सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

मोदी राहुल का रास्ता साफ करने के लिये ही आए हैं


-अरुण माहेश्वरी

आज वायरवेबसाइट परवाइड एंगलकार्यक्रम में  एक वार्ता सुन रहा था चुनाव जीतने की भाजपा की रणनीति के बारे में इस वार्ता की संयोजिका माया मीरचंदानी और वायरके अन्यतम संस्थापक सिद्धार्थ वर्द्धराजन के साथ एक प्रमुख भागीदार थे प्रशांत झा, जिन्होंने इसी विषय पर अंग्रेज़ी में एक किताब लिखी है -‘How the BJP wins election’

विशेषज्ञता का एक जाना-माना रूप यह भी है कि जो घट जाए, उसकी वैद्यता को प्रमाणित करने के लिये तमाम चीज़ों को इस प्रकार पेश करो कि जैसे जो घटित हुआ वह महज शतरंज का कोई खेल था जिसमें विजेता ने सब सही चालें चली और वह जीत गया ! लेकिन ऐसे पंडित जब विशेषज्ञता की इसी तर्ज़ पर घटित के बजाय आगत के भविष्य-वक़्ता की भूमिका में आते हैं, तब वे हमेशा यथास्थिति के, अर्थात पहले के विजेता के पक्ष में दलील उठाए हुए एक घटिया वक़ील की भूमिका में दिखाई देने लगते हैं

वे विजेता की पहले की जीत की व्याख्या के तर्कों को ही किसी कल्पनाशून्य अध्यापक की सालों की रट की भाँति  विशेषज्ञ की तरह दोहराने लगते हैं और सच कहा जाए तो इसे ही विशेषज्ञता का व्यवसायिक या पेशेवर रूप कहते हैं ऐसे लोग कभी भी किसी नये परिवर्तन के लिये बन रहे संयोग के उन बिंदुओं को नहीं देख सकते हैं जो परिस्थिति की हर बुनावट में हमेशा अदृश्य, एक शून्य तत्व की तरह मौजूद रहते हैं जो यकबयक संयोग के नये बिंदु में पूरे दृश्यपट को उलट-पलट कर सब पर छा जाते हैं ये हमेशा हर परिस्थिति में विकल्पहीनता का राग बजाने वाले सत्ताधारियों के कोरे ढिंढोरची हुआ करते हैं  

वायरकी इस वार्ता में प्रशांत झा हमें पूरी तरह से ऐसे ही एक निर्बीज पेशेवर विश्लेषक की भूमिका में दिखाई दे रहे थे मोदी पहले जीते तो आगे भी वे ही जीतेंगे और राहुल गांधी पहले विफल हुए तो आगे भी विफल ही होंगे ! जैसे जीतना और हारना क्रमश: इन दोनों का कोई अटल प्रारब्ध हो

बहरहाल, ऐसे व्याख्याता हमें या तो बिल्कुल मूर्ख या यथास्थिति के घुटे हुए समर्थक प्रतीत होते हैं  

आज के गुजरात की ज़मीनी रिपोर्टें जिस बात के साफ संकेत दे रही है कि इस बार वहाँ मोदी के परखचे उड़ने वाले हैं, प्रशांत झा अपनी विशेषज्ञ वाली तटस्थ सी मुद्रा में यह कहने में जरा भी संकोच नहीं करते कि गुजरात और हिमाचल में तो भाजपा की स्थिति अच्छी रहेगी ! तटस्थता का, और अपनी दूर-दृष्टि का दिखावा करने के लिये इतना और ज़ोड़ देते हैं कि आगामी साल के कर्नाटक तथा दूसरे राज्यों के चुनाव में उसे मुश्किल हो सकती है !

इस प्रसंग में हमारी यह साफ मान्यता है कि प्रशासन और अर्थनीति के मामले में पूरी से अज्ञ, शुद्ध रूप से लफ़्फ़ाज़ नरेन्द्र मोदी में किसी बेहतरीन राजनीतिज्ञ का एक भी ऐसा गुण नहीं है जो राजनीति में उनकी स्थिति को जरा सा भी स्थायित्व प्रदान कर सकता है ऐसे व्यक्ति का विकल्प तलाशने की ज़रूरत नहीं होती है, वह हमेशा अदने से अदने ईमानदार राजनीतिज्ञ के रूप में मौजूद रहता है  

प्रशांत झा ने भाजपा की जीत का आख्यान लिखा है और इसे ही वे राजनीति का अंतिम सत्य माने हुए हैं लेकिन सच यह है कि नरेन्द्र मोदी के आगमन के घटना चक्र को किसी भी जनतांत्रिक राजनीति की महज एक सामयिक भटकन कहा जा सकता है, जैसे आज अमेरिका का ट्रंप भी है जब कोई समाज एक निश्चित दिशा में बढ़ रहा होता है, उसमें उसकी दिशा की सत्यता की परख के लिये ही इस प्रकार के सामयिक भटकाव स्वाभाविक तौर पर देखने को मिलते हैं ताकि फिर समाज अपनी पूर्व दिशा में और दृढ़ता तथा तेजी के साथ आगे बढ़ सके  


हमें यह साफ दिखाई दे रहा है कि पाँच सालों का मोदी शासन राहुल गांधी के नेतृत्व में भारत में कांग्रेस की सरकार के रास्ते को काफी सुगम बना देगा, जो भारत में अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा स्थायित्व वाली सरकार होगी अभी के भारत की सही दिशा कांग्रेस की ही दिशा है जो किसी भी मतवादी संकीर्णता से मुक्त रह कर इस देश को हर लिहाज से उन्नततर स्तर तक ले जा सकेगी यह कहने में हमें कोई हिचक महसूस नहीं हो रही है  

