सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

विखंडन जब स्वयं विखंडन की माँग करता है

(अच्युतानंद मिश्र के लेख "भक्तिकाल : इतिहास और विखंडन" का एक पुनर्पाठ)


— अरुण माहेश्वरी


 "आलोचना के 82वें अंक में प्रकाशित अच्युतानंद मिश्र का लेख "भक्तिकाल : इतिहास और विखंडन" पढ़कर एक सुखद आश्चर्य हुआ। हमारी दृष्टि में इसे पिछले कई दशकों में भक्तिकाल पर लिखी गई एक सबसे गंभीर और वैचारिक रूप से महत्त्वपूर्ण टिप्पणी कहा जा सकता है। इसका महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि यह आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भक्तिकाल-संबंधी अवधारणा की आलोचना करता है, बल्कि इस बात में है कि यह उस पूरे इतिहास-बोध को प्रश्नांकित करता है जो "भक्तिकाल" को एक समरस (समन्वित) कालखंड, एक अखंड सांस्कृतिक युग, भारतीय आत्मा के सहज उत्कर्ष अथवा एकरेखीय साहित्यिक विकास की कथा के रूप में प्रस्तुत करता आया है।

उनके शब्दों में, “शुक्ल जी के अनुसार भक्तिकाल में कोई एक समग्र परंपरा नहीं थी बल्कि पूर्ववर्ती दौर (निर्गुण धारा) उत्तरवर्ती दौर के ठीक विपरीत था । यानी भक्तिकाल परस्पर विरोधी धारणाओं के समन्वय से निर्मित अवधारणा है ।”(पृ.22)

इस पर वे यह सवाल उठाते हैं कि “इस समन्वय की जरूरत क्यों थी और किसे थी?” आगे भक्तिकाल में कई परंपराओं के संघर्ष का एक ब्यौरा देते हुए यह साफ मत जाहिर करते हैं कि “भक्तिकाल की एकता और केंद्रीयता बहुत सुदृढ़ नहीं है, बल्कि वहाँ किन्हीं अप्रकट अवधारणाओं के तहत सामंजस्य बिठाने का प्रयत्न अधिक है ।” (पृ.23)

इन ‘अप्रकट अवधारणाओं’ पर रोशनी डालते हुए वे आगे बढ़ते हैं कि “उपनिवेश-पूर्व भारत में जो वर्चस्ववादी ताकतें थीं, उपनिवेशवादी शक्तियों ने उसी की क्रमिकता में दमन की परियोजना को पुनर्व्यवस्थित करते हुए भारत के निकट अतीत, भक्तिकाल की समन्वयकारी दृष्टि तथा समग्रता का छद्म निर्मित किया ताकि भारतीय समाज में प्रतिगामी मूल्यों की केंद्रीयता बनी रहे ।”(वही)

इस प्रकार, पूरे लेख में मिश्र का यही बताने का आग्रह बराबर बना रहा कि "भक्तिकाल" स्वयं इतिहास की कोई स्वयंसिद्ध इकाई नहीं, बल्कि एक निर्मित (constructed) अवधारणा है, जिसके भीतर सोद्देश्य अनेक परस्पर विरोधी ऐतिहासिक धाराओं को कृत्रिम रूप से समन्वित कर दिया गया है।

कहना न होगा, यही वह बिन्दु है जहां से यह लेख अपनी वास्तविक शक्ति प्राप्त करता है। उन्होंने ठीक ही लिखा है कि कबीर, सूर, तुलसी, मीरा और जायसी को एक ही वैचारिक धारा का प्रतिनिधि मान लेना इतिहास का सरलीकरण है।

“भक्तिकाल को किसी एक धारणा के परिपाक के रूप में पढ़ना कठिन है । हम भले कबीर, सूर, तुलसी, मीरा और जायसी का एक संयोजन तैयार कर लें, मगर भक्तिकाल की किसी एक धारणा के अंतर्गत उनका सामंजस्य बिठाना कठिन है । कहने का तात्पर्य यह है कि भक्तिकाल को समग्रता में पढ़ना एक तरह का सामान्यीकरण है, जिसमें नीर क्षीर विवेक की जगह अपनी-अपनी मान्यताओं का आरोपण है । कबीर और तुलसी को ही एक साथ रखकर विकसित धारणा का निर्माण कठिन है।” (पृ.22)

जाहिर है कि इनकी वैचारिक संरचनाएँ, इनके सामाजिक आधार और इनके धार्मिक-सांस्कृतिक अर्थ अलग-अलग हैं। मिश्र का साफ संकेत है कि "समग्र भक्तिकाल" की धारणा वस्तुतः एक ऐसी ब्राह्मणवादी विचारधारात्मक चादर है, जो सोद्देश्य इन अंतर्विरोधों को ढँक देती है।

“यह विलयन भक्ति की समूची अवधारणा को संदेह के घेरे में ले आता है। इसके विपरीत अगर हम भक्ति की अवधारणा को दो परस्पर संघर्षरत परंपराओं में विखंडित करें और उन्हें भारतीय समाज-संस्कृति में विद्यमान इन दो परंपराओं के सतत संघर्ष के रूप में देखें तो वर्तमान के संघर्ष की अधिक सार्थक और निर्णायक व्याख्या की जा सकेगी ।” (पृ.23)

इसी प्रकार दक्षिण भारतीय भक्ति, संगम साहित्य, आलवार-नयनार परंपरा, भागवत, मंदिर-व्यवस्था तथा उत्तर भारतीय निर्गुण-सगुण धाराओं के बीच संबंधों की पुनर्समीक्षा का उनका आग्रह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लेख के शुरू में ही उन्होंने सवाल किया है कि “दक्षिण से निकली जिस भक्ति से हम उत्तर भारत की भक्ति-चेतना को संबद्ध करते हैं−वह कौन-सी धारा थी, उसमें भक्ति के कौन-से आयाम थे, कौन-सी टकराहटें थीं?” (पृ.22)

