शनिवार, 27 जून 2015

पूरे अमेरिका में समलैंगिक विवाह को वहां के सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानूनी मान्यता और इस राय से जुड़े बुनियादी सवाल





समलैंगिक विवाह के बारे में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने इसी 25 जून को जो फैसला सुनाया है, उससे दुनिया में तहलका मचा हुआ हैं। आज के ‘टेलिग्राफ’ में इस फैसले के कुछ खास अंशों को न्यूयार्क टाइम्स से लेकर प्रकाशित किया गया है। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट की एक न्यायपीठ में बहुमत से लिये गये इस फैसले पर पीठ के कुछ न्यायाधीशों ने अपनी असहमति भी जाहिर की है। ‘टेलिग्राफ’ की रिपोर्ट में दोनों पक्ष की राय के अंशों को शामिल किया गया है।

समलैंगिकता की तरह के आदमी के व्यवहार के जिन पक्षों की कल्पना से ही हमारे अंदर एक प्रकार की जुगुप्सा सी पैदा हो जाती है, जिसे हम अनैतिक, अप्राकृतिक और कभी-कभी तो पशुवत भी मानते रहे हैं, वह आज पश्चिम की दुनिया में एक अत्यंत ज्वलंत और विचारयोग्य सवाल बना हुआ है। अब अमेरिका में लिये गये इस फैसले का और भी व्यापक अन्तरराष्ट्रीय प्रभाव होगा।

आखिर यह मामला क्या है, और इसे स्वीकृति देने के पीछे कौन से तर्क काम कर रहे हैं, उन्हें जानने के लिये ही हमने फैसले के इन अंशों को ध्यान से पढ़ा। इसमें शक नहीं है कि बहुमत की ओर से इस फैसले के पीछे न्याय के हित में जो तर्क दिये गये हैं वे कई मायनों में हमें नये और महत्वपूर्ण भी लगे। हमारे ऐसा लगने के पीछे हो सकता है कि शायद हम इस विषय के अब तक के विमर्श से काफी अपरिचित रहे हैं। आदमी का व्यवहार भी सामाजिक परिस्थितियों और विचारों के विकास के साथ ही परिवर्तनशील है, इस बात को समझते हुए भी विवाह की तरह की संस्थाओं के बारे में हमारे विचार में कुछ खास प्रकार के यौनिक व्यवहार की धारण इतनी बद्धमूल रही है कि उनके इतर कुछ भी सोच-समझ पाना हमारे लिये नामुमकिन सा रहा है।

इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के इन चंद खास अंशों का, जिन्हें ‘टेलिग्राफ’ की रिपोर्ट में शामिल किया गया है, हिंदी में अनुवाद करके हमने उन्हें मित्रों के साथ साझा करना उचित समझा। यह सभी मित्रों के लिये सोच का एक गंभीर और दिलचस्प विषय हो सकता है। हम यहां ‘टेलिग्राफ’ की रिपोर्ट का भी लिंक दे रहे हैं :

बहुमत की राय के अंश

न्यायाधीश एंथनी कैनेडी ने अपनी खनकती भाषा में कहा है कि ‘‘समलैंगिक युग्म विवाह का सम्मान करते हैं और ‘‘कानून की नजरों में समान मर्यादा की मांग’’ कर रहे हैं। संविधान के द्वारा उन्हें यह अधिकार प्रदान किया जाता है।

‘‘विवाह से अधिक गहरा कोई मेल-बंधन नहीं होता है, क्योंकि इसमें प्रेम, आस्था, निष्ठा, त्याग और परिवार के सर्वोच्च आदर्श निहित होते हैं। वैवाहिक युगल बन कर दो व्यक्ति जो पहले थे उससे कुछ ऊपर उठ जाते हैं। जैसा कि याचिकर्ताओं ने कहा है, विवाह से ऐसा प्रेम जुड़ा हुआ है जो मृत्यु के बाद भी बना रहता है।

‘‘यह कहना कि ये पुरुष या स्त्री विवाह के विचार का सम्मान नहीं करते, उन्हें गलत समझना है। उनका कहना है कि वे इसका सम्मान करते हैं और इतनी गहराई से सम्मान करते हैं कि वे खुद इसे अपनाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि सभ्यता की सबसे पुरानी संस्थाओं में से एक, इस संस्था से वे बाहर रहे और अकेलेपन में जीने के लिये मजबूर हो। वे कानून की नजरों में समान सम्मान की मांग कर रहे हैं। संविधान उन्हें यह अधिकार प्रदान करता है। ’’

बहस जारी रहे

न्यायमूर्ति कैनेडी ने माना है कि जो लोग दृढ़ता के साथ यह मानते हैं कि विवाह सिर्फ पुरुष और स्त्री के बीच होना चाहिए, वे समलैंगिक विवाह का विरोध करते रहें। उन्होंने लिखा कि यह बहस चलती रहे, लेकिन इन्हें विवाह करने दिया जाए।

‘‘अन्तत:, इसपर बल दिया जाना चाहिए कि धर्म और धर्मानुयायी पूरे आंतरिक विश्वास के साथ कह सकते हैं कि विधि के विधान के अनुसार समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं दी जाए। ...इसके बजाय वे उनके साथ खुली और शोधमूलक बहस कर सकते हैं जो उनसे सहमत नहीं है और जो धार्मिक आस्था या धर्म-निरपेक्ष (secular) विश्वास के आधार पर समलैंगिक विवाह को अनुमति देने को सही, बल्कि जरूरी मानते हैं। लेकिन जिन शर्तों के आधार पर विपरीत लिंग के युग्मों को विवाह करने की अनुमति दी जाती है उन्हीं शर्तों पर समलैंगिक युवकों को विवाह करने से रोकने का अधिकार संविधान राज्य को नहीं दे सकता। ’’

विवाह की प्रशस्ति

न्यायमूर्ति कैनेडी ने विवाह का उल्लेख करते हुए अपने बहुमत के फैसले में नौ बार ‘मर्यादा’ शब्द का प्रयोग किया है और उन्होंने वैवाहिक स्थिति को ‘‘हमारी सबसे गहन आशाओं और आकांक्षाओं के लिये जरूरी ‘इंद्रियातीत स्थिति’ बताया है।

‘‘शुरू से लेकर आज तक के मानव इतिहास के पृष्ठों ने विवाह के इंद्रियातीत महत्व को दर्शाया है। एक पुरुष और एक स्त्री के बीच आजीवन मेल-बंधन ने हमेशा सभी व्यक्तियों के लिये, उनका जीवन कैसा भी क्यों न हो, श्रेष्ठता और मर्यादा की प्रतिश्रुति प्रस्तुत की है।

धर्मानुयायियों के लिये विवाह पवित्र है और जो इसपर सेकुलर नजरिये से सोचते हैं, उनके लिये यह एक अद्भुत सिद्धि है। इसकी शक्ति दो लोगों को एक ऐसे जीवन का संधान देती है जिसे वे अकेले चल कर हासिल नहीं कर सकते थे, क्योंकि विवाह सिर्फ दो व्यक्तियों की तुलना में कहीं ऊंची बात है। आदमी की मूलभूत जरूरतों से उत्पन्न विवाह हमारी सबसे गहन आशाओं और आकांक्षाओं के लिये जरूरी है।’’

मर्यादा

न्यायमूर्ति कैनेडी ने दलील दी है कि 14वें संशोधन में ‘उचित कार्रवाई’ के प्राविधान में व्यक्ति की मर्यादा का प्रश्न एक केंद्रीय प्रश्न है, जिसमें कहा गया है कि राज्य ‘‘किसी भी व्यक्ति को कानून की कार्रवाई के बिना जीवन, स्वतंत्रता या संपत्ति से वंचित नहीं करेगा।’’ वे कहते हैं कि मर्यादा की बात को इस विचार में अंतर्निहित पाया जा सकता है।

नये अधिकार

न्यायमूति कैनेडी ने बताया कि संस्थापकों ने अमेरिका को ‘अधिकारों का विधेयक’ (Bill of Rights) प्रदान किया था, लेकिन ऐसी कोई नियमावली या सूत्र नहीं दिया था जिनके जरिये हमेशा के लिये अंतिम रूप से तय किया जा सके कि क्या है और क्या नहीं है। उनके अनुसार, यह विकासमान है, उसी प्रकार जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि विवाह का अधिकार संविधान द्वारा एक संरक्षित अधिकार है।

‘‘अन्याय की प्रकृति ऐसी है कि उसे हम हमेशा अपने काल में देख नहीं सकते है। जिन पीढि़यों ने ‘अधिकारों का विधेयक’ और 14वां संशोधन लिखा, उन्होंने स्वतंत्रता के सारे रूप और संभावनाओं को पहले ही जान नहीं लिया था, और इसीलिये आगत पीढ़ी को यह दायित्व दिया कि स्वतंत्रता से जो हम समझते हैं, उसका उपभोग करने के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करें। जब कोई नई अन्तदृ‍र्ष्टि संविधान के केंद्रीय संरक्षणों और उसके कानूनी रूपों में फर्क देखती है तो निश्चित रूप से स्वतंत्रता के दावे की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।’’

और प्रतीक्षा नहीं

समलैंगिक विवाह के सवाल को राज्यों पर छोड़ने के तर्क के बारे में न्यायमूर्ति कैनेडी कहते हैं कि ऐसा ‘सतर्कता’ वाला रवैया काम का नहीं है। वे लिखते हैं -‘‘इसकी तत्काल जरूरत है। सिर्फ ऐप्रिल द बोएर और जेन राउस की तरह के याचनाकर्ताओं के लिये नहीं, जो अपने बच्चों के लिये संरक्षण चाहते हैं। उनका जीवन तथा उनके बच्चों का शैशव जल्द ही पूरा हो जायेगा।’’

हमारी संवैधानिक व्यवस्था की शक्ति यह है कि व्यक्ति को अपने मूलभूत अधिकार को पाने के लिए कानून की कार्रवाई की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है। आहत व्यक्तियों के लिये राष्ट्र की अदालतों के दरवाजे खुले हैं। ...किसी भी व्यक्ति का नुकसान होने पर वह संविधान के संरक्षण का अधिकारी है, ज्यादा लोग भले ही उससे असहमत हो और भले ही विधायिका कोई कदम उठाने से इंकार कर दे। संविधान का विचार ही ‘‘कुछ विषयों को राजनीतिक विवाद के दायरे के बाहर, बहुमत और अधिकारियों की पहुंच से दूर रखना है और उन्हें अदालतों द्वारा अमल के कानूनी सिद्धांतों के रूप में स्थापित करना है।’’

भिन्न मत

इससे मतभेद की चार बातों में से एक में, जिसे मुख्य न्यायाधीश जॉन जी राबर्ट्स ने व्यक्त किया है और जिससे दो और न्यायाधीश अन्तोनिन स्कालिया तथा क्लारेंस थॉमस ने भी अपनी सहमति जाहिर की है, कहा गया है कि न्याय और प्रेम पर आधारित तर्कों का एक ‘‘अविवादित आकर्षण’’ होने पर भी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किये जाने के बजाय राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

‘‘यह अदालत विधायिका नहीं है। हमारी चिंता का विषय यह नहीं है कि समलैंगिक विवाह एक अच्छा विचार है। संविधान के अन्तर्गत न्यायाधीशों को यह कहने का अधिकार है कि कानून क्या है, न कि कानून क्या होना चाहिए। जिन लोगों ने संविधान को स्वीकृति दी उन्होंने अदालतों को अपनी ‘‘शक्ति या इच्छा के प्रयोग का नहीं, राय देने का अधिकार दिया था।’’

‘‘हम है ही कौन...’’

न्यायमूर्ति राबर्ट्स ने न्यायमूर्ति कैनेडी की इस बात का खंडन किया कि मूलभूत अधिकारों का अभी भी संधान और विकास होना है।

‘‘बहुमत का फैसला कोई कानूनी राय नहीं, मनमर्जी है। इसमें जिस अधिकार की घोषणा की गई है, संविधान में उसका कोई आधार नहीं है और न ही इस अदालत में ऐसा कोई पूर्व-उदाहरण। बहुमत ने खुले आम न्यायिक ‘सतर्कता’ को अस्वीकारा है। खुले आम ‘अन्याय की प्रकृति’ के बारे में अपनी खुद की नई अन्तर्दृष्टि के अनुसार समाज की पुनर्रचना की अपनी इच्छा पर भरोसा रखते हुए मामूली विनम्रता भी नहीं दिखाई है।

‘‘इसके जरिये अदालत ने आधे से ज्यादा राज्यों के विवाह कानूनों को रद्द कर दिया है और लाखों सालों में जिस सामाजिक संस्था ने मानव समाज का आधार तैयार किया, उसे बदल डालने का निर्देश जारी कर दिया है। ...हम अपने को क्या समझ रहे है ?’’

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सोमवार, 11 मई 2015

अतृप्ति का विवेक : शमशेर

अरुण माहेश्वरी


 शमशेर बहादुर सिंह का स्मरण आदमी की अंतहीन दबी हुई इच्छाओं के एक पावन खजाने के स्मरण जैसा है। ‘चुका भी हूं मैं नहीं, कहां किया मैंने प्रेम अभी’ की अतृप्ति का रचनाकार, ‘आज निरीह कल फतहयाब निश्चित’ के आत्म–विश्वास से परिपूर्ण मानवता के भविष्य पर अटूट आस्था वाला सच्चा साम्यवादी, ‘बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही’ कहने वाला यथार्थवादी, और सर्वोपरि जन–जन का हितैषी, एक निश्छल और सहज इंसान – शमशेर की कविताएं इसका यथेष्ट साक्ष्य है।
शमशेर अपनी सादगी के कारण ही प्रपंचों भरी इस दुनिया में सारी जिंदगी अनेक लोगों के लिये एक अबूझ पहेली बने रहे। उनमें घोषित मार्क्सवादी तक शामिल रहे हैं, उत्कट आत्मवादी और ‘सुरुचि–संधानी’ आभिजात्यों की तो बात ही क्या! प्रकृति और मानव के अंतहीन रहस्यों तथा अनगिनत रंगों को विस्मय की फंटी आंखों से देखने की शमशेर की मानव–सुलभ जिज्ञासाओं ने बहुत सारे लोगों को भरमाया है, उन पर ‘रहस्य–साधना’ (डा. रामविलास शर्मा की शब्दावली) के प्रेतों की छाया से आशंकित किया है, जन–मन के कवि को ‘कवियों का कवि’ घोषित करने के लिये उत्साहित किया है। दरअसल खंडित मनुष्यता के आज के समय में शमशेर की तरह का एक पूर्ण इंसान, जिसके लिये मार्क्स के शब्दों में, मानवोचित किसी भी वस्तु से कोई परहेज नहीं था, स्वयं में किसी महा–रहस्य का रूप न ले, तो यही आश्चर्य की बात होती। न अपने जीवन में और न अपनी कविता में ही उन्होंने इस पूर्णता की, स्वप्न और यथार्थ की द्वंद्वात्मक एकता की अवहेलना की, इसीलिये जितना उन्होंने अपने से बाहर के यथार्थ को व्यक्त किया, मन के भीतर की अथाह गहराइयों, वस्तु के अति–यथार्थवादी बिंबों को भी उन्होंने सदा उतना ही महत्व प्रदान किया। प्रेम के दुर्लभ क्षणों की अतिवायवीय और अति मांसल अनभूतियों से लेकर जनजीवन की कठिनतम चुनौतियों और क्रांति की गहरी समस्याओं तक उनके व्यक्तित्व, उनकी कविता और उनकी चिंताओं का सहज विस्तार था और यही सहजता  तथा उनके व्यक्तित्व की दुर्लभ निश्छलता ही उनकी रचनाओं के सौंदर्य का राज थी, दबी हुई इच्छाओं और अतृप्ति की पावनता का स्रोत थी। जो कभी बुरा नहीं सोच सकता, जो अपने अवचेतन की अंतिम तहों तक में शिव और सुंदर की ही कामना करता है और जो सुप्त नहीं, पूरी तरह जागृत मानव है, उसकी रचना कभी बुरी नहीं हो सकती – शमशेर एक ऐसे ही कवि थे।
शमशेर की कविताएं यथार्थ और स्वप्नों के अनेक रंगों वाले निकटस्थ और दूरस्थ परस्पर विलीन होते बिंबों का, मौन और मुखर भावों का एक ऐसा निजी संसार है, रिक्तताओं की ऐसी आकर्षक घाटियां हैं जो पाठक को किसी सम्मोहक इन्द्रजाल की भांति अपनी ओर खींचती तथा गहरे उतारती जाती है। कोरा प्रलाप और अनाप–शनाप की गहरी खाइयों में महीन चेतना की जो रोशनी शमशेर की कविताओं में दिखाई देती है, उसमें कवि नहीं, उसका पाठक भी स्नात हो अनूठी अनुभूतियों की खुमारी में खो जाता है। जैसे पाठ की रिक्तताओं से बोलते अर्थ पात्र की सामर्थ्य  के अनुरूप खुलते खुलते ही खुलते हैं – शमशेर का विलयनशील, मौन बिंबों का महीन और चेतन काव्य भी पाठक से उसकी पात्रता का प्रमाण–पत्र जरूर मांगता है।
देहरादून के एक संपन्न और शिक्षित जाट परिवार में जन्मे शमशेर का जीवन शुरू से नाना कारणों से बड़े उद्देश्यों का एकाकी जीवन रहा। 9 वर्ष की उम्र में ही मां चल बसना, पढ़ाई के समय होस्टल का जीवन, 24 वर्ष की उम्र में सिफर्ी 6 वर्ष साथ निभा कर पत्नी का गुजर जाना और उसके चार वर्ष बाद ही पिता का न रहना। साथ रह गया किताबों का, पत्रिकाओं और कविताओं का। युवा वय में ही ‘माडर्न रिव्यू’,‘रूपाभ’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘नया साहित्य’ तथा रवीन्द्रनाथ, सरोजिनी नायडू, एजरा पाउंड और निराला की कविताओं के रोमांच को वे उम्र की अंतिम घड़ी तक भुला नहीं पाये थे। इसके अलावा पार्टी, उसका कम्यून, साहित्यकारों की संगत, मजलिसें और मार्क्सूवाद।

उर्दू के शहरी और महीन मिजाज को संस्कारों और साधना, दोनों से ही उन्होंने काफी हद तक जज्ब कर लिया था। उर्दू को वे गंगा–जमुना के दोआब वाले उस क्षेत्र की खड़ी बोली का सबसे स्वाभाविक विकास मानते थे और उधर के जन–मानस की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम। उनका कहना था, उर्दू हमारे भावों को जन के साथ अधिक निकटता से प्रकट करती है। (कवियों का कवि शमशेर, रंजना अरगड़े, पृ.210)। यही वजह है कि अपने क्षेत्र के परिवेश को, वहां की जन–संस्कृति को, जनता का कवि बनने की अपनी आस को पूरा करने के लिये ही सारी उम्र वे उर्दू को साधते रहे, लेकिन कवि बने हिंदी के ही। मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूं – उनकी कई आंतरिक इच्छाओं की तरह की एक इच्छा ही रह गयी, सचाई यह है कि उर्दू में तो वे कविता का ककहरा पढ़ते रहे, हिंदी में सचमुच नयी जमीन तोड़ डाली।
शमशेर ने दिल्ली जाकर पेंटिंग की बाकायदा शिक्षा ली थी। उनके चित्रांकन में सफाई थी, रेखाओं में गति और अर्थ भी थे – लेकिन वे चित्रकार नहीं बने। हालांकि, पेंटिंग के प्रशिक्षण ने रंगों के उनके बोध को इतना जागृत कर दिया कि बाद में उनका कोई भी काव्य बिंब रंगविहीन नहीं रहा – हमेशा उनके पसंदीदा रंगों की छाया बिंबों के अनुरूप विलयित रंगों में उनके समूचे सृजन का अभिन्न अंग बनी रही।
बनारस में त्रिलोचन का साथ, इलाहाबाद में इप्टा के लोगों से संपर्क, गालिब, निराला, फैज के अलावा ांस के सुरियलिज्म के आंदोलन, ब्रेतां और उसकी लोक घोषणा, अमेरिकी कवियत्री मैरियम मूर और एडिथ सिट्वेल आदि के प्रभावों से बन रहे शमशेर सन् 45 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनें और मुंबई के पार्टी कम्यून के निवासी। उन्हीं दिनों की कविता है– ‘‘वाम वाम वाम दिशा/समय साम्यवादी/हीन भाव, हीन भाव/मध्यवर्ग का समाज, दीन/किंतु उधर/पथ प्रदर्शिका मशाल/कमकर की मुट्ठी में– किंतु उधर– आगे–आगे जलती चलती है/लाल लाल.../वाम–पक्षवादी है.../समय साम्यवादी।‘‘
12 जुलाई 1944 के दिन रोटियां टंगे लाल झंडों को लिये ग्वालियर के मजदूरों पर रियासती सरकार ने गोलियां चलाई, इधर शमशेर की कविता आई, – ‘‘ये शाम है।‘‘ ‘‘ये शाम है कि/आसमान खेत है पके हुए अनाज का/लपक उठी लहू भरी दर्रातियां– कि आग है:/धुंआ–धुंआ/ सुलग रहा/ग्वालियर के मजदूर का हृदय।.../गरीब के हृदय/टंगे हुए/ कि रोटियां लिये हुए निशान/लाल–लाल/जा रहे /कि चल रहा/लहू भरे ग्वालियर के बाजार में जुलूस/जल रहा/धुआं–धुआं/ग्वालियर के मजदूर का हृदय।‘‘
‘‘बात बोलेगी‘‘ इसी दौर की कविता है। कम्युनिस्टों के अभिवादन पर उनके एक मुक्तक की पंक्तियां हैं:
‘‘यह सलामी दोस्तों को है, मगर मुट्ठियां तनती है दुश्मन के लिए।‘‘
शमशेर सन् 1948 तक ‘‘माया‘‘ के सम्पादक रहे। 1951 के ‘दूसरे सप्तक‘ में प्रयोगवादी समझे जाने वाले कवियों भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंत माथुर, हरिनारायण व्यास, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती के साथ ही शमशेर की बीस रचनाएं प्रकाशित हुई थी। इन रचनाओं के साथ दिये गये अपने वक्तव्य में शमशेर ने लिखा – ‘‘उसको (यानी कि अपने चारों तरफ की जिंदगी को) ठीक–ठाक यानी वैज्ञानिक आधार पर (मेरे नजदीक वह वैज्ञानिक आधार माक्र्सवाद है) समझना और अनुभूति और अपने अनुभव को इसी समझ और जानकारी से सुलझा कर, स्पष्ट करके, पुष्ट करके अपनी कला–भावना को जगाना। यह आधार इस युग के हर सच्चे और ईमानदार कलाकार के लिये जरूरी है।‘‘
शमशेर ने अपने समकालीनों को जैसे देखा, उसमें खुद उनको भी देखा जा सकता है। मुक्तिबोध उनके लिये निराला के बाद सबसे मीनिंगफुल पोइट थे। उनकी बीमारी के दिनों में वे उनकी सेवा कर रहे थे और हर दिन लौट कर एक शेर लिखा करते थे। एक ही मीटर में लिखे गये उन शेरों से अंत में जो पूरी गजल बनी, उस गजल का अंतिम शेर है–
‘‘वो सरमस्तों की महफिल में मुक्तिबोध आया/सियासत जाहिदों की खन्दए–दीवाना हो जाए।
नार्गाजुन ठेठ जनता की ठाठ के अनमोल खजाने जैसे थे। ‘‘बाबा हमारे, अली बाबा/नार्गाजुन बाबा.../बहादुर कविता के जीते–जागते/कभी न हार मानने वाली जनता के/बहादुर तराने/और जिंदा फसाने.../ऐसे खजाने कविता की/झोली में बरसाते/हमारे बाबा अली बाबा/नार्गाजुन बाबा।‘‘
शमशेर की कविताओं में प्रकाशचंद गुप्त, सज्जाद जहीर, आर.डी.भारद्वाज, रजिया सज्जाद जहीर, भुवनेश्वर, प्रभाकर माचवे से लेकर मोहन राकेश, रघुवीर सहाय और अज्ञेय भी आए हैं। अज्ञेय उनके लिये एक महत्वपूर्ण हस्ती थे। उनके पहले संकलन, जगत शंखधर द्वारा संकलित ‘‘चुनी हुई कविताएं‘‘ की अंतिम कविता है– ‘अज्ञेय से‘। सम्पर्क में आये अन्योंं के प्रति एक आंतरिक स्वीकार का जो भाव शमशेर में अक्सर देखने को मिलता है, अज्ञेय के मामले में वे थोड़ा ठहर कर उनके आभिजात्य की वेदनाओं को सहला भर के रह जाते हैं। ‘‘जो नहीं है/जैसे कि सुरुचि/उसका गम क्या?/वह नहीं है।/किससे लड़ना?/रुचि तो है शांति,/स्थिरता,/काल–क्षण में/एक सौंदर्य की/मौन अमरता।/अस्थिर क्यों होना/फिर?/जो है उसे ही क्यों न संजोना?/उसी के क्यों न होना?/जो कि है।‘‘