शनिवार, 7 अक्टूबर 2017

समय जैसा है, उसे ही लिखा जाए (प्रेमचंद की तत्वमीमांसा और लेखक के पुनर्संदर्भीकरण की ज्ञान मीमांसा )

-अरुण माहेश्वरी



उपन्यास सम्राट प्रेमचंद : 1880 में जन्म ; 20वीं सदी के प्रारंभ के साथ लेखन का प्रारंभ ; और 1936 में मृत्यु की लगभग आखिरी घड़ी तक लेखन का एक अविराम सिलसिला। हिंदी के उपन्यास सम्राट।

उपन्यास विधा : अनुभव और यथार्थ का एक दीर्घ और रोचक आख्यान।

प्रेमचंद लिखते हैं : “उपन्यास लेखक को यथासाध्य नये-नये दृश्यों को देखने और नये-नये अनुभवों को प्राप्त करने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने देना चाहिए।“ और साथ ही यह भी कि “ जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिये की जाती है, तो वह ऊंचे पद से गिर जाती है, इसमें संदेह नहीं।“

अर्थात उपन्यास के लिये जो जरूरी है - वह है दृश्य, चित्र। ‘जीवन जैसा है’ के नाना रूपों और मानव चरित्रों के चित्र।

फिर भी, प्रेमचंद आदर्शवाद की बात भी करते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि संसार में बुराई का ही आधिक्य है, इसलिये कोरा यथार्थ-चित्रण आदमी को कमजोर बनायेगा, उसे निराशा से भरेगा। आदमी को कमजोर करना उनका अभीष्ट नहीं हो सकता, इसीलिये वे यथार्थवाद के साथ ही आदर्शवाद को भी जरूरी मानते हैं।

मत का प्रचार न हो, फिर भी आदर्श जरूर हो !

प्रेमचंद की शब्दावली में, यथार्थवाद अंधेरी कोठरी है और अंधेरी कोठरी में काम करते-करते थक चुके आदमी को आदर्शवाद ही स्वच्छ वायु का आनंद देता है। जबकि मतवाद - सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत का प्रचार - साहित्य के दर्जे को गिरा देता है।

यह उस समय की बात है जब आदर्शवाद और मतवाद में ज्यादा भेद नहीं किया जाता था। स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता, समाजवाद और क्रांति, धर्म-निरपेक्षता और भाईचारा - इनमें कौन आदर्शवाद है और कौन कोरा मतवाद - कहना मुश्किल था। फिर भी प्रेमचंद में कोई दुविधा तो थी ही, जिसके चलते उन्होंने आदर्श को जरूरी माना, लेकिन मत के प्रचार को नहीं।

प्रेमचंद के लिखे पाठ को तो कोई बदल नहीं सकता। लेकिन समय बदल जाता है तो पाठक बदल जाता है। बीत रहा हर पल इतिहास में तब्दील होकर नये इतिहास-बोध, पाठ के नये अर्थ को तैयार करता है।
‘मत’ और ‘आदर्श’ को लेकर प्रेमचंद में दुविधा थी, लेकिन आज के पाठक के मन में शायद वैसी दुविधा नहीं है। मतवाद और आदर्शवाद पर्याय दिखाई देते हैं। आदर्शवाद की ओट में चला आरहा मतवादी दुराग्रह अब  और भी साफ है।

ऐसे में,  पुन: उपन्यास के मूल धर्म - ‘समाज जैसा है’ - उसे बिना किसी मुलम्मे के चित्रित करने की बात की जानी चाहिए। पूंजीवादी आदर्श और ‘पूंजीवाद जैसा है’, समाजवादी आदर्श और ‘समाजवादी समाज जैसा रहा है’, क्रांतिकारी आदर्श और ‘क्रांतिकारी पार्टियां जैसी है’, जनतंत्र और ‘जनतांत्रिक व्यवस्था जैसी है’ - इनके बीच चयन में ‘जैसा है’ को चुनने में अब किसी दुविधा का स्थान नहीं हो सकता। इस ‘जैसा है’ के चित्रण के कारण ही तो सारी दुनिया में हर प्रकार की तानाशाही, आततायी सरकारें लेखकों-कलाकारों को जुल्मों का शिकार बनाती है। यही सच इस बात का भी प्रमाण है कि लेखक का इससे बड़ा शायद दूसरा कोई आदर्श नहीं हो सकता।

सचमुच, यह समय ‘मत’ और ‘आदर्श’ के बारे में प्रेमचंद की दुविधा से मुक्ति का समय है।

इस पूरे विषय को ज्ञान और सत्य के बीच के एक सनातन तनाव के विषय के तौर पर भी देखा जा सकता है. एक आदमी सत्य की ओट में झूठ बोल सकता है. यह उसका दुराग्रह होता है जब वह तथ्यात्मक रूप से कही गई एक सही बात में अपनी कामनाओं या वासनाओं को छिपा रहा होता है. इसके विपरीत, दूसरा आदमी किसी उन्माद में, या भूलवश, अपनी इच्छा के विरुद्ध ही, झूठ कहता हुआ भी सच बोल जाता है. यह असल में तथ्यात्मक वस्तुनिष्ठता और आत्मनिष्ठ सत्य का द्वंद्व है. वास्तविकता यह है कि हर कथन में, हर बयान में कुछ खामोश संकेत छिपे होते हैं, जिन्हें आम तौर पर पंक्तियों के बीच के अंतराल और मौन कहा जाता है.

