रविवार, 31 जनवरी 2016

एक नये विमर्श का प्रस्ताव


-अरुण माहेश्वरी

उर्मिलेश उर्मिल ने अपनी फ़ेसबुक वाल पर लिखा - " हैदराबाद नगर महापालिका के लिये चुनाव प्रचार इन दिनों चरम पर है. २ फरवरी को मतदान होना है. भाजपा प्रत्याशियों के सामने एक बड़ी समस्या आ रही है. दलित आबादी वाले इलाकों में हर जगह वे खदेड़े जा रहे हैं. लोग सवाल करते हैं, 'हम सब जातिवादी और देशद्रोही हैं, तुम्हें हमारा वोट क्यों चाहिये.' संघ-भाजपा-एबीवीपी के सामने भविष्य में यह समस्या अन्य इलाकों में भी पैदा हो सकती है, जब लोग कहना शुरू कर दें कि (आजादी की लड़ाई से अलग रहने वाले) संघियों को छोड़कर इस देश में सारे लोग जातिवादी-राष्ट्रविरोधी हैं!"

इसपर हमने टिप्पणी की कि "हेगेल के तर्कशास्त्र में एक पद आता है - पूर्ण प्रत्यावर्तन । Absolute Recoil । जब मीमांसा में एक ख़ास संयोग पर अपने को पूरी तरह से गँवा कर फिर से स्व के सार रूप, तत्व रूप की प्राप्ति की जाती है । संघ परिवार का तत्व रूप इतना ही निकृष्ट है कि उसको फिर से प्राप्त करना उसके विनाश को प्राप्त करने के समान है । सत्ताधारी संघियों की यही नियति है । जिस प्रक्रिया से अन्य अपने भटकावों से मुक्त होकर अपना नवीनीकरण करते हैं, वही प्रक्रिया एक फ़ासिस्ट और सांप्रदायिक विचारों पर निर्मित संगठन को जनतांत्रिक परिवेश में पूरी तरह से बेमेल और अप्रासंगिक बना देती है । "

गीता के पाचंवें अध्याय में जहाँ 'कर्म और संन्यास' के बारे में श्री कृष्ण उपदेश देते हैं, उसके सोलहवें श्लोक में कहा गया हैं -
ज्ञानेन्द्रिय तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन: ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम् ।।

इसका अर्थ है कि जीव का ज्ञान अविद्या से आच्छादित है । भगवान के ज्ञान से जब यह अविद्या से आच्छादित ज्ञान विनष्ट हो जाता है, तब वही ज्ञान सूर्य की भाँति प्रकाशित होकर अप्रकाशित परम तत्व को प्रकाशित कर देता है ।

अब कल्पना कीजिये - जहाँ वस्तु का यह परम तत्व ही सांप्रदायिक और ब्राह्मणवादी चातुर्वर्ण्य वाला सोच होगा, वहाँ किसी भी वजह से आच्छादित सच के अंत से जो प्रकाश में आयेगा, उसका रूप कैसा होगा !
याद आती है 7 जुलाई 2015 के 'जनसत्ता' में छपी अपूर्वानंद की एक टिप्पणी की जिसकी प्रतिक्रिया में उसी दिन हमने अपनी फेसबुक वाल पर जो लिखा वह इस प्रकार था -

" मनोविज्ञान की यह कैसी समझ !

"आज के जनसत्ता में अपूर्वानंद का लेख छपा है - ‘हिंदू राष्ट्र गांव-दर-गांव।

"आरएसएस हिंदू सांप्रदायिकता का प्रचारक है, यह अब कोई सात पर्दो में छिपा रहस्य नहीं है। केंद्र में भाजपा की सत्ता है तो इससे उनके सांप्रदायिक एजेंडा को बल मिल रहा है, इस बात पर भी किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती। ऐसी अति-अनुकूल परिस्थितियों में कोई भी अपने अंदर-बाहर के सब कुछ को बिल्कुल नग्न रूप में प्रकट कर देता है, यह भी सही है।

"लेकिन इतना सब होने मात्र से, किसी के भी अपना सब कुछ प्रकट कर देने भर से ही दूसरों के मन में उसके प्रति स्वीकार्यता बढ़ जाती है, इसका कोई कारण नहीं है। यह कहा जाता है कि एक झूठ को सौ बार दोहराने से वह सच मान लिया जाने लगता है। लेकिन यह आदमी के चेतन पक्ष का पहलू है, शुद्ध धोखा-धड़ी में फंसने का। सच सामने आने से वही व्यक्ति खुद को बुरी तरह ठगा गया महसूस करता है। झूठ उसके अवचेतन में बसा नहीं रह जाता। इसीलिये किसी विचार या प्रचार से उत्तेजित होकर कोई काम कर गुजरना ही आदमी के मन का पूरा परिचायक नहीं होता।
"आदमी का मन उसके चेतन और अवचेतन दोनों को मिला कर बनता है। जिसे आदमी का अवचेतन कहते है, उसके मन का एक अंधेरा, सुप्त कोना, अपूर्वानंद ने अपने लेख में उसके गठन के विषय को उठाया है। हमारा कहना है कि अवचेतन भी यदि चेतन की तरह ही किसी के द्वारा निदेशित हो सके, उसे पूर्व-निर्धारित ढांचों में ढाला जा सके तो फिर चेतन और अवचेतन के बीच फर्क ही क्या रह जायेगा। अपूर्वानंद अपने लेख का अंत इस पंक्ति से करते हैं कि 'हिंदू मन से शायद ही किसी को ऐतराज हो लेकिन भारतीय समाज के लिये हिंदुत्ववादी अवचेतन के गठन के आशय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।’

‘अवचेतन के गठन के आशय’ ! गौर कीजिये। वे सुचिंतित ढंग से अवचेतन के गठन की प्रक्रिया की बात कह रहे हैं। आदमी का परिवेश उसकी नैसर्गिक जरूरतों से जुड़ कर ही उसके अवचेतन में कोई जगह बनाता है। हर प्रकट चीज अवचेतन में जगह नहीं बनाती। अवचेतन में प्रवेश के लिये उसे उसकी शारिरिक-मानसिक जरूरतों का स्वाभाविक हिस्सा बनना पड़ता है। भोजन और विष्ठा में यही फर्क है। दोनो प्रकट हैं, लेकिन दोनों के लिये आदमी में समान चाहत नहीं होती। एक को ग्रहण करता है और दूसरे को अपने से दूर रखता है। विष्ठा का भक्षण करने वाला या तो कोई विकृत मस्तिष्क का व्यक्ति होगा या फिर कोई चालाक, स्वार्थी तांत्रिक।
भारत की सचाई यह है कि आरएसएस का प्रकट रूप भारतीय मन के लिये ग्रहण-योग्य नहीं है। सन् 2002 के दंगे उसकी विष्ठा है और कोई लाख कोशिश कर ले, भारतीय मन में उसे ग्रहण करने की चाहत कभी पैदा नहीं कर सकता। हाल ही में दुलात ने अपनी किताब में वाजपेयी की 2004 की जिस बात का उल्लेख किया है कि हमने 2002 में भूल की थी, वह ऐसे ही नहीं है। मोदी ने चुनाव जीता 2002 को भुला कर और कांग्रेस के प्रति सामान्य असंतोष को भुना कर, न कि सांप्रदायिक विष्ठा के प्रति किसी प्रकार की प्रीति पैदा करके। कांग्रेस नेतृत्व ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के लिये माफी अनायास ही नहीं मांगी थी।

"ऐसे में कोई भी बुद्धिजीवी यदि आज भारतीय मन के बदलने की बात करता है तो उसकी मनोविज्ञान की समझ और इतिहास बोध पर भी शंका होने लगती है।

"भारत में इसके पहले भी भाजपा नीत एनडीए शासन का एक दौर बीत चुका है। तब भी आरएसएस कम ताकतवर नहीं था। लेकिन जो आरएसएस राममंदिर आंदोलन के समय अपनी रहस्यमयता के चलते जितने लोगों को प्रेरित कर पाया, उसी ने एनडीए के दौर में अपने प्रकट भ्रष्ट रूप से उतने ही लोगों को विकर्षित भी किया। पेट्रोल पंप आदि की तरह के उस दौर के कई घोटालों में आरएसएस की सर्वोच्च कमेटियों के लोग शामिल पाये गये। उस एनडीए सरकार के पतन के बाद देश भर में आरएसएस की शाखाओं की संख्या में भारी गिरावट आगई थी। कई सालों से मध्यप्रदेश में संघ-संचालित सरकार के होने का परिणाम यह है कि अभी भारत के अपने प्रकार के सबसे जघन्य अपराधमूलक घोटाले व्यापमं में उस प्रदेश के आरएसएस के नेताओं के शामिल होने की बात आम है।
"अपूर्वानंद जब आरएसएस के लोगों की बढ़ी हुई हिंसक गतिविधियों के हवाले से यह कहते हैं कि यह भारतीय मन के किसी अवचेतन का गठन का मार्ग है तो सचमुच हंसी आती है। यह आरएसएस के रहस्य के प्रकट होने का समय है और प्रकट होने का एक मतलब होता है - नंगा होना ! आज जो साधू-साध्वियां गाहे बगाहे हिंसक और अनर्गल बातें करते हैं, उनकी शर्म को छिपाने में इन सबके पसीने छूट रहे हैं।

"जहां तक भारतीय सामाजिक-मन का सवाल है, इसकी जरूरतें विविधताओं के ठोस यथार्थ को मान कर चलने की जरूरतें हैं । इसी से उसका अवचेतन बना है और आगे भी बनेगा। यह उपनिवेशवादी यूरोप का एकांगी ‘राष्ट्रवादी’ मन नहीं है कि जिसमें साम्राज्य-विस्तार की ललक पैदा करके हिटलर-मुसोलिनी तैयार किये जा सके ! यूरोप के ऐसे ‘सामाजिक मन’ को भी अपने ठगे जाने का अब भारी पछतावा है। उन्होंने अपने ‘राष्ट्रवाद’ की दुर्गंधपूर्ण विष्ठा को बड़ी भारी कीमत देकर पहचाना है। उनके शासक-वर्गों की जरूरतों से जुड़ा युद्धोन्मादी मन और आम लोगों की जरूरतों से जुड़े युद्ध-विरोधी मन में अब क्रमश: बड़ा फर्क आ चुका है। इसके अलावा अब वह समय भी नहीं रहा है कि पहले की तरह के उपनिवेश कायम किये जा सके। किसी चीज के हासिल होने की असंभवता का बोध ही धीरे-धीरे अवचेतन से भी उसकी कामना को मिटाता है, लेकिन लंबे, काफी लंबे अर्से बाद क्योंकि इतिहास की बही में उसकी एक लकीर जो पड़ी हुई है। लेकिन भारतीय इतिहास कम से कम ऐसे विस्तारवादी ‘राष्ट्रवाद’ से पूरी तरह मुक्त है जिसके बूते आज के आम तौर पर ‘राष्ट्रवाद’ के पतन के युग में भारतीय मन के अवचेतन में उसके लिये कोई जगह बनाई जा सके !

"इसीलिये अपूर्वानंद जो भारतीय समाज के नये अवचेतन के ‘सचेत गठन’ का हौवा खड़ा कर रहे हैं, वह शुद्ध रूप में उनकी अपनी आत्मगत कमजोरी है। इसका न जीवन के ठोस यथार्थ से और न उस यथार्थ से जुड़े भारतीय समाज की जरूरतों से कोई संबंध है। यह उनकी अपनी एक सन्निपात की स्थिति है, जिसमें वे एक अर्से से फंसे हुए हैं। ‘आलोचना’ पत्रिका के इधर के भारतीय जनतंत्र पर केंद्रित दोनों अंकों के संपादकीयों में भी इसके लक्षणों को देखा जा सकता है। किसी के एक बार सत्ता में आने मात्र से वह मनुष्यों के मन के रथ का सारथी नहीं बन जाता है। ऐसा सोच उस मार्क्सवादी कथन की एक कच्ची समझ है कि किसी भी युग की विचारधारा उसके शासक वर्गों की विचारधारा होती है।"

उर्मिलेश जी की पोस्ट से क्या ऐसा कोई नया विमर्श तैयार नहीं होता है ?

शनिवार, 30 जनवरी 2016

कृत्रिम बुद्धि के युग में अर्थशास्त्र

- अरुण माहेश्वरी
( चतुर्दिक श्रृंखला - 3, प्रतिद्वंद्विता से इजारेदारी तक की भूमिका )


जब यथार्थ एक प्रकार के स्थायी अवशेष सा दिखाई देने लगता है, जब सामाजिक संबंधों में परिवर्तन की प्रक्रिया लगभग अचल जान पड़ती है, तब तकनीक ही वह पथ है जिससे आधुनिक समय में गतिशील यथार्थ ख़ुद को हमारे सामने व्यक्त करता है । आज भले ही पूँजीवाद का कोई ठोस विकल्प क्षितिज पर  न दिखाई दे रहा हो, लेकिन कोई यह भी नहीं कह सकता कि जीवन पूरी तरह से ठहर गया है । उल्टे, आज जीवन की परिस्थितियां इतनी तेज़ी से बदलती दिखाई दे रही है कि बिना किसी सामाजिक क्रांति के ही जैसे चौतरफा कोई भूचाल आया हुआ है । चीज़ें जिस गति से बदल रही है, इसका आसानी से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है । सिलिकन वैली का एक बादशाह विनोद खोसला कहता है  कि आगे विचारशील मशीन, कृत्रिम बुद्धि की तकनीकी क्रांति का सबसे गहरा असर सीधे आदमी की विचार करने की, निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ेगा ।

वह यहाँ तक कहता है कि मनुष्य की श्रम-शक्ति और मानवीय विचारशीलता की जरूरत जितनी कम होगी, पूंजी की तुलना में श्रम शक्ति की और विचारशील मशीन की तुलना में मनुष्य के विचारों की कीमत उतनी ही कम होती जायेगी। ऐसे में उसका मानना है कि "प्रचुरता और आमदनी में बढ़ती हुई विषमता के युग में हमें पूंजीवाद के एक ऐसे नये संस्करण की जरूरत पड़ सकती है जो सिर्फ अधिक से अधिक दक्षता के साथ उत्पादन पर केन्द्रित न रह कर पूंजीवाद के अन्य अवांछित सामाजिक परिणामों से समाज को बचाने के काम पर केंद्रित होगा।"

'पूँजीवाद का नया संस्करण' जो 'पूँजीवाद के अवांछित सामाजिक परिणामों से बचाने पर केंद्रित होगा' ! सुनने में कैसा लगता है ! ऐसा पूँजीवाद जो पूँजीवाद का प्रतिकार हो ! अर्थात पूँजीवाद न हो !


उसकी राय में कोई भी आर्थिक सिद्धांत बेकार साबित होगा यदि उसमें अतीत की तकनीकी क्रांतियों और इन नयी विचारशील मशीनी तकनीक के बीच के फर्क की समझ नहीं होगी। वे इसे एक ऐसा घुमावदार मोड़ बता रहे है जब मार्क्स की शब्दावली में, इतिहास की गाड़ी पर सवार बुद्धिजीवी झटका खाकर औंधे मुँह गिर जाते हैं । अब तक जिन ऐतिहासिक अनुभव को अवलंब बना कर सिद्धांतों की रचना की जाती रही है, वे अनुभव और सिद्धांत भविष्य के लिये वैध साबित नहीं होंगे । एक नये कार्य-कारण संबंध से पुराने, ऐतिहासिक परस्पर-संबंध टूट सकते हैं। जो लोग कमप्यूटरीकरण से रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का हिसाब-किताब किया करते हैं, और अब भी कर रहे हैं, वे इस बात को समझ ही नहीं रहे हैं कि आगे तकनीक क्या रूप लेने वाली है और उनके सारे अनुमान अतीत के अनेक 'सत्यों' की तरह झूठे साबित हो सकते है ।


आज अर्थ जगत में 'स्टार्टअप्स' का बोलबाला है । कहा जा सकता है - विश्व पूँजीवाद की अभी की एक सबसे रोमांचक उत्पत्ति । यह अर्थ-व्यवस्था में एक प्रकार की नयी जेनेटिक इंजीनियरिंग अथवा जेनेटिक रिपेयरिंग के तत्वों की स्थापना है । असंख्य छोटी-छोटी आर्थिक प्रयोगशालाएँ । इंटरनेट के साथ आई संपर्क और संचार की नई तकनीक के प्रयोग की संभावनाओं की प्रयोगशालाएँ ! हाथ में स्मार्ट फोन लिये एक नये प्रकार के मनुष्य को केंद्र में रख कर विकसित की जा रही नई अर्थ-व्यवस्था की प्रयोगशालाएं । सचमुच, इन पर उद्योगों और वाणिज्य के सामान्य नियमों को लागू करके देखने पर इन्हें पूरी तरह से समझना मुश्किल होगा ।

एंगेल्स ने कहा था कि भौतिकवाद को प्रत्येक वैज्ञानिक आविष्कार के साथ अपने रूप को बदलना होगा । भौतिकवाद के सामाजिक रूप में यह परिवर्तन स्वत:स्फूर्त होकर भी किसी न किसी रूप में निदेशित भी होता है । वैज्ञानिक खोजों के साथ ही उनके सामाजिक प्रभावों को अंजाम देने वाली इसकी अपनी अन्तर्निहित चालक शक्तियाँ भी पैदा हो जाती है । खोज जितनी बड़ी होगी, रूप में परिवर्तन की प्रक्रिया का आयतन और संभवतः गति भी उतनी व्यापक और तेज़ होगी । अमेरिका में सिलिकन वैली और गराज वर्कर्स के ज़रिये पूरे मानव जीवन के डिजिटलाइजेशन का जो काम प्रारंभ हुआ, उसी की शाखाओं, उप-शाखाओं का संजाल दुनिया के कोने-कोने में फैल चुका है । यही स्टार्ट्सअप का संसार है । इसकी गति को दुनिया के अर्थशास्त्री विस्फारित ऑंखों से देख रहे हैं । व्यापार के विस्तार में ऐसी गति ! यह चल नहीं सकता । हाल के 'इकोनॉमिस्ट' की तरह की रंगीन और पीली आर्थिक पत्र-पत्रिकाओं के अंकों को देख लीजिये । ये सब डाटकाम बबूले से लेकर इन नयी-नयी कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव के क़िस्सों के साथ ही ऐसी तमाम कूपित क़िस्म की प्रतिक्रियाओं से भरी हुई दिखाई देती है ।


लेकिन हमें तो इन प्रतिक्रियाओं से लगता है जैसे कोई सिरफिरा हर दिन टूट कर गिरते सितारों के नज़ारें देख कर यह कहने लगे कि सारे सितारें इसी प्रकार एक दिन टूट कर महाशून्य में विलीन हो जायेंगे और आसमान बिना सितारों का होगा ! दरअसल, यह मूलत: यथास्थितिवादियों की गुहारें भर हैं । वे इस नये विस्फोटक विस्तार में विद्रोह की गंध पाते हैं । वे इसे बेड़ियों में जकड़ कर अनुशासित करना चाहते हैं । इसमें उन्हें वर्तमान व्यवस्था के अंतिम मान लिये गये चौखटे के बाहर चले जाने का ख़तरा नज़र आने लगता है । यह शुद्ध पूँजी से पूँजी बनाने के पूँजीवादी जादू के लिये चुनौती जैसा है ।


इकोनॉमिस्ट' पत्रिका के 5-11 दिसंबर 2015 के अंक में इन स्टार्टअप्स के बूते ही तो पूँजीवाद को 'अति सक्रिय, फिर भी शांत' (Hyperactive, yet passive') कहा गया है । सक्रियता स्टार्टअप्स की और शांति पूँजीवाद में गहरे तक बैठ चुकी मंदी और गतिरोध के संकट की । अन्यथा, पूँजीवाद में 'शांति' का क्या काम !

