शनिवार, 6 मई 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (4)


-अरुण माहेश्वरी


जैकोबिन गणतंत्र

यदि ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति ने यूरोप की अर्थ-व्यवस्था को एक नया रूप दिया तो उसकी राजनीति और विचारधारा का निर्माण फ्रांस में हुआ था। फ्रांसीसी क्रांति से ही सारी दुनिया की उदार और क्रांतिकारी जनतांत्रिक राजनीति को अपनी भाषा और मुद्दे भी मिलें। क्रांति के प्रारंभ के साथ ही संविधान सभा की बहस में उदारपंथी और क्रांतिकारी जोशो-खरोश के प्रतीक जैकोबिन (अर्थात पर्वत) गणतंत्रवादियों के बीच जो विचारधारात्मक तनाव सामने आया, उसी का फल था कि क्रांति के दूसरे साल, 1791 में वहां जैकोबिन गणतंत्र की स्थापना हो गई। एरिक हाब्सवाम की किताब ‘Age of Revolution’ में इस काल के यूरोप के इतिहास के विस्तृत ब्यौरे को देखा जा सकता है।



जैकोबिन गणतंत्र के चौदह महीनों के काल में ही फ्रांस के पूरे राज परिवार सहित लगभग 17 हजार सरकारी अधिकारियों की गर्दने गिलोटीन की गई थी। फ्रांसीसी क्रांति के इस काल के आतंक को आज तक दुनिया की दक्षिणपंथी ताकतें भूल नहीं पाई है। 1989 में जब सारी दुनिया में धूम-धाम से फ्रांसीसी क्रांति की द्विशताब्दी मनाई जा रही थी, ब्रिटेन की तत्कालीन कंजर्वेटिव प्रधानमंत्री माग्र्रेट थैचर जैकोबिन गणतंत्र के उन दिनों की याद करके उस क्रांति की भर्त्सना करने से नहीं चूकी थी।

जैकोबिन गणतंत्र में सम्राट पर मुकदमे का दृश्य

बहरहाल, फ्रांसीसी क्रांति के दौरान उदारवादियों और गणतंत्रवादियों के बीच तनाव के कई मुद्दों में एक बड़ा मुद्दा यहूदियों के बारे में था। 1789 के ‘मनुष्य के अधिकारों की घोषणा’ में कहा गया था कि मनुष्य जन्म से ही स्वतंत्र थे और हैं, और सभी मनुष्यों के अधिकार एक समान हैं। इसके अलावा यह भी कहा गया था कि किसी भी व्यक्ति को उसके विचारों की बदौलत, भले उसके धार्मिक विचारों की बदौलत ही क्यों न हो, तब तक कभी परेशान नहीं किया जायेगा, जब तक उसके विचारों की अभिव्यक्ति से कानून के द्वारा स्थापित सार्वजनिक व्यवस्था में कोई खलल न पड़ता हो।


‘मनुष्य के अधिकारों की घोषणा’ के बिनाह पर ही 27 सितंबर 1791 के दिन यहूदियों को भी, जिनसे फ्रांस के कैथोलिक धर्मावलंबी बहुत नफरत करते थे, अन्य फ्रांसीसी नागरिकों की बराबरी में सारे अधिकार प्रदान किये गये। यहूदियों के बारे में कैथोलिकों का कहना था कि चूंकि वे ईश्वर की शान के साक्षी थे और पारंपरिक चर्च के इतिहास में शामिल थे, इसीलिये उन्हें संरक्षण तो दिया जाना चाहिए, लेकिन चूंकि वे ईश्वर के क्रोध के पात्र बने थे, इसलिये या तो उन्हें दोयम अवस्था में रखा जाना चाहिए, या उनका धर्म-परिवर्तन करा देना चाहिए।


यहूदियों से नफरत करने वालों में उस काल के प्रमुख दार्शनिक वाल्तेयर, दिदेरो, जोकोर, दोलबैक आदि भी शामिल थे। वे यहूदियों को अरुचिकर अंधविश्वासों से ग्रस्त जघन्य लोभ का पुंज मानते थे। (देखें, Gareth Stedman Jones की किताब “Karl Marx, Greatness and Illusion” ; पृष्ठ - 12,13)

