शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

मोदी की व्यापारी बुद्धि और राहुल की राजनीतिक दृष्टि

- अरुण माहेश्वरी 



हम सब जानते हैं कि व्यापारी बुद्धि और राजनीतिक बुद्धि का मूलभूत अंतर उनके लक्ष्य की प्रकृति में है। व्यापारी बुद्धि का लक्ष्य पहले से निश्चित होता है—मुनाफ़ा। उसकी सारी कुशलता, नवाचार और जोखिम उठाने की क्षमता के बावजूद उसकी सोच क्षितिज सीमाबद्ध होता है। उसके हर निर्णय का मूल्यांकन इसी प्रश्न से किया जाता है कि उससे कितना लाभ हुआ। इसे सीमित साधनों से सीमित परिणाम प्राप्त करने की सीमित बुद्धि का जा सकता है । 

इसके विपरीत राजनीतिक बुद्धि ठीक वहाँ से शुरू होती है जहाँ परिणाम की गणना समाप्त होने लगती है। ऐलेन बाद्यू जब कहते हैं कि राजनीति की मुख्य चुनौती “accepting the infinity of the future”—भविष्य की अनंतता को स्वीकार करना—है, तो इसका अर्थ यही है कि सच्ची राजनीति अपने को किसी पहले से तय अंतिम परिणाम में बंद नहीं कर सकती। चुनाव जीतना, सरकार बनाना, यहाँ तक कि क्रांति करके राज्यसत्ता पर अधिकार कर लेना भी राजनीतिक प्रक्रिया का अंत नहीं होता है। वास्तव में सबसे कठिन राजनीतिक प्रश्न तो इसके बाद शुरू होता है—आगे क्या?

इसी अर्थ में क्रांति के बाद का प्रश्न राजनीति का एक प्रमुख प्रश्न है। यदि क्रांति का अर्थ केवल सत्ता पर कब्जा करना हो, तो क्रांतिकारी बुद्धि और व्यापारी बुद्धि की संरचना में बहुत अंतर नहीं रह जायेगा । व्यापारी निवेश करता है, बाजार पर अधिकार करता है और मुनाफ़ा कमाता है; सीमित राजनीति संगठन बनाती है, चुनाव अथवा संघर्ष करती है, सत्ता पर अधिकार करती है और उस फिर अधिकार को बनाए रखने की कारस्तानियों में लग जाती है। दोनों के लक्ष्य पहले से निर्धारित है और लक्ष्य प्राप्त होते ही सारी गतिविधि उसी उपलब्धि के संरक्षण की तकनीक बन कर रह जाती है। राजनीति तब कोई सत्य-प्रक्रिया न रहकर शुद्ध सत्ता-प्रबंधन हो जाती है।

यहीं से कोई भी भाजपा में मोदी के प्रभुत्व से आए परिवर्तन को भी समझा जा सकता है। पार्टी को सिर्फ चुनाव जीतने वाली मशीन में बदल देना पहली और सीमित बुद्धि में उसकी असाधारण राजनीतिक सफलता दिखाई देता है; लेकिन दार्शनिक अर्थ में यही सफलता उसकी राजनीतिक सीमाबद्धता का प्रमाण हो सकता है। यदि संगठन, विचारधारा, सामाजिक क्रियाकलाप , नेतृत्व-निर्माण और जनता से संबंध—सबका मूल्य केवल इस कसौटी पर तय होने लगे कि उनसे अगला चुनाव जीता जा सकता है या नहीं, तो राजनीतिक बुद्धि और व्यापारी बुद्धि में कोई फर्क नहीं रह जाता है। वोट उसका बाजार, चुनाव उसकी बैलेंस-शीट और सत्ता उसका मुनाफ़ा बन जाती है।

इस प्रक्रिया में राजनीति का वास्तविक सत्त्व क्षीण हो जाता है, क्योंकि राजनीतिक सत्त्व सत्ता प्राप्त करने में नहीं, सत्ता प्राप्त होने के बाद भी समाज में निहित अभी-अज्ञात संभावनाओं को खुला रखने में होता है। व्यापारी बुद्धि पूछती है—हमें इससे क्या मिलेगा? चुनावी बुद्धि पूछती है—इससे कितनी सीटें मिलेंगी? पर राजनीतिक बुद्धि का प्रश्न इससे बिल्कुल अलग है—इस परिस्थिति से वह क्या नया उत्पन्न हो सकता है जिसकी अभी गणना ही संभव नहीं है? व्यापारी बुद्धि स्वार्थ केन्द्रित व्यवहारिक बुद्ध है, तो राजनीतिक बुद्धि सेवा-केन्द्रित सर्जनात्मक बुद्धि है, 

बाद्यू जब “भविष्य की अनंतता” की बात करते हैं तो यही उसका राजनीतिक अर्थ होता है। चुनाव अथवा क्रांति भी एक घटना हो सकती है; लेकिन घटना स्वयं सत्य नहीं होती। असली सवाल यह है कि उसके बाद कौन-सी सत्य-प्रक्रिया शुरू होती है और वह कौन-सा नया प्रमाता पैदा करती है। जिस राजनीति के लिए सत्ता अंतिम लक्ष्य है, वह सत्ता पाते ही समाप्त होने लगती है; जिस राजनीति के लिए सत्ता भी एक नया आरंभ है, वही अपने भविष्य की अनंतता को स्वीकार करती है।

इसीलिए मोदी की छोटी व्यापारी बुद्धि के चलते भाजपा जहां तेज़ी से अपने अंत की दिशा में बढ़ रही है तो वहीं राहुल गांधी की सत्ता की सीमा के परे जाने वाली राजनीति भविष्य के बंद दरवाज़ों को खोलने के लिए दस्तक दे रहीं है । मोदी राजनीति के अंत की भूमिका में हैं तो राहुल की भूमिका राजनीति की संभावनाओं को बनाए रखने की है ।

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