जब तक इन मौन संकेतों की रिक्तताओं को पकड़ा नहीं जाता है, पाठ के झूठ और सच का पूरी तरह से पता नहीं लग सकता है. और, इन्हें पकड़ने का एकमात्र तरीका है कि पाठ को ठोस, वास्तविक जीवन के संदर्भ में स्थापित किया जाए. पाठ में लेखक का सोच ही सब कुछ नहीं होता, जरूरी होता है उस सोच को ऐसे सकारात्मक और नकारात्मक संकेतों की श्रृंखला में उतारना जो इन मौन संकेतों के वास्तविक संदेश का वहन कर सके, पाठकों तक उन्हें सही ढंग से प्रेषित कर सके.

इसीलिये, जब भी आप ‘जैसा है वैसा’ बयान करेंगे, वह कोरा प्रकृतिवाद नहीं होगा. वह सच स्वत: नहीं, आपके जरिये व्यक्त हो रहा है. उससे आप वास्तव में एक ऐसा पूरा परिप्रेक्ष्य पेश कर रहे होते हैं, ताकि आपकी अपनी बातों के मौन संकेतों को भी पढ़ा जा सके. इसके अलावा, जो सच आपके सामने है, वह आपके मार्फत कैसे अभिव्यक्त होता है, उसी से यह भी जाहिर हो जाता है कि खुद आपने उस सच को कैसे ग्रहण किया है. पिछले दिनों अशोक वाजपेयी के बारे में अपने एक लेख में, आश्विच के वद्यस्थल पर खड़े कवि के भावों की अभिव्यक्ति से हमने जितना आश्विच को नहीं देखा, उससे बहुत ज्यादा खुद लेखक के सत्य को देखा था.

ऐसी ढेरों बातें होती हैं, जिन्हें हम अपनी कल्पना में महसूस करके ही उसे सच मानने लगते हैं. इनमें वास्तव में जीवन का वस्तु-सत्य नहीं, हमारी अपनी इच्छा-अनिच्छा बोल रहे होते हैं. इससे उचित-अनुचित का हमारा बोध भी व्याहत होता है. यह बात, सिर्फ लेखक पर नहीं, पाठक पर भी, हर व्यक्ति पर लागू होती है. ऐसे में, आम बाजारू लेखक, जब वह पाठ के जरिये अपने पाठक के रूबरू होता है, अक्सर वह किंचित निरपेक्ष होकर अपने लिये एक न्यायाधीश की भूमिका अपना लेता है. वह पाठक का मन टटोल कर उसके हित-अहित के बारे में न्याय सुनाने लगता है. यह पाठक के मनोविज्ञान में बैठ कर न्याय-निर्णय देने वाला एक प्रकार का खोजी नजरिया है जो आम तौर पर बाजार में काफी सफल साबित होता है.

तमाम बाजारू लेखन का यह एक मूल सूत्र है. लेकिन सवाल है कि क्या यह नजरिया पाठक का उसके जीवन के सच से साक्षात्कार कराने वाला नजरिया है ? भले यह पाठक का सामयिक तौर पर हित साधे, उसे लुभाये, उसका मनोरंजन भी करें, लेकिन यह उसे उसके सच से परिचित नहीं कराता. यह अन्तत: एक झूठ ही है, किसी झूठे आश्वासन की तरह का झूठ. इसमें पाठक के अपने विचार के अधिकार तक को छीन लिया जाता है. लेखक उसके लिये उसकी पसंद का एक भला-भला सा संसार रच देता है.

इसके विपरीत, पाठ में वस्तुनिष्ठता का दूसरा रास्ता है स्पष्टवादिता का, साहस के साथ सच को कहने का. बात को जीवन के ठोस संदर्भ के साथ स्थापित करने का. जब पाठक सच को जानने पर भी उसे स्वीकारने से इंकार कर रहा होता है, तब पूरी ताकत के साथ सच को रखने की जरूरत होती है. जब कोई जीवन का मजा भी लेगा, लेकिन भान ऐसा करेगा मानो वह यह मजा अपनी मर्जी से नहीं ले रहा, तो ऐसे में जीवन की ठोस सचाई के बयान से उसके छद्म नैतिक-मूल्यों के जंजाल को खत्म करने की जरूरत रहती है.

तथापि, लेखक के लिये, यह स्पष्टवादिता वाला रवैया ही अंतिम नहीं हो सकता है. पाठ का विश्लेषणात्मक विमर्श यदि कभी किसी छल-छद्म पर निर्भर नहीं करता, तो वह किसी भी प्रकार के बल पर भी आश्रित नहीं हो सकता है, भले वह तर्क का बल हो या न्याय-नैतिकता का बल. सबसे बड़ी सचाई यह है कि भाषा के अपने सारे मौन-मुखर संकेत अंतत: खुद में जीवित तर्क होते हैं. भाषा का प्रयोग ही तो किसी बात को रखने के लिये, किसी बात से इंकार करने या किसी बात को मनवाने के लिये किया जाता है. हर बात के अपने दो पहलू होते हैं. एक पक्ष होता है, दूसरा विपक्ष. हर बात को दूसरी बात से काटा जा सकता है. इसप्रकार, कहा जा सकता है कि अनिर्णय एक सर्व-व्यापी सच है.

