रविवार, 23 अगस्त 2026

सत्ता की सीमित बुद्धि बनाम प्रतिरोध की अनंत संभावनाएँ

 

(राहुल गांधी के आत्मविश्वास की राजनीतिक रणनीति का दार्शनिक आधार)

– अरुण माहेश्वरी



टाइम्स ऑफ इंडिया ने 20 अगस्त को राहुल गांधी के एक स्पष्ट वक्तव्य को अपनी सुर्खी बनाया। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उन्होंने कहा – नरेंद्र मोदी का "राजनीतिक अंत" हो चुका है, उनका शासन अपने आखिरी पड़ाव पर है, और अब उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो गई है।

यह बयान केवल एक आक्रामक राजनीतिक दाँव या आंतरिक सूचनाओं का नतीजा नहीं लगता। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी जिस अंदाज में बात कर रहे हैं, उसमें एक पैटर्न साफ दिखता है – वे राजनीतिक मुद्दों को भी दार्शनिक नज़रिए से देखने की कोशिश करते हैं। उनका दृष्टिकोण अक्सर निगमनात्मक (deductive) होता है, यानी वे किसी तत्काल घटना से निष्कर्ष नहीं निकालते, बल्कि सत्ता की मूल संरचना, उसकी मानसिकता और विचारधारा की सीमाओं को समझने से शुरू करते हैं।

ऐसा लगता है मानो उन्होंने संघी मानसिकता को अच्छी तरह पढ़ लिया है – कि वह किन धारणाओं में जकड़ी है, कहाँ उसे सोचने-समझने में दिक्कत होती है, और किस बिंदु पर वह पूरी तरह असमर्थ हो जाती है।

संघ की विचारधारा सिर्फ राजनीतिक मान्यताएँ नहीं देती; यह व्यक्ति की पूरी प्रतीकात्मक दुनिया बना देती है। इसी दुनिया में संघी मानसिकता को पाला-पोसा जाता है – उसके सोचने, देखने और समझने के ढर्रे पहले से तय कर दिए जाते हैं। गांधी की हत्या, मुसलमानों के प्रति शत्रुता, और जातिगत पदानुक्रम – ये ऐसे विषय हैं जिन पर संघी दिमाग पहले से ही बंद होता है। ये मात्र अप्रिय सत्य नहीं हैं; बल्कि इन तथ्यों को उसकी प्रतीकात्मक व्यवस्था में शामिल ही नहीं किया जाता। इसलिए गांधी की हत्या उसे एक अकेले हत्यारे का काम लगती है, मुसलमान-विद्वेष राष्ट्रवाद लगता है, और जातिगत ऊँच-नीच हिंदू-एकता।

राहुल गांधी की निगमनात्मक पद्धति इन्हीं बंद बिंदुओं को पहचानने से शुरू होती है। वे यह नहीं देखते कि मोदी ने किस प्रसंग में क्या कहा या क्या किया; वे देखते हैं कि संघी शिक्षा-दीक्षा ने उनकी सोच को किस तरह सीमित कर दिया है। मोदी की राजनीतिक दृष्टि की कमी सूचनाओं के अभाव से नहीं, बल्कि इसी संरचनात्मक जकड़ से पैदा होती है। जब नई परिस्थितियाँ उन बहुलताओं को सामने लाती हैं जिन्हें संघी व्यवस्था ने हाशिए पर रखा था, तो मोदी का दिमाग उन्हें समझ नहीं पाता। वे नई वास्तविकता को भी पुराने विभाजनों – हिंदू-मुसलमान, राष्ट्रवादी-विरोधी, अपना-पराया – के चश्मे से ही देखने की कोशिश करते हैं।

इसलिए जब समाज के अलग-अलग वर्ग आपस में अप्रत्याशित संबंधों में जुड़कर एक नई सामूहिकता (गठबंधन) बनाते हैं, तो संघी दिमाग भौचक रह जाता है। वह नई स्थिति में भी पुराने दुश्मन, पुरानी खाई और पुरानी दवा तलाशने में व्यस्त रहता है। राहुल गांधी इस आंतरिक असंगति को धीरे-धीरे उजागर करते हैं, और उसे उसके चरम पर ले जाते हैं – जहाँ वह अपने ही विरोधाभासों से जर्जर हो जाती है।

