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गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

रघुराम राजन : एक बैंकर


(अर्थात, 'ठगी और पैगंबरी के मिश्रण से निर्मित एक निष्ठुर चरित्र')
—अरुण माहेश्वरी


रघुराम जी. राजन भारत में अभी मोदी-विरोधी बुद्धिजीवियों के खास हलके में काफी लोकप्रिय नाम है । इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनके रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से हटने के बाद ही मोदी ने नोटबंदी की तरह का तुगलकी कदम उठाया था और यह आम तौर पर माना जाता है कि यदि राजन गवर्नर होते तो वे उन्हें कभी ऐसा नहीं करने देते ; उर्जित पटेल की तरह वे एक वकील वित्त मंत्री के इशारों पर नहीं नाचते । यद्यपि खुद राजन ने एक जगह कहा है कि मोदी ने उनसे नोटबंदी के बारे में चर्चा की थी, लेकिन राजन का उस पर क्या मत था, इसे उन्होंने कहीं भी साफ शब्दों में नहीं बताया और न ही आज तक नोटबंदी के मोदी के कदम की कोई स्पष्ट शब्दों में निंदा ही की है । इसीलिये, वे मोदी को नोटबंदी की तरह के अर्थ-व्यवस्था के लिये सबसे घातक साबित हुए कदम से रोकते या नहीं, इसके बारे में लोगों की अवधारणा कुछ भी क्यों न हो, उसे पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता है । इसके अलावा, जब उन्हें गवर्नर के पद से हटाया गया उस समय मोदी के साथ उनके विवाद की तो कोई खबर नहीं थी । अखबारों में अनर्गल बकने के लिये मशहूर उकसावेबाज सुब्रह्मण्यम स्वामी उन पर जरूर हमले कर रहे थे । सुब्रह्मण्यम स्वामी बैंकों की ब्याज की दरों को कम करने की बात कहते थे और उनका अभियोग था कि अमेरिकी एजेंट राजन इसमें बाधा बन कर भारत के उद्यमियों की ताकत के खुल कर खेलने के रास्ते में रोड़ा बना हुआ है । तब बाज हलकों से यह भी माना जा रहा था कि स्वामी इस मामले में आरएसएस के विचारों को ही रख रहे थे । ऐसे समय में, संभवत: ब्याज की दरों में कमी के मसले पर ही राजन के रुख का अनुमान करके मोदी ने उन्हें उनके कार्यकाल के कुछ पहले ही विदा कर दिया, लेकिन तब से लेकर आज तक, उधारी पर ब्याज की दरों का मसला ज्यों का त्यों ही पड़ा हुआ है । आम लोगों की जमा राशि पर ब्याज की दरों को तो लगातार कम किया जा रहा है, लेकिन बैंकों द्वारा दी जाने वाली उधारी पर ब्याज की दरों के मामले में बैंक कुछ करने को तैयार नहीं है और न ही सरकार की ओर से उन्हें कोई साफ निर्देश है, क्योंकि पहले से ही अधिकांश बैंक अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं ।

