शनिवार, 22 अप्रैल 2017

मार्क्सवाद-लेनिनवाद के विज्ञान पर एक सोच

(लेनिन के 147 वें जन्मदिन पर खास)
-अरुण माहेश्वरी


आज रूस की नवंबर क्रांति के महान रूपाकार लेनिन का 147 वां जन्मदिन है। यही साल मानव समाज के लिये उनके सबसे बड़े कर्तृत्व, नवंबर क्रांति का शताब्दी वर्ष भी है। और भी गौर करने लायक बात है कि आगामी 5 मई को कार्ल मार्क्स के जन्मदिन पर हम मार्क्स के जन्म के द्वि-शताब्दी वर्ष में प्रवेश करेंगे।

नवंबर क्रांति के शताब्दी वर्ष के प्रारंभ में अपने एक लेख में हमने लिखा था कि जरूरत है इस पूरे साल दुनिया को हिला देने वाली इस दूरगामी प्रभाव की क्रांति पर गंभीरता से चर्चा कि्या जाए। किसी भी विषय का गहराई से अवलोकन स्वयं उस विषय के इस हद तक संस्कार, शोधन और परिमार्जन की भूमिका अदा करता है कि उससे बिल्कुल नये अर्थ स्फूट होने लगते है। यह कोई भाववाद नहीं है, यह भावों का भौतिकवाद है। बहुत पुरानी बात है कि मंत्र मनन से मंत्रित होता है।

तभी हमने यह भी लिखा था कि ‘‘हम नहीं मानते कि रूस में महान लेनिन के नेतृत्व में मार्क्सवाद के प्रयोग से जिस सामाजिक क्रांति का निरूपण हुआ उसके अब और नये-नये रूपों और अर्थों के विस्तार की संभावनाएं शेष हो गई हैं। अर्थात, नवंबर क्रांति के अब कोई अवशेष नहीं बचे हैं । रात गई बात गई । दुनिया बदल गई है, वह समय नहीं रहा और इसीलिये नवंबर क्रांति भी नहीं रही।”

मार्क्सवाद एक विज्ञान है। सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान। मार्क्स का यह एक अक्सर दोहराया जाने वाला कथन है कि मनुष्य अपने समाज का निर्माण स्वयं करता है, मगर दी हुई परिस्थिति में। अपनी पुस्तक ‘जर्मन विचारधारा’ में मार्क्स जब मनुष्य की चर्चा करते है, वे ‘एक सचमुच जीवित इंसान’ (a real living man) की बात करते हैं, चेतना संपन्न मनुष्य की।

‘मनुष्य अपने समाज का निर्माण  स्वयं करता है’, इसी समझ ने भौतिकवाद के तब तक के, आदिम जीवन से जुड़े भौतिकवाद से लेकर फायरबाख तक के दर्शनशास्त्रीय भौतिकवाद के नियतिवादी स्वरूप को बदल कर उसे द्वंद्वात्मकता के नये आधार पर स्थापित किया था। एक जमाने में भाववाद के खिलाफ फायरबाख के तीखे संघर्ष को अपने पर एक ऋण मानते हुए भी मार्क्स यह कहने से नहीं चूके थे कि उनके कोरे विश्वास भौतिकवादी नहीं बल्कि ‘असली भाववादी’ थे। वे लिखते है कि ‘फायरबाख का असली भाववाद उस समय प्रगट हो जाता है, जब हम उनके धर्म और आचार-नीति के दर्शन पर आते हैं।’’


इसकी तुलना में जिन हेगेल के विचारों को, जो सर के बल खड़ा था उन्होंने पैर के बल खड़ा किया, उसके बारे में वे कहते थे कि ‘‘राष्ट्र के बौद्धिक विकास पर इतना प्रचण्ड प्रभाव डालने वाली हेगेल के दर्शन जैसी महाकृति केवल नजरअन्दाज कर देने से ही खत्म नहीं की जा सकती थी। उसे तो ठीक उसके ही अर्थ में ‘गलत साबित’ करने की जरूरत थी, इस अर्थ में कि उसके रूप को तो आलोचना के जरिये समाप्त कर दिया जाता, पर उसके द्वारा उपलब्ध नयी अन्तर्वस्तु को बचा लिया जाता। ---हेगेलवादी पद्धति-विधि और अन्तर्वस्तु दोनों में - भाववादी ढंग से सिर के बल उलटा खड़ा भौतिकवाद प्रस्तुत करती है।’’

जाहिर है, इस प्रकार मार्क्स के जरिये मनुष्य के अस्तित्व और उसकी चेतना के परस्पर संबंधों के एक नये विज्ञान की स्थापना हुई थी। इसके साथ ही युक्त हुआ सामाजिक-आर्थिक विकास के इतिहास का मार्क्स का गहन अध्ययन, जिसे सामान्य तौर पर ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम से जाना जाता है। उन्होंने इस बात को गहराई से लक्षित किया कि मनुष्यों पर जीवन में धर्म, विज्ञान, राजनीति, और कला आदि तमाम पक्षों से जुड़ी जो इतनी विचारधाराएं लदी हुई है, उन सबके मूल में है मनुष्य द्वारा जीविका के तात्कालिक भौतिक साधनों का उत्पादन। इस समग्र विवेचन से ही यह मर्म की बात सामने आई कि मनुष्य की चेतना के सामाजिक स्वरूप के निरूपण में वर्ग संघर्ष वह उत्प्रेरक तत्व है जो किसी भी समाज के एक संपूर्ण रूपांतरण के संयोग का कारण बनता है। जब समाज के उत्पादन संबंधों में ऐसी परिस्थिति पैदा होती है, जिसमें उत्पादन में विकास का क्रम व्याहत होने लगता है, उत्पादक शक्तियों में शोषण और वंचना का भाव पैदा होने लगता है, तभी पुराने उत्पादन संबंधों पर टिका पूरा सामाजिक ताना-बाना जर्जर हो कर बिखरने लगता है और उत्पादन के नये संबंधों पर आधारित नये समाज के निर्माण का प्रारंभ होता है।


मार्क्स एक दार्शनिक, वैज्ञानिक के साथ ही सर्वोपरि क्रांतिकारी थे। दर्शन और इतिहास के अध्ययन के उनके इस निचोड़ ने ही सामाजिक क्रांति के एक नये विज्ञान की आधारशिला रखी जिसमें नियति के किसी दीर्घ क्रम पर परिस्थितियों को छोड़ने के बजाय सामाजिक समृद्धि और न्याय के लिये सचेत और संगठित सामूहिक प्रयत्नों के बारे में सुसंगत सिद्धांत और पद्धति के विकास का प्रयत्न निहित था।

पूंजीवाद के विकास के प्रारंभिक चरण में ही उससे प्रकट हो चुके लक्षणों के विश्लेषण के आधार पर मार्क्स ने ही पूंजीवाद की कोख से पैदा हुए मजदूर वर्ग के सर्वहारा रूप को, जिसके पास अपनी श्रम शक्ति के अलावा  जीविका का और कोई साधन नहीं होता, इस युग की एक सर्वप्रमुख क्रांतिकारी शक्ति के रूप में चिन्हित किया। पूंजीवादी उत्पादन की अपने वक्त की प्रणालियों के गहन विश्लेषण से उन्होंने इस वर्ग में संगठन, क्रांति और नव-निर्माण की सारी संभावनाएं देखी और समाज के इसी सचेत तबके को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी के गठन से एक क्रांतिकारी प्रक्रिया के बीच से स्वतंत्र और साम्यवादी समाज के निर्माण की पूरी परिकल्पना पेश की। साम्यवाद को उन्होंने बिल्कुल सही मानवता का भवितव्य, एक स्वतंत्र, समानतापूर्ण और न्यायपूर्ण समाज का आदर्श रूप बताया।