प्रश्न यही है कि क्या ऐसे में, किसी भी एक धागे में, कथित तौर पर किसी विचारधारा के धागे में पिरो कर सारे विचारों को किसी प्रकार की स्थिरता प्रदान करने की क्या कोई जरूरत है ? जब विचार पहले से ही स्थिर है, एक निश्चित अर्थ का वहन करते हैं, वे खोखर नहीं होते कि उनमें कुछ भी डाला जा सके. तब फिर उन्हें और ज्यादा बांधने की, एक सूत्र में पिरोने की, एक चादर के तले लाने की क्या जरूरत है ? यहीं से शब्द और विचार की शक्ति के बारे में हम एक नये अभिज्ञान को अर्जित कर सकते हैं.

मूल बात यह है कि जो साफ तौर पर गलत है उसके भूल-भुलैय्ये में और ज्यादा भटकने की जरूरत नहीं है. वह हमारे जीवन में अप्रासंगिक है. कोई इसे किसी भी बहाने से, नैतिक या दूसरे कारणों से स्वीकारे या न स्वीकारे. बाबा रामदेव कैंसर का इलाज कर सकता है या योग में सारे ब्रह्मांड का ज्ञान समाया हुआ है, यह झूठ है. ऐसे झूठ को कोई किसी भी बहाने से कितनी बार भी क्यों न कहा जाए, उनकी जांच के भी चक्कर में पड़ने की जरूरत नहीं है. सच कहने के अलावा लेखक के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है, वह किसी को अच्छा लगे, या बुरा लगे; किसी को दुखी करे या सुखी करे. आदमी पाप के बोझ को लाद कर चले ताकि धर्म से उनका उद्धार किया जा सके, यह धर्माधिकारियों के हित का हो सकता है. लेखक का काम इसके ठीक विपरीत है. भले ऐसा करते हुए वह नितांत अलग-थलग और असामाजिक किस्म का किसी भूत जैसा ही क्यों न दिखाई देने लगे. रिल्के ने कहा था कि ‘सुंदरता तो पैशाचिकता का अंतिम आवरण है’. हर नई चीज डरावनी प्रतीत होती है.

इस समझ के साथ आगे बढ़ने पर ही, कहना न होगा, लेखक की अपनी भूमिका, पाठक के साथ उसके संबंध के सारे सवाल एक नई अर्थवत्ता ग्रहण करने लगेंगे. तभी हम, यह संसार जैसा है, वैसा ही उसे पेश करने के रास्ते की श्रेष्ठता को और भी अच्छी तरह से समझ सकेंगे. प्रेमचंद का लेखन इसी प्रकार पूरी उत्कटता से सच को कहने वाला लेखन है ।

'ज़िद्दी धुन' वेबसाइट पर इस प्रेमचंद जयंती (31 जुलाई 2017) पर मनमोहन के एक पुराने लेख को प्रसारित किया गया था । इस लेख में प्रेमचंद की यथार्थ दृष्टि के जरिये नवजागरण की एक समग्र प्रक्रिया में कथित हिंदी नवजागरण की अपनी खास असंगतियों पर सही ढंग से उँगली रखी गई थी । यह मूलत: एक विकासमान यथार्थवादी रचना दृष्टि की सफलता थी । काशी की पारंपरिक शास्त्रीयता से मुक्त दृष्टि की सफलता । लेकिन विचार का एक बड़ा सवाल अब भी असमाधित रह जाता है कि ऐसा क्या था कि अन्यों में यह उत्तरण संभव नहीं हुआ ? कथित सनातनी परंपरा की बेड़ियों को वे काट नहीं पायें जैसा प्रेमचंद में दिखाई पड़ता है ।

यह सवाल इसलिये बनता है क्योंकि हमारे सामने पूरी तरह से औपनिषदिक सोच की ज़मीन से पैदा हुए रवीन्द्रनाथ की भी एक समग्र तस्वीर है ।

सर विलियम जोन्स, एशियाटिक सोसाइटी और भारतीय पौर्वात्यवाद की पूरी मुहिम भी इसी बंगाल से शुरू हुई थी जिसने 11वीं सदी के बाद से 18 वीं सदी तक के काल को भारत का अंधकारपूर्ण मध्ययुग बताया था । विलियम जोन्स ने अपनी इस स्थापना से ब्रिटिश शासन की प्रगतिशीलता की जहाँ एक पृष्ठभूमि तैयार की, वहीं उसने इन सात सौ सालों में संस्कृत के बरक्स विकसित हुई सभी भारतीय भाषाओं को भी नकारने का काम किया । कबीर, रैदास से लेकर दादू, नानक - सिद्धों-नाथों के कामों को भी औघड़ों का काम घोषित कर दिया । यहाँ तक कि अभिनवगुप्त के स्तर की दार्शनिक, भाषाशास्त्री, धर्मशास्त्री, कवि और धर्मगुरु तक को विस्मृत करके शैवागमों की पूरी स्वतंत्र परंपरा को वेदान्ती परंपरा से खारिज कर दिया गया । एस एन दासगुप्त और देवी प्रसाद चटर्जी के स्तर के भारतीय दर्शन के इतिहासकारों में भी यह कमी दिखाई देती है ।

मनमोहन के इस लेख में बिल्कुल सही भक्ति आंदोलन को अन्य कईयों से एक अलग स्थान पर रखा गया है । दरअसल, कबीर यदि भक्ति साहित्य में अलग दिखाई देते हैं तो उसके मूल में अपभ्रंश की मध्यस्थता से तैयार हो रही उनकी खड़ी बोली की भाषा की भी एक भूमिका है ।