लेकिन क्रांति के विकास के साथ-साथ जो लोग अनपढ़ उत्पीड़ित जनों को सत्ता सौंप दिये जाने में सामाजिक अराजकता का खतरा देख रहे थे, उनकी आवाज लगातार कमजोर पड़ती चली गई। क्रांति की कैथोलिक चर्च से भी शत्रुता बढ़ गई। चर्च ने राज परिवार को देश से पलायन करने में मदद करने की कोशिश की थी जो विफल रही। जैकोबिन गणतंत्र की नागरिकों की सेना ने जर्मनी और ब्रिटेन के हमलावरों को भी पराजित करके खदेड़ दिया, उल्टे बेल्जियम पर कब्जा भी कर लिया। यह यूरोप की सभी ताकतों को जवाबी कार्रवाई की साफ चेतावनी थी।

क्रमशः

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (3)


- अरुण माहेश्वरी


‘क्रांति एक जटिल सत्य है’

इस प्रकार 18वीं सदी के मध्यकाल में पूरे यूरोप में छितरे हुए बुद्धिदीप्त सम्राटों की तुलना में फ्रांसीसी क्रांति का रास्ता मूलभूत अर्थों में बिल्कुल भिन्न था। अल्बर्त सौबुल के शब्दों में ‘‘ फ्रांसीसी क्रांति का अर्थ था कि पूंजीपति वर्ग (बुर्जुआ) अंततः सामाजिक मंच के केंद्र में आ गया है जिसे बुद्धिदीप्त सम्राट अपनी प्रकृति में निहित अन्तर्विरोधों के कारण ही स्वीकार नहीं सकता था। इसके प्रतिरोध के लिये अन्य सभी सार्वभौमिकताओं और उनके माननीय लोगों का गठजोड़ कायम हुआ, जिनकी प्रतिक्रांति निरंकुश सत्ता से भी ज्यादा क्रूर थी। बुद्धिदीप्त सम्राट ने तो शुरू में ही अपने को सचेत रूप में क्रांति के बिल्कुल विरोध में खड़ा कर लिया था।’’
इस प्रकार क्रांति के शुरू में जो लगा था कि संविधान समिति के प्रस्ताव के अनुसार असेंबली सम्राट को ऐतिहासिक रूप से स्वीकार कर लेगी, उसकी संभावना खत्म होते ज्यादा समय नहीं लगा।



संविधान समिति के अध्यक्ष ज्यो जोसेफ म्यूनियिर ने राष्ट्रीय सार्वभौमिकता और एकीकृत असेंबली पर आधारित जो नया संविधान प्रस्तावित किया था, वह ज्यो जैक हूसो (रूसो) के विचारों से मेल खाता हुआ था। इंगलैंड की पार्लियामेंट की प्रणाली पर टिप्पणी करते हुए रूसो ने कहा था कि ‘‘अंग्रेज लोग यदि यह सोचते हैं कि वे आजाद है तो वे खुद को धोखा दे रहे हैं। वे सिर्फ उसी समय आजाद रहते है जब पार्लियामेंट के सदस्यों का चुनाव करते हैं ; एक बार चुन लेने के बाद वे गुलाम हो जाते हैं ; उनका कोई मूल्य नहीं रहता।’’