इस प्रकार, किसी भी विज्ञान के लिये जरूरी एक सिद्धांत, उस पर अमल के खास औजार और  अमल की विधि - इन तीनों की ही एक समग्र अवधारणा पेश करने की वजह से मार्क्सवाद को सामाजिक-ऐतिहासिक विकास का एक विज्ञान माना जाता है।

लेकिन, जैसा कि हर प्रामाणिक विज्ञान के क्षेत्र में यह एक मान्य सत्य है कि व्यवहार ही उसका परम तत्व नहीं हुआ करता है। बल्कि, व्यवहार विज्ञान के सिद्धांत के विस्तृत फलक पर एक खास क्षण भर होता है, संयोगों का क्षण, जब सिद्धांत का मर्म एक खास विचारधारात्मक स्वरूप (ज्ञान) अथवा व्यवहारिक स्वरूप (समस्या के निदान) का रूप ग्रहण कर लेता है। इस बात को आज भी लगातार प्रयोग के द्वारा प्रमाणित हो रहे आइंस्टाइन के सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में अच्छी तरह से समझा जा सकता है।

हमारे कहने का तात्पर्य यही है कि भले किसी सिद्धांत के अमल की विधि और उसके स्वरूप के विकास में कोई भी सफलता क्यों न मिल जाए, वह विधि और उसके परिणामों को तब तक किसी विज्ञान की मान्यता नहीं मिल सकती जब तक ठोस प्रमाणों के आधार पर मूलभूत सिद्धांत उसकी अनुमति नहीं देता। आज रूस की नवंबर क्रांति और उसके बाद उसकी 1991 के वक्त की परिणति पर भी यही बात लागू होती है। यह बात लेनिन पर लागू नहीं होती, क्रांति को उसके रास्ते पर ले जाने के क्रम में उनके द्वारा किये जाने वाले न जाने कितने प्रयोगों पर लागू नहीं होती। लेकिन परवर्ती काल में, जिन्होंने नवंबर क्रांति को किसी आधिभौतिक सत्य का रूप दे दिया, उन पर जरूर लागू होती है।

लेनिन के नेतृत्व में जब रूस की क्रांति हुई थी, वह दुनिया के इतिहास में अपने प्रकार का मार्क्सवाद का प्रथम प्रयोग था। पेरिस कम्यून तो सिर्फ ऐसी किसी संभावना की एक झलक भर था। लेनिन ने इस पर अमल के दौरान क्रांति की रक्षा के लिये ‘एक देश में समाजवाद’, ‘शांति के प्रश्न’ और क्रांति के फलीभूत होने के लिये ‘नयी आर्थिक नीति' (NEP) की तरह के जो लगातार प्रयोग किये, जिस प्रकार बोल्शेविक क्रांति के बाद के अपने लगभग छः साल के जीवन में वे एक के बाद एक व्यवहारिक सवालों से जूझते रहे, उन पर यदि कोई भी गहराई से ध्यान दें तो पता चलता है कि कैसे लेनिन ने मार्क्स के सामाजिक विकास के विज्ञान से ही निःसृत एक सामाजिक क्रांति के पूरे विज्ञान की आधारशिला रखी थी। हमारा मानना है कि आगे ऐसे न जाने कितने और प्रयोग, कितने स्तरों पर कितने रूपों में जारी रहेंगे, इसकी कोई पूरी कल्पना नहीं कर सकता है। लेकिन यह सच है कि इस क्रांति के परिणाम आज की पीढ़ी के जीवंत अनुभवों के अंग हैं। इन अनुभवों की महत्ता और इनकी भूमिका से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है। समाजवादी क्रांति और सामाजिक रूपांतरण की जितनी भी समस्याएं है लेनिन ने अपार धैर्य और गहरी सूझ-बूझ के साथ उनका सामना किया था। उनके विशाल साहित्य का पन्ना-पन्ना इसकी गवाही देता है।


मार्क्स ने खुद लिखा था कि “समाज - उसका रूप चाहे जो हो - क्या है ? वह मानवों की अन्योन्यक्रिया का फल है। क्या मनुष्य को समाज का जो भी रूप चाहे चुन लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है ? कदापि नहीं।...उत्पादन, वाणिज्य और उपभोग के विकास की कोई खास अवस्था ले लीजिए, तो आपको उसके अनुरूप ही सामाजिक गठन का रूप, परिवार का, सामाजिक श्रेणियों या वर्गों का संगठन भी, या एक शब्द में कहें तो नागरिक समाज भी मिलेगा। किसी खास नागरिक समाज को ले लीजिए तो आपको खास राजनीतिक व्यवस्था भी मिलेगी, जो नागरिक समाज की आधिकारिक अभिव्यक्ति मात्र है।”

मार्क्स इसके साथ ही यह भी कहते हैं कि “ मानव अपनी उत्पादन शक्तियों का - जो उसके पूरे इतिहास का आधार है - स्वाधीन विधाता नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक उत्पादक शक्ति अर्जित शक्ति होती है, भूतपूर्व कार्यकलाप की उपज होती है।”

इसीलिये, जो लोग नवंबर क्रांति को किसी उल्कापात की तरह स्वर्ग से अवतरित और फिर एक चमक दिखा कर अंतरीक्ष में ही गुम हो जाने के रूपक की तरह देखते हैं, वे ही उसे मनुष्य के सामाजिक विकास के इतिहास से पृथक मान कर उसके पूर्ण विलोप की तरह का विचार व्यक्त कर सकते हैं।

मानव समाज आज कृत्रिम बुद्धि द्वारा उत्पादन के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। सन् ‘91 के बाद एकध्रुवीय विश्व के पहले चरण में ही रोजगार-विहीन (job-less) विकास के सारे लक्षणों की पहचान कर ली गई थी। इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रतिफल के रूप में एक श्रीहीन (growth-less), वाणी-हीन, (voice-less) और निर्दयी (ruthless) परिस्थितियों की बातें भी स्पष्ट थीं। लेकिन अभी रोजगार-विहीनता का नहीं, बल्कि रोजगार-संकुचन का समय आ रहा है। बिल्कुल सही अनुमान किया जा रहा है कि आगामी एक दशक से भी कम समय में भारत में 69 प्रतिशत रोजगार कम हो जायेंगे। कमोबेस कुछ ऐसा ही हाल बाकी दुनिया का भी होगा।



इस सचाई को भांप कर ही विकसित देशों में आने वाले मानवीय अस्तित्व के संकट की परिस्थितियों से बचने के लिये राज्य की ओर से सभी नागरिकों के लिये एक न्यूनतम आमदनी को हर हाल में सुनिश्चित करने के नाना रूपों पर विचार शुरू हो गया है। हाल में स्विट्जरलैंड में ‘यूनिवर्सल बेसिक इन्कम’ की ऐसी स्कीम पर एक जनमतसंग्रह हो चुका है और फिनलैंड ने ऐसी एक योजना पर अमल की घोषणा भी कर दी है। इसके समानांतर ही, विचारों के स्तर पर, इस पूर्ण आटोमेशन के काल में पूर्ण आटोमेटेड आनंदमय कम्युनिस्ट समाज (Fully automated luxury communism) की कुछ हवाई किस्म की बातें भी की जा रही है।

मूल बात यह है कि हवाई हो या ठोस, मनुष्यों द्वारा अर्जित नई उत्पादन शक्तियों के अनुरूप मानव समाज के नये स्वरूपों के निरूपण को कोई रोक नहीं सकता है। और, नवंबर क्रांति और समाजवादी समाज इस निरूपण में हमेशा एक प्रकाश स्तंभ का काम करेंगे, इसमें कोई शक नहीं है।