अज्ञेय जी के ड्राइंग रूम में वान गौग के चित्र को देखकर उन्होंने एक कविता लिखी थी। लेकिन दिलचस्प है मोहन राकेश और रघुवीर सहाय पर उनकी कविताएं। अन्य सभी शमशेर के हमसफर थे, लेकिन मोहन राकेश से उनका वैसा कोई संबंध नहीं था। रंजना अरगड़े को उन्होंने कहा भी था कि ‘‘असल में मोहन राकेश के साथ मेरा बहुत कम परिचय था। वैसे भी मैं संकोची हूं। मैं स्वभाव के कारण कभी उनके यहां गया नहीं।‘‘ फिर भी राकेश उनकी जिज्ञासाओं और आकर्षण के कारण जरूर बने थे। इसका पहला कारण था राकेश की संस्कृत की पृष्ठभूमि और दूसरा सबसे बड़ा कारण था सिर्फ कलम के बूते, बिना किसी नौकरी के सहारे के एक सम्मानित जीवन जीने का उनका माद्दा। राकेश ने अन्यथा उन्हें बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं किया था। राकेश के बारे में उथला होने तक की उनकी गंभीर आपत्ति थी। रंजना को कहा था : राकेश में सोशल कांसियसनेश ज्यादा नहीं थी, ‘‘और अनलेस यू आर इंटरेस्टेड इन द डीपर प्रोबलम्स आफ सोसायटी यू आर नॉट कंप्लीट, आपका ड्रांइग रूम लिटरेचर हो जायेगा।‘‘

राकेश की मौत पर शमशेर ने कविता लिखी : ‘‘मोहन राकेश के साथ एक तटस्थ बातचीत‘‘।
ठहाके लगाने के लिये मशहूर राकेश इतनी जल्दी मौत की ओर क्यों चले गये, शमशेर कविता में इसी प्रश्न को मंथते हैं। कहते हैं, ‘‘मौत कोई सेंटीमेंट की चीज नहीं, कि राकेश उसमें बह गये। वह एक ठोस हस्ती है व्यक्ति के लिये, हर व्यक्ति के लिए।‘‘ और फिर गहरी शंका के साथ पूछ बैठते हैं, ‘‘तुम बहुत अधिक पी गये थे क्या/क्या अब भी जाम तुम्हारे हाथ में है।‘‘
शमशेर आगे राकेश की खूबियों, आधुनिक नाटक को उनके अवदान की चर्चा करते हैं। मृत्यु से, इस लोक से परे एक दूसरे रहस्य लोक से संवाद शमशेर का प्रिय विषय है। राकेश को भी वे इसका निमित्त बनाते हैं। एक–एक करके कितने ही अपनों को गंवा चुके शमशेर के लिये मृत्यु के बाद का लोक डरावना कत्तई नहीं है, लेकिन राकेश से उनकी यही शिकायत रही, ‘‘ओह माडर्न आर्टिस्ट/काश तुम इतने मार्डन न होते/ताकि जिंदा रहते/जिंदा रहते/अभी कुछ और दिन जिंदा रहते।‘‘
मौत का अर्थ सीन से हट जाना भर है, यह शमशेर जानते थे। फिर भी यह बात राकेश पर लागू नहीं की जा सकती थी, इसलिये अफसोस करते है। गुमशुदगी तो शमशेर की चीज थी, राकेश भला क्यों उस ओर चला गया! शमशेर लिखते हैं : मैं/एक गुमशुदगी को प्यार/करता हूं/और तुम उसीकी तरफ चले गये हो/कैसे कहूं कि मुझे तुमसे/ईष्र्या नहीं‘‘
इसके साथ ही शमशेर अपनी गुमशुदगी का राज खोलते हैं और उसी सिलसिले में कुछ ऐसी पंक्तियां कह जाते हैं, जिनसे शमशेर के व्यक्तित्व का मौन जैसे पूरी ऊर्जा के साथ मुखर हो उठता है। जैसे मुक्तिबोध अपनी ‘अंधेरे में‘ कविता की डरावनी दुनिया से जुझते हुए यही सब कुछ नहीं है, ‘‘मुझको जिंदगी–सरहद/सूर्यों के प्रांगण पर भी जाती सी दीखती।‘‘ कह कर अद्भूत दृप्त स्वरों में बोल उठते हैं:
‘‘कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूं
वर्तमान समाज चल नहीं सकता।
पूंजी से जुड़ा हुआ ह्यदय बदल नहीं सकता‘‘
बिल्कुल वैसे ही लहजे में अपनी गुमशुदगी के मृत्यु पार के उस लोक के बारे में शमशेर कहते हैं कि वह ऐसा लोक है :
‘‘जहां यह गंदगी /आज की सियासत की/आज की गंदी कला की/आज के झूठ की/आज के फरेब, आज के पैसे की/आज के वीभत्स शासक और शोषक की/नहीं है।‘‘
वही शमशेर का अपना लोक है जिसमें वे गुमशुदा रहते थे। अपनी सारी अतृप्तियों के साथ भटकते थे। कइयों ने इस कविता से ही शमशेर में गहन मृत्युबोध के तत्व की खोज कर उन्हें अस्तित्ववाद के दोजख में रशीद कर देना चाहा था। लेकिन मृत्यु की यह कितने सुंदर जीवन की उत्कट कामना है, इसे अतृप्ति के विवेक तत्व से ही समझा जा सकता है। शमशेर जानते थे–मृत्यु पार के ऐसे लोक में किसी माडर्निस्ट का मन नहीं बस सकता। इसीलिये विस्मित थे कि फिर राकेश वहां क्यों गये!

इसी सिलसिले में एक और जरूरी बात। रहस्य–संहार के उन्माद में आचार्य शुक्ल ने निगु‍र्णपंथी भक्ति साहित्य की पूरी लोक परंपरा की निंदा की, छायावाद को दुत्कारा और रवीन्द्रनाथ को भी अस्वीकारा। आचार्य से विरासत में मिले इसी फोबिया के चलते परवर्ती समय के प्रगतिशील दक्काकों ने शमशेर, मुक्तिबोध के सफाये की, उन्हें प्रगतिशील साहित्य की धारा से काटने की कम कोशिशें नहीं की। लेकिन इतिहास का न्याय यह है कि आज ‘साहित्यिक गुटबाजियों से दूर’ कविता में की गयी शमशेर की यह प्रार्थना ज्यादा सटीक जान पड़ती है जिसमें वे कहते हैं :
‘‘देवताओं मेरे साहित्य के युग–युग के सुनो/साधनाओं की परमशक्तियों इतना वर दो–(अपने भक्तों की चरण धूलि जो समझो मुझको)/एक क्षण भी मेरा व्यय ऐसों की संगत में न हो।/एक वरदान यही दो जो हो दया मुझ पर/स्वप्न में भी न पड़े ऐसों की छाया मुझ पर।‘‘
आज उनके फिर से सम्यक मूल्यांकन का निवेदन करते हुए उनकी लिखी ‘‘एक प्रभात फेरी‘‘ के गीत के उद्धरण के साथ हम उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित करते हैं :
‘‘फिर वह एक हिल्लौर उठी– गाओ।/वह मजदूर किसानों के स्वर कठिन हठी।/कवि हे, उनमें अपना दय मिलाओ।/उनके मिट्टी के तन में है अधिक आग/है अधिक ताप/उसमें, कवि हे/अपने विरह मिलन के ताप जलाओ।/काट बुर्जुआ भावों की गुमठी को–/गाओ।‘‘




शुक्रवार, 8 मई 2015

रवीन्द्रनाथ की आध्यात्म-आधारित विश्व-दृष्टि



अरुण माहेश्वरी

यह रवीन्द्रनाथ के जन्म का 150वां वर्ष है। सांस्कृतिक रूप में सजग भारत के किसी भी व्यक्ति को रवीन्द्रनाथ ने आकर्षित न किया हो, ऐसा संभव नहीं है। ऊपर से, यदि आप बंगाल के निवासी है तो रवीन्द्रनाथ की उपस्थिति का अहसास निश्चत तौर पर आप पर बना ही रहेगा। रवीन्द्रनाथ के समूचे व्यक्तित्व पर कोई जितना ही विचार करता है, सबसे पहले उस जीवन और व्यक्तित्व की विशालता और विपुलता का वैभव आश्चर्यचकित करता है। रवीन्द्रनाथ कहीं से ऐसे इंसान नहीं थे जिनमें एक गुलाम देश के नागरिक की किसी भी प्रकार की कुंठा का लेश मात्र मौजूद हो। स्वतंत्रता उनकी कामना नहीं, उनकी नैसर्गिकता थी। तुलसीदास लिखते हैः ‘मति अकुंठ हरि भगति अखंडी’। एक अकुंठ, अखंड और संपूर्ण मानवता को समर्पित रवीन्द्रनाथ के समान विराट वैभवशाली व्यक्तित्व का भारत की तरह के गरीब और गुलाम देश में कैसे निर्माण हुआ, यह किसी के लिये भी विस्मय का विषय हो सकता है।

सात मई 1861 के दिन कोलकाता के प्रसिद्ध ठाकुर परिवार में जन्मे रवीन्द्रनाथ के पूरे जीवन काल को सिर्फ आधुनिक भारत के इतिहास का ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया के इतिहास का एक भारी उथल-पुथल और संक्रमण का काल कहा जा सकता है। तत्कालीन बंगाल में उनके जन्म के पहले ही नवजागरण के युग का प्रारंभ होगया था। योरप के रेनेसांस की तुलना में इस नवजागरण का दायरा बहुत सीमित और प्रभाव काफी मामूली था, लेकिन यह निश्चित तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य की छत्र-छाया में पनप रहे क्षीणकाय पूंजीवाद पर ही आधारित था। 19वीं सदी के मध्य में हमारे देश में ब्रिटिश पूंजी के बल पर पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था की आधारशिला रखी गयी थी। सन् 1853 में भारतीय रेल की स्थापना हुई, 1852 में चाय बागान बनें, 1853 में मुंबई में पहली कपड़ा मिल बनी, 1854 में रानीगंज में पहली कोयला खदान शुरू हुई, 1855 में पहली चटकल की स्थापना की गयी। यह सब ब्रिटिश पूंजी के बल पर हुआ था। 1857 तक हमारे देश के बुद्धिजीवी ब्रिटिश कंपनियों के दलाल, मुसद्दी थे या सरकारी नौकरियां कर रहे थे। बंगाल में अंग्रेजों द्वारा जमीन के इस्तमारी बंदोबस्त से जिस नये जमींदार वर्ग का जन्म हुआ उनमें से अधिकांश इन मुसद्दियों के बीच से आते थे। स्वयं ठाकुर परिवार भी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रवीन्द्रनाथ के दादा प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर सरकारी अमीन भी थे। यह तबका एक ओर जहां नयी-नयी जमींदारियां खरीद रहा था, वहीं अंग्रेज व्यापरियों की तर्ज पर नील कोठी सहित तमाम प्रकार के व्यवसाय-वाणिज्य में लगा हुआ था। उसकी अपनी आर्थिक बुनियाद उतनी मजबूत न होने और इसी वजह से चेतना के स्तर पर भी पिछड़े हुए होने के कारण ही संथाल विद्रोह, सिपाही विद्रोह, नील विद्रोह की तरह के जन-विद्रोहों को किसी प्रकार का नेतृत्व देने में वह वर्ग पूरी तरह से विफल रहा था। उनके जीवन और विचारों में बुद्धि और भक्ति, आध्यात्म और वस्तुवाद तथा सुधार और क्रांति के विचारों की भारी गड्ड-मड्ड स्थिति दिखाई देती है। सुधार की ओट में साम्राज्यवाद और सामंतवाद के साथ एक प्रकार का समझौता करके चलने की मानसिकता ही प्रबल थी।

बहरहाल, जैसे दुनिया के सभी सुधारवादी आंदोलनों की इतिहास में एक विशेष भूमिका रही है, वैसे ही भारतीय इतिहास में भी नवजागरण के उस प्रारंभिक सुधारवादी दौर की भूमिका को छोटा करके नहीं देखा जा सकता है। इसके अलावा, भारत के परंपरागत जड़ीभूत समाज में ब्रिटिश साम्राज्य की लुटेरी किंतु साथ ही एक ठहरे हुए समाज की जड़ों को हिला देने वाली भूमिका ने भी यहां के उदीयमान बुद्धिजीवी समुदाय की मानसिकता को तैयार करने में एक भूमिका अदा की थी। बंगाल और भारतीय नवजागरण के इस दौर के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व राजा राममोहन राय ने जिस आवेग और अध्यवसाय, विद्वता और निष्ठा के साथ भारतीय समाज की तमाम जड़ताओं को चुनौती दी, योरप के बुद्धिवाद की प्रतिष्ठा की और साथ ही स्वतंत्रता और समानता के संघर्ष का सूत्रपात किया, उसने बिल्कुल सही राममोहन को आधुनिक भारत और भारत की राष्ट्रवादी चेतना का प्रवर्त्तक बना दिया। राममोहन राय और उनके साथ जुड़े भारतीय नवजागरण और नवजागरणकालीन तमाम व्यक्तित्वों की अपनी-अपनी लंबी कहानियां हैं। यहां हमारे लिये इतना ही काफी है कि ठाकुर परिवार (रवीन्द्रनाथ के दादा प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर, पिता महर्षी देवेन्द्रनाथ ठाकुर और रवीन्द्रनाथ सहित उनके सभी भाई-बंदों का विशाल परिवार) इस पूरे नवजागरणकालीन विमर्श का एक अभिन्न हिस्सा था। जन्मकाल से ही रवीन्द्रनाथ की मज्जा में इस नवजागरण और राष्ट्रीय विमर्श का रक्त प्रवाहित हो रहा था।

शिवनाथ शास्त्री ने सन् 1856 से 1861 के काल के बारे में लिखा है कि “इस काल को बंग समाज के लिये ‘माहेन्द्रक्षण’ कहा जा सकता है। इस काल में विधवाविवाह का आंदोलन, इंडियन म्यूटिनी, नील का हंगामा, हरीश का आविर्भाव, सोमप्रकाश का अभ्युदय, देशी रंगशाला की स्थापना, ईश्वरचंद गुप्त की मृत्यु और मधुसुदन का आविर्भाव, केशवचंद्र सेन के ब्राह्म समाज का प्रवेश और ब्राह्म समाज में नयी शक्ति का संचार इत्यादि तमाम घटनाएं घटी थी। इनमें से प्रत्येक ने बंग समाज को प्रबल रूप में आलोड़ित किया था।...” (‘रामतनु लाहिड़ी उ तत्कालीन बंगसमाज’, पृः 224-225)

एक ओर देवेन्द्रनाथ ठाकुर और केशवचंद्र का हिंदू समाज के कुसंस्कारों के खिलाफ आंदोलन और ब्राह्म धर्म का प्रचार, दूसरी ओर डिरोजियों के ‘यंग बंगाल’ का धर्म के खिलाफ विद्रोह और योरप की संस्कृति और जनवादी चेतना का आंदोलन बंगाल के तत्कालीन शिक्षित समाज में एक नये प्रकार के जागरण और जीवन का संचार कर रहा था। अक्षय कुमार दत्त, देवेन्द्रनाथ ठाकुर, राजनारायण बसु, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, प्यारीचंद मित्र, रामगोपाल घोष, रसिककृष्ण मल्लिक, रेवरेंड कृष्णमोहन, माईकेल मधुसुदन, दीनबंधु मित्र, राजेन्द्रलाल मित्र, और हरीश मुखोपाध्याय की तरह के प्रतिभाशाली और व्यक्तित्वशाली लोगों के उदय ने तत्कालीन जातीय संस्कृति और चरित्र में एक उल्लेखनीय परिवर्तन का सूत्रपात किया।

इसीप्रकार, ‘हिंदू पैट्रियट’, ‘सोमप्रकाश’, और ‘तत्वबोधिनी पत्रिका’ तथा साहित्य के क्षेत्र में माईकेल मधुसुदन और दीनबंधु मित्र की तरह के साहित्यकारों के आविर्भाव ने बांग्ला भाषा और बंग साहित्य में एक नये युग का प्रारंभ किया था। कुल मिला कर यह युग एक राष्ट्र के उदय का युग था। परवर्ती दिनों में क्रमशः राष्ट्रवाद और स्वाभिमान की भावना प्रबल होने लगी थी। रवीन्द्रनाथ अपनी ‘जीवनस्मृति’ में लिखते हैं, “बचपन में मेरे लिये सबसे बड़ा सुयोग यह था कि घर में दिन-रात साहित्य का वातावरण बना रहता था। ...साहित्य और ललित कला में उनके (परिवार के लोगों के) उत्साह की सीमा नहीं थी। वे जैसे सभी कोणों से बंगाल के आधुनिक युग का आह्वान करने की कोशिश  कर रहे थे। वेश-भूषा, कविता-गीतों, चित्रों-नाटकों, धर्म-स्वदेशीपन - प्रत्येक विषय में उनके अंदर एक स्वयंसंपूर्ण जातीयता का विचार जाग गया था। ...बांग्ला में देशभक्ति के गीत और कविताओं का प्रारंभ उन्होंने ही किया था। कितने दिन की तो बात है, गणदादा रचित ‘लज्जित मन से भारतयश का गान कैसे करू’ हिंदू मेले में गाया जाता था।” (जीवनस्मृति: पृः 65)

कुल मिला कर, ठाकुर परिवार एक ऐसा परिवार था जिसने प्राचीन सनातन हिंदू धर्म के खिलाफ संघर्ष शुरू किया था और उसके साथ ही वह आधुनिक युग के आहृान और उसकी रचना के काम में दीवानगी की हद तक लगा हुआ था। इससे बचपन में  ही रवीन्द्रनाथ के मन में धर्म और आध्यात्मिकता, स्वदेशीपन और राष्ट्रीयता, साहित्य और कला साधना  - इन सबके बीज पड़ चुके थे।

सन् 1867 में पहले ‘हिंदू मेला’ का आयोजन हुआ, तब रवीन्द्रनाथ सिर्फ 5 वर्ष के थे। चैत्र संक्रांति के दिन आयोजित किये जाने वाले इस मेले का प्रमुख उद्देश्य जनचित्त में देशभक्ति की भावना का प्रसार था। इस मेले के आयोजन में ठाकुर परिवार की एक प्रमुख भूमिका हुआ करती थी। कोलकाता के पारसी बगान में इस मेले के नवम अधिवेशन में किशोर कवि रवीन्द्रनाथ ने अपनी देशभक्ति की कविता ‘हिंदू मेला का उपहार’ का पाठ किया था जिसे रवीन्द्रनाथ अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में हमेशा याद करते थे। रवीन्द्रनाथ के शब्दों में, ”हमारे घर की सहायता से हिंदू मेला नामके एक मेले की सृष्टि हुई थी। नवगोपाल मित्र महाशय को इस मेले का कर्णधार बनाया गया था। पहली बार भारतवर्ष को स्वदेश मान कर उसके प्रति भक्ति भाव को अर्जित करने की कोशिश हुई थी। मंझले दादा ने तब प्रसिद्ध राष्ट्रीय गीत ‘मिले सभी भारत संतान’ की रचना की थी। ...लार्ड कर्जन के काल में दिल्ली दरबार के बारे में एक लेख लिखा था, लार्ड लिटन के काल में कविता लिखी थी ‘हिंदू मेला का उपहार’- तत्कालीन अंग्रेज गवर्नमेंट विरोध से डरती थी लेकिन चौदह-पंद्रह साल के बाल्य कवि की लेखनी से नहीं डरती थी। ...हिंदू मेला में पेड़ के तले खड़े होकर उसका पाठ किया था।” ‘हिंदू मेला का उपहार’ कविता की कुछ पंक्तियां है:

1
“हिमाद्रि शिखरे शिलासन ’परि/गान व्यास-ऋषि वीणा हाते करि-/कांपाये पर्वतशिखर कानन,/कांपाये निहार शीतल वाय।”
4
झंकारिया वीणा कविवर गाय,/केनोरे भारत केनो तुई, हाय,/आबार हासिस! हासिबार दिन/आछे कि एखोनो एक घोर दुःखे।
(हिम शिखरों की शिलापर बैठ/वीणा थामे व्यास ऋषि गाते हैं-/पर्वतशिखरों का वन कांप उठता है/कांप उठती है बर्फीली शीतल वायु।)
(झंकृत कर वीणा को कविवर गाते हैं,/ क्यों भारत क्यों तू, हाय/फिर हंस रहे हो!/हंसने के दिन /बचे है अबभी इस घनघोर दुख में। )

इसीप्रकार दिल्ली दरबार के बारे में कविता में उस दरबार में शामिल होने वाले देशी राजाओं पर रवीन्द्रनाथ ने जो तीखा व्यंग्य किया था, वह देखते बनता है।

ठाकुर परिवार ने सिर्फ हिंदू मेला ही नहीं, इटली के क्रांतिकारी गुप्त संगठन की तर्ज पर ‘संजीवनी सभा’ नामक एक गुप्त संगठन भी बनाया था जिसे चलाने वाले प्रमुख व्यक्ति थे राजनारायण बसु और ज्योतिरिंद्रनाथ ठाकुर।

रवीन्द्रनाथ एक चिर यायावर थे। अपने लंबे जीवन में देश-विदेश की उन्होंने जितनी यात्राएं की तब बहुत थोड़े लोग ही उतनी यात्राएं कर पाते थे। और, ये सभी यात्राएं किसी सांस्कृतिक मिशन से कम नहीं हुआ करती थी। सिर्फ 17 साल की आयु में 20 सितंबर 1878 के दिन अपनी पहली विलायत यात्रा के पहले उन्होंने अंग्रेजी भाषा और योरोपीय साहित्य का विषद अध्ययन किया। पूरी तरह से ग्रहण न कर पाने के बावजूद दांते, गोथे तक को उनके अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से पढ़ा। कुल मिला कर इस समूची तैयारी का प्रभाव उनके मानस के विस्तार और खुलेपन के रूप में सामने आया। उनके अंदर की संस्कारगत धार्मिक जड़ता और दूसरे प्रकार की तमाम संकीर्णताएं इस पहली यात्रा से काफी हद तक टूट गयी। अपनी ‘जीवनस्मृति’ में इसपर उन्होंने विस्तार से लिखा है। रवीन्द्रनाथ के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी यात्राओं की बड़ी भारी भूमिका रही।

इन सबके बावजूद यही सच है कि रवीन्द्रनाथ पर सबसे गहरा असर उनके परिवार के धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण का था जिससे वे कभी भी पूरी तरह मुक्त नहीं हो पायें। वे जब सिर्फ 11 वर्ष के थे, तभी उनका उपनयन संस्कार हुआ था। पिता देवेन्द्रनाथ ने इस आयोजन को अपने ढंग से एक अभिनव आयोजन बनाने के लिये ही इसमें ब्राह्म धर्म के उपादानों का प्रयोग किया। आचार्य आनन्दचन्द्र वेदांतवागीश की सलाह पर वैदिक मंत्रों का पाठ किया गया। उस समय गायत्री मंत्र का जो पाठ किया गया था, उसके प्रभाव को रवीन्द्रनाथ सारा जीवन याद किया करते थे। उनके शब्दों में, “उस उम्र में ऐसी बात नहीं है कि मैं समझता था कि गायत्री मंत्र का मायने क्या है, लेकिन आदमी के अंतर में कुछ ऐसा है कि पूरी तरह से न समझने पर भी उसका प्रभाव रहता है। इसीलिये मुझे एक दिन की बात याद आती है जब हमारी पढ़ाई के कमरे में ईंटों से बने फर्श के एक कोने में बैठ कर गायत्री जाप करते करते अनायास ही मेरी दोनों आंखें भर आयी और लगातार जल गिरने लगा। जल क्यों गिर रहा था इसे मैं जरा सा भी समझ नहीं पाया। ...असल बात यह है कि अंतर के अंतःपुर में जो काम चल रहा है बुद्धि के क्षेत्र में हमेशा उसकी खबर नहीं पंहुचती है।” (जीवनस्मृति, पृः 40-43)

न सिर्फ उपनिषदों के मंत्रों पर, बल्कि आदि ब्राह्म समाज के नाना विधि-विधानों और संस्कारों पर काफी लंबे अर्से तक उनकी अंध-श्रद्धा थी। हालांकि परवर्ती दिनों में बुद्धिवाद के तीखे तर्कों ने उन्हें काफी झकझोरा भी। रवीन्द्रनाथ ने अपने अंतिम दिनों में लिखे ‘मानुषेर धर्म’ शीर्षक ग्रंथ में बचपन से ही खुद पर धर्म के प्रभाव के बारे में विस्तार से लिखा है। “हमारा जन्म जिस परिवार में हुआ उस परिवार की धर्म साधना एक खास प्रकार की थी। उपनिषद और पितृदेव के अनुभव, राममोहन और अन्य साधकों की साधना ही हमारी पारिवारिक साधना थी। मैं पिता का छोटा बेटा था। जातकर्म से शुरू करके मेरे सारे संस्कार वैदिक मंत्रों से हुए थे, निश्चित तौर पर ब्राह्ममत के अनुरूप।”

जाहिर है कि रवीन्द्रनाथ के इन गहरे धार्मिक संस्कारों ने उनकी रचनाशीलता को खास आध्यात्मिक रूप दिया, वह हमेशा उनकी कवि सत्ता का अभिन्न अंग बना रहा। वे जब सिर्फ 21 साल के थे तभी उन्होंने ‘प्रभात संगीत’ संकलन की कविताएं लिख ली थी। इन कविताओं की व्याख्या करते हुए खुद रवीन्द्रनाथ ने अपनी सृजनात्मकता के इस आध्यात्मिक पहलू को खुले मन से स्वीकारा है। ‘प्रभात संगीत’ की दूसरी कविता है, ‘निर्झरेर स्वप्नभंग’(निर्झर का स्वप्न-भंग)। इस कविता वे लिखते है कि “एक अभूतपूर्व अद्भुत हृदय-स्फूर्ति के दिन निर्झरेर स्वप्नभंग लिखी गयी थी, लेकिन उस दिन कौन जानता था कि उस कविता में मेरे समस्त काव्य की भूमिका लिखी जा रही है।”(जोर हमारा - अ.मा.)