हम यह इसलिये कह रहे है क्योंकि स्टार्टअप्स सिर्फ व्यवसाय नहीं है । इसके मूल में स्मार्ट फोन वाला एक नया आदमी है, उसकी उद्यमशीलता है । इससे व्यापार के साम्राज्य पैदा हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं । लेकिन ये मानव जीवन में एक बड़ा परिवर्तन ज़रूर ला रहे हैं । ग़ौर करने की बात यह है कि इनके साथ पूँजीवाद का भविष्य जुड़ गया है, जिसके संदर्भ में मार्क्स-एंगेल्स का कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र कहता है कि पूँजीपति उत्पादन के साधनों के निरंतर क्रांतिकरण के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता है । इसीलिये हम इन्हें संकटग्रस्त पूँजीवाद की जेनेटिक रिपेयरिंग के तत्व के रूप में देखते हैं । गौर करने की बात यह होगी कि इन नये जीन्स के प्रवेश से पूंजीवाद का रूप क्या और कैसा हो जायेगा, यह सवाल अब तक भविष्य के गर्भ में ही है, जिसका संकेत विनोद खोसला की उलझनों में दिखाई देता है ।


बहरहाल, स्टार्टअप्स में निमज्जित नौजवानों का एक अत्यंत विकसित और सफल रूप स्टीव ज़ाब्स या जुकरबर्ग है । ज़ाब्स कहता था कि हम नहीं जानते, दुनिया क्या चाहती है । हम क्या चाहते हैं, उसे हम जानते हैं । यह स्टीव ज़ाब्स नहीं, उसकी ज़ुबान से कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन और इंटरनेट की सम्मिलित शक्ति बोल रही थी । ऐसी ज़ुबान में एक कोरा व्यवसायी नहीं बोल सकता, जो अक्सर बाज़ार की माँग/ ज़रूरत का हवाला देता है । ऐसी बातें कि हम यह चाहते हैं, और लोगों को मंज़ूर हो तो अपनायें अन्यथा अस्वीकार कर दें, अग्रदूत बोला करते हैं । सिलिकन वैली का बादशाह, विनोद खोसला जब कृत्रिम ज्ञान के क्षेत्र में चल रहे अभावनीय प्रयोगों के आधार पर भविष्य में राज्य और पूँजीपतियों की भूमिका की समाप्ति की बात कहता है तभी स्टार्टअप्स की चौतरफ़ा फैली टुकड़ियों में पनप रही विद्रोही वैकल्पिक अर्थनीति के तत्वों की पहचान भी की जा सकती है ।


स्टार्टअप्स के उठने-गिरने की हर रोज़ की कहानियों के बावजूद यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि मानव श्रम की इन प्रयोगशालाओं का शायद ही कभी कोई अंत होगा ।  ऐसे तमाम तथ्यों की रोशनी में खोसला कहते है कि वे पूंजीवाद के कट्टर समर्थक है और इसी नाते वे साफ शब्दों में कहते हैं कि आज जो कुछ चल रहा है, उसे अबाध गति से और भी तेजी के साथ चलने दिया जाना चाहिए। खोसला की ‘फ़ोर्ब्स’ पत्रिका के ब्लाग पर जारी की गई इस पोस्ट पर अपने ब्लाग 'चतुर्दिक' में हमने एक टिप्पणी की थी। उसमें हमने श्रम का कोई मूल्य न रह जाने वाले उनके कथन के पहलू पर यह बुनियादी सवाल उठाया था कि यदि किसी समाज में श्रम शक्ति का मूल्य नहीं रहता है, तो फिर पूँजी का भी क्या मूल्य रह जायेगा ? श्रमिक और पूँजीपति का अस्तित्व परस्पर निर्भर है । यदि पूँजीपति की भूमिका उत्पादन के काम में ख़त्म हो जाती है तो श्रमिक की तरह ही उसके अस्तित्व का भी कोई कारण बचा नहीं रह जाता है। अगर कुछ बचा रह जाता है, तो वह है, राज्य की भूमिका । और समाज में वर्गीय अन्तर्विरोधों के अंत का अर्थ है राज्य के वर्गीय चरित्र का भी लोप, वस्तुतः राज्य का लोप । तब हमने पूछा था, क्या सचमुच, एक शोषण-विहीन, राज्य-विहीन समाज के निर्माण का मार्क्स का यूटोपिया आदमी की जद के इतना क़रीब है ?


जीवन के दूसरे विषयों की तरह ही अर्थ-व्यवस्था के विषयों को भी हमेशा पूरी तरह से स्याह-सफेद रंगों में नहीं समझा जा सकता है । हम समझते हैं कि अर्थ-व्यवस्था में भी हमेशा एक प्रकार की तरलता बनी रहती है । कितने प्रकार के स्वार्थ एक साथ काम करते हैं, उनकी पूरी गणना भी नहीं की जा सकती । इसीलिये जो लोग राजनीति और संस्कृति के तमाम विषयों को अर्थ-व्यवस्था की हलचलों से जोड़ कर व्याख्यायित करने का उतावलापन दिखाते हैं, हमें लगता हैं, वें कोरी लफ़्फ़ाज़ी, कुछ जड़सूत्रों की तोता-रटंत के सिवाय और कुछ नहीं कर रहे होते हैं । उनकी राजनीति और अर्थनीति, दोनों की समझ छिछली होती है ।


अर्थनीति से जुड़ी ऐसी ही तमाम आशंकाओं और संभावनाओं के विषय पर समय-समय पर किये गये हमारे लेखन को 'चतुर्दिक श्रृंखला' के इस तीसरे खंड में संकलित किया गया है । हम नहीं जानते, आज के समय में अर्थनीति संबंधी विमर्श में इस लेखन को कितना अपनाया जायेगा । अर्थनीति विषयक हमारे लेखन का एक ऐसा संकलन तैयार करने के लिये अनामिका प्रकाशन के पंकज शर्मा आंतरिक आभार के पात्र है ।



दिसंबर 2015            

बुधवार, 27 जनवरी 2016

‘मां सरस्वती’ के वरद् पुत्र अज्ञेय

-अरुण माहेश्वरी





आलोचना जब अपने विषय में पूरी तरह डूब कर रह जाती है, कहा जाए, प्रेयस् में खो जाती है, वह आलोचना नहीं रहती, अनालोचना हो जाती है। इस धुन में वह अपने अंदर के उन निहायत औपचारिक से सवालों को भी खो बैठती है कि उसके लिये आखिर विषय की प्रासंगिकता ही क्या है ? कहते हैं कि मनुष्य अपने को ईश्वर में जितना खपाता है, उसका अपना अपने पास उतना ही कम रह जाता है। मजदूर के श्रम का उत्पाद जितना ज्यादा होता है, उसके स्वयं का मूल्य उतना ही कम हो जाता है ।

पिछले दिनों हम जब केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी आदि के साथ ही रवीन्द्रनाथ और रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, निराला, प्रसाद, नंददुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा आदि के जरिये हिंदी साहित्य के वर्तमान विरूपित से दिखाई दे रहे परिदृश्य पर लिख रहे थे, तभी यह साफ था कि इस परिदृश्य को कभी भी सिर्फ दृश्य में उपस्थित जनों की चर्चा से मूर्त नहीं किया जा सकता है। बल्कि, इसे रूपायित करने के लिये उन तमाम विगत हस्तियों की चर्चा करना भी समान रूप से जरूरी है, जो अपने जीवित काल से लेकर आज तक भी, इस परिदृश्य पर अपनी प्रेतछाया के प्रभाव को बनाये हुए हैं ।

कहना न होगा, हिंदी साहित्य जगत पर ऐसी एक सबसे प्रमुख प्रेतछाया का नाम है - अज्ञेय। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'।

चार साल पहले उनका जन्म शताब्दी वर्ष था। उस मौके पर कई आयोजन हुए। उन आयोजनों को देख कर इस लेखक ने एक छोटी सी टिप्पणी लिखी थी -

“सात मार्च 1911 को जन्मे अज्ञेय जी का शताब्दी वर्ष पूरा होगया। हिंदी जगत में उनके लिये श्रद्धा-सुमनों की कोई कमी नहीं रही। अलग-अलग शहरों में कई आयोजन हुए। अखबारों, पत्रिकाओं में कुछ छोटी-मोटी टिप्पणियां आयीं। उनके निकट के मित्रों, संबंधियों ने एक-दो किताबें भी निकाली। कुछ स्वघोषित ‘सांस्कृतिक दूतों’ के शहर-शहर फेरे लगे। लेकिन गौर करने की बात यह है कि कुल मिला कर यह पूरा वर्ष बिना किसी वैचारिक उत्तेजना और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यग्रता के, एक स्निग्ध और शान्त, तनाव-रहित वातावरण में बीत गया।

“रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद, और मुक्तिबोध तो जाने दीजिये, यहां तक कि तुलसी जयंती भी आज तक सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों पर कुछ वैचारिक उत्तेजना पैदा करती है। लेकिन हाल के वर्षों तक हिन्दी में सबसे विवादास्पद समझे जाने वाले अज्ञेय की शताब्दी कोई मामूली वैचारिक आलोड़न भी पैदा नहीं कर पाये, यह स्थिति किस बात का संकेत है?

“क्या यह अज्ञेय पर, या आज के समय पर, या दोनों पर ही कोई विशेष टिप्पणी है ।

“जिन नामवरजी की अज्ञेय के साथ एक मंच पर उपस्थिति से वैचारिक रक्तपात का कयास लगाया जाता था, उन्होंने भी इस शताब्दी वर्ष में दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थनाएं भर करके अपना काम चला लिया। और जो ‘अज्ञेयपंथ’ का झोला लिये घूमते रहे हैं, उनके पास पहले भी कहने के लिये सिर्फ श्रद्धा और भक्ति ही थी, शताब्दी वर्ष के समारोहों में भी उसीका प्रदर्शन किया गया। वैसे भी, आज के ‘समाजवाद-विहीन’ वैश्वीकरण के युग में अज्ञेय के विचारों के दो प्रमुख फलक, कम्युनिस्ट-विरोध और पूरब-पश्चिम द्वैत वाली पंडिताई के खरीदार कहां बचे हैं! कुल मिला कर इस पूरे साल ‘अज्ञेयपंथ’ और ‘नामवरपंथ’ की खूब छनी। सब कुछ भले-भले निपट गया।

“इस ‘भले-भले’ ने ही आज हमारे लिये यह प्रश्न छोड़ दिया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ ? किसी जमाने में हिंदी में प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के बरक्स अज्ञेय का प्रयोगवाद (परिमल) विचारधारा के एक दूसरे धुर का मंच हुआ करता था। पचास के दशक के शीत युद्ध के जमाने में एक ओर जहां सोवियत-प्रेरित समाजवाद, जनतंत्र और शांति का आंदोलन था तो दूसरी ओर अमेरिका के तत्वावधान में ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ का ‘समाजवादी निरंकुशता’ के खिलाफ ‘विचारधारा की समाप्ति’ के नारे के आधार पर तैयार किया गया पश्चिमी बुद्धिजीवियों का विरोधी मंच था। अज्ञेय जी ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के मंच से जुड़े हुए थे, इसके अनेक साक्ष्य हिंदी में चर्चित हो चुके हैं। किसी भी वजह से प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के साथ निर्वाह करने में असमर्थ लेखकों के लिये परिमल एक अलग मोर्चे की भूमिका अदा कर रहा था। इसीलिये स्वाभाविक तौर पर हिंदी में उस काल की सारी साहित्यिक-वैचारिक बहसों के केंद्र में अज्ञेय हुआ करते थे। लेकिन आज वह सारा विवाद कहां रफ्फू-चक्कर होगया ?

“यही एक प्रश्न किसी को भी आज की साहित्यिक दुनिया के सच पर गहराई से नजर डालने के लिये प्रेरित कर सकता है।

“आजादी के पहले की और शीत युद्ध के पूरे जमाने की बात छोड़ दीजिये। तब वास्तव में दुनिया दो शिविरों में बंटी हुई थी- साम्राज्यवादी और समाजवादी। 80 के दशक तक समाजवादी शिविर की अनेक बुनियादी कमजोरियों और बिखराव के उजागर होने पर भी धरती पर सोवियत संघ की मौजूदगी मात्र से विचारों की दुनिया में शीतयुद्ध का तनाव बना हुआ था। इसीलिये, तब तक भी भारत सहित बहुत से नवस्वाधीन विकासशील देशों में साम्राज्यवाद-विरोधी गुट-निरपेक्षता, गैर-पूंजीवादी विकास की संभावनाओं के आधार पर जनतंत्र और उसके विस्तार की लड़ाई की एक खास ‘समाजवादी’ दिशा थी। चीन का ‘नया जनवाद’ ढेरों नयी वैचारिक उद्भावनाओं का स्रोत था। हिंदी में तभी प्रेमचंद शताब्दी के दौरान प्रेमचंद को केंद्र में रख कर चंद्रबली सिंह ने ‘आलोचनात्मक’ और ‘समाजवादी’ यथार्थवाद के साथ ही यथार्थ की एक और, तीसरी श्रेणी ‘जनवादी क्रांतिकारी यथार्थवाद’ की अवधारणा रखी। प्रगतिशील लेखक संघ वस्तुत: बिखर गया, लेकिन हिंदी-उर्दू के लेखकों के एक नये संगठन, जनवादी लेखक संघ (1982) का उदय हुआ। जनतंत्र का सवाल केंद्रीय सवाल बना और भारत की जनता की जनतंत्र की लड़ाई के मोर्चे की जो इंद्रधनुषी तस्वीर पेश की गयी उसमें डा. रामविलास शर्मा से लेकर अज्ञेय तक, सबके लिये समान स्थान का आश्वासन था। यह एक अलग विचार का प्रश्न है कि व्यवहार में ऐसा मोर्चा कभी भी संभव हुआ या नहीं हुआ ?  जाहिर है कि इस पूरे घटनाचक्र की पृष्ठभूमि में 1975 का आंतरिक आपातकाल और 1977 में जनता पार्टी तथा तीन राज्यों में वामपंथियों की भारी जीतों के अनुभव की भी बड़ी भूमिका थी।

“ आंतरिक आपातकाल के पहले और बाद के इस दौर में अज्ञेय जीवित ही नहीं, खासे सक्रिय थे। 1965 में वे बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लौट कर तीन सालों तक टाइम्स आफ इंडिया के हिंदी साप्ताहिक ‘दिनमान’ के संस्थापक संपादक की भूमिका निभाने के बाद 1973-74 के दौरान जयप्रकाश नारायण के साप्ताहिक ‘एवरीमैन्स वीकली’ के संपादक (1973-74) रहे और 1977-80 तक नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक का काम संभाला। वह पूरा दौर भारत में जनतंत्र की रक्षा के लिये सबसे तीव्र संघर्ष का दौर था और जयप्रकाश के साथ जुड़ कर अपने अखबारों के जरिये अज्ञेय ने उस पूरी लड़ाई में अपनी एक भूमिका अदा की थी।

“फिर भी आज तक कोई यह प्रश्न क्यों नहीं उठाता है कि जनवादी लेखक संघ के वैचारिक परिप्रेक्ष्य के इंद्रधनुषी दायरे में अज्ञेय को उनके जीवित काल में कभी क्यों नहीं शामिल किया जा सका ?