शोषण की ताकतें इस नई परिस्थिति का इस्तेमाल राज्य को अधिक से अधिक दमन-मूलक बनाने के लिये करेगी। हमारे जैसे देश में बेरोजगारों की बढ़ती हुई फौज को गुंडों-बदमाशों (गोगुंडों) की फौज में बदलने की कोशिश आज भी जारी है और आगे भी जारी रहेगी। इससे दंगाइयों की, अन्ध-राष्ट्रवाद के नशे में चूर आत्म-घाती युद्धबाजों की फौज बनाई जायेगी। लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि यह हिटलर का, औद्योगिक पूंजीवाद के प्रथम चरण का जमाना नहीं है। यह मनुष्यों के आत्म-विखंडन से लेकर समान स्तर पर विखंडित, अकेले मनुष्यों की नई सामाजिकता का जमाना भी है। मार्क्स ने आन्नेनकोव के नाम अपने उसी पत्र में, जिससे हमने उपरोक्त उद्धरण लिया है, यह भी लिखा था कि “मानव का सामाजिक इतिहास उसके व्यक्तिगत विकास के इतिहास के अलावा और कुछ भी नहीं है - भले ही उसको इसकी चेतना हो या न हो।”

और, “ मनुष्य जो उपार्जित करता है उसे फिर कभी छोड़ता नहीं। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह उस सामाजिक रूप का भी परित्याग नहीं करता जिसमें उसने किन्हीं उत्पादक शक्तियों को प्राप्त किया है। इसके विपरीत, प्राप्त परिणाम से वंचित न होने, और सभ्यता के फलों को न गंवाने के लिए, मनुष्य उस क्षण से ही अपने सारे परंपरागत सामाजिक रूपों को बदलने को बाध्य होता है जब से उसके वाणिज्य के रूप का अर्जित उत्पादक शक्तियों के साथ सामंजस्य नहीं रह जाता।”

यह सच है कि मार्क्सवाद को यदि ठोस रूप में सामाजिक बदलाव की शक्ति के रूप में देखना है तो लेनिन के बिना उसकी शायद ही कोई तस्वीर बन पायेगी। ‘दर्शन की भूमिका दुनिया की व्याख्या भर करना नहीं, उसे बदलना है’ - मार्क्स का यह कथन मार्क्सवादी दर्शन के संदर्भ में सबसे पहले लेनिन के जरिये ही चरितार्थ हुआ था। आधुनिक समाज के अन्तर्विरोधों पर मार्क्स ने कहा था ‘पूंजीवादी निजी संपत्ति की घंटी बज चुकी है। संपत्तिहारकों का संपत्तिहरण हो रहा है’। मार्क्स के इस प्रसिद्ध कथन को जमीनी हकीकत का रूप देने का रास्ता लेनिन ने ही सबसे पहले दुनिया को दिखाया था।



कहना न होगा, नवंबर क्रांति की विद्रोही विरासत तबाह की जा रही उच्छिष्ट मानव-शक्ति को सामाजिक रूपांतरण की एक नई संगठित, सृजनात्मक शक्ति में बदलने का संदेश देती है। जीवन के सभी स्तरों पर मार्क्सवाद के प्रयोग की स्थितियों को समझते हुए उन्हें मूर्त करने में ही यह क्रांतिकारी विज्ञान चरितार्थ होता है। हर समाज में बनने वाले द्वंद्वात्मक संयोगों को मानव-मुक्तिकारी समाज व्यवस्थाओं में उतारना ही क्रांतिकारियों का काम है।

अंत में हम यही कहेंगे कि कम्युनिस्ट आंदोलन के इस कठिन दौर में यह जरूरी है कि लेनिन के साहित्य को फिर एक बार गहराई से पढ़ा जाए - उनसे कुछ आप्त वाक्यों को ढूंढ लाने के लिये नहीं, बल्कि खास-खास सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में सामाजिक रूपांतरण को संभव बनाने के लिये जरूरी यथार्थ बोध, वैचारिक निष्ठा और जीवन-संकल्प को, सच को समझने की अन्तरदृष्टि को हासिल करने के लिये। कम्युनिस्ट पार्टी की शायद ही ऐसी कोई समस्या होगी, जिसका सामना लेनिन ने न किया हो, और वह भले बीज रूप में ही क्यों न हो, लेनिन के साहित्य में मौजूद न हो।

हमारे देश में हमें अपने धर्म-निरपेक्ष और कल्याणकारी राज्य के संविधान की रक्षा की लड़ाई के जरिये पूरे समाज के हितार्थ मनुष्यों की इन अर्जित शक्तियों के प्रयोग को सुनिश्चित करना है। नवंबर क्रांति हमें अपने संविधान के सार-तत्व को पूरे ओज और विस्तार के साथ प्रकाशित करने वाली शक्तियों के निर्माण की प्रेरणा देती है। सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें इसे समाज की आत्म-विनाशकारी शक्ति में बदलना चाहती है। नवंबर क्रांति का संदेश विनाश के खिलाफ सृजन और न्याय के लिये दृढ़ प्रतिज्ञ संघर्ष का संदेश है।

लेनिन की 147वीं जयंती के मौके पर गहरी श्रद्धा और सम्मान के साथ हम उनका स्मरण करते हैं।




गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

मार्गदर्शकों के लिये जीवन के परम सत्य की उपलब्धि का अर्थात निर्वाण का क्षण


‘कानून अपना काम करेगा’ - यह कथन है के कानून मंत्री कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का। उनसे जब पूछा गया कि क्या भाजपा के मार्गदर्शक आडवाणी-जोशी की रक्षा के लिये पार्टी ने कोई खास रणनीति बनाई है ? उनका साफ जवाब था - ‘कानून अपना काम करेगा’।

अर्थात आडवाणी और जोशी को खुद की रक्षा के लिये अकेला छोड़ दिया गया है।

कल कुछ टीवी चैनलों के उत्साहित रिपोर्टरों ने यह खबर चलाई थी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमित शाह ने आडवाणी से खुद बात की थी, भाजपा नेतृत्व ने उसे गलत बताते हुए तत्काल रुकवा दिया।

‘खुल्लम-खुल्ला’ वाली उमा भारती से भी कह दिया गया है कि अपनी ऐसी सारी बयानबाजियों के लिये वह खुद जिम्मेदार होगी। जो कल तक अयोध्या जाने के लिये आकुल-व्याकुल थी, उन्हें रोक दिया गया है। विनय कटियार या साध्वी ऋतंभरा की तरह के नेताओं का तो मोदी-शाह गुट के लिये वैसे ही दो कौड़ी का दाम नहीं हैं। अब वे ज्यादा से ज्यादा आडवाणी-जोशी के घर पर स्यापा के लिये बैठने वाली दो-चार लोगों की मजलिस के सदस्य भर रह सकते हैं।

जो उमा भारती और ऋतंभरा दावा कर रही थी कि राम मंदिर की बदौलत ही भाजपा सत्ता में आई है, उन्हेें आईना दिखा दिया गया है।

यह भाजपा और आरएसएस के प्रत्येक नेता को मोदी-शाह के द्वारा दी गई खास चेतावनी है। मोदी-शाह के अलावा किसी अन्य के प्रति वहां कोई सहानुभूति नहीं चल सकती है।


बुधवार, 19 अप्रैल 2017

खुल्लम-खुल्ला !



सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उमा भारती ने सबके सामने अपनी जिस प्रकार की अति-प्रसन्न और आह्लादित तस्वीर पेश की, 'खुल्लम-खुल्ला' से व्यक्त होने वाली नंगई की बातों से जिस प्रकार उनकी बाँछे खिली जा रही थी - वह सचमुच एक अद्भुत दृ्श्य था ! इस गेरुआ धारी को ज़रा भी अहसास नहीं है कि अपने किसी भी अपराधी कृत्य के लिये इस प्रकार झूम उठना उनके कौन से आत्म-प्रकाश का रूप है ! 