रवीन्द्रनाथ भारत के बारे में अंग्रेज़ों के सांस्कृतिक इतिहास के विश्लेषण से काफी पहले ही मुक्त हो गये थे । इसीलिये शास्त्र-ज्ञान उनकी बेड़ी नहीं बना, बल्कि और ऊँची उड़ान का हेतु बन कर सामने आया । हिंदी के काशी के पंडित उसमें फँस कर रह गये । और प्रेमचंद का सौभाग्य था कि वे उस ज़मीन से उठे ही नहीं थे ।

भारतीय नवजागरण और हिंदी नवजागरण के तमाम सांस्कृतिक संदर्भों में प्रेमचंद की यथार्थवादी रचना दृष्टि के अपने तात्विक विकास के इस आख्यान में हिंदी साहित्य के अपने इतिहास से जुड़ा एक और, ज्यादा समसामयिक प्रश्न भी अविवेचित रह गया है कि आख़िर क्यों प्रेमचंद को खास तौर पर आजादी के बाद हिंदी में पुराना पड़ गया माना जाने लगा था और फिर वे कैसे यकबयक सबको बिल्कुल नवीन और ताज़ातरीन दिखाई देने लगे ?

इस सवाल का जवाब हमें प्रेमचंद के अंदर से जितना नहीं मिलेगा, उससे बहुत ज्यादा उनके बाहर से, जीवन के नये संदर्भों से मिलेगा । आजादी और बँटवारे ने गांधी जी के अनुयायी, स्वतंत्रता सेनानी प्रेमचंद के युग का अंत कर दिया था । न सिर्फ अंग्रेज़ चले गये, बल्कि बँटवारे से उनके काल की विकराल हिंदू-मुस्लिम समस्या का एक समाधान हो गया था । यही टिपिकल उत्तर-औपनिवेशिक काल था । ज़मींदारी उन्मूलन और पंचवर्षीय योजनाओं ने प्रेमचंद के समय के कृषि क्षेत्र के भी पुराने अंतर्विरोधों को पीछे धकेल दिया था ।

यह तो इतिहास का एक नया चक्र था जिसमें आजादी के लगभग दो दशक बाद, सन् '67 में राजनीतिक मोहभंग की पहली अभिव्यक्ति हुई, भूमि सुधार के नये संघर्ष, सन् '75 के आंतरिक आपातकाल, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के उभार से सांप्रदायिकता की नई चुनौती और सन् '80 के पहले से ही शुरू हो चुके ढाँचागत समायोजन के दौर ने सन् '80 में प्रेमचंद की जन्मशताब्दी के मौक़े पर उन्हें नये संदर्भों में पुनर्जीवित कर दिया ।

यह एक नये राजनीतिक-सामाजिक इतिहास के अंदर से  प्रेमचंद का पुनरोदय था । जिन्होंने उन्हें पुराना मान कर कबाड़खाने में डाल देना चाहा था, वे भी उनके इस नये जन्म से लगभग सकते में थे । साहित्य के नये जनवादी उभार के लिये तो प्रेमचंद उसके संघर्षों की मशाल बन गये, लेकिन प्रयोगवादियों, आधुनिकतावादियों के लिये भी वे कबाड़ख़ाने की चीज नहीं, बल्कि साहित्य के अति मूल्यवान सहेज कर रखने लायक एंटीक बन गये । देखते-देखते प्रेमचंद के सारे पात्रों की फ़ौज भी समाज में चारों ओर दिखाई देने लगी । जिन्हें व्यतीत मान कर आगे की सुध लेने की कल्पनाएँ की जा रही थी, वे साक्षात अपनी मुक्ति की माँग के साथ सामने दिखाई देने लगे और आपको पीछे घसीटने लगे । सन् '36 में ही धरती से रुखसत कर चुके प्रेमचंद इतिहास के इस नये फेरे में नये भारत की लड़ाई के लेखक प्रेमचंद बन गये ।

लेखकों के मूल्याँकन में उनके इस प्रकार के पुनर्संदर्भीकरण की कितनी बड़ी भूमिका होती है, इसे बंगाल में रवीन्द्रनाथ के शताब्दी वर्ष में देखा गया था । कम्युनिस्टों द्वारा कभी बुर्जुआ कवि के रूप में तिरस्कृत रवीन्द्रनाथ का तब प्रगतिशील साहित्य और विचार के सर्वकालिक श्रेष्ठतम प्रतीक के रूप में  पुनर्जन्म हुआ था ।

इसीलिये, इधर मुक्तिबोध शताब्दी के मौक़े पर, जब उनकी जीवन दृष्टि और रचना-विधान को लेकर कई पुराने सवालों को नये सिरे से उठाया जा रहा है, तब सिर्फ उनका झंडा लहराने से शायद ही कुछ हासिल होगा । इतिहास के वर्तमान चरण में उनका पुनर्संदर्भीकरण करने की ज़रूरत है । 'लहक' पत्रिका में अपने लंबे लेख में हमने इसी ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है । लेखक की तात्विकता नये जीवन संदर्भों में, वह ज्ञान मीमांसा का नया संदर्भ भी हो सकता है, कई नये अर्थ देने लगती है और समय के साथ उसे समान रूप से जीवित बनाये रखती है , बशर्ते हम इन नये संदर्भों के फ्रेम में उसे उतार सके। इसमें इतिहासबोध और इतिहासीकृत अध्ययन की बड़ी भूमिका होती है ।