चूंकि रघुराम राजन के काल तक जीडीपी में वृद्धि की दरों में कोई कमी नहीं आई थी, क्योंकि तब तक अर्थ-व्यवस्था पर नोटबंदी की तरह की कोई बाहरी चोट नहीं की गई थी, इसीलिये शायद यह भी मान लिया जाता है कि राजन ने अपने गवर्नर के काल में भारत के वित्तीय प्रबंधन के काम का संचालन सुचारु ढंग से किया था । लेकिन यदि आपको रघुराम राजन को अपने विचार का विषय बनाना है, व्यक्ति नहीं, बैंकर रघुराम राजन को, क्योंकि वही उनकी प्राणी सत्ता का प्रमुख रूप है, तो एक क्षण के लिये भी नहीं भूलना चाहिए कि वह शुद्ध रूप से एक बैंकर है, न कि कोई जन-कल्याणकारी विश्वदृष्टि संपन्न बुद्धिजीवी या जनता के प्रति जवाबदेह कोई जन-प्रतिनिधि । और सब जानते हैं कि एक महाजन की बुद्धि और एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी की बुद्धि में, या जनता के हितों के प्रति संवेदनशील राजनीतिज्ञ में कभी कोई मेल संभव नहीं है । इसीलिये इसमें कोई आश्चर्य नहीं था कि बैंकों के एनपीए (डूबत) की समस्या रघुराम राजन के काल में ही जब बड़े रूप में सामने आ गई थी तब उन्होंने ही बैंकों के तलपट में से डूबत की उन राशियों को बट्टे खाते में डाल कर, पूंजीपतियों को बाकायदा छूट देकर तलपट का शोधन करने का काम शुरू कर दिया था । डूबत की उगाही की बात वे करते थे लेकिन मुख्य रूप से उनका जोर इस बात पर था बैंकों को उनके खस्ता हाल से निकालने के लिये सरकार को अपने कोष से, भले आम लोगों से और ज्यादा कर वसूल कर, बैंकों की मदद के लिये सामने आना चाहिए । एनपीए की समस्या के समाधान के लिये ही राजन दिवालियापन (Insolvency and Bankruptcy) संहिता के पक्के समर्थक थे जिसके आधार पर मोदी सरकार अभी वह एफआरडीआई (The Financial Resolution and Deposit Insurance Bill) विधेयक लाने जा रही है जिसने बैंकों के सभी खाताधारकों की रातों की नींद को उड़ा रखा है ।

राजन के मूलभूत नजरिये के बारे में यह सब हमारे मन की कल्पना भर नहीं है । हमारे सामने राजन की तीन किताबें हैं — 'Saving Capitalism from Capitalists (Unleashing the power of Financial Market to create wealth and spread opportunity), ‘Fault Lines’, तथा ‘I do  what I do’ । जैसा कि हमने पहले ही कहा है कि राजन मूलत: बैंकर है, जिसे देशी भाषा में महाजन का मुंशी भी कहा जा सकता है, यह बात इन तीनों किताबों के एक-एक शब्द से जाहिर होती है । गांव के उस ओछे महाजन का नजरिया जो अकाल में लोगों के भूख से मरने को ही उनकी नियति मानता है क्योंकि उनके पास अनाज खरीदने के पैसे नहीं होते हैं । अनाज के अपने जखीरे में से एक दाना भी मुफ्त देना नैतिक लिहाज से गलत समझता है !


मार्क्स ने 'पूंजी' के पहले खंड में पूंजी के उत्पादन के तीन क्षणों का विस्तृत विवेचन किया था । पहला पूंजीपति के द्वारा मुद्रा से बाजार से माल (कच्चा माल + श्रमशक्ति) को खरीदना, दूसरा उसे उत्पादन की प्रक्रिया में डालना और तीसरा उत्पादन की प्रक्रिया से तैयार हुए माल को बाजार में पुन: मुद्रा के एवज में बेचना जिसके मूल्य में वह अतिरिक्त मूल्य भी शामिल होता है जो उत्पादन प्रक्रिया के बीच से उसमें जुड़ता है । इन तीन क्षणों के निरंतर आवर्त्त से ही पूरी पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था का वह ताना-बाना तैयार होता है जिसमें पूंजी के अनेक  परवर्ती रूपों में विस्तार का एक पूरा ब्रह्माण्ड तैयार होता जाता है । वे बताते हैं कि पूंजी के इन परवर्ती रूपों के साथ पूंजीवादी उत्पादन की कम विकसित अवस्थाओं की कई अवधारणाओं का कोई मायने ही नहीं रह जाता है । स्टाक कंपनियां, बैंकिंग इस परवर्ती उत्पादन प्रणाली की ऐसी ही उपज है जिसमें, उनके शब्दों में, एक लाइन में कहे तो कह सकते है, 'निजी संपत्ति के बिना निजी उत्पादन होता है' । मार्क्स ने पूंजी के तीसरे खंड के 'पूंजीवादी उत्पादन में उधार की भूमिका' अध्याय में इसके बारे में कहा था — “यह एक पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के भीतर पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का उन्मूलन है और इसीलिये एक आत्मविलेय अन्तर्विरोध है, जो prima facie उत्पादन के एक नए रूप में संक्रमण के महज एक चरण को प्रकट करता है ।...यह कुछेक क्षेत्रों में एकाधिकार स्थापित कर देता है और उसके द्वारा राज्य के हस्तक्षेप को आवश्यक बनाता है । यह एक नए वित्तीय अभिजात वर्ग को, प्रवर्त्तकों, सटोरियों, और सिर्फ दिखावे के निदेशकों के रूप में परजीवियों की एक नई किस्म को, कंपनी प्रवर्त्तन शेयर निर्गमन और शेयरों की सट्टेबाजी के जरिये ठगी और धोखाधड़ी की संपूर्ण प्रणाली को पुररुत्पादित कर देता है ; निगमों के प्रवर्त्तन, शेयर जारी करने और शेयरों की सट्टेबाजी के जरिये धोखे और ठगी के पूरी व्यवस्था । यह निजी संपत्ति हुए बिना निजी उत्पादन है ।” (कार्ल मार्क्स, पूंजी, खंड – 3, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृष्ठ – 386)1