वे सिर्फ इतना सा बयान करके मगन है कि उनके इसी कुकृत्य की वजह से वे आज सत्ता पर हैं । लेकिन वे भूल जाती है कि अयोध्या में किये गये इस जघन्य अपराध के बाद भारत में दंगों-फसादों का जो सिलसिला शुरू हुआ उनमें हज़ारों मासूमों की जाने गईं थी, न जाने कितने लोगों को उनके घरों से उजाड़ दिये गया था । मुंबई बम विस्फोटों से लेकर गोधरा-गुजरात के दंगों की आग आज भी कहीं न कहीं सुलग ही रही है । आज तक देश के विकास की सारी प्राथमिकताएँ पटरी से उतरी हुई हैं । 

इस नाचती-झूमती साध्वी को क्या इन गंभीर बातों का ज़रा सा भी बोध नहीं हैं ! ये आज मंत्री है और कह रही है, उन्हें अपने अपराधी कृत्यों पर गर्व है ! 

देश के ऐसे आत्म-मुग्ध, अपने अपराधों के लिये इतराने वाले कर्णधार कभी कुछ भी रचनात्मक कर सकते हैं, इसमें हमेशा संदेह रहेगा । सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उमा भारती का यह अशालीन व्यवहार ही उनसे मंत्री बने रहने के नैतिक अधिकार को छीन लेता है । 


पता नहीं, उन्हें अपने इस अशालीन व्यवहार की कोई क़ीमत चुकानी पड़ेगी, या आशंका के मुताबिक़ उल्टे उन्हें पुरस्कृत ही किया जायेगा ! 

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

पर्रीकर साहब को घबड़ाहट क्यों होती है !


-अरुण माहेश्वरी


सचमुच यह देख कर भारी हैरानी होती है कि कितनी आसानी से पूर्व प्रतिरक्षा मंत्री, अभी गोवा के मुख्यमंत्री, मनोहर पार्रीकर ने कह दिया कि वे प्रतिरक्षा मंत्रालय इसलिये छोड़ कर आ गयें क्योंकि कश्मीर की स्थिति बेकाबू हो गई थी !

दिमाग पर अगर हम थोड़ा सा जोर डालें, तो देख सकते हैं, कश्मीर के बारे में आरएसएस की नीतियों का अब तक का क्या इतिहास रहा है ! पर्रीकर ने प्रतिरक्षा मंत्री रहते, और उनके संकेतों पर भारतीय सेना ने बिल्कुल उन्हीं नीतियों पर अमल शुरू किया था जिनकी आरएसएस आज तक पैरवी करता रहा है। कश्मीर निवासियों की अस्मिता की सारी मांगों को, कश्मीर की सरकार की स्वायत्तता को फौजी बूटों के तले दबा कर रखो, उन्हें सर न उठाने दो, बल्कि कुचल डालो। अब तक की सभी सरकारों के द्वारा वस्तुतः मजाक बना दी गई धारा 370 को भी कश्मीरियों को अपमानित करने के एक मुद्दे की तरह जीवित रखने के लिये उसे खत्म करने की बात को दोहराते रहोे ; किसी भी प्रकार से कश्मीर घाटी की आबादी की संरचना को बदलो, इसके लिये बहाना कुछ भी क्यों न हो - पंडितों के पुनर्वासन के नाम पर हो या सैनिक आवासन के नाम पर ! सर्वोपरि, मुसलमानों को देश का दुश्मन मानो !

संघ के प्रचारक मोदी-पर्रीकर मंडली के दबावों में सेना ने पैलेट गनों का धड़ल्ले से प्रयोग शुरू करना शुरू कर दिया, सेनाध्यक्ष ईट का जवाब पत्थर से देने की भाषा में बात कर रहे हैं। प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से ऐसी आवासन नीतियों की चर्चा की जाने लगी, जिनसे किसी को भी आबादी की संरचना में बदलाव की दुरभिसंधि की गंध मिल सकती है।

दूसरी ओर, वहां पहले से मौजूद मुट्ठी भर पाकिस्तान-परस्तों का दल तो ऐसे हर मौके की ताक में लगा ही हुआ है। भारत सरकार के संदेहास्पद व्यवहारों से इन उग्रवादियों को आजादी-पसंद कश्मीरियों की पाँत में प्रवेश करने का और मौका मिला। और, आज पूरा कश्मीर उस स्थिति में पहुंच गया है कि खुद मनोहर पर्रीकर को अपने इस कर्तृत्व को देख कर घबड़ाहट होने लगी है!

मनमोहन सिंह के जमाने में अति धीरज के साथ इस समस्या में निहित सभी मुद्दों पर इससे जुड़े तमाम पक्षों से बातचीत का एक सिलसिला शुरू हुआ था। यहां तक कि सशस्त्र बलों के विशेषाधिकार से जुड़े, सबसे अधिक दुरुपयोग किये गये, अफस्पा जैसे कानून को भी विचार और सुधार का विषय बनाया जाना संभव हुआ था। आज वह सब बुरी तरह से पटरी से उतर चुका है। मुट्ठी भर कुछ सौ आतंकवादियों की संख्या में क्रमशः इजाफे के समाचार आने लगे हैं। हमारे सशस्त्र बलों के लिये कश्मीर क्रमशः किसी शत्रु क्षेत्र की तरह की जगह बनती दिखाई दे रही है।

और तभी, मनोहर पर्रीकर आश्चर्यजनक बेशर्मी के साथ पीठ दिखा कर भागने की बात कह रहे हैं !

इस सरकार की चरम विफलता की कीर्ति का दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण है नोटबंदी। इसके पीछे की विवेकहीनता पर अब तो संसद की स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट भी आ गई है। इसके सारे आर्थिक दुष्परिणाम क्रमशः सामने आने लगे हैं। लेखकों-बुद्धिजीवियों की हत्या से लेकर उन्हें धमकाने, बीफ के नाम पर मुसलमानों को हमले का निशाना बनाने से शुरू हुई इस सरकार की यात्रा में गोगुंडों के तांडव और कश्मीर में अपने देश के ही एक राज्य की जनता के साथ शत्रुओं की तरह का व्यवहार करते हुए इस सरकार के लगभग अढ़ाई साल बीत गये। इस दौरान अर्थनीति के क्षेत्र में योजना आयोग को भंग करके नीति आयोग बनाया गया लेकिन करने के लिये उसके पास कोई काम नहीं रहा। सड़कों के नामों की तरह ही कुछ पुरानी जन-कल्याण योजनाओं के नाम बदल दिये। और, सबसे बड़ा ढकोसला साबित हुआ स्वच्छ भारत अभियान। प्रधानमंत्री सहित ढेर सारे नामी-गिरामी लोगों की हाथ में झाड़ू लिये तस्वीरें प्रसारित करके इसे जनता की नैतिकता के मत्थे मढ़ दिया गया। इसके अलावा जिस चीज ने लोगों का ध्यान खींचा, वह थी शैलानियों की तरह प्रधानमंत्री की निरुद्देश्य विदेश यात्राएं । इन्हीं सबको लेकर टीवी के चैनलों पर शोर-शराबे में समय इतनी तेजी से बीता कि पता ही नहीं चला कि सरकार अपने उत्तरार्द्ध में प्रवेश कर चुकी है।



यही वह बिंदु था जहां से इस सरकार पर ‘कुछ तो करो’ का भूत चढ़ना शुरू हो गया। और उसी कुछ ‘कर गुजरने’ के उन्माद में मोदी जी ने 8 नवंबर को , जैसे किसी लंबी तंद्रा से हड़बड़ी में उठ कर, यकबयक 500 और 1000 रुपये के नोटों के चलन को रोक देने, अर्थात एक बार के लिये लगभग 87 प्रतिशत करेंसी को अचल कर देने की घोषणा कर दीं। खुद टेलिविजन पर आकर तमाम प्रकार की अशालीन मुद्राओं के साथ ऐलान किया कि अब आप सबकी जेब में ये जो बड़े नोट हैं, वे सब रद्दी के टुकड़े हो गये हैं। बाद में तो यहां तक कहा कि बड़े नोटों को बंद करके उन्होंने छोटे नोटों की, अर्थात बड़े लोगों की जगह छोटे लोगों की इज्जत बढ़ा दी है।