इसीलिये जो अब भी सम्राट को कार्यपालिका के अधीन रख कर क्रांति करने की बात सोचते थे उनके मूल में कहीं न कहीं यह पुराना विश्वास काम कर रहा था कि एक क्रांतिकारी राजा के नेतृत्व में ही कोई क्रांतिकारी काम पूरा हो सकता है। असेंबली के बहुत से सदस्यों को भ्रम था कि जो भी किया जा रहा है, वह महज कुछ सुधार हैं, किसी बिल्कुल नयी व्यवस्था की स्थापना नहीं। इन तमाम लोगों को आम जनता की आकांक्षाओं की अनुलंघनीय सार्वभौमिकता की बातों से ही एक प्रकार का डर लगता था। वे इसमें राष्ट्र की पूरी वित्तीय व्यवस्था के बिखर जाने का खतरा देखते थे। उन्हीं दिनों दी साइस बोर्दियो के बिशप ने कहा था कि ‘‘ हमें पालने में पल रहे लोगों के लिये प्राकृतिक अधिकारों की नहीं, नागरिकों के अधिकारों की, बड़े लोगों के विधेयात्मक कानूनों की बात करनी चाहिए, जिसने पिछली 15 सदियों से हमें एकजुट रखा है।’’

अर्थात, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, आम जनता में सार्वभौमिकता की बात बहुत से लोगों को राष्ट्र के अंत की बात की तरह से सुनाई दे रही थी। लेकिन जैसे-जैसे क्रांति आगे बढ़ती गई, जनता के सार्विक अधिकारों की बात तेज होती गई। इसने राष्ट्रीय एकता की पवित्रता की एक पूरी नई अवधारणा को पेश किया। पुराने अटल और  ब्रह्मांडीय मान लिये गये सभी ढांचों को ढहा देना होगा, यही था - 1794 का रोबेसपियर का ‘श्रेष्ठ प्राणी का पंथ (Cult of supreme being) । रोबेसपियर ने ऐलान किया कि बाहर के प्रतापी लोगों से लड़ने के पहले अंदर के इन कुलीनों का सफाया जरूरी है। तब तक यह साफ हो चुका था कि ‘‘सार्वभौमिकता सिर्फ और सिर्फ आम जनता में वास करती है। इस अकेले सिद्धांत के आधार पर ही आगे के सारे राजनीतिक व्यवहारों को नये रूप में ढालना होगा। जनता की यह सार्वभौमिकता अहस्तांरणीय (imprescriptible),  अविच्छेद्य (inalienable), और अनियोज्य (indelegable) है।’’

इसी के आधार पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की भर्त्सना करने, उन पर नियंत्रण रखने और उन्हें वापस बुला लेने के अधिकारों को भी फ्रांस के संविधान में मूलभूत अधिकार के तौर पर शामिल किया गया। 17 जुलाई 1793 की रात, एक दृप्त घोषणा के जरिये, बिना किसी प्रकार के मुआवजे के फ्रांस से सामंतशाही का खात्मा कर दिया गया। किसान और उनकी जमीन सामंतों के शिकंजे से हमेशा के लिये मुक्त हो गई। इसीलिये मैथी की तरह के कुछ इतिहासकार फ्रांसीसी क्रांति को एक नहीं, बल्कि चार सालों में चार क्रांतियों के समुच्चय के रूप में देखते हैं।

बहरहाल, फ्रांसीसी क्रांति का यह समूचा घटना-क्रम जिस प्रकार विकसित हुआ, और जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, उससे जाहिर है कि इतिहास की हमेशा एक द्वंद्वात्मक प्रक्रिया होती है। इसे कभी भी यांत्रिक ढंग से नहीं समझा जा सकता है। क्रांति स्वयं में एक जटिल सत्य है। इसका निरूपण कभी भी किसी सरल रेखा में पूर्व-नियोजित ढंग से नहीं किया जा  सकता है। आज भी जब कोई ऐतिहासिक भौतिकवाद का झंडा उठा कर मनुष्यों और उनके समूहों के छोटे से छोटे सामाजिक-राजनीतिक व्यवहारों को तथाकथित वर्गीय मानदंडों पर आंकने की कसरत करते हुए दिखाई देता है तब उसके अहमकपन पर सिवाय हंसी के और कुछ नहीं आ सकती।
  
(देखियें Timothy Tackett की किताब - ‘Becoming a revolutionary : The deputies of the French National Assembly and the emergence of a revolutionary culture (1789-1790, Princeton, Princeton University Press, 1996 और Albert Soboul, Understanding the French Revolution, People’s Publishing House, Indian Edition, 1989)
क्रमशः