"इस एक सवाल के जवाब से जहां प्रलेस-जलेस की विचारधारात्मक प्रतिश्रुतियों और निष्ठाओं की सचाई की परख हो सकती है, वहीं अज्ञेय की भी ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ की वास्तविकता को समझा जा सकता है। कहना न होगा कि आज जहां जलेस-प्रलेस प्रकार के संगठन पार्टी की जकड़नों से बेदम होकर अस्तित्वीय संकट के गह्वर में हांफ रहे हैं, और लेखक क्रमश: जयपुर उत्सव की तरह की साहित्य-मंडियों में अपनी कीमत लगवाने को व्याकुल हो रहे हैं, वहीं अज्ञेय की ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ का भी आज कोई दो-कौड़ी का दाम लगाने के लिये तैयार नहीं है। अज्ञेय शताब्दी वर्ष के आयोजनों की रपटों से तो कम से कम यही जाहिर होता है।

“सचमुच यह एक अनोखी विडंबना है। नामवर का लोप ही अज्ञेय का भी लोप है। ऐसे ही ‘विचारधारा का अंत’ विचार मात्र के अंत का भी सबब बनता है। “





गौर करने की बात यह रही कि तब कोलकाता से नियमित निकलने वाली पत्रिका ‘वागर्थ’ ने अपनी समझ से, अज्ञेय जी की अर्चना-आरती के पवित्र मौके पर ऐसी किसी संशयपरक टिप्पणी के प्रकाशन को अनुचित माना। जिस अखबार में हम अक्सर लिखते थे, उसकी अज्ञेय जी के प्रति प्रतिबद्धताएं इतनी उत्कट थी कि आम तौर पर साहित्यिक अखाड़ेबाजी के आकर्षण के प्रति आग्रही होने के बावजूद प्रात:स्मरणीय अज्ञेय जी पर इतने हलके से उठाये गये सवाल भी उसके लिये ईश-निंदा से कम अपराध नहीं था। अशोक वाजपेयी की तरह के सत्ताधारियों ने अपने में भावी ‘अज्ञेय’ को देखना शुरू कर दिया था और इसीलिये किसी न किसी रूप में सरकारी सहयोग से सांसें लेने वाली बाकी पत्रिकाओं के दरवाजों पर दस्तक देने का साहस नहीं किया जा सकता था। यूपीए टू का जमाना था, वामपंथियों की कतारों में वैसे ही पस्ती थी। पहले से ही साहित्य में विचारधारात्मक संघर्ष के सूत्र छूट जाने से संगठनों की पत्रिकाओं में भी धारा के विरुद्ध चलने का कोई उत्साह नहीं था। फेसबुक की तरह के वैकल्पिक मंच का तो कोई अस्तित्व ही नहीं था। जुकरबर्ग ने 2004 में फेसबुक के सोशलसाइट को अमेरिका में शुरू तो कर दिया था, लेकिन उसका अन्तरराष्ट्रीय विस्तार 2012 के आईपीओ के बाद ही संभव हो पाया था। हमारा ब्लाग ‘चतुर्दिक’ भी दो साल बाद, 2013 में शुरू हुआ।

इसप्रकार, कुल मिला कर, अज्ञेय, और साथ ही नामवर जी के प्रति भी आलोचनात्मक दृष्टि से लिखी गई एक छोटी सी टिप्पणी के लिये हिंदी जगत के सारे दरवाजे बंद थे। गनीमत थी कि ‘विध्वंसक’ राजेन्द्र यादव जी मौजूद थे। उनके ‘हंस’ में उसे जगह मिली। लेकिन बाकी हिंदी जगत की स्थिति तो यही थी - जैसा  कांट के बारे में कहते है - उन्हें सम्राट के खिलाफ मुकदमा चला कर उसे फांसी पर चढ़ाना मंजूर नहीं था, उसे वे खूनी विद्रोहियों द्वारा सीधे सर कलम करने से कहीं ज्यादा अश्लील मानते थे। हिंदी प्रतिष्ठानों के लिये अज्ञेय को गाली दिया जाना मंजूर हो सकता है, लेकिन उन्हें बाकायदा तर्कों से खारिज करने की प्रस्तावना तक को नहीं स्वीकारा जा सकता है। शुद्ध आभिजात्यों के न्यायशास्त्र का शासन था !

शताब्दी वर्ष में अज्ञेय जी के नाम पर साहित्य में असीम-अनंत के संधानियों के ढोल-नगाड़े बजते रहे। हिंदी के सारस्वत पुरुष के लिये मां सरस्वती की आर्तपुकार का व्यापार मजे से चलता रहा। साहित्य अकादमी ने 2012 में अज्ञेय के पत्रों का एक संकलन ‘अज्ञेय पत्रावली’ (सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी) प्रकाशित कर और ‘रचना संचयनों’ की अपनी श्रृंखला में ‘अज्ञेय गद्य रचना संचयन’ पर काम को शुरू कर, जो अभी 2015 में सवा नौ सौ पन्ने के संकलन के रूप में प्रकाशित हुआ है, शताब्दी के पालन की अपनी औपचारिकताएं पूरी की।

इन सबके बावजूद, समग्रत:, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अज्ञेय शताब्दी वर्ष के बीच से न लेखक अज्ञेय का वैसा कोई पुनर्जन्म हुआ जैसा रवीन्द्रनाथ या प्रेमचंद के शताब्दी वर्षों में उनका हुआ था, और, न ही आधुनिक युग के सवालों पर अज्ञेय के विचार कोई नई दृष्टि देते हुए प्रतीत हुए। अपने जीवित काल में हिंदी साहित्य जगत की वैचारिक टकराहटों के केंद्र में रहने वाला लेखक-विचारक, तीन दशक से भी कम समय में, अपने जन्म-शताब्दी वर्ष के दौरान सिर्फ श्रद्धासुमनों का पात्र रह गया, लेशमात्र रचनात्मक और वैचारिक उत्तेजना का विषय नहीं बन पाया।

हमारा सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ ? क्यों एक समर्थ गद्यकार, कथाकार, उपन्यासकार, कवि, विचारक और यात्रा-वृत्तांतों का प्रभावशाली लेखक अपने किसी भी पात्र, काव्यबिंब, विचार या शैली की विशिष्टता के साथ साहित्य के प्रतिमानों की किसी गंभीर चर्चा के केंद्र में नहीं दिखाई दिया ? उनको लेकर यदि कुछ चीजों पर चर्चा हुई तो वे थी उनका कथित ‘अति-व्यस्त’ जीवन , उनकी संपादन योजनाएं, स्वदेश-विदेश यात्रा की योजनाएं, संगोष्ठी, साहित्यिक आयोजनों, जानकी यात्रा, भागवत भूमि यात्रा, वत्सल निधि और लेखक शिविरों की। खुद अज्ञेय ने 1943 में ही ‘तारसप्तक’ की भूमिका में अपने को ‘योजना-विश्वासी’ के रूप में बदनाम बताया था।‘अज्ञेय पत्रावली’ की भूमिका में विश्वनाथ तिवारी भी बताते हैं, ‘‘अज्ञेय के पत्रों से जाहिर है कि उनका जीवन एक अति व्यस्त लेखक का जीवन था।’’ अज्ञेय की कविताओं में बार-बार आने वाला एक लगातार, अनथक रूप से दौड़ती, छटपटाती, तड़पती ‘सोन मछली’ का आत्म-बिंब ही इस शताब्दी वर्ष के आयोजनों के प्रमुख प्रतीक के रूप में सामने आया। छ: पंक्तियों की उनकी कविता ‘सोन मछली’ को खूब सुना गया - ‘‘हम निहारते रूप,/ कांच के पीछे/ हांप रही है मछली।...’’

अज्ञेय ने अपने साहित्यिक जीवन में ‘समाजवादी निरंकुशता’ के खिलाफ ‘आधुनिकता’ का, व्यक्ति-स्वतंत्रता का झंडा उठाया था। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि शेखर और भुवन जैसे पात्रों से मुखरित अज्ञेय का जीवन-दर्शन पश्चिम की आधुनिकतावादी काफ्कानुभूति या किसी अस्तित्वीय संकट की छटपटाहट या पीड़ा का दर्शन नहीं था। अज्ञेय कहीं से भी आधुनिक जीवन के तनावों को नहीं जीते थे। शुरू से उन्हें अपने आत्म में झांकने से परहेज था, क्योंकि उनका विश्वास था कि ‘‘अपने को बहुत अधिक जानने से कोई लाभ नहीं होता, केवल क्लेश-ही-क्लेश होता है।’’(‘चिन्ता’ की ‘छाया-कथा’ से) वे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की भाव-भूमि पर अपने को हमेशा ‘असीम’ की देहरी पर, तृप्त श्रद्धालीन, श्रद्धासीन भाव के साथ जीते थे। एक आततायी दुनिया में विखंडित अकेले आदमी के यथार्थ और तनावपूर्ण आधुनिक भाव बोध से वे कोसों दूर थे। वैसे भी किसी ‘योजना-विश्वासी’, उत्सवधर्मी, तीर्थ यात्री, आयोजन-प्रिय लेखक का उस आधुनिकता बोध से कोई जैविक संपर्क हो भी नहीं सकता था, जिसने ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के मंच को एक वैचारिक संगति का आधारप्रदान किया था और दुनिया के कई बड़े-बड़े लेखकों को भी अपनी ओर खींचने में सफल हुआ था। कहना न होगा, अज्ञेय का इस मंच से संपर्क जितना उनका नैसर्गिक चयन नहीं था, उससे कहीं ज्यादा नितांत स्थानीय, स्वार्थपूर्ण और प्रगतिशील लेखक संघ के विरोध में अपना एक मंच तैयार करने के निजी आग्रह का परिणाम था।

अन्यथा, उत्सवधर्मिता को रचनाधर्मिता के विरुद्ध तो मुक्तिबोध मानते थे, अज्ञेय नहीं ! आधुनिकतावादी व्यक्तिवाद और उत्सव-आयोजन - ये दो पूरी तरह से अलग-अलग धाराएं है, किसी सरल रेखा के दो छोर नहीं। इनमें क्या काम्य है और क्या त्याज्य, इसप्रकार का मूल्य-निर्णय एक दीगर सवाल है। लेकिन यह साफ है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास के एक क्रूरतम अनुभव के बाद व्यर्थता के यथार्थबोध की बेचैनी से अज्ञेय का कोई संबंध नहीं था। उनका हिंदी आलोचना में बार-बार दोहरायी जाने वाली इस निराधार, बल्कि कोरी वितंडावादी धारणा से कोई संपर्क नहीं था कि ‘आधुनिकतावाद’ का अंत अंतत: पोंगापंथी परंपरावाद के गर्त में ही होता है। उल्टे, अंत तक जाते-जाते तो उनका प्रत्यावर्तन सन् 1912-13 के ‘मैथलीशरण गुप्त’ की ‘भारत-भारती’ की संवेदना में होता है। यह एक प्रकार से भारत के ‘युगांतरवादी’ क्रांतिकारियों के पुनरुत्थानवाद का भी प्रत्यावर्तन था। इस अर्थ में अज्ञेय छायावादी युग की संवेदना और भाषाई संस्कार में शायद कुछ भी नया नहीं जोड़ पाये थे।  

बहरहाल, प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपनी पुस्तक ‘संवाद’ के लेखों में अज्ञेय के बारे में लिखते हुए यही केंद्रीय सवाल उठाया था कि ‘‘अज्ञेय अन्तर्मुखी रचनाकार है। तब वे सप्तकों का संयोजन और पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन वगैरह कैसे कर सके ? ’’

उन्हीं दिनों हमने श्रोत्रिय जी के सामने एक प्रतिप्रश्न रखा था कि ‘‘क्या अज्ञेय और पीडि़त जनता की अन्तर्मुखता एक है ? क्या एक शोषित-पीडि़त इंसान द्वारा अपने भौतिक जीवन में पराजयों से निपटने के लिये अपने अन्तर में नैतिक विजयों के रचे जाने वाले समर-आयोजनों का अज्ञेय के किसी भी ‘भीतरी संघर्ष’ से कोई मेल है ? और क्या चंद ‘सुशिक्षित’, ‘संस्कृतिवान’, शक्तिशालियों के साथ मिल कर किये जाने वाले वैभवपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का उनकी कथित अन्तर्मुखता से कोई मूलभूत विरोध है ? (साहित्य में यथार्थ : सिद्धांत और व्यवहार, अरुण माहेश्वरी़, पृष्ठ - 122)

अज्ञेय सोलह साल की उम्र में क्रांतिकारियों के संपर्क में आगये थे। 1930 में जब उन्नीस के थे, पहली बार गिरफ्तार हुए, फिर 1931-33 तक जेल की कालकोठरी में बंद रहे। जेल में लिखी गई उनकी छ: कहानियों का जो पहला संकलन ‘कोठरी की बात’ प्रकाशित हुआ, उसकीपहली कहानी है - ‘छाया’। जेल के वार्डन के मुंह से कही गयी क्रांतिकारी अरुण की साथी सुषमा की फांसी की कहानी। अरुण खुद उस फांसी का साक्षी बनता है - मृत सुषमा के मुंह की ओर देर तक देखते हुए ‘बहुत धीमी, कांपती आवाज में बोला, शारदा तुम्हारी जीत हुई’। जेल का डाक्टर सुषमा के शव को दफ्तर ले जाकर ‘पब्लिक’ को सौंप देने की बात कहता है, तो अरुण बोलता है -‘पब्लिक !’
‘वह फिर बोला, ‘पब्लिक’!’
‘‘फिर एक डरावनी हँसी हँसा... और बोला ‘चलो।’ (कोठरी की बात, प्रथम संस्करण, पृष्ठ - 29)
‘छाया’ के बाद ही इस संकलन की दूसरी कहानी है - ‘द्रोही’। इसमें कथा नायक कहता है - ‘‘जबसे मैं बंदी हुआ हूं मेरा आत्म-संयम टूट-सा गया है। मैं क्षण भर भी अपने मनोवेग को थाम नहीं सकता! बेलगाम घोड़े की तरह वह मुझे जिधर चाहता है, लेकर भाग जाता है। और मैं डर कर उससे चिपट कर बैठा रहता हूँ कि कहीं गिर न पड़ूँ उसे रोकने का प्रयत्न करने के लिए मेरे हाथों को अवकाश ही नहीं मिलता।
‘‘मैं द्रोही हूँ ? कौन कहता है ?
‘‘मैंने एक बार, एक अस्थायी जोश में आकर, राजद्रोह करने का और करवाने का बीड़ा उठाया था। पर यह तो यौवन की एक उमंग थी, हृदय का एक उद्गार था। उमंग आई और चली गई, उद्गार उठा और मिट गया। उस एक बात के लिए क्या मै सदा के लिए द्रोही होजाऊंगा ? और फिर उसका समुचित प्रायश्चित भी तो कर रहा हूँ। जो आग मैंने सुलगाई थी, क्या उसे बुझाने में सरकार की भरसक सहायता नहीं कर रहा हूँ ?
‘‘देशद्रोह !
‘‘नहीं, यह देशद्रोह नहीं है। जो बीज मैंने बोया था, उससे अगर पौधा अच्छा नहीं लगा, तो क्यों न मैं उसकी जड़ काटूँ, क्यों न उसे उन्मूल उखाड़ फेकूँ और नये वृक्ष के लिए स्थान बनाऊँ।’’ (वही, पृष्ठ 37-38)

जेल से निकलने के बाद सन् 1935 की अज्ञेय जी की कविता है - ‘‘क्या मेरे कर्मों का संचय मुझको चिंता छूट गई है-/ मैं बस जानूँ, मैं धनु हूँ, जिसकी प्रत्यंचा टूट गई है !’’

जेल में ही अज्ञेय जी की ‘कोठरी की बात’ की कहानियों, ‘भग्नदूत’ और ‘चिंता’ की कविताओं की रचना के अलावा ‘शेखर : एक जीवनी’ का भी पहला मसौदा तैयार हो गया था। जीवन से ‘द्रोह’ नामक चीज हमेशा के लिये विदा हुई। द्रोह के दाग से पूरी तरह मुक्त नये अज्ञेय, शेखर की तरह की तमाम उलझनों को भी परे रख कर ‘नदी के द्वीप’ के भुवन में स्वछंद जीवन के उच्छवास को भरपूर जी लेने की अनंत कामना के साथ अवतरित हुए। कहना न होगा, मछली की छटपटाहट  और हांफनी के मूल में उसकी ‘रूप तृषा’ है, किसी अस्तित्विीय संकट का भाव बोध नहीं !

अज्ञेय ने स्वतंत्रता आंदोलन से नाता तोड़ा,  द्वितीय विश्वयुद्ध में ‘पिपुल्स वार’ की सैद्धांतिकता ने ब्रिटिश शासकों के कोप से दूर रखा और वे प्रगतिशील लेखक संघ के भी संपर्क में आएं। रेडिकल ह्यूमेनिस्ट एम. एन. राय ने उन्हें गांधी से अलग रहने के तर्क दिये, आजादी के ठीक बाद, जब कम्युनिस्टों ने ‘यह आजादी झूठी है’ का नारा दिया और भारत सरकार के क्रूर दमन को निमंत्रित किया, तब तक अपने ‘तारसप्तक’(1943) में मार्क्सवादियों के साथ निबाह करने में सक्षम अज्ञेय प्रलेस के विरुद्ध ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के भारत-दूत बन चुके थे। सन् ‘75 के आंतरिक आपातकाल के पहले तक ‘दिनमान’ के यशस्वी संपादक जयप्रकाश नारायण के ‘एवरीमैन्स’ से शुरू के सिर्फ पांच महीने जुड़े रहे और  बिहार आंदोलन के पहले ही दिसंबर 1973 में उससे त्यागपत्र दे दिया। सन् ‘75 में आंतरिक आपातकालकी घोषणा के बाद तो एक लंबे अर्से के लिये जर्मनी के हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में जा बसे।

कहने का मतलब यह है कि जिस धनु की प्रत्यंचा तीस के दशक में ही टूट गई थी, वह फिर किसी युद्ध के मैदान में नहीं चढ़ी। ‘‘मेघाच्छन्न आकाश, प्रकाशहीन सांयकाल, पवन अचंचल, चंचला की अदृश्य और उड़ते-उड़ते सहसा पंख टूट जाने से विवश गिरता हुआ अकेला-ही-अकेला, एक पक्षी जो गिरता है और फिर अपनी उड़ान, अपना स्थान पाने के लिये छटपटा रहा है, छटपटा रहा है‘‘। ‘शेखर एक जीवनी’ में युयुत्सु भाव को ‘वय:संधि’ की छटपटाहटों के तौर पर तिरोहित कर अज्ञेय का तनावों से विरेचित, अनंत कामनाओं से भरे आभिजात्य मनुष्य के रूप में नया जन्म हो चुका था। जहां तक वैचारिकता का सवाल है, वह तो उनकी बची-खुची पहचान के भी लोप का कारण बनी। वह अपने मनोविज्ञान पर अन्यों के जैसा दिखने के लिये चढ़ाया गया नकाब था। जैसे हम देखते हैं, मोदी के प्रचार में सबकों मोदी के चेहरे का नकाब पहना कर व्यक्तित्व-शून्य, यकसां बना दिया जाता है। आदमी की क्षुद्रता और उदात्तता की सारी विशिष्टताएं इस सामूहिक-पहचान में छिपाई जाती है।