वे आगे और कहते हैं — “सट्टे में प्रवृत्त बड़ा व्यापारी जिसे जोखिम में डालता है, वह उसकी अपनी नहीं, सामाजिक संपत्ति होती है । पूंजी के उद्गम को बचत के साथ जोड़ने वाली बात उतनी ही बीभत्स हो जाती है, क्योंकि वह चाहती है कि दूसरे उसके लिये बचत करे ।...निवृत्ति वाली बात भी उसकी ऐय्याशियों से पूरी तरह खारिज हो जाती है, जो स्वयं में उसके लिये उधार पाने का एक साधन है । जिन अवधारणाओं का पूंजीवादी उत्पादन की कुछ कम विकसित अवस्थाओं में कुछ अर्थ होता था, वे सर्वथा निरर्थक हो जाती है ।” (वही, पृष्ठ – 387)2

बैंकिंग पूंजीवाद के विकास के इसी संश्लिष्ट रूप से, पूंजी की गतियों से उत्पादन और परिचलन के क्षेत्र में संक्रमण के जिस नये चरण का ऊपर उल्लेख किया गया है, उसी का एक प्रमुख ठोस तत्व है । यह मूलत: पूंजीवादी उत्पादन में उधार की भूमिका को निर्धारित करने का एक प्रमुख औजार है ।

मार्क्स ने इस उधार की पद्धति की दो खास लाक्षणिकताओं की चर्चा की — एक, पूंजीवादी उत्पादन को प्रोत्साहन देना और अन्यों के श्रम के शोषण से लेकर जुए और ठगी के शुद्धतम और विशालतम रूप से धनी बनना और कम से कम लोगों द्वारा पूरी सामाजिक संपदा का दोहन करना । दूसरा, एक नई उत्पादन प्रणाली में संक्रमण को तय करना । उसकी यही अस्पष्ट प्रकृति जो लॉ से लेकर इसाक परेरा तक उधार के सभी प्रमुख पैरोकारों को ठग और पैगंबर के मिश्रण के प्रीतिकर चरित्र से विभूषित करती है ।3

कहना न होगा, पूंजीवाद में उधार और ब्याज की बैंकिंग की दुनिया के एक ऐसे 'ठग और पैगंबर के मिश्रण के प्रीतिकर चरित्र', रघुराम राजन की प्राणीसत्ता पर चर्चा को एक संदर्भ देने के लिये ही हमने पूंजीवाद के अंतर्गत वित्तीय जगत के पूरे ताने-बाने के उदय के बारे में मार्क्स के ब्यौरों का एक अंश यहां पेश किया है ।