शुक्रवार, 5 मई 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (2)




. अरुण माहेश्वरी

फ्रांसीसी क्रांति (1789-1791) यूरोप के राजनीतिक इतिहास की जमीन पर उठा शायद अब तक का सबसे बड़ा बवंडर। इसके पहले वहां जो चलता रहा वह मानो सहस्त्र सालों से किसी ब्रह्मांडीय अकाट्य नियम की तरह सामाजिक संरचना के एक परम सत्य की तरह था। बड़े से बड़े ज्ञानदीप्त और उदार सम्राटों के लिये भी अमीर-उमरावों के विशेषाधिकारों को चुनौती देना राष्ट्र की सार्वभौमिकता को चुनौती देने से कम नहीं था। पूरे यूरोप में ज्ञानदीप्त और आततायी राजाओं की अनेकों प्रजातियां रहीं, लेकिन किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि वे अपने अधिकारों और सामंती ढांचे की बुनियाद के साथ कभी कोई छेड़-छाड़ कर सकते थे।


फ्रांसीसी क्रांति ने पहली बार राष्ट्र की सार्वभौमिकता को सिर्फ नागरिक की सार्वभौमिकता में व्यस्त किया । ‘सबार उपरे मानुष, मानुषेर उपरे किछु नाय’ की तरह के आदर्श विचार को जमीन पर उतार दिया। जिस समय बाकी यूरोप नाना प्रजाति की राजशाहियों के अधीन था, फ्रांसीसी क्रांति ने मनुष्य के मूलभूत अधिकार के रूप में ‘प्रतिनिधिमूलक सरकार’, ‘धर्म की आजादी’, ‘बोलने की आजादी‘ और ‘कानून के सामने हर किसी की समानता’ के आदर्शों को मनुष्य के सबसे पवित्र और अनुलंघनीय अधिकार के रूप में स्थापित किया।

जाहिर है, हजारों सालों से चली आ रही शासन प्रणाली को दी गई इस अकल्पनीय चुनौती में एक ओर जहां व्यापक जनता के बीच आशा और उत्साह का तूफान दिखाई दे रहा था, वहीं हर कथित विवेकवान में चिंता और अराजकता की आशंकाएं भी गहरा रही थी। खतरा था कि पूरी समाज-व्यवस्था इस कदर चरमरा कर बिखर न जाए कि राज्य पूरी तरह से दिवालिया हो जाए। नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा का कोई प्रबंध ही बचा न रह सके।

कुल मिला कर पश्चिम की दुनिया के लिये यह हर प्रकार से अनोखा और विरल अनुभव था। इस क्रांति ने जैसे एक झटके में कुलीनों, पुरोहितों, सेना, सामंतों और मजदूरों, दासों की भी जन्मना अधिकारों की पूरी प्रणाली को ध्वस्त कर दिया। ईश्वर के रूप में राजा की सार्वभौमिकता की जगह जनता की सार्वभौमिकता को ही सर्वौपरि और परम मान कर धर्म-निरपेक्षता के आधार पर पूरी राष्ट्रीय प्रणाली के पुनर्विन्यास का काम शुरू किया गया।

फ्रांसीसी क्रांति के प्रारंभ के इस पूरे घटना-क्रम को करीब से देखने पर सबसे दिलचस्प बात यह सामने आती है कि उसमें कुछ भी पूर्व-निर्धारित ढंग से नहीं हुआ था। इसके नेतृत्वकारी लोगों के सामने जैसे-जैसे एक-एक विषय आते गये, इस क्रांति का रूप भी उसी क्रम में अपना आकार लेता चला गया। (देखें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित पुस्तक ^Fixing the French constitution, in inventing the French revolution’ Essaya on French political culture in the eighteenth century’, Keith Michael Baker)