हमारी नज़र में, "समन्वय" को एक स्वाभाविक सांस्कृतिक गुण न मानकर स्वयं एक ऐतिहासिक प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करना ही हिन्दी आलोचना में एक गंभीर हस्तक्षेप है। यहीं तक आते-आते यह लेख भक्तिकाल की चर्चा को एक बिल्कुल नए स्तर पर पहुँचा देता है।

किन्तु यहीं से हमें उनके इस विखंडन की अपनी सीमाएँ भी दिखाई देने लगती हैं। कहा जा सकता है कि यह सीमा विखंडन मात्र की ही सीमा होती है ।

अच्युतानंद का घोषित उद्देश्य "भक्तिकाल" की एकान्वित अवधारणा का विखंडन है। परंतु विडंबना तब पैदा होती है जब यह विखंडन अंततः स्वयं एक नए केंद्रीय व्याख्यात्मक सिद्धांत में संगठित हो जाता है। इस लेख में लगभग प्रत्येक ऐतिहासिक रूपांतरण का अंतिम स्पष्टीकरण "ब्राह्मणवाद" में जाकर समाप्त होता है। मंदिर, भागवत, गीता, शंकराचार्य, तुलसी, रीतिकाल, यहाँ तक कि भक्ति की भाव-संरचना भी अंततः उसी के भीतर अर्थ ग्रहण करती है।

“अगर दास प्रथा के मूल में वैदिक चेतना प्रसूत ब्राह्मणवादी विचारधारा कार्यरत थी तो सामंतवादी चेतना की संस्कृति के मूल में व्याप्त ब्राह्मणवादी विचारधारा को दृष्टि भगवद्गीता से मिल रही थी । बौद्ध तथा अन्य भौतिकतावादी दर्शनों के उद्भव और प्रभाव के बाद ब्राह्मणवादी चिंतन एवं ज्ञानकांड का जो पराभव हुआ था, उसे पुनर्जीवित करने का काम भगवद्गीता ने किया ।

“भगवद्गीता ने नए रूप में ब्राह्मणवादी विचारधारा को पुनर्जीवित करने के लिए दास प्रथा के दौर का आक्रामकता की जगह सहिष्णुता और व्यापकता को महत्त्व दिया । ...बौद्ध दर्शन और उसकी विचारधारा की ओर सामाजिक क्रम में निम्न स्थान पर रह रहे समूह तेजी से आकर्षित हो रहे थे । इस वजह से ब्राह्मणवादी परंपरा का प्रभाव एवं प्रसार कम हो चला था । भगवद्गीता ने विभिन्न अस्थाओं के प्रति सहिष्णुता का दर्शन दिया ।”(पृ.26-27)

वे इसे एक औपनिवेशिक चेतना का परिणाम बताते हैं जो “भक्ति की इस धारा को दक्षिण से उत्तर तक अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करती है, साथ ही दूसरी संघर्षशील परंपरा को, जिसका संबंध भौतिकवादी दर्शन से रहा है, महत्त्व नहीं देती । ऐसा करके वह भारत की अवधारणा को ही बदलती है । इसके मूल में यह दृष्टि व्याप्त थी कि ब्राह्मणवादी विचारधारा से निर्मित और रूपांतरित भारत ही भारत है । जबकि तथ्य इससे भिन्न दिखाई देते हैं ।” (पृ.26)

हमारा सवाल है कि क्या इतना विखंडन ही अपने-आप में पर्याप्त है? हमें यह इसीलिये पर्याप्त नहीं लगता है, क्योंकि विखंडन का पहला काम किसी स्थापित मिथक या एकान्विति को तोड़ना होता है। वह अपने-आप में किसी सत्य का निर्माण नहीं करता; वह उस स्थान का निर्माण करता है जहाँ सत्य पहली बार अपनी ऐतिहासिक आकृति ग्रहण कर सके। इसलिए विखंडन आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। यदि वह यहीं रुक जाए, तो वह केवल नकार बनकर रह जाता है; यदि वह सत्य-प्रक्रिया की ओर बढ़े, तभी वह अपने ऐतिहासिक प्रयोजन को प्राप्त करता है।

इस बिन्दु पर हमें लेख की विश्लेषण-पद्धति और उसके निष्कर्ष के बीच एक साफ तनाव नज़र आता है।

लेख का सबसे बड़ा योगदान तो यह है कि यह भक्तिकाल की जड़ हो चुकी ऐतिहासिक एकान्विति को तोड़ता है, परन्तु इसकी सबसे बड़ी सीमा यह लगी कि जिस एकान्विति (totalization) का लेख विखंडन करता है, उसी का एक नया रूप इसमें स्वयं निर्मित होने लगता है। वह धीरे-धीरे “ब्राह्मणवाद” के एक ऐसे केंद्रीय संकेतक का रूप ग्रहण कर लेता है जिसके अधीन विविध ऐतिहासिक प्रवाह पुनः एक नए ज्ञान-विन्यास में संगठित होने लगते हैं।

"ब्राह्मणवाद" क्रमशः लकानियन Master Signifier (S1) का स्थान ग्रहण कर लेता है। लगभग प्रत्येक ऐतिहासिक रूपांतरण का अंतिम स्पष्टीकरण । मंदिर, भागवत, गीता, शंकर, तुलसी, रीतिकाल, यहाँ तक कि भक्ति की भाव-संरचना भी उसी के भीतर व्याख्यायित होती है। अर्थात् ब्राह्मणवाद स्वयं विश्लेषण की वस्तु नहीं रहता; वह विश्लेषण की सार्वभौमिक कुंजी बन जाता है। लगभग प्रत्येक ऐतिहासिक परिवर्तन का अंतिम अर्थ उसी के भीतर जाकर स्थिर हो जाता है। यह सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है कि उन प्रक्रियाओं का सत्य क्या है?