यह निगमनात्मक पद्धति किसी पूर्वनिर्धारित सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू करने जितनी सरल नहीं है। इसका विशिष्ट रूप है – reductio ad absurdum यानी 'असंगति-प्रमाण' – जिसमें सत्ता की अपनी मान्यताओं को उनके तार्किक नतीजे तक ले जाया जाता है, और फिर दिखाया जाता है कि वे अपने ही विरोधाभास में फँस जाती हैं। इस विधि से सोच की आंतरिक विसंगतियाँ खुलती हैं और एक नया राजनीतिक विमर्श बनता है।

राहुल गांधी शायद मोदी शासन को ठीक इसी नज़रिए से देख रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे कि सरकार इसलिए गिर रही है क्योंकि उसके खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं या उसकी लोकप्रियता घटी है। उनका निष्कर्ष गहरा है: मोदी की सत्ता जिस सीमित बुद्धि पर टिकी है, वह एक अनंत संभावनाओं से भरे राजनीतिक समाज को समझने में अक्षम है। और यही उसकी असफलता की जड़ है।

छोटी बुद्धि – जो गिनती तो करती है, संबंधों को नहीं पहचानती

आज की दुनिया के प्रमुख मार्क्सवादी दार्शनिक ऐलेन बाद्यू ने 'सीमाबद्धता' (finitude) पर विचार किया है – जहाँ न केवल वस्तुएँ, बल्कि उन्हें सोचने का तरीका भी पूर्वनिर्धारित नियमों में कैद हो जाता है। उदाहरण के लिए, प्राकृतिक संख्याएँ – एक के बाद दो, दो के बाद तीन – बढ़ती तो हैं, पर पैटर्न वही रहता है। यहाँ नवीनता भी पुराने क्रम की पुनरावृत्ति मात्र है। यही है 'छोटी बुद्धि' – जो भले ही नए तत्वों को जोड़ ले, पर सोचने का ढर्रा नहीं बदलता।

मोदी की सोच में भी समाज के कुछ स्थिर वर्ग हैं – हिंदू, मुसलमान, दलित, पिछड़े, सवर्ण, किसान, युवा, महिलाएँ, मध्यवर्ग। प्रत्येक वर्ग के लिए एक तय संदेश, तय भय और तय प्रलोभन है। राजनीति भी पहले से तय अनुक्रम में चलती है – एक चुनाव, एक योजना, एक सांप्रदायिक मुद्दा, फिर अगला…

जब कोई नया सामाजिक तत्व सामने आता है, तो उसे भी किसी पुराने खाँचे में ढाला जाता है। आंदोलनकारी छात्र – "विपक्ष द्वारा गुमराह युवक", असंतुष्ट किसान – "बिचौलियों का मोहरा", नागरिक अधिकारों की बात करने वाला – "राष्ट्रविरोधी", जातिगत न्याय की माँग करने वाला – "समाज तोड़ने वाला"। इस तरह हर नई घटना को पुरानी श्रेणियों में बाँध दिया जाता है। नक्सल से अर्बन नक्सल, फिर 'दिमागी नक्सल' – बस एक ही पुरानी प्रतिक्रिया नए नाम के साथ।

यह पद्धति तब तक चलती है जब तक समाज को अलग-अलग व्यक्तियों और स्थिर समूहों का जोड़ माना जाए। लेकिन राजनीति की नई स्थिति में असली सवाल यह है कि लोगों के बीच कितने नए संबंध और गठबंधन बन सकते हैं। एक छात्र केवल छात्र नहीं रह जाता – वह बेरोजगार युवा भी है, किसान का बेटा भी, दलित या पिछड़े समुदाय का सदस्य भी, संविधान का नागरिक भी, और चुनावी व्यवस्था से असंतुष्ट मतदाता भी।

यहीं पर 'छोटी बुद्धि' का गणित फेल होता है। सत्ता को यह समझ नहीं है कि किसी स्थिति का वास्तविक संसाधन व्यक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि उनके बीच बन सकने वाले संबंधों की संभावनाएँ हैं। एक व्यक्ति कई मुद्दों पर अलग-अलग गठबंधनों का हिस्सा हो सकता है। इसलिए आंदोलन का संसाधन मतों की संख्या से कहीं ज्यादा होता है।

मोदी सरकार ने अब तक विपक्ष को कुछ दलों, नेताओं और परिवारों तक सीमित रखा। उसकी रणनीति सीमित थी – किसी नेता को बदनाम करना, किसी दल को तोड़ना, गठबंधन में फूट डालना, या मीडिया अभियान से छवि को नष्ट करना।

