सीमित रहती है। इसके चलते वास्तविकता एक बंद गणितीय संरचना में बदल जाती है, जहाँ हर चीज को पहले से ज्ञात नियमों के भीतर फिट कर दिया जाता है। ऐसी सोच सत्ता पर अल्पकालिक नियंत्रण तो कायम कर सकती है, लेकिन राजनीति की गहराई और उसकी अप्रत्याशित गतिशीलता को पकड़ने में हमेशा चूकती है।
इसके विपरीत असीम चिंतन राजनीति को एक खुली और अपूर्ण प्रक्रिया के रूप में देखता है। वह जानता है कि हर परिस्थिति अपने भीतर ऐसी संभावनाएँ रखती है जो उसकी वर्तमान गणना में शामिल नहीं हैं। राजनीति केवल वर्तमान आँकड़ों का योग नहीं है। जनता, इतिहास, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, सामाजिक स्मृतियाँ और राजनीतिक घटनाएँ किसी भी क्षण ऐसा नया समीकरण पैदा कर सकते हैं जिसे पुराने हिसाब से समझा नहीं जा सकता।
इसी फर्क को हम सामान्य भाषा में राजनीति की छोटी बुद्धि और बड़ी बुद्धि का फर्क कह सकते हैं।
छोटी बुद्धि का अर्थ बुद्धि का अभाव नहीं है। वह कई बार बेहद चतुर, चालाक और हिसाबी होती है। वह जानती है कि किस दल में फूट है, किस नेता की क्या कमजोरी है, किस सांसद को तोड़ा जा सकता है, किस सहयोगी पर दबाव डाला जा सकता है और किस तात्कालिक प्रलोभन से कितने वोट जुटाए जा सकते हैं।
लेकिन चतुराई और राजनीतिक बुद्धि एक ही चीज नहीं हैं।
राजनीति की बड़ी बुद्धि किसी परिस्थिति को उसके तात्कालिक समीकरण से आगे जाकर देखती है। वह जानती है कि राजनीतिक दल केवल नेताओं और सांसदों के झुंड नहीं होते। उनके पीछे इतिहास होता है, सामाजिक आधार होता है, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ होती हैं, राजनीतिक स्मृतियाँ होती हैं और भविष्य की अपनी जरूरतें होती हैं। राजनीति में संबंध का अर्थ कभी भी अधीनता नहीं होता।
सद्यः समाप्त मानसून सत्र ने मोदी-शाह की इसी सीमित और छोटी राजनीतिक बुद्धि की बुनियादी सीमा को लगभग प्रयोगशाला की स्पष्टता के साथ सामने रख दिया है।
सत्र के पहले इस जोड़ी ने ऐसा वातावरण बना रखा था मानो संसद के अंकगणित की सारी गुत्थियाँ सुलझ चुकी हैं। तृणमूल कांग्रेस में बड़ी टूट हो गई है; डीएमके और कांग्रेस के बीच तनाव है; शरद पवार की एनसीपी परिसीमन के किसी संशोधित फार्मूले पर बातचीत के लिए तैयार हो सकती है; तेलुगु देशम पहले से एनडीए में है। इन सबको जोड़कर वे सपना देखने लगे कि संविधान संशोधन के लिए आवश्यक लगभग 360 सांसदों की जादुई संख्या अब उनकी पहुँच में है।अर्थात राजनीति को महज एक एक्सेल शीट बना दिया गया ।
इतने अपने, इतने सहयोगियों के, इतने विपक्ष से तोड़ कर, इतनों को प्रलोभन देकर, इतने को डरा कर साथ लाया जा सकता है। अब सबको जोड़ कर 360 पूरे हो जायेंगे । इस जादुई संख्या के मिलते ही मानो संविधान-संशोधन की वैतरणी पार करके वे अपनी चिरस्थायी तानाशाही के बैकुंठ तक पहुँच जायेंगे ।
यहीं बाद्यू की finite और infinite की स्थापना का वास्तविक राजनीतिक अर्थ समझ में आता है। Infinite कोई बहुत बड़ी संख्या नहीं है। असीम सीमित का विशाल रूप भर नहीं होता। वह उस संभावना का संकेत है जिसे वर्तमान गणना अपने भीतर पूरी तरह समेट नहीं सकती है ।
इसलिए 360 भी finite है और 543 भी finite है। संसद की सारी सीटें भी अंततः एक गणनीय समुच्चय हैं।
लेकिन राजनीति संसद की सीटों के इस समुच्चय में समाप्त नहीं होती। उसके बाहर जनता है। इतिहास है। भाषाएँ हैं। क्षेत्रीय आकांक्षाएँ हैं। सामाजिक संरचनाएँ हैं। संघीय संबंध हैं। राजनीतिक स्मृतियाँ हैं। और इन सबकी अपनी स्वतंत्र गति है।
मोदी-शाह की सीमित बुद्धि की मूल समस्या यही है कि वह इन स्वतंत्र गतियों को नहीं देखती। वह हर नई परिस्थिति को अपने पुराने गणित से हल करने की कोशिश करती है।
विपक्ष मजबूत हुआ तो पार्टी तोड़ दीजिए; बहुमत कम हुआ तो सांसद जोड़ लीजिए; क्षेत्रीय दल असंतुष्ट है तो उसके नेता को साध लीजिए; कोई संस्था बाधक है तो उस पर नियंत्रण कायम कर लीजिए। हर समस्या का उत्तर प्रबंधन है।
इस मानसून सत्र से पहले इसी राजनीतिक प्रबंधन के चार बड़े शिकार साफ दिखाई दे रहे थे— डीएमके, तेलुगु देशम, शरद पवार की एनसीपी और तृणमूल के बागी सांसद।
डीएमके के प्रसंग में मोदी-शाह की छोटी बुद्धि का फार्मूला था कि कांग्रेस से दूरी का अर्थ होता है भाजपा से निकटता !
तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच तनाव दिखाई दिया और मोदी-शाह ने मान लिया कि स्तालिन को अब साधा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस और डीएमके के बीच मतभेद का अर्थ यह कैसे हो गया कि डीएमके भाजपा के केंद्रीकृत राज्य के हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के राजनीतिक प्रकल्प का हिस्सा बनने के लिए तैयार है?
यही है छोटी बुद्धि की विडंबना जो सिर्फ वर्तमान क्षण को देखती है, इतिहास को नहीं।
डीएमके के पीछे द्रविड़ आंदोलन का लंबा इतिहास है; तमिल अस्मिता है; भाषा का प्रश्न है; संघवाद की परंपरा है; उत्तर और दक्षिण के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न है। इन सबको किसी तात्कालिक कांग्रेस-डीएमके तनाव में बदल देना एक राजनीति के इतिहास को मिटा कर देखने के समान है।
छोटी बुद्धि ने कांग्रेस और डीएमके के बीच की दरार देखी। बड़ी बुद्धि तमिलनाडु देखती है ।
तेलुगु देशम के मामले में इन छोटी बुद्धि वालों का फ़ार्मूला है — सहयोग का अर्थ है हुकुमबरदारी !
चंद्रबाबू नायडू एनडीए में हैं, इसलिए मान लिया गया कि उनकी पार्टी के सांसद सरकार की हर बड़ी संवैधानिक-ग़ैर-संवैधानिक परियोजना के लिए सहज उपलब्ध हैं। क्या किसी गठबंधन में शामिल होना अपने राजनीतिक अस्तित्व को सहयोगी दल के हाथों गिरवी रख देना होता है ?
तेलुगु देशम की शक्ति दिल्ली से नहीं आती। वह आंध्र प्रदेश से आती है। उसे अपने राज्य की आकांक्षाओं, अपने मतदाताओं और अपने राजनीतिक भविष्य का हिसाब रखना है। परिसीमन जैसे प्रश्न पर वह सबसे पहले यह देखेगी कि आंध्र और दक्षिण भारत की राजनीतिक शक्ति पर उसका क्या असर पड़ेगा।
छोटी बुद्धि सोचती है कि वह हमारे गठबंधन में हैं, इसलिए उनके वोट हमारे हैं। बड़ी बुद्धि का सवाल होगा कि वे हमारे साथ क्यों हैं, किन प्रश्नों पर हैं और कब तक हैं?
शरद पवार के मामले में इन महानुभावों का सूत्र है- मुलाकात का अर्थ आत्मसमर्पण।
प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात हुई और उससे यह कहानी बना ली गई कि अब पवार को भी साध लिया गया है। यह उसी राजनीतिक शैली का घरेलू रूप है जिसमें राष्ट्राध्यक्षों को गले लगाकर राष्ट्रों को जीत लेने का भ्रम पाल लिया जाता है।
शरद पवार जैसे नेता की पूरी राजनीति को एक मुलाकात में सीमित नहीं किया जा सकता। महाराष्ट्र का अपना सामाजिक संसार है, किसानों का प्रश्न है, पार्टी का आधार है, गठबंधनों का इतिहास है और पवार की अपनी दीर्घ राजनीतिक यात्रा है।
राजनीति में बातचीत करना आत्मसमर्पण नहीं है।किसी प्रस्ताव पर विचार करना किसी के हाथ बिक जाना नहीं होता ।
छोटी बुद्धि हर बातचीत में ‘डील’ खोजती है। बड़ी बुद्धि राजनीतिक संबंधों की बहुस्तरीयता को समझती है।
और तृणमूल के बागी सांसदों के मामले में तो छोटी बुद्धि अपने सबसे शुद्ध रूप में सामने आई।
बीस सांसद टूट गए—अर्थात बीस वोट उधर से इधर आ गए।बस इतना ही?
उनके मन में एक बार भी यह सवाल नहीं आता कि क्या बीस सांसदों के साथ उनके बीस निर्वाचन क्षेत्र भी टूट कर भाजपा में आ गए हैं?क्या उनके मतदाता भी उनके साथ स्थानांतरित हो गए हैं? क्या पश्चिम बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति उन सांसदों के दल बदलने से बदल गई है?