यही वह बिन्दु है जिसे जाक लकान विमर्शों का विश्वविद्यालयी विमर्श (University Discourse) में रूपांतरण कहते हैं, जब ज्ञान स्वयं को सत्य का स्थानापन्न मान लेता है और प्रमाता अर्थात् सत्य का धारक-वाहक दृष्टि से ओझल हो जाता है।

हमारा सवाल है कि यदि इतिहास वास्तव में इतना बहुल और बहुकेंद्रीय है, तो क्या उसकी व्याख्या कभी भी किसी एक केंद्रीय संकेतक (central signifier) में समाहित की जा सकती है?

अपनी पद्धति में यह लेख हमें आश्चर्यजनक रूप से जिल देल्यूज़ (Gilles Deluze) की चिंतन पद्धति के अनुरूप दिखाई देता है। यह भक्तिकाल को किसी एक उद्गम, एक केंद्र अथवा एकरेखीय विकासक्रम का परिणाम नहीं मानता। बल्कि उसे संगम साहित्य, बौद्ध-जैन परंपराओं, आलवार-नयनार भक्ति, भागवत, शैव-वैष्णव संप्रदायों, लोकधर्म और उत्तर भारतीय संत परंपरा जैसी अनेक ऐतिहासिक धाराओं के अंतर्ग्रथित विकास के रूप में देखता है।

देल्यूज़ ऐसी बहुकेंद्रीय और गैर-वृक्षीय संरचना को राइज़ोम (Rhizome) कहते हैं। जैसे दूब या अदरक की जड़ें किसी एक तने से नहीं फैलतीं, बल्कि अनेक दिशाओं में बढ़ती हुई लगातार नए संबंध बनाती रहती हैं, उसी प्रकार कुछ ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ भी किसी एक मूल कारण या एक केंद्रीय धुरी से नहीं समझी जा सकतीं। वे परस्पर जुड़ी हुई अनेक गतियों का जाल होती हैं।

कहना न होगा, श्री मिश्र ने भक्तिकाल के अध्ययन में इस पद्धति का अत्यंत सृजनात्मक उपयोग किया है।

पर हमारा मानना है कि हम यदि भक्ति को केवल अनेक ऐतिहासिक धाराओं के संयोग के रूप में देखेंगे तो वह इतिहास की एक जटिल संरचना भर रह जाएगी। और यदि उसे केवल धार्मिक अनुभूति मानेंगे तो इतिहास उससे बाहर चला जाएगा।

देल्यूज़ की पद्धति हमें बहुलता की गति और उसके गैर-केंद्रीय संबंधों को समझने में सहायता करती है; किंतु हमारे लिए प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता। हमारा सवाल है कि क्या बहुलता ही सत्य है? बहुलता के भीतर कौन-सी ऐसी जननिक प्रक्रिया (generic process) सक्रिय है जो इन विविध ऐतिहासिक आकृतियों को एक सत्य-प्रक्रिया (truth process) में जोड़ती है?

भक्ति का सत्य न तो किसी एक संप्रदाय का सत्य है, न किसी जाति का, न किसी धार्मिक पहचान का। वह मनुष्य के अपने सत्य से प्रत्यक्ष संबंध की एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। इसी कारण भक्ति को केवल धार्मिक या सामाजिक इतिहास के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।

ऐलेन बाद्यू की भाषा में कहें तो वह एक ऐसा सार्वभौमिक सत्य है जो किसी निश्चित ऐतिहासिक भुवन में ठोस अपवाद की तरह जन्म लेता है । बाद्यू इसे Universal Concrete Exception (UCE) (सार्वभौमिक ठोस अपवाद) कहते हैं। एक ऐसा सत्य जो भारतीय इतिहास के एक विशिष्ट भुवन में जन्म लेता है, पर जिसकी वैधता उसी भुवन तक सीमित नहीं रहती।

बाद्यू के अनुसार, सत्य एक ऐसी प्रक्रिया है जो किसी विशिष्ट ऐतिहासिक घटना (Event) से जन्म लेती है, पर अपनी स्थानीय उत्पत्ति का अतिक्रमण करके सार्वभौमिक (Universal) हो जाती है। इसी अर्थ में बाद्यू सत्य को UCE कहते हैं जो एक साथ स्थानीय भी होता है और सार्वभौमिक भी; इतिहास की उपज भी होता है और इतिहास के पार जाने वाली संभावना भी।

यहीं पर बाद्यू की Generic Multiplicity (जननिक बहुलता) की अवधारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यह जननिक बहुलता देल्यूज की धारणा के अनुसार वस्तुओं, समुदायों या परंपराओं की बहुलता नहीं है; वह प्रमाताओं की बहुलता है, सत्य प्रक्रिया के धारक-वाहक प्रमाताओं की बहुलता। भक्ति के संदर्भ में जननिक बहुलता उन असमान स्थानीय प्रमाताओं की बहुलता के रूप में दिखाई देती है जिन्हें कोई एक सामाजिक, धार्मिक या सांस्कृतिक गुण समेट नहीं सकता, पर जो एक साझा सत्य-निष्ठा से संबद्ध हैं।

प्रमाता भी इतिहास से बाहर खड़ी कोई आध्यात्मिक सत्ता नहीं होता। वह सत्य की अवस्थिति का ऐतिहासिक स्थल होता है। इतिहास और प्रमाता को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा नहीं किया जा सकता। इतिहास के बिना प्रमाता अमूर्त आध्यात्मवाद बन जाएगा। और प्रमाता के बिना इतिहास केवल ज्ञान-संरचना। भक्ति की वास्तविक समझ इन दोनों की द्वंद्वात्मक एकता में ही संभव है।

मिश्र ने अपने लेख में दास-भक्ति पर विस्तार से विचार किया है और दास्य-भाव के सामाजिक और वैचारिक उपयोग की ओर ठीक ही संकेत किया है।

किन्तु सवाल है कि क्या दास्य-भाव केवल सामाजिक अधीनता का ही रूप है?