‘शेखर’ के बारे में अज्ञेय जी कहते हैं कि यह एक घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए (vision) को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है। प्रसाद जी की घनीभूत पीड़ा दुर्दिन में आंसू बन कर आती है। और अज्ञेय जी की घनीभूत वेदना जीवन के थोथे दार्शनिक विलास, स्व-विरोधी बातों के उन्मादित-विमर्श के एक ऐसे दुखांत की विडंबना के साथ आती है जिसका अंत बेहद नीरस, कोरी ढर्रेवरता की वापसी में होता है - भारतीय दर्शन के नीरस दुखांत की विडंबना की तरह जिसकी तमाम धाराएं शंकर में समाहित होकर कोरे कर्मकांडों में पर्यवसित हो जाती है। जिसमें आगे भक्ति और तत्व मीमांसा एकमेक हो जाते हैं।

स्लावोय जिजेक ऐसे ही एक प्रसंग में शेक्सपियर के नाटक Troilus and Cressida के पांचवे अंक के दूसरे दृश्य के इस अंश को उद्धृत करते है:
O madness of discourse,
That cause sets up with and against itself !
Bi-fold authority ! where reason can revolt
without perdition, and loss assume all reason
Without revolt
(आह, विमर्श का पागलपन,/ कर्ता खुद के साथ और खुद के खिलाफ सामने आता है/ दोहरी हैसियत ! जहां विवेक विद्रोह कर सकता है/ बिना विनाश के, और विनाश सारे विवेक को धारण कर लेता है/ बिना विद्रोह के)

इस नाटक के संदर्भ में ये पंक्तियां ट्रौयलस की उन स्व-विरोधी दलीलों के बारे में है जब ट्रौयलस को क्रेसीडा की बेवफाई का पता चलता है ; वह जो कहना चाहता है एक ही सुर में उसके पक्ष और विपक्ष की सारी दलीलें देने लगता है; उसके तर्क उसकी खुद की दलीलों के खिलाफ होते हैं लेकिन उन्हें खारिज नहीं करते, उसकी अतार्किकता तर्क को बिना खारिज किये तर्क का रूप लेने लगती है। एक कर्ता जो खुद अपने खिलाफ काम करता है, एक तर्क जो खुद के अस्वीकार से जुड़ जाता है।

दरअसल, आदमी की आत्म-स्वीकृतियां जितनी अधिक बेलाग और बेलौस होती है, अपनी विसंगतियों पर वह जितना अधिक आत्म-विश्वास के साथ मुखर होता है, वह उतना ही अधिक मिथ्याचार भी कर रहा होता है। उनसे व्यक्ति के अंतरजगत की कोई जानकारी नहीं मिलती। वस्तुत: उसके पास कहने जैसा कुछ होता ही नहीं है। आदमी का आत्मोत्थान तो आत्म-विवर्तन है, उसकी अन्तर्निहित विसंगतियों की देन। वह स्व के दो बाह्य, अजैविक विलोमों के कृत्रिम द्वंद्वों से रूपायित नहीं होता। आखिरकार, शून्य में शून्य का जोड़, घटाव, गुणा, भाग - सब शून्य ही होता है।

अज्ञेय की समग्र बौद्धिक बुनावट में उनके जीवन और मानस के इस पहलू की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। जीवन का यही दंश है जिसकी वजह से ‘हांफती हुई इस सोन मछली’ को फिर कभी कोई ऐसा संगतिपूर्ण वैचारिक ठौर नहीं मिल सका, जिसके संदर्भ में एक आधुनिक विचारक के रूप में उनकी कोई अपनी स्वतंत्र पहचान बनें, अर्थात जो उन्हें व्यग्र करें, कुछ नया कहने के लिये प्रेरित करें।

अज्ञेय परिभाषित होते रहे कम्युनिस्ट-विरोध की नकारात्मकता से। यदि उनके अवचेतन को टटोले, खोजे कि उनकी सोच में दमित क्या है, तो वह कोई ‘स्वतंत्रता’ का तत्व नहीं है। यह तो उनका घोषित नारा था, बिल्कुल प्रकट, एक बार-बार दोहरायी गयी बात। और इसीलिये शायद सबसे अधिक खोखली बात भी। महज एक नियम, एक औपचारिकता! अज्ञेय में जो सर्वत्र है, लेकिन दमित है - वह है प्रगतिशीलता का विरोध, साहित्य के केंद्र में साधारण आदमी की स्थापना पर टिके यथार्थवाद का विरोध, ‘प्रेमचंद’ का विरोध, जनता के हितों के प्रति प्रतिबद्धता का विरोध - जो छिपे-ढके ढंग से आता है, डंके की चोट पर नहीं। प्रेमचंद शताब्दी पर अज्ञेय अपने लेख ‘उपन्यास सम्राट’ में संकेतों से इस ‘सम्राट’ की कोरी ‘किस्सागोई’, उसके लेखन में ‘सघन संरचना का अभाव’ की तरह की बातों से उनकी अनाधुनिकता और लघुता को जिस प्रकार उठाते हैं, वह है उनके सोच का दमित पहलू, अवचेतन में बैठी उनके विचारों की एक प्रमुख संचालक शक्ति।

इसीलिये, जैसा कि शुरू में ही कहा गया है - ‘नामवर का लोप अज्ञेय का भी लोप है’। आदमी की कामनाओं की अमूर्तता अक्सर किसी नकारात्मकता के जरिये ही मूर्त होती है, उसके किसी अभाव की पूर्ति के लिये नहीं। कामना अभाव का पर्याय नहीं है। अभाव का बोध व्यग्रता और संघर्ष की चेतना पैदा करता है, कामना सिर्फ विलास की लालसा। अज्ञेय का लेखन इसी लालसा की फैंटेसी है।

तथापि, अंतिम दिनों में जब वे अपनी कुछ ग्रंथियों से मुक्त हुए, कामनाओं की ज्वाला शांत हुई तो ‘विद्रोह‘ और ‘क्रांति’ की तरह के विषयों पर इतना जरूर कह पाये कि ‘‘इनके बारे में जरूर कुछ सोचने को है। सोचने को है तो कहने को भी होगा। लेकिन ...इनकी जो परिकल्पना ‘शेखर : एक जीवनी’ के चरित-नायक की थी वह आज मेरी नहीं है, इतना तो जरूर कह सकता हूं। रोमानी भावना का मुलम्मा काफी-कुछ उतर चुका है।‘‘ और मार्क्स की कही इस बात को कि ‘‘ स्वतंत्रता का एक रूप ठीक वैसे ही दूसरे को शासित करता है जैसे शरीर का एक अंग दूसरे को करता है। जब भी किसी एक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाया जाता है तो स्वतंत्रता के सामान्य रूप पर प्रश्न उठा दिया जाता है। जब स्वतंत्रता के एक रूप को खारिज किया जाता है तो सामान्य तौर पर स्वतंत्रता को ही खारिज कर दिया जाता है", वे अपने ढंग से कहते हैं कि ‘‘मानव की स्वाधीनता मानव मात्र की होने के कारण अविभाज्य है: किसी एक की स्वाधीनता को विक्षत या सीमित कर के दूसरे की स्वाधीनता नहीं बढ़ायी जायेगी।’’(‘जोग लिखी’ में संकलित विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, परमानंद श्रीवास्तव तथा केदारनाथ सिंह से 1975 में की गई बातचीत से)

हिंदी में अज्ञेय जी की चर्चा अक्सर एक मनीषी विचारक के रूप में ज्यादा की जाती है। वे खुद भी, इसको लेकर काफी सतर्क रहने की कोशिश करते थे। विश्वनाथ तिवारी ने बताया है कि कैसे अपने व्याख्यानों को लेकर वे सजग रहते थे। फिर भी उनका रूझान किसी शोधकर्ता या प्रवर्त् क का नहीं था। प्रवर्त्1क जीवन में परिवर्तनों को निश्चित भविष्य-दृष्टि से अर्थ प्रदान करता है। उसके सोच में तर्क की एकसूत्रता दिखाई देती है। अज्ञेय तो युगीन विचारधारा के एक ऐसे कनस्तर थे जिसमें समय की असंतुलित, अलौकिक, रहस्यमय विचित्र संरचनाएं छिपाई जाती है। असंगतियों का सम्मिश्रण ही इसका आकर्षण होता है, जो कोई प्रभावी सामाजिक भूमिका अदा करने के लिये हमेशा तमाम विसंगतियों से मेल बैठाता है। यही उनके प्रति सांस्थानिक साहित्य जगत के स्वीकार का एक रहस्य भी है। इसकी सही पड़ताल उस समय तक नहीं हो सकती, जब तक अज्ञेय को उन्हीं के मानदंडों पर मापने का काम जारी रहेगा। लेखक को उसके मापदंड पर मापने की तरह ही एक जरूरी काम उसके मापदंडों को दुरुस्त करने का भी होता है। अगर हेगेल को हेगेल के मानदंडों पर ही मापा जाता रहता तो फिर उस द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की कोई संभावना ही नहीं बनती जिसने हेगेल को, जो सिर के बल खड़ा था, पैर के बल खड़ा किया।

‘अज्ञेय’ की पुस्तक ‘आधुनिक हिंदी साहित्य’ के लेखों को थोड़ी सजगता से देख लीजिये, असंगतियों का पिटारा होने का हमारा आरोप प्रमाण की अपेक्षा नहीं रखेगा। 1976 में प्रकाशित यह किताब उनकी कुछ वर्ष पहले की किताब ‘‘हिन्दी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य’’का नया संस्करण है। पहले की किताब के लेखों के अलावा इसमें एक ही नया लेख जोड़ा गया था - ‘भाषा और अस्मिता’। इस लेख के योग से उन्होंने अपनी पुस्तक की उपयोगिता को नवीनता प्रदान की है, ऐसा उनका मानना था। आईये, हम इस एक, पंद्रह पेज के नये लेख को ही लेते हैं।

इस लेख की शुरूआत वे जापानी भाषा में ‘मानव’ शब्द के न होने की उस बात से करते हैं जिसे उन्होंने बाद में ‘जोग लिखी’ के अपने लेख ‘आंखों देखी और कागद लेखी’ में भी दोहराया है। बताते हैं कि जापान में मानव शब्द जिन दो धातुओं से बना है उनका अर्थ होता है ‘मानवीय मध्यवर्ती’। और इसके साथ ही फिर उनकी कोरी अटकलपच्चियों का जो दौर शुरू होता है कि अंत तक आते-आते यह लेख बेसिर-पैर की बातों की बेस्वाद खिचड़ी का एक क्लासिक उदाहरण बन जाता है। जिस लेख से वे अपने पूर्व-संकलन को एक नया रूप दिये जाने का दावा कर रहे थे, वही शायद हिंदी में उनका सबसे कम समझा गया लेख होगा !

इसमें एक जगह ‘अमेरिकी बृहत्पूजा’ के सिलसिले में अनायास ही पण्य के मूल्य के निर्धारण में काम करने वाली कोरी अतार्किकता की मार्क्स की बात भी आ जाती है। ‘‘दाम के बारे में तो स्थिति और भी विचित्र है। आप कोई चीज उसके दाम पर नहीं खरीदते...आपको जो कुछ दिया जाता है एक ऐसे परिमाण या आधार की अपेक्षा में दिया जाता है जिससे आपका कोई साक्षात्कार नहीं होता - और न हो सकता है क्यों कि उस परिमाण या प्रतिमान का अस्तित्व ही नहीं है। आप जिस संसार में रहते हैं उसी को सापेक्ष कर दिया गया है।’’

भाषा और अस्मिता के प्रसंग में पूरे पंद्रह पेज तक बिना किसी संगति की ऐसी तमाम बातों को कहते हुए अंत में आते-आते अज्ञेय लिखते हैं - ‘‘भाषा की बात को शायद अधिक तूल दे दिया गया है। लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही स्पष्ट है कि पूरी बात नहीं कही गयी है।’’ ‘मानव मध्यवर्ती’ की जिस रोमांचक बात से लेख शुरू होता है, अंत में उसे ही यह कह कर बेकार करार देते हैं कि ‘‘शायद इस नाम के उत्तरार्ध से तत्काल उलझना उतना आवश्यक नहीं है’’, और लेख का समापन इस आप्त वाक्य से होता हैं कि ‘‘भाषा के आविष्कार में मानवीय अस्मिता का आविष्कार होता है : उसकी सृष्टि होती है।’’

यह है हमारे चिंतक मनीषी का चिंतन ! भाषा जिसकी तुलना नदी के प्रवाह से की जाती है, जो अपने क्रिया पद, सर्वनाम, अव्यय और प्रत्यय-विभक्तियों से अपनी विशिष्टता बनाये रखती है, संज्ञा पदों, विशेषणों और प्रत्ययों से नहीं। वह राष्ट्रीय अस्मिता का एक प्रमुख तत्व होने पर भी, आज बहु-भाषी राष्ट्रीयता भी उतना ही बड़ा सच है। इसीलिये इस विषय में कोरी अंधश्रद्धा वाली बातों का कोई औचित्य नहीं है।

मजे की बात यह है कि बारीकी से देखने पर जिन अज्ञेय की चिंतन प्रणाली में किसी भी प्रकार की संगति और तर्क का सर्वथा अभाव दिखाई देता है, उनके बारे में ही हिंदी में धारणा यह है कि ‘‘उनके चिंतनपरक निबंधों में एक दार्शनिक - बल्कि वैज्ञानिक की तर्कपद्धति का पूरा इस्तेमाल है’’। (संचयिता, अज्ञेय, राजकमल प्रकाशन, संपादक नंदकिशोर आचार्य की भूमिका, पृ: xxxi)

दरअसल, तर्क तो चिंतन की महज कोई यांत्रिक पद्धति नहीं है। विचार में उसकी अपनी एक तात्विक महत्ता भी होती है। वह व्यक्ति के विचार के सार-तत्व तक को प्रभावित करता है। हेगेल अपने Science of Logic में बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं कि तर्क को शुद्धविवेक की प्रणाली समझना होगा, शुद्ध विचार का क्षेत्र । यह सच का क्षेत्र है, क्योंकि इसपर कोई आवरण नहीं है, यह दिगंबर है। इससे जुड़ी चिंतन प्रणाली में विषय का प्रारंभ ही उचित-अनुचित के अवबोध पर टिका होता है।

हमारे यहां तो तर्क की तात्विक-सत्ता का सबसे बड़ा और चिरंतन उदाहरण है रवीन्द्रनाथ, जो रचना और विचार के हर कदम पर अपने गहन औपनिषदिक चिंतन की रहस्यवादिता की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। उनके औपनिषदिक संस्कार किसी अंध आत्म-गौरव  के नहीं, चिंतन की गहराई और जड़सूत्रों से मुक्ति के हेतु बनते हैं तो इसके मूल में तर्क की यही तात्विकता है। यह तर्क ही है जो किसी यथार्थवादी लेखक को अपने विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों की सीमाओं से परे जाकर देखने की दृष्टि देता हैं।

दरअसल, अगर हम थोड़ी गहराई से, इधर-उधर देखते हुए सोचे तो अज्ञेय की कथित ‘तार्किकता’ (वस्तुत: अतार्किकता) के रहस्य के सूत्र कहीं और ही दिखाई देंगे। यह एक प्रकार की सापेक्ष तार्किकता है। हिंदी साहित्य में दक्षिणपंथी अध्यापकीय दुरात्माओं की उस दुनिया की सापेक्षता, जिन्होंने आनंदवर्ध्यन और उनके रस-सिद्धांत का चर्वण करते हुए भी जिस चीज को सबसे अधिक गंवाया था वह वही सहृदयता है, जिसे रस सिद्धांत में ही न सिर्फ रचनाकार के लिये, बल्कि ग्राहक पाठक और विवेचक के लिये भी जरूरी माना गया है। शुक्ल जी के जमाने से ही वह दुनिया डंके की चोट पर नये साहित्य की प्रत्येक उद्भावना को दुत्कारती रही है। उसके लिये जो चला आ रहा है, उसकी सनातनता ही उसका आकट्य तर्क है। हर नया, रचनात्मक प्रयत्न शुद्ध विध्वंस है। इसीलिये प्रगतिशील रचनाकार तो उसे कभी फूटी आंखों नहीं सुहाते थे। दूसरी ओर, साहित्य की तमाम प्रवृत्तियों को अपनी सेवा में लगाने का ‘अध्यापकीय प्रगतिशीलों’ के विचारधारात्मक उन्माद का भी अपना एक पहलू था। उसमें भी हर व्यक्ति किसी अभियान के एक यंत्र के पुर्जे से अधिक कोई महत्व नहीं रखता था। इसने मुक्तिबोध सहित रचनाकारों के एक अच्छे खासे तबके का सांस लेना दुष्कर कर रखा था। विचारधारा की जड़सूत्रता कम अतार्किक नहीं होती !