रघुराम राजन की तारीफ में कहा जाता है कि वे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने 2008 के अमेरिकी सबप्राइम संकट से शुरू हुए आर्थिक संकट को पहले ही भांप लिया था । हम सभी जानते हैं कि उस संकट के बाद सारी दुनिया में यह बात उठने लगी थी कि क्या यह पूंजीवाद के अंत का संकेत नहीं है ? फुकुयामा की तरह के पूंजीवाद के उदार जनतंत्र में 'इतिहास का अंत' कहने वाले विचारक तक ने 2008 के बाद इसके अस्तित्व के संकट की बात कहनी शुरू कर दी थी । क्या पूंजीवाद का कोई भविष्य है ? इस प्रकार के सवाल भी तब से लेकर आज तक यथावत है । आज भी उसी आधार पर बौद्धिकों के बीच यहां तक गंभीर चर्चा हो रही है कि अपने अंदुरूनी अंतर्विरोधों के कारण पूंजीवाद बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के सामने आए जब कभी खत्म हो सकता है । (देखें, Wolfgang Streek, How will Capitalism end, Juggernaut, 2017)

हमारा सवाल यह है कि क्या बैंकर रघुराम राजन 2008 के आर्थिक संकट को पूंजीवाद के अपने अंदुरूनी अंतर्विरोधों के किसी संकट के रूप में देख कर पहले से ही उसके विस्फोट के लक्षणों को पहचान रहे थे या पहचान सकते थे ? या उनका नजरिया कुछ और ही था, कुछ वैसा ही जैसा भारत की बैंकिंग प्रणाली के संकट के बारे में उनका रहा है कि 'इसके लिये सिर्फ ऊपरी मरहम-पट्टी से काम नहीं चलने वाला है, सघन शल्य चिकित्सा की जरूरत है ।' और वह शल्य चिकित्सा और कुछ नहीं, भारत सरकार के रुपयों से या भारत की जनता के पास संचित धन से बैंकों की मदद करते हुए उनके बैलेंसशीट्स का शोधन किया जाए, सारे एनपीए को बट्टे खाते में डाल दिया जाए । उनकी राय में, जब तक ऐसा नहीं किया जाता है, भारतीय बैंक आगे भारत में उद्योगों के लिये पूंजी जुटा कर देने का काम नहीं कर पायेंगे, जिससे आर्थिक गतिरोध पैदा होगा, मंदी आएगी, आदि, आदि । अर्थात, जैसा कि मार्क्स ने पूंजीवाद में उधार की भूमिका के बारे में कहा कि यह मुट्ठी भर लोगों को दूसरों के संचित धन को मुहैय्या कराने का एक औजार है, राजन सरकार से उसकी इस भूमिका को पूरी ताकत के साथ अदा करने की ही सिफारिश कर रहे थे ।


जहां तक 2008 के अमेरिकी सबप्राइम संकट का सवाल है, सब जानते हैं, यह बैंकों की अपनी लोभ और लालच से भरी बेपरवाही की करतूतों, विवेकहीन ढंग से वित्तीय उत्पादों के निर्माण, बैंकों की प्रतिभूतियों की स्वतंत्र सत्ता को किसी ब्रह्म की तरह अनादि अनंत मान लेने और स्वात्मभूत समझने से पैदा हुआ संकट था । यह एक प्रकार से कोरे हवाई विचारों की तरह का संकट था कि जब तक कोई उन्हें हांक सके हांक ले, वर्ना कोरा भ्रम साबित होते हुए उन्हें औंधे मुंह गिरना ही होता हैं। दर्शनशास्त्र को भी जब आदमी के सर्वोच्च ज्ञान का लोकोत्तर क्षेत्र मान कर जीवन के भौतिक यथार्थ से पूरी तरह काट दिया जाता है तब वास्तव में वह चिन्तन के विकास के स्रोत से, उसकी चुनौतियों से ही कट जाता है । अमेरिकी सबप्राइम संकट भी कुछ-कुछ वैसा ही था । यह जमानत पर पड़ी संपत्तियों को प्रतिभूतियों की शक्ल देकर और फिर प्रतिभूतियों की अनगिनत संततियों के जरिये उनके लेन-देन का एक विचित्र सा अमूर्तन का बहुलतावादी स्वयंभू स्वप्निल संसार तैयार करने का एक अद्भुत खेल था, जिसके पीछे यदि अभेद सत्य की तरह की कोई चीज थी तो वह थी आदमी के अंतहीन लोभ से उपजी वित्तीय क्षेत्र में चौतरफा मुनाफे की लूट की धूम । यह लोभ की शक्ति ही सबप्राइम संकट के निर्माण की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया में एक गैर-द्वंद्वात्मक चालिका शक्ति थी, जो उसके अंदर ही निहित थी । हेगेल ऐसे गैर-द्वंद्वात्मक तत्व को मूलत: द्वंद्वात्मक विकास में एक प्रकार की बाधा के रूप में देखते थे ; फ्रायड इसे मनोरोगियों में उनकी मृत्युकांक्षा (death drive) बताते थे । अंदर का एक ऐसा तत्व जो बार-बार परिस्थिति या आदमी को घेरता रहता है, उसे अपने वृत्त से निकलने नहीं देता । लेकिन पूंजीवाद है, तो मुनाफा है, तो लोभ है ! सबका परस्पर-निर्भर अस्तित्व है !

