गुरुवार, 12 मार्च 2015

वित्त आयोग की आड़ में केंद्र का स्वेच्छाचार


अरुण माहेश्वरी



इस 9 मार्च को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। उनकी मुलाकात के राजनीतिक उद्देश्यों को लेकर ढेर सारे कयास लगाये जा रहे हैं, लेकिन इसका घोषित उद्देश्य प्रधानमंत्री को पश्चिम बंगाल की संकटजनक वित्तीय स्थिति से परिचित कराना तथा उसके समाधान के लिये केंद्र से अतिरिक्त सहायता प्राप्त करना था।

इस मुलाकात के बाद ममता बनर्जी ने एक संवाददाता सम्मेलन में सिर्फ इतना कहा कि प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल सरकार की आर्थिक पहलकदमियों की प्रशंसा की है। उन्होंने पश्चिम बंगाल को किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा देने के बारे में कोई आश्वासन दिया है या नहीं, इसके बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया। दूसरे सूत्रों के हवाले से अखबारों के जरिये पता चला कि प्रधानमंत्री ने उनसे यह भी कहा कि 14वें वित्त आयोग ने पश्चिम बंगाल को 13वें वित्त आयोग की सिफारिश की तुलना में लगभग 20500 करोड़ रुपये की जो अतिरिक्त राशि के अंतरण की सिफारिश की है, उसके अलावा वे और कुछ नहीं कर सकते हैं। उनकी दलील थी कि और कुछ भी करने से दूसरे राज्य भी इसी प्रकार की मांगों को उठाने लगेंगे। केंद्र और राज्यों के बीच बांटने लायक कर राजस्व के 42 प्रतिशत हिस्से को सीधे राज्यों के सुपुर्द कर देने के बाद केंद्र के हाथ बंध चुके हैं।

बहरहाल, यह एक असमंजस की स्थिति है। वित्त आयोग की सिफारिशों से ऊपरी तौर पर तो लगेगा कि केंद्र ने पहले की तुलना में अपने कर राजस्व का बड़ा हिस्सा राज्यों को सौंप दिया है। लेकिन, वास्तव में इससे राज्यों की वित्तीय स्थिति पर क्या असर पड़ने वाला है, इसका किसी को कोई साफ अनुमान नहीं है। 14वें वित्त आयोग ने देश के दूसरे वित्तीय संकट में पड़े हुए पूर्वी राज्य बिहार को भी 13वें आयोग की सिफारिश की तुलना में लगभग 11500 करोड़ रुपये अतिरिक्त देने की सिफारिश की है। लेकिन पिछड़े हुए क्षेत्र को मिलने वाले अनुदान के खत्म होने और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा न दिये जाने की स्थिति में बिहार पर इसका कुल मिला कर क्या असर पड़ेगा, यह विचार का विषय है।

14वें वित्त आयोग की इस रिपोर्ट पर आयोग के एक सदस्य प्रोफेसर अभिजीत सेन ने अपनी असहमति दर्ज करायी है। असहमति के अपने नोट में उन्होंने बताया है कि इस आयोग ने अतीत की रिपोर्टों की तुलना में पांच मामलों में एक भिन्न रास्ता अपनाया है। पहला यह कि केंद्र के कर राजस्व के आबंटन की राशि में काफी वृद्धि की गयी है। दूसरा, राज्यों के घाटे के लिये दिये जाने वाले अनुदान को कूतने में योजनाबद्ध राजस्व खर्च को शामिल किया गया है। तीसरा, राज्यों के बीच ‘विशेष दर्जा प्राप्त’ और ‘अन्य’ के फर्क को खत्म कर दिया है। चौथा, राज्यों को दिये जाने वाले अनुदानों के साथ अक्सर जिस प्रकार की अनेक शर्तें जुड़ी होती थी उस परिपाटी को खत्म किया गया है। और पांचवा, एक प्रकार के ‘सहकारी संघवाद’ को हासिल करने और वित्तीय नियमों की बेहतर ढंग से निगरानी के लिये कुछ सांस्थानिक व्यवस्थाओं की सिफारिशें की गयी है। इससे राज्यों को पहले की तुलना में बिना किसी शर्त के ज्यादा कोष उपलब्ध हो पायेगा।

