−अरुण माहेश्वरी
आज Substack.com पर स्लावोय जिजेक के ब्लाग की टिप्पणी के अंत में इस टिप्पणी से एक बार के लिए आश्चर्यचकित रह गया कि आज की दुनिया के दो सबसे बड़े टैक्नोक्रैट अरबपति “एलोन मस्क और पीटर थीयेल आज के दानुंजियो हैं ।” (Elon Musk and Peter Thiel are today’s D'Annunzios.)
गाब्रिएले दानुंजियो इटली के एक कवि, उपन्यासकार और उग्र राष्ट्रवादी थे। उन्होंने एक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करके 1919 में आज के क्रोएशिया के रियेका (Rijeka) के फ़्यूमे (Fiume) नगर पर कब्ज़ा कर लिया था और अपने 16 महीनों के शासन में उसे अपनी कल्पना के समाज की प्रयोगशाला बनाया था। वहां ऐसा संविधान और प्रशासन लागू किया गया जिसमें कलात्मक और यौन स्वतंत्रता, अराजकतावादी-साम्यवादी आकांक्षाओं तथा सैन्य नेतृत्व का विचित्र मेल था। मुसोलिनी के फ़ासीवाद ने बाद में उसकी राजनीतिक नाटकीयता के कई तत्व अपनाए थे।
जिजेक अपनी टिप्पणी में मस्क और थीयेल को उस प्रकार का एक अराजकतावादी कम्युनिस्ट नहीं कहते। लेकिन वे इनके बीच तुलना का सूत्र ढूंढते हैं, वह है—अपनी कल्पना से नया संसार रचने और उसी आधार पर उसका नियंता बनने की महत्वाकांक्षा। दानुंजियो की काव्यात्मक कल्पना की जगह मस्क और थीयेल के पास तकनीकी भविष्य की कल्पना है। इनके यहां भी रचना का दुस्साहस अपनी निजी दृष्टि को सबकी नियति बना देने की अधिनायकवादी आकांक्षा में बदल जाता है।
इस चर्चा से हमें अनायास ही अंतोनिओ ग्राम्शी याद आ जाते हैं । ग्राम्शी ने अपने लेख “Americanism and Fordism” में अमेरिकी पूँजीवाद की विशिष्टता बताते हुए कहा था कि वहाँ सामाजिक प्रभुत्व कारखाने से पैदा होता है और उसके संचालन के लिए अपेक्षाकृत कम पेशेवर राजनीतिक तथा वैचारिक मध्यस्थों की आवश्यकता पड़ती है। इसके विपरीत उन्होंने यूरोप में उत्पादन पर आश्रित परजीवी तबकों के बोझ की चर्चा की थी। यहाँ उनका मूल इशारा उत्पादन की नई शक्ति और उससे पैदा होने वाली सामाजिक भूमिका की ओर था । वे अमेरिकी पूंजीपतियों के लिए one man army की तरह के पद का भी प्रयोग करते हैं ।
अब हमारे मन में यह सवाल आता है कि क्या भारत के एक भी बड़े पूँजीपति की कोई दानुंजियो जैसी अपनी मर्जी के नये संसार को बनाने की जिद से तुलना कर सकता है? सवाल है कि अगर नहीं, तो क्यों नहीं?
दरअसल, इसका उत्तर भारतीय पूँजीवाद के विकास के मूल में छिपा है। भारतीय पूंजीवाद की संचय-प्रक्रिया का रत्ती भर भी संबंध किन्हीं मौलिक खोजों, अथवा उत्पादन और जीवन की नई संभावनाएँ खोलने की उपलब्धियों पर नहीं टिका हुआ है। वे सब के सब सरकारी ठेकों, सरकारी संरक्षण में प्राकृतिक संसाधनों की लूट, दलाली, दूसरों के उत्पादों और तकनीकों की नकल तथा राज्य द्वारा संरक्षित बाज़ार पर इजारेदारी पर प्रमुख रूप से टिके रहे हैं। इस अर्थ में यह पूरी तरह से एक परजीवी वर्ग है जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र हैसियत न होने के कारण कोई स्वतंत्र विचार भी नहीं है । सत्ता की चाकरी ही उसकी अनिवार्य नियति है । इनके यहाँ सफलता का निर्णायक सूत्र खोज का जोखिम उठाना नहीं, सत्ता के वरद् हस्त को हासिल करना है।
हम कह सकते हैं कि हमारे यहां के पूंजीपतियों की सबसे बड़ी खोज सत्ता के दरबार के रास्ते की खोज होती है। वे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और श्रमिकों की रचनाशीलता का फल बटोरते हैं; राजनीतिक और धार्मिक प्रचारकों से भविष्य का स्वप्न उधार लेते हैं। जिस पूँजी के विस्तार का रास्ता सिर्फ सत्ता के संरक्षण से ही खुलता हो, उसकी कल्पनाशीलता भी अंततः उसी दरबार की चौहद्दी में चक्कर काटते रहने के लिए अभिशप्त होती है।
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