रघुराम राजन इस 2008 के अमेरिकी संकट को कैसे देखते हैं, यहां यह जानना दिलचस्प होगा और इसीसे उनकी बैंकर वाली प्राणीसत्ता भी खुल कर सामने आ पायेगी, हम उसे सही रूप में परिभाषित कर सकेंगे । उनकी पहली किताब है ‘Saving Capitalism from Capitalists’ (2003) । इसका नया और तीसरा संस्करण अभी 2017 में आया है जिसमें एक नया 'अंत-वक्तव्य' (Afterwords) जोड़ा गया है । इस किताब के शीर्षक का एक उप-शीर्षक भी है — ‘Unleashing the power of financial market to create wealth and spread opportunity’  (संपत्ति की सृष्टि और अवसरों के विस्तार के लिये वित्त बाजार की शक्ति का विमोचन) । इस उपशीर्षक से ही जाहिर है कि एक बैंकर के नाते वित्तीय उत्पादों की सार्वभौम सत्ता पर उनकी  इतनी अगाध आस्था है कि उन कागजातों को ही वे संपत्ति और अवसरों का अंतिम रूप मानते हैं ।4 यह सही है । अर्थशास्त्र में संपत्तियों का कागज के प्रतिज्ञापत्रों में रूपांतरण और कागज के नोटों का संपत्ति में रूपांतरण जब एक सच्चाई है तो यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि वित्त बाजार का वास्तविक अर्थ-व्यवस्था से कोई सीधा संपर्क नहीं होता है । लेकिन जब मामला शुद्ध रूप से वित्तीय उत्पादों का हो, अर्थात कागजों से बनाये जाने वाले कागजों का, एक लाख की संपत्ति के एवज में एक करोड़ के शेयर जारी करके आम लोगों के धन पर डाका डालने का, तब वह विषय अर्थशास्त्र का नहीं, अंतत: कोरी ठगी और प्रवंचना का हो जाता है । एक धक्के में शेयर बाजार के गिर जाने से अरबो-खरबों की कीमत वाले शेयरों और प्रतिभूतियों के कागज सिर्फ कागज रह जाते हैं। जब कोई अर्थशास्त्री/बुद्धिजीवी ऐसे वित्तीय उत्पादों को अर्थ-व्यवस्था की वास्तविक समस्याओं की राम वाण दवा बताने लगता है, तब यह समझने में देर नहीं लगती है कि यह दिमाग किसी अर्थशास्त्री का नहीं, किसी महाजन का, चिटफंड के किसी प्रवंचक का या बैंकर का ही हो सकता है जो हमेशा इसी जुगत में रहता है कि कैसे आम लोगों की बचत को उनके घरों से खींच कर बाहर लाए और उसे जोखिम में डाल कर मौज मनाई जाए । पूंजीवाद में उधार और ब्याज की बैंकिंग की दुनिया का टिपिकल 'ठग और पैगंबर के मिश्रण वाला प्रीतिकर चरित्र' !