मेरे अनुसार मुक्तिबोध का पुनर्संदर्भीकरण (recontextualisation) वैसे तो सन् '90 के काफी पहले की ही, लेकिन खास तौर पर '90 के बाद की समाजवादोत्तर मार्क्सवादी ज्ञान मीमांसा के नये संदर्भों में ही किया जा सकता है । मुक्तिबोध साहित्य और उसकी समीक्षा के मानदंडों की जिन समस्याओं से जूझते रहे थे, वे इसी संदर्भ में आज बेहद समीचीन और जीवंत दिखाई पड़ते हैं । अन्यथा, तमाम सदीच्छाओं के बावजूद, हम ही उन्हें विस्मृतियों के ढेर में दफ़ना देने के दोषी बनेंगे । राम नाम का जाप करते हुए उनकी शवयात्रा में शामिल हो जायेंगे ।

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

दुविधाओं के पाश में जकड़ दी गयी सीपीएम की त्रासदी

—अरुण माहेश्वरी


आज (3 अक्तूबर 2017) के अखबारों में सीपीआई(एम) के पोलिट ब्यूरो की बैठक के बारे में कुछ खबरें आई हैं । इन खबरों को अगर सच माना जाए तो लगता है जैसे भारतीय वामपंथ की यह प्रमुख पार्टी कुछ ऐसे आत्मगत संकट में फंस गई है जिसमें एक वामपंथी पार्टी की विशिष्ट, अपनी एक निर्विकल्प आंतरिक संरचना के पहलू को वह गंवा चुकी है । सत्ता-संघर्ष, जिसे गुटबाजी भी कहते हैं, बहुमत-अल्पमत का खेल इसे लील ले रहा है और इस आंतरिक विसंगति का परिणाम उसके राजनीतिक कामों की दशा और दिशा को भी बुरी तरह से प्रभावित करने लगा है ।

हमारे सामने यह एक बुनियादी सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या इस पार्टी के इस आत्म-संकट में उसके अंदर की कुछ खास विचारधारात्मक दुविधाओं की भी कोई भूमिका नहीं है ?

सन् '90 के बाद से ही, जब से भारतीय राजनीति में कांग्रेस दल को ठोस चुनौती देते हुए आरएसएस-भाजपा का साफ तौर पर उभार दिखाई देने लगा, सीपीआई(एम) अपने राजनीतिक मत को कांग्रेस और भाजपा, इन दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों के बरक्स परिभाषित करती रही है । यह सन् '75 के आंतरिक आपातकाल और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थिति से गुणात्मक रूप से एक भिन्न स्थिति है । उन दिनों वामपंथ भी एक बराबर की वैकल्पिक शक्ति हुआ करता था । तब कांग्रेस और भाजपा, इन दोनों से समदुरत्व की बात का कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि वामपंथ स्वयं ठोस रूप में एक विकल्प पेश कर पा रहा था । लेकिन जैसे ही, वामपंथ खुद इस रेस से हट गया, या कह सकते हैं पिछड़ गया, उसके लिये शत्रु एक नहीं, दो हो गये । अर्थात वह अपने लक्ष्य की निर्विकल्पता से हट कर एक प्रकार से विकल्पों के पाश में फंस गया । जरूरत यह थी कि जितना जल्द हो, वह इस पाश से मुक्त हो, और अपने निर्विकल्प लक्ष्य को सुनिश्चित करके उस दिशा में बढ़ जाए, लेकिन दुर्भाग्य से यह एक ऐसी फांस है जिससे वह आज तक अपने को मुक्त नहीं कर पाया है । उसके राजनीतिक प्रस्तावों में 'इसे हराओ, उसे कमजोर करो' या 'उसे कमजोर करो, इसे हराओं' की तरह की उलटबांसियो ने प्रमुख स्थान लेना शुरू कर दिया, 'अपने समय के प्रमुख और गौण अन्तर्विरोधों' की तरह के मंत्रों का जाप दिन प्रति दिन तेज होता चला गया, यथार्थ परिस्थिति के पहलू उपेक्षित होते चले गये ।

जाहिर है कि वामपंथ के अपने इस संकट के मूल में यह सचाई काम कर रही है कि वह खुद को सत्ता की दौड़ से अलग कर चुका है और वामपंथ की इस दशा के लिये उसके इतिहास के जिन दो फैसलों ने अहम भूमिका अदा की है वे 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देना और फिर 2005 में यूपीए-1 से समर्थन वापस लेना रहे हैं । इस बात की हमने बार-बार अपने लेखों में चर्चा की है । कहने के लिये इनमें से पहले निर्णय को सीपीएम की भूलों के इतिहास की एक त्रासदी तो दूसरे को एक संपूर्ण प्रहसन कहा जा सकता है ।  दूसरे निर्णय की सारवानता को साधारण आदमी तो समझ ही नहीं पाया, सिर्फ विमूढ़ बना देखता भर रह गया ।

वैसे गहराई से सैद्धांतिक रूप में देखे तो इसे जर्जर सोवियत समाजवादी क्रांतिकारिता की अधोमुखी तात्विकता का क्रमिक प्रगटीकरण कहा जा सकता है ।

इसमें मजे की बात यह है कि इन दोनों मौकों पर ही सीपीएम में इस निस्तेज हो चुकी सोवियत प्रकार की समाजवादी क्रांतिकारिता की कमान संभाले हुए एक ही व्यक्ति रहे — प्रकाश करात, जिनके बहुमत के पाश ने सीपीएम को वस्तुतः आज तक, दो दशकों के अंतराल के बाद भी जकड़ रखा है । चूंकि आज की दुनिया में सोवियत प्रकार की क्रांतिकारिता का कोई निर्विकल्प क्षितिज बचा नहीं है, बल्कि यह किसी विकल्प में भी शामिल नहीं है, इसीलिये इसकी जकड़बंदी का अर्थ अब किसी वामपंथी पार्टी में शुद्ध गुटबाजी के अलावा और कुछ नहीं हो सकता है ।

