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बुधवार, 3 मई 2017

रामचंद्र शुक्ल पर अधिष्ठित आलोचना का पुरोहितवाद और वस्तु का द्वंद्वमूलक ज्ञान


-अरुण माहेश्वरी


हिंदी का अध्यापक जगत सामान्य तौर पर रामचंद्र शुक्ल को एक दैवी प्रतिमा मान कर उसकी सिर्फ परिक्रमा करता रहता है। बहुदेववाद पर आस्था के नाते अपनी पूजा-अर्चना के लिये वह रामविलास शर्मा तथा शायद और भी कुछ गुरुओं की छोटी बड़ी मूर्तियां बना कर उनकी भी परिक्रमा कर रहा है। जबकि द्वंद्ववाद की पहली शर्त है कि वस्तु के इर्द-गिर्द चक्कर काटने के बजाय उस समग्र का विखंडन करके उसके अन्तर्विरोधी मार्गों का संज्ञान प्राप्त करना।

अगर लेनिन की शब्दावली का प्रयोग करें तो ऐसी आलोचना को अधिक से अधिक ‘अनुर्वर पुष्प’ कहा जा सकता है। ऐसा अनुर्वर पुष्प, पुरोहितवादी रूढ़िवाद - जिसकी हम मानते हैं, 'अपनी ज्ञान मीमांसीय जड़े होती हैं और जो कुछ सजीव, उर्वर, असली, सशक्त, सर्वशक्तिसम्पन्न, वस्तुपरक, निरपेक्ष मानव-ज्ञान के जीवित वृक्ष पर उगता है।' हमने अपनी किताब में आज की हिंदी आलोचना के ऐसे ही जगत को ऐसे झड़ चुके फूलों का कूड़ा, ‘आलोचना का कब्रिस्तान’ कहा है।

लेनिन ने “…Empiro criticism” में लिखा था ‘‘किसी भी चीज की गति के ज्ञान, उसके स्वतः स्फूर्त विकास, उसके वास्तविक जीवन के ज्ञान की पहली शर्त है उसका वैपरित्यों की एकता के रूप में ज्ञान। वस्तु का विकास (evolution)  वैपरित्यों का संघर्ष है।’’ यहां विकास का अर्थ है वृद्धि अथवा क्षय। जब भी किसी चीज की पुनरावृत्ति के रूप में उसका विकास होता है तो लेनिन के शब्दों में ‘‘उसकी प्रेरक शक्ति, उसका स्रोत, उसका प्रयोजन धुंधलके में रहता है। या उसे कोई बाह्य ईश्वरीय प्रयोजन मान लिया जाता है।’’

लेकिन जब महज पुनरावृत्ति नहीं की जाती है तभी उसकी अपनी गति के स्रोत की ओर ध्यान दिया जाता है।

पुनरावृत्ति के रास्ते को लेनिन ने ‘निर्जीव, निष्प्रभ और शुष्क’ बताया है और दूसरे रास्ते को ‘सजीव’। इसी पथ से किसी भी अस्तित्वमान वस्तु की ‘स्वगति’ की कुंजी मिल सकती है। उसमें छलांग की, उसकी निरंतरता के क्रमभंग, उसके वैपरित्य में रूपांतरण की, पुराने के नष्ट होने ओर नये के उद्भव की कुंजी मिलती है।