अभिजीत सेन को इन बातों से कोई आपत्ति नहीं है। उनका सिर्फ यह कहना है कि इन प्रस्तावों से केंद्र द्वारा राज्यों को योजना की मद में मिलने वाले अनुदान पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। केंद्र को अपनी कई कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करनी पड़ेगी। पिछड़े हुए क्षेत्रों को मिलने वाले अनुदान में भी कटौती हो सकती है, जिसका सीधा असर बिहार पर भी पड़ेगा।

अभिजीत सेन ने कहा है कि चूंकि राज्यों की यह धारणा होती है कि वित्त आयोग की सिफारिशों से केंद्रीय योजना की मद में आने वाले पैसों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, इसीलिये  इस बात की आशंका है कि आने वाले समय में सभी राज्यों को अचानक ही परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि केंद्र कभी भी बजट में योजना की मद में घोषित परिव्यय में कटौती कर सकता है। आज ममता बनर्जी द्वारा केंद्र से और सहायता की दरख्वास्त करने और केंद्र द्वारा यह कहने में कि उसने पहले ही काफी ज्यादा दे दिया है जो एक प्रकार की अस्पष्ट सी स्थिति दिखाई देती है, उसके पीछे मूल कारण यही है कि केंद्र के कर राजस्व के राज्यों के बीच बंटवारे के मामले में अभी भी कई ऐसे बिंदु है, जिनके बारे में स्थिति बहुत भ्रामक है।

दरअसल, भारत में केंद्रीय कर राजस्व को राज्यों के बीच वितरण की अब तक दो प्रमुख एजेंशियां काम करती रही है - योजना आयोग और वित्त आयोग। योजना आयोग एक स्थायी निकाय रहा है जो राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को निर्धारित करने के साथ ही उन लक्ष्यों की पृष्ठभूमि में केंद्रीय सहायता प्राप्त योजनाओं का खाका तैयार करके उन पर अमल के लिये राज्यों को वित्त मुहैय्या कराता था। इसीलिये इसकी सिफारिशें गतिशील और कुछ पूर्वधारणाओं पर आधारित हुआ करती थी। केंद्रीय कर राजस्व का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा योजना आयोग के जरिये ही राज्यों के पास पहुंचता था। अब मोदी सरकार के आने के बाद इस आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन किया गया है। यह नीति आयोग केंद्र के कर राजस्व के आबंटन में कोई भूमिका अदा करेगा या नहीं ; यदि करेगा तो किस प्रकार करेगा, ये सारी बातें अभी स्पष्ट नहीं है। ऊपर से, 14वें वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार राज्यों को गैर-योजना मद में 42 प्रतिशत तक की राशि दिये जाने के कारण योजना की मद में अनुदानों के मामले में केंद्र सरकार दिक्कत में है। 2015-16 के केंद्रीय बजट में भी इसका असर दिखाई दिया है, जिसमें कई ग्रामीण विकास योजनाओं की मद में लागत को कम किया गया है।

बहरहाल, सन् 1983 में जब केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिये न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में सरकारिया आयोग का गठन किया गया था, उसकी पृष्ठभूमि यह थी कि (1) राज्य सरकारें सिर्फ प्रशासनिक एजेंशिया बन कर रह गयी है। विधायी, प्रशासनिक, और वित्तीय क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक केंद्रीकरण से राज्यों को हानि हुई है। (2) अधिकांश समवर्ती विषयों पर केंद्र का अधिकार कायम होगया है, राज्यों के लिये कुछ नहीं रह गया है। एक प्रकार की निरर्थक एकरूपता को बनाने की कोेशिश हो रही है। (3) राज्यों के संसाधनों में उस दर से वृद्धि नहीं हुई है जिस दर से उनकी जिम्मेदारियों में वृद्धि हुई है। साधनों और दायित्वों के बीच अंतराल बढ़ता जा रहा है। (4) योजनाबद्ध विकास से केंद्र के हाथ मजबूत हुए है। (5) नियंत्रण, लाइसेंस-परमिट की प्रणाली के कारण ऐसे केंद्रीकरण का आविर्भाव हुआ जिसमें मुट्ठी भर लोगों को अनावश्यक शक्ति प्राप्त हो जाती है। इनके अलावा, इस पृष्ठभूमि में केंद्र द्वारा राज्यपालों का बेजा इस्तेमाल करने की तरह के शुद्ध राजनीतिक सवालों का भी एक पहलू था।