इनके बीच, अज्ञेय का किंचित खुलापन यदा-कदा कई सच्चे लेखकों को आकर्षित करता था। तारसप्तकों से लेकर ‘प्रतीक’ और ‘नया प्रतीक’ की योजनाओं से कई नये प्रतिभाशाली रचनाकार जुड़े। लेकिन, अज्ञेय में वे सारे तत्व मौजूद थे, जो डा. नगेन्द्र से लेकर विद्यानिवास मिश्र तक के दक्षिणपंथी अध्यापकीय सनातनपंथियों को आश्वस्त करते थे। उन्होंने जैसे-जैसे अज्ञेय को अपनाया, अज्ञेय यायावर से तीर्थयात्री में बदलते चले गये।




इसी सिलसिले में हम, अज्ञेय की सर्वोत्कृष्ट मानी गयी रचना ‘असाध्य वीणा’ को ही लेते हैं। वीणा-वंदना की लंबी कविता, संवेदना के स्तर पर निराला की  ‘वर दे वीणा वादिनी’ के धरातल पर ही टिकी हुई।

इसकी कहानी कुछ इस प्रकार है कि वज्रकीर्ति द्वारा अति प्राचीन किरीट तरु से गढ़ी गई एक ‘मंत्रपूत वीणा’ को साधक प्रियंवद को बजाना है। कविता शुरू होती है इस विकट वीणा के गढ़न की रहस्यमयता के बयान से। वीणा देख विह्वल साधक तमाम संशयों से भरा इसे गोद में उठाता है।

अज्ञेय लिखते हैं - ‘‘मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा-/ नहीं, स्वयं अपने को शोध रहा था। / सघन निविड़ में वह अपने को / सौंप रहा था उस किरीट तरु को।’’

यहीं से शुरू होता है अज्ञेय का अपना जीवन-दर्शन। साधक प्रियंवद स्वयं के शोधन के लिये अपने अन्तर में झांक कर अपने अंत:सार के विवर्तन की ओर, अपनी सीमाओं, अपनी विसंगतियों से मुक्ति के आत्म-संघर्ष की ओर बढ़ने के बजाय, वह बाहर के, अन्य के अन्त:सार की, वीणा ही नहीं, उसके मूल तत्व, किरीट तरु की वंदना करने लगता है। और इस प्रकार वीणा के साथ भक्त और भगवान वाला एक गहन रिश्ता कायम करता है।

व्यक्ति के चिंतन में हर चीज का स्वरूप उसके विलोम के जरिये उत्पन्न होता है। अभेद भेद के जरिये, प्रत्यक्ष परोक्ष के जरिये, रूप सारतत्व के जरिये। कहां जा सकता है, किसी अन्य के जरिये। लेकिन जब प्रश्न आत्म-उत्थान के स्वरूप का हो, तो वह कभी सीधे किसी अन्य के जरिये, यहां तक कि परिवेश के जरिये भी प्रकट नहीं होता है। इसमें आदमी खुद को ही प्रकट करता है, अपनी विसंगतियों से जूझते हुए अपना ही पूर्ण विवर्तन करता है। अर्थात यह पूरी तरह से व्यक्ति का अन्तर्निहित उपक्रम होता है। अपने अन्तर के असाध्य को साधने की प्रक्रिया बाहरी अन्य की वंदना नहीं हो सकती। यह तो धर्म की तरह की कोरी आत्म-प्रवंचना है।

इसीलिये प्रियंवद स्वयं के शोधन की बात के दूसरे क्षण ही जब वीणा के मूल ‘किरीट तरु’ की ओर उन्मुख हो जाता है, यह जानते देर नहीं लगती कि प्रियंवद अपने अंतर में झांकने से सख्त परहेज करने वाले अज्ञेय का ही एक प्रतिरूप है। मुक्तिबोध होते तो इस असंभव चुनौती में उत्तीर्ण होने के लिये गहरे आत्म-संघर्ष की, अपनी सामथ्र्य  के विकास के घनघोर उद्यम के जंजाल में फंस जाने की कहानी कहते। लेकिन अज्ञेय इस प्रकार के आत्म विकास के किसी उत्कट आत्म-संघर्ष के बजाय घंटा-घडि़यालों के साथ भगवान की पूजा-अर्चना का पवित्र वातावरण रचते हैं।

आगे की कविता किरीट तरु की अर्चना और भगवान के दर्शन, अर्थात वीणा के बज उठने की आर्त-पुकार की कविता है।

‘‘मैं तुझे सुनूँ/ देखूँ ध्याऊँ/ अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक् :/ कहाँ साहस पाऊँ/ छू सकूँ तुझे !’’

एक ही लालसा है कि साधक के बिना किसी उद्यम के, वीणा पर बिना किसी आघात के ही वह बज उठे।

‘‘किस स्पर्घा से/ हाथ का आघात/ छीनने को तारो से/ एक चोट में वह संचित संगीत जिसे रचने में/ स्वयं न जाने कितनों के स्पंदित प्राण रच गए।’’

रचना के प्रयत्नों से दूसरों के प्राण रच गए, लेकिन प्रियंवद को बिना प्रयत्न के वीणा का वरदान चाहिए! इसी से जाहिर है कि प्रियंवद के ‘स्वयं के शोधन’ की शुरू की बात कोरी मिथ्या थी। वीणा में संगीत की रचना से उसमें अपने किसी रचाव का कोई आग्रह नहीं है। वह तो राजा का कृपाकांक्षी है। याचक है। कहता है –

‘‘तेरी लय पर मेरी सांसें/ भरे, पूरें, रीतें, विश्रांति पायें। / तू गा:/ मेरे अंधियारे अंतस में आलोक जगा/ स्मृति का/ श्रुति का -’’

और यह ‘स्मृति’ क्या है ? एक भरे-पूरे जीवन की फंतासी। ‘स्तब्ध विजड़ित करते चित्रों का संसार’।

कहना न होगा, फंतासी हमेशा आदमी की कामनाओं और उनकी पूर्ति के लिये प्रयत्नों के बीच की दीवार होती है। उद्यम तो यहां कवि के लिये भारी आतंक है।

‘‘हर स्वर-कम्पन लेता है मुझको सोख-/ वायु सा नाद में उड़ जाता हूं/ मुझे स्मरण है-/ पर मुझको मैं भूल गया हूं।’’

‘‘मैं नहीं, नहीं, मैं कहीं नहीं/ ओ रे तरु! ओ वन!/ ओ स्वर संभार।’’

जो खुद को याद तक नहीं करना चाहता, वह खुद का शोधन करेगा !

जो भी हो, अंत में भक्त की पुकार पर भगवान का अवतार हो जाता है। वीणा बज उठती है। चारो ओर से मंगल ध्वनियां, शंखनाद शुरू हो जाते हैं। राजा खुश और प्रियंवद - रानी की सतलड़ी ले - ‘तेरा तुझको अर्पित’ का वीतराग सुनाता हुआ लौट जाता है।

कविता की अंतिम सारवान पंक्ति है - ‘‘प्रिय पाठक ! यों मेरी वाणी भी / मौन हुई।’’

कहना न होगा, सब कुछ यूं ही घटता गया और दैव योग से ही निरुद्दम, हमारे मित्र नीलकांत जी की शब्दावली में, मृत सौन्दर्य के उपासक अज्ञेय हिंदी साहित्य की एक घटना बन गये ।







शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

दिल्ली में बाबुओं की 'कामबंदी' के व्यापक राजनीतिक निहितार्थ


-अरुण माहेश्वरी


दिल्ली की केजरीवाल सरकार और केंद्र की मोदी सरकार के बीच अभी जो चल रहा है वह एकदलीय शासन की कोशिशों के उन पुराने काले, पिछली सदी के सत्तर के दशक की यादों को ताज़ा कर देता है जब राज्यपाल पूरी नग्नता से केंद्र सरकार के राजनीतिक दलाल की भूमिका अदा किया करता था और गाहे-बगाहे, बेवजह ही धारा 356 के प्रयोग से चुनी हुई राज्य सरकारों को गिरा कर राज्यों में केंद्र की शासक पार्टी की परोक्ष सरकार क़ायम कर दी जाती थी ।
उन दिनों, केंद्र की ऐसी तमाम साजिशाना हरकतों ने केंद्र और राज्यों के बीच तनाव को इस स्तर तक पहुँचा दिया कि साम्राज्यवादी देशों ने फिर से एक बार भारत के बल्कनाइजेशन की संभावनाओं को देखना शुरू कर दिया था । देश के तमाम राज्यों में किसी न किसी रूप में 'धरती पुत्रों' के नारों ने ज़ोर पकड़ना शुरू कर दिया ; राष्ट्रीयता के बजाय प्रांतीय और जातीय पहचान के विषय राजनीति के प्रमुख विषय बन गये ।
1975 का आंतरिक आपातकाल भी मूलत: उसी एकदलीय तानाशाही के रुझान की उपज था ।
इंदिरा गांधी ने आपातकाल के बाद जनता द्वारा बुरी तरह से ठुकरा दिये जाने से शिक्षा ली, 1983 में केंद्र- राज्य संबंधों के पुनर्विन्यास के लिये सरकारिया आयोग का गठन किया गया । धारा 356 का प्रयोग राजनीति का एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा बन गया । सुप्रीम कोर्ट तक ने इसके बेजा प्रयोग के खिलाफ रायें दी । 1951 से काम कर रहे वित्त आयोग को राज्य की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील बनाया गया । सत्ता का विकेंद्रीकरण बाद की सभी सरकारों की नीतियों का प्रमुख आधार बना । पश्चिम बंगाल के भूमि-सुधार के अनुभवों की प्रेरणा से 1992 के 73वें संविधान संशोधन और पंचायती राज क़ानून ने गाँवों तक सत्ता को ले जाने में एक अहम भूमिका अदा की ।
इन सभी राजनीतिक पहलकदमियों का फल हुआ कि जो राष्ट्र एक समय में पूरी तरह से बिखराव के कगार पर पहुँच गया दिखाई दे रहा था, उस राष्ट्र के एकीकरण को अभूतपूर्व बल मिला । इस मामले में आर्थिक उदारीकरण की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता । 1991 ने आर्थिक विषयों में केंद्र की प्रत्यक्ष, राजनीतिक उद्देश्यों से की जाने वाली भेद-भावपूर्ण दखलंदाजियों के युग का अंत कर दिया । राज्यों के बीच आर्थिक विषयों में प्रतिद्वंद्विता के लिये मैदान काफ़ी हद तक समतल कर दिया गया । इस उदार अर्थनीति के दूसरे जो भी सामाजिक-आर्थिक परिणाम क्यों न निकले हो, पूरे देश के आर्थिक एकीकरण को इसने इतना बल पहुँचाया कि आज भारत के बल्कनाइजेशन, उसके बिखराव की कल्पना किसी सिरफिरे की सनक जान पड़ती है ।
बहरहाल, इस पूरी पृष्ठभूमि में जब हम दिल्ली को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ केंद्र के एक के बाद एक, तमाम घिनौने षड़यंत्रों को देखते हैं तो लगता है जैसे अन्य सामाजिक मामलों की तरह ही केंद्र- राज्य संबंधों के मामले में भी मोदी सरकार इतिहास के चक्के को पीछे की ओर घुमाना चाहती है । दिल्ली राज्य की कुछ ख़ास परिस्थितियों , राज्य की पुलिस पर राज्य सरकार के बजाय केंद्र सरकार के नियंत्रण की तरह की स्थितियों के चलते केंद्र सरकार को दिल्ली सरकार के सभी मामलों में प्रत्यक्ष दख़लंदाज़ी का एक अवसर मिला हुआ है । और आज यह साफ़ है कि वह अपने इस अधिकार का पूरी नग्नता और धृष्टता के साथ प्रयोग करने से ज़रा भी परहेज़ नहीं कर रही है ।
मोदी सरकार ने अपने मंत्री, अरुण जेटली को भ्रष्टाचार के आरोपों से बचाने के लिये सीधे मुख्यमंत्री के दफ़्तर पर सीबीआई से छापा मरवा कर जेटली संबंधी फ़ाइलें को हथियाने की कोशिश की है ।
दिल्ली सरकार के खिलाफ मोदी सरकार की साज़िशें कितनी शर्मनाक स्तर पर चली गई है, इसका सबसे ताज़ा उदाहरण दिल्ली सरकार के नौकरशाहों को लेकर की जा रही खींच-तान है । दिल्ली सरकार अपने जिस अफ़सर को हटाती है उसे मोदी सरकार अपने विशेषाधिकारों के प्रयोग से निरस्त करके फिर से बहाल कर देती है । अब यह खेल अपने चरम पर पहुँच गया है जब दिल्ली के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने केंद्र सरकार के उकसावे पर कामबंदी की घोषणा कर दी है ।
ज़ाहिर है कि यह दिल्ली में एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक गतिरोध पैदा करने की मोदी सरकार की सुनियोजित कोशिश है । इस प्रकार के गतिरोध के बहाने वह दिल्ली सरकार को अस्थिर करने, उसे बर्खास्त तक करके सीधे केंद्र का शासन क़ायम करने का पुराना, एकदलीय तानाशाही के दिनों का घिनौना खेल खेलना चाहती है । अरुण जेटली को डीडीसीए के भ्रष्टाचार के आरोप से बचाने का उसके पास दूसरा कोई उपाय शायद नहीं रह गया है !
यदि मोदी सरकार दिल्ली की जनता के ऐतिहासिक निर्णय से चुन कर आई केजरीवाल सरकार के खिलाफ इस प्रकार की कोई सीधी कार्रवाई करती है, जिसकी पूरी संभावना है, तो यह सीधे तौर पर भारतीय लोकतंत्र और इसके संघीय ढाँचे पर कुठाराघात होगा । इसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम होंगे । यह तेज़ी के साथ जनता का विश्वास खो रही मोदी सरकार का सिर्फ़ अपने एक मंत्री को बचाने के लिये उठाया गया एक आत्मघाती क़दम साबित होगा । इसकी जितनी निंदा की जाए, कम होगी ।
नये साल का यह पहला दिन ही मोदी सरकार के ग़ैर-जनतांत्रिक इरादों का प्रतिरोध करने की शपथ लेने का दिन बने !

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

विचार का एक प्रमुख विषय : जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद

संगठन के विषयों पर सीपीआई (एम) का महाधिवेशन


-अरुण माहेश्वरी

संगठन के सवालों पर सीपीआई(एम) का महाधिवेशन (27 दिसंबर-31 दिसंबर 2015) कोलकाता में चल रहा है।

इस महाधिवेशन में लिये गये संगठन संबंधी नीतिगत निर्णयों के बारे में सही ढंग से तभी कोई बात हो सकती है, जब इसमें अपनाये गये दस्तावेज हर किसी को विचार के लिये उपलब्ध होंगे। लेकिन सीपीआई(एम) के मुखपत्र गणशक्ति और यहां के दूसरे स्थानीय अखबारों से तथा पार्टी के नेताओं के संवाददाता सम्मेलनों से अब तक जो बात सामने आई है, उसमें यह साफ तौर पर कहा गया है कि नये सिरे से सीपीआई(एम) को एक जन पार्टी के रूप में तैयार किया जायेगा।

अगर यह सच है तो यह प्रकारांतर से इस बात की स्वीकृति है कि 1978 के सलकिया प्लेनम में जन-क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण का जो नारा दिया गया था, उस पर अमल में अब तक पार्टी विफल रही है।

हम नहीं जानते, इस विफलता को किन तथ्यों और मानदंडों के आधारों पर आंका गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के संचालन के सबसे पवित्र और अनुलंघनीय सिद्धांत के रूप में ‘जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद’ की दुहाई दी जाती रही है और जन-क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण के लिये भी इससे भिन्न किसी दूसरे सांगठनिक सिद्धांत का रास्ता नहीं अपनाया गया है। फिर आखिर यह विफलता क्यों ? कैसे जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद सिर्फ यहीं पर नहीं, बल्कि सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में कोरे केंद्रीयतावाद में तब्दील हो कर रह जाता है!

यह जितना सैद्धांतिक सवाल है, उतना ही एक दार्शनिक प्रश्न भी है। जनतंत्र की कोई भी प्रकृत अवधारणा उसे व्यापक जनता और समाज से काट कर कभी चरितार्थ नहीं हो सकती। विचार का कोई भी रूप जब व्यापक जनता से कट कर चंद चुने हुए लोगों के विशेषाधिकार का प्रश्न बन जाता है, वहीं से उसके जनतांत्रिक तत्व की हानि शुरू हो जाती है। पूंजीवादी जनतंत्र सच्चा जनतंत्र नहीं है, क्योंकि वह एक खास वर्ग के हितों से जुड़ा होता है।

जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद के ‘जनतांत्रिक पहलू’ की सुरक्षा की पहली शर्त यह है कि वह महज पार्टी का अंदुरूनी विषय बन कर न रहे। पार्टी के संगठन में व्यापक समाज की दखलंदाजी को सुनिश्चित करके ही जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद में जनतंत्र चरितार्थ हो सकता है।

लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों का अब तक का अनुभव काफी हद तक इसके विपरीत रहा है। जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद संगठन का कोई जैविक सिद्धांत न होकर उसके संचालन का महज एक यांत्रिक सिद्धांत रहा है। यह मुट्ठीभर पार्टी सदस्यों और नेताओं का निजी मामला रहा है। इसके जरिये पार्टी के संगठन में व्यापक समाज की दखल के रास्ते कभी नहीं खुल पाये हैं।
यह रोग सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों में नहीं, भारत की दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों में भी समान रूप से बना हुआ है। ‘जनता के बीच सीधे अपनी बात न कह कर पार्टी फोरम पर बात करने’ की दलीलें हर पार्टी की ओर से बार-बार दोहराई जाती है।

जनतंत्र मात्र की क्रियाशीलता के अंदर के ऐसे अवरोधों को सारी दुनिया में महसूस किया जा रहा है और इसीलिये जनभागीदारी वाले जनतंत्र (Participatory Democracy) की अक्सर चर्चा की जाती है।

इस बीमारी को ठोस रूप में समझने के लिये एक इस तथ्य पर गौर किया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में लंबे काल से इतनी ताकतवर पार्टी होने के बावजूद उसका ‘जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद’ इसके सभी स्तरों पर नेतृत्व में अपराधियों और समाज-विरोधियों के प्रभुत्व को रोकने में विफल रहा है। अगर व्यापक जनता और समाज की पार्टी के संगठन में कोई सीधी दखल होती, तो गोपनीय ढंग से पार्टी में अपराधियों की पैठ कभी संभव नहीं हो सकती थी।

इसीलिये, जैसे जनतंत्र को उसके पूंजीवादी तानाशाही के रूप से मुक्त करने की जरूरत है, वैसे ही क्रांतिकारी पार्टी को संगठन को व्यापक समाज से अलग, चंद लोगों, अर्थात पार्टी सदस्यों और नेताओं की तानाशाही से मुक्त करने की जरूरत है। जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद में जनतंत्र के तत्व की हिफाजत व्यापक जनता और समाज के जरिये होगी, न कि पार्टी के अंदर की बहसों में अल्पमत पर बहुमत की राय को स्वीकार कर चलने की किसी यांत्रिक प्रक्रिया से।

यह तभी होगा, जब हर पार्टी सदस्य को, वह पार्टी के अंदर बहुमत में हो या अल्पमत में, व्यापक जनता के बीच जाकर सीधे अपनी बात रखने की बाकायदा इजाजत होगी। हर पार्टी सदस्य की जनता के बीच सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार के अनुशासन की बाधा का कोई स्थान नहीं होगा।