आजि ऐ प्रभाते रविर कर/केमने पासिलो प्राणेर ‘पर /केमने पासिलो गुहार आंधारे/प्रभात पाखीर गान!/ना जानि केनोरे एतो दिन परे/जागिया उठिलो प्राण!/जागिया उठेछे प्राण, /उरे  उथलि उठेछे बारि,/उरे  प्राणेर वासना प्राणेर आवेग/रूधिया राखिते नारी।

(आज के इस प्रभात काल में सूर्य की किरणें/ प्राणों के भीतर कैसे प्रवेश कर गयीं?/ गुहा के अंधकार में प्रभात-पक्षी का गान कैसे समा गया?/ न जाने, इतने दिनों बाद प्राण क्योंकर जाग उठे हैं?/ प्राण जाग उठे हैं,/ अरे पानी उछल कर उमड़ पड़ा है। / अरे! प्राणों की वेदना, प्राणों के आवेग को रोक रखना संभव नहीं अब!)
प्राणों के इस प्रवाह की गति महा, विषाल समुद्र की ओर थी, “न जाने, आज क्या हुआ कि जाग उठे हैं प्राण/ मानो, कानों में पड़ा हो दूरस्थ महासागर का गान“। इस महासागर की प्रतिमा ही रवीन्द्रनाथ में बाद में विराट पुरुष, महामानव का रूप लेती है। परवर्ती दिनों की रवीन्द्रनाथ की संपूर्ण राजनीतिक चेतना का बीज रूप जैसे इस कविता में दिखाई देता है। गीतांजलि की प्रसिद्ध कविता ‘भारत तीर्थ’ के ‘एई भारतेर महामानवेर सागरतीरे’ के पूरे रूपक के आधार को आध्यात्मिक अखंड विश्व, असीम और अनन्त ब्रह्मांड से जुड़े उनके विस्तृत हृदय, अकुंठ व्यक्तित्व में देखा जा सकता है। भारत की गुलामी की जंजीरों ने उनमें आक्रोश तो पैदा किया लेकिन कभी भी पराजय या किसी प्रकार की कुंठा का भाव पैदा नहीं हुआ।

बुनियादी तौर पर भारतीय आध्यात्म पर आधारित इस उदार और विषाल हृदय की जमीन पर खड़े होकर ही रवीन्द्रनाथ ने अपने वक्त के सभी राजनीतिक और सामाजिक विमर्शों में नितांत मौलिक ढंग से हस्तक्षेप किया। वह विमर्श भले उग्र राष्ट्रवाद की दलीलों को अस्वीकारने का हो या कथित मॉडरेट नेशनलिस्ट राजनीति के खिलाफ विवेक और तर्क के साथ जन-जन को जगाने वाली देशभक्ति की कार्रवाई का हो। बंकिम युग की परिपाटी पर जिस समय प्राचीन हिंदू राजाओं की वीरगाथाएं लिख कर उग्र राष्ट्रवाद का संदेश दिया जा रहा था, उसी समय रवीन्द्रनाथ ने अपनी रचना ‘बउठाकुरानी का हाट’ में राजा प्रतापादित्य को एक नृशंस और अत्याचारी राजा के रूप में पेश किया और बंगाल के जन-जीवन का एक यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया। जिस समय अलबर्ट बिल (1883) की तरह के मुद्दों पर चंद बुद्धिजीवियों को इकट्ठा करके कोरे विरोध प्रस्तावों की ‘एजिटेशनल’ राजनीति की जा रही थी, उस समय ऐसी राजनीति को भिक्षा की राजनीति बता कर फटकारने से भी उन्होंने परहेज नहीं किया। “हमारे देश में पॉलिटिकल एजिटेशन करना भिक्षावृत्ति करने जैसा है।...भिखारी का मंगल नहीं हो सकता, भिखारी जाति का भी मंगल नहीं हो सकता। ...अंग्रेजों से भीख में हमें और सबकुछ मिल सकता है, लेकिन आत्मनिर्भरता नहीं मिल सकती।...सरकार को जगाने के लिये वे जितनी मेहनत कर रहे है, अपने देश के लोगों को जगाने में उतनी मेहनत करने से काफी अधिक सुफल मिलेगा।”

रवीन्द्रनाथ का यह आध्यात्मिक आधार ही था जिसके चलते सारी दुनिया के श्रेष्ठतम मस्तिष्कों से अन्तर्क्रिया करते हुए भी वे पश्चिमी सभ्यता के मोहपाश में कभी नहीं फंसे। 1890 में अपनी दूसरी विलायत यात्रा के बाद पश्चिमी सभ्यता को चुनौती देते हुए वे कहते हैं:“तुमने बहुत जान लिया है, काफी पाया है लेकिन सुख मिला है क्या? हम विश्वसंसार को माया बता कर बैठे हुए हैं और तुम उसे ही ध्रुव सत्य बता कर खट-खट कर मर रहे हो, तुम क्या हमसे ज्यादा सुखी हो गये हो?” इसप्रकार के तमाम सवालों के तीरों से रवीन्द्रनाथ ने अपने लेख ‘नूतन और पुरातन’ में पश्चिमी सभ्यता को बुरी तरह बींधा था। दुनिया भर में योरोपीय जातियों के साम्राज्यों की दुर्दशा पर उनकी यह टिप्पणी बहुत प्रसिद्ध है कि “योरोपीय जाति योरप में जितनी सभ्य, जितनी दयावान, जितनी न्यायपूर्ण है योरप के बाहर उतनी नहीं है। अब तक इसके अनेक प्रमाण मिल चुके हैं।”

सन् 1885 में कांग्रेस की स्थापना होगयी थी। लेकिन रवीन्द्रनाथ में कांग्रेस की प्रारंभिक अनुनय-विनय और शिष्टमंडलों की राजनीति के प्रति जरा भी आकर्षण नहीं था। वे कांग्रेस के मंच की भाषा से कोसों दूर थे। उस समय सुधीन्द्रनाथ ठाकुर ‘साधना’ पत्रिका निकालते थे। रवीन्द्रनाथ ही इस पत्रिका के प्रमुख लेखक और केन्द्रीय आकर्षण थे। इस मंच का प्रयोग उन्होंने खुल कर अपने राजनीतिक विचारों को व्यक्त करने के लिये किया। मॉडरेटों और कांग्रेस के मंच की थोथे वागाडंबर पर टिकी राजनीति पर कटाक्ष करते हुए वे कहते हैं: ”आज पृथ्वी की रणभूमि में हम कौन सा हथियार लेकर खड़े है। सिर्फ भाषण और निवेदन? कौन से कवच पहन कर अपनी आत्म-रक्षा करना चाहते हैं। सिर्फ छद्मवेश? इस तरह कितने दिनों तक काम चलेगा और कितना तो फल मिलेगा।”

और भी गौर करने लायक बात यह है कि रवीन्द्रनाथ की औपनिषदिक शिक्षा उन्हें पुनरुत्थानवाद की ओर नहीं ढकेलती। काफी दबाव के बावजूद वे तिलक के गणपति उत्सव और वीर शिवाजी के मिथक की तर्ज पर किसी देवी-देवता की वंदना के सार्वजनिक उत्सव या बंगाली राजा की वीरगाथा का आख्यान खड़ा नहीं करते। न , ‘गोरक्षणी सभा’ के गोरक्षा की तरह के आंदोलन के प्रति उनकी कोई सहानुभूति थी। इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ की सहानुभूति संथाल विद्रोह और सिपाही विद्रोह के प्रति थी। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को वे काफी पहले से ही समझने लगे थे। और यही वजह है कि वे हमेशा कविता के कल्पनालोक से निकल कर लड़ाई के मैदान में उतर पड़ने के लिये आकुल रहा करते थे। उनकी अमर कविता ‘एबार फेराओ मोरे’ के ये शब्द:
“एबार फेराओ मोरे, लोये जाओ संसारेर तीरे/हे कल्पने रंगमयी। दोलाओ ना समीरे समीरे/तरंगे तरंगे आर, भुलाओ ना मोहिनी मायाय। /विजन विषादघन अन्तरेर निकुंजछायाय/रेखो ना बोसाये आर। ...”
(अब मुझे लौटा कर संसार के तट पर ले आओ/हे कल्पना की रंगमयी। मत झुलाओ हवा हवा में/लहर लहर में, न मोहित करो मोहिनी मायासे। /निर्जन घने विषाद भरे अंतर की लताओं की छाया में/ मत रखो और बैठा कर। ...”)

इसीप्रकार उनका असाधारण ‘आहृान गीत’: “चलो दिवालोक, चलो लोकालये, /चलो जन कोलाहले - /मिसाबो हृदय मानवहृदये/असीम आकाश तले।” (चलो दिवालोक में, लोकालय में/चलो जनकोलाहल में -/मिलाऊंगा हृदय मानव हृदय से/असीम आकाश के तले।)

रवीन्द्रनाथ की लेखनी का यह ‘साधना युग’ इसलिये काफी उल्लेखनीय है कि उस दौरान अपने लेखों के जरिये उन्होंने अपनी खुद की राजनीति की एक साफ रूपरेखा रखी थी। कांग्रेस के साथ उनका मतभेद मुख्यतः इस बात पर था कि उन्हें राजनीतिक विचारधारा के मामले में इंगलैंड और उसकी सौ नियमों से बंधी पार्लियामेंट्री राजनीति स्वीकार्य नहीं थी। योरप के बाहर, भारत सहित हर जगह उन्होंने अंग्रेजों को एक घृणित शोषक और उत्पीड़क के रूप में देखा था। कांग्रेस के लोगों की अंग्रेज भक्ति उन्हें सहन नहीं थी।

फिर भी, रवीन्द्रनाथ को कांग्रेस-विरोधी कहना उचित नहीं होगा। इसीप्रकार, ब्रिटिश साम्राज्य के जघन्य रूप के प्रति गहरी नफरत के बावजूद, इंगलैंड के भी मुट्ठीभर विवेकवान लोगों के प्रति अपनी आंतरिक श्रद्धा व्यक्त करने में भी उन्होंने कभी किसी प्रकार की कृपणता का परिचय नहीं दिया। सिडिशन एक्ट और 1897 में रानाडे हत्या मामले में तिलक की गिरफ्तारी, लार्ड कर्जन का यूनिवर्सिटी बिल (1902), बंगभंग का प्रस्ताव (1905), स्वदेशी आंदोलन, साम्राज्यवादियों का पहला विश्वयुद्ध - इन तमाम मामलों में रवीन्द्रनाथ जनता के जनतांत्रिक अधिकारों के एक प्रबल पक्षधर और भारत की राष्ट्रीय एकता के एक जागरूक प्रहरी के रूप में उभर कर सामने आये थे।

यही वह काल था जब 1901 के अंतिम दिनों में रवीन्द्रनाथ ने शांतिनिकेतन में ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना की। यह रवीन्द्रनाथ के व्यक्तित्च का एक महत्वपूर्ण रचनात्मक पहलू था जिसके केंद्र में भी उनके आध्यात्मिक संस्कारों की बड़ी भूमिका थी। शान्तिनिकेतन के पीछे प्राचीन भारत के तपोवन की पूरी अवधारणा काम कर रही थी। बाद के दिनों में शिक्षा संबंधी उनके विचारों में काफी परिवर्तन हुए। फिर भी अपने इस तपोवन से उनका क्या तात्पर्य था, इसे 1909 में ‘तपोवन’ शीर्षक लेख में बताते हैंः

“भारतवर्ष ने जिस सत्य को अपने निश्चित भाव से उपलब्ध किया है वह सत्य क्या है? वह सत्य प्रधानतः वणिक-वृत्ति नहीं है, स्वादेशिकता नहीं है, स्वराज्य नहीं है - वह है विश्व-बोध। इस सत्य की भारत के तपोवन में साधना हुई है। इसका उपनिषद् में उच्चारण हुआ है...भारत ने प्रबलता को नहीं, परिपूर्णता को चाहा था। इस परिपूर्णता का अर्थ है निखिल के साथ योग, और योग विनम्र होकर, अहंकार को दूर करके ही स्थापित हो सकता है।”

स्वदेशी आंदोलन का जो दबाव कवि को जनकोलाहल के बीच चले आने के लिये प्रेरित कर रहा था, राजनीतिक उथल-पुथल के इसी दौर में गिरडीह में बैठ कर रवीन्द्रनाथ ने देशभक्ति के जो चंद अमर गीत लिखे, उन्होंने बांग्ला जातीय चेतना के निर्माण में अकल्पनीय भूमिका अदा की थी। 1.जदि तोर डाक सुने केउ ना आसे तबे ऐकला चलो रे 2. बांग्लार माटी, बांग्लार जल, बांग्लार वायु, बांग्लार फल-/पूण्य होक, पूण्य होक, पूण्य होक हे भगवान 3. ओ आमार देशेर माटी, तोमार ’परे ठेकाई माथा 4.आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासि 5.सार्थक जनम आमार जन्मेछी ए देशे 6.एबार तोर मरा गंगे बान एसेछे, ‘जय मा’ बोले भासा तरि  - रवीन्द्रनाथ के ये सारे गीत इसी काल की देन है।

इसीकाल में राष्ट्रीय शिक्षा और ग्राम्य समाज के संगठन के बारे में रवीन्द्रनाथ ने कई लेख लिखे। बंगभंग-विरोधी आंदोलन के साथ ही हिंदू-मुस्लिम समस्या ने भी एक विकट रूप लेना शुरू कर दिया था। रवीन्द्रनाथ इस समस्या से काफी विचलित थे। उन्होंने यह साफ देखा था कि अंग्रेज यदि हिंदू और मुसलमानों के बीच विद्वेष पैदा करने में सफल होरहे है तो इसका संबंध हमारे समाज की सचाई से है जिसे रवीन्द्रनाथ हमारा ‘पाप’ कहते हैं। “हम सैकड़ों वर्षों से साथ-साथ रहते है, एक खेत की उपज, एक नदी के जल, एक सूरज के प्रकाश का भोग करते आरहे हैं, हम एक भाषा में बात करते हैं, हम एक ही सुख-दुख के लोग है - फिर भी पड़ौसी के साथ पड़ौसी का जो मानवोचित संबंध है, जो धर्म से अलग है, वह हमारे बीच नहीं है।

“हम जानते हैं बांग्लादेश में बहुत सी जगहों में हिंदू-मुसलमान एक चटाई पर साथ-साथ नहीं बैठते हैं - घर में मुसलमान के आने पर जाजम का एक हिस्सा लपेट दिया जाता है, हुक्के के पानी को फेंक दिया जाता है।
‘... यदि शास्त्रों में ऐसा विधान है तो ऐसे शास्त्र को लेकर स्वदेश-स्वजाति-स्वराज की स्थापना कभी भी नहीं की जा सकती है।”

सभी जानते हैं कि बंगभंग-विरोधी आंदोलन के बाद का काल ही बंगाल में उग्रराष्ट्रवादी क्रांतिकारियों के उभार का भी काल था। रवीन्द्रनाथ को इस जन-विच्छिन्न उग्रवाद से बेहद परहेज था। इसके साथ वे अपने को वैचारिक रूप में ही अलग नहीं पाते थे बल्कि ऐसे उग्रवाद को वे एक चारित्रिक व्याधि के रूप में देखते थे। उनका भारी विवादास्पद उपन्यास ‘घरे बाइरे’ और अंतिम उपन्यास ‘चार अध्याय’ इसके सबसे बड़े प्रमाण है।
इसके साथ ही गौर करने लायक बात एक और है कि बीसवीं सदी के प्रारंभ में विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ, निवेदिता, उकाकुरा आदि सभी मनीषियों में एकप्रकार के उग्र प्राच्यवाद का स्वर सुनाई देता था। लेकिन, स्वदेशी युग के अंतिम दौर में इनमें से सबसे पहले रवीन्द्रनाथ ने ही उग्र प्राच्यवाद और उसके साथ ही हिन्दूपन के खिलाफ लड़ाई की जरूरत का आहृान करते हुए कहा कि “ पश्चिम के साथ पूरब को मिलना ही होगा।” इसके बाद से ही रवीन्द्रनाथ में पूरब और पश्चिम के बीच मिलन के स्वर क्रमशः प्रबल होने लगे। “यह मिलन ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, कला, साहित्य, संस्कृति आदि तमाम विषयों पर आपसी आदान-प्रदान पर आधारित होगा।” वे पश्चिमी उग्रवाद के भी समान रूप से विरोधी थे। मूलतः, आध्यात्मिक अन्तरराष्ट्रीयतावाद ही उनके इन तमाम विचारों का मूल आधार था।

सन् 1912 में रवीन्द्रनाथ तीसरी बार विलायत की यात्रा पर गये और साथ ही अमेरिका भी पंहुचे। अमेरिका से लिखे उनके पत्रों से पता चलता है कि उनके मन में तभी शान्तिनिकेतन के लिये विदेश से वित्त-संग्रह का विचार आया था। वहीं पर उन्हें मैकमिलन कंपनी द्वारा ‘गीतांजलि’ के अंग्रेजी संस्करण के प्रकाशन की खबर भी मिली। 13 नवंबर 1913 के दिन ‘गीतांजलि’ के लिये नोबेल पुरस्कार की घोषणा की गयी। और, 1914 की जुलाई के अंतिम दिनों में पहला विश्वयुद्ध शुरू होगया। रवीन्द्रनाथ ने इसे अपनी भाषा में विश्वपाप कहा। उस समय की उनकी कविताओं और लेखों में उनकी इस भावना का सीधा प्रभाव दिखाई देता है।

रवीन्द्रनाथ ने सच्चे अर्थों में यदि किसी भारतीय व्यक्तित्व के साथ खुल कर किसी विमर्श में हिस्सा लिया तो वे थे महात्मा गांधी।


गांधीजी 1915 में भारत आयें। रवीन्द्रनाथ के साथ उनका संपर्क उनके दक्षिण अफ्रीका प्रवास के समय ही होगया था। जब वे भारत आयें उस समय शान्तिनिकेतन में उनके दक्षिण अफ्रीका के ‘फीनिक्स’ विद्यालय के कुछ छात्र ठहरे हुए थे। लेकिन मजे की बात यह है कि जिस समय गांधीजी ‘हिंद स्वराज’ में पश्चिमी सभ्यता और विज्ञान को एक सिरे से नकार रहे थे, उसी समय पश्चिम के साथ निरंतर संपर्क के चलते रवीन्द्रनाथ क्रमशः अपने आध्यात्मिक खोल से निकल कर वैज्ञानिक चेतना की ओर बढ़ने लगे थे। सी.एफ.एन्ड्रूज, जिनसे रवीन्द्रनाथ की मुलाकात तीसरी विलायत यात्रा में हुई थी और जो परवर्ती दिनों में शांतिनिकेतन से जुड़ गये थे, उनको लिखे एक पत्र में कवि कहते हैः ‘We all hope here, science in the end will help man. She will make the necessities of life easily accessible to every man, so that humanity will be freed from the tyranny of matter which now humiliates her. This struggling mass of men is great in its pathos, in its latency of infinite power.’

1916 में रवीन्द्रनाथ जापान की यात्रा पर गये और वहीं से फिर एकबार अमेरिका गये। जापान में रहते हुए ही उन्होंने साम्राज्यवाद और राष्ट्रवाद की तीव्र निंदा करने वाले वे भाषण लिखे जो उनकी पुस्तिका ‘नेशनलिज्म’ में संकलित है। जापान तब एशियाई शक्ति का प्रतीक माना जाता था। ‘जापान में राष्ट्रवाद’ शीर्षक लेख में  रवीन्द्रनाथ लिखते हैः “पुरातन प्राच्य के शिशु जापान ने, आधुनिक युग के सभी उपहारों पर, निस्संकोच अपना अधिकार जताया है। उसने पुरानी आदतों की जकड़न एवं सुस्त दिमाग के व्यर्थ ढेर को त्यागने में साहसिक जीवट का परिचय दिया है; जो अन्यथा मितव्ययिता और ताले-चाभी की सुरक्षा में ही रहना पसंद करते हैं। फलस्वरूप वह वर्तमान समय के संपर्क में आया है और उसने आधुनिक सभ्यता की जिम्मेदारियों को उत्सुकता व पूरी योग्यता से स्वीकार किया है।” इसी लेख में आगे जाकर रवीन्द्रनाथ पश्चिमी राष्ट्रवाद के युद्धोन्माद की तीखी निंदा करते हुए जापान के बारे में कहते हैं कि “पश्चिमी राष्ट्रों ने उसे तब तक आदर नहीं दिया, जब तक कि उसने यह सिद्ध नहीं कर दिया कि शैतान के जासूसी कुत्ते न केवल युरोप के कुत्ताघरों में पलते हैं बल्कि जापान में भी उन्हें पालतू बनाया जा सकता है और उन्हें खाने को मानव के दुख-त्रास दिए जा सकते हैं।

“पूर्व ने अपने सहज-ज्ञान से यह अनुभव कर लिया था, भले ही अरुचि के साथ, कि उसे योरप से बहुत कुछ सीखना है।...इन सभी चीजों से बढ़कर योरप ने सदियों के बलिदान तथा उपलब्धता के सहारे हमारे सामने स्वतंत्रता के परचम को ऊंचा उठाए रखा है...क्योंकि योरप को हमने अपना गहन सम्मान दिया है, इसीलिये जहां कहीं भी वह दुर्बल तथा झूठा दिखाई देता है, वहीं वह हमारे लिए उतना ही ज्यादा हानिकारक भी हो उठता है-श्रेष्ठ भोजन के साथ परोसे गए विष की तरह।” जापान से वे निवेदन करते हैं: “आपमें आस्था की शक्ति एवं सोच की स्पष्टता होनी चाहिए ताकि आप यह साफ-साफ देख सकें कि प्रगति का यह भद्दा ढांचा, जो कुशलता के ‘बोल्टों’ से कसा हुआ है और महत्वाकांक्षा के पहियों पर दौड़ता रहता है, ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएगा। ...क्या हमें आज इसके संकेत नहीं दिख रहे? क्या हमें युद्ध के शोर, नफरतकी चीखों, निराशा भरे रुदन, सदियों के मंथन से राष्ट्रवाद के तल में जमे बेशुमार कीचड़ से आती वह आवाज सुनाई नहीं दे रही- एक ऐसी आवाज जो हमारी आत्मा को चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि राष्ट्रीय स्वार्थ की मीनार, जो देशभक्ति के नाम पर निर्मित की गई है और जिसने स्वर्ग के विरुद्ध अपना परचम फहराया हुआ है, उसे अब अपने ही बोझ से हहराकर ढह जाना चाहिए।”

रवीन्द्रनाथ के इन भाषणों पर जापान, अमेरिका और योरप में तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। अमेरिका यात्रा के दौरान उनसे इसके बारे में काफी सवाल-जवाब किये गये थे।

बहरहाल, 1916 में भारत सचिव मॉन्टेग्यू भारत आयें। यहां की शासन-व्यवस्था में सुधार के लिये उन्होंने विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं से मुलाकात की। पूरे देश में इसे लेकर काफी उत्तेजना थी। इस बारे में रवीन्द्रनाथ का साफ मत था कि “ भिक्षा लेकर हम स्वाधीन नहीं होंगे - कभी नहीं। स्वाधीनता अन्तर की बात है!