भक्ति में दास्य-भाव किसी गुलाम की दासता नहीं, अभिनवगुप्त द्वारा वर्णित भरिततनु के मूल भाव की तरह होता है। भरिततनु इच्छाओं का विसर्जन करके स्वतंत्र होता है । इसके विपरीत उनका भैरव इच्छाओं का विसर्जन नहीं करता, बल्कि किसी अन्य पर निर्भर न रहने के कारण स्वतंत्र रहता है । हम भक्ति में दास्य और स्वातन्त्र्य को परस्पर विरोधी नहीं कहेंगे; वे प्रमातृत्व की दो भिन्न ऐतिहासिक आकृतियाँ हैं। दास्य और भैरव-स्वातन्त्र्य को प्रमातृत्व की दो भिन्न आकृतियों की तरह पढ़ा जा सकता है । एक अपेक्षाओं और निजी इच्छाओं के विसर्जन से निर्मित होता है तो दूसरा किसी अन्य पर निर्भरता के पूर्ण अभाव से ।

अभिनवगुप्त की दृष्टि में तो प्रमाता का स्वभाव ही स्वातन्त्र्य है। इसलिए भैरव की स्वतंत्रता भी किसी नैतिक अनुशासन का फल नहीं, बल्कि प्रमातृत्व का स्वभाव है।

इसीलिये हम कहते हैं कि कबीर, मीरा, नानक, रैदास, नामदेव, आंडाल, लल्लेश्वरी और तुकाराम किसी साझा धार्मिक मत, किसी एक परंपरा के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक ही सत्य-निष्ठा के भिन्न-भिन्न स्थानीय प्रमाता हैं। इनका सत्य किसी संप्रदाय या मत का सत्य नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने सत्य से प्रत्यक्ष संबंध का सत्य है। उनकी भिन्नता उस सत्य का निषेध नहीं करती; बल्कि उसी एक सत्य-निष्ठा की ऐतिहासिक, सार्वभौमिकता का प्रमाण पेश करती है।

हमें इस लेख की सबसे गहरी दार्शनिक सीमा यही लगती है कि इसमें समाज है, जाति है, सत्ता है, ज्ञान है, विचारधारा है, किन्तु प्रमाता कहीं नहीं है। कबीर क्यों बोलते हैं? मीरा का अनुभव क्या है? नानक के भीतर कौन-सी सत्य-निष्ठा कार्य कर रही है? रैदास किस प्रमातृत्व की आकृति प्रस्तुत करते हैं? इन प्रश्नों की ओर लेख का ध्यान बिल्कुल नहीं जाता। यहां वह इतिहास के वस्तुगत पुनर्निर्माण तक ही सीमित रह जाता है।

लेख अनेक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सूत्रों, वर्णव्यवस्था, बौद्ध-जैन परंपराएँ, दक्षिण भारतीय समाज, संगम साहित्य, आलवार, भागवत, मंदिर-आर्थिक संरचना, शंकराचार्य, निर्गुण-सगुण धारा, सबको जोड़ता है पर यह सवाल नहीं करता कि ऐसा कौन-सी सत्य-निष्ठा थी जिसने इन विविध ऐतिहासिक आकृतियों को जन्म दिया?

हमारा प्रस्ताव यह है कि भक्ति का इतिहास इसी प्रश्न से पुनः पढ़ा जाना चाहिए। कबीर, मीरा, नानक, रैदास, नामदेव, आंडाल और तुकाराम एक-दूसरे के प्रतिरूप नहीं हैं। उनके देवता भिन्न हैं, भाषाएँ भिन्न हैं, सामाजिक स्थितियाँ भिन्न हैं, यहाँ तक कि उनके धार्मिक रूपक भी भिन्न हैं। फिर भी वे एक ही सत्य-प्रक्रिया के भिन्न-भिन्न स्थानीय प्रमाता हैं। किसी विशिष्ट सत्य-प्रक्रिया की निष्ठा एक होती है; उसके ऐतिहासिक प्रमाता अनेक होते हैं; उसके धारक-वाहक अनेक होते हैं।

लेख का एक बड़ा निष्कर्ष यह है कि “भक्तिकाल” एक समरूप अवधारणा नहीं है। यह निष्कर्ष बिल्कुल सही है। लेकिन बाद्यू का अगला प्रश्न होगा—यदि यह एकरूप नहीं है, तो इन विविध धाराओं को जोड़ने वाला Generic Truth क्या है? कबीर, मीरा, नानक, तुकाराम, आंडाल, लल्लेश्वरी, नामदेव— इन सबके बीच कौन-सी ऐसी जननिक बहुलता (generic multiplicity) है जो किसी एक धर्म, जाति, भाषा या संप्रदाय से बड़ी है?

रूसी क्रांति एक स्थानीय ऐतिहासिक घटना थी। वह रूस के विशिष्ट सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में घटी। पर उसके साथ जुड़ा वर्ग-संघर्ष का सत्य रूस तक सीमित नहीं था । चीन, भारत, वियतनाम, क्यूबा, फ्रांस, इटली और लैटिन अमेरिका तक भिन्न-भिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, जातीयताओं और राष्ट्रीयताओं के लोगों ने स्वयं को उसी सत्य से संबद्ध पाया। उन्हें एक जाति, एक भाषा या एक राष्ट्र ने नहीं, बल्कि एक साझा सत्य-निष्ठा ने जोड़ा। यही जननिक बहुलता प्रमाताओं की बहुलता है।

मार्क्सवादी आलोचना स्वयं लंबे समय तक Generic Multiplicity की धारणा को व्यवहार में स्वीकार करती रही है, यद्यपि उसने उसे इस एक नाम से नहीं पहचाना है ।

लेख इस प्रश्न को खुला छोड़ देता है। यदि सत्य प्रक्रिया के वाहक प्रमाता अनेक हैं, तो द्वंद्व भी एकरेखीय नहीं रह जाता। इतिहास वस्तुतः एक ही सत्य प्रक्रिया की अनेक स्थानीय द्वंद्वात्मक आकृतियों का क्षेत्र होता है।

मिश्र का लेख बार-बार दिखाता है कि किस प्रकार भक्ति का उपयोग ब्राह्मणवादी पुनर्गठन के लिए हुआ। इस बात को ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह प्रश्न तो बचा रह ही जाता है कि क्या तुलसी केवल विचारधारा हैं? क्या कबीर केवल प्रतिरोध हैं? क्या मीरा केवल सामाजिक संरचना का परिणाम हैं?

