−अरुण माहेश्वरी
1 नवंबर की रैली सिर्फ एक राजनीतिक रैली नहीं थी । जिन लोगों ने भी यू ट्यूब पर सरे जमीन इस रैली को कवर किया है, उनकी रिपोर्टिंग्स से इसका जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आया वह यही था कि यह एक राजनीतिक दल, या इंडिया गठबंधन नामक कई राजनीतिक दलों के समूह की रैली ही नहीं थी, यह उतनी ही गैर-राजनीतिक जेन जी, नागरिक समाज और आम लोगों की रैली थी ।
बिना इस तथ्य को नोट किए इस रैली का सही मूल्यांकन और इसके राजनीतिक संकेतों का आकलन संभव नहीं है ।
हमने अपने फेसबुक पेज पर इसी तथ्य को रेखांकित करने के लिए ‘न्यूज पिंच’(News Pinch) की एक रिपोर्टिंग साझा की है । वह रिपोर्टिंग बताती है कि कैसे ‘ग़ैर-दलीय’ होना राजनीतिक चेतना से रहित होना नहीं होता है।
राजनीतिक दलों की सदस्यता के बाहर भी लोकतंत्र की रक्षा की तरह के राजनीतिक संकल्प पैदा हुआ करते हैं । वोट चोरी का मसला लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा से जुड़ा मसला है, इसे समझने के लिए राजनीतिक दलों से संबद्धता जरूरी नहीं है ।
यह समय कोकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की मृत्यु का शोक या जश्न मनाने का समय नहीं है । सीजेपी का संबंध जेन जी से है और जेन जी का अस्तित्व राजनीतिक दलों से नहीं, हमारे सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के अतिरिक्त ‘रीयल’ से है । वह अतिरिक्त रीयल जो किसी गिनती में नहीं आता पर हर गिनती को बिखेर देता है ।
आज यदि हम सारी दुनिया में जेन जी के उभार को देखें तो पायेंगे कि यह राजनीति के जगत की एक बिल्कुल नयी पौध की तरह है । उदार जनतंत्र की ही डिजिटल युग की एक नई पीढ़ी । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बराबरी और सत्ता से प्रश्न करने के अधिकार को अपने जीवन की स्वाभाविक शर्त मान कर तैयार हुई एक सर्वथा नई राजनीतिक पीढ़ी । डिजिटल संचार ने इसकी सामुदायिक पहचान, संवाद और संगठन की क्षमताओं को अभूतपूर्व विस्तार दिया है।
यह वह पीढ़ी है जिसने नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका के अलावा केन्या, बुल्गारिया, मंगोलिया से लेकर हंगरी में संसदीय तानाशाही के अवतार विक्टर ऑर्बान, और सर्बिया का अलेक्ज़ांदर वुचिच की सत्ता के परखचे उड़ा दिये । इसी का प्रताप है कि इसराइल की तरह के युद्धखोर कहे जाने वाले समाज में नेतन्याहु जैसा जंगबाज अभी गद्दी के लिए जूझ रहे हैं और अमेरिका में ट्रंप जैसा महा अहंकारी शासक अपनी प्रासंगिकता कायम रखने के लिये कसमसा रहा है । इसी के प्रकोप से फ्रांस, ब्रिटेन सहित लगभग पूरे यूरोप में आग लगी हुई है ।
हम जानते हैं कि हंगरी, सर्बिया, नेपाल और श्रीलंका में युवा भागीदारी तथा परिवर्तन के संगठनात्मक रूप अलग-अलग हैं। पर एक बात साफ है कि इन परिवर्तनों में नई पीढ़ी की निर्णायक और महत्वपूर्ण भागीदारी रही है ।
और, हम आज अपनी आंखों के सामने भारत में मोदी-शाह-आरएसएस की तरह की चरम भ्रष्ट और तानाशाही की पूरी संरचना को उसी युवा जन-प्रतिरोध के आंदोलन की लपटों में झुलसते देख रहे हैं ।
जब हम इस पीढ़ी के सामाजिक उत्स की तलाश करते हैं, निःसंकोच कह सकते हैं कि यह उसी बदनाम ‘उदार लोकतंत्र’ की उपज है जिसके डिजिटल स्वरूप को सामान्य तौर पर पूंजीवाद के चरम मजदूर-विरोधी युग के रूप में चिह्नित किया जाता है । अब ऐसा लगने लगा है कि इसकी डिजिटल तकनीक ने सिर्फ शोषण को नहीं, अब प्रतिरोध को भी एक नई धार और भाषा देना शुरू कर दिया है ।
एक दौर में यदि इसने पूंजीपतियों के औजार के रूप में पुरातनपंथी वाम की विदाई का काम किया तो अब यही नई पीढ़ी का हथियार बन कर सारी दुनिया में दक्षिणपंथ की कब्र खोद रहा है । जो तकनीक अब तक सत्ता की निगरानियों और दमन के हथियार का काम कर रही थी, वही अब नए लोकतांत्रिक राजनीतिक संघर्ष का औजार भी बन रही है ।
कुल मिला कर, हम आज सारे जराग्रस्त पुराने ढांचों के भरभरा कर ढह जाने के साक्षी बन रहे हैं। राष्ट्र, धर्म, जाति, वर्ग आदि की तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक विभाजनों के जड़ खाँचों पर टिकी राजनीति दम तोड़ती दिखाई देने लगी है । आज पीढ़ियों का यह संघर्ष उम्र का नहीं, सत्ता और स्वतंत्रता के संबंध का संघर्ष है।
भारत में ‘वोट चोरी’ के खिलाफ यह लड़ाई आज सभी लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ जेन जी नामक इस नई ऊर्जा से अनूठा संयोग करने की लड़ाई का रूप ले रही है। यह लड़ाई छात्र, मजदूर, किसान, बेरोजगार, अल्पसंख्यक और मध्यवर्ग, सबको एक साझा संघर्ष के लोकतांत्रिक सूत्र से बांध रही है।
इसमें आज हम राहुल गांधी की एक विशिष्ट अवस्थिति को लक्ष्य कर सकते हैं । उनकी भूमिका परंपरागत राजनीतिक संगठनों और उनके बाहर विकसित हुई युवा-नागरिक ऊर्जा के बीच पुल की भूमिका दिखाई देती है ।
भारत की राजनीति की इस ऊर्जा को यदि इसी प्रकार सहेज कर रखा जाता रहे, राजनीति के पुराने आधिभौतिक विश्वासों के मोह की जंजीरों से मुक्त करके राजनीति को राजनीति के रूप में ही ग्रहण करके सामाजिक रूपांतरण की दिशा में बढ़ा जाता रहे, तो हमारा विश्वास है कि आज के भारत को उसके गहरे अवसाद के इन क्षणों से बाहर निकाला जा सकेगा ।
1 नवंबर की रैली में भारत की उसी इच्छा-शक्ति का प्रदर्शन हुआ है जो मोदी-संघ जैसे कुंठित जनों की गिरफ्त से देश को आजाद करके स्वतंत्रता के खुले आकाश में जीने की नई संभावनाओँ का संकेत देती है ।
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