“तपस्या के बल पर हम इस दान के अधिकार को हासिल करेंगे, भीख के अधिकार को नहीं, किसी भी लालच में पड़ कर हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए।”

उस समय विश्वयुद्ध चल रहा था। गांधीजी और कांग्रेस ने इस युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य के साथ पूर्ण सहयोग का रास्ता अपनाया था। मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार की घोषणा विश्वयुद्ध की समाप्ति के थोड़ा पहले ही होगयी थी। नवंबर 1928 में जब विश्वयुद्ध खत्म हुआ उसके तत्काल बाद कांग्रेस के मंच से भारत को आत्म-नियंत्रण का अधिकार देने की मांग जोरदार ढंग से उठी। उसी काल में 23 दिसंबर 1918 के दिन शान्तिनिकेतन में एक अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में विश्वभारती की आधारशिला रखी गयी। विश्वभारती की ओर से रवीन्द्रनाथ का यही संदेश थाः “हम मानवविधाता के राजपथ पर महामानव के गीत गाते जायेंगे। ...महाविश्व के पथ को ही हम देश के अनुरूप ग्रहण करेंगे।” रवीन्द्रनाथ को विश्वभारती के लिये सारी दुनिया के नागरिकों से सक्रिय सहयोग की भारी उम्मीद थी।


13 अप्रैल 1919 के दिन जलियांवाला बाग के जनसंहार से विक्षुब्ध रवीन्द्रनाथ ने 1915 में मिली अपनी नाइटहुड की उपाधि को ठुकरा दिया। इस घटना के ठीक एक दिन पहले ही रवीन्द्रनाथ ने गांधीजी को पत्र लिख कर यह कहा था कि “स्वाधीनता की महान भेंट जनता को दान में कभी नहीं मिल सकती। हमको इसे उपलब्ध करने के लिए इसे जीतना होगा...मैं अत्यंत हार्दिक प्रार्थना करता हूं कि आपके मार्ग में कोई रोड़ा न अटके जिससे हमारी आध्यात्मिक स्वाधीनता कमजोर पड़ जाय”।

विश्वभारती के लिये सारी दुनिया के लोगों की शुभकामनाएं और सहयोग लेने के लिये ही 12 मई 1920 के दिन कवि योरप और अमेरिका की यात्रा पर निकल पड़े। लगभग 14 महीने तक अमेरिका और योरप के नाना देशों की यात्रा के बाद 16 जुलाई 1921 के दिन मुंबई से वर्द्धमान होकर शान्तिनिकेतन लौटे। इस दौरान उन्होंने शान्तिनिकेतन में एन्ड्रूज के नाम ढेरों पत्र लिखे। भारत की तत्कालीन उत्तेजनापूर्ण राजनीतिक परिस्थति पर उनकी नजर लगातार टिकी हुई थी। यह समय भारत में रौलट एक्ट के खिलाफ और खिलाफत और गांधीजी के असहयोग आंदोलन का समय था।

अपने एक पत्र में वे एन्ड्रूज को लिखते हैं: ‘ Keep Santiniketan away from the turmoils of politics---we must never forget that our mission is not political. Where I have my politics, I do not belong to Santiniketan.’

वे इस बात पर हमेशा बल दे रहे थे कि राजनीतिक ‘स्वराज’ से ही मोक्ष नहीं है; हमारी लड़ाई आत्मा की है - मनुष्य की मुक्ति की लड़ाई सिर्फ राजनीतिक स्वाधीनता नहीं है।

रवीन्द्रनाथ जब भारत लौटै, गांधीजी का असहयोग आंदोलन शुरू हो चुका था। शान्तिनिकेतन भी उसके प्रभाव से मुक्त नहीं रहा था। शान्तिनिकेतन का कोलकाता विश्वविद्यालय के साथ जो थोड़ा सा संपर्क पहले बना था, वह टूट गया। जहां तक खिलाफत आंदोलन के समय सामयिक तौर पर बनी हिन्दू-मुस्लिम एकता का सवाल था, रवीन्द्रनाथ के मन में इसके बारे में काफी संदेह था और बाद में दिनों में वह संदेह सच भी साबित हुआ।

असहयोग आंदोलन की घोषणा के साल भर बाद, 6 सितंबर 1921 के दिन गांधीजी कोलकाता आये थे। कवि से उनके जोड़ासांकू के घर पर मुलाकात हुई और दोनों के बीच एन्ड्रूज की उपस्थिति में लगभग चार घंटे तक वार्ता चली। भारत की स्वतंत्रता के साध्य और साधन पर हुई इस वार्ता का कोई फल नहीं निकला, लेकिन, जैसाकि रोम्यां रोला ने लिखा है, ‘ It seems as if it were a controversy between a St. Paul and a Plato’। गांधीजी और रवीन्द्रनाथ के बीच 1915 से लेकर कवि की उम्र की आखिरी घड़ी 1941 तक लगातार भाषा नीति, असहयोग, सत्याग्रह, सत्य और प्रेम, चरखा और स्वराज्य, पूना समझौता, बिहार का भूकंप तथा विश्वास और अंधविश्वास, आदि विभिन्न विषयों पर वार्ताएं और पत्राचार होते रहें। इस समूचे विमर्श को अनेक अर्थों में भारी ऐतिहासिक महत्व का एक राष्ट्रीय विमर्श कहा जा सकता है।

1922 की 20 सितंबर से दिसंबर महीने के तीसरे हफ्ते तक रवीन्द्रनाथ पश्चिम भारत, श्रीलंका और फिर पश्चिम भारत की यात्रा पर रहे। वहां से लौट कर आने के कुछ दिनों बाद ही उत्तर भारत की यात्रा (काशी, लखनऊ से अहमदाबाद, मुंबई होकर कराची, सिंध के हैदराबाद से स्टीमर से काठियावाड़ के पोरबंदर) पर चल दिये। इन यात्राओं का एकमात्र लक्ष्य शांतिनिकेतन के उद्देश्यों का प्रचार करना था। तब से सन् 1926 तक कवि चीन, जापान, दक्षिण अमेरिका के अर्जेन्टिना, दो बार इटली, जर्मनी और योरप के अनेक देशों की लंबी-लंबी यात्राएं करते रहे। इटली के फासिस्ट शासक मुसोलिनी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्होंने उसकी प्रशंसा में कुछ बातें कह दी जिनका मुसोलिनी ने सारी दुनिया में प्रचार कराके काफी लाभ उठाया। इस दौरान उन्होंने कई नाटक और कविताएं लिखी और साहित्य, संस्कृति, शिक्षा संबंधी तमाम विषयों पर भाषण दिये।

1927 में भारत आकर भी वे देश के कोने-कोने में विश्वभारती के काम से ही घूमते रहे। 1929 में फिर कनाडा, जापान की यात्रा पर निकल गये। 1930 में योरप की अपनी अंतिम यात्रा पर गये। इसी यात्रा में 11 सितंबर 1930 के दिन रवीन्द्रनाथ  सोवियत संघ पहुंचे। सोवियत संघ को देखने की उनकी लालसा काफी अर्से से थी। रूस की इस यात्रा पर उन्होंने लिखा, “अंत में रूस आना होगया। जो देखा अचरज हुआ। दूसरे किसी देश जैसा ही नहीं था। एकदम बुनियादी तौर पर अलग। नीचे से ऊपर तक सब लोगों को इन्होंने समान रूप से जगा दिया है।”
रूस से ही अपने बेटे रथीन्द्रनाथ को ‘जमींदारी प्रथा’ के बारे में उन्होंने लिखा, “जैसे दिन आरहे हैं, उनमें जमींदारी पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता है। उस चीज के प्रति काफी लंबे अर्से से मेरे मन में धिक्कार था, अब वह और भी दृढ़ होगया। जिन सब बातों को काफी अर्से से सोचता था, इसबार रूस में उसकी सूरत देख आया। इसीलिये जमींदारी व्यवसाय पर मुझे शर्म आती है।”

रवीन्द्रनाथ की ‘रूस की चिट्ठी’ में सोवियत संघ की समाजवादी व्यवस्था की जिस प्रकार भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है, वह उनके गहन मानवतावादी दृष्टिकोण में एक बड़े विस्तार का सूचक है।
सोवियत संघ से रवीन्द्रनाथ सीधे अमेरिका की यात्रा पर चले गये। यह उनकी अमेरिका की अंतिम यात्रा थी। वहां से 31 जनवरी 1931 के दिन भारत आयें। 1932 में इरान और ईराक की यात्रा पर गये। 1934 में रवीन्द्रनाथ एकबार फिर, तीसरी बार श्रीलंका की यात्रा पर गये थे और वहीं पर उन्होंने अपने सबसे अधिक विवादास्पद उपन्यास ‘चार अध्याय’ को पूरा किया।

सन् ‘35 से ’38 तक के काल में कवि मूलतः देश के कुछ स्थानों की यात्राओं के अलावा शान्तिनिकेतन की गतिविधियों में ही अधिक मुब्तिला रहे। 17 सितंबर 1940 के दिन वे शांतिनिकेतन से अंतिम बार निकले थे।
इस समय तक द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होगया था। इसमें शक नहीं कि यह विश्वयुद्ध  रवीन्द्रनाथ के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना था। वस्तुतः 1939 से लेकर अपनी मृत्यु (7 अगस्त 1941) तक वे इस युद्ध की परिस्थितियों के बारे में लगातार चिंतित रहे। इस युद्ध में वे साफ तौर पर पूरी मनुष्यता के अस्तित्व पर खतरे को देख रहे थे और इसीलिये फासिस्ट ताकतों के खिलाफ मित्र शक्तियों के प्रति उनकी सहानुभूति और समर्थन में किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं था। रूस का अनुभव उनके साथ था और उसके प्रति प्रकट सहानुभूति भी। अपने अंतिम दिनों के इसीकाल में कवि ने अंतिम इच्छा के रूप में ‘सभ्यता का संकट’ ऐतिहासिक लेख लिखा जिसे 14 मई 1941 के दिन शान्तिनिकेतन में पढ़ा गया। कवि तब अस्सी साल के होगये थे। इस लेख का प्रारंभ वे इन शब्दों से करते हैंः



“आज मेरे जीवन के अस्सी वर्ष पूर्ण हुए। अपने जीवन-क्षेत्र का दीर्घ विस्तार आज मेरे सामने आता है।...
“पाश्चात्य जातियों को अपनी सभ्यता पर जो गर्व है उसके प्रति श्रद्धा रखना अब असंभव होगया है। वह सभ्यता हमें अपना शक्ति रूप दिखा चुकी है लेकिन मुक्ति रूप नहीं दिखा सकी। मनुष्य का मनुष्य के साथ वह सम्बन्ध, जो सबसे अधिक मूल्यवान है और जिसे वास्तव में सभ्यता कहा जा सकता है, यहां नहीं मिलता। ...
इसीबीच मैंने देखा कि योरप में मूर्तिमन्त र्बबरता अपने नखदन्त बाहर निकालकर विभीषिका की तरह बढ़ती जा रही है। मानव-जाति को पीड़ित करने वाली इस महामारी का पाश्चात्य सभ्यता की मज्जा में जन्म हुआ। वहां से उठकर आज उसने मानव-आत्मा का अपमान करते हुए दिग्दिगन्तर के वातावरण को कलुषित कर दिया है। हमारे अभागे, निःसहाय, जकड़े हुए देश की दरिद्रता में क्या हमें उसका आभास नहीं मिलता?
“एक न एक दिन भाग्यचक्र पलटा खायेगा, और अंग्रेजों को अपना भारतीय साम्राज्य छोड़कर जाना होगा। लेकिन किस तरह के भारत को वे पीछे छोड़ जायेंगे?...जीवन के प्रथम भाग में मेरा हार्दिक विश्वास था कि सभ्यता-दान ही योरोप की आन्तरिक सम्पत्ति है। आज जब जीवन से विदा होने का दिन समीप आ रहा है मेरे इस विश्वास का दिवाला निकल चुका है। ...लेकिन मनुष्य के प्रति विश्वास खो देना पाप है। अन्तिम क्षण तक इस विश्वास की रक्षा करूंगा। ...जो लोग प्रबल और प्रतापशाली है उनकी शक्ति, गर्व और आत्माभिमान अजेय नहीं है। ...निश्चय ही इस सत्य का हमें प्रमाण मिलेगा...

महामानव का आगमन है।
दिशा-दिशा में घास का तिनका-तिनका रोमांचित है।
देवलोक में शंख बज उठा...
‘जय-जय-जय रे मानव अभ्युदय’ -”

रवीन्द्रनाथ के जीवन के इस पूरे आख्यान को यदि कोई गहराई से देखेगा तो उसे इसमें शुरू से अंत तक महाविश्व के महामानव की प्रतिमा का एक ऐसा सूत्र पिरोया हुआ दिखाई देगा जिस प्रतिमा को उन्होंने अपने जीवन के प्रारंभ में ही अपने आध्यात्मिक संस्कार से हृदय में बहुत गहरे बसा लिया था, और उम्र की अंतिम घड़ी तक वे उसी महामानव की जयकार का गीत गाते रहे। उसमें किसी भी प्रकार की लघुता का कोई स्थान नहीं था।



मंगलवार, 5 मई 2015

कार्ल मार्क्स के 198वें जन्मदिवस पर सरला माहेश्वरी की कविता :


जन्मदिन का उपहार

नहीं देना चाहती
तुम्हें कोई संबोधन
तुम हर बोधन से बड़े हो

तुम्हारा नाम ही सबसे प्रिय है मुझे

इसलिये हे मार्क्स !
आज तुम्हारे जन्मदिवस पर
देना चाहती हूँ
ख़बरों के दो उपहार

पहली खबर है स्वीडन से
शोषितों में भी शोषित
दुनिया की पहली शोषिता स्त्री के बारे में

वेश्यावृति अब मान ली गयी है वहाँ
औरतों और बच्चों के खिलाफ सामाजिक हिंसा
मजबूरी में देह बेचनेवाली औरत नहीं
देह ख़रीदने वाला पुरूष और समाज भी है अपराधी

सरकार ने ही मान ली है इसे
अपनी ज़िम्मेदारी
और देखो !
देखते ही देखते ये असाध्य सा रोग
अब लगने लगा है एक साध्य बीमारी

और,
दूसरी खबर है तुर्की से

आने वाले चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी की
सभी साढ़े पाँच सौ उम्मीदवार बनी हैं महिलाएँ

नहीं यह किसी महिला अस्मिता
या किसी सामाजिक संतुलन की बात
शोषक समाज के विरुद्ध
सोच-समझ कर लिया गया निर्णय है

कहना है वहाँ की पार्टी का
महिलाएँ ही रहीं थीं सबसे आगे
उलट दिये थे उन्होंने अपने नाम लिखे सारे पुराने संबोधन
नहीं डरी थी वे आँसू गैस से
नहीं डरी थी पुलिस की गोली और डंडे की मार से
हिला दी थी उन्होंने ही शासन की चूलें
वे ही तो हैं दैनन्दिन शोषिता
सबसे शोषक, निर्मम निज़ाम की

इसीलिये
उन्हें ही, सिर्फ उन्हें ही बनाया है उम्मीदवार

है न खबर ज़ोरदार !

आज तुम्हारे जन्मदिवस पर
स्वीकार करो हमारा यह उपहार ।

सोमवार, 4 मई 2015

कार्ल मार्क्स का 198वां जन्मदिन




आज़, मार्क्स के 198वें जन्मदिन पर याद आती है उनके दामाद पाल लफार्ग की निम्नलिखित तमाम बातें :

‘‘मार्क्स का विचार था कि अनुसंधान के अंतिम फल की चिंता किये बिना विज्ञान का अनुशीलन विज्ञान के लिये ही किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में सक्रिय सहभागिता का त्याग करके, अथवा बिल के चूहे की तरह अपने को अध्ययन-कक्ष या प्रयोगशाला में बंद करके और समकालीनों के सार्वजनिक जीवन तथा राजनीतिक संघर्ष से तटस्थ रहकर वैज्ञानिक महज अपने को हेय ही बना सकता है।’’

‘‘वे कहा करते थे, ‘मैं विश्व नागरिक हूं, मैं जहां कहीं भी हूं, सक्रिय हूं।’’

‘‘किताबें उनके लिये विलास-सामग्री नहीं, औजार थीं। वे कहा करते थे, ‘ये मेरी बांदियां हैं और इन्हें मेरी इच्छा के अनुसार मेरे सेवा करने होगी।’’

‘‘डार्विन की भांति वे भी उपन्यास पढ़ने के बड़े शौकीन थे।’’

‘‘वे इस उक्ति को बार-बार दोहराना पसंद करते थे कि ‘जीवन संघर्ष में विदेशी भाषा एक हथियार है।’’

‘‘उनका विचार था कि जब तक कोई विज्ञान गणित का उपयोग करना नहीं सीख लेता, तब तक वस्तुत: विकसित रूप नहीं प्राप्त कर सकता।’’

‘‘चिंतन उनका सबसे बड़ा सुख था। मैंने अक्सर उन्हें उनकी जवानी के दर्शन-गुरू हेगेल के शब्द दुहराते हुए सुना :‘‘किसी कुकर्मी के अपराधमूलक चिंतन में भी स्वर्ग के चमत्कारों से अधिक वैभव तथा गरिमा होती है।’’

‘‘जब मार्क्स ने अपने चारित्रिक प्रमाण-प्राचूर्य तथा तर्क-वैपुल्य के साथ मुझे मानव-समाज के विकास-संबंधी अपना तेजस्वी सिद्धांत समझाया था, तब मुझे ऐसा लगा था मानो मेरी आंखों के सामने से पर्दा हट गया हो। मैंने पहले पहल विश्व-इतिहास की तर्क-संगति को स्पष्ट रूप से देखा और सामजिक विकास के व्यापारों का, जो देखने में इतने अन्तर्विरोधपूर्ण हैं, उसके भौतिक कारणों के साथ ताल-मेल बिठा पाया।’’

‘‘वे अपनी कृतियों से भी कहीं अधिक ऊंचे थे।’’

‘‘मार्क्स अपनी कृति से कभी संतुष्ट नहीं होते थे, उसमें बाद को हमेशा परिवर्तन करते रहते थे और निरंतर पाते थे कि उनकी अभिव्यक्ति उनके चिंतन की ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाती।’’

‘‘उनके आलोचक यह कभी सिद्ध नहीं कर सके कि वे लापरवाह थे अथवा अपने तर्कों को ऐसे तथ्यों पर आधारित करते थे, जो जांच की कड़ी कसौटी पर खरे न उतर सकें।’’

‘‘मार्क्स की साहित्यिक ईमानदारी भी उतनी ही जबर्दस्त थी, जितनी वैज्ञानिक ईमानदारी।’’

‘‘उनके काम करने का ढंग अक्सर उनके ऊपर ऐसे कार्यभार लाद देता था, जिनकी गुरुता की कल्पना पाठक मुश्किल से कर सकते हैं।’’

‘‘मार्क्स और एंगेल्स हमारे युग में पुराकालीन कवियों द्वारा वर्णित मित्रता के आदर्श का मूर्त रूप थे।’’

‘‘अन्य किसी भी व्यक्ति की तुलना में मार्क्स एंगेल्स की राय की अधिक कद्र करते थे, क्योंकि मार्क्स के ख्याल से एंगेल्स ही वह व्यक्ति थे जो उनके सहकर्मी हो सकते थे।’’

‘‘मार्क्स जितने स्नेही पति और पिता थे, उतने ही अच्छे मित्र भी थे। उनकी पत्नी, बेटियां, एंगेल्स और हेलेन उन जैसे व्यक्ति के स्नेह-पात्र होने के योग्य भी थे।’’

कार्ल मार्क्स के 198वें जन्मदिन पर उनके प्रति आंतरिक श्रद्धांजलि।

रविवार, 3 मई 2015

गिरीश करनाड के नाटक पर संघ परिवार का हमला




संघ परिवार अपने राजनीतिक वर्चस्व को कायम करने के लिये किस प्रकार ‘गाय’ का इस्तेमाल कर रहा है, इसका एक और निंदनीय उदाहरण सामने आया है। इसबार उन्होंने निशाना बनाया है देश के जाने-माने रंगकर्मी, नाट्य निदेशक, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखक और अभिनेता गिरीश करनाड को। हाल में जबसे महाराष्ट्र में गोमांस पर पाबंदी लगाने का कदम उठाया गया, गिरीश करनाड ने गोमांस को लेकर कुछ ऐसी बातें कही थी, जो संघ परिवार के लोगों को पसंद नहीं आईं । इसके अलावा उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के इस जघन्य कदम के खिलाफ प्रदर्शन में शिरकत भी की थी।
करनाड के इसी जुल्म के खिलाफ संघ परिवार ने संगठित रूप से अब उनके नाटकों के प्रदर्शन पर रोक लगाने और उन्हें प्रताड़ित करने का निर्णय लिया है। पिछली 10 मार्च को उडुपी में विश्व हिंदू परिषद ने एक विराट हिंदू समाजोत्सव करके बाकायदा यह निर्णय लिया था कि प्रदेश में करनाड के नाटकों के प्रदर्शनों में बाधा डाली जायेगी। अब इस फैसले पर उनके अमल का पहला परिणाम सामने आगया है।
इसी 30 अप्रैल को मणिपाल के श्री नरसिंघे मंदिर में करनाड के एक नाटक ‘नाग मंडला’ का प्रदर्शन तय हुआ था। 1988 में लिखे गये करनाड के इस नाटक के कर्नाटक के कोने-कोने में अब तक कई प्रदर्शन हो चुके हैं। इसपर एक कन्नड़ फिल्म भी बन चुकी है। यह मनुष्य का रूप धर कर एक शारीरिक और भावनात्मक तौर पर असंतुष्ट स्त्री को अपने प्रभाव में लेने की कोबरा सांप की कहानी है। हाल में इस नाटक का दक्षिण-पश्चिमी और उत्तरी कर्नाटक में बोली जाने वाली टुलु भाषा में अनुवाद हुआ था और इसी भाषा में इसे श्री नरसिंघे मंदिर में खेला जाना था। उडुपी में पिछले 35 सालों से सक्रिय ‘रंगभूमि’ नाट्य मंडली इसका प्रदर्शन करने वाली थी और काफी रुपये खर्च करके उसने इसकी पूरी तैयारियां कर ली गयी थी।
लेकिन 30 अप्रैल के ठीक पहले दिन, संघ परिवार की संस्था संस्कार भारती ने मंदिर के न्यास के अधिकारियों को धमकी दी कि यदि मंदिर में करनाड के नाटक का प्रदर्शन किया गया तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। संघ परिवारियों के उपद्रव के भय से मंदिर के न्यास ने नाटक के प्रदर्शन को रोक दिया।
सांस्कृतिक क्षेत्र में संघ परिवार के ऐसे नग्न हस्तक्षेप की जितनी निंदा की जाए कम है। यह सीधे तौर पर संस्कृतिकर्मियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।


नागमंडला नाटक की दो तस्वीरें



बुधवार, 29 अप्रैल 2015

व्यापकतम प्रतिरोध संघर्ष में ही वामपंथ की संभावनाएं है

अरुण माहेश्वरी


‘व्यक्ति नहीं, नीतियां प्रमुख होती है’- राजनीति के क्षेत्र में इस तरह की आदर्श, आप्त बातों के खोखलेपन के इतिहास-बोध के आधार पर ही हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि सीपीआई(एम) के महासचिव पद पर सीताराम येचुरी के आने से निश्चित तौर पर भारत की वामपंथी राजनीति के एक नये चरण का सूत्रपात होगा। इसकी परिणतियों के तमाम सीमांत क्या क्या होंगे, अभी उसके बारे में निश्चय के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता है। लेकिन यह तय है कि कुछ जड़ताएं टूटेगी, भारत के संसदीय जनतंत्र में पहले की अपेक्षा वामपंथ की गतिशीलता बढ़ेगी; वह अपने नेतृत्व की चली आरही पथरीली संवादहीनता की व्याधि से मुक्त होगा। अगर सब सही हुआ तो वामपंथ के अंदर दूर दूर तक पसरे संवेदनशून्य नौकरशाही के ढांचे में दरारें पड़ेगी, मानवीय खुलापन आयेगा और वामपंथी राजनीति मेहनतकश जनता के जीवन-संघर्षों की शक्ति से ऊर्जस्वित होकर देश के नये भावी नेतृत्व को भी जन्म देगी।