सांसदों को गिनना तो आसान है। लेकिन सांसद पैदा करने वाली राजनीतिक परिस्थिति को समझना दूसरी बात है। यही छोटी और बड़ी बुद्धि का फर्क है।छोटी बुद्धि सांसद देखती है। बड़ी बुद्धि उसके पीछे के मतदाता को देखती है।छोटी बुद्धि नेता को देखती है। बड़ी बुद्धि उस समाज को देखती है जिसने उस नेता को पैदा किया है।
इसलिए डीएमके को समझना है तो स्तालिन से आगे तमिलनाडु को देखना होगा। तेलुगु देशम को समझना है तो नायडू से आगे आंध्र प्रदेश को देखना होगा। एनसीपी को समझना है तो शरद पवार से आगे महाराष्ट्र को देखना होगा। और तृणमूल के बीस बागी सांसदों को समझना है तो उन बीस व्यक्तियों से आगे बंगाल की राजनीति को देखना होगा।
मोदी-शाह की राजनीति की मूल समस्या यह नहीं है कि उन्हें जोड़-तोड़ करना नहीं आता। इसके उलट, जोड़-तोड़ की कला के तो वे महा-उस्ताद हैं । असल समस्या यह है कि उन्होंने जोड़-तोड़ को ही राजनीति समझ लिया है।
चुनाव जीतना जनता को जीत लेना हो गया। बहुमत प्राप्त करना देश पर स्वामित्व का अधिकार हो गया। तब सहयोगी दल स्वतंत्र राजनीतिक शक्तियाँ नहीं, आश्रित दिखाई देने लगते हैं । सांसद जनप्रतिनिधि नहीं, गिने जाने वाले जीव हो जाते हैं। राजनीति के एक विशाल एक्सेल शीट में बदल जाने के पीछे की यही कहानी है ।
लेकिन राजनीति की मूल विशेषता यह है कि वह कभी पूरी तरह गिनी नहीं जा सकती। संसद में 360 सांसद जुटाए जा सकते हैं, पर भारत को 360 सांसदों में समेटा नहीं जा सकता।
भारत असंख्य भाषाओं, क्षेत्रों, इतिहासों, जातीय-सामाजिक अनुभवों, राजनीतिक स्मृतियों और आकांक्षाओं की वह बहुलता है जिसे किसी एक केंद्रीय सत्ता की गणना में पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। यही समझ राजनीति की बड़ी बुद्धि का आरंभ-बिंदु है। वह जानती है कि समाज किसी शासक की बनाई हुई शतरंज की बिसात नहीं है। उसमें असंख्य स्वतंत्र प्रवृत्तियाँ सक्रिय रहती हैं और वे किसी भी क्षण स्थापित समीकरणों को बदल सकती हैं।
यही बात विदेश नीति पर भी लागू होती है। दुनिया को राष्ट्राध्यक्षों के व्यक्तिगत संबंधों, गले मिलने की तस्वीरों, तत्काल सौदों और प्रचारात्मक उपलब्धियों में घटा देना छोटी बुद्धि का अंतरराष्ट्रीय संस्करण है। राष्ट्र अपने नेताओं से बड़े होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे राजनीतिक दल अपने सांसदों से बड़े और समाज अपने शासकों से बड़ा होता है।
सद्यः समाप्त मानसून सत्र का सबसे बड़ा सबक इसलिए किसी एक विधेयक के पारित अथवा पारित न होने में नहीं है। उसका असली सबक उस राजनीतिक बुद्धि की सीमा में है जिसने मान लिया था कि कुछ नेताओं को साधकर, कुछ दलों की दरारों का लाभ उठाकर और कुछ सांसदों को इधर से उधर करके भारत की राजनीतिक संरचना को अपनी इच्छा के अनुसार बदला जा सकता है।
बारिश आई, मानसून सत्र शुरू हुआ और जैसे शुरू हुआ, वैसे ही बीत भी गया।इसके साथ ही 360 सांसदों के सपनों का वह महल भी बह गया जिसे बड़ी मेहनत से हवा में खड़ा किया गया था। इसलिये, क्योंकि वह महल राजनीति की छोटी बुद्धि से तैयार किया गया था ।
शानदार विश्लेषण. यही हुआ क्योंकि यही होना था.
जवाब देंहटाएंमहत्वपूर्ण एवं सटीक आलेख
जवाब देंहटाएंराजनीतिक समीकरणों को नई दृष्टि से देखने की सलाहियत पैदा करता विश्लेषण।
जवाब देंहटाएंतार्किक एवं रोचक विश्लेषण। समाज अपने शासकों से बड़ा होता है और उसे वैसा होना चाहिए।पर भारत के मामले में स्थितियां अक्सर उलट होती हैं क्योंकि हम अक्सर पूरी तौर से परखे बग़ैर व्यक्ति पूजा करने लगते हैं।
जवाब देंहटाएंतर्कसम्मत विवेचना और सम्यक जानकारी. पढ़कर ज्ञान-क्षितिज विकास पाता है. आभार
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