सरकारिया आयोग की इस रिपोर्ट में केंद्र और राज्यों के बीच के वित्तीय संबंधों पर भी एक अध्याय है। उसमें साफ कहा गया था कि ‘‘वित्तीय संसाधन जुटाना, उनकी भागीदारी एवं उपयोग सरकार की बहुस्तरीय व्यवस्था में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और यदि इसे आपसी समझदारी तथा मेल-मिलाप की भावना से न सुलझाया गया तो इससे अंत:सरकारी संबंधों की कठिन समस्या पैदा होजाती है।’’ सरकारिया आयोग ने इस बात को नोट किया था कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच करों, उधार लेने तथा परिव्यय के संबंध में समवर्ती शक्तियां हैं। इसी में प्राय: गंभीर आर्थिक और प्रशासनिक समस्याएं उत्पन्न होती है जिन्हें मुश्किल बातचीत, समझौतों के माध्यम से निपटाना होता है, अन्यथा न्यायपालिका का सहारा लेना पड़ता है।

सन् 1983 में गठित इस आयोग की रिपोर्ट 1988 में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद के इन 27 सालों में दुनिया काफी बदल गयी है। 1991 के बाद के उदारतावादी दौर में, जब क्रमश: यह साफ होने लगा कि विकास के कामों में सरकार प्रत्यक्ष रूप में ज्यादा शामिल नहीं होगी और निजी क्षेत्र के जरिये ही निवेश को हासिल करना होगा, देश के सभी राज्यों के बीच निजी निवेश को लुभाने के लिये करों में नाना प्रकार की छूट देने की होड़ शुरू होगयी। राज्यों के बीच इस कर-युद्ध के चलते राज्यों की आय में क्रमश: अपेक्षाकृत गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ और राज्य सरकारें अपने खर्च चलाने के लिये ज्यादा से ज्यादा उधार पर आश्रित होने लगी। निवेश को लुभाने के लिये न जाने कितना रुपया बर्बाद होगया, लेकिन अंत में देखा यह गया कि जिन राज्यों में पहले से ही इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित था, उन्हीं में ज्यादा से ज्यादा निजी निवेश भी हुआ और उन्हीं राज्यों को बहु-स्तरीय सरकारी सहायता भी सबसे ज्यादा मिली।

सरकारिया आयोग की रिपोर्ट के शुरू में ही भारत में संध और राज्य की द्वि-स्तरीय सरकार की व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा गया था कि वास्तविकता में हमारे यहां संविधान का स्थायी स्वरूप नहीं है। वह बदलते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश से प्रभावित होता है और उसीमें लगातार एकता और विविधता के बीच संतुलन को बनाये रखने के लिये प्रयत्नशील रहता है। यह शासनप्रणाली इतनी गतिशील है कि इसमें तमाम नियंत्रणों और संतुलनों के बावजूद केंद्र और राज्यों के बीच अनेक समस्याएं और मतभेद उत्पन्न होते हैं। राष्ट्र की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाती है। इसीलिये ‘‘यह जरूरी होता है कि केंद्र-राज्य संबंधों की समय-समय पर समीक्षा की जाए ताकि सहयोगी प्रयास की भावना से प्रेरित समाज कल्याण के लक्ष्य को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके।’’

इन तमाम कारणों से केंद्र और राज्यों के बीच पैदा होने वाले वित्तीय असंतुलनों को दूर करने में वित्त आयोग से भी कहीं ज्यादा योजना आयोग की भूमिका हुआ करती थी। वह अनुदानों  की राशि को तय करने में राज्यों की आबादी, क्षेत्रफल, प्रतिव्यक्ति आय की शक्ति और वित्तीय अनुशासन, इन सब पहलुओं को ध्यान में रखता था जबकि वित्त आयोग सिर्फ क्षेत्रफल का संज्ञान लेता है। आज हमारे राजनीतिक क्षेत्र में इस विषय पर जो धुंधलका दिखाई देरहा है, उसके मूल में यही है कि योजना की मद मंे होने वाले खर्च में कटौती का राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, इसका अभी कोई भी सही-सही अनुमान नहीं लगा पा रहा है।