यदि साहित्य का समूचा अर्थ उसकी वैचारिक स्थिति में समा जाए, तो उसकी सौंदर्यात्मक और सत्यात्मक शक्ति कहाँ जाएगी?

कविता कभी केवल विचारधारा नहीं होती। भाषा में हमेशा ऐसा अवशेष रहता है जिसे कोई भी वैचारिक संरचना पूरी तरह आत्मसात नहीं कर सकती। लकान इसे रीयल से जोड़ते हैं। अभिनवगुप्त भी काव्य की शक्ति को उसके प्रत्यक्ष कथन में नहीं, उसके प्रतीयमान अर्थ में देखते हैं। उदाहरण के लिए, तुलसी के पदों में दास्य-भाव के साथ-साथ एक अद्वितीय लयबद्ध सौंदर्य है जो उनके ब्राह्मणवादी पुनर्गठन से अधिक है।

इसलिए कबीर और तुलसी का विचारधारात्मक विश्लेषण आवश्यक है, फिर भी उससे उनकी कविता का सत्य समाप्त नहीं हो जाता। कबीर आज भी बोलते हैं, मीरा आज भी गाती हैं, नानक आज भी सुनाई देते हैं – क्योंकि उनकी कविता केवल उनके समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सत्य-निष्ठा की एक आकृति है। इतिहास हमें बताता है कि वे कब प्रकट हुए; कविता दिखाती है कि वह सत्य क्या था जिसके वे वाहक बने। वह सत्य किसी संप्रदाय या जाति का नहीं, बल्कि जैसा कि हमने पहले ही कहा है, मनुष्य के अपने सत्य से प्रत्यक्ष संबंध का है – और कविता उस संबंध की ऐतिहासिक आकृति मात्र नहीं, स्वयं वह संबंध है, अपने काव्य-रूप में।

इस लेख में एक अन्य महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक आयाम भी अछूता रह गया है। यह वैसे तो दक्षिण भारत से उत्तर भारत तक की यात्रा का विस्तृत पुनर्निर्माण करता है, पर इस्लाम के आगमन को लगभग केवल बाहरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के रूप में छोड़ देता है।

जबकि, इसके विपरीत, हम जानते हैं कि हिन्दी साहित्य के पारंपरिक इतिहासकारों ने भक्ति को इस्लामी आक्रमण की प्रतिक्रिया के रूप में भी प्रस्तुत किया है।

हमारी नज़र में ‘इस्लाम की प्रतिक्रिया’ और ‘इस्लाम की अवहेलना’, ये दोनों दृष्टियाँ ही अधूरी हैं।

भक्ति न तो इस्लाम की प्रतिक्रिया मात्र है, न उससे पूर्णतः स्वतंत्र किसी निर्वात में विकसित हुआ कोई भाव । इस बिन्दु पर कारण (cause) और भुवन (world) का अंतर समझना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। किसी सत्य-प्रक्रिया का कारण और उसका ऐतिहासिक भुवन एक ही वस्तु नहीं होते।

बाद्यू के शब्दों में, सत्य किसी विशेष भुवन में प्रकट अवश्य होता है, पर उसका कारण वह भुवन नहीं होता।

इस्लाम ने भक्ति का सत्य उत्पन्न नहीं किया। किन्तु उसने उस ऐतिहासिक संसार को अवश्य बदल दिया जिसमें भक्ति ने अपने नए रूप ग्रहण किए।

सूफ़ी परंपरा, फ़ारसी सांस्कृतिक उपस्थिति, नगरों का विकास, नई राजनीतिक संरचनाएँ, भाषिक आदान-प्रदान—इन सबने उस ऐतिहासिक विश्व का पुनर्गठन किया था जिसमें कबीर, नानक और दादू जैसे संतों का उदय हुआ।

इस अर्थ में इस्लाम भक्ति का कारण नहीं, पर उसके ऐतिहासिक भुवन का एक निर्णायक घटक जरूर है। यह अंतर कारणवादी इतिहासवाद और सत्य की ऐतिहासिक व्याख्या के बीच का मूलभूत अंतर है।

इन आलोचनाओं के बावजूद मैं मानता हूँ कि इस लेख की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने "भक्तिकाल" को पुनर्विचार के लिए खोल दिया है। हमारा आग्रह केवल इतना है कि अब उसी विखंडित इतिहास के भीतर सक्रिय सत्य-प्रक्रिया और उसके प्रमाताओं को भी पहचाना जाए। इतिहास का विखंडन सत्य-प्रक्रिया का उद्घाटन नहीं करता; वह केवल उस स्थान को निर्मित करता है जहाँ सत्य अपनी ऐतिहासिक आकृति ग्रहण कर सके।

विखंडन इतिहास को खोलता है; पर प्रमाता की अवधारणा उस इतिहास के भीतर सक्रिय सत्य-प्रक्रिया के वाहक को दृश्य बनाती है। तभी भक्ति केवल इतिहास का विषय नहीं रहती, बल्कि सत्य-प्रक्रिया का दार्शनिक विषय भी बन जाती है।

यहीं से हमारा प्रश्न इतिहास के सत्य का नहीं, सत्य के इतिहास का हो जाता है। इतिहास सामाजिक प्रक्रियाओं का पुनर्निर्माण करता है; सत्य का इतिहास उन प्रक्रियाओं में जन्म लेने वाले प्रमाताओं का। अच्युतानंद का आग्रह पहले पर है; हमारा आग्रह दूसरे पर। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक दिशाएँ हैं। वे इतिहास को खोलते हैं, हम उसके भीतर से सत्य के उद्भव की पहचान चाहते हैं। इतिहास का काम है संरचनाओं का विखंडन। दर्शन का काम है उन संरचनाओं के भीतर सक्रिय सत्य-प्रक्रिया का उद्घाटन।

