सोमवार, 27 जनवरी 2014

फिर एक बार ‘अन्तर्वर्ती वर्ग’ और आज के राजनीतिक संक्रमण पर कुछ सोच



कल एक पोस्ट में हमने प्रभात पटनायक के लेख ‘अन्तवर्ती वर्गों’ पर टिप्पणी की थी। ‘अन्तर्वर्ती वर्गों’ का शासन - दो शिविरों में बंटी दुनिया की खास परिस्थिति में नव-स्वाधीन देशों में विकास का एक गैर-पूंजीवादी रास्ता।

नेहरूवियन सोशलिज्म, पंचवर्षीय योजनाएं, कमांडिंग हाइट आफ पब्लिक सेक्टर, जमींदारी प्रथा की समाप्ति से लेकर इंदिरा गांधी के जमाने में बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिविपर्स की समाप्ति, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण से लेकर 1991 के पहले तक चला आरहा कथित लाइसेंस राज इसी ‘गैर-पूंजीवादी विकास’ के आख्यान की कथाएं हैं। ये कथाएं अन्य बातों के साथ ही भारत के पूंजीपति वर्ग की वास्तविक स्थिति की सचाई का बयान भी है। भारत की नीतियों के निर्धारण में इसकी अशक्तता, शासन के सैद्धांतिक प्रश्नों पर इसकी अक्षमता भी इस आख्यान से व्यक्त होती है जिसे प्रभात के लेख में भी औपनिवेशिक परिस्थितियों का एक अनिवार्य परिणाम बताया गया है।

बहरहाल, अभी हम पंडित नेहरू और उस पीढ़ी के नेताओं की बात छोड़ भी देते हैं, लेकिन केंद्र में इंदिरा गांधी से आज तक, सिर्फ चंद सालों के अटल बिहारी वाजपेयी के शासन को छोड़ दिया जाए, और राज्यों में ज्योति बसु, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, मायावती, जयललिता, नवीन पटनायक आदि-आदि का पूंजीपतियों के साथ जिसप्रकार का एक दूरी रख कर चलने का व्यवहार रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है, और वह भी इस सचाई की पुष्टि करता है कि भारतीय राजनीति को कठपुतली की तरह सीधे अपने इशारों पर नचाने की कूव्वत भारत के पूंजीपतियों में आज भी उतनी नहीं है।

क्या मनमोहन सिंह को एक अक्षम और निर्णयहीनता का शिकार प्रधानमंत्री बताने की टीवी चैनलों की चिल्लाहटों के पीछे भी आर्थिक शक्ति के समानुपात में राजनीतिक शक्ति हासिल न कर पाने की उनकी इसी वेदना का आर्तनाद नहीं है?

यह सच है कि वाजपेयी के शासन में प्रशासनिक सैद्धांतिक प्रश्नों पर प्रत्यक्ष पूंजीपतियों के हस्तक्षेप के कुछ दृश्य दिखाई दिये थे, जब देश के शिक्षामंत्रियों के एक सम्मेलन में भारत की भावी शिक्षा-व्यवस्था का एक ब्लूप्रिंट तक कोलकाता के एक छुटभैये पूंजीपति पी.डी.चितलांगिया से रखवाने की पेशकश की गयी थी। आज जिन टेलिकॉम क्षेत्र और कोयला खानों के आबंटन के क्षेत्र में इतने भारी नीतिगत-निर्णयों से जुड़े भ्रष्टाचार के अभियोग सामने आ रहे हैं, वे सारी नीतियां एनडीए सरकार के समय में ही अपनायी गयी थी।

जो भी हो, अभी देश में एक प्रकार के परिवर्तन की जो लहर सी दिखाई दे रही है, हमें उसपर थोड़ी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। हमारा मानना है कि वे दिन लद चुके हैं जब किसी व्यक्ति की इच्छा-अनिच्छा से, उसकी सद्भावना-दुर्भावना मात्र से अब ऐसी कोई लहर पैदा हो सकती है। न राहुल गांधी से, न नरेंद्र मोदी से और न ही अरविंद केजरीवाल से। यह समय व्यक्तित्वों का नहीं, व्यक्तित्वों के विलोपन का समय है।

अपनी सीमाओं के प्रति सचेत, कोरा दिखावा करने में असमर्थ, भोली सूरत का, हकलाहटों से भरा राहुल गांधी अपने पारिवारिक राजनीतिक प्रशिक्षण से बनी आदतों के अनुरूप शासन चलाने की एक परिपाटी का प्रतीक है, तो दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी तमाम चारित्रिक कमजोरियों के मामले में हर राजनीतिज्ञ को मात देने वाला, फिर भी आरएसएस की पाठशाला में इतिहास से लेकर तमाम विषयों का अधकचरा ज्ञान रखने वाला एक ऐसा व्यक्ति है जो मानता है कि उसके पास दुनिया के सभी विषयों पर अंतिम राय सुनाने की योग्यता है। एक ओर हकलाहट और दूसरी ओर अनर्गल लफ्फाजी। एक ओर अपनी सीमाओं के अहसास का दबाव और दूसरी ओर सर्वज्ञता के अहंकार की निरंकुशता।

और, इन दोनों के दायरे से बाहर, उदय हो रहा है - आम आदमी पार्टी (आप) का। इस ऐतिहासिक नियम का प्रमाण कि जब स्थापित व्यवस्था की जीर्ण संस्थाएं जरूरी बदलाव की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ होती है, तभी सामाजिक परिवर्तन की लहरें पैदा होती है। भ्रष्टाचार, राजनीतिज्ञों-नौकरशाही-पुलिस और न्यायतंत्र की बदनाम धुरी से निपटने में अशक्त साबित हो रहे वर्तमान व्यवस्थागत संस्थानों में भारी परिवर्तन की जरूरतों का प्रतिफलन।

नरेन्द्र मोदी भी एक परिवर्तन की मांग के साथ आए हैं। कांग्रेस के लंबे शासन में परिवर्तन की मांग के साथ। लेकिन आज की व्यवस्था से उनकी यदि कोई शिकायत है तो इसलिये नहीं कि आम आदमी का जीवन तमाम प्रताड़नाओं का शिकार है बल्कि इसलिये क्योंकि उनकी सारी सहानुभूति देश के बड़े-बड़े पूंजीवादी घरानों के साथ है। उसी प्रकार, जिसकी एक झलक एनडीए के वाजपेयी शासन में देखने को मिली थी और जिसकी तमाम परिणतियों को आज हमारा देश भोग रहा है।

आम आदमी पार्टी को दिल्ली के चुनाव में अभूतपूर्व सफलता मिली है। इस सफलता को इस आंदोलन के एक अंक का पटाक्षेप कहा जा सकता है। आगामी लोकसभा चुनाव इस आंदोलन का दूसरा काफी महत्वपूर्ण अंक होगा। पहले अंक के अंत और उसके बाद के नये अंक के प्रारंभ के बीच, फुर्सत के इस ‘गहमागहमी’ वाले समय में आज की सामजिक-राजनीतिक परिस्थिति का ठोस जायजा लेते हुए इस आंदोलन के नेतृत्व को सम्भाव्य की सीमाओं को अच्छी तरह समझना होगा, अपने दोस्तों और दुश्मनों के बारे में एक साफ समझ के आधार पर इस नये अंक के पात्रों की भूमिकाओं को तय करना होगा।

‘आप’ के पीछे बदलाव की ऐतिहासिक-सामाजिक जरूरतें काम कर रही हैं। इसे कोई कोरा लफ्फाज भुनाने न पायें, इस ओर खास तौर पर सचेत रहने की जरूरत है।
 

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