क्रांति के शुरू में बहुतेरे जन-प्रतिनिधियों (Deputies) को यही लग रहा था कि अंततः जो भी सुधार होंगे, सम्राट के तत्वावधान में ही किये जायेंगे। एक प्रकार की कानून आधारित राजशाही की अवधारणा के प्रति उनकी निष्ठा बनी हुई थी। लेकिन 1789 की गर्मियों में छः हफ्तों तक उनकी जो सघन और गरमा-गरम लगातार बैठकें हुई, उनके बीच से ही नागरिक की सार्वभौमिकता की बुनियादी निष्ठा के आधार पर उन सब की एक क्रांतिकारी समझ विकसित होने लगी। इस गहन मंथन के बीच से जो निकल कर आया वह समाज के नव-निर्माण की एक बिल्कुल क्रांतिकारी जनतांत्रिक अवधारणा थी।

क्रमश: 

गुरुवार, 4 मई 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है

- अरुण माहेश्वरी

(1)

अल्लामा इकबाल की एक प्रसिद्ध शायरी है - ‘इबलीस की मजलिस-ए-शुरा’ ( शैतान के परामर्श-मंडल की बैठक)। इसमें शैतान को उसका एक सलाहकार (तीसरा मुशीर) प्रसंगवश कहता है -


‘‘रूह-ए-सुल्तानी राहे बाकी तो फिर क्या इज्राब
है मगर क्या उस यहूदी की शरारत का जवाब ?’’

(साम्राज्य का गौरव यदि बाकी रहा तो फिर  डर किस बात का, लेकिन उस यहूदी की शरारत का क्या जवाब है?)

उस यहूदी का आगे और हुलिया बताता है कि -



‘‘वो कलीम बे-तजल्ली, वो मसीह बे-सलीब
नीस्त पैगंबर व लेकिन दर बगल दारद किताब’’

(वह प्रकाशहीन आप्त कथन, वह बिना सलीब का मसीहा, नहीं है पैगंबर वह पर उसकी बगल में उसकी किताब है)

इकबाल की शैतानों की मजलिस में जिस खुदा के बिना नूर के ही कलमा कहने वाले, बिना सलीब के मसीहा और पैगंबर न होने पर भी काख में एक किताब दबाए जिस यहूदी पर यहां चिंता जाहिर की जा रही थी, वह कोई और नहीं कार्ल मार्क्स था। वही मार्क्स, जिसकी प्रेरणा से  कभी इकबाल ने ही लिखा था -

‘‘जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर नहीं रोजी
उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो’’

(जिस खेत से किसान को रोजी न मिलें, उस खेत के अनाज के हर दाने को जला दो।)



बहरहाल, आज तक सारी दुनिया के तमाम शैतानों की मजलिसों में इतनी ही गहरी चिंता और नफरत का विषय लेकिन अरबों मेहनतकशों के हृदय सम्राट कार्ल मार्क्स का जन्म पश्चिम जर्मनी के राइनलैंड में मुजेल नदी के मुहाने पर बसे त्रायर शहर में 5 मई 1818 के दिन हुआ था।



मार्क्स के जन्म के ठीक तीन साल पहले 5 मई 1815 के दिन वाटरलू की लड़ाई में फ्रांस के सम्राट उस नेपोलियन बोनापार्ट की पराजय हुई थी जिसने ईसा पूर्व की आठवीं सदी से चले आ रहे पवित्र रोमन साम्राज्य का सन् 1806 में अंत कर दिया था। कार्ल मार्क्स के दादा मायर हलेवी मार्क्स एक यहूदी धर्मगुरू थे। लेकिन मार्क्स के पिता हेनरिख मार्क्स ने धर्मगुरू का पेशा नहीं अपनाया और वे एक वकील बन गये। हेनरिख का वकील बनना तभी संभव हुआ था क्योंकि नेपोलियन के शासन के तहत जर्मनी की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में जो बड़ा परिवर्तन आया था। इसीलिये कहा जा सकता है कि मार्क्स के परिवार का फ्रांस में नेपोलियन के उद्भव के साथ एक सीधा संपर्क था।