यह सब हमारा कोई खयाली पुलाव नहीं है। सीपीआई(एम) के नेतृत्व में यह परिवर्तन एक ऐसे महत्वपूर्ण समय में हुआ है जब भारत की राजनीति साफ तौर पर संक्रमण के एक नये बिंदु की ओर बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। मोदी सरकार कोई चमक दिखाने के पहले ही बड़े लोगों की दासता की हीनता का प्रदर्शन करके लोगों की नजर में म्लान होगयी है। मजदूर वर्ग को तो इसने अपना जन्मजात शत्रु मान कर ही अपने शासन की यात्रा शुरू की थी। जिस दिन इसने अपनी दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते स्कीम की घोषणा की थी, उस दिन को देश की सभी ट्रेडयूनियनों ने भारत के मजदूरों के जीवन में एक काला दिवस बताया था। वह बहु-राष्ट्रीय निगमों को श्रम कानूनों में तमाम रियायतें देने के आश्वासनों पर पूरी नंगई के साथ अमल करने की उसकी शुरूआत है। पूंजी और श्रम के विरोध के बीच सरकार की जो एक अंपायर की भूमिका होती है ताकि कोई श्रमिकों के साथ अन्याय न करने पाये, उस स्कीम के जरिये सरकार ने अपनी उस भूमिका के अंत की घोषणा कर दी।

अब भूमि अधिग्रहण विधेयक के जरिये उसने मेहनतकश जनता के सबसे बड़े हिस्से किसानों को अपने हमलों का निशाना बनाया है। उद्देश्य एक ही है - कॉरपोरेट की अंतहीन लिप्सा के रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करना। यूपीए-2 सरकार के काल में कितनी लंबी बहसों, गहरी छान-बीन और देश के कोने-कोने में उभर रहे आंदोलनों की पृष्ठभूमि में जो भूमि अधिग्रहण कानून पारित हुआ था, उसे एक झटके में, स्वेच्छाचारी ढंग से इसने उलट दिया है। यूपीए-2 के काल में बने कानून में किसानों की जमीन की हिफाजत की गारंटी की गयी थी और उनकी स्वीकृति से किये गये अधिग्रहण में भी उन्हें भरपूर मुआवजा देने के प्राविधान थे। मनमाने ढंग से किसानों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव की बिना कोई परवाह किये उनकी जमीन को छीन लिये जाने पर रोक लगायी गयी थी। एक ऐसे ऐतिहासिक कानून की हत्या के लिये अध्यादेश पर अध्यादेश के जरिये आक्रमण करके मोदी सरकार ने किसानों के खिलाफ एक चरम निष्ठुर तानाशाही का रुख अपना लिया है।

और तो और, जब कृषि का संकट देश के हर कोने में सबसे विकट रूप में सामने आरहा है, कोई राज्य ऐसा नहीं है जहां किसानों की आत्म-हत्या की घटनाएं न घट रही हो, उस समय इस सरकार के बजट में ग्रामीण जनता की कल्याण योजनाओं की कई मदों में कटौती की गयी है। प्रधानमंत्री सबसिडी के मसले पर हिकारत के इतने गहरे भाव से बात करते हैं, जैसे उनकी नजर में आम लोगों द्वारा सरकार से किसी भी प्रकार की क्षतिपूर्ति की मांग उससे भीख मांगने जैसा है। देश की व्यापक जनता में भिखारी होने का हीन भाव भरने का प्रधानमंत्री का यह निर्दयी अभियान एक कल्याणकारी राज्य के मुखिया के लिये किसी अक्षम्य अपराध से कम नहीं है। संसद के पटल पर मनरेगा को देश का कलंक बताना, विदेशों में कल्याणकारी योजनाओं की हंसी उड़ाना साधारण जन को नीची नजर से देखने की उनकी भावना को बताने के लिये काफी है। मजे की बात यह है कि यही सरकार अपने बजट में बड़े आराम से कॉरपोरेट घरानों को अरबों-खरबों की रियायते देने में जरा भी संकोच नहीं करती।

उभरते हुए नये राजनीतिक परिदृश्य की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मोदी तथा उनकी सरकार का गरीब जनता के प्रति हिकारत से भरा नजरिया आज जनसाधारण के सामान्य बोध में प्रवेश कर चुका है। इसके साथ ही नेट न्यूट्रेलिटी के मसले पर इस सरकार के कॉरपोरेट-परस्त रुख ने पढ़े-लिखे नौजवानों को भी गहरी शंकाओं से भर दिया है। इसप्रकार, इस सरकार के खिलाफ देश की जनता के व्यापकतम संयुक्त प्रतिरोध संधर्ष की सारी संभावनाएं अब राजनीति के क्षितिज पर उभरती हुई साफ दिखाई देने लगी है।

ऐसे समय में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का एक प्रभावशाली विपक्ष के नेता के रूप में उभरना, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पर प्रकाश करात की जगह सीताराम येचुरी का आना, जो इधर के कुछ सालों में वामपंथ के साथ जुड़ गये अंध कांग्रेस-विरोध की बीमारी से मुक्ति का आधार बन सकता है और इनके साथ ही नयी एकीकृत समाजवादी पार्टी का भी भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ समझौताहीन रवैया आने वाले समय में राजनीति की अनंत संभावनाओं की ओर संकेत कर रहा है।

भारतीय वामपंथ ने हमेशा कृषि क्रांति के मुद्दों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा है। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में उसी के नेतृत्व में भूमि सुधार और पंचायती राज की स्थापना के संघर्ष को जो अभूतपूर्व सफलता मिली, वह किसी से छिपी नहीं है। कृषि क्षेत्र के कार्यकर्ता ही वामपंथ की शक्ति के मूल स्रोत रहे हैं। ऐसे में सभी वामपंथी ताकतों की संयुक्त शक्ति भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व दे सकती है और गहरी राजनीतिक सूझबूझ और उदारता के साथ इस लड़ाई को जनता के व्यापकतम संयुक्त प्रतिरोध की लड़ाई में बदल सकती है। किसान, मजदूर और नौजवानों की संयुक्त शक्ति से ऐसे किसी भी संघर्ष के विकास में हमें भारतीय वामपंथ के विस्तार की भी अनंत संभावनाओं की उभरती हुई तस्वीर साफ नजर आती है।

'जानकीदास तेजपाल मैनशन'


- अरुण माहेश्वरी

रोहिणी अग्रवाल जी ने अलका सरावगी के हाल में प्रकाशित उपन्यास ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’ की अतिशय तारीफ करते हुए अपनी फेसबुक वाल पर एक पोस्ट लगायी थी। उसका अंत उन्होंने इन शब्दों से किया था : ‘‘ वह इंसान की अपनी ही चूलों के हिल जाने की कथा कहता है। न, आतंक फैला कर पाठक की घिघियाई मुद्रा का लुत्फ उठाने की जरा भी शाइस्तगी नहीं लेखिका में। वह तो हौले से उसके हाथ को अपने संपुट में ले न्यौता दे डालती है कि आओ, चलें, अपने हिस्से के वक्त पर एक नई तामीर खड़ी करें - भागते-भागते नहीं, धीरज के साथ, सृष्टि की आदिम लय-ताल से एकमेक होते हुए क्योंकि अचर-अगोचर के बिना अपने तईं इंसान ही कहां मुकम्मल है।’’
यह उपन्यास हमने भी पढ़ा है। इसीलिये रोहिणी जी की पोस्ट पर हमने एक टिप्पणी की जिसे मैं यहां मित्रों के साथ शेयर कर रहा हूंं। चूंकि इस मामले में कथा साहित्य की कुछ बुनियादी बातें शामिल है, इसीलिये मित्रों को हमारी यह टिप्पणी कुछ उपयोगी लग सकती है, जो इसप्रकार है :-
रोहिणी जी, मैंने भी यह उपन्यास पढ़ा है, बड़े ध्यान से पढ़ा है।
दरअसल, आख्यान और विवरण में कुछ बुनियादी फर्क होते हैं। आख्यान में हम जिन घटनाओं का साक्षात करते हैं वे चरित्रों के जीवन से सीधे जुड़ी होती है। चरित्रों के विकासमान जीवन में घटनाएं भी अपने सामाजिक महत्व के कारण एक सक्रिय भूमिका अदा करती दिखाई देती है। जिन घटनाओं में चरित्र शामिल होता है पाठक उनके दर्शक होते हैं। इसके चलते पाठक खुद उन घटनाओं का अनुभव भी करते हैं। दुनिया के सभी बड़े-बड़े उपन्यासकारों को देख लीजिये। बाल्जक, तालस्ताय, गोर्की, प्रेमचंद, लू शुन से लेकर हमारे यशपाल, जैनेन्द्र और अभी के उदयप्रकाश तक। उनके चरित्र किसी भी मायने में निष्क्रिय चरित्र या घटनाओं के दर्शक भर नहीं होते।
जिन रचनाओं में चरित्र ही दर्शक हो, निष्क्रिय, घटनाओं को दिखाने की एक खिड़की मात्र, वहां घटना पाठक के लिये एक कोरी प्रदर्शनी बन जाती है, अधिक से अधिक प्रदर्शनीय श्रृंखला। पाठक उनका एक अवलोकक होता है, उन्हें महसूस नहीं करता। आख्यान निष्प्राण होकर कोरा ब्यौरा बन जाता है, एक रिपोर्ट।
इसीलिये आख्यानों की जान सप्राण, वैविध्यमय, संघर्षमय और उद्यमशील चरित्र होते हैं। अलका सरावगी के लेखन की दिक्कत यह है कि उनमें ऐसे चरित्रों के लिये कोई जगह नहीं होती है। इसीलिये हमें तो उनका लेखन बेहद बनावटी और उबाऊ लगता रहा हैं। कोरी बतकही, अधिक से अधिक कह सकते हैं, किस्सागोई। यह उपन्यास तो और भी उबाऊ है, क्योंकि इसमें घटनाओं की वैसी श्रृंखला वाली किंचित गतिशीलता भी नहीं है, जिसकी एक झलक ‘कलिकथा’ में दिखती है। इसके अलावा ब्यौरा भी सघन नहीं, उथला-उथला। वे सामाजिक तौर पर निष्क्रिय चरित्रों को लेकर चलती हैं, जिनका अपने समय की राजनीति, सामाजिक आंदोलनों के प्रति ही नहीं, हर प्रकार की उद्यमशीलता के प्रति भी एक प्रकार की उदासीनता, हिकारत और वितृष्णा से भरा नजरिया होता है। ऐसे चरित्र प्रकारांतर से यथास्थिति के समर्थक, आत्मा-विहीन चरित्र होते हैं। यह लेखक की अपनी भी दिक्कत है, घटनाओं की सिर्फ दर्शक भर बने रहने की दिक्कत । बातों की चकल्लस की दिक्कत। वे लगातार इसीप्रकार का लेखन कर रही है। अब तो यह किसी ब्रांड के नाम को भुनाने का पण्य जैसा भी लगने लगा है।
आपने इसका उपभोग किया, इसके लिये आप प्रशंसा की पात्र है।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

सीपीआई(एम) की 21वीं कांग्रेस : किससे आंख चुराने की कोशिश !


अरुण माहेश्वरी


सीपीआई(एम) की 21वीं कांग्रेस को शुरू हुए तीन दिन बीत चुके हैं। इस कांग्रेस में अभी किन बातों पर क्या बहस चल रहीं है, इन्हें जानने का एक मात्र प्रामाणिक तरीका पार्टी द्वारा हर रोज जारी की जाने वाली अति संक्षिप्त प्रेस-विज्ञप्ति के अलावा और कुछ नहीं है। इस विज्ञप्ति में कांग्रेस के पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अलावा कुछ खास प्रस्तावों का जिक्र होता है और बहस के लिये तैयार किये गये दस्तावेजों पर बोलने वाले वक्ताओं के नामों की जानकारी होती है। यही है एक क्रांतिकारी पार्टी के अंदुरूनी जनतंत्र के चरम रूप को चरितार्थ करने वाली वह खास संगठनात्मक शैली जिसमें कोई भी आम प्रतिनिधि एक बंद ढांचे के अंदर ही बोलने का अधिकारी होता है, बाहर के व्यापक समाज तक उसकी बातों की गूंज-अनुगूंज की कोई गुंजाईश नहीं होती। प्रतिनिधि की स्वतंत्र सत्ता उसी वक्त तक होती है जब तक वह बोल रहा होता है। उसके भाषण की समाप्ति के क्षण के साथ ही वह सत्ता पार्टी कांग्रेस में चुने गये नेतृत्व के हाथ में खुद को सुपुर्द कर, आगे की कांग्रेस तक के लिये उनके निर्देशों के एक औजार में विलीन हो जाती है।

दरअसल, किसी न किसी रूप में यह बात अभी तक स्वीकृत सभी पार्टी-तंत्रों पर कमोबेस इसीप्रकार लागू होती है, लेकिन एक क्रांतिकारी पार्टी के ढांचे में पार्टी तंत्र की यह सचाई अपने तात्विक रूप में, 24 कैरेट सोने की तरह होती है। इसमें किसी प्रकार की खाद या मिलावट की संभावना नहीं होती है।

इस मायने में इधर के दिनों में आम आदमी पार्टी के अंदर से पार्टी के अंदुरूनी जनतंत्र के विषय को जिसप्रकार खुद में एक स्वतंत्र राजनीतिक विषय के तौर पर उठाया जा रहा है, वह अपने आप में एक भिन्न विषय है और पार्टी-तंत्र कैसे खुद में जनता के जीवन से जुड़ा एक बड़ा सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न बन चुका है, इसकी ओर संकेत करता है।

बहरहाल, सीपीआई(एम) की कांग्रेस के इन तीन दिनों के बारे में विज्ञप्तियों आदि के जरिये जो भी सामने आया है, उससे पता चलता है कि अभी तक इसमें पिछले पचीस सालों के दौरान अपनाई गयी पार्टी की राजनीतिक और कार्यनीतिक लाईन की समीक्षा का जो दस्तावेज बहस के लिये जारी किया गया था, उस पर चर्चा हुई है। सीपीआई(एम) के इस दस्तावेज पर टिप्पणी करते हुए इसी लेखक ने अन्यत्र लिखा है कि यह ‘‘एक प्रकार से स्मारकों को ढहा कर अतीत से मुक्ति पाने का एक नपुंसक तरीका है। पुरानी भूलों के बजाय चर्चा उन भूलों के कारणों की, उनके पीछे की सामाजिक-राजनीतिक विफलताओं की होनी चाहिए। और सबसे बड़ी जरूरत इन ऐतिहासिक भूलों के कारकों से निष्ठुरता के साथ मुक्ति पाने की है, न कि किसी सर्वसमावेशवाद के तहत लाशों के बोझ को ढोने की।’’

गौर करने लायक बात यह है कि पार्टी कांग्रेस में चल रही इस बहस के बारे में अब तक जो भी संकेत दिये जा रहे हैं, उनसे पता चलता है कि आगे से सीपीआई(एम) आंचलिक बुर्जुआ दलों के साथ मिल कर किसी तीसरे विकल्प को तैयार करने के चक्कर में नहीं पड़ेगी। उसकी केंद्रीय राजनीति की दिशा सिर्फ वामपंथी दलों की एकता को कायम करने की दिशा होगी। चुनाव आदि के अवसरों पर आंचलिक बुर्जुआ दलों के साथ जो भी समझौते होंगे उनके लिये हर राज्य की इकाई को अपने लाभ-नुकसान को देखते हुए स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने होंगे।

अगर यह बात सच है तो कहना न होगा, यह किसी हारे-थके बदहवास से व्यक्ति के लिये येन-केन-प्रकारेण अपने लिये सुकून, सुख और शान्ति के कोने में दुबक कर बैठ जाने की काल्पनिक लालसा जैसा है। सीपीआई (एम) के लिये अभी वाम एकता का नारा सुकून के एक वैसे ही अंधेरे कोने की तरह है । हमारा सवाल है कि अगर आंचलिक पूंजीवादी दलों का अवसरवाद त्याज्य और वर्जित है तो सभी वामपंथी दलों का इतिहास भी इस मामले में कोई दूध का धुला हुआ नहीं है। ज्यादा दूर न जाकर, अभी-अभी फिर से वाममोर्चा की शोभा बढ़ाने के लिये आई एसयूसीआई कल तक पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के जानी दुश्मनों की कतार में शामिल रही है। इतनी सारी अलग-अलग वामपंथी पार्टियों का अस्तित्व ही इनके पीछे की कुछ कहानी तो कहता ही है!

दरअसल, गहराई से देखने पर ऐसा लगता है कि सीपीआई(एम) के वर्तमान नेतृत्व ने कुछ इतनी बड़ी-बड़ी, पहाड़ समान कार्यनीतिक भूलें की हैं, जिन्हें वह अपनी स्मृतियों तक में कोई स्थान देने से आज जैसे कांप सा उठता है। इसमें उदाहरण के तौर पर हम दो सबसे बड़ी घटनाओं का यहां उल्लेख करना चाहेंगे। पहली 1996 में, जब ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के पस्ताव को केंद्रीय कमेटी के इसी नेतृत्व ने ठुकरा दिया था। और दूसरी घटना है 2009 में, जब परमाणु संधि के नाम पर यही नेतृत्व यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेकर मनमोहन सिंह सरकार को उखाड़ फेंकने के लिये ताल ठोक कर उतर पड़ा था।

कहना न होगा, कार्यनीति के क्षेत्र में इस नेतृत्व द्वारा लिये गये ये दोनों फैसले ही संसदीय जनतंत्र में सीपीआई(एम) के भविष्य को प्रभावित करने वाली इतनी भारी घटनाओं के मूल में रहे हैं, जिनपर आज तक जारी राजनीतिक बहसों के बावजूद उसका वर्तमान नेतृत्व उन्हें भुला कर अपने राजनीतिक इतिहास की स्मृतियों से बिल्कुल बाहर कर देना चाहता है। इन दोनों घटनाओं पर चली बहसें इस नेतृत्व के लिये लगभग असहनीय है क्योंकि इनसे भारतीय वामपंथ को लगे सदमे इतने घातक है कि उनकी स्मृतियों के साथ कोई भी अपनी बनायी दुनिया में चैन की एक सांस भी नहीं ले सकता है। ये दोनों घटनाएं ही कोरी कल्पनाप्रसूत नहीं हैं, जिनका कोई ठोस अस्तित्व न रहा हो। ये ठोस ऐतिहासिक तथ्य है और इसी 25 साल की अवधि के अंदर के तथ्य है जिस पर सीपीआई(एम) की इस कांग्रेस में बहस की जा रही है। फिर भी इनका इस दस्तावेज में कायदे से कोई उल्लेख न होना इन्हें लेकर वर्तमान नेतृत्व के भीतर की प्रेत-ग्रंथी को बताने के लिये काफी है।

अपनी विफलताओं के कारणों की इस कहानी से मूंह चुरा कर सीपीआई(एम) का नेतृत्व उन कारणों को समझने से इंकार कर रहा है जिनकी वजह से किसी के महापतन के ऐसे आख्यान तैयार होते हैं। जब कोई अपने भटके हुए कदमों की सचाई को जानने से इंकार करता है तो वह अकारण नहीं होता। इसके मूल में सीपीआई(एम) के वर्तमान नेतृत्व की एक थोथी क्रांतिकारी ललक, एक आदिम झूठ की बड़ी भूमिका जान पड़ती है जिससे अपने अस्तित्व के आधार के बारे में काल्पनिक कहानियां गढ़ के वह दूसरों को बरगलाता है। इसी के चलते यथार्थ और कल्पना का भेद मिट जाता है, ठोस राजनीतिक कार्यनीति का स्थान डॉन क्विगजोटिक क्रांतिकारी स्वांग लेने लगता है।



बुधवार, 15 अप्रैल 2015

राष्ट्र के हित में इंटरनेट सेवाओं का पूर्ण राष्ट्रीयकरण जरूरी है : प्रसंग नेट- तटस्थता



अरुण माहेश्वरी

तथाकथित कारपोरेट जनतंत्र के ध्वजाधारी अमेरिका में अभी तक जिस ओर लोगों का ध्यान उतनी संजीदगी से नहीं गया है, उस सवाल ने आज भारत के व्यापार जगत में जिस प्रकार की एक गहरी बहस का रूप ले लिया है, उससे भारतीय अर्थ-जगत के आगामी स्वरूप के बारे में कुछ अंदाज तो जरूर मिल सकता है। यह सवाल है नेट तटस्थता (Net neutrality) का सवाल।

पिछले दिनों यहां रिलायंस की इंटरनेट कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशन ने 38 कंपनियों के साथ ऐसे समझौते किये थे जिनसे उन कंपनियों के एप्स का प्रयोग करने पर इंटरनेट ग्राहकों को कोई कीमत अदा नहीं करनी पड़ेगी। इस खर्च को विक्रेता कंपनियां खुद उठायेगी।

इसके साथ ही इंटरनेट कंपनियों में चुनिंदा कंपनियों से ऐसे समझौतों की एक होड़ सी मच गयी। एयर टेल की इंटरनेट कंपनी ने बाकायदा एक नया साइट ही शुरू कर दिया - एयरटेल जीरो। एयरटेल जीरो के साथ नेट-विपणन की अभी सबसे तेजी से बढ़ रही कंपनी फ्लिपकार्ट ने समझौता किया। इस समझौते के साथ ही इस पूरे मामले की जानकारी रखने वाले तबकों में एक तूफान सा खड़ा होगया। यह सवाल उठाया जाने लगा कि इस प्रकार तो इंटरनेट पर बड़ी पूंजी की पूर्ण इजारेदारी कायम होजायेगी और बेहतर उत्पादों के निर्माता होने पर भी सिर्फ पूंजी के अभाव के चलते उन्हें अपने विस्तार के लिये इंटरनेट के प्रयोग की समान सुविधा नहीं मिल पायेगी।

दूसरी ओर, एयरटेल जीरो के साथ फ्लिपकार्ट के समझौते का एक तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि अन्य इंटरनेट साइट पर से लोगों ने भारी संख्या में फ्लिपकार्ट के एप्स को उतारना शुरू कर दिया। इसके चलते फ्लिपकार्ट को एयरटेल की मुफ्त सुविधा से होने वाले लाभ की जगह नुकसान कहीं ज्यादा होने लगा।
फ्लिपकार्ट के जो मालिक शुरू में एयरटेल जीरो के साथ अपने समझौते की जोरदार पैरवी कर रहे थे, अचानक ही उन्होंने पैंतरा बदल कर इंटरनेट तटस्थता के पक्ष में एक सैद्धांतिक रुख अपना लिया और एयरटेल जीरो से हुए समझौते से पीछे हट गयें। और इसके साथ ही, ‘नेट तटस्थता’ का मुद्दा अखबारों और टेलिविजन चैनलों में एक बहस का मुद्दा बन गया। इंटरनेट जनतंत्र की तरह के कुछ बुनियादी सवाल उठने लगे। केंद्रीय सूचना मंत्री तक ने बयान दे दिया कि वे इंटरनेट तटस्थता के पक्ष में हैं। टेलिकॉम रेगुलेटरी प्राधिकरण ट्राइ के सामने भी यह मसला जा चुका है और इस बारे में वह शीघ्र ही अपनी नीतियों को साफ करने का आश्वासन दे रहा है।

इस पूरे प्रसंग में आज जो सवाल दाव पर है, वह यह कि इंटरनेट प्रणाली अर्थ-जगत में पूर्ण इजारेदारी को कायम करने का माध्यम बनेगी या सबके लिये विकास का समान अवसर प्रदान करेगी ?

