राहुल गांधी की राजनीति का मूल्यांकन होगा या उनकी वंशावली का?
(रामचंद्र गुहा से सवाल)
—अरुण माहेश्वरी
आज बीबीसी पर रामचंद्र गुहा का साक्षात्कार सुनकर हतप्रभ हूँ कि कैसे कोई इतिहासकार महज कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को परोसकर बेतुके राजनीतिक मानदंडों के पक्ष में दलीलें तैयार करने लगता है!
गुहा इस साक्षात्कार में महात्मा गांधी के बेटों की राजनीति में अरुचि के आधार पर राहुल गांधी की राजनीति को खारिज कर रहे थे और उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य बता रहे थे ।
गांधीजी के बेटों ने सत्ता की राजनीति का रास्ता नहीं चुना, इसलिए नेहरू की पारिवारिक परंपरा से आने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री पद के अयोग्य है, क्या इन दोनों बातों के बीच कोई तार्किक संबंध संभव है?
यह राजनीतिक विवेचना नहीं, एक राजनेता की वंशावली की जाँच है। गुहा ही इस सत्य की गुह्यता जानते होंगे कि किसी व्यक्ति का परिवार उसके सार्वजनिक कर्म का विकल्प कैसे हो सकता है? जन्म से अगर किसी की योग्यता तय करना गलत है तो जन्म से अयोग्यता तय करने में कौन सी जनतांत्रिक बुद्धिमत्ता है?
गुहा की इस तर्क प्रणाली में कांग्रेस की संगठनात्मक समस्या और राहुल गांधी की व्यक्तिगत राजनीतिक क्षमता को एक ही चीज बना दिया गया है। किसी दल में नेतृत्व के अवसरों का संकुचन किसी की भी आलोचना का विषय हो सकता है। लेकिन उससे यह निष्कर्ष कैसे निकल सकता है कि उस दल का किसी राजनीतिक परिवार से आया नेता शासन के अयोग्य है। ऐसा कोई निष्कर्ष निकालने के लिए उसके विचार, निर्णय, कार्य और सार्वजनिक जवाबदेही की जाँच की जानी चाहिए न कि उसकी वंशावली की । कोरे ‘परिवारवाद’ के आरोप को उस जाँच से बचने का आसान बहाना नहीं बनाया जाना चाहिए ।
इस प्रसंग में गांधी जी के पुत्रों का उनका उदाहरण भी असंगत है। गांधी के पुत्रों ने भारत में कोई सत्ताधारी राजनीतिक वंश नहीं बनाया। लेकिन इससे नेहरू की पारिवारिक राजनीतिक परंपरा स्वतः दोषपूर्ण कैसे हो जाती है? गांधी जी के पुत्रों को राजनीति से पूरी तरह अनुपस्थित बताना भी गलत है। वे खुद गांधी जी के बेटों की राजनीतिक दिलचस्पियों का जिक्र करते हैं । उन्होंने सरकारी पद नहीं लिया, इसी बिना पर उन्हें राजनीति से दूर कैसे कहा जा सकता है?
हमारी नजर में गांधी जी की ऐतिहासिक विशिष्टता को दूसरों की अयोग्यता का सर्वकालिक प्रमाणपत्र बना देना वास्तव में गांधी जी के सत्य से आँख मूँदना जैसा है । गांधी ने तो कांग्रेस को लोक सेवक संघ में बदलने का प्रस्ताव दिया था। इसमें उनकी चिंता का विषय जनता की स्वतंत्र राजनीतिक सक्रियता को बनाए रखने की थी । उससे यह नियम कत्तई नहीं निकलता कि किसी राजनेता की संतान को जनतांत्रिक शासन में प्रवेश का अधिकार नहीं होना चाहिए।
राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में पारिवारिक नाम से मिले अवसर को कोई नहीं नकारता है? सवाल यह है कि उन्होंने उस अवसर का किया क्या। खास तौर पर मोदी शासन के इन बारह वर्षों में उनकी भूमिका को केवल उनके उपनाम में समेट देना उस पूरे संघर्ष को मिटाना है जिसमें उन्होंने हार, उपहास और दबाव के बीच विपक्ष की आवाज को बनाए रखा । 2023 में उनकी लोकसभा की सदस्यता भी गई जो सर्वोच्च न्यायालय से राहत के बाद बहाल हुई। इन सब प्रतिकूलताओं में भी उन्होंने अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखी।
गुहा को भारत जोड़ो यात्रा के महत्त्व का भी अहसास नहीं है । कन्याकुमारी से कश्मीर तक जनता के बीच चलना, उसके दुख सुनना और सांप्रदायिकता के खिलाफ मोहब्बत के आधार पर एक साझा भारत का विचार रखना मामूली राजनीतिक कार्य नहीं कहलायेगा। इसी यात्रा ने विपक्ष के लिए जनता से संवाद के एक व्यापक मंच की संभावना तैयार की । उनकी राजनीति की हर सीमा पर चर्चा हो सकती है, लेकिन उनकी मेहनत और उसकी राजनीतिक दिशा को परिवारवाद कहकर खारिज करना शुद्ध बौद्धिक आलस्य और एक प्रकार की अय्याशी भी है।
अभी वोट चोरी के विरुद्ध राहुल का संघर्ष हमारे लोकतंत्र के सामने खतरे के बुनियादी प्रश्न को उठाता है कि लोग अपने शासक चुनने के अधिकार पर कितना भरोसा कर सकते हैं? चुनाव आयोग के खिलाफ लड़ाई के नेतृ्त्व में राहुल गांधी है ।
‘सत्याग्रह’ मंच के माध्यम से देश के अलग-अलग जनसंघर्षों को जोड़ने की पहल भी उनके दीर्घकालिक राजनीतिक सोच का संकेत है। इसमें किसान, छात्र, दलित, आदिवासी और स्त्रियों के संघर्षों को व्यापक सार्वजनिक संवाद में लाने की कोशिश है। ऐसी पहल का मूल्यांकन उसके काम और परिणाम से होना चाहिए।
राहुल की शासन संबंधी तैयारी, आर्थिक समझ, संगठन क्षमता और निर्णयों पर कोई भी कठोर से कठोर प्रश्न उठाने का अधिकारी है । लोकतंत्र में ये सवाल उठने ही चाहिए । लेकिन उनके जन्म को उनके विरुद्ध अंतिम फैसला बना देना कैसी जाँच है? इसमें किसी भी व्यक्ति को अपना उत्तर देने का अवसर ही नहीं मिलता है!
ऐलेन बाद्यू की भाषा में राजनीतिक सत्य की निष्ठा रक्त संबंध से प्रमाणित नहीं होती। वह व्यक्ति के अपने समय में किए गए हस्तक्षेप से पहचानी जाती है। यही कसौटी राहुल पर भी लागू होगी। उनका परिवार उन्हें शुरुआती अवसर दे सकता था; आज के संघर्ष की जिम्मेदारी उन्हें स्वयं उठानी पड़ रही है।
हम अंत में यही कहेंगे कि वंशावली देखकर राजनीतिक फैसला सुनाना हर प्रकार के जनतांत्रिक विवेक का त्याग है। राहुल गांधी को उनके कामों से परखिए। प्रधानमंत्री बनने की उनकी दावेदारी का फैसला जनता और संसदीय बहुमत करेंगे, किसी इतिहासकार के द्वारा उनकी निजी वंशावली की परीक्षा नहीं।