लेकिन असली त्राहि-त्राहि मची अति साधारण और गरीब लोगों के घर में। देश भर के सारे काम काज ठप हो गये और लगभग दो महीनों तक लगने लगा जैसे देश के लोगों के पास एक ही काम रह गया है - पुराने नोटों को नये नोटों में बदलने के लिये बैंकों के सामने धक्के खाने का काम। सवा सौ लोग तो नोट बदलने की लाइन में ही मर गये। और कितने लोग इससे पैदा होने वाले जीवन के दूसरे दुख कष्टों में मरे होंगे, इसका कोई हिसाब किताब नहीं हो सकता है। किसानों, मजदूरों, छोटे-छोटे फेरीवालों, खोमचा वालों और दुकानदारों के तो पैरों के नीचे जो थोड़ी सी ही जमीन थी, वह भी एक बार निकल गई।

इस भारी कसरत का कुल जमा परिणाम क्या निकला ? अर्थनीति के जानकार शुरू से ऐसे बेहूदा कदम के घातक परिणामों के बारे में जो कह रहे थे, आज वही शत-प्रतिशत सही साबित हो रहा है। न काला धन में कोई कमी आई, न उस पर किसी प्रकार की रोक लग पाई। न जाली नोटों का बाजार में आने का सिलसिला एक दिन के लिये भी रुका। हजारों मजदूरों के रोजगार चले गये, किसानों को उनकी फसलों के दाम नहीं मिले। घर-घर में स्यापा छाया रहा। यहां तक कि बाद के दिनों में कैशलेस और सफेद डिजिटल मनी का जो शोर मचाया गया, उसका भी गुब्बारा फूट गया है।

आज तक बाजार में नगदी की कमी बनी हुई है। बैंकों से नगदी उठाये जाने पर नाना प्रकार की सीमाओं और जुर्मानों की घोषणाएं की जा चुकी है। अर्थशास्त्री सही कह रहे हैं कि साधारण लोगों का पूरी बैंकिंग प्रणाली पर से जो विश्वास उठा है, उसके चलते अब लोग पहले से भी ज्यादा नगदी अपने घर में रखने पर यकीन करने लगेंगे। अर्थात, 8 नवंबर 2016 के पहले तक जितने रुपये के करेंसी नोट बाजार में थे, अब बाजार में उतने से भी काम नहीं चलेगा। बाजार में नगदी का संकट कायम रहेगा।

ऊपर से बैंकों में जमा हुई इतनी भारी मात्रा में राशि के बाद स्थिति यह है कि बैंकों से दिये जाने वाले कर्ज की मात्रा में वृद्धि के बजाय तेजी से गिरावट आ रही है। अक्तूबर 2016 से दिसंबर 2016 के बीच बैंकों के ऋण में 2.3 प्रतिशत की कमी आई है, जब कि पिछले साल के इसी काल में उसमें 2.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। 2015 के पूरे साल में बैंकों से कर्ज में 10.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, उसकी जगह 2016 के पूरे साल में यह वृद्धि सिर्फ 5.1 प्रतिशत रही, जिसका सबसे प्रमुख कारण तथाकथित नोटबंदी है। आज बैंकों के लिये एक बड़ी समस्या उसके पास जमा नगदी को सम्हालने की हो गई है। बैंकों में जमा राशि में 11.8 प्रतिशत की, कुल 108 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है।




कुल मिला कर, मोदी जी ने जो कहा था कि लबालब भरा हुआ बैंकों का खजाना अर्थ-व्यवस्था में वृद्धि में सहयोगी बनेगा, उसके बिल्कुल विपरीत यह बैंकों के ही गले की फांस बन गया है। जो प्रधानमंत्री जीडीपी के विकृत आंकड़ों का हवाला देकर हार्वर्ड वनाम हार्डवर्क की शेखी बघार रहे थे, उनके पास इस सवाल की कोई व्याख्या नहीं है कि क्यों औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के नहीं, शुद्ध गिरावट के आंकड़े अब आने लगे हैं ? अकेले इस फरवरी महीने में इसमें 1.2 प्रतिशत की गिरावट हुई है। बाजार से खरीदार गायब है। अर्थ-व्यवस्था पर मंदी छा रही है। विदेशी मुद्रा भंडार में भी तेजी से गिरावट आ रही है, लेकिन रिजर्व बैंक चुप है ।  इसमें हस्तक्षेप से करेंसी के पहले से बिगड़े हुए माहौल पर क्या असर पड़ेगा, इसका वह सही अनुमान नहीं लगा पा रहा है।

इस पूरी चर्चा का तात्पर्य सिर्फ यही है कि अपने कर्मों के चलते यदि आप किसी आर्थिक अघटन को आमंत्रित करते हैं, और फिर अचानक उससे पल्लू झाड़ कर रिजर्व बैंक या ऐसी ही किसी और संस्था को स्थिति को संभालने के लिये सौंप कर उस ओर ताकते तक नहीं हैं - यह शासन का कौन सा नजरिया है ? मनोहर पर्रीकर के साफ कथन से ही नहीं, आज अर्थ-व्यवस्था को लेकर मोदी जी के साफ तौर पर उदासीन आचरण से भी यही सवाल उठता है। अपनी करनी की चरम विफलता के समय बिल्कुल मासूमियत की नकाब को ओढ़ कर यह बताना कि आप नहीं जानते, ऐसा क्यों हुआ, या किसी अदृश्य दुश्मन के मत्थे सारे अघटन को मढ़ना, क्या अर्थ है ऐसी आरोपित मासूमियत का ?

दरअसल, मोदी जी और उनकी मंडली की समस्या उनकी राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा और उनके परिवेश की समस्या है, जिसके चलते उनके पास चयन के लिये कोई श्रेष्ठ रास्ता बचा नहीं रहता है। जाॅन मेनार्ड केन्स ने एक बार शेयर बाजार के आर्थिक सोच के बारे में टिप्पणी करते हुए उसकी तुलना उस घटिया प्रतिद्वंद्विता से की थी जिसमें आपको सुंदर स्त्रियों की ढेर सारी तस्वीरों में से सबसे संुदर स्त्री की तस्वीर चुनने के लिये नहीं, बल्कि ऐसी स्त्री की तस्वीर चुनने के लिये कहा जाएं जो औसत सुंदर स्त्री के सबसे करीब हो। अर्थात आपको औसत स्तर के मत को भी नहीं, बल्कि औसत मत भी किसे औसत मानता है, उसे चुनने की मजबूरी हो !

जाहिर है कि ऐसे में आदमी के चयन के लिये कुल मिला कर वहीं रह जाता है जो कुछ खास लोगों की पसंद का होता है। इसे ही कहते है अपनी खुद की बनाई परिस्थिति से बंधा हुआ स्वतंत्र आदमी ! मोदी जी और उनकी मंडली के लिये चयन का मार्ग उनके शाखाओं की बौद्धिकी के ज्ञान ने पहले ही बहुत सीमित और अवरुद्ध कर रखा है। जिन झूठों और बेतुकी बातों को वे प्रचारक के रूप में रटते रहे हैं, वे अब तो उनके परम ज्ञान और विश्वास का रूप ले चुके हैं, क्योंकि उनका मानना है कि उसी के बल पर तो उन्हें सत्ता हासिल हुई है। अपने झूठे विश्वासों की अकाट्यता का इससे बड़ा दूसरा और क्या प्रमाण होगा !