यह जाहिर है कि भारतीय अर्थजगत का भावी स्वरूप गुड़गांव आदि की तरह के उभर रहे आईटी केंद्रित शहरों में सक्रिय हजारों नयी स्टार्ट अप की गतिविधियों में निहित हैं। नई तकनीक और इंटरनेट के बल पर आर्थिक जगत के पूरे ताने-बाने का कायांतर होना तय है। अब सवाल यही रह जाता है कि इस नयी आर्थिक संरचना में सिर्फ बड़ी पूंजी के लिये ही जगह रहेगी या छोटी-छोटी पूंजी के प्रतिभाशाली उद्यमी भी इसमें जिंदा रह पायेंगे। इंटरनेट वह बुनियादी क्षेत्र है जिसमें प्रवेश करके ही इस कथित नयी आर्थिक-संरचना का रूप बदलना हैं। अगर इसमें प्रवेश के पहले दरवाजे पर ही इसप्रकार का भेद-भाव किया जाने लगे कि जिससे बड़ी पूंजी के बल पर ही आगे बढ़ा जा सकता है तो यह क्षेत्र अर्थ-व्यवस्था में किसी प्रकार के खुलेपन या प्रतिद्वंद्विता में मददगार बनने के बजाय शुरू में ही इजारेदाराना पूंजी के पूर्ण अधिकार को कायम करने के औजार के रूप में काम करने लगेगा। यह निश्चित तौर पर उन हजारों प्रतिभाशाली नौजवानों को हतोत्साहित करेगा जो दिन-रात परिश्रम करके सारी दुनिया में इस क्षेत्र के विकास में भी आज भारी योगदान कर रहे हैं।

हमारी नजर में अब समय आगया है जब राष्ट्र और मानवता के हित में यह जरूरी है कि इंटरनेट की तरह की सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करके इसे मुनाफाखोरों के चंगुल से पूरी तरह मुक्त किया जाए और इसका प्रयोग करने वालों के साथ किसी भी प्रकार का भेद-भाव बरतने की संभावना ही न छोड़ी जाए। तभी अर्थ-जगत के मानवीय कायांतर में इस महत्वपूर्ण सेवा का कारगर ढंग से इस्तेमाल हो सकता है।



मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

अग्निबीज डिरोजियो





सरला माहेश्वरी


(‘‘बुद्धिमानों की मंत्रणा ने नहीं बल्कि विक्षिप्त लोगों के ‘पागलपन‘ ने मनुष्य के चिंतन और कर्म में, उसके अंदर और बाहर, उसके दर्शन और साहित्य में युग-युग में नये ढ़ग से सृष्टि की है।‘‘ -रवीन्द्रनाथ)
                 
आज हम जिन डिरोजियो के 200 वर्ष पूर्ति पर उनका स्मरण करते हुए बंग समाज के सांस्कृतिक विकास में उनके अभूतपूर्व योगदान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर रहे हैं, वे डिरोजिये जब सिर्फ 22 वर्ष के ही थे तभी काल के निष्ठुर हाथों ने उन्हें इस संसार से उठा लिया था। मात्र 22 वर्ष की उम्र का एक नौजवान कोई प्रकांड पंडित नहीं हो सकता था। उनके आवेग, स्वतंत्र चिंतन और न्याय-अन्याय के तीव्र बोध ने ही उन्हें साधारण जन में एक अतिविशिष्ट जन बना दिया था। वे असाधारण थे क्योंकि उन्होंने गुलामी के उन दुर्दिनों में पूरी तरह से मुक्त और स्वतंत्र मनुष्य का घ्वज फहराया था। उन्होंने हर दबे कुचले इंसान को, समाज के हर पीडि़त तबके को उठ खड़े होने और मनुष्य की गरिमा के साथ जिंदा रहने की शिक्षा देने की कोशिश की थी। और उनकी इन प्रबल, जबरदस्त कोशिशों ने भारत में आकर बसे एक पोर्तुगीज परिवार के वशंधर को भारत के एक पक्के देशभक्त कवि और भारत की जनता के सच्चे दोस्त और भविष्यदृष्टा शिक्षक बना दिया। सचमुच वे एक स्फुर्लिंग की तरह आए और पांच-सात वर्षों के अपने तूफानी क्रिया-कलापों तथा उत्कट विद्रोही विचारों की छटा दिखाकर लुप्त हो गये, लेकिन उनकी चमक बंगाल के सांस्कृतिक आकाश पर जैसे एक अमर सितारे की तरह हमेशा के लिए अंकित हो गयी। सिर्फ 22 वर्ष की उम्र में चला गया नौजवान आश्चर्यजनक रूप में आज भी एक असाधारण शिक्षक और महान विद्रोही पथप्रदर्शक के रूप में याद किया जाता है।

18 अप्रैल 1809 के दिन कोलकाता की एक तत्कालीन व्यापारिक कंपनी जे.स्काट कंपनी के एक बड़े अधिकारी के घर में जन्मे हेनरी लुईस विवियन डिरोजियो का मूल पुर्तगाली नाम डिरोजारियो था। उनके पिता एक युरेशियाई थे और मां अंग्रेज थीं। पिता युरेशियाई इसलिये कहे जाते थे क्योंकि उनकी मां भारतीय और पिता पुर्तगाली थे।

डिरोजियो के व्यक्तित्व के निर्माण में जिस व्यक्ति की सबसे अधिक चर्चा की जाती है वे थे उनके शिक्षक डेविड ड्रमंड। सिर्फ पांच वर्ष की उम्र में डिरोजियो को डेविड ड्रमंड के स्कूल, धर्मतल्ला एकेडमी ऑफ डेविड ड्रमंड में भर्ती कर दिया गया था। इसी स्कूल में उन्होंने 1815-1823 तक शिक्षा प्राप्त की। ड्रमंड इसके सिर्फ दो वर्ष पहले सन् 1813 में स्कॉटलैंड से बंगाल आये थे। ड्रमंड वास्तव में एक भिन्न प्रकृति के इंसान थे। पश्चिमी स्वातंत्र्य चेतना और प्रगतिशील चेतना उनके व्यक्तित्व से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई थी। शिवनाथ शास्त्री ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रामतनु लाहिड़ी ओ तत्कालीन बंगसमाज’ में उनके बारे में लिखा है कि जिस स्वतंत्र चिंतन के प्रभाव से फ्रांसीसी क्रांति का उदय हुआ, वही स्वतंत्र चिंतन उनके अंतर में पूरी तरह से काम कर रहा था। उन्होंने ही इस बात का भी उल्लेख किया है कि अपने निकट के लोगों के साथ धर्म के विषय को लेकर मतभेद होने की वजह से ही वे हमेशा के लिये अपनी जन्मभूमि को छोड़ कर  इस देश में आगये। भारत वे अपना भविष्य बनाने अर्थात धनोपार्जन के लिये ही आये थे, लेकिन चंद दिनों के अंदर ही उन्होंने अपने कुछ मित्रों की मदद से कोलकाता के धर्मतल्ला इलाके में धर्मतल्ला एकेडमी नाम से एक विद्यालय की स्थापना की।

ड्रमंड मनमौजी इंसान थे। उनका यह मानना था कि सामाजिक अनुशासन को बनाये रखते हुए, मनुष्य की रुचियों को बिना विकृत किये अपनी तृप्ति और अपने विकास के लिये हर व्यक्ति को अपनी मन मर्जी के अनुसार जीने का हक होना चाहिये। यदि इस दुनिया में ईश्वर कहीं है तो वे लोग उसकी खोज करें जिनके पास उसे खोजने के लिये बेइंतिहा समय है, लेकिन उनके अनुसार, इस संसार में मनुष्य ही ईश्वर है, मनुष्य ही खुद सर्वव्यापी प्रभु है और ईश्वर चिंता का ही दूसरा नाम मानव चिंता है। मनुष्य से बड़ा इस धरती पर दूसरा कोई सत्य नहीं है। इसप्रकार के विचारों के हामी डेविड ड्रमंड अपने छात्रों को कैसी शिक्षा देते होंगे इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। तत्कालीन भारत के अंग्रेज समाज में भी ड्रमंड एक विवादास्पद व्यक्ति थे। वे कहते थे कि उनके स्कूल में बच्चों को पढ़ाने से बच्चे नास्तिक हो जायेंगे। विनय घोष ने अपनी पुस्तक ‘विद्रोही डिरोजियो’ में ड्रमंड के बारे में लिखते हुए बताया है कि ‘अखबारों की स्वतंत्रता‘ के बारे में उनकी एक कविता उन दिनों भारी चर्चा का विषय बनी थी।

19 वीं सदी के तत्कालीन कोलकाता के समाज में ड्रमंड की तरह के अनूठे शिक्षक की स्मृतियों के और तो कोई अवशेष नहीं मिलते लेकिन कोलकाता के सर्कुलर रोड पर स्थित कब्रिस्तान में उनकी एक समाधी आज भी कायम है जिसके समाधिफलक पर जो पहली पंक्ति लिखी हुई है वह है-

Beneath lie the mortal remains of
David Drummond, a native of Scotland
and for many years a successful teacher of youth
in this city, he departed this life on the
28th April 1843, aged 56 years

The monument was erected to the memory
of the deceased by a few of his friends and
pupils who respected his character admired
his talents and esteemed his worth.

‘नौजवानों का एक सफल शिक्षक’  (a successful teacher of youth)-इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण था उनका छात्र, हेनरी लुईस विवियन डिरोजियो। इस स्कॉटिश स्वतंत्रचेता विद्वान शिक्षक का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही डिरोजियो में जैसे समंजित होकर एक नये आवेग और ऊर्जा के साथ अवतरित हुआ था। और खुद डिरोजियो ने अपने विद्यार्थी जीवन के बाद जब कर्म जीवन में अपने कदम रखे तो 17 वर्ष की उम्र में ही तत्कालीन हिंदू कॉलेज में एक शिक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई और 1826 से लेकर 1831 तक का सिर्फ 6 वर्षों का उनका जीवन काल ही कुछ इतना विस्मयकारी, रुढि़बद्ध समाज के लिए इतना चुनौतीभरा और गुलाम मस्तिष्कों को मुक्ति के लिये झकझोर देने वाला ऐसा उत्तेजक काल रहा है कि जिसकी स्मृतियों से समूचा बंग समाज आज तक उद्वेलित और प्रेरित होता है।

डिरोजियो के वक्त का कोलकाता सामंतों और व्यापारियों का एक उदीयमान शहर था। अंग्रेजों ने ग्रीक दास प्रथा की तरह कोलकाता को भी दासों की एक मंडी बना रखा था। विलियम जोन्स ने यहां के गुलामों की दुर्दशा देखकर लिखा था-‘‘यहां के गुलामों की दुरावस्था की जो बात मैं जानता हूं वो इतनी मार्मिक है कि उसे बताने में भी संकोच होता है। हर दिन मेरे कानों तक गुलामों पर निष्ठुर जुल्मों की जो कहानी पहुंचती है, उन्हें सुनना भी मुझे महापाप की तरह लगता है। इस काफी आबादी वाले शहर कोलकाता में ऐसे पुरुष या स्त्रियां बहुत कम ही हैं जिनके घर में कम से कम एक बेटा या बेटी गुलाम न हो।‘‘
कोलकाता से प्रकाशित होने वाले तत्कालीन ‘कलकत्ता गजट‘, ‘समाचार दर्पण‘ की तरह के अखबारों में इस शहर के गुलामों के बारे में कई तरह की खबरें प्रकाशित होती रहती थी। और इसी शहर में डिरोजियो ने अपने गुरू से स्वतंत्रता और मुक्त मन तथा आजाद मस्तिष्क की शिक्षा ली थी। कोलकाता में सर्वत्र दिखाई देने वाली गुलामी की प्रथा ने उस नौजवान हृदय को बुरी तरह झकझोरा था और सिर्फ 18 वर्ष की उम्र में ही कैम्पबैल की इस प्रसिद्ध पंक्ति-
And as the slave departs, the man returns के हवाले के साथ उन्होंने जो कविता लिखी, वह इसप्रकार थी:

How felt he when he first was told
A slave he ceased to be;
How proudly beat his heart, when first
He knew that he was free!
...
Oh freedom! there is something dear
e’en in the very name
...
success attend the patriot sword,
That is unsheathed for thee!
...
Blest be the generous hand that breaks
The chain a tyrant gave
And feeling for degraded man
Gives freedom to the slave.

गुलाम को जब पता चला कि वह दासता के दंड से मुक्त हो गया है तो उसको कैसा महसूस हुआ होगा, कैसे गर्व से उसका हृदय धड़कने लगा होगा जब उसे पहली बार पता चला होगा कि वह मुक्त हो गया है...‘स्वतंत्रता‘ नाम की ऐसी महत्ता है कि जो भी देशभक्त इस पवित्र नाम का संकल्प लेकर तलवार उठाता है वह कभी पराजित नहीं होता। जिस हृदय से रक्त झरता है, वही हृदय आत्मोत्सर्ग के गर्व से भर उठता है, जो हाथ अत्याचारियों की बेडि़यों को काटकर पराधीन, लांछित मनुष्य को आत्मसम्मान प्रदान कर सकता है, वह हाथ धन्य है।

डिरोजियो की इस कविता का शीर्षक था, ‘गुलाम की मुक्ति‘। 19 वीं सदी का तत्कालीन कोलकाता का बंग समाज किस प्रकार सामंती पतनशीलता और पोंगापंथी विचारों की गिरफ्त में पूरी तरह फंसा हुआ था, इसका विवरण 18वीं और 19वीं सदी के बंगाल के इतिहास में सर्वत्र मिलता है। शिवनाथ शास्त्री के शब्दों में तब झूठ, प्रवंचना, घूस, धोखा, फरेब आदि के जरिये रुपये इके करके धनी बनने में शर्म की कोई बात नहीं थी। उल्टे निकट के पांच जन इके होने पर इसीप्रकार के लोगों की चतुराई और बुद्धिमानी की तारीफ हुआ करती थी। धनी लोग अपने माता-पिता के श्राद्ध पर, बेटे-बेटियों की शादी में, पूजा त्यौहारों में भारी धन खर्च करके आपस में प्रतियोगिता किया करते थे। ...धनी गृहस्थ खुले आम वैश्याओं के साथ मौज-मस्ती में कोई शर्म नहीं करते थे। तब उत्तर पश्चिम तथा मध्य भारत से गायिकाओं और नर्तकियों के दल शहर में आते थे, जिन्हें बाईजी के संभ्रांत संबोधन से संबोधित किया जाता था। ...किस रईस ने किस प्रसिद्ध बाईजी पर कितने हजार रुपये बहाये, शहर के भद्रजनों की महफिलों में ऐसी खबरें काफी चला करती थी और इसमें कोई किसी प्रकार की बुराई नहीं देखता था।

यह खास प्रकार के बाबुओं का जमाना था जिनके बारे में शिवनाथ शास्त्री लिखते हैं: ये बाबू दिन में सोते, पतंग उड़ाते, बुलबुल की लड़ाई देखते, सितार इसराज बीन आदि बजा कर, कविताएं, हाफ आखड़ाई (संगीत की छोटी महफिल), पांचाली (गीत प्रतियोगिता) आदि को सुन कर, रात को वारांगनाओं के घर घर में गीत संगीत सुन कर तथा मौज मस्ती करके समय बीताते थे। इसीप्रकार शास्त्रीजी ने गांजे के ओं और धार्मिक कर्मकांडों की भरमार का भी विस्तार से चित्र खींचा है।

ऐसे समय में सन् 1809 में जब डिरोजियो का जन्म हुआ था, राममोहन राय तब तक कोलकाता शहर में रहने के लिये नहीं आये थे। डिरोजियो जब ड्रमंड के धर्मतल्ला एकेडमी में भर्ती हुए उसी समय सन् 1814 के मध्य में राममोहन राय ने कोलकाता में रहना शुरू किया। एक ओर डिरोजियो की शि़क्षा का क्रम चल रहा था और दूसरी ओर बंग समाज में नये युग के आदर्श और मूल्यों के प्रणेता के रूप में राममोहन उभर कर सामने आ रहे थे और इससे वस्तुत: पूरा हिंदू समाज कांप रहा था। राममोहन की ‘आत्मीय सभा‘ की स्थापना हो चुकी थी। डिरोजियो जब सिर्फ 9 वर्ष के विद्यार्थी थे उसी समय सती प्रथा विरोधी राममोहन के लेख प्रकाशित होने लगे थे। और इसप्रकार जब डिरोजियो ड्रमंड स्कूल से एक स्वतंत्रचेता मनुष्य के रूप में निकलकर आये, उस समय तक राममोहन राय तथा बांग्ला नवजागरण के अन्य अग्रदूतों ने वह जमीन बनानी शुरू कर दी थी जिस जमीन पर डिरोजियो की तरह के परम विद्रोही मस्तिष्क के लिए भी पांव रखने की थोड़ी सी जगह हो सकती थी।

डिरोजियो ने 1823 में अपनी शिक्षा पूरी की और उसके बाद कुछ दिनों तक उन्होंने उसी वाणिज्यिक कंपनी में क्लर्क की नौकरी की जहां उनके पिता काम करते थे। एक क्लर्क का सीमित जीवन डिरोजियो को कत्तई रास नहीं आ सकता था। और सिर्फ दो वर्ष की नौकरी के बाद ही नौकरी से पल्ला झाड़कर वे भागलपुर में घूमने के लिये अपनी मौसी के घर चले गये। गंगा नदी के तटों पर भागलपुर, डालटनगंज की गिरि श्रंखलाओं के प्राकृतिक सौंदर्य ने डिरोजियो के युवा मन को एक कवि मन में रूपांतरित कर दिया। उसी दौरान, प्राकृतिक सौंदर्य की अन्य कविताओं के साथ ही कवि डिरोजियो ने ‘द फकीर ऑफ जंगीरा‘ की तरह की ऐसी अमर रचनाओं का सृजन किया जिसे भारत में लिखे गये अंग्रेजी साहित्य में सदा आदर के साथ रखा जायेगा।

डिरोजियो के शैक्षणिक जीवन काल में ही कोलकाता में 20 जनवरी 1817 के दिन हिंदू कॉलेज की स्थापना हुई थी। भारत में अंग्रेजी शिक्षा का यह पहला सरकारी प्रतिष्ठान था जिसका उद्धेश्य भारत के युवको को यूरोपीयन विज्ञान, साहित्य और पश्चिमी विचारों से परिचित करवाना था। हिंदू कालेज की स्थापना में नेतृत्वकारी भूमिका सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर हाइड ईस्ट और डेविड हेयर ने अदा की थी। लेकिन इसे खास तौर पर राममोहन राय का सहयोग प्राप्त था। हांलाकि शिवनाथ शास्त्री के ब्यौरे के अनुसार राममोहन राय और डेविड हेयर ने मूलत: इस प्रकार के कालेज की स्थापना की योजना बनायी थी और राममोहन के ‘आत्मीय सभा’ के एक सदस्य बैद्यनाथ मुखर्जी ने इस योजना की खबर सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सर हाइड ईस्ट को दी। हाइड ने इस योजना का हार्दिक स्वागत किया हाइड के घर पर हुई एक सभा में हाइड और हेयर ने ऐसे कालेज की स्थापना का प्रस्ताव तत्कालीन हिंदू समाज के प्रमुख लोगों के सामने रखा। इस प्रस्ताव का सबने काफी उत्साह के साथ स्वागत किया। लेकिन शिवनाथ शास्त्री ने ही बताया है कि जब करपंथी हिंदू नेताओं को इस बात का पता चला कि अंग्रेजों की इस पहलकदमी के पीछे राममोहन राय का भी हाथ है तो वे यकबयक बिदक गये और उन्होंने यह शर्त रखी कि जब तक राममोहन राय को इस कॉलेज की स्थापना के लिये बनाई गयी समिति से हटाया नहीं जाता, तब तक वे खुद इस समिति का समर्थन नहीं करेंगें। प्यारेचंद मित्र ने डेविड हेयर की जीवनी में इस घटना का जिक्र इस प्रकार किया है : ‘‘प्रस्तावित कालेज के साथ अपना संबंध तोड़ने के लिये राममोहन को मनाने में कोई कठिनाई नहीं थी, क्योंकि वे समिति के सदस्य के रूप में अपने नाम के खोखले दिखावे की अपेक्षा अपने देशवासियों की शिक्षा को अधिक मूल्यवान समझते थे। ‘‘

इस पूरे प्रसंग को यहां उठाने का तात्पर्य यह बताना है कि जब डिरोजियो ने अपने कर्म जीवन में प्रवेश किया और सन् 1826 में इसी हिंदू कॉलेज में जब एक शिक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई, उस समय के बंग बौद्धिक समाज में पहले से ही किसप्रकार की उत्तेजना फैली हुई थी और विचारों की टकराहट से पैदा होने वाला सामाजिक आलोड़न साफ दिखाई दे रहा था। कट्टरपंथियों और उदारपंथियों के बीच की तकरारों ने उस समय के बौद्धिक जगत को पूरी तरह से उद्वेलित कर रखा था और कहना न होगा कि नये और पुराने विचारों, नयी और पुरानी संस्थाओं के बीच टकरावों और तकरारों का परिवेश ही वस्तुत: वह परिवेश होता है जिसे किसी भी समाज के लिये नवजागरण का काल कहा जा सकता है। डिरोजियो को भी नवजागरणकालीन इस व्यापक आंदोलन की उत्पत्ति कहा जा सकता है। डिरोजियो अपने जिन विद्रोही विचारों के लिए विख्यात हुए उन विचारों के लिए तत्कालीन समाज में पहले ही बारूद बिछ चुकी थी, सिर्फ एक चिंगारी की जरूरत थी। और कहना न होगा कि डिरोजियो ने उसी चिंगारी की भूमिका अदा की थी।
हिंदू कॉलेज, जिसे एंग्लो-इंडियन कॉलेज, महापाठशाला, नैटिव हिंदू कॉलेज और विद्यालय आदि कई नामों से जाना जाता था, के उद्धेश्यों के बारे में तत्कालीन शिक्षा निरीक्षक विल्सन ने कहा था कि ‘‘यह कॉलजे वह प्रमुख स्रोत होगा जिसके जरिये यूरोपीय स्रोतों से प्राप्त होने वाले सच्चे ज्ञान को हिंदुस्तान के बौद्धिक जीवन में रूपांतरित किया जा सकेगा।‘‘ नौजवान शिक्षक डिरोजियो की सारी गतिविधयां हिंदू कॉलेज के इस घोषित उद्धेश्य के साथ मेल खाती थी। लेकिन मजे की बात यह है कि इसी नौजवान शिक्षक ने जब नवजागरण के सच्चे आदर्शों, स्वतंत्रता, हर विषय पर सवाल उठा कर संशय व्यक्त करने की प्रश्न चेतना और रुढि़बद्ध स्थापित विचारों को चुनौती देने के नवजागरणकालीन मूल्यों को यथार्थ में प्रतिष्ठित करना शुरू किया तो हिंदू कॉलेज के तमाम अधिकारीगण को डिरोजिये की गतिविधियां नागवार गुजरी। डिरोजियो ने शिक्षा के स्तर को जितना ऊंचा बनाये रखा था, इसका पता तो विल्सन की रिपोर्ट से ही लग जाता है। विल्सन ने सन् 1828 की अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि कॉलेज के सीनियर छात्रों की अंग्रेजी रचना शक्ति को देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये थे। कॉलेज के अव्वल दर्जे के छात्रों में पोप की कविता, मिल्टन के पैराडाइज लोस्ट और शेक्सपीयर के अच्छे-अच्छे नाटकों के बारे में जानकारी के स्तर को देखकर वे चमत्कृत थे। इतिहास, दर्शन, गणित और विज्ञान के विषयों में भी उन्होंने छात्रों को पारंगत पाया था।

सन् 1826 के बाद से ही हिंदू कॉलेज की छात्र संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि देखी गयी थी। हिंदू कॉलेज में पैसे देकर पढ़ने वालों को पे-स्कॉलर कहा जाता था और बाकी के लोग बिना शुल्क के पढ़ाई किया करते थे। विनय घोष की पुस्तक में उल्लेखित आंकड़ों के अनुसार, 1824 तक इस कॉलेज के छात्रों की कुल संख्या औसतन 100 से अधिक नहीं थी जिनमें पे-स्कॉलर सिर्फ 24 थे। 1825 के बाद धीरे-धीरे पे-स्कॉलरों की संख्या बढ़ने लगी और 1826, 1827 तथा 1828 में इनकी संख्या क्रमश: 223, 300 और 336 हो गयी। सन् 1828 में हिंदू कॉलेज के कुल छा़त्रों की संख्या 436 थी। 1850 तक आते-आते ऐसे पे-स्कॉलरों की संख्या औसतन 450 तक पंहुच गयी थी। गौर करने लायक बात यह है कि 1825 से लेकर 1850-51 तक के इन 25 वर्षों में हिंदू कॉलेज में छात्रों की संख्या में जो लगातार वद्धि हो रही थी उनमें अचानक 1829-30 के दो-तीन वर्षों में कुछ गिरावट भी देखी गयी। इन दो-तीन वर्षों में छात्रों की संख्या में गिरावट के कारणों की व्याख्या करते हुए मि. जे. कर ने लिखा है-‘‘इस गिरावट के पीछे अशत: तो कुछ और स्कूलों की स्थापना काम कर रही थी, अंशत: उस काल की वाणिज्यिक दुरावस्था भी एक कारण थी और आंशिक तौर पर नैटिव्स के बीच पैदा हुआ वह डर भी था कि उनके बच्चों के धर्म में हस्तक्षेप किया जा रहा है और श्रीमान डिरोजियो के प्रभाव के कारण उनके बच्चे अपने पूर्वजों के सम्मानित रीति-रिवाजों के प्रति तेजी से अपनी श्रद्धा को गंवा रहे हैं।

