मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

सीपीआई(एम) में फिर एक बार गहरा आंतरिक संकट


सीपीआई(एम) के पोलिट ब्यूरो की अभी चल रही बैठक में विचार का सबसे महत्वपूर्ण विषय यह है कि पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस के साथ मोर्चा बना कर चुनाव में उतरेगी या नहीं । ख़बरों के अनुसार, कल तक की बैठक में इस पर कोई निर्णय नहीं हो पाया है । यह बैठक आज भी चलेगी । कहा जा रहा है इस विषय में अंतिम निर्णय आगामी कल से शुरू होने वाली केंद्रीय कमेटी की बैठक में ही लिया जा सकेगा ।

अख़बारों से यह भी पता चल रहा है कि सीपीआई(एम) का नेतृत्व इस विषय पर पूरी तरह से बँटा हुआ है । पार्टी के सर्वोच्च निकाय में कितने लोग पक्ष में है और कितने पक्ष में, इसकी भी गणना हो रही है ।

लगता है सीपीआई(एम) फिर एक संकट के मुहाने पर है । किसी भी राजनीतिक पार्टी में इस प्रकार के एक अत्यंत अहम राजनीतिक सवाल पर, जिस पर पार्टी का और देश की भावी राजनीति का भी भविष्य निर्भर करता हो, कोई निर्णय सर्व-सम्मति के बजाय यदि मतदान के ज़रिये लेने की नौबत आजाए तो यह उस पार्टी को निश्चित तौर पर दिशाहीनता के गहरे अंधेरे में धकेल देने की तरह होगा । सीपीआई (एम) इसके पहले भी अंदरूनी जनतंत्र के नाम पर, शुद्ध गुटबाज़ी और मतदान के ज़रिये ऐसे निर्णय लेती रही है जिन्हें ज्योति बसु तक ने ऐतिहासिक भूल कहा था और कम्युनिस्ट आंदोलन के तमाम पर्यवेक्षक जिन्हें भारतीय राजनीति में वामपंथ की बढ़ी हुई अप्रासंगिकता का एक प्रमुख कारण मानते हैं ।

अभी फिर एक बार, सीपीआई (एम) भारत की बहु-राष्ट्रीय सचाई की पूरी तरह से अवहेलना करते हुए पोथी की दासता (पहले पारित किये गये प्रस्ताव के बंधन) और तर्क तथा विवेक के बजाय शुद्ध पक्ष और विपक्ष के संख्या-तत्व के आधार पर निर्णय लेने की यांत्रिकता की चुनौती के सम्मुख है । देखते हैं, राजनीतिक विवेक जीतता है या वही पुरानी नौकरशाही कार्य-प्रणाली वाली यांत्रिकता ।

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