इतिहास का व्यंग्य देखिये कि एक समय में सरकारिया आयोग ने यह नोट किया था कि योजनाबद्ध विकास की अवधारणा ने राज्यों की तुलना में केंद्र के पक्ष में संतुलन को बिगाड़ा है। और आज चिंता इस बात की की जारही है कि योजना की मद में कमी से भारत के संतुलित और समान विकास का मार्ग बाधित होगा। लोगों ने योजना के साथ जुड़े लाइसेंस-परमिट राज की बुराई को देखा था। अब लोग निजी निवेश को आकर्षित करने के लिये कर-युद्ध के दुष्परिणामों को भोग रहे हैं; संतुलित राष्ट्रीय विकास के लिये केंद्रीय योजना मद में खर्च में कमी घातक दिखाई दे रही है। यह स्थिति तब और भी चिंताजनक होजाती है जब नीति आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष अरविंद पानगढि़या वित्त आयोग की सिफारिशों को मान लेने के लिये प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, लेकिन योजना की मद में खर्च में कटौती को लेकर जरा भी विचलित नहीं है। इसी से पता चलता है कि नीति आयोग का गठन योजना आयोग की हत्या करके किया गया है। जिन्हें भ्रम है कि नीति आयोग कमोबेस वही काम करेगा जो योजना आयोग किया करता था, वह बहुत जल्द ही दूर हो जायेगा। और यदि ऐसा होता है तो यह राज्यों तक केंद्रीय राजस्व के अंतरण की एक महत्वपूर्ण एजेंशी की हत्या होगी, जो राज्यों के आर्थिक स्वास्थ्य के लिये एक बुरी खबर है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वित्त आयोग की सिफारिशों के पीछे के रहस्य को बिल्कुल सही पकड़ा है। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इसका कड़ा विरोध किया है और साफ कहा है कि केंद्रीय कर राजस्व के अंतरण में 10 प्रतिशत की वृद्धि दिखावटी है और इससे बिहार को लाभ नहीं, हानि होगी। बिहार के विभाजन के बाद  पिछड़े हुए क्षेत्र और गाडगिल-मुखर्जी सूत्र के अनुसार उसे जो अतिरिक्त लाभ मिल रहे थे, उन्हें इसकी आड़ में खत्म कर दिया गया है। सचाई यह है कि 13वें वित्त आयोग की तुलना में केंद्रीय कर राजस्व में बिहार का हिस्सा 1.3 प्रतिशत कम होगया है। इस मामले में पश्चिम बंगाल और झारखंड के हिस्से में बहुत मामूली क्रमश: .078 और .337 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन योजना की मद में होने वाली कटौती के नुकसान को देखते हुए यह नहीं के बराबर ही है।

नरेन्द्र मोदी अपने चुनाव अभियान के दौरान पूर्वांचल के सभी प्रदेशों में दहाड़ते हुए यह वादा कर रहे थे कि वे विकास के मामले में भारत के पूरबी और पश्चिमी हिस्से के बीच के फर्क को खत्म कर देंगे। लेकिन उनकी सरकार के कदमों में तो उनके इस वादे की कोई छाप नहीं दिखाई देती है। पूर्वांचल की वंचना के इतिहास को उलटने का कोई संकेत नहीं है। इस मामले में मोदी सरकार का रुख वैसा ही है जिसके बारे में सरकारिया आयोग की रिपोर्ट में यह कटुक्ति की गयी थी कि ‘‘‘‘राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग सत्ता में होते हैं उन्हें राज्य स्तर की शक्तियों पर अपना नियंत्रण बनाये रखने के लिए ऐसी विरोधी नीतियों और उक्तियों को विवश होकर अपनाना पड़ता है जो सदैव राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों के प्रतिकूल होती है।’’ जाहिरा तौर पर अगर केंद्र का यही रुख जारी रहा तो आने वाले समय में फिर एक बार राष्ट्र की एकता और अखंडता के हित में नये सिरे से केंद्र-राज्य संबंधों की गहराई से समीक्षा की जरूरत पड़ेगी।  








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