पर यह उद्घाटन किस रूप में होता है? इतिहास अपनी संरचनाओं को विखंडित करके जिस स्थान का निर्माण करता है, वहाँ सत्य अपनी पहली ऐतिहासिक आकृति किस रूप में ग्रहण करता है? हमारा कहना है कि वह आकृति कविता है।

कबीर, मीरा, नानक, रैदास, नामदेव, आंडाल, तुकाराम, लल्लेश्वरी — इनमें से प्रत्येक ने अपने-अपने ऐतिहासिक भुवन में एक ही सत्य-निष्ठा को धारण किया। उनके देवता भिन्न हैं, भाषाएँ भिन्न हैं, सामाजिक स्थितियाँ भिन्न हैं, यहाँ तक कि उनके धार्मिक रूपक भी भिन्न हैं। फिर भी वे एक ही सत्य-प्रक्रिया के भिन्न-भिन्न प्रमाता हैं। पर यह प्रमातृत्व केवल एक वैचारिक स्थिति नहीं है — यह एक काव्यात्मक स्थिति है। अर्थात्, प्रत्येक प्रमाता अपनी निष्ठा को भाषा, लय, प्रतीक और अनुभव की एक अद्वितीय आकृति में प्रस्तुत करता है। वह आकृति ही कविता है।

इसीलिए हम कहते हैं — कविता सत्य-निष्ठा की पहचान नहीं, बल्कि खुद उसकी एक आकृति है।

अर्थात् कविता सत्य का बाहरी प्रतिनिधित्व नहीं; वह उस सत्य-प्रक्रिया की एक अंतःस्थ, ऐतिहासिक और काव्यात्मक आकृति है— अपने ऐतिहासिक शरीर में। जिस प्रकार कोई विचार अपने कथन में आकृति ग्रहण करता है, उसी प्रकार सत्य-निष्ठा अपनी कविता में आकृति ग्रहण करती है। यह आकृति केवल 'शैली' नहीं, केवल 'अलंकार' नहीं, केवल 'भाषा' नहीं — यह सत्य का ठोस सार्वभौमिक (concrete universal) है जो एक स्थानीय प्रमाता के भीतर से प्रकट होता है और अपनी स्थानीयता का अतिक्रमण करके सार्वभौमिक हो जाता है।

इतिहास हमें बताता है कि कबीर, मीरा और नानक कब प्रकट हुए। कविता दिखाती है कि वह सत्य क्या था जिसके वे वाहक बने — और वह सत्य आज भी क्यों सक्रिय है। कबीर की कविता उनकी वैचारिक स्थिति का दस्तावेज़ नहीं है; वह उस सत्य की आकृति है जिसके प्रति कबीर निष्ठावान थे। मीरा का पद उनके सामाजिक संघर्ष का अभिलेख नहीं है; वह उस सत्य का काव्य-शरीर है जिसने उन्हें राजस्थानी रजवाड़े के भीतर से सार्वभौमिक कर दिया। नानक का शबद केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं; वह उस सत्य-निष्ठा की आकृति है जिसने एक पंजाबी व्यापारी-परिवार के पुत्र को पाँच सौ वर्षों तक अरब, ईरान, तिब्बत और भारत में सुनने योग्य बनाए रखा।

यही वह बिन्दु है जहाँ इतिहास और कविता का द्वंद्व समाप्त होता है और उनकी द्वंद्वात्मक एकता प्रकट होती है। इतिहास के बिना कविता अमूर्त स्वप्न बन जाती है; कविता के बिना इतिहास निर्जीव दस्तावेज़। कविता के भीतर ही इतिहास अपनी जीवंतता पाता है; इतिहास के भीतर ही कविता अपना ठोस रूप पाती है। इसलिए भक्ति-सत्य को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि कौन-सी सामाजिक संरचना थी, कौन-सी जाति थी, कौन-सा आर्थिक दबाव था — बल्कि यह भी जानना आवश्यक है कि उन संरचनाओं के भीतर से एक प्रमाता ने अपनी निष्ठा को किस काव्य-आकृति में प्रकट किया।

बाद्यू की भाषा में, कविता वह घटना-निष्ठा (fidelity to the Event) है जो अपनी ऐतिहासिक स्थानीयता को तोड़कर सार्वभौमिक हो जाती है — पर वह सार्वभौमिकता अमूर्त नहीं, बल्कि ठोस है, क्योंकि वह एक निश्चित भाषा, एक निश्चित लय, एक निश्चित अनुभव में अवस्थित है। यही बाद्यू का Universal Concrete Exception है — और कविता उसी का साक्षात रूप है।

यहीं पर हम मिश्र के विखंडन के सबसे गहरे निहितार्थ को पहचानते हैं। यदि उन्होंने "भक्तिकाल" की एकान्विति को विखंडित किया है, तो उस विखंडन का उद्देश्य केवल यह सिद्ध करना नहीं था कि भक्तिकाल एक समरस अवधारणा नहीं है — उसका उद्देश्य वह स्थान निर्मित करना था जहाँ भक्ति-सत्य अपनी वास्तविक आकृतियों में प्रकट हो सके। हम कहेंगे कि वे आकृतियाँ संप्रदाय नहीं, जाति नहीं, मत नहीं — वे कविताएँ हैं। कबीर की कविता, मीरा की कविता, नानक की कविता, रैदास की कविता, आंडाल की कविता, तुकाराम की कविता — ये सब भक्ति-सत्य की उन ऐतिहासिक आकृतियों का नाम है, जिन्हें एक समन्वित 'भक्तिकाल' ने अपने भीतर दबा दिया था।

अतः मिश्र का विखंडन हमें इन आकृतियों को पहचानने का स्थान देता है, किन्तु उन आकृतियों को पहचानने का कार्य अब हमें ही करना है। विखंडन केवल एक विध्वंसक कार्य नहीं; वह एक प्रकटीकरण है — वह उन आकृतियों को उजागर करता है जो एकान्विति के भीतर अदृश्य थीं। अब हमारा काम उन आकृतियों को — उन कविताओं को — पूरी गंभीरता से पढ़ना है, केवल उनके वैचारिक सामग्री के रूप में नहीं, बल्कि सत्य-निष्ठा की ऐतिहासिक आकृतियाँ के रूप में।