हमारी राय में जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद में जनतंत्र के तत्व को इस प्रकार से सजीव बना कर न सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी अपने को वास्तव अर्थों में एक जनपार्टी बना पायेगी, बल्कि समाज के सामने राजनीतिक दलों के संगठन का एक प्रकृत जनतांत्रिक विकल्प पेश कर पायेगी। 

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

कन्वर्जेंस के समय में मीडिया

('तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुुक की इबारतें' पुस्तक का प्राक्कथन)

‘‘ प्रिंट की दुनिया आज भी हमारे बीच साफ तौर पर मौजूद है। हम यह नहीं कह सकते कि उसे हम पीछे छोड़ आए हैं। यह और भी लंबे अर्से तक बनी रह सकती है। भारत या ब्रिटेन में कुछ ज्यादा ही। लेकिन मुझे लगता है कि हम मोटे तौर पर इसे जान चुके हैं, हम इसमें बहुत ज्यादा अब प्रयोग नहीं कर सकते। ...आप इसपर कई प्रकार से सोच सकते हैं। मैं नहीं मानता कि हम डिजिटल युग में जाने का जोखिम इसलिए नहीं उठाते क्योंकि हम समझते हैं कि प्रिंट ही अच्छा है। बल्कि पत्रकारिता के लिहाज से सोचने पर डिजिटल दुनिया ही कहीं ज्यादा बेहतर लगती है। मेरा अनुभव है कि डिजिटल दुनिया में आप एक बेहतर पत्रकार हो सकते हैं। अन्यथा, आपके पिछड़ जाने का खतरा है। ...सचमुच संपादन के दौरान ही मुझे लगा कि अब डिजिटल दुनिया में घुस जाना होगा। यदि मैं गलत साबित होता हूं और प्रिंट कुछ और सालों तक बना रह जाता है, तो कोई बात नहीं, उसमें काम करना तो हमे आता ही है। ’’

ये शब्द है एलन रसब्रिजर के। ‘फ्रंटलाईन’ पत्रिका के 7 अगस्त 2015 के अंक में ‘गार्जियन’ अखबार के पूर्व संपादक एलन रसब्रिजर के साथ शशिकुमार की एक लंबी बातचीत प्रकाशित हुई है। ‘गार्जियन’ के जीवन में रसब्रिजर का लगभग दो दशकों का काल एक बेहद घटना-बहुल काल माना जाता है, जब ‘गार्जियन’ ‘न्यूयार्क टाइम्स’ जैसे अखबार के टक्कर में वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा ऑनलाईन समाचारपत्र बन गया। इसी काल में ‘गार्जियन’ का प्रिंट रूप भी बदला और अंत में तो वह पूरी तरह से ऑनलाईन, सोशल वेब पर चला गया। दुनिया को चौका देने वाले जूलियन असांज के विकिलीक्स में ‘गार्जियन’ की भागीदारी रही। लगातार सात सालों की मेहनत के बाद निक डेवीज द्वारा संचार माध्यमों में रुपर्ट मर्डक की अनैतिक गतिविधियों के भंडाफोड़ में भी गार्जियन की एक बड़ी भूमिका थी। और अभी अंत में, एडवर्ड स्नोडेन द्वारा अमेरिकी सुरक्षा एजेंशी के भंडाफोड़ की वजह से तो ‘गार्जियन’ को जन-सेवा का पुलित्जर पुरस्कार मिला। गार्जियन की ये सारी उपलब्धियां एलन रसब्रिजर के काल की ही रही है। रसब्रिजर ‘गार्जियन’ से इसी जून महीने में स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होगए और अभी एशियन कॉलेज आफ जर्नलिज्म (एसीजे) में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में अध्यापन का काम कर रहे हैं।

‘गार्जियन’ के स्तर के एक अखबार के साथ प्रिंट से लेकर ऑनलाईन, वेब की डिजिटल दुनिया की लंबी यात्रा के साक्षी रसब्रिजर जब डिजिटल में पत्रकारिता के भविष्य को देखते हैं तो यह अनायास ही नहीं है। वे कहते हैं कि ‘‘डिजिटल सिर्फ समाचारों के वितरण का एक और माध्यम भर नहीं है। ...मैं एसीजे में अध्यापन का काम करता हूं। वहां का पूरा जीवन ही डिजिटल है। वहां के छात्र इसके अलावा कुछ जानते ही नहीं है। ... इस नए माध्यम में किसी को इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं रहती है कि प्रिंट में क्या हो रहा है। तुलना तो सिर्फ प्रिंट जगत में डिजिटल से की जाती है। जाहिर है कि आगे ऐसे बहुत लोग होंगे जो प्रिंट के विचार से पूरी तरह मुक्त होंगे। प्रिंट कुछ मामलों में अतुलनीय है। लेकिन आने वाली दुनिया अलग होगी, जिसमें सिर्फ मीडिया नहीं, जीवन का हर क्षेत्र डिजिटल से प्रभावित होगा। इसीलिए इस पुरानी दुनिया से इस हद तक चिपके रहना कि कुछ भी क्यों न हो जाए, इस क्रांति के प्रभाव से पत्रकारिता बची रहेगी, मुझे भविष्य के बारे में कोई बुद्धिमत्तापूर्ण सोच नहीं लगता है।’’

शशिकुमार ने जब उनसे पूछा कि क्या इससे कहानी कहने के ढंग में बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा ? रसब्रिजर का जवाब था - ‘‘मैं इसके किसी सीधे-सपाट जवाब के जाल में नहीं पड़ना चाहता। कोई कैसे कह सकता है कि एक सीधी-सादी कहानी के दिन नहीं रहे। ...हमारे सामने चुनौती सिर्फ यह है कि हम अब सब कुछ कर सकते हैं। आपके करने की संभावनाओं की कोई सीमा नहीं रही है। कुछ लोगों को गुटकों में सूचना चाहिए तो कुछ है जो सूचना की अनंत गहराई तक पहुंचना चाहते हैं। ... हम भविष्य को किसी माप के अनुसार देखना नहीं चाहते। लोगों की इच्छा के माप से भी हम संचालित नहीं हो सकते।’’

इसप्रकार बात यहां तक चली जाती है कि क्या किसी भी कहानी का विस्तार या उसकी गहनता उसके कहने के माध्यम पर निर्भर करती है ? और, रसब्रिजर का जवाब है, ‘‘जरूर। मसलन यदि आप एनिमेशन को आईफोन पर फ्लैश में लाना चाहते हैं तो वह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप एनिमेशन के अनुसार फ्लैश का प्रयोग करते हैं या नहीं। यदि आप अफ्रीका में होंगे तो आपकी पत्रकारिता अलग होगी। वह संक्षिप्त पाठ पर आधारित होगी जिसमें कम से कम तस्वीरों का प्रयोग किया जायेगा, क्योंकि वहां इंटरनेट सुविधाओं में कमी के कारण डाउनलोडिंग में बहुत ज्यादा समय लग जाता है। ...अन्यथा मैंने स्मार्ट फोन पर लोगों को लंबे से लंबे लेखों को पढ़ते हुए देखा है।’’

“इसके अलावा, जिस माध्यम में संवाद की गुंजाइश नहीं होती, उसमें आप भाषण की तरह एकतरफा बोल सकते हैं। लेकिन इस डिजिटल माध्यम में तीखा लिखने पर तीखा प्रत्युत्तर भी तत्काल मिलेगा।“

रसब्रिजर इसी सिलसिले में बड़े निबंधकार साइमन जेन्किन का उल्लेख करते हैं। वे बताते हैं कि हम उनसे मांग करते हैं कि हमें बारह सौ के बजाय तीन सौ शब्दों में आपकी बात चाहिए, और दोपहर तक नहीं, सुबह-सुबह ; और यह भी जरूरी नहीं कि वह बहुत सुचिंतित हो। इसप्रकार, एक सवाल उठा कर उसपर बहस आमंत्रित करना भी एक प्रकार की पत्रकारिता है। इसका अपना एक अलग महत्व है। ‘‘कहने का अर्थ यह है कि एक पत्रकार को इन सब बातों के प्रति खुला नजरिया रखना होगा।’’

रसब्रिजर की यह बात कि ‘तकनीक और नयी संभावनाओं के प्रयोग को लेकर तमाम चीजों के प्रति एक बहुत ही खुले नजरिये’ की जरूरत है, वह प्रमुख बात है जिसे अपने प्रकार की इस फेसबुक डायरी की भूमिका में हम खास तौर पर रेखांकित करना चाहेंगे। लिखना लेखक की नैसर्गिकता है। लेकिन ऐसा करते हुए उसे हमेशा अपने समय की अनेक प्रकार की बाधाओं का मुकाबला करते रहना पड़ता है। लिखने की कई हसरतें पैदा होने के पहले ही खत्म हो जाती है। लोगों की पूरी जिंदगी गुजर जाती है, लेकिन वे यह नहीं जान पाते कि कैसे अपने लिखे को दूसरों के लिए प्रकाशित करें। अपने लेखन के प्रकाशन के लिए अब तक सिर्फ  लेखक होना ही यथेष्ट नहीं रहा है।

यह एक परिप्रेक्ष्य है, जिसमें फेसबुक की तरह के सामाजिक माध्यम अभिव्यक्ति के औजार के रूप में खास अर्थ रखते हैं। इसमें प्रश्न सिर्फ नई तकनीक के चयन का नहीं रहता है। यह लेखकीय अस्मिता से जुड़ा प्रश्न भी है। यद्यपि इन माध्यमों के प्रति भी सामाजिक-राजनीतिक सत्ताएं अभी जिसप्रकार सशंकित हैं और आए दिन इनपर लगाम कसने की उनकी चिंताएं सामने आती रहती है, इससे यही लगता है कि ये माध्यम भी क्रमश: एक निश्चित आम-सहमति की सीमा में ही काम करने का मंच प्रदान करेंगे। उन सीमाओं का उल्लंघन किसी को भी सामाजिक तिरस्कार से लेकर स्नोडेन की तरह सरकारी कोप का पात्र तक बना देगी। फिर भी, हमारे जैसे अभावों के समाज में आदमी की स्वतंत्रता भौतिक कारणों से ही जितनी सीमित है, उसमें फेसबुक की तरह के  खुले मंच से मिलने वाली प्रकाशन की सुविधा जैसे सालों की मुराद के पूरा होने की तरह महत्वपूर्ण हो जाती है।

खुद हमारा अनुभव है कि इस मंच का प्रयोग करके हम अनेक विषयों पर खुल कर अपने ऐसे विचारों को रख पाए हैं, जिनके लिए दूसरे परंपरागत माध्यमों पर जगह नहीं रह गयी है। इसकी साक्षी है यह फेसबुक डायरी भी।

इसके अलावा यह मंच अकेले व्यक्ति की मुखर सामाजिक भूमिका को सुनिश्चित करने वाला मंच है। सन् 2014 भारत में एक ऐसे लोकसभा चुनाव का समय रहा है जिसमें चुनावों के आज तक के इतिहास में सबसे ज्यादा रुपये खर्च किये गये थे। यह पत्रकारिता पर पेडन्यूज के पूर्ण ग्रहण का काल था। सत्ताधारी कांग्रेस दल और नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी के अलावा तीसरी किसी भी ताकत के लिए कहीं एक इंच जगह भी नहीं थी। खास तौर पर नरेन्द्र मोदी के भाजपा ने पानी की तरह अरबों रुपये बहा दिये थे। पूरा कॉरपोरेट जगत नग्न तौर पर नरेन्द्र मोदी के पक्ष में उतरा हुआ था और टेलिविजन के सारे चैनलों से सिर्फ मोदी-मोदी की रट लगाई जा रही थी। शुद्ध धन-बल से प्रचार की आंधी के मुकाबले में प्रतिवाद और प्रतिरोध की आवाज के लिये अगर कहीं कोई जगह बची थी तो वह एक हद तक सिर्फ फेसबुक की तरह के सोशल मीडिया में ही थी। हालांकि इस माध्यम पर भी ‘नमो’ समूह ने बेहद संगठित ढंग से हमला किया था, और विपक्ष की आवाज सिर्फ लोगों की व्यक्तिगत पहल तक सीमित थी। खास तौर पर, वामपंथी राजनीतिक पार्टियों के लिए तो यह माध्यम तब तक कोरा अजूबा ही बना हुआ था। लेकिन फिर भी, दक्षिणपंथ के संगठित और मुखविहीन हमलों के खिलाफ फेसबुक पर एक-एक आदमी के जवाबी लेखन का भी अपना एक स्वरूप इसी के बीच से सामने आ रहा था।

हमारे जैसे फेसबुक पर सक्रिय लेखक ने जब साल के अंत में पूरे साल की अपनी इन गतिविधियों पर नजर डाली तो एकबारगी लगा कि कई अर्थों में साल भर की इन पोस्टों से एक वैकल्पिक सोच का खाका उभरता हुआ दिखाई देता है। इसीलिए लगा कि फेसबुक की भीत पर लगभग प्रतिदिन लिख कर हमने जो साल भर की फेसबुक डायरी तैयार की है, उसे डिजिटल के साथ ही प्रिंट में भी लाया जा सकता है। और इसप्रकार, रसब्रिजर की तरह के तमाम लोग पत्रकारिता में प्रिंट और डिजिटल की दो अलग दुनियाओं को लेकर जो विमर्श कर रहे हैं, उसके साथ ही प्रिंट और डिजिटल के संयोग के भी एक नए विमर्श की जमीन तैयार हो सकती है। क्योंकि, उन्हीं के अनुसार भारत और ब्रिटेन की तरह के देशों में इन दोनों दुनियाओं का सह-अस्तित्व दूसरे विकसित देशों की तुलना में कहीं ज्यादा लंबे काल तक बना रह सकता है। यह, कन्वर्जेंस का यह एक और नया प्रयोग भी कहला सकता है।

बहरहाल, सारी दुनिया में फेसबुक पर आज करोड़ों लोग सक्रिय हैं। लेकिन अब तक हमारी नजर में ऐसी दूसरी किसी फेसबुक डायरी की मिसाल नहीं आई है। इसीलिये इस बात की आशंका बनी हुई है कि हमारा यह प्रयास पाठक समाज से कितनी स्वीकृति पायेगा ! इसके बावजूद, शायद हमारे खुद के लेखन की खास प्रकृति के चलते, क्योंकि हमने कभी भी माध्यम की सीमाओं और संभावनाओं को मद्देनजर रखते हुए लेखन नहीं किया, हमें लगता है कि प्रिंट के पाठकों को इस प्रयोग को अपनाने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी।

इस काम को संभव बनाने में अनामिका प्रकाशन के पंकज शर्मा जी ने जो भूमिका अदा की, उसके लिए मैं उनका आभारी रहूंगा। फेसबुक के उन सभी मित्रों और फॉलोअर्स के प्रति भी आभारी रहूंगा जिनके चलते हम फेसबुक की भीत पर नियमित लिखने का उत्साह पाते रहे हैं।

सितंबर 2015                                                                                                     अरुण माहेश्वरी








‘तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक की इबारतें’


फेसबुक के सभी मित्रों से अपनी यह खुशी साझा करना चाहता हूं - अगले हफ्ते तक हमारी नई किताब ‘तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक की इबारतें’ प्रकाशित हो जायेगी।

लगभग साढ़े चार सौ पृष्ठों की यह किताब शायद अपने प्रकार की एक बिल्कुल नई और अनोखी किताब होगी। फेसबुक पर रोज-रोज लिख कर हम किस प्रकार अपने समय का एक इतिहास दर्ज कर रहे होते हैं, इस किताब से पता चलेगा। इसका महत्व शायद इसलिये भी होगा कि यह उस वर्ष 2014 का रोजनामचा है, जो भारत की राजनीति के एक तूफानी वर्ष के तौर पर हमेशा याद किया जायेगा। रोजनामचे में लेखक की अपनी आत्मगत उपस्थिति तो अनिवार्यत: होती ही है !