जाहिर है, इसी अज्ञान के भयावह परिणामों को आज पूरी अर्थ-व्यवस्था और राष्ट्र भुगतने के लिये मजबूर है। नोटबंदी को अमीरों पर चोट कहा गया, और कम्युनिस्टों से इसके समर्थन की उम्मीदें भी की गई। ऐसा भान किया गया जैसे संविधान के निदेशक सिद्धांतों में जिस समाजवाद का उल्लेख हैं, पहली बार उसकी मूल भावना पर अमल किया गया है। इसके अलावा, नोट बंदी को काला धन के शोधन की, अर्थात काला धन की अर्थ-व्यवस्था की जगह सफेद धन की अर्थ-व्यवस्था तैयार करने की मशीन बता कर विकसित पूंजीवादी देशों में प्लास्टिक मनि के प्रचलन वाला सपना भी खूब प्रचारित किया गया।

लेकिन वास्तविकता में देखा गया, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, इसका सबसे बुरा असर पड़ा गरीब किसानों पर। आज देश का पूरा ग्रामीण क्षेत्र एक साथ जैसे किसानों के क्रंदन के शोर से भर गया है। किसानों के इस सामूहिक रूदन की ध्वनियां सबसे तेज स्वरों में सुनाई दी थी उत्तर प्रदेश, पंजाब के पिछले विधान सभा चुनावों के वक्त। इसका परिणाम हुआ कि देखते ही देखते किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा इन चुनावों का एक प्रमुख मुद्दा बन गया। नोटबंदी के पचास दिनों की मियाद के खत्म होने के ठीक बाद, संसद के सत्र के अंत में जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से मिल कर किसानों की कर्ज-माफी की मांग की थी, प्रधानमंत्री चुप्पी साधे हुए थे। तब तक इस प्रकार की कर्ज माफी के कदम को अर्थनीति के लिहाज से एक अतार्किक कदम माना जा रहा था। लेकिन लगा चुनाव की झुलनी का धक्का, और बलम (प्रधानमंत्री) उसी अतार्किकता की गोद में चले गये। उत्तर प्रदेश के चुनाव में जिस बात को अपने घोषणा पत्र में नहीं कहा, उसे प्रधानमंत्री ने अपनी एक सभा में कह दिया कि अगर राज्य में भाजपा की सरकार बनती है तो कैबिनेट की पहली बैठक में ही किसानों का पूरा कर्ज माफ कर दिया जायेगा।

उधर पंजाब में भी सभी दलों ने इसी वादे को दोहराया। कांग्रेस ने कहा कि छः महीनों के अंदर वह किसानों का सारा कर्ज माफ कर देगी। आज तो यह मांग देश के सभी राज्यों में चुनावों का प्रमुख मुद्दा होगी।

इस प्रकार, अब अर्थनीति के सारे उसूलों को ताक पर रख कर सभी राज्यों के दिवालियापन के भारी जोखिम के रास्ते पर पूरे राष्ट्र को उतर जाना पड़ा हैं। स्टेट बैंक आफ इंडिया की अध्यक्षा अरुंधती भट्टाचार्य कहती रह गई कि इससे बैंकों के कर्ज को चुकाने की नैतिकता के अंत का जोखिम है। लेकिन इन्होंने क्रमशः पूरे समाज को एक ऐसे भंवर में डाल दिया है जब उसके सामने जोखिमों के चयन के अलावा कुछ शेष नहीं रह गया है। मजे की बात यह है कि चयन राजनीतिज्ञ करते हैं, बेहद संकीर्ण, तात्कलिक राजनीतिक स्वार्थों के लिये, लेकिन उसके जोखिम का बोझ बैंकों को, या दूसरे लोगों को उठाना पड़ रहा है।


यह जो कर्ता एक और भरता कोई दूसरा वाली स्थिति है, इसमें किसी से भी किसी चीज की जवाबदेही की कोई मजबूरी नहीं रह जाती है। केंद्र में बैठे नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का बोझ देश के सभी राज्यों की आर्थिक अवस्था पर डाल कर संघीय व्यवस्था में एक और तनाव और असंतुलन का बीजारोपण कर दिया गया है। यह एक ऐसी जोखिम भरी स्थिति है जिसमें फंस कर सिर्फ आपस में राजनीतिक ब्लैक मेलिंग की राजनीति की संभावनाएं बची रह जाती है। सकारात्मक कामों के लिये परस्पर सहयोग और सामंजस्य अथवा तर्क अर्थहीन हो जाता है।

जब देश की समस्याओं का पूरा आख्यान मुसलमान-विरोध और गोरक्षा पर टिका होगा, तो इसके समाधान के रास्ते वैसे ही कुत्सित और अतार्किक होंगे, जैसे यहूदी-विरोध और आर्य श्रेष्ठता पर टिके हिटलरी शासन के रास्ते थे। आज हम उसी के साक्षी है। जब जीवन की सामान्य गति में दुखदायी हस्तक्षेप किये जायेंगे तब आलम सभी प्रकार की विनाशकारी विचारधारात्मक प्रतिद्वंद्विता के लिये खुला खेल फर्रुखवादी वाला ही होगा। यह संकीर्णताओं और सामाजिक वैषम्य के लिये और उर्वर जमीन तैयार करने का खेल है। इससे कभी किसी सकारात्मक परिणाम को प्राप्त करने का सोच अदूरदर्शिता के अलावा और कुछ नहीं कहलायेगा।

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

तालिबानी राजनीति के प्रतिरोध की समस्याएं


-अरुण माहेश्वरी


“नाजीवाद एक ऐसी परिघटना है जिसकी कोई तार्किक व्याख्या मुमकिन नहीं है। ...आश्विच के सामने इतिहासकार की व्याख्या की ताकत बौनी नजर आती है।“ ( इयान करशॉ - द नाजी डिक्टेटरशिप : पर्सपेक्टिव आफ इंटरप्रिटेशन ; तीसरा संस्करण ; लंदन 1993)

नोटबंदी अर्थ-व्यवस्था पर क्या असर डालेगी, आर्थिक विषयों का जानकार हर व्यक्ति इसे जानता था। फिर भी, जहर को चख कर जब आपको उसका स्वाद जानने का भूत सवार हो, तो आपको मरने से कौन बचा सकता है। इसके अलावा कभी-कभी आदमी किसी के झांसे में आकर भी मरण-छलांग लगा लेता है। मसलन, ऐसे तथ्य भी सामने आए हैं कि मोदी जी ने नोटबंदी की तरह का कदम कुछ अमेरिकी सलाहकारों के कहने पर उठाया था। वे देखना चाहते थे कि किसी भी देश में इस प्रकार के एक उथल-पुथल मचाने वाले, सैद्धांतिक तौर पर आत्मघाती समझे जाने वाले कदम के वास्तविक सामाजिक परिणाम क्या हो सकते हैं। उन्हें मोदी जी की तरह का आर्थिक नीतियों के मामले में एक अबोध नेता मिल गया, जो भला-बुरा कुछ भी उटपटांग करके अपनी छाती पर बहादुरी का तमगा लगाने के लिये आतुर था। भारत को बली का बकरा बना दिया गया।