छात्रों पर डिरोजियो का प्रभाव और परम्परागत रीति-रिवाजों के प्रति छात्रों के मन में पैदा हो रही विद्रोही मानसिकता, यह एक ऐसा विषय था जिस पर पोंगापंथी हिंदू अभिभावकों के बीच गहरी शंकाएं पैदा हो गयी थीं। और कहना न होगा कि कोलकाता के व्यापक समाज में तब डिरोजियो के प्रति असंतोष और नफरत की एक आंधी बह रही थी।

हिंदू कॉलेज में एक ओर शिक्षा का बढ़ता हुआ स्तर जिसकी वजह से वहां छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही थी और जिसमें डिरोजियो की प्रमुख भूमिका थी, वहीं दूसरी ओर डिरोजियो के प्रति ही हिंदू समाज में तीव्र आक्रोश का पैदा होना-इस अस्वाभाविक से दिखाई देने वाले घटनाक्रम के मूल में क्या बात थी, यह किसी के लिए भी गहरी दिलचस्पी का विषय हो सकता है। विनय घोष ने अपनी पुस्तक ‘विद्रोही डिरोजियो‘ में इस घटनाक्रम के मूल कारण की व्याख्या करते हुए इसके लिये डिरोजियो के अनोखे और चुम्बकीय व्यक्तित्व को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने लिखा है कि हिंदू कॉलेज में पंडितों की कमी नहीं थी लेकिन डिरोजियो की तरह का चुम्बकीय व्यक्तित्व, किसी को भी चमत्क्रृत कर देने वाली उसकी प्रतिभा उन सबमें अन्यतम थी।

‘‘जो छात्र उनके करीब आते वे सिर्फ विद्या की बर्फ समान शीतल चट्टान के दबाव को ही सहन नहीं करते थे, प्रतिभा की चिंगारी के ताप का भी अनुभव करते थे। गुरु-शिष्य, छात्र-शिक्षक के बीच तो रहता ही है, मनुष्य और मनुष्य के संबंधों के बीच भी जहां सिर्फ मजबूरियों का दबाव रहता है, हृदय की कोई उष्मा नहीं होती, जहां परस्पर संबंधों में अकृत्रिम कुछ नहीं होता . . . वहीं डिरोजियो के साथ उसके छात्रों के जो आंतरिक संबंध विकसित हुए थे वे अकृत्रिम मानवीय संबंधों की तरह ही बहुत ही अंतरंग थें और इसीलिये बाहर के जनसमाज में वे संबंध आंखों को चौंधिया देने वाली बिजली की चमक के साथ प्रकट हुए थे। खुद डिरोजियो के छात्रों ने अपने शिक्षक के बारे में जो लिखा वे उस अनोखे व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के लिये काफी है। उनका एक छात्र राधानाथ सिकदर लिखता है कि सिर्फ किताबी पांडित्य से ही उनकी शिक्षा समाप्त नहीं हो गयी थी, मनुष्य के जीवन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण शिक्षा सत्य के प्रति अटल निष्ठा और अन्याय के प्रति तीव्र घृणा और इसे उन्होंने अपने नौजवान शिक्षक डिरोजियो से ही हासिल किया था।

डिरोजियो और उनके छात्रों को इतिहास में ‘यंग बंगाल‘ के नाम से जाना जाता है। सन् 1834 में जब डिरोजियो की मृत्यु को तीन वर्ष हो चुके थे, लाल बिहारी दे पढ़ाई के लिये कोलकाता आये थे। इस वक्त तक डिरोजियन युग का हल्ला शांत नहीं हुआ था। गुरू की मृत्यु के बाद ‘यंग बंगाल‘ समूह ने और ज्यादा उत्साह के साथ उनके आदर्शों का प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया था। लाल बिहारी दे खुद एक प्रतिभाशाली छात्र थे और कोलकाता में कदम रखने के साथ ही उनका परिचय यहां के इस नये वातावरण के साथ हुआ था। डिरोजियो के छात्रों से उन्होंने डिरोजियो के बारे में कई कहानियां सुनी थीं। बाद में इसके बारे में लिखते हुए लाल बिहारी दे ने लिखा है :

‘‘हिंदू कॉलेज के तरुण छात्र बेकन, लॉक, बर्कले, ह्यूम, रीड, स्टीवर्ट आदि पश्चिमी दार्शनिकों के श्रेष्ठ साहित्य से परिचित हुए। इस परिचय से उनके गतानुगतिक सोच में एक क्रांतिकारी आलोड़न का सूत्रपात हुआ। प्रत्येक विषय के संदर्भ में उन्होंने प्रश्न उठाना तथा तर्क करना शुरू कर दिया। इसके चलते उनमें अनेक प्रचलित जड़ धारणाओं की जड़ें हिल गयी, युगों पुराने उनके आस्था के स्तम्भ हिलने लगे। इस नयी शिक्षा के अप्रतिद्वंद्वी शिक्षक थे, डिरोजियो। हिंदू कॉलेज में वे छात्रों की जो क्लास करते उसकी आबोहवा ही सबसे अलग थी। उनके पढ़ाने का ढ़ंग एकदम स्वतंत्र था। छात्रों को उनकी कक्षा में शिक्षा का जो नया आस्वादन मिलता, वह और कहीं विशेष मिलता नहीं था। डिरोजियो का प्रधान लक्ष्य था, छात्रों के अंदर ज्ञानेच्छा जागृत करना। हो सकता है यह छोटे विषय के साथ बड़े की तुलना हों, लेकिन ऐसा होने पर भी डिरोजियो क्लब के साथ एकमात्र प्लेटो और अरस्तू के ‘एकेडमी‘ की तुलना की जा सकती है। क्लास रूम के बंद परिवेश में स्वाभाविक रूप में ही विषय वस्तु पर आलोचना की स्वतंत्रता और गंभीरता रखना कठिन होता। डिरोजियो ने इसीलिये कॉलेज के बाहर अपने घर के बैठकखाने में छात्रों को बुलाना शुरू कर दिया। वहां के मुक्त परिवेश में विचार-विमर्श बहुत अच्छी तरह जम जाता, शिक्षक और उनके छात्र सभी को मन खोलकर अबाध रूप में बातचीत का मौका मिलता। कुछ ही दिनों में बैठकखाने का परिवेश भी बातचीत के लिये पूरी तरह उपयुक्त नहीं लगा। तब उन्होंने छात्रों को लेकर बाहर एक अघ्ययन चक्र और वाद-विवाद सभा गठित की।‘‘

डिरोजियो की शिक्षा पद्धति क्या थी, उनके छात्रों ने उनसे क्या गृहण किया, उनके छात्र सिर्फ शिक्षित ही नहीं बल्कि समाज के चरित्रवान, शक्तिशाली लोग थे, उन्होंने प्रश्न उठाना सीखा था। इन सबका एक परिचय लाल बिहारी दे के उपरोक्त कथन से मिलता है।

जाहिर है कि इसप्रकार के एक पूरी तरह से स्वतंत्र और मुक्त मस्तिष्क के लोगों के लिये कॉलेज के क्लास रूम बहुत ही संकुचित प्रतीत होने लगे। इन गुरू और शिष्यों की गोष्ठियां अब कॉलेज से निकल कर पहले डिरोजियो के घर में और फिर उनके एक छात्र, कृष्ण बिहारी सिंह की मानिकतल्ला स्थित बगानबाड़ी में होने लगी। इन गोष्ठियों का नामकरण किया गया, ‘एकेडेमिक एसोसियेशन‘। नौजवान छात्रों की इन विचार-गोष्ठियों की चर्चा तब पूरे समाज में होने लगी थी। लाल बिहारी दे ने लिखा है कि अकादमीशियनों की इस वाटिका में हफ्ते-दर-हफ्ते होने वाले वाद-विवाद में नौजवान कोलकाता उस वक्त के सामाजिक, नैतिक और धार्मिक विषयों को उठाया करता था। इन बहसों की मुख्य धार स्थापित धार्मिक संस्थाओं के विरुद्ध सुचिंतित विद्रोह पर केंद्रित होती थी। शिक्षा क्षेत्र के ये नौजवान सिंह (यंग लॉयंस ऑॅफ बंगाल) हर हफ्ते हिंदू धर्म का नाश हो, पोंगापंथ का नाश हो, के नारों के साथ दहाड़ा करते थे।

बंगाल के इन नौजवानों ने अपने वक्त के धार्मिक पिछड़ेपन, नैतिक मिथ्याचार और घिनौनेपन के खिलाफ, कुप्रथाओं और कुसंस्कारों के विरुद्ध, विवेकहीन शास्त्र-वचनों के खिलाफ, जात-पांत और मूर्ति-पूजा के विरुद्ध, राष्ट्रीय आर्थिक और मानसिक जड़ता के खिलाफ और यहां तक कि ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध भी इन गोष्ठियों में जो गर्जन-तर्जन हुआ करता था, उसकी ध्वनि-प्रतिघ्वनि समाज के विभिन्न स्तरों में सुनाई देने लगी थी। पारम्परिक समाज में इन चुनौतियों के सम्मुख एक प्रकार का आतंक पैदा हो गया था। डिरोजियंस की गोष्ठियों में तब कौन नहीं आता था। इनमें आने वालों में डेविड हेयर भी शामिल थे, विलियम बैंटिक के निजी सचिव भी आते थे, बिशप कॉलेज के अध्यक्ष, कोलकाता के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, कितने ही अखबारों के संपादक और शिक्षा प्रेमी लोग यहां इकट्ठा हुआ करते थे और यहां से नौजवानों की गरमा-गरम बातों से खुद के अंदर तारुण्य की स्फूर्ति भरकर जाया करते थे। विभिन्न सूत्रों से इन गोष्ठियों का जो विवरण मिलता है उनसे पता चलता है कि ये गोष्ठियां पूरी तरह से अनुशासित और इतने विद्वतापूर्ण वातावरण में आयोजित की जाती थी कि जिनमें गंभीर से गंभीर बहस के बावजूद कभी किसी को निजी स्तर पर कोई ठेस नहीं पंहुचाई जाती थी। ये सत्य के संधान की गोष्ठियां थीं। बहस में कोई भी पक्ष और विपक्ष नहीं होता था। एसोसियेशन के सदस्यों के अलावा श्रोताओं को भी बहस में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया जाता था। और, जैसा कि एक प्रत्यक्षदर्शी एलेक्जेंडर डफ के दिये गये विवरण से पता चलता है-‘‘इन बहसों में शामिल होकर कोई भी अपने को धन्य समझता था।‘‘ बहस का स्तर इतना ऊंचा होता था कि किसी को भी यह नौजवानों की गोष्ठी प्रतीत नहीं होती थी और इसलिये तत्कालीन समाज का हर उम्र, ओहदे और प्रकांड पंडित समझा जाने वाला व्यक्ति भी इन गोष्ठियों में उत्साह के साथ शामिल हुआ करता था। वक्तागण अपने वक्तव्यों के दौरान अनायास ही अंग्रेजी साहित्य की लम्बी उद्धृतियां दिया करते थे। ऐतिहासिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक सभी विषयों पर बहसें हुआ करती थी।। विनय घोष ने ऐसे कुछ विषयों को गिनाते हुए लिखा है कि ऐतिहासिक विषय होता तो रॉबर्टसन और गिबन की, राजनीतिक विषय होता तो एडम स्मिथ और जेरेम बेंथम की, वैज्ञानिक विषय होता तो न्यूटन और डेवी की, धार्मिक विषय होता तो ह्यूम और टामस पेइन, आध्यात्मिक विषय होता तो लॉक, रीड और स्टीवर्ट और ब्राउन की तरह के मनीषियों की रचनाओं का इन नौजवान सदस्यों द्वारा अपने पक्ष में बखूबी इस्तेमाल किया जाता था। उनके भाषण उस वक्त के प्रसिद्ध अंग्रेज कवियों, बायरन, वाल्टर स्काट की तरह के प्रमुख रचनाकारों की पंक्तियों से सुसज्जित हुआ करते थे। यहां एक अद्भुत सम्मोहक वातावरण हुआ करता था जिसमें पांडित्य और वाग्मिता का अपूर्व मिश्रण दिखाई देता था। ईश्वर के अस्तित्व, जाति प्रथा की अच्छाई और बुराई, मूर्ति-पूजा का पक्ष और विपक्ष, अंधविश्वास बड़ा है न कि तर्क और विवेक, अबाध व्यक्ति स्वातं़़त्र्य या बाधित, समष्टि-प्रभुत्व के बीच क्या काम्य है क्या वर्जनीय - ये सारे विषय बिल्कुल शास्त्रीय स्तर के वाद-विवाद में तारुण्य के आवेग के साथ उठा करते थे।


डिरोजियो युरेशियाई थे, लेकिन वे भारत की एक सच्ची संतान थे। भारत को ही वे अपना देश मानते थे। उनकी ‘जंगीरा का फकीर‘ कविता की चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं, इसके अलावा अनेक छोटी-बड़ी कविताओं में उनकी देशभक्ति के स्वर साफ तौर पर सुने जा सकते थे। बंगाल के ये युवा सिंह सिर्फ सामाजिक कूपमंडूकता के विरुद्ध ही नहीं, विदेशी गुलामी के विरुद्ध भी गरजा करते थे।

मानिकतल्ला की इन अकादमिक सभाओं में जब डिरोजियो और उनके छात्र विचारोत्तेजक गोष्ठियां और विद्रोही चिंतन का सिंहनाद किया करते थे, उस समय तक बंगाल के नवजागरण के अग्रदूत राममोहन राय ने समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था। 4 दिसम्बर 1829 के दिन विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को प्रतिबंधित घोषित कर दिया था। बैंटिक की इस घोषणा से तत्कालीन पुरातनपंथी समाज में जो भारी हलचल मची थी उसे सभी जानते हैं। धर्म गया, जात गयी, का आतंक फैलाकर सारे धर्मघ्वजाधारी लोग सड़कों पर उतर आये थे। सरकार के पास नाना प्रकार के प्रतिवाद, प्रतिवेदन भेजे जा रहे थे। इसी संरक्षणवादी आंदोलन को चलाने के लिये 17 जनवरी 1830 को ‘धर्मसभा’ की स्थापना की गयी थी। पोंगापंथियों का सारा गुस्सा अब स्वतंत्र चेतना और पश्चिमी विचारों के विरुद्ध केंद्रित हो गया था। सरकार का तो वे बाल भी बांका नहीं कर सके लेकिन उन्होंने अपने गुस्से का निशाना हिंदू कॉलेज के प्रतिभाशाली विद्रोही नवशिक्षित नौजवानों को बनाया। उन्हीं दिनों पादरी अलेक्जेंडर डफ ने राजा राममोहन राय के सहयोग से जनरल एसेम्बली इंस्टीट्यूशन की स्थापना की जिसे भारत में ईसाई शिक्षा की आधारशिला बताया गया था। एलेक्जेंडर डफ ने खासतौर पर ‘यंग बंगाल’ के छात्रों को अपना लक्ष्य बना रखा था। उनकी मान्यता थी कि अगर इन प्रतिभाशाली छात्रों के बीच ईसाई धर्म का बीजारोपण किया जा सका तो उससे हिंदू समाज के कुसंस्कारों और उसकी जड़ता की अभेद्य दीवार को तोड़ना ज्यादा आसान होगा। डफ की गतिविधियों ने हिंदू कॉलेज के अधिकारियों के बीच हड़कंप पैदा कर दिया था। उस ईसाई पादरी के प्रभाव से छात्रों को बचाने के लिये कॉलेज की कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित किया कि जिसमें बताया गया कि कॉलेज के छात्रों के अशालीन आचरण से कॉलेज के अघ्यक्ष और अभिभावक अत्यंत क्षुब्ध और विचलित हैं और इसी बिनाह पर धर्म संबंधी किसी भी विचार-गोष्ठी या वक्तव्य में छात्रों की भागीदारी पर उन्होंने रोक लगा दी।

यह समूचा घटनाक्रम कोलकाता के तत्कालीन हिंदू समाज के अभिभावकों की मन:स्थिति को बताने के लिये काफी है। आतंकित अभिभावकों ने अपने बच्चों को कॉलेज से निकालना भी शुरू कर दिया था। औार इसीलिये 1829-32 के बीच हिंदू कॉलेज के छात्रों की संख्या में भी गिरावट आई, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है।

हिंदू कॉलेज की कमेटी द्वारा छात्रों पर लगाये गये प्रतिबंध को तत्कालीन अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं ने ‘धृष्टता‘, ‘निरकुंशता‘, ‘मूर्खता,‘ और ‘हास्यास्पद‘ आदि बताया था। जिस ‘इिंडया गेजेट‘ पत्रिका में कमेटी के इस निर्णय के विरुद्ध कड़े शब्दों में संपादकीय लिखा गया था, उसके सहयोगी संपादक डिरोजियो ही थे। संपादकीय की भाषा को देखकर लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि यह संपादकीय डिरोजियो का ही लिखा हुआ है। इसमें लिखा गया था-‘‘डेविड हेयर और रसोमय दत्त जैसे व्यक्तियों के नाम एक ऐसे दस्तावेज में देखकर हम दुखी हैं जो दस्तावेज राजनीतिक और धार्मिक मसलों पर निजी निर्णय के अधिकार में नाक घुसेड़ने की धृष्टता, निष्ठुरता और मूर्खता का एक उदाहरण पेश करता है।‘‘

छात्रों पर किसी भी धर्म संबंधी विचार गोष्ठी में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाने वाले कमेटी के निर्देश पर इस तीखी टिप्पणी पत्रिका में यह भी लिखा गया कि डफ साहब को अपने भाषण जारी रखने चाहिये।
जाहिर है कि ये तमाम घटनाएं हिंदू कॉलेज में डिरोजियो के विरुद्ध एक नफरत का वातावरण तैयार करने के लिये काफी थी। और चंद दिनों बाद ही इसके परिणाम भी सामने आने लगे।

23 अप्रैल 1831 के दिन हिंदू कॉलेज के गर्वनर चंद्र कुमार ठाकुर, सह सभापति विल्सन, राधाकांत देव, राधामाधव बंद्योपाध्याय, रामकमल सेन, डेविड हेयर, रसोमय दत्त, प्रसन्नकुमार ठाकुर, श्री कृष्ण सिंह और कॉलेज के सचिव लक्ष्मीनारायण मुखोपाध्याय की उपस्थिति में कालेज कमेटी की सभा हुई और इसमें मुख्य रूप से डिरोजियो को ही लक्ष्य बनाकर उनकी विचित्र शिक्षा पद्धति की वजह से नौजवानों के नैतिक पतन के बारे में चिंता जाहिर की गयी। इस सभा के अंत में विचार के लिये जो 14 सूत्री प्रस्ताव पेश किया गया, उसका पहला सूत्र ही था-‘‘चूंकि डिरोजियो सारे अनर्थ की जड़ है तथा आम लोगों में वह आंतक का विषय हो गया है, इसलिये उसे कॉलेज से निकालना उचित है और छात्रों के साथ उसके सीधे सम्पर्कों को तत्काल तोड़ना जरूरी है।‘‘

इसी में एक और प्रस्ताव यह भी था कि ‘‘जो तमाम छात्र हिंदू धर्म विरोधी आचरण करते हैं और इस देश के सामाजिक रीति-रिवाजों को मानकर नहीं चलते, उन्हें भी कॉलेज से बाहर कर देना जरूरी है।‘‘
इसके अलावा छात्रों की भरती के समय उनके स्वभाव और चरित्र के बारे में पूरी तरह खोज-खबर लेने का भी एक प्रस्ताव किया गया था।

एक प्रस्ताव यह भी था कि ‘‘यदि कोई छात्र बाहर की किसी सभा-समिति या भाषण में शामिल होता है तो उसे कॉलेज से निकाल दिया जायेगा।‘‘

इसके अलावा यह भी कहा गया कि ऐसे किसी भी विषय का पठन-पाठन नहीं होगा जिससे छात्रों के नैतिक चरित्र का पतन होता हो। इसके साथ ही फारसी और बांग्ला की पढ़ाई पर अधिक ध्यान देने तथा सीनियर क्लास के छात्रों को संस्कृत पढ़ाने का प्रस्ताव भी रखा गया था।

इस सभा में उपरोक्त प्रस्तावों पर जो बहस हुई उसके मिनिट्स विनय घोष की पुस्तक में दिये गये हैं। सभा में उपस्थित 9 लोगों में 6 ने डिरोजियो के पक्ष में राय दी थी और 3 ने विरोध में मत व्यक्त किया था। विरोध में मत देने वालों में धर्म सभा के नेता, राधाकांत देव प्रमुख थे जिन्होंने कहा कि वे नौजवानों को शिक्षा देने के मामले में डिरोजियो को एक पूरी तरह से अयोग्य शिक्षक मानते हैं। जबकि कमेटी के सह-सभापति विल्सन ने कहा कि डिरोजियो की शिक्षा के कुपरिणामों के कोई प्रमाण कम से कम उन्हें नहीं मिले हैं और वे उसे एक योग्य और शक्तिशाली शिक्षक ही मानते हैं। डेविड हेयर ने भी कहा था कि डिरोजियो की तरह का एक सुयोग्य शिक्षक आज के जमाने में मिलना दुर्लभ है और उनका मानना है कि उसकी सुशिक्षा के कारण छात्र विशेष तौर पर उपकृत हो रहे हैं। रसोमय दत्त और प्रसन्नकुमार ठाकुर ने भी डिरोजियो के खिलाफ किसी भी प्रकार के अभियोग की जानकारी से इंकार किया था। श्री कृष्ण सिंह ने तो साफ शब्दों में कहा कि डिरोजियो के खिलाफ सारे अभियोग आधारहीन हैं, उनकी योग्यता पर किसी तरह का कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है।

बहरहाल, इस समूची बहस का अंतिम परिणाम यह निकला कि डिरोजियो को उसकी नौकरी से तो हटा दिया जाय लेकिन इसके साथ ही उसकी योग्यता को उचित स्वीकृति भी प्रदान की जाय -
“Resolved that the measure of Mr.Derozio’s removal be carried into effect with due consideration for his merits and services.”

कमेटी की ओर से डिरोजियो को कहा गया कि बेहतर होगा कि वे खुद ही कॉलेज से इस्तीफा दे दें। गौर करने लायक बात यह है कि डिरोजियो ने खुद से इस्तीफा देने के प्रस्ताव को एक सिरे से खारिज कर दिया। कमेटी के अध्यक्ष विल्सन के पत्र का जवाब देते हुए उन्होंने लिखा : ‘‘ महोदय, आपके निर्देश के अनुसार इस पत्र के साथ मैंने त्यागपत्र भेज दिया है। इस पत्र को पढ़ने से जाहिर होगा कि अपनी मर्जी से पद त्याग करने के बारे में आपके प्रस्ताव को मैं पूरी तरह से स्वीकार नहीं पाया हूं। यदि मैं यह मानता कि मेरे अध्यापन के समय में कॉलेज का कोई अनिष्ट हुआ है या इसके बारे में कोई विश्वसनीय प्रमाण भी होता तो मैं बिना कोई प्रतिवाद किये इस्तीफा देने के तर्क को जरूर मान लेता। लेकिन अपने आत्मसम्मान की तिलांजलि देकर किसी सामयिक घटनाक्रम के हमले को स्वीकार करना मैं विवेकसम्मत नहीं मानता हूं। इस बात से मैं कैसे इंकार कर सकता हूं कि आप लोग मुझे इस्तीफा देने के लिये मजबूर कर रहे हैं। इसीलिये बिना किसी विवाद के इस्तीफा देना कत्तई संभव नहीं है। आप एक सम्माननीय व्यक्ति हैं। अपने सम्मान की रक्षा के लिये आपने यह अनुरोध किया है। लेकिन इस सांत्वना से मेरे अपमान की पीड़ा कहां कम हो रही है। प्रवीण और प्रज्ञावान लोग यदि मुझे हटाकर अपमानित करने पर तुले हैं तब मैं भी इस अपमान को सहने की शक्ति रखना वांछनीय नहीं समझता।

“कॉलेज के कुछ हिंदू प्रबंधकों ने मेरे खिलाफ जिस प्रकार का असंयत क्रोध व्यक्त किया है वो आसानी से शांत होता दिखाई नहीं देता। इसीलिये कॉलेज में फिर से शिक्षक के रूप में काम करने की संभावना तो फिलहाल नहीं देख रहा हूं। इसके अलावा कर्म जीवन के प्रवाह में बहते-बहते जिंदगी की नाव कौनसे किनारे जाकर लगेगी, वह तय नहीं है। संभव है कि जीवन में अब आपके सान्निध्य का सुअवसर प्राप्त नहीं होगा। इसलिये आज ऐसा सुअवसर प्रदान करने के लिये आपके प्रति अपनी पूरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। कॉलेज में काम करने के दौरान आपसे जैसा हार्दिक व्यवहार मिला, उसे जीवन में कभी भी नहीं भूलूंगा। -एच.एल.वी.डिरोजियो ‘‘

विल्सन को लिखे इस पत्र के साथ डिरोजियो ने जो त्यागपत्र भेजा था उसमें उन्होंने साफ शब्दों में लिखा था-प्रबंध कमेटी की बैठक में जो प्रस्ताव लिया गया उससे मजबूर होकर यह त्यागपत्र दे रहा हूं। वे कहते हैं कि मेरे विरुद्ध लाये गये एक भी अभियोग को आप प्रमाणित नहीं कर पाये हैं, यहां तक कि मुझे सफाई देने के अधिकार से भी वंचित किया गया। कमेटी का बहुमत मुझे एक योग्य शिक्षक मानता है, इसके बावजूद आप येन-केन-प्रकारेण मुझे हटाने के लिये तुले हुए हैं। इसप्रकार यह एकतरफा विचार करके मुझे दंड दिया गया है। आशा है कि इस सच्चाई को स्वीकारने में आपको कोई संकोच नहीं होगा।

डिरोजियो ने लिखा कि वे इससे ही बहुत खुश हो जाएंगें।

डिरोजियो के इस खत के जवाब में अब विल्सन साहब ने उनपर लगाये गये अभियोगों को उन्हें लिखकर भेजा। विल्सन ने उनके सामने तीन गंभीर सवाल रखे और लिखा कि इन सवालों का जवाब आप दे भी सकते हैं और नहीं भी दे सकते हैं। उनका पहला सवाल था - क्या आप ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं ?