वैसे तो त्रायर शहर 16 वीं सदी में ही बस गया था और जब वह रोमन प्रदेश गालिया बेलगिका की राजधानी था, तब इसकी आबादी 80 हजार तक पहुंच गई थी। लेकिन बाद के दिनों में घटते-घटते कार्ल मार्क्स के जन्म के वक्त इस प्राचीन शहर की आबादी बमुश्किल दस हजार रह गई थी।



मार्क्स की मां होलैंड के एक यहूदी मुद्रा कारोबारी की बेटी थी। 1814 में ही हेनरिख मार्क्स से उनकी शादी हुई थी। हेनरिख ने संभवतः कार्ल मार्क्स के जन्म के पहले ही यहूदी धर्म को त्याग कर ईसाई धर्म को अपना लिया था। हेनरिख की संततियां भी ईसाई ही बनी रही। लेकिन फिर भी, आज तक बहुत से लोग मार्क्स की धार्मिक पहचान को यहूदी धर्म से जोड़ते हैं, जैसा कि ऊपर अल्लामा इकबाल की शायरी में भी आया है। लेेकिन कार्ल मार्क्स को यहूदी बताने में कोई सचाई नहीं है।

इन सबके बावजूद, कोई यदि मार्क्स के जीवन को उनके जन्म के पहले की पृष्ठभूमि से जोड़ कर देखेगा तो उसमें तीन चीजों को बेझिझक शामिल किया जा सकता है - (1) फ्रांसीसी क्रांति, (2) रोमन साम्राज्य और (3) राइनलैंड के यहूदी।


   
क्रमशः




बुधवार, 3 मई 2017

सोनिया गांधी की एक स्वागत योग्य पहलकदमी ; आम आदमी पार्टी को भी इसमें छोड़ा न जाए

(सांप्रदायिक फासीवाद के ख़तरे के खिलाफ धर्म-निरपेक्ष दलों का महागठबंधन )
-अरुण माहेश्वरी

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने, जो अपनी बीमारी की वजह से ही क्यों न हो, पिछले कईं दिनों से अपने को सक्रिय राजनीति से दूर रखती हुई दिखाई दे रही थी और कांग्रेस दल की बागडोर को पूरी तरह से राहुल गांधी को सौंप देने की तैयारियाँ हो चुकी थी, राष्ट्रीय राजनीति की वर्तमान नाज़ुक परिस्थिति में, जब हमारे देश का धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक संविधान ही दाव पर लगा हुआ दिखाई दे रहा है, अपने ऐसे निजी फ़ैसलों को एक बार के लिये दरकिनार करते हुए जनतंत्र और धर्म-निरपेक्षता की एक नई लड़ाई के लिये कमर कस कर उतर जाने की तैयारी कर ली है । 

आगामी जुलाई महीने में राष्ट्रपति के चुनाव को केंद्र में रखते हुए देश की सभी ग़ैर-भाजपा पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के साथ उन्होंने वार्ताओं का जो सिलसिला शुरू किया है, उसके बारे में बिल्कुल सही कहा जा रहा है कि यह पहलकदमी सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव के लिये नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा के लिये मोदी जी की भाजपा के खिलाफ देश की सभी जनतंत्र-प्रेमी और धर्म-निरपेक्ष पार्टियों के एक व्यापकतम संयुक्त मोर्चा के निर्माण की दिशा में की जा रही पहलकदमी है । 

अब तक इस विषय में सोनिया गांधी ने व्यक्तिगत रूप से शरद पंवार, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, मायावती, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी, मुलायम सिंह यादव, एम के स्तालिन, ओमर अब्दुल्ला आदि से बात कर ली है । राहुल गांधी ने अखिलेश यादव से अलग से भी बात की है । इनके अलावा साफ शब्दों में कहा जा रहा है कि इस मोर्चे में शामिल होने के लिये शिव सेना, बीजू जनता दल, एआईएडीएमके, तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेताओं से भी अपील की जायेगी । 