अंत में हम पुनः कहेंगे — विखंडन स्वयं विखंडन की माँग करता है, क्योंकि विखंडन का अंतिम उद्देश्य विखंडन नहीं होता। उसका उद्देश्य उस स्थान को निर्मित करना होता है जहाँ सत्य पहली बार अपनी ऐतिहासिक आकृति ग्रहण कर सके। और वह आकृति — जिसके निर्माण के लिए विखंडन स्थान खोलता है — वह कविता है। क्योंकि सत्य अपनी शुद्ध अवस्था में अदृश्य है; वह दृश्य तभी होता है जब कोई प्रमाता उसे अपनी भाषा, अपनी लय, अपने अनुभव में आकृति देता है।

स्लावोय जिज़ेक ने Absolute Recoil में इसी प्रत्यागमन को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की नई नींव के रूप में देखा है। यदि अच्युतानंद मिश्र ने भक्तिकाल के इतिहास को विखंडित किया है, तो उनका यही कार्य हमें उसके भीतर सक्रिय प्रमाताओं और सत्य-प्रक्रियाओं की खोज के लिए प्रेरित करता है। इस अर्थ में प्रत्येक सच्चा विखंडन अपने अतिक्रमण की माँग करता है — वह अतिक्रमण जहाँ इतिहास विखंडित होकर कविता बन जाता है, और कविता अपने भीतर सत्य का उद्घाटन करती है।

यहाँ एक मूल प्रश्न उठता है—कविता क्या है? इस प्रश्न को अधिक ठोस रूप में समझने के लिए डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक “भारतीय सौन्दर्य बोध और तुलसीदास” एक उपयोगी कसौटी प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से इसके पहले लेख, “वैदिक कवियों का सौन्दर्य-बोध”, और तुलसी-संबंधी लेखों के बीच का फर्क उल्लेखनीय है।

“वैदिक कवियों का सौन्दर्य-बोध” में ऋग्वेद किसी स्थिर धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत काव्य-जगत के रूप में उपस्थित होता है। प्राकृतिक शक्तियाँ, श्रम, स्थापत्य, संगीत, प्रेम, दुःख, मृत्यु और सामान्य मनुष्य का अनुभव—सब मिलकर काव्य-सत्य की बहुल आकृतियाँ रचते हैं। कविता यहाँ किसी पूर्वनिर्धारित विचार की पुष्टि नहीं करती; वह जीवन के विविध अनुभवों को एक नए सौन्दर्यात्मक विन्यास में संगठित करती है। इसी अर्थ में यह विवेचन हमें कला की एक खुली, जननिक और बहुल प्रक्रिया का उत्कृष्ट उदाहरण प्रतीत होता है।

इसके विपरीत, तुलसी-संबंधी लेखों में रामविलास शर्मा अनेक स्थानों पर कविता को एक पूर्वनिर्धारित ऐतिहासिक-राजनीतिक प्रतिरूप—विशेषतः सामंतवाद-विरोध और लोकोन्मुख भक्ति—की रोशनी में पढ़ते दिखाई देते हैं। समस्या इतिहास की उपस्थिति नहीं है; कविता इतिहास से बाहर नहीं होती। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इतिहास कविता को खोलने के बजाय उसकी एकमात्र व्याख्यात्मक कुंजी बन जाता है।

हमारा आग्रह “कला कला के लिए” का नहीं, बल्कि “कला सत्य के लिए” का है। सामाजिक और राजनीतिक सत्य निस्संदेह वास्तविक हैं; वर्ग-संघर्ष भी आधुनिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण सत्य-प्रक्रिया है। किन्तु कविता का सत्य किसी सामाजिक सत्य का साधारण अनुवाद नहीं होता। वह भाषा, लय, बिंब, अनुभव और रूप के माध्यम से अपनी स्वतंत्र कलात्मक प्रक्रिया में उद्घाटित होता है।

इसी दृष्टि से हमें रामविलास शर्मा के भीतर दो आलोचनात्मक प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। वैदिक कवियों के विवेचन में वे कविता के भीतर से सत्य की बहुल आकृतियों को उद्घाटित करते हैं; तुलसी के विवेचन में कई बार एक केंद्रीय ऐतिहासिक अर्थ कविता पर आरोपित होता दिखाई देता है। यह अंतर हमारे लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इससे वही प्रश्न अधिक स्पष्ट होकर सामने आता है जिसे हम इस पूरे लेख में उठाना चाहते हैं—कविता विचारधारा से रिक्त नहीं होती, पर उसका सत्य किसी एक विचारधारा में समाप्त भी नहीं हो जाता।

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि कविता को किसी व्यापक ऐतिहासिक प्रतिरूप के भीतर पढ़ने की यह प्रवृत्ति हिन्दी आलोचना में नई नहीं है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी की ऐतिहासिक भूमिका को लोकधर्म तथा वर्णाश्रम-व्यवस्था के पुनर्संतुलन की सामाजिक आवश्यकता के संदर्भ में देखा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्ति के विकास को भारतीय परंपराओं और इस्लाम सहित विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं के ऐतिहासिक संवाद की पृष्ठभूमि में समझने का प्रयास किया। डॉ. रामविलास शर्मा ने इसी ऐतिहासिक पद्धति को आगे बढ़ाते हुए तुलसी की भक्ति को लोकोन्मुख चेतना, वर्गीय अंतर्विरोधों और सामंतवाद-विरोध के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया।

इन तीनों दृष्टियों में पर्याप्त मतभेद हैं, पर उनकी पद्धति में एक साझा प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। कविता का निर्णायक अर्थ उसकी भाषा, लय, बिंब, रस और काव्यात्मक गठन के भीतर नहीं, बल्कि किसी व्यापक ऐतिहासिक, सामाजिक या वैचारिक संरचना में खोजा जाता है। कविता स्वयं सत्य-प्रक्रिया नहीं रह जाती; वह किसी पहले से मान लिए गए ऐतिहासिक सत्य का उदाहरण या प्रमाण बन जाती है। इन तीनों दृष्टियों में कविता के कलात्मक गठन की उपेक्षा समान रूप से नहीं होती; फिर भी उसका निर्णायक अर्थ प्रायः किसी व्यापक ऐतिहासिक, सामाजिक अथवा वैचारिक संरचना से निर्धारित होता दिखाई देता है।