अनामिका प्रकाशन के पंकज शर्मा जी ने ऐसी एक अभिनव पुस्तक के प्रकाशन में जिस प्रकार के उत्साह और तत्परता का परिचय दिया है, वह सचमुच सराहनीय है। यह हार्ड बाउंड के साथ ही पेपरबैक में भी आयेगी। इसमें आए संदर्भों की लगभग चौदह पृष्ठ की सूची से प्रकाशक ने इसे और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। अभी तक उन्होंने इसके पेपरबैक की कीमत के बारे में कोई सूचना नहीं दी है। लेकिन पेपरबैक में जरूर ही किफायती मूल्य पर मिलेगी।

प्रकाशक का नाम व पता है :
Anamika Publishers and Distributors (Pvt) Ltd
4697/3, 21-A, Ansari Road,
Dariyaganj, New Delhi - 110 002
Phone : 011-23281655, 011-23270239
E Mail - anamikapublishers@yahoo.co.in

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

भाजपा के अनुसार भारत में जातिवाद का सच भी गढ़ा हुआ (manufactured) है

राज्य सभा का अधिवेशन आज भी रुका हुआ है। दो दिन पहले भारत के संविधान पर चल रही बहस के दौरान कांग्रेस नेता और पूर्वमंत्री कुमारी शैलजा ने समाज में जातिगत भेदभाव के सच को बताने के लिये गुजरात के एक मंदिर के अपने अनुभव को सदन में रखा था। सजल आंखों से उन्होंने बताया कि किस प्रकार द्वारका के एक द्वीप पर स्थित मंदिर में पूजा के वक्त पुजारी ने उनसे उनकी जाति के बारे में पूछा था। शैलजा ने कटाक्ष किया कि यह है -विकास का गुजरात मॉडल !
कुमारी शैलजा के बयान के दूसरे दिन ही मोदी सरकार के अति-उत्साही मंत्री अरुण जेटली सदन में कुछ कागजों के साथ हाजिर होगये। शैलजा के अनुभव को झुठलाते हुए उन्होंने द्वारकाधीश मंदिर की आगंतुकों की उस डायरी का उल्लेख करना शुरू कर दिया जिसमें खुद कुमारी शैलजा ने 23 जनवरी 2013 के दिन पुजारियों की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि ‘‘उनका अहोभाग्य था कि उन्हें भगवान कृष्ण का आशिर्वाद मिला।’’ जेटली ने मंदिर के इस रेकर्ड को सदन में रखने की पेशकश भी की। 
कुमारी शैलजा ने तत्काल जेटली की इस उत्साही खोज को खारिज करते हुए बताया कि उन्होंने द्वारकाधीश मंदिर की बात नहीं कही थी। वे द्वारका के एक द्वीप पर स्थित एक मंदिर की चर्चा कर रही थी। भाजपा के एक सांसद ने उन्हें याद दिलाया कि वे शायद बैत द्वारका मंदिर की बात कर रही है तो कुमारी शैलजा ने कहा कि हां, उसी मंदिर की बात है। 
बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत नरसी की हुण्डी भरी थी। यह मंदिर एक द्वारकाधीश मंदिर से तीस किलोमीटर दूर एक अलग टापू पर स्थित है जहां नौका से जाना पड़ता है। 
मजे की बात यह है कि अति-उत्साही जेटली के शिष्य, भाजपा के एक दूसरे मंत्री पियूष गोयल ने जेटली की इस अनुपम खोज पर उछल कर कहा कि ‘‘गढ़ी हुई अन्य समस्याओं और गढ़े गये भेद-भाव (Manufactured problems and manufactured discrimination) का यह एक और उदाहरण है। 
कुमारी शैलजा के बयान और उस पर वित्त मंत्री जेटली का रवैया यह दिखाने के लिये काफी है कि मोदी सरकार अपने विरोधियों को अपमानित करने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। उन्हें यह कहने में भी कोई हिचक नहीं है कि भारत में जातिवादी भेदभाव की बात करना सच नहीं, बल्कि एक गढ़ा हुआ सच है ! वे एक पूर्व मंत्री के पीड़ादायी अनुभवों को झुठलाने के लिये मंदिरों के भी झूठे-सच्चे रेकर्ड पेश कर सकते हैं। 
जेटली आज भी अपने झूठ के लिये खेद प्रकट करके माफी मांगने के लिए तैयार नहीं है। अब भाजपा वालों का कहना है कि शैलजा ने इसके साथ ‘विकास के गुजरात मॉडल’ का उल्लेख क्यों किया ! अर्थात्, आने वाले समय में मोदी के कथित ‘विकास मॉडल’ की आलोचना की भी मनाही होगी !
सचमुच, संसदीय जनतंत्र की नैतिकताओं के साथ भाजपा का मेल बैठना इस मोदी जमाने में अब मुश्किल हो रहा है। लेकिन संतोष की बात यही है कि दिल्ली, बिहार और अब गुजरात की जनता ने यह बता दिया है कि इनके उत्पात के अब गिने-चुने दिन ही शेष है। इनके भविष्य की इबारतें जनता के दिलों पर लिखी जा चुकी है। 

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

बुराई का अंत और बुराई का प्रारंभ साथ-साथ

अरुण माहेश्वरी


आज संविधान दिवस की बहस के सिलसिले में लोक सभा में प्रधानमंत्री के भाषण को नहीं सुन पाया। कुछ न्यूज चैनलों पर उसकी क्लिपिंग्स देखी और उस पर कइयों की टिप्पणियों को भी सुना।

इसके पहले लोक सभा में राजनाथ सिंह का और राज्य सभा में अरुण जेटली का भाषण सुना था।

इन सबसे कुल मिला कर जैसी वैचारिक अराजकता का दृश्य दिखाई देता है, उससे अनायास ही हेगेल के तर्क शास्त्र में वर्णित उस स्थिति का खयाल आ जाता है कि कैसे कोई चीज बढ़ते-बढ़ते स्व-विरोधों के एक अनोखे संयोग में अपने अंत के साथ ही अपने उदय का संकेत देती है। एक परम विवर्तन। Absolute recoil । इस मामले में - एक बुराई के अंत के दृश्य से उसी बुराई का उदय।

शेक्सपियर के नाटक Troilus and Cressida के पांचवे अंक के दूसरे दृश्य में शेक्सपियर लिखते हैं :
O madness of discourse,
That cause sets up with and against itself !
Bi-fold authority ! where reason can revolt
without perdition, and loss assume all reason
Without revolt
(आह, विमर्श का पागलपन,/ कर्ता खुद के साथ और खुद के खिलाफ सामने आता है/दोहरी हैसियत ! जहां विवेक विद्रोह कर सकता है/ बिना विनाश के, और अंत सारे विवेक को धारण कर लेता है/बिना विद्रोह के)

इस नाटक के संदर्भ में ये पंक्तियां ट्रौयलस की उन स्व-विरोधी दलीलों के बारे में है जब ट्रौयलस को क्रेसीडा की बेवफाई का पता चलता है ; वह जो कहना चाहता है एक ही सुर में उसके पक्ष और विपक्ष की सारी दलीलें देने लगता है; उसके तर्क उसकी खुद की दलीलों के खिलाफ होते हैं लेकिन उन्हें खारिज नहीं करते, उसकी अतार्किकता तर्क को बिना खारिज किये तर्क का रूप लेने लगती है। एक कर्ता जो खुद अपने खिलाफ काम करता है, एक तर्क जो खुद के अस्वीकार से जुड़ जाता है।

यही है संविधान की मर्यादा और उसके नग्न उलंघन के बीच के संघी गोपनीय समझौते की सचाई !

इस सरकार के शासन के अंत तक यही नाटक जारी रहेगा। बुराई का अंत बुराई के प्रारंभ के साथ चलेगा। 

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

पेरिस हमला और इसके बाद !

अरुण माहेश्वरी




तेरह नवंबर को पेरिस पर आतंकवादी हमले को यूरोप का 9/11 (11 सितंबर) कहा जा रहा है। सन् 2001 का 9/11 विश्व राजनीति का एक संदर्भ बिंदु बना जब यह कहा गया कि इसके बाद दुनिया वह नहीं रहेगी, जो तब तक थी। वह दुनिया की अकेली महाशक्ति पर सीधा हमला था। जो तालिबान खुद अमेरिका की उपज था, सोवियत संघ के पतन के बाद सोवियत संघ समर्थित  अफगानिस्तान की नजीबुल्लाह सरकार को हटा कर जिसे अफगानिस्तान की सत्ता सौंपी गई थी, उसीके खिलाफ महीने भर के अंदर अमेरिका ब्रिटेन को संग लेकर अपनी पूरी ताकत के साथ टूट पड़ा। तालिबान के सहयोगी अल कायदा के नेता बिन लादेन को, जिसने 9/11 की योजना बनाई थी, अमेरिका का एक नंबर दुश्मन घोषित किया गया। और देखते ही देखते, तीन महीने में तालिबान की जगह हामिद करजाई की सरकार बना दी गई। अफगानिस्तान अमेरिकी सेना के कब्जे में आगया।

इसके बाद सन् 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के पूरे इतिहास को हम जानते ही हैं। इराक पर कब्जा करने के बाद लगभग सात साल तक वहां प्रशासन को लेकर पश्चिम की ताकतें नाना प्रकार के प्रयोग करती रही। तभी 2010 में टूनिशिया से एक नये प्रकार का सरकार-विरोधी नागरिक आंदोलन शुरू हुआ, और देखते ही देखते वह अरब लीग के लगभग सभी देशों - मिस्र, लीबिया, यमन, बहरीन, सीरिया, अल्जीरिया, जार्डन, कुवैत, मोरक्को, सुडान, सऊदी अरबिया, ओमन, जिबोती, पश्चिमी सहारा - में फैल गया। पूरे मध्यपूर्व में तख्ता-पलट के अनोखे दृश्य दिखाई देने लगे। एक विशाल क्षेत्र में फैले इस एक प्रकार के गृह युद्ध को अरब वसंत के नाम से जाना जाता है। न जाने कितनी सरकारें उखाड़ कर फेंक दी गई, कितनी नई आई और फिर से उखाड़ दी गई। कई जगहों पर नागरिक स्वतंत्रता की मांगों को पूरी निष्ठुरता से कुचल दिया गया, तो कई जगहों की सरकारों ने इस तूफान का कहीं ज्यादा लचीलेपन से मुकाबला किया। लेकिन सच यह है कि अधिकांश स्थानों पर अरब वसंत के आंदोलन में भारी हिंसा का प्रयोग हुआ। अब तक लाखों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है।   

कुल मिला कर, यह बात सही साबित हुई कि कम से कम अरब देशों, इस्लामिक राष्ट्रों के लिए 9/11 के बाद दुनिया वह नहीं रही जो इसके पहले हुआ करती थी। पेट्रोडालर की समृद्धि का पूरा महल धराशायी हो गया। अरब भूमि पर अबाध रूप में पश्चिमी ताकतों के घोड़े दौड़ने लगे। उखाड़-पछाड़ के खूनी खेल में अमेरिका ने तालिबान और अल कायदा के कई नये छोटे-बड़े संस्करणों को जन्म दिया, जिनमें पिछले साल ही एक महादानव इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) पैदा हुआ, जो खलीफाओं के राज्य की वापसी के नारे और अमेरिकी हथियारों से लैस होकर सीरिया और उसके आस-पास के क्षेत्रों पर अपना कब्जा जमाता चला गया। थोड़े से दिनों में ही आतंकवाद के  अर्थशास्त्र ने इसे इतना ताकतवर बना दिया कि अब वह अपने पश्चिमी आकाओं के लिये भस्मासुर बन चुका है। भूमध्य सागर और टर्की के रास्ते सीरिया, लेबनान, इराक से शरणार्थियों के जत्थे पर जत्थे यूरोप की धरती पर पहुंचने लगे। दो महीने पहले ग्रीक के एक टापू कोस के तट पर सीरियाई बच्चे आयलन कुर्डी के शव ने पूरे यूरोप में शरणार्थियों के प्रति नजरिये पर एक नयी बहस की शुरूआत की थी। कई यूरोपीय देशों ने पश्चिम एशिया के शरणार्थियों को शरण देने के अपने इरादों की घोषणा की। 

लेकिन दो महीने भी नहीं बीते, 13 नवंबर को पेरिस पर हुए आतंकवादी हमले ने लगता है जैसे सारे दृश्यपट को फिर एक बार एक झटके में बदल दिया। जो यूरोप कल तक शरणार्थियों के प्रति भाव-विह्वल था, इस हमले ने शरणार्थियों को उनकी घृणा का सबसे बड़ा पात्र बना दिया। ‘मानवतावादी और सहनशील’ यूरोप की चारों दिशाओं से प्रतिशोध, प्रतिशोध और प्रतिशोध की गूंजे सुनाई दे रही है। हंटिंगटन का ‘सभ्यता का संघर्ष’ फिर सर पर चढ़ कर बोल रहा है। स्लावोय जिजेक की तरह का मार्क्सवादी कहे जाने वाला अध्येता कह रहा है -‘आइसिस के आतंकवादियों के बारे में किसी गहरी समझ की जरूरत नहीं है, उन्हें वही कहा जाना चाहिए जो वे हैं - इस्लामिक फासिस्ट। जिजेक के मूंह से हंटिंगटन बोलने लगा है। उसका साफ मानना है कि ये शरणार्थी हमेशा पश्चिमी जीवन शैली के शत्रु बने रहेंगे, कभी यूरोपीय समाज में घुल-मिल नहीं पायेंगे। एक रूसी लेखक का उद्धरण देते हुए जिजेक ने अपने लेख में लिखा है - 
‘‘ये लोग थके हुए, क्रुद्ध और अपमानित है। इन्हें यूरोपीय मूल्यों, जीवनशैली और परंपराओं, बहु-संस्कृतिवाद या सहिष्णुता का कोई ज्ञान नहीं है। वे कभी भी यूरोप के कानूनों को नहीं मानेंगे। ...इतनी समस्याओं के साथ वे जिन देशों में आ गये हैं, उनका वे कभी भी उपकार नहीं मानेंगे, क्योंकि इन्हीं देशों ने तो पहले उनके स्वदेश में खून की नदियां बहाई है।...एंजेला मर्केल आधुनिक जर्मन समाज और यूरोप की सौगंध लेकर समस्या के लिये तैयार हो रही है...यह झूठ और मूर्खता है।’’

जिजेक यहां तक कह जाते हैं कि शरणार्थियों को लेकर भी एक अर्थशास्त्र काम कर रहा है, जो उनके प्रति सहानुभूति से पेश आने की दलीलें तैयार करवाता है। जिजेक ऐसी सभी मानवतावादी बातों को छोड़ कर आइसिस का और भी भारी हिंसा से मुकाबला करने पर बल देते हैं। 

इसप्रकार, पेरिस पर हुए इस हमले को क्यों 9/11 के बाद की परिस्थिति का दूसरा अध्याय कहा जा रहा है, इसकी एक झलक हमें स्लावोय जिजेक की बातों से मिल जाती है। पहले से ही जिस अरब दुनिया की कमर को तोड़ दिया गया है, अब इस दूसरे चरण में और भी हिंसक उपायों से कभी सभ्यता का पालना कही जाने वाली बेबिलोनिया-मेसोपोटामिया की इस दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिये नेस्तनाबूद किया जायेगा। पश्चिम के लोग ‘अपने’ यूरोप की नाक के तले इन पिछड़े हुए ‘जंगली और बर्बर’ लोगों को अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते ! इस पूरे क्षेत्र पर पश्चिमी देशों का प्रत्यक्ष शासन ही इनकी नियति है - ‘सभ्यता की रक्षा की अनिवार्य शर्त!’

पेरिस पर हमले के एक दिन पहले ही इराक में आतंकवादियों ने 26 लोगों की हत्या की थी, 60 को जख्मी किया। उसके एक दिन पहले लेबनान के बेरूत में 181 लोग इनके विस्फोटों से मारे गये। पाकिस्तान में पिछले महीने 107 लोग मरे। इसराइली आतंकवादियों ने पिछले महीने 56 फिलिस्तीनियों को मार डाला। लेकिन कहीं भी इन हत्याओं को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई दी। ये आतंकवादी वही थे, जिन्होंने पेरिस पर हमला किया। लेकिन तब तक किसी को इसमें कोई इस्लामिक फासीवाद नहीं दिखाई दिया। लेकिन पेरिस पर हमले के साथ ही जैसे इस लड़ाई का पूरा चरित्र बदल गया। वैसे ही, जैसे 22 जून 1941 के दिन सोवियत संघ पर हिटलर के हमले के साथ ही द्वितीय विश्वयुद्ध का चरित्र बदल कर ‘जनयुद्ध’ होगया था !  पेरिस पर हमला सभ्यता पर हमला है ! अन्यथा, अब तक तो आइसिस का मामला बर्बरों का आपसी मामला और सभ्य देशों के हथियारों की बिक्री और आजमाईश का मामला भर था। 

यह है - 9/11 के बाद के अभियान के इस दूसरे चरण का लुब्बेलुबाब। जिजेक की तरह के चिंतकों को आतंकवादियों और शरणार्थियों का अर्थशास्त्र अच्छी तरह से समझ में आता है, लेकिन सामरिक-औद्योगिक गंठजोड़ के अर्थशास्त्र से वे आंख चुरा लेते हैं। पश्चिम एशिया के तेल भंडार से लेकर नाना प्रकार के खनिजों की खुली लूट के साम्राज्यवादी अर्थशास्त्र को वे बड़ी आसानी से ओझल कर देते हैं। पश्चिमी देशों पर लटक रही 2008 से भी बड़ी और घातक मंदी के अर्थशास्त्र को भी भूल जाते हैं। भूल जाते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में 1929 की महामंदी थी। 

और, सभ्यता के मसलों को हथियारों और युद्ध के बल पर तय करने की यह मानसिकता पूरी मानव जाति के अस्तित्व के साथ कितना बड़ा खेल खेल रही है, इसका भी इन्हें जरा सा अहसास नहीं है। आज की दुनिया, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की, परमाणविक हथियारों, इस पूरी धरती का विनाश कर देने में सक्षम हथियारों की दुनिया है। जो आज भी इतिहास में बल प्रयोग की भूमिका से रोमांचित हैं, उन्हें इतिहास के वेग के वर्तमान दौर का अंदाज ही नहीं है। यह पूरी मानवता को तलवार की धार पर चलाने की तरह है। थोड़ी सी चूक हुई तो फिर इस ब्रह्मांड से मनुष्य नामक प्राणी का अस्तित्व ही खत्म हो सकता है। पूंजी का वैश्वीकरण हुआ है, लेकिन राजसत्ताओं का नहीं। राज्यों के बीच हिंसक प्रतिद्वंद्विता बनी हुई है। इसके खतरे के परिणामों का इन्हें अंदाज ही नहीं है। एक समय में रोजा लुक्सेमबर्ग ने कहा था - समाजवाद या बर्बरियत। लेकिन, सच यह है कि बर्बरियत भी तभी नसीब होगी जब मनुष्य नसीब वाला होगा ! 