1990 में सोवियत संघ के पतन के बाद ही सीपीएम ने अपने को सोवियत प्रकार के समाजवाद की, एकदलीय शासन वाली कई विलक्षणताओं से मुक्त कर लिया था । इसके भी बहुत पहले, सन् '78 के सलकिया प्लेनम में जन-क्रांतिकारी पार्टी के लक्ष्य को अपना कर उसने एक नये भारतीय क्रांतिकारी निर्विकल्प की दिशा को खोज लिया  था और '90 के बाद उस दिशा में बढ़ने का उसका रास्ता बिल्कुल साफ हो गया था । लेकिन सन् '96 में देखा गया कि पुराने, अवशिष्ट निम्नमुखी क्रांतिकारी तत्वों ने जनवादी केंद्रीयता की आड़ में पार्टी को आगे बढ़ने देने के बजाय बहुमत के पाश से जकड़ कर रख दिया । तभी से बहुमत के नेतृत्व की सनक से पार्टी के प्रमुख निर्णय लिये जाने लगे । जो सैद्धांतिक तत्व ज्योति बसु वाले फैसले में आड़े आया, यूपीए-1 में शामिल होने के फैसले में आड़े नहीं आया ! यह सनक नहीं तो किस चीज का परिचायक था !

और आज भी यही सिलसिला चल रहा है ।

यह एक संयोग ही था कि पार्टी की पिछली कांग्रेस में बहुमतवादियों की इच्छा के विपरीत सीताराम येचुरी पार्टी के महासचिव बन गये । लेकिन वे आज की परिस्थिति में जिसे न्यूनतम जनतांत्रिक चेतना का व्यक्ति भी सबसे जरूरी समझता है कि मोदी-आरएसएस के फासीवादी शासन के खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनवादी दलों की एकता के लिये काम किया जाए, उस दिशा में निर्द्वंद्व भाव से कभी नहीं बढ़ पाए । इसमें बाधा के तौर पर प्रकाश करात फासीवाद की वर्गीय व्याख्या के मंत्र का जाप करते हुए नित नये विश्लेषणों के साथ हाजिर दिखाई देते हैं और वर्तमान परिस्थिति में पार्टी अपनी भूमिका सही रूप में अदा कर सके उसके रास्ते में रोड़ा बन कर खड़े हो जाते हैं ।

जिस काल में 'सम-दुरत्व' के सिद्धांत की कोई प्रासंगिकता नहीं बची है, उसी समय सीपीएम के बहुमतवादी वर्गीय विश्लेषण के नाम पर, ज्ञान के सोपान के सबसे प्रथम स्तर के अपने मंत्रों का जाप शुरू कर देते हैं । अगर इस प्रकार के मंत्र जाप को ही विचारधारा मान लिया जाए तब आप कह सकते हैं कि वर्गीय विश्लेषण की दृष्टि से कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं है । लेकिन अगर मंत्र जाप कोरे कर्मकांड का निमित्त न बने, बल्कि वाम की अपनी सीमाओं से मुक्ति का एक सोपान बने जो जीवन के बहुविध गतिशील यथार्थ को आत्मसात करने की उसे शक्ति दे सके ताकि वह जनता के जनवाद के अपने लक्ष्य को साध सके, अपनी सारी आत्मगत रूढ़ियों का अंत कर सके, तो बात सिर्फ ऐसे आप्त कथनों तक ही सीमित नहीं रह सकती है ।

कहना न होगा, सीपीएम का बहुमतवादी हिस्सा अभी भी वास्तव में मंत्र जाप, पूजा, धूप, नैवेद्य के कर्मकांडी स्तर पर ही अटका हुआ उन्हें ही अपनी निर्विकल्पता माने हुए है । इसीलिये वह यथार्थ की तरलता को आत्मसात करके उसमें अपने को स्थित करने में असमर्थ साबित हो रहा है । तथाकथित वर्ग-विश्लेषण की अपनी मनोरूढ़ि का शिकार बन कर वह उसी प्रकार किंकर्त्तव्यविमूढ़ है जैसे विकल्पों के पाश से आबद्ध कोई भी जीव हुआ करता है । प्रकाश करात पिछले दिनों मोदी-आरएसएस-भाजपा के बारे में विश्लेषण में जिस प्रकार की दुविधाग्रस्त स्थिति में फंसे हुए बार-बार दिखाई देते रहे हैं, उसकी इसके अलावा दूसरी कोई व्याख्या नहीं हो सकती है ।

6 सितंबर 2016 के 'इंडियन एक्सप्रेस' में उन्होंने इनके बारे में लिखा था — “ आज के भारत में हिंदुत्व की विचारधारा और अंध-राष्ट्रवाद सांप्रदायिक आधार पर लोगों का ध्रुवीकरण कर रहा है और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करता है । धार्मिक अल्पसंख्यकों को दबाने के लिये बर्बर तरीकों का प्रयोग करता है ; भिन्न मत और धर्म-निरपेक्ष बुद्धिजीवियों को राष्ट्र-विरोधी बता कर उनका दमन करता है ।...
“ये तमाम चीजें जहां जनतंत्र और धर्म-निरपेक्षता के लिये खतरा पैदा करती है, वहीं इन्हें खुद में फासीवादी व्यवस्था का घटक नहीं कहा जा सकता है ।“

प्रकाश करात के इस वक्तव्य पर वाम हलकों में ही तब व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी ।