अब नोटबंदी के सारे परिणाम सामने आ रहे हैं। कुछ परिणाम तो उसी समय आगये थे जब बिना पूरी तैयारी के यह कदम उठाया गया था। बाजार में सिर्फ नगदी की कमी होने के कारण एक झटके में लाखों लोगों के रोजगार चले गये। मजदूर सिर्फ जिंदा रहने के लिये शहरों को छोड़ कर गांव चले गये थे। हजारों की संख्या में लघु और मंझोले उद्योग बंद हो गये। किसानों की साग-सब्जी जैसी फसल का कोई खरीदार न होने से उन्हें उनका कोई दाम ही नहीं मिल पाया। बुवाई के काम को भारी नुकसान हुआ। लोगों की शादियों तक में अकल्पनीय परेशानी हुई। लगभग पचास दिनों तक पूरी अर्थ-व्यवस्था ठप रही। आशंका के मुताबिक ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट आई। यूपी चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने आंकड़ों को कूतने की पद्धति बदल कर दिखाने की कोशिश की थी कि जीडीपी में बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आई है। लेकिन, जब निवेश के सभी आंकड़ों में गिरावट है, बैंकों से ऋण की मात्र घट रही है, विदेशी निवेश भी कम हो रहा है और आंखों के सामने बंद हो चुके कारखाने खुलने का नाम नहीं ले रहे हैं, तब किसी एक आंकड़े की हेरा-फेरी करके सामाजिक यथार्थ को झुठलाया नहीं जा सकता है।


हाल के रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि मोदी सरकार पहली ऐसी सरकार है जिसके तीन साल के शासन काल में भारत के निर्यात में 4.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसके पहले मनमोहन सिंह के नेतृत्व के दो काल 2004-2008 और 2009-2014 में क्रमशः 24.4 और 19.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल (1998-2004) में भी 14.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

यूपी चुनाव के बाद, वहां अवैध बूचड़खानों पर पाबंदी के नाम पर मांस के कारोबार को जिस प्रकार प्रभावित किया गया है, उसका न सिर्फ घरेलू बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, बल्कि बीफ के निर्यात के हजारों करोड़ का कारोबार मुसीबत में पड़ता दिखाई दे रहा है। अभी भाजपा सरकारों के बीच यह साबित करने की होड़ लगी हुई है कि कौन कितना बड़ा गो भक्त है। यूपी का मुख्यमंत्री मनुष्यों से ज्यादा गायों की सेवा के लिये अपनी आतुरता दिखा रहा है, तो गुजरात सरकार ने गोहत्या को मनुष्य की हत्या के समान अपराध घोषित कर दिया है। यह सब पशुपालन से जुड़ी कृषि अर्थ-व्यवस्था के हितों की पूरी तरह से अनदेखी करते हुए सिर्फ धार्मिक विश्वासों और उन्माद को हवा देने के लिये किया जा रहा है। पूरे देश में गोगुंडों की एक फौज तैयार हो गई है, जो किसी भी व्यक्ति को (खास तौर पर मुसलमान और दलितों को) गाय संबंधी किसी भी अपराध में शामिल बता कर उसे सता सकते हैं। यूपी में मांस के कारोबार से जुड़े लाखों लोगों के रोजगार पर खतरा पैदा हो गया है। मध्यप्रदेश और झारखंड के भी क्रमशः उसी दिशा में बढने के समाचार आ़ रहे हैं।

इसके साथ ही, भारत में हमेशा से एक अलग प्रकार का नैतिकतावादी राजनीतिक अभियान चलता रहा है शराबबंदी का। नशे का अपना एक समाजशास्त्र और मनोविज्ञान है। लंबे कालक्रम में खास तौर पर शराब का तो एक स्वतंत्र अर्थशास्त्र भी विकसित हो गया है। इसीलिये इसके बारे में एकतरफा निर्णय करना मुश्किल होता है। कह सकते हैं, राजनीतिक अर्थशास्त्र का यह एक गैर-अर्थशास्त्रीय विषय है। भारत में यह समाज सुधार आंदोलनों का भी हिस्सा बन गया है। अनुभव बताता है कि इस पर रोक की अब तक की हर कार्रवाई उतने ही बड़े पैमाने पर इसके गैर-कानूनी उत्पादन और कारोबार का कारण बन जाती है। गुजरात में, जहां काफी पहले से शराबबंदी है, रिपोर्टें बताती है कि वहां शराब की खपत में कोई कमी नहीं आई है। इधर बिहार में शराबबंदी और यूपी में मांसबंदी के बाद एक चुटकुला चल पड़ा है - बिहार में कबाब खाओ और यूपी में शराब पीओ। सुप्रीम कोर्ट ने भी सभी प्रकार के हाईवे के पांच सौ मीटर के दायरे में शराब की बिक्री पर पाबंदी लगा कर देश भर में इसके लाखों करोड़ों रुपये के कारोबार को अस्त-व्यस्त कर दिया है। शराब की दुकानों के अलावा लाखों की संख्या में हाईवे पर होटलों और रेस्टोरेंट बंद हो रहे हैं। इनमें सैकड़ों फाइव-स्टार होटल भी हैं। इन सबमें काम करने वाले लाखों लोगों के रोजगार का क्या होगा, कहना मुश्किल है !



ऊपर से, मोदी जी ने बड़े पूंजीपतियों को सस्ता कर्ज देने से बैंकों को होने वाले घाटों से बचाने के लिये आम लोगों की जमा राशि पर ब्याज की दरों को गिराना शुरू कर दिया है। सरकार की अपनी सभी लघु बचत योजनाओं, मसलन, ईपीएफ, पीपीएफ, किसान विकास पत्र आदि पर ब्याज की दर को गिराते हुए वहां तक पहुंचा दिया है, जहां वे पहले कभी नहीं थी। इससे आम लोगों में अपनी बचत से होने वाली कमाई पर भरोसा कम हो रहा है। कुल मिला कर अर्थनीति की कुत्ता खाए अंधा पीसे वाली दशा है।

इन सबका कुल जमा परिणाम यह है कि आमदनी में सुरक्षा के बारे में निश्चिंत न होने से आम आदमी अपनी नितांत जरूरी चीजों के अलावा एक भी पैसा खर्च करने से हिचकने लगा है। बाजार आज भी खाली दिखाई देते हैं। हर बीतते दिन के साथ अर्थ-व्यवस्था में मंदी ज्यादा से ज्यादा गहरी होती जा रही है।

बाजार में खरीदार नहीं होगा तो उद्योगपति भी किनके लिये मालों का उत्पादन करेंगे ? अर्थात आर्थिक विकास की संभावनाएं भी दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। बेरोजगारों को रोजगार अब मोदी का चुनावी जुमला भी नहीं रह गया है। इसके विपरीत नौजवानों को एंटी रोमिओ स्क्वैड, गोरक्षक और हिंदू सेना, हिंदू जागरण की तरह के मंचों पर अधिक से अधिक उतारा जा रहा है। आक्रामक हिंदू चेतना के उन्माद के नशे से एक बार के लिये जीवन की दूसरी समस्याओं की ओर से उन्हें उदासीन रखा जा रहा है। आज देश के हर छोटे-बड़े शहर में हिंदू जागरण के बड़े-बड़े आयोजन किये जा रहे हैं। तलवारे लहराते हुए नौजवान बड़े-बड़े प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैं। जहां भी चुनाव होने वाले होते हैं, संगठित तरीके से वहां पहले से सांप्रदायिक दंगे कराये जाते हैं ताकि चुनाव उस सांप्रदायिक उन्माद की भेंट चढ़ जाए। यूपी में पिछली सरकार के कार्यकाल में लगभग 700 सांप्रदायिक दंगे कराये गये। इसी साल गुजरात में चुनाव होने जा रहे हैं। वहां भी दंगों का सिलसिला शुरू हो गया है।

इसी 28 मार्च को अहमदाबाद से सिर्फ 120 किलोमीटर दूर उत्तरी गुजरात के मुस्लिम-बहुल वादावली गांव पर बगल के गांव से आए 5000 सशस्त्र लोगों ने हमला करके वहां के मुखिया इब्राहिम बेलिम की हत्या कर दी। दर्जनों घरों में आग लगा दी, बहुत से लोगों को जख्मी कर दिया। आशंका की जाती है कि आगामी दिसंबर महीने के पहले, जब गुजरात में विधान सभा के चुनाव होंगे, पूरे राज्य में इस प्रकार के कई दंगे कराये जायेंगे।
2018 के प्रारंभ में त्रिपुरा, नागालैंड, मेघालय, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश की विधान सभाओं के भी चुनाव होंगे। यूपी को गर्म रख के बाकी सभी राज्यों में खास प्रकार का सांप्रदायिक संदेश पहुंचाया जाएगा।