ग़ौर करने की बात यह है कि सीताराम येचुरी ने यह भी कहा है कि ममता बनर्जी के प्रति उनके गहरे मतभेदों के बावजूद इन मतभेदों को वे ऐसे व्यापक मोर्चे के आड़े नहीं आने देंगे । इस मामले में किसी में भी कोई उलझन नहीं है कि इस मोर्चे के घटक यदि किसी क्षेत्र में एक दूसरे के खिलाफ संघर्ष करते हैं, तब भी राष्ट्र के संवैधानिक ढाँचे का रक्षा के लिये बन रहे व्यापक राष्ट्रीय मोर्चे में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आएगी । 

इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी-शाह की जन-विरोधी और जनतंत्र-विरोधी करतूतों के खिलाफ इस प्रकार का राष्ट्र- व्यापी महागठबंधन ही भारत में जनतांत्रिक राजनीति के भविष्य का कोई नया रास्ता तैयार कर सकता है । हम इस पहलकदमी का तहे-दिल से स्वागत करते हैं । इसके साथ ही इस मोर्चे में आम आदमी पार्टी को भी शामिल करने की कोशिश किये जाने की एक अतिरिक्त माँग भी रखते हैं । 



सोनिया गांधी की एक स्वागत योग्य पहलकदमी ; आम आदमी पार्टी को भी इसमें छोड़ा न जाए

(सांप्रदायिक फासीवाद के ख़तरे के खिलाफ धर्म-निरपेक्ष दलों का महागठबंधन )
-अरुण माहेश्वरी



कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने, जो अपनी बीमारी की वजह से ही क्यों न हो, पिछले कईं दिनों से अपने को सक्रिय राजनीति से दूर रखती हुई दिखाई दे रही थी और कांग्रेस दल की बागडोर को पूरी तरह से राहुल गांधी को सौंप देने की तैयारियाँ हो चुकी थी, राष्ट्रीय राजनीति की वर्तमान नाज़ुक परिस्थिति में, जब हमारे देश का धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक संविधान ही दाव पर लगा हुआ दिखाई दे रहा है, अपने ऐसे निजी फ़ैसलों को एक बार के लिये दरकिनार करते हुए जनतंत्र और धर्म-निरपेक्षता की एक नई लड़ाई के लिये कमर कस कर उतर जाने की तैयारी कर ली है ।

आगामी जुलाई महीने में राष्ट्रपति के चुनाव को केंद्र में रखते हुए देश की सभी ग़ैर-भाजपा पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के साथ उन्होंने वार्ताओं का जो सिलसिला शुरू किया है, उसके बारे में बिल्कुल सही कहा जा रहा है कि यह पहलकदमी सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव के लिये नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा के लिये मोदी जी की भाजपा के खिलाफ देश की सभी जनतंत्र-प्रेमी और धर्म-निरपेक्ष पार्टियों के एक व्यापकतम संयुक्त मोर्चा के निर्माण की दिशा में की जा रही पहलकदमी है ।

अब तक इस विषय में सोनिया गांधी ने व्यक्तिगत रूप से शरद पंवार, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, मायावती, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी, मुलायम सिंह यादव, एम के स्तालिन, ओमर अब्दुल्ला आदि से बात कर ली है । राहुल गांधी ने अखिलेश यादव से अलग से भी बात की है । इनके अलावा साफ शब्दों में कहा जा रहा है कि इस मोर्चे में शामिल होने के लिये शिव सेना, बीजू जनता दल, एआईएडीएमके, तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेताओं से भी अपील की जायेगी ।


ग़ौर करने की बात यह है कि सीताराम येचुरी ने यह भी कहा है कि ममता बनर्जी के प्रति उनके गहरे मतभेदों के बावजूद इन मतभेदों को वे ऐसे व्यापक मोर्चे के आड़े नहीं आने देंगे । इस मामले में किसी में भी कोई उलझन नहीं है कि इस मोर्चे के घटक यदि किसी क्षेत्र में एक दूसरे के खिलाफ संघर्ष करते हैं, तब भी राष्ट्र के संवैधानिक ढाँचे का रक्षा के लिये बन रहे व्यापक राष्ट्रीय मोर्चे में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आएगी ।

इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी-शाह की जन-विरोधी और जनतंत्र-विरोधी करतूतों के खिलाफ इस प्रकार का राष्ट्र- व्यापी महागठबंधन ही भारत में जनतांत्रिक राजनीति के भविष्य का कोई नया रास्ता तैयार कर सकता है । हम इस पहलकदमी का तहे-दिल से स्वागत करते हैं । इसके साथ ही इस मोर्चे में आम आदमी पार्टी को भी शामिल करने की कोशिश किये जाने की एक अतिरिक्त माँग भी रखते हैं ।

रामचंद्र शुक्ल पर अधिष्ठित आलोचना का पुरोहितवाद और वस्तु का द्वंद्वमूलक ज्ञान


-अरुण माहेश्वरी


हिंदी का अध्यापक जगत सामान्य तौर पर रामचंद्र शुक्ल को एक दैवी प्रतिमा मान कर उसकी सिर्फ परिक्रमा करता रहता है। बहुदेववाद पर आस्था के नाते अपनी पूजा-अर्चना के लिये वह रामविलास शर्मा तथा शायद और भी कुछ गुरुओं की छोटी बड़ी मूर्तियां बना कर उनकी भी परिक्रमा कर रहा है। जबकि द्वंद्ववाद की पहली शर्त है कि वस्तु के इर्द-गिर्द चक्कर काटने के बजाय उस समग्र का विखंडन करके उसके अन्तर्विरोधी मार्गों का संज्ञान प्राप्त करना।

अगर लेनिन की शब्दावली का प्रयोग करें तो ऐसी आलोचना को अधिक से अधिक ‘अनुर्वर पुष्प’ कहा जा सकता है। ऐसा अनुर्वर पुष्प, पुरोहितवादी रूढ़िवाद - जिसकी हम मानते हैं, 'अपनी ज्ञान मीमांसीय जड़े होती हैं और जो कुछ सजीव, उर्वर, असली, सशक्त, सर्वशक्तिसम्पन्न, वस्तुपरक, निरपेक्ष मानव-ज्ञान के जीवित वृक्ष पर उगता है।' हमने अपनी किताब में आज की हिंदी आलोचना के ऐसे ही जगत को ऐसे झड़ चुके फूलों का कूड़ा, ‘आलोचना का कब्रिस्तान’ कहा है।

लेनिन ने “…Empiro criticism” में लिखा था ‘‘किसी भी चीज की गति के ज्ञान, उसके स्वतः स्फूर्त विकास, उसके वास्तविक जीवन के ज्ञान की पहली शर्त है उसका वैपरित्यों की एकता के रूप में ज्ञान। वस्तु का विकास (evolution)  वैपरित्यों का संघर्ष है।’’ यहां विकास का अर्थ है वृद्धि अथवा क्षय। जब भी किसी चीज की पुनरावृत्ति के रूप में उसका विकास होता है तो लेनिन के शब्दों में ‘‘उसकी प्रेरक शक्ति, उसका स्रोत, उसका प्रयोजन धुंधलके में रहता है। या उसे कोई बाह्य ईश्वरीय प्रयोजन मान लिया जाता है।’’

लेकिन जब महज पुनरावृत्ति नहीं की जाती है तभी उसकी अपनी गति के स्रोत की ओर ध्यान दिया जाता है।

पुनरावृत्ति के रास्ते को लेनिन ने ‘निर्जीव, निष्प्रभ और शुष्क’ बताया है और दूसरे रास्ते को ‘सजीव’। इसी पथ से किसी भी अस्तित्वमान वस्तु की ‘स्वगति’ की कुंजी मिल सकती है। उसमें छलांग की, उसकी निरंतरता के क्रमभंग, उसके वैपरित्य में रूपांतरण की, पुराने के नष्ट होने ओर नये के उद्भव की कुंजी मिलती है।