दूसरा प्रश्न था कि क्या आप यह मानते हैं कि पिता-माता के आदेशों का पालन करना अथवा उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति दिखाना किसी के भी नैतिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं होता ?

तीसरा सवाल था कि क्या आपकी राय में भाई -बहन के बीच विवाह सामाजिक अपराध नहीं है ? क्या आप इन विषयों पर छात्रों के साथ खुलकर बातचीत किया करते हैं ?

विल्सन साहब के इन गंभीर अभियोगों भरे सवालों के जवाब में डिरोजियो ने एक काफी लम्बा पत्र लिखा जिसे विनय घोष ने अपनी पुस्तक में बिल्कुल सही, उनके जीवन के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की संज्ञा दी है। इस पत्र में उन्होंने एक-एक करके हर सवाल का माकूल जवाब दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि मैंने कभी अपने को नास्तिक के रूप में पेश नहीं किया, लेकिन ईश्वर के अस्तित्व या अनअस्तित्व के बारे में खुलकर बहस करना अपराध है तो इस अपराध को स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है। इस बारे में दुनिया में अनेक मत है और उनको लेकर मैंने छात्रों के साथ खुले मन से बहस की है। मैंने आस्तिकों की बात भी कही है और नास्तिकों की भी। इसके अलावा उन लोगों की बात भी कही है जो इसप्रकार के सवालों को बेमानी मानते हैं। इसी सिलसिले में डिरोजियो की राय थी -‘‘किसी का कुछ भी विश्वास क्यों न हो, यदि विरोधी की राय का विश्लेषण नहीं किया जाता है तो उस विश्वास का आधार कैसे दृढ़ हो सकता है। ‘‘

इसी क्रम में डिरोजियो ने लार्ड बैकन को उद्धृत किया कि ‘‘if a man will begin with certainities, he shall end in doubts.”

डिरोजियो ने पश्चिम के और भी कई विद्वानों का इसमें जिक्र किया और निष्कर्ष के तौर पर लिखा कि - ‘‘ सच कहूं तो मनुष्य के ज्ञान की सीमा और उसके विचारों की परिवर्तनशीलता के बारे में मैं खुद इतना अधिक संवेदनशील हूं कि बहुत से मामूली किस्म के विषयों पर भी मैं अपनी एक निश्चित राय व्यक्त नहीं करता हूं। किसी अन्वेषक की तरह अनन्त समुद्र में अज्ञेय सत्य के द्वीप की यात्रा करना ही ज्ञानान्वेषण का श्रेष्ठ पथ है, यही मेरी धारणा है।

मेरे खुद का मानस कुछ ऐसा ही है। प्रश्नविहीन, संशयहीन मन जितना जल्दी जड़ता के जाल में फंसकर असमय मानसिक मृत्यु को प्राप्त करता है, प्रश्नाकुल, संशयों से भरा हुआ मन मनुष्य को उतनी आसानी से संदेहवादी या नकारवादी नहीं बनाता है। सत्य वह या जो हम विश्वास करते हैं वही ध्रुव सत्य है, कोई भी सत्यान्वेषी मनुष्य हलफ लेकर इसप्रकार की बात नहीं करेगा।‘‘

जहां तक माता-पिता के प्रति श्रद्धा और उनके आदेशों को मानने का सवाल था, डिरोजियो ने इसपर गहरा आश्चर्य व्यक्त किया और इसे अपने विरुद्ध एक घिनौना दुष्प्रचार भी बताया। उन्होंने लिखा कि - ‘‘ मैं यदि पितृहीन नहीं होता तो खुद मेरे पिता ही इस दुष्प्रचार का उचित जवाब दे देते।‘‘ उन्होंने बहुत ही कड़े शब्दों में लिखा कि जो लोग उन पर ऐसा अभियोग लगा रहे हैं उन सभी महात्माओं की तुलना में वे कम मातृभक्त नहीं हैं।

अपने पत्र में डिरोजियो ने ऐसे कई उदाहरण तक गिनाये हैं जिनसे पता चलता है कि किसप्रकार उन्होंने अपने माता-पिता का निरादर करने वाले छात्रों के अशोभनीय आचरण का तिरस्कार किया था और उन्हें अपने माता-पिता से माफी मांगने को मजबूर किया था।

विल्सन द्वारा उठाये गये तीसरे सवाल, अर्थात भाई-बहन के बीच विवाह के प्रश्न पर डिरोजियो की कड़ी टिप्पणी थी कि इसप्रकार के एक अजूबे सवाल पर वे छात्रों के साथ बात कर सकते हैं, ऐसा उन्होंने सोचा भी कैसे! उन्होंने इस अभियोग को किसी उर्वर मस्तिष्क की उपज बताया और कहा कि कोइ्र्र कापुरुष, चरित्रहीन व्यक्ति ही उनके खिलाफ इसप्रकार के झूठे दुष्प्रचार में उतर सकता है। ऐसे लोग झूठ के बल पर ही जिंदा रहते हैं। डिरोजियो ने विल्सन साहब को इसप्रकार की अफवाह फैलाने वालों को यह संदेश भेजने का आग्रह किया कि - ‘I am not a greater monster than most people’.

डिरोजियो ने इस पत्र में उनके तथा उनके परिवार के बारे में फैलाई जा रही मनगढ़ंत कहानियों और गंदी-गंदी बातों का हवाला दिया। अपने इस पत्र के अंत में उन्होंने विल्सन साहब से पूछा था कि क्या झूठी अफवाहों के डर से या निंदकों को खुश करने की गरज से मुझे कॉलेज से निकाल बाहर करना आप जैसे विवेकवान व्यक्ति के लिये उचित था ? डिरोजियो का कहना था कि जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध झूठी अफवाहें फैलाई जाती है, तब उन्हीं अफवाहों के आधार पर उस व्यक्ति को कठोर दंड देना क्या झूठ को प्रश्रय देने के समान नहीं है ?

डिरोजियो के चिर प्रश्नाकुल अधीर मन-मस्तिष्क ने कभी भी शांत होना तो सीखा ही नहीं था। हिंदू कॉलेज से इसतरह निकाले जाने के बाद भी न तो डिरोजियो और न ही उनके शिष्य किसी तरह की निराशा या पस्तहिम्मती का शिकार हुए। डिरोजियो ने ‘ईस्ट इंडियन‘ नामक दैनिक पत्र का संपादन शुरू कर दिया और अपने शिष्यों को भी पत्रकारिता से जुड़ने के लिये प्रेरित किया। जाहिर है उस समय वैचारिक संघर्ष के लिये अखबार से बड़ा और दूसरा माध्यम क्या हो सकता था ? उनके छात्र कृष्णमोहन बंद्योपाध्याय, जो उस समय मात्र 18 वर्ष के थे, ने 1831 की मई में ‘द एनक्वायरर‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन और संपादन किया और 17 वर्ष के दक्षिणारंजन ने बांग्ला साप्ताहिक पत्र, ‘ज्ञानान्वेषण‘ का संपादन किया। सत्य और ज्ञान की खोज ही इन अखबारों का उद्देश्य बताया गया। उधर डिरोजियो के हिंदू कॉलेज से निकाले जाने के बाद भी हिंदू कट्टरपंथियों का उनके प्रति आक्रामक अभियान खत्म नहीं हुआ था। अखबारों में रोज डिरोजियो के विरुद्ध झूठी अफवाहें छपती रहती थीं कि किसप्रकार उनकी शिक्षा नौजवानों को बिगाड़ रही है और वे अपनी सभ्यता और संस्कृति का अनादर कर रहे हैं। इन हमलों के जवाब में जुलाई महीने के अंत में डिरोजियो के शिष्य कृष्णमोहन ने ‘एनक्वायरर’ में लिखा-

‘‘अभियोगकर्ताओं का गुस्सा अभी भी उतना ही उग्र बना हुआ है। सारे कट्टरपंथी अभी निंदा गर्जन में लगे हुए हैं। गुरुम सभा का ताप हिंसक बना हुआ है और वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। धर्मान्ध लोग समाज से बहिष्कार करने की हुंकारे भर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इसके प्रति सहनशीलता उदारपंथियों का जवाब होगा। गुरुम सभा का ताप बढ़ा हुआ हो, उसे उबाल बिंदु तक जाने दिया जाय। पोंगापंथी क्रुद्ध हैं; उन्हें आग के रूप में विस्फोटित होने दिया जाय। उदारपंथियों की आवाज उन रोमन लोगों की तरह हो जो सिर्फ कर्म करना ही नहीं जानते हैं, बल्कि उसके लिये दुख भी बरदाश्त करना जानते हैं। समाज बहिष्कार का डंका घर-घर बजे। सैकड़ों लोग समाज से बाहर हों; वे सब एकजुट होकर एक पार्टी बनायेंगे, तभी हमारा उद्देश्य सफल होगा।‘‘

लाल बिहारी दे ने इस संबंध में लिखा है कि सप्ताह-दर -सप्ताह इसीतरह ‘एन्क्वायरर’ के पन्नों पर रूढि़वादी हिंदुओं के विरुद्ध प्रचार चलता रहता। यह अखबार अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने का एक हथियार बन गया था। कृष्णबिहारी विद्रोही युवकों के नेता बन गये थे। उनका घर उन तरुण नौजवानों का एक अड्डा बन गया था जो जात-पांत की दीवारों को तोड़कर आगे बढ़ रहे थे।

अपने गुरू के इस तरह कालेज से निकाले जाने तथा धर्म सभा के हमलों ने इन छात्रों को और उद्वेलित कर दिया था। इन सभी नौजवानों का अड्डा अब कृष्णमोहन के घर जमता, जहां विभिन्न विषयों पर जमकर चर्चाएं होतीं और संघर्ष के नये-नये तरीके ईजाद किये जाते। ‘एन्क्वायरर’ और ‘ज्ञानान्वेषण’ में इन गोष्ठियों की खबरें छपती रहतीं।

विनय घोष ने उन दिनों की एक घटना का जिक्र अपनी पुस्तक में किया है कि किस तरह 23 अगस्त 1831 के दिन कृष्णमोहन की अनुपस्थिति में उनके घर में हिंदुओं की धर्मान्धता पर चर्चा करते हुए इतनी उत्तेजना पैदा हुई कि उसी उत्तेजना में एक छात्र मछुआ बाजार की मुस्लिम दुकान से रोटी और गोमांस खरीद कर ले आया। वहीं पर सब छात्रों ने उसे खाया और हड्डियां पास के चक्रवर्ती परिवार में फेंक कर चिल्लाने लगे, गाय की हड्डी, गाय की हड्डी। गाय की हड्डी की आवाजें सुनकर चक्रवर्ती परिवार में हड़कंप मच गया। सारे पड़ौसी इका हो गये और उन नौजवानों को मारने के लिये लपके। उस समय किसी तरह ये नौजवान अपनी जान बचाकर भाग निकलने में सफल हुए। कृष्णमोहन जब घर लौटे तो इस बात को जानकर बहुत दुखी हुए, सबको समझाने की बहुत कोशिशें की लेकिन मामला किसी तरह शांत नहीं हुआ। सभी का कहना था कि कृष्णमोहन को घर और मोहल्ला छोड़ना होगा। और इसप्रकार अपने घर से आग उठाने वाले कृष्णमोहन ही सबसे पहले इस आग में झुलस गये, उन्हें अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। लेकिन कट्टरपंथियों का गुस्सा इससे भी शांत नहीं हुआ, वे उन्हें हर गली, मोहल्ले में अपमानित करते और यहां तक कि गुप्त रूप से उन्हें मारने की साजिशें भी रची जाने लगी।

तत्कालीन हिंदू समाज और उसके अंदर गहराई तक जमे हुए कुसंस्कार, अंधविश्वास और उनके पोंगापंथ का क्या रूप था, इसकी चर्चा हम शुरू में ही कर आये हैं। यह भयानक पुरातनपंथी समाज था। यह समाज राममोहन राय को भी बरदाश्त नहीं कर पा रहा था। उनकी भी हत्या करने की कम साजिशें नहीं की गयी थीं। ऐसे में डिरोजियो और उनके शिष्यों का यह चरम विद्रोही रूप इस समाज के लिये कितना चुनौती भरा होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। समूचा हिंदू समाज इनके खिलाफ जैसे तलवार लेकर उतर पड़ा था। इसी परिवेश में कृष्णमोहन ने ‘एन्क्वायरर’ में लिखा –

‘‘हम जानते हैं कि हर रोज हमारे विरोधी हम पर हमले की नानाप्रकार की साजिशें कर रहे हैं। हमारे स्वभाव और चरित्र के बारे में भी झूठी बातें फैलाने के लिये पर्चें बांटे जा रहे हैं ... लेकिन हम हरप्रकार के अत्याचार को सहने के लिये तैयार हैं। हम जानते हैं कि किसी राष्ट्र को संस्कारों से मुक्त और विकसित मस्तिष्क का बनाने पर बाहर में कुछ शोर और विभ्रम पैदा होगा ही।‘‘

डिरोजियंस का नीति-मंत्र ही था - ‘‘वह जो विवेक का प्रयोग नहीं करता वह कट्टरपंथी होता है, जो विवेक का इस्तेमाल नहीं कर सकता वह मूर्ख है और जो विवेक का प्रयोग नहीं करता वह गुलाम है।‘‘ जाहिर है कि डिरोजियंस हर कुरबानी और शहादत देकर समाज की इन मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोड़ देना चाहते थे। एक तरफ डिरोजियो के शिष्य समाज की मानसिक बेडि़यों को तोड़ने की लड़ाई लड़ रहे थे और दूसरी तरफ खुद डिरोजियो भी ‘ईस्ट इंडियन‘ अखबार के जरिये अपने समाज के खिलाफ भी लगातार तीखी वैचारिक लड़ाई लड़ रहे थे। अपने अखबार में 1831 के सितम्बर महीने में उन्होंने ‘जॉन बूल ‘ पत्रिका के संपादक के बारे में कुछ टिप्पणियां की थी जिससे तत्कालीन यूरोपियन समाज काफी उद्वेलित हो उठा था। इसका जिक्र करते हुए खुद इस पत्रिका के संपादक मैक्नागैटन ने लिखा है :

‘‘अगले दिन वे एक दोस्त को साथ लेकर डिरोजियो के घर गये। घर में पहुंचने पर हमें एक आफिस में ले जाया गया, जहां दो लोग बैठे हुए थे। मैंने इससे पहले डिरोजियो को कभी देखा नहीं था। इसलिये घर में घुसते ही पूछा, ‘ईस्ट इंडिया‘ के संपादक से मिलना चाहता हूं। कुछ झिझक के बाद एक आदमी ने कहा, मैं ही संपादक हूं। उसके बाद मैंने कहा कि क्या यह लेख आपका ही है? मेरे हाथ से लेख लेकर उसने कुछ देर तक उसे देखा और फिर कुछ हकलाते हुए कहा कि हां, मैंने ही लिखा है। मैंने लेख उसके हाथ से लेकर अपनी जेब में रख लिया। और कहा कि इस लेख में आपने जिस सीमाहीन उदंडता का परिचय दिया है उसके लिये मैं व्यक्तिगत रूप में आपको दंड देने के लिये आया हूं, कहकर मैंने डिरोजियो की कालर पकड़कर हल्के से उसपर दो बेंते जमाई। इच्छा तो थी उसके कंधों पर मारने की लेकिन उसने बचाव में हाथ आगे किये तो बेंत उसके हाथ में ही लगी। डिरोजियो ने मुझे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। वह एकदम पीला पड़ गया था और कांप रहा था। (इंडिया गैजेट, 26 सितम्बर 1831)

तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद डिरोजियो की कलम की धार कम नहीं हुई। वे हिंदू समाज और योरोपीय समाज, दोनों के पोंगापंथ के विरुद्ध लगातार लिखते रहे। उनकी लेखनी साम्राज्यवाद और उसकी नीतियों के खिलाफ भी उठती रही। कहना न होगा कि हिंदू समाज के साथ ही साथ योरोपीय समाज भी इस कारण उनसे भंयकर नाराज रहने लगा। डिरोजियो अपने मित्र कृष्णमोहन का, जो हिुदुओं के कट्टरपंथ और अंधविश्वासों के खिलाफ लगातार अपने अखबार के जरिये वैचारिक संघर्ष चला रहे थे, अपने पत्र के जरिये उत्साह-वद्र्धन करते रहते थे। हिंदू नरमपंथी लोग जो नीतिगत रूप में मूर्तिपूजा का विरोध करते थे, लेकिन घर में मूर्तिपूजक बने रहते थे उनकी इन दोगली नीतियों का भी ये नौजवान विरोध करते थे। सुधारवादियों के नेता, ‘रिफोर्मर’ पत्रिका के संपादक, प्रसन्न कुमार ठाकुर के इस दोगले चरित्र को भी ‘एन्क्वायरर’ के पन्नों पर बेनकाब किया गया था। उस समय के निकलने वाले सुधारवादी या मध्यममार्गी अखबार, ‘इंडिया गैजेट‘, बंगाल हरकरा‘, ‘रिफोर्मर‘ तथा ‘समाचार दर्पण‘ इन तरुणों के खिलाफ लगातार टीका-टिप्पणियां करते और उन्हें गरमपंथ की बजाय नरमपंथी रास्ता अपनाने की सीख दिया करते। ‘इंडिया गैजेट’ का कहना था कि राममोहन के अनुगामी ब्रह्मसभाई हिंदू समाज के मध्यमार्गी हैं और डिरोजियो के स्वतंत्र चिंतन के हिमायती अल्ट्रा लेफ्ट या रैडिकल पार्टी हैं। ये दोनों ही समाज को सुधारना चाहते हैं, उसकी उन्नति और कल्याण की कामना करते हैं तथा हमेशा से प्रचलित शास्त्र-वचनों की तुलना में तर्क और विवेक पर निर्भर रहना चाहते हैं। दोनों दल ही मूर्ति पूजा और निरर्थक कुसंस्कारों का परित्याग करना चाहते हैं, जातिप्रथा को अमानवीय प्रथा समझकर उसे मान्यता नहीं देना चाहते तथा हर विषय में धर्मान्धता से घृणा करते हैं। लेकिन मध्यममार्गी धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहते हैं ...।‘‘ इसी तरह ‘रिफोर्मर’ पत्रिका भी ‘इंडिया गैजेट’ के विचारों के समर्थन में उतरी हुई थी।

तरुण डिरोजियंस सुधारवादियों की हर दलील का जवाब बड़े धीरज और तर्क के साथ देते। ‘एन्क्वायरर’ में ‘इंडिया गैजेट’ की इन बातों का जवाब देते हुए लिखा गया - ‘‘हम आशा करते हैं कि वे यह बात नहीं भूले होंगे कि हमारा लक्ष्य हमारे नौजवान मित्रों को उदार उदाहरण देकर उन्हें प्रभावित करना है और हमने कभी भी पोंगापंथी समुदाय के बुजुर्ग लोगों को समझाने की कोशिश नहीं की है।‘‘

गाय की हड्डियां फेंकने की घटना का बार-बार ‘इंडिया गैजेट’ द्वारा हवाला देकर तरुण डिरोजियंस का अपमान करने के प्रसंग के बारे में ‘एन्क्वायरर’ ने लिखा - ‘‘कुछ दिन पहले एक पोंगापंथी हिंदू के घर में गाय की हड्डी फेंकने की घटना का ‘इंडिया गैजेट‘ के संपादक ने फिर से उल्लेख किया है तरुणों को लोगों को समाज की आंखों से गिराने के लिये। लेकिन जब नौजवानों ने यह स्वीकार कर लिया है कि यह काम करके उन्होंने बहुत बड़ी गल्ती की है, इसके लिये उन्होंने पश्चाताप भी व्यक्त किया है और भविष्य में कभी इसतरह का आचरण नहीं करने का प्रण भी किया है, तब हमारे सहयोगी के लिये यह उचित नहीं था कि इस तरह की घटना का फिर से उल्ल्ेाख करके नौजवानों पर कीचड़ उछाले।‘‘

डिरोजियो और उनके शिष्यों का यह वैचारिक संघर्ष इसी तरह चलता रहा। लेकिन अचानक इस संघर्ष की लौ जलानेवाला, नौजवानों की रगो में, उनकी आंखों में लहू बनकर टपकने वाला डिरोजियो जिस तरह एक तूफान की तरह आया था, उसी तरह अचानक चला भी गया। हिंदू कालेज से निकाले जाने के मात्र 8 महीनों के बाद ही 23 दिसम्बर 1831 को वे इस दुनिया से चले गये। शिवनाथ शास्त्री ने लिखा है कि 17 दिसम्बर को उन्हें कालेरा हो गया। छ: दिनों तक वे बिस्तर पर पड़े रहे। उनकी बीमारी के समय उनके पास उनके शिष्य महेषचन्द्र घोष, कृष्णमोहन बंद्योपाध्याय, रामगोपाल घोष, दक्षिणारंजन मुखोपाघ्याय आदि थे और रात-दिन उनकी सेवा में लगे रहे। लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। 24 दिसम्बर (विनय घोष के अनुसार 23 दिसंबर) को वे इस दुनिया को छोड़ कर चले गये।

अपनी मौत के कुछ दिनों पहले डिरोजियो ने यह कविता लिखी थी -

Expanding. like the petals of young flowers;
I watch the gentle opening of your minds.
And the sweet loosening of the spell that binds
Your intellectual energies and powers,
That stretch (young bird in soft summer hours)
Their wings to try their strength. O how that winds
Of circumstances, and freshening April showers
Of early knowledge, and unnumbered kinds
Of new perceptions shed their influences;
And how you worship Truth’s omnipotence!

What joyance rains upon me, when I see
Fame, in the mirror of futurity,
Weaving the chaplets you are yet to gain,
And then I feel I have not lived in vain.
(The Bengal Annual, 1831)

वास्तव में डिरोजियो अपने तरुण छात्रों के दिमागों की खिड़कियां खुलते हुए देख रहे थे, देख रहे थे कि उनके नन्हें चूजे अब अपने परों में नयी ताकत भरकर उड़ने के लिये तैयार हो रहे है। उनका जीवन वृथा नहीं गया था। यही उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख था।

आज उस तरुण नौजवान के जीवन के 200 वर्ष बाद जब हम उन युवा डिरोजियंस के संघर्ष को याद करते हैं तो लगता है कि क्या वही अक्षत ऊर्जा, वही अदम्य साहस, वही निष्ठा और ईमानदारी हर युग के नवोन्मेष के लिये जरूरी नहीं है? शायद हर युग को इसतरह के अग्निबीजों की जरूरत होती है। अग्निबीज कभी मरते नहीं बस थो़ड़ी सी हवा पानी मिलते ही फिर-फिर अंकुरित और प्रस्फूटित हो उठते हैं और इसी तरह प्रगति की धारा को कभी तेज तो कभी धीमी गति से प्रवहमान बनाये रखते हैं। समाज की बूढ़ी रगों में नया जीवन भरने के लिये डिरोजियंस की तरह के अग्निबीज हमेशा-हमेशा हमारी प्रेरणा के श्रोत बने रहेंगे। डिरोजियो की स्मृतियां अमर रहे।