गुरुवार, 12 नवंबर 2015

भाजपा की अन्तर्कलह के दिलचस्प संकेत


अरुण माहेश्वरी

भाजपा में आडवाणी समूह का प्रतिवाद अनायास ही भाजपा और संघ परिवार के बारे में विचार की बहुत दिलचस्प संभावनाओं से भरा दिखाई देता है।

भाजपा लंबे अर्से से संसदीय जनतंत्र के ढांचे में संविधान-सम्मत ढंग से सत्ता की एक प्रतिद्वंद्वी पार्टी के रूप में बनी हुई है, और आरएसएस इस ढांचे के बाहर का गोपनीय सत्ता-केंद्र है। इन दोनों के बीच पिछले लगभग 64 सालों से एक ऐसी संगति बनी हुई है जिसे ध्यान से देखें तो पायेंगे कि यह एक खास प्रकार की विश्रृंखलित संगति (broken symmetry) है। बिना किसी वास्तविक जैविक संपर्क की संगति; अतार्किक संगति। यह संगति वस्तुत: तभी प्रकट होती रही है जब भाजपा सत्ता पर होती है। उसी समय आरएसएस की एक गैर-संवैधानिक सत्ता-केंद्र वाली भूमिका प्रकट होने लगती है। अन्य दिनों में, दोनों अपने-अपने दड़बों में सिमटे होते हैं। भाजपा दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों की तरह संसद के अंदर और संसद के बाहर की गतिविधियों में लगी रहती है। और आरएसएस तो शुद्ध सांस्कृतिक संगठन की खाल ओढ़ लेता है।

आम तौर पर लोग कहते हैं कि ये दोनों संगठन अन्योनाश्रित है। यह बात एक सफेद झूठ और कोरे भ्रम के अलावा कुछ नहीं है। सत्ता में अपनी भागीदारी के दावे के लिये आरएसएस द्वारा फैलाये जाने वाला भ्रम। क्योंकि सत्ता के संघर्ष में तो भाजपा के अलावा दूसरी भी अनेक पार्टियां हैं। जब दूसरी किसी पार्टी को अपने लिये ऐसे किसी बाहरी, गोपनीय ढंग के संचालक-संगठन की जरूरत नहीं महसूस होती है, जो खास परिस्थितियों में संविधानेत्तर सत्ता-केंद्र के तौर पर उभर कर आ जाता है, अन्यथा अपनी किसी दूसरी पहचान के साथ गुम रहता है,  तब फिर भाजपा के लिये ही ऐसे बाहरी संगठन का आसरा क्यों जरूरी है ! अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों में कुछ लोग संगठन का काम देखते हैं, कुछ संसदीय संस्थाओं में भागीदारी का जिम्मा लिये होते हैं। लेकिन इनमें से किसी को भी कभी अपने को एक-दूसरे से स्वतंत्र समूह बताने की जरूरत नहीं होती है। वे सभी एक प्रकट संगति में काम करते हैं।

मसलन, सोनिया गांधी और उनके सलाहकारों को ही लिया जाए। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री को संचालित करते हैं - गैर-संवैधानिक सत्ता-केंद्र की भूमिका अदा करते हैं। लेकिन कभी कोई यह नहीं कह सकता है कि प्रधानमंत्री की पार्टी और सोनिया गांधी की पार्टी अलग-अलग है।

इसीलिये, आरएसएस और भाजपा के बीच की संगति पूरी तरह से अतार्किक और विश्रृंखलित संगति दिखाई देती है। जब भाजपा सत्ता के बाहर होती है तो इनके बीच हितों की टकराहट का कोई नजारा देखने को नहीं मिलता। लेकिन जब-जब भाजपा सत्ता पर आती है, सत्ता पर अपने हक के साथ आरएसएस मैदान में उतर जाता है और समाज के सभी स्तरों पर अजीबो-गरीब तनाव के दृश्य दिखाई देने लगते हैं। शिक्षा के भगवाकरण से लेकर, राममंदिर, धारा 370, गोमांस आदि की तरह के विषयों पर बवाल शुरू हो जाते हैं, जिनसे घोषित तौर पर भाजपा नीत मोर्चे और सरकारें बचने की बात कहते रहते हैं।

जन संघ के समय में, ‘77 में जनता पार्टी की सरकार के वक्त आरएसएस की वजह से ही दोहरी सदस्यता का पूरा अतार्किक और अनावश्यक विवाद पैदा हुआ। यह उसी विश्रृंखल संगति का परिणाम था जो इन दोनों संगठनों के बीच बनी हुई है। बाद के दिनों में, वाजपेयी-आडवाणी के सत्ता-काल में भी आरएसएस के साथ उनका हमेशा एक तनाव बना रहता था। यहां तक कि जिस गुजरात को संघ की प्रयोगशाला कहा जाता है, वहां भी 2002 के दंगों के बाद क्रमश: देखा गया कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस के काबू में नहीं रहे। सिंघल-तोगडि़या कंपनी से उनके संबंध, बाबू बजरंगी और माया कोडनानी की तरह के अपराधियों को जेल जाने से बचाने के प्रति मोदी की उदासीनता के अंदर भी इसी तनाव की झलक मिलती है।

इस बार, 2014 के चुनाव में आडवाणी जैसे भाजपा के एक वरिष्ठ, कद्दावर नेता से बचने के लिए आरएसएस ने गुजरात के चौदह साल से महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का इस्तेमाल किया। मोदी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बेइंतहा साधन-संपन्न पूरा पैकेज था। मोदी को भी संघ का मोहरा बनना अपने लिए लाभदायी लगा। आडवाणी, जोशी की उम्र ने इनके काम को आसान कर दिया। मोदी विकास के नाम पर जीत गये, लेकिन उनके जीतने के बाद ही आरएसएस ने अपना हमेशा का घटिया सांप्रदायिक खेल शुरू कर दिया।

आज परिस्थिति यह हुई है कि एक विश्रृंखलित संगति वाले संगठन की गतिविधियों के कारण डेढ़ साल के अंदर ही मोदी की चमक का पूरा मुलम्मा उतर चुका है।  जिस व्यक्ति ने जादू की छड़ी घुमा कर भाजपा का मोदी पार्टी में कायांतर कर लिया, संघ की करतूतों ने इतने थोड़े से दिनों में उसकी हस्ती को हिला कर रख दिया है। चौदह साल तक जो व्यक्ति मुख्यमंत्री रहा, जो आज प्रधानमंत्री है, वह अचानक ही, आरएसएस को सत्ता का भागीदार बनाने के चक्कर में कोरा संघ प्रचारक दिखाई देने लगा। मोदी और उसके प्रमुख सिपहसलार अमित शाह की सूरत आज भाजपा के तेजी से पतन के लिये जिम्मेदार सबसे बड़े खलनायक की हो गई है। जनता के बीच मोदी-शाह का प्रतिनिधित्व करने वाले तत्व आरएसएस के अनपढ़, अज्ञानी गाली-ब्रिगेड के लोग है !

बहरहाल, इस पूरे प्रसंग में जो मूल बात हमें सबसे अधिक दिलचस्प लगती है,  वह आरएसएस और भाजपा के बीच के संबंध की ही बात है - एक अस्वाभाविक, अतार्किक और विश्रृंखलित संगति के संबंध की बात।

दरअसल जब भी कोई स्वतंत्र ढांचा तैयार किया जाता है, तो हमेशा उसकी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए उसके चारों ओर एक खाई खोदी जाती है ताकि उन अवांछित प्रभावों से उस ढांचे को बचाया जा सके, जो उसकी स्वतंत्रता को हानि पहुंचाने वाले होते हैं। यह बात हर चीज पर लागू होती है। व्यक्ति, परिवार और  संगठन पर ही नहीं, बल्कि विचारों के ढांचे पर भी। बेटे को उसके पैरों पर खड़ा करने के लिए बाप को उसे छोड़ देना पड़ता है। जब कोई संगठन अपने घोषित उद्देश्यों से भिन्न किसी उद्देश्य के लिए अपने से अलग किसी संगठन को तैयार करता है तो उसे उस खास उद्देश्य के लिये अपने ढंग से काम करने के लिये छोड़ दिया जाता है। वह उस उद्देश्य विशेष के लिये जरूरी अपने विकास के तर्कों और तत्वों को अपनाता है। यहां तक कि विचारों के ढांचों में भी, हर धारणा को खुद अपनी संगति बनानी होती है।

लेकिन आरएसएस के साथ दिक्कत यह है कि वह ऐसे लालची बाप की तरह है जो बेटे को संपन्न देख कर उसपर लद कर उसे चूसना चाहता है और उसकी दरिद्रता के दिनों में उसे अपने से परे करके, स्वतंत्र जूझने के लिये छोड़ देता है। या उसकी दशा उस महाजन की तरह की है जो मौका देखकर अपने सूद को वसूलने के लिये उत्पात मचाया करता है। संघ ने जब अपने राजनीतिक सरोकारों को शुरू में ही जन संघ और बाद में भाजपा के सुपुर्द कर दिया और खुद को आत्मिक जगत के विषयों तक सिमटा लिया, तो फिर क्यों बार-बार अनुकूल मौकों पर उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं सर उठाने लगती है ! जो संगठन संसदीय जनतंत्र के ढांचे में पनप रही भाजपा नामक परिघटना से बाहर रहा है, वह जब अचानक ही अवतरित होकर बिल्कुल अलग प्रकार के उत्पात मचाना शुरू कर देता है, तो कुछ मिला कर जो अराजक, विश्रृंखल स्थिति पैदा हो सकती है, आज भाजपा उसी के परिणामों को भोग रही है।

हर परिस्थिति के विकास के अपने लक्षण होते हैं। और लक्षणों के साथ ही कुछ ऐसी चीजें भी होती है जिनके प्रभाव को रोक कर आगे बढ़ा जाता है। आरएसएस की बाबा आदम के जमाने की आइसिस-छाप, धर्म पर आधारित सामाजिक समझ के प्रभाव को रोक कर ही संसदीय जनतांत्रिक ढांचे में भाजपा अपना स्थान बना पाई है। अब फिर उसपर आरएसएस के विचारों का बलात-आरोपण इस पार्टी के ढांचे में कैसे-कैसे तनाव पैदा कर सकता है, आज के भाजपा के संकट में हम उसे आसानी से देख सकते है।

इसीलिये, इस संकट का अंतिम तार्किक परिणाम या तो आरएसएस के बलाघात से भाजपा के टूट कर बिखर जाने में हो सकता है या आरएसएस और भाजपा के रिश्तों में स्थायी दरार में। अगर सामयिक तौर पर इन परिणतियों को किसी प्रकार से टाल भी दिया गया तो भी यह दोनों संगठनों की कोशिकाओं के विकृतिकरण का, उन्हें प्राणघाती असाध्य रोग का शिकार बना देगा। शत्रुध्न सिन्हा, भोला सिंह, सी. पी. ठाकुर, आडवाणी, जोशी, शांता प्रसाद और यशवंत सिन्हा के प्रतिवाद के समूहवृंद में अक्सर भाजपा पर लद जाने वाले इस अलग प्रकार के संविधानेत्तर-सत्ता केंद्र के दबाव की चरमराहट की ध्वनि को आसानी से सुना जा सकता है। जो विचारों में विस्मृत हो चुका होता है, वह फिर जब अचानक यथार्थ में लौटता है तो कुछ लोगों में उसकी इस आकस्मिक वापसी से एक अलग प्रकार का सम्मोहन भी पैदा होता है। ऐसे लोग ही भाजपा के इस संकट से उद्धार में आरएसएस की कोई सकारात्मक भूमिका देख सकते हैं। वरना, जो इस संकट के मूल में है, उसे ही इसके निदान का कारण समझना सिवाय एक भ्रम के और कुछ नहीं हो सकता।


रविवार, 8 नवंबर 2015

बिहार के चुनाव परिणाम पर कुछ टीपें

-अरुण माहेश्वरी

शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ, आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया, जाँ थी कि फिर सँभल गई
आज हमें फ़ैज़ साहब की इन पंक्तियों को गाते रहने की इच्छा हो रही है ।

2019 में इस ग़ज़ल की और पंक्तियों को गाया जायेगा -
... दर्द का चाँद बुझ गया, हिज्र की रात ढल गई । '

सारे टीवी चैनल्स बिकाऊ है । चैनलों को ख़रीदने के मामले में आगे भी भाजपा दूसरी सभी पार्टियों की तुलना में ज्यादा ताक़तवर रहेगी । इसीलिये आगे के तीन साल तक टीवी चैनल लगातार झूठ उगलने के लिये अभिशप्त रहेंगे ।
अरुण शौरी ने मोदी के बारे में सही कहा है कि उनके पास अर्थ-व्यवस्था की कोई समझ नहीं है । आर्थिक मामलों में मोदी विफल रहेंगे लेकिन अख़बारों और चैनलों की हेडलाइन्स को लगातार ख़रीदते रहेंगे । मोदी-शाह की यह प्रवंचक कार्यनीति उनके लिये और पूरी भाजपा के लिये आत्म-प्रवंचना साबित होगी ।
मोदी ने कांग्रेस-मुक्त भारत की बात से अपनी शुरूआत की थी और सच यह है कि भाजपा-मुक्त भारत से अपनी पारी का अंत करेंगे । अमित शाह ने अपने लोगों से जीत का अभ्यास करने की बात से शुरूआत की और सच यह है कि उनका अंत लगातार हार को सहने की वास्तविकता से होगा ।

भाजपा के प्रवक्ता सभी चैनलों पर कह रहे हैं कि पार्टी हार के कारणों पर विचार करेगी ।
सवाल है - कौन सी पार्टी ? भाजपा या मोदी पार्टी ?
मोदी-शाह जोड़ी तो भाजपा को हड़प चुकी है । अगर भाजपा को इस हार पर विचार करना है तो उसे एक नया जन्म लेना होगा ; मोदी-शाह जोड़ी को इतिहास के कूड़े पर फेंकना होगा ; और आरएसएस से अपने को यथासंभव दूर करना होगा । क्या भाजपा के लिये यह कभी भी संभव है ?
कहना न होगा, बिहार चुनाव का यह बिंदु भारत में भाजपा के पूरी तरह से अप्रांसगिक होते जाने के प्रारंभ का बिंदु साबित होगा ।

मोदी समूह का बार-बार एक ही भूल को दोहराते रहना ही उसकी नियति है ।
टीवी चैनलों पर अक्सर कुछ टिप्पणीकार बड़ी मासूमियत से यह सवाल करते पाये जाते हैं कि बार-बार मूंह की खाने के बावजूद यह पार्टी एक ही गलती को बार-बार दोहराती क्यों है? मसलन्, मोदी ने दिल्ली में जो भूलें की, हूबहू उन्हीं भूलों को उसने दिल्ली में क्यों दोहराया ? अथवा भाजपा को जिन भूलों की वजह से कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश में इतनी कीमत चुकानी पड़ी, वही भूलें उन्होंने फिर बिहार में क्यो कीं ?
क्या कहेंगे इन टिप्पणीकारों की मासूमियत को ? क्या वे यह नहीं जानते कि कोई भी घटना तब एक नियम का रूप ले लेती है जब उसे बार-बार दोहराया जाता है। पहली बार में कोई घटना किसी नियम का संकेत नहीं देती। घटनाओं की नियम-विहीन सी नजर आती श्रृंखलाओं के बीच से एक नियमित श्रृंखला को पाया जा सकता है ; विचारों के बार-बार दोहराव से विचारधारा को पहचाना जा सकता है।
जैसे, आजाद भारत में सांप्रदायिक दंगों के इतिहास में एक खास ढर्रा देखा गया है। पिछले लोक सभा चुनाव के पहले ही दंगों और सांप्रदायिक तनावों की एक पूरी श्रृंखला देखी गई। इन अनुभवों के आधार पर ही तो यह अनुमान लगाया जाता है कि यदि उत्तर प्रदेश का प्रशासन चौकन्ना न रहा तो उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव के पहले बड़े पैमाने पर दंगे होंगे। बिहार में भी सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कम कोशिश नहीं की गई।
जाहिर है कि दंगों की घटनाओं की यही श्रृंखला भाजपा को बाकायदा एक सांप्रदायिक पार्टी बनाती है। सांप्रदायिक राजनीति का यह नियम उसके कामों और विचारों, दोनों में जाहिर होता है। भाजपा के चरित्र के मूल में उसकी विचारधारा है, लेकिन जैसे इतिहास के नियम कर्ता के बजाय उसके कार्यों से तैयार होते हैं, वैसे ही भाजपा की ठोस सांप्रदायिक पहचान उसकी भड़काऊ और दंगाई गतिविधियों से बनती है।
यही वजह है कि पार्टियों से जुड़ी किसी भी घटना की व्याख्या करने वाले पंडितों के लिए यह जरूरी होता है कि वह उनकी गतिविधियों की श्रृंखला की व्याख्याओं से जाहिर होने वाली विचारधारा को ठोस रूप में जाने। विचारधारा को तरजीह न देने वाले या न जानने वाले व्याख्याता ही इसप्रकार के निरर्थक, मासूम से सवाल कर सकते हैं।
एक मित्र ने लिखा कि “भाजपा के कुछ वर्तमान और भूतपूर्व नेता आज मन की बात बोल रहे हैं ,भाजपाई होकर भी विपक्षी से दिख रहे हैं तो हमें अच्छा लगता है, सूट करता है।ज़रा सोचिये अगर ये मंत्री या ऐसे ही कुछ बना दिये गए होते पहले ही, इनके अहम को चोट नहीं पहुँचाई गई होती, इनकी पूछ होती तो क्या ये मन की बात बोलना पसंद करते या बोलते तो वह उस कोटि की होती,जैसी कि मोदीजी की आकाशवाणी पर होती है।और आज जो मोदीजी की जयजयकार कर रहे हैं, कल मान लो उन्हें बाहर कर दिया जाए तो वे भी खरी-खरी बात कहने लगेंगे,इसलिए मौक़े के मुताबिक़ बोलनेवालों और जो हमेशा एक सा कड़ुवा बोलते हैं,उनमें आज भी हमें फ़र्क़ करना चाहिए।“
हमारा कहना है - जब कोई विचार कहीं से भी आता है तो वह किसी न किसी लक्षण का भी सूचक होता है। किसी भी वजह से क्यों न हो, वह एक दरार तो दर्शाता ही है। इससे यह मिथक दरकता है कि मोदी-शाह नेतृत्व चुनौती-विहीन है। आज हमें ये नेता संदिग्ध लग सकते हैं, लेकिन जब ऐसे ही विचारों का दोहराव होगा तो यही बाते उस पार्टी के अन्दर एक ‘ऐतिहासिक जरूरत’ मानी जाने लगेगी। जो चीज प्रथमत: कुछ समझ में नहीं आती, अजीब सी लगती है, वही क्रमश: चेतना में रूपांतरित होती है। चेतना के बनने का रास्ता हमेशा इसीप्रकार पहले चीज की गलत पहचान से ही पैदा होता है। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले उदय प्रकाश ने अपना सम्मान लौटाया। बहुतेरे ऐसे थे, जिन्होंने उनके इरादों पर संदेह किया। उनके बाद नयनतारा सहगल, फिर अशोक वाजपेयी - संदेहास्पदकता का भाव कमजोर होने लगा। और आज, उसे ही सब एक ‘ऐतिहासिक जरूरत’ समझ रहे हैं। इसीलिये देखने की जरूरत है कही जाने वाली बातों की सत्यता को, न कि कौन कह रहा है उसके व्यक्तित्व को।
सचमुच, भाजपा के प्रवक्ताओं के मुंह से ‘विकास’ एक अपशब्द की तरह लगने लगा है।