2008 के सबप्राइम संकट के पहले रघुराम राजन ने उस संकट को इसलिये नहीं देख लिया था कि पूंजीवाद अति-उत्पादन, अराजकता और मुनाफे की सामान्य दर की गिरावट के अपने आंतरिक संकट में फंस चुका है और एक पूंजीवादी जनतांत्रिक व्यवस्था में इसके सामाजिक प्रभावों को टालने की राजनीतिज्ञों की अब तक की सामाजिक सुरक्षा कवच वाली कोशिशें विफल साबित होने लगी, राज्य के पास संसाधनों का टोटा पड़ने लगा था । इसके बजाय राजन की दृष्टि इस बात पर थी कि क्यों अमेरिकी सरकारें, वह भले बुश की रही हो या क्लिंटन की, आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये उन्हें अधिक से अधिक उधार उपलब्ध कराके उनके जीवन के साथ ही अर्थ-व्यवस्था में सुधार की भी मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ रही हैं । ऐसे-ऐसे लोगों को अपने घर के लिये बिल्कुल आसान शर्तों पर उनकी हैसियत की बिना सही जानकारी के उधार दे रही है जो कभी भी उस उधारी को चुका नहीं पायेंगे । उन्हें बैंकरों की ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरने की मूलभूत मानसिकता पर कोई खास आपत्ति नहीं है क्योंकि इसे तो वे बैंकरों का धर्म मानते हैं, उनके शब्दों में दैनंदिन बैंकिंग के उबाऊ काम में कुछ अतिरिक्त मनोरंजन, और जब खुद सरकार उन्हें यह मौका दे रही है तब तो उस रास्ते पर न चलना और उसका लाभ न उठाना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं होगा ।5 न उन्हें बैंकरों के द्वारा मनमाने तरीके से अपने वेतन और भत्तों को बढ़ाने में कोई नैतिक गड़बड़ी दिखाई देती है । उनकी दृष्टि की क्षुद्रता यहां तक है कि वे रोजगार-विहीन विकास की समस्या का समाधान भी वित्त बाजार में लेखाकारों, वकीलों आदि की गतिविधियों में वृद्धि में देखते हैं । अन्य जन-कल्याणकारी सोच से जुड़े बुद्धिजीवी जिन चीजों को जीवन की समस्याओं के मूल में देखते हैं, राजन उन्हें ही समस्या का समाधान मानते हैं । अन्य लोग आदमी की मुक्ति उसे पूंजी की बेड़ियों से मुक्ति में देखते हैं, तो राजन पूंजी की गुलामी की और ज्यादा जकड़बंदी में ।

उनकी पुस्तक 'Fault Lines’ में एक अध्याय है — उन्हें उधार को खाने दो (Let them eat credit) । जनतंत्र में जनता के हितों की सार्वभौमिकता को मानने की वजह से हर सरकार का दायित्व होता है कि वह किसी भी सामाजिक विकास के कारण जन-जीवन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव से आम लोगों की रक्षा करे । जैसा कि हमने पहले ही बताया है कि अमेरिका में बैंकों की उधार के रुख को थोड़ा आम लोगों की ओर मोड़ कर उनके जीवन में राहत देने की कोशिश की गई थी जिसे राजन की तरह के लोग सबप्राइम संकट का मुख्य कारण मानते हैं । इस अध्याय में उनका यह नजरिया पूरी तरह से खुल कर सामने आया है ।6