इसी ऐतिहासिक-वैचारिक आग्रह का एक अधिक रूढ़ रूप परवर्ती हिंदी आलोचना की विश्वविद्यालयी परंपरा में दिखाई देता है जो आज भी विभिन्न रूपों में सक्रिय है। केवल उसके केंद्रीय संकेतक (Master Signifier) बदलते रहते हैं—कहीं वर्ग, कहीं जाति, कहीं राष्ट्र, कहीं उपनिवेश, कहीं अस्मिता, कहीं लैंगिकता। पर आलोचना की मूल पद्धति प्रायः वही रहती है: पहले एक व्यापक ऐतिहासिक या वैचारिक ढाँचा निर्धारित किया जाता है, फिर कविता को उसी के भीतर अर्थ दिया जाता है। कविता का अपना सत्य उसकी ऐतिहासिक व्याख्या में विलीन हो जाता है।

हमारा प्रश्न इसी पद्धति की सीमा से संबंधित है। इतिहास कविता की अनिवार्य शर्त है; पर क्या वही उसकी अंतिम व्याख्या भी है? यदि कविता केवल किसी ऐतिहासिक संरचना का लक्षण भर है, तो उसकी सार्वभौमिकता कहाँ से आती है? कबीर, मीरा, नानक, आंडाल, लल्लेश्वरी या तुकाराम आज भी हमें इसलिए नहीं उद्वेलित करते कि वे किसी ऐतिहासिक संरचना के उदाहरण हैं; वे इसलिए जीवित हैं कि उनकी कविता स्वयं एक सत्य-प्रक्रिया की ऐतिहासिक आकृति है। इतिहास उनके उद्भव की व्याख्या करता है; कविता उनके सत्य का उद्घाटन करती है।

लकान के शब्दों में हम पुनः दोहरायेंगे कि यही वह क्षण है जब आलोचना विश्वविद्यालयी विमर्श (University Discourse) का रूप ग्रहण करती है—ज्ञान स्वयं को सत्य का स्थानापन्न मान लेता है और प्रमाता, जो सत्य का वास्तविक धारक-वाहक है, दृष्टि से ओझल हो जाता है।

अंततः हमारा आग्रह केवल इतना है कि साहित्य-विमर्श में प्रमाता को फिर से उसके केंद्रीय स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाए। प्रमाता से हमारा तात्पर्य किसी अकेले व्यक्ति या मनोवैज्ञानिक आत्म से नहीं है। वह उन नई सामाजिक घटनाओं से जन्म लेने वाले सत्य का धारक-वाहक होता है, जो इतिहास के विविध क्षेत्रों में व्यक्ति, समुदाय, आंदोलन, कलात्मक परंपरा अथवा किसी नई सामूहिकता के रूप में प्रकट होता है। वही सत्य के प्रति अपनी निष्ठा के द्वारा इतिहास में एक नये अध्याय का उद्घाटन करता है।

इसीलिए साहित्य का इतिहास केवल कृतियों, प्रवृत्तियों या विचारधाराओं का इतिहास नहीं है; वह उन प्रमाताओं के उदय का इतिहास भी है जिनमें मानवता के नये सत्य पहली बार मूर्त होते हैं। कविता इन प्रमाताओं की केवल अभिव्यक्ति नहीं करती; वह उनके गठन और आत्मपहचान का भी एक ऐतिहासिक स्थल होती है। इसीलिए साहित्य की आलोचना का मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कोई रचना किस वर्ग, जाति, धर्म, राष्ट्र या विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है; बल्कि यह कि वह किस प्रकार के प्रमाता को जन्म देती है, किस सत्य के प्रति उसकी निष्ठा निर्मित करती है, और मानव अस्तित्व की किन नई संभावनाओं को उद्घाटित करती है।

साहित्य का इतिहास केवल ग्रंथों, शैलियों और विचारधाराओं का इतिहास नहीं है; वह उन प्रमाताओं के ऐतिहासिक आविर्भाव का इतिहास भी है जो अपने युग की नई सत्य-घटनाओं के धारक-वाहक बनकर प्रकट होते हैं। ये प्रमाता केवल व्यक्ति नहीं होते; वे समुदाय, आंदोलन, कलात्मक परंपराएँ और नई सामाजिक सामूहिकताएँ भी हो सकते हैं। साहित्य इन्हीं प्रमाताओं की आत्मचेतना का एक विशेष क्षेत्र है, जहाँ सत्य पहली बार भाषा, रूप, संवेदना और कल्पना के माध्यम से अपना ऐतिहासिक शरीर ग्रहण करता है।

इसलिए साहित्य की आलोचना का मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कोई रचना किस विचारधारा, वर्ग, जाति, धर्म या राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। उसका मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि वह किस प्रकार के प्रमाता के आविर्भाव का स्थल बनती है, किस सत्य के प्रति निष्ठा का निर्माण करती है, और मनुष्य के अस्तित्व की किन नई संभावनाओं को उद्घाटित करती है। साहित्य के केंद्र में प्रमाता की पुनः प्रतिष्ठा का अर्थ इसी प्रश्न को आलोचना के केंद्र में स्थापित करना है।

सत्य-घटना प्रमाता का आविर्भाव करती है; साहित्य उस प्रमाता के गठन, आत्मपहचान और ऐतिहासिक प्रकाशन का विशिष्ट क्षेत्र बनता है। विखंडन का उद्देश्य इतिहास का अंत नहीं, उस स्थान का उद्घाटन है जहाँ प्रमाता अपनी सत्य-निष्ठा को कविता की ऐतिहासिक आकृति में मूर्त करता है।






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