आज वे प्रकाश करात ही, पश्चिम बंगाल में एक सेमिनार के लिये भेजे गये अपने हाल के आलेख में लिखते हैं कि “मोदी शासन और अल्पसंख्यकों तथा बुद्धिजीवियों पर उसके फासीवादी प्रकार के हमलों ने जनतंत्र और धर्म-निरपेक्षता के लिये गंभीर खतरा पैदा कर दिया है । हमें नव-उदारवादी नीतियों और हिंदुत्व की ताकतों के खिलाफ संयुक्त रूप से लड़ने की उचित कार्यनीति अपनानी होगी ।“ (कार्ल मार्क्स के जन्म की  द्विशताब्दी, 'पूंजी' के डेढ़ सौ वर्ष और नवंबर क्रांति की शताब्दी के मौके पर कोलकाता में आयोज्य सेमिनार के लिये प्रकाश करात का आलेख)

'फासीवादी प्रकार के' हमलों का जिक्र करके फिर वही पुरानी 'सम-दुरत्व' की नीति का जाप करते हुए 'उचित कार्यनीति' के विषय को अमूर्त रख कर ही वे मौन हो जाते हैं । उनके पास इस 'उचित कार्यवाही' का कोई ठोस आकार नहीं होता है । सीपीएम के बहुमतवादी क्रांतिकारियों की यही वह दुविधा है, जिसने इस पूरी पार्टी को जकड़ कर पंगु बना कर छोड़ दिया है ।

इसीलिये सीपीआई(एम) के इस पोलिट ब्यूरो की बैठक में 2018 के अप्रैल महीने में होने वाली पार्टी कांग्रेस के लिये प्रस्ताव का कोई सर्व-सम्मत मसौदा तैयार नहीं हो पाया है ।  संभवतः आगामी पार्टी कांग्रेस में इस बार बहस के लिये दो समानांतर प्रस्ताव पेश किये जायेंगे ।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

गोमांस के व्यापार पर इजारेदारी का यह कैसा उपक्रम !

आज बनारस के एक साथी ने लिखा है किअंदाज सही निकला सर, सरकारी गोरक्षा मूवमेंट ने छोटे स्लाटरों से पशु छीनकर बड़ों की ओर मूव करवा दिया उधर के स्लाटरों में गायों की आपूर्ति की स्थति पता नहीं

ये साथी खुद स्वामी करपात्री जी महाराज के एक परम सहयोगी और किसी समय गोरक्षा आंदोलन के  कर्ता-धर्ताओं में एक रहे हैं लेकिन जब आरएसएस के लोगों ने जगन्नाथ पुरी पीठ के शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ का इस्तेमाल करके इस आंदोलन पर क़ब्ज़ा जमा लिया और 1966 की गोपाष्टमी के दिन हज़ारों त्रिशूलधारी साधुओं को लेकर दिल्ली में संसद भवन पर हमला किया उसी समय से करपात्री जी महाराज ने आरएसएस की इस कार्रवाई का खुला विरोध करना शुरू कर दिया था वह भारत में संविधान के केंद्र-स्थल  पर आरएसएस का पहला सीधा हमला था पुलिस को आक्रामक साधुओं पर गोली चलाना पड़ी थी जिसमें कुछ साधू मारे भी गये  

मजे की बात यह है कि जिन शंकराचार्य की पीठ को तब आरएसएस ने अपना मोहरा बनाया था आज उसी पीठ के साथ आरएसएस का छत्तीस का रिश्ता है अभी आरएसएस आज के युग के आशाराम, रामपाल, राम रहीम, बाबा रामदेव आदि की तरह के भोगी बाबाओं को हिंदू धर्म के रक्षकों के रूप में पालता-पोसता है  

करपात्री जी की मृत्यु के बाद भी ये साथी एक ओर जहाँ अपने स्तर पर गोरक्षा के कामों से जुड़े हुए हैं, वहीं इस क्षेत्र में आरएसएस की गतिविधियों पर इनकी तीखी नज़र रहने और स्लाटर हाउस तथा गोमांस के व्यापारियों के साथ संघ के लोगों की साँठ-गाँठ का हमेशा विरोध करने की वजह से संघ वालों ने इन्हें नाना प्रकार से प्रताड़ित भी किया है इसीलिये उनका आग्रह है कि इस टिप्पणी में उनका नाम नहीं जाना चाहिए  

इधर मोदी के सत्ता में आने और गोगुंडों के रूप में गोरक्षकों की भूमिका को देख कर वे इधर अक्सर कहा करते थे कि ये समूची गतिविधियाँ बड़े-बड़े स्लाटर हाउसेस की गोमांस के व्यापार पर पूर्ण इजारेदारी को कायम करने का उपक्रम भर है  

आज योगी सरकार ने सत्ता पर आने के साथ ही ग़ैर-क़ानूनी स्लाटर हाउस पर पाबंदी के नाम पर जो काम शुरू किया है, उसकी दिशा इसी बीच साफ हो गई है अब आगे से गायों को कटने के लिये सिर्फ बड़े-बड़े स्लाटर हाउस को ही भेजा जायेगा वे ही ऐसी गायों की क़ीमतों को अपनी मर्ज़ी से तय करेंगे इसमें अब बाजार के नियम की कोई दखलंदाजी नहीं रहेगी  


कहा जाता है कि आज के भारत में हज़ारों करोड़ रुपये के गोमांस के व्यापार पर इनकी पूरी इजारेदारी है उनकी मर्ज़ी के बिना व्यापार के इस क्षेत्र का एक पत्ता भी नहीं हिलता है  अगर यह सच है तो कहना होगा, धर्म के नाम पर राजनीति का यह कैसा खेल है !