लेकिन अब उसके सामने सिर्फ कांग्रेस या कम्युनिस्ट या सपा नहीं है। आज छात्र, किसान, मजदूर, महिलाएँ, दलित, आदिवासी, बेरोजगार, छोटे व्यापारी, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाले नागरिक और चुनावी निष्पक्षता की माँग करने वाले समूह – सभी नए-नए संबंध बना रहे हैं। हर संघर्ष दूसरे संघर्ष का हिस्सा बन सकता है, और हर नया संबंध एक नया राजनीतिक उपसमुच्चय पैदा करता है। सत्ता एक संगठन तो तोड़ सकती है, पर सभी संभावित संगठनों की संभावना को नहीं।

इसीलिए मैंने पहले फेसबुक पर लिखा था:

"मोदी वोट को साधते रहे, विपक्ष ने समूह की शक्ति पर दाँव लगाया। वोट व्यक्ति की शक्ति है, आंदोलन समूह की। वोट केवल एक को चुन सकता है, सामूहिक संघर्ष अनंत संभावनाएँ पैदा करता है।"

यही असली ताकत है – एक छात्र की छोटी सी माँग (जैसे परीक्षा-घोटाले के खिलाफ) जब बेरोज़गारी, शिक्षा का निजीकरण, सामाजिक न्याय, पुलिस-दमन, मताधिकार और संविधान के सवालों से जुड़ती है, तो वह एक अनंत राजनीतिक प्रक्रिया का रास्ता खोल सकती है। घटना एक समय और स्थान में घटती है, लेकिन उससे पैदा होने वाले संबंध और संभावनाएँ अनंत हैं।

राम मंदिर का चढ़ावा – छोटी बुद्धि की बड़ी पराजय

राम मंदिर के चढ़ावे का प्रकरण इसे पूरी तरह समझाता है। यह केवल वित्तीय भ्रष्टाचार का एक मामला नहीं है। संघी गलियारों में तो इसे भगवान कृष्ण के माखन-चोरी वाले प्रसंग से भी जोड़ा गया – मानो मोदी स्वयं भगवान हों।

पर सच्चाई यह है कि राम मंदिर मोदी और संघ के लिए सिर्फ एक मंदिर नहीं था; वह उनकी पूरी राजनीतिक संरचना का सबसे बड़ा प्रतीक था। अपनी छोटी बुद्धि में वे इसे हिंदुत्व की विजय का प्रतीक मानते थे। लेकिन वे यह समझ नहीं पाए कि धार्मिक आस्था किसी पार्टी की संपत्ति नहीं होती। उसमें पवित्रता, न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व भी होते हैं। मंदिर का चढ़ावा चुनावी चंदा नहीं, श्रद्धालु का अपने आराध्य को अर्पण है।

इसलिए यह चढ़ावा चोरी केवल 'इलेक्टोरल बॉण्ड' का मामला नहीं है – यह धर्मभीरुओं की आस्था की लूट है। यहाँ राजनीतिक भ्रष्टाचार नैतिक पतन बन गया है।

इस मामले में संघ और मोदी पूरी तरह लाचार दिखते हैं। उनके पास न तो इसका खुलकर जवाब देने की भाषा है, और न ही चुप रहने का विकल्प। अगर बोलते हैं, तो मंदिर ट्रस्ट, उसके हिसाब-किताब, और भाजपा-संघ से जुड़े लोगों की भूमिका पर सवाल उठेंगे। अगर चुप रहते हैं, तो हिंदू आस्था पर डाका डालने के कुप्रसिद्ध होंगे।

यही वह क्षण है जब सत्ता की बुद्धि अपने ही विरोधाभास में फँस जाती है – अपने सबसे बड़े प्रतीक का श्रेय लेना, और उसी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप से बचना, एक साथ संभव नहीं। सबसे सुरक्षित प्रतीक अब उसी के खिलाफ साक्ष्य बन चुका है। यहाँ विपक्ष ने उसकी विचारधारा नहीं तोड़ी, बल्कि सत्ता की आंतरिक असंगति ने ही उसे ध्वस्त कर दिया।

धैर्य और आत्म-विश्वास

ऐसे विश्लेषण में बहुत धैर्य चाहिए। कोई नहीं जानता कि झूठ कब उजागर होगा – लेकिन असंगतता अंततः खुद को ही खोल देती है। राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में हम यही धैर्य देख रहे हैं।