कुल मिला कर हम यह पूरे दावे के साथ कह सकते हैं कि यदि रघुराम राजन ही नोटबंदी के समय रिजर्व बैंक के गवर्नर होते और यदि उन्हें किसी प्रकार यह समझा दिया गया होता कि इससे बैंकों के पास अतिरिक्त 2-3 लाख करोड़ रुपये आम लोगों के घरों से आ जायेंगे तो उनमें यह कदम उठाने के लिये मोदी से कम उत्साह नहीं होता ! सिर्फ इतना ही नहीं, राजन की किताबों से यह साफ है कि उन्हें यदि इस बात का ही अनुमान होता कि इस प्रकार के किसी कदम से बैंकों को आम लोगों का धन किसी भी वक्त अपने पास अटका कर रखने का अधिकार मिल जायेगा, तब वे और भी उत्साह के साथ इसका खुल कर समर्थन करते, जैसा उर्जित पटेल ने भी इसके प्रति अपने मौन समर्थन से किया ।

भारत का आज का दुर्भाग्य यह है कि इस प्रकार के पेशेवर 'ठग और पैगंबरी के मिश्रण से तैयार हुए चरित्रों' के चौखटे में राजनेताओं ने भी अपने को जड़ लिया है । मोदी-जेटली की आम जनों के दुख-दर्दों के प्रति निष्ठुरता इसी का प्रमाण है ।


1.“This is the abolition of the capitalist mode of production within the capitalist mode of production itself, and hence a self-dissolving contradiction, whichprima facie represents a mere phase of transition to a new form of production. It manifests itself as such a contradiction in its effects. It establishes a monopoly in certain spheres and thereby requires state interference. It reproduces a new financial aristocracy, a new variety of parasites in the shape of promoters, speculators and simply nominal directors; a whole system of swindling and cheating by means of corporation promotion, stock issuance, and stock speculation. It is private production without the control of private property.”

2.“What the speculating wholesale merchant risks is social property, not his own. Equally sordid becomes the phrase relating the origin of capital to savings, for what he demands is that others should save for him. [Just as all France recently saved up one and a half billion francs for the Panama Canal swindlers. In fact, a description of the entire Panama swindle is here correctly anticipated, fully twenty years before it occurred. – F.E.] The other phrase concerning abstention is squarely refuted by his luxury, which is now itself a means of credit. Conceptions which have some meaning on a less developed stage of capitalist production, become quite meaningless here.”

3.“The two characteristics immanent in the credit system are, on the one hand, to develop the incentive of capitalist production, enrichment through exploitation of the labour of others, to the purest and most colossal form of gambling and swindling, and to reduce more and more the number of the few who exploit the social wealth; on the other hand, to constitute the form of transition to a new mode of production. It is this ambiguous nature, which endows the principal spokesmen of credit from Law to Isaac Péreire with the pleasant character mixture of swindler and prophet.”

4. “Healthy and competitive financial markets are an extraordinarily effective tools in spreading opportunity and fighting poverty. Because of their role in financing new ideas, financial markets keep alive the process of “creative destruction” – whereby old ideas and organisations are constantly challenged and replaced by new, better ones. Without vibrant, innovative financial markets, economics would invariably ossify and decline.” (Saving Capitalism from the Capitalists, Harper Business,2017, p. 1)

5. “For banks, this was the age of the “3-6-3” formula : borrow at three percent, lend at six percent, and head off to the golf course at 3 pm. Banks were profitable, safe, and boring, and the price was paid by depositors…Because companies’ profits were under pressure, they began to innovate more and take greater risks, and doing so required financiers who could understand those risks, price them accurately, and distribute the judiciously. Banking was no longer boring; indeed, it became the command center of the economy, financing one company’s expansion here while putting another into bankruptcy there.” (ibid., p. 318)

6. Politicians always sensitive to their constituents have responded to these worrisome developments (developments of loss of jobs etc. due to technology – A.M.) with an attempt as a panacea facilitating the flow of easy credit to those left behind by growth and technological progress. And so America’s failings in education and more generally, the growing anxiety of its citizenery about access to opportunity have led in indirect ways to unsustainable household debt, which is at the centre of this crisis. That most observers have not noted these links suggests this fault line is well hidden and therefore particularly dangerous. (Fault Lines, Collins Business 2010, Let them eat Credit, p.29-30)