भाजपा ने उन्हें अपरिपक्व, वंशवादी, अनिच्छुक और असफल – जो नहीं कहा। लेकिन राहुल ने तत्काल जवाब देने की बजाय उस मिथ्या छवि को अपने तार्किक नतीजे तक विकसित होने दिया। यात्राओं, मुकदमों, संसद से निष्कासन, और लगातार निजी हमलों के बीच ही देखा गया कि भाजपा की बनाई हुई विरूपित छवि स्वतः ध्वस्त हो गई। वे उससे मुक्त हो गए।

दूसरी ओर, भाजपा ने पूरी कोशिश की कि राहुल को सिर्फ एक कांग्रेसी नेता की तरह देखा जाए – लेकिन उनकी इसी कोशिश ने राहुल को कांग्रेस की सीमाओं के परे, व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। अब भाजपा का झूठ उस बिंदु पर सामने आ रहा है, जिसका मोदी और उनकी सरकार को अंदाज़ा भी नहीं था। राहुल की छवि बिगाड़ने का अभियान ही मोदी के राजनीतिक अंत का संकेत बन गया है।

अनंतता की गणना – कैंटर से बाद्यू तक

बाद्यू आधुनिक गणितज्ञ जॉर्ज कैंटर के अनंतता-सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा करते हैं। कैंटर ने सिद्ध किया कि किसी भी समुच्चय का घात-समुच्चय (power set) – यानी उसके सभी संभावित उपसमुच्चयों का संग्रह – मूल समुच्चय से हमेशा बड़ा होता है। यह बड़ी अनंतता है। इसे यदि राजनीति पर लागू करें तो पायेंगे कि किसी स्थिति में मौजूद व्यक्तियों की संख्या गिनी जा सकती है, पर उन व्यक्तियों के बीच बन सकने वाले सभी संबंधों और गठबंधनों की संख्या हमेशा उस गिनती से अधिक होती है।

यही वह अनंतता है जिसे सत्ता की सीमित बुद्धि नहीं समझ सकती। वह व्यक्तियों को गिनती रहती है, पर उनके संबंधों की असीम संभावनाओं के प्रति अंधी रहती है।

हम पहले से यह नहीं जान सकते कि कौन सा छात्र आंदोलन किस किसान आंदोलन से जुड़ जाएगा, या कौन सा धार्मिक विश्वासघात किस नैतिक विद्रोह को जन्म देगा। लेकिन हम यह निश्चित कह सकते हैं कि स्थिति का सामूहिक संसाधन उसके व्यक्तिगत संसाधनों के साधारण योग से कहीं बड़ा होता है।

उपसंहार - अनंतता से टकराकर सत्ता का अंत 

बाद्यू कहते हैं – "The infinite infinitizes thought itself." – अनंतता स्वयं विचार को अनंत बना देती है।

राहुल गांधी का यह कथन कि मोदी शासन अपने अंतिम चरण में है – यह कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक निगमनात्मक राजनीतिक विश्लेषण है। मोदी सत्ता का अंत इसलिए नहीं है कि उसके खिलाफ एक बड़ी ताकत खड़ी हो गई है, बल्कि इसलिए कि उसकी सीमित संघी बुद्धि उस राजनीतिक समाज को समझने में असमर्थ है, जिसकी संभावनाएँ उसके हर दमन, हर झूठ और हर नैतिक विसंगति के साथ बढ़ती जा रही हैं।

सत्ता व्यक्तियों को पराजित कर सकती है, पर व्यक्तियों और सामूहिकता के बीच बन चुकी अनंतता की खाई को नहीं पाट सकती। जब सत्ता एक प्रतिरोध को दबाती है, तो उसी दमन से अनेक नए प्रतिरोध-समुच्चय जन्म ले लेते हैं।

मोदी शासन का राजनीतिक अंत इसी बिंदु पर स्पष्ट हो जाता है – जहाँ सत्ता के पास अभी भी साधन हैं, पर परिस्थिति की संभावनाएँ उन साधनों से अनंत रूप से बड़ी हो चुकी हैं।

वोट व्यक्ति की शक्ति है, आंदोलन समूह की। वोट एक को चुनता है, संघर्ष अनेक को जोड़ता है। बड़ा से बड़ा वोट-चोर भी सामूहिक संघर्ष के सामने असहाय होता है।


2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन और सधा हुआ विश्लेषण सामूहिक संघर्ष ही सशक्त प्रतिरोध ईकाई है इतिहास भी गवाह है आपको साधुवाद।

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