एक ओर आर्थिक क्षेत्र में चरम विफलता, उपलब्धि के नाम पर शून्य, बल्कि चौतरफा पतन और दूसरी ओर इस प्रकार का सांप्रदायिक हिंसा का माहौल। यह सब एक भारी दुष्चक्र का रूप लेता जा रहा है, जिसे यदि एक शब्द में व्याख्यायित किया जाए तो कह सकते हैं कि भारत में तालिबानी अर्थनीति के दिनों की शुरूआत हो गई है। वे दिन दूर नहीं जब एक दूसरे के खून के प्यासे एके-47 चमकाते लोगों के हुजूम एक सिरे से दूसरे सिरे तक दौड़ते-भागते दिखाई देंगे और पृष्ठभूमि में सिर्फ और सिर्फ भग्नावशेष होंगे। स्वच्छ भारत के शोर के पीछे सबसे सड़े हुए शहरों का देश, मेक इन इंडिया के नारों के पीछे बंद कल-कारखानों का देश, सबका साथ सबका विकास की बातों के पीछे सांप्रदायिक भेद-भाव, घृणा और नफरत का नंगा खेल !

अर्थ-व्यवस्था को जड़ बना देने का अर्थ है, उसे मृत घोषित कर देना और उसमें गिरावट का मतलब है इस लाश में सड़ांध का पैदा होना। सब चीजों का सड़ना, घर-घर में संकट, हवा में बारूद की गंध, गुंडों-माफिया गिरोहों के हाथ में देश के हर कोने का शासन, रंगदारी, दंगे और हर आदमी का सिर्फ और सिर्फ खून का प्यासा दिखाई देना - यही तो है तालिबानी राजनीति और अर्थनीति का सच। थोड़ा सा भी ध्यान से देखे तो पायेंगे कि इस सच के सारे लक्षण अब दिखाई देने लगे हैं। आज का सबसे डरावना सच यह है कि क्रमशः संवेदनशील आदमी प्रधानमंत्री मोदी और योगी की तरह के नेताओं में हरकत मात्र से डरने लगा है। आदमी में लाश के प्रति हमेशा एक प्रकार का डर का भाव होता है, लेकिन वह उससे भी ज्यादा तब आतंकित हो जाता है, जब वह लाश में अचानक कोई हरकत देखता है। लाश के क्रिया-कर्म के लिये तैयार हो चुके आदमी के लिये यह हरकत एक भारी खौफ की तरह की होती है और वह भूत-भूत कह कर भागने लगता है। अब क्रमशः हम उसी स्थिति की ओर जा रहे हैं। लोग मनाने लगे हैं कि ये मोदी-योगी कंपनी निश्चेष्ट लाश की भांति पड़ी रहे, तभी तक गनीमत है। इनमें हरकत के संकेत तो इनके लाश रूप से ज्यादा डरावने होंगे। नोटबंदी, मांसबंदी, गोगुंडों की बेहूदगी - इनके पास ऐसी भयावह चीजों के अलावा देने के लिये शायद कुछ नहीं है। वे ऐसी ही और कोई विपदा लाए, इससे अच्छा है, किसी आलसी अजगर की तरह जंगल के किसी खोह में चुपचाप बैठे रहे।


उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव परिणामों के बाद, अब जरूरी है कि फिर एक बार हम पूरे राष्ट्र की राजनीति की इस परिस्थिति के बारे में नये सिरे से विचार करें। हम देखें कि क्या अर्थ है इस बात का कि मोदी सरकार की तमाम विफलताओं और नोटबंदी की तरह के पूरी तरह से विवेकहीन कदम के बावजूद, जिसमें देश के तमाम गरीब किसानों और शहरों के अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों और मध्यमवर्गीय परिवारों को अकल्पनीय मुसीबतों का सामना करना पड़ा है, भारत में दक्षिणपंथ के प्रति जन-समर्थन में अब तक किसी खास गिरावट का संकेत नहीं मिल रहा है। यह सच है कि पंजाब में कांग्रेस के हाथों अकाली-भाजपा गठबंधन को भारी हार का मुंह देखना पड़ा। गोवा में भी शासक दल होने के बावजूद भाजपा हारी। मणिपुर में लंबे अर्से से कांग्रेस का शासन होने पर भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई।

लेकिन देश के हिंदी हृदय-केंद्र उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बिना किसी लहर के भाजपा की जो भारी जीत हुई है, वह किसी भी राजनीतिक पर्यवेक्षक के सामने कई नये सवाल खड़ा करती है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अलावा गोवा और मणिपुर में जिसप्रकार की नग्न बेशर्मी के साथ, पराजय के बावजूद, भाजपा के नेतृत्व की सरकारें बनाई गईं, उनसे भाजपा की राजनीति की दिशा का पूरा अनुमान किया जा सकता है। ऊपर से ईवीएम मशीनों की विश्वसनियता के बारे में, कि इनसे कभी भी छेड़-छाड़ की जा सकती है, जितने गंभीर सवाल उठे हैं, वे इस पूरे प्रसंग को और भी जटिल बना दे रहे हैं। जहां तक पंजाब का सवाल है, वहां कांग्रेस के बाद दूसरे स्थान पर जिस प्रकार आम आदमी पार्टी का उदय हुआ है, उसी से साफ है कि वहां जनता इतनी बड़ी संख्या में अकाली-भाजपा गठबंधन के विरुद्ध उतर पड़ी थी कि भाजपा के लिये कांग्रेस को सरकार बनाने से रोकना लगभग असंभव हो गया था।

कुल मिला कर, यह भारतीय राजनीति की कोई सामान्य स्थिति नहीं है। अगर हम दुनिया के इतिहास के तथ्यों की रोशनी में इस समूचे घटनाक्रम की थोड़ी सी भी गहराई में जाएं तो इस सचाई को देखने से चूक नहीं सकते हैं कि आज का भारत वास्तव में 1933-1945 (हिटलर के उत्थान और पतन के काल) के यूरोप की तरह के एक भयंकर राजनीतिक गृह युद्ध के दौर में प्रवेश कर चुका है। इसे किसी भी मायने में सामान्य राजनीतिक घटनाचक्र के उन मानदंडों से नहीं समझा जा सकता है जिनमें जनतांत्रिक मर्यादाओं के नाम पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आपस में कुछ ताल-मेल बैठा कर जनतांत्रिक राजनीतिक ताने-बाने को कायम रखा जा सकता है।

इसमें स्पष्ट तौर पर भारतीय राजनीति की दो परस्पर विरोधी धाराओं के बीच एक प्रकार के सीधे युद्ध के लक्षणों को देखा जा सकता है। 1933 के बाद के यूरोप में जैसे एक ओर 18वीं सदी के ज्ञान-प्रसार और रूस की समाजवादी क्रांति की ताकतें थी तो दूसरी ओर पश्चिमी सभ्यता के सारे मान-मूल्यों को पूरी बर्बरता से कुचल डालने के लिये तत्पर हिटलर, मुसोलिनी और जापान में तोजो की सरकारों सहित यूरोप के सभी देशों में दक्षिणपंथ का एक सामान्य उभार था। बिल्कुल उसी तर्ज पर हमारे यहां एक ओर आजादी की लड़ाई और उससे जुड़े जनतांत्रिक, धर्म-निरपेक्षता और सामाजिक न्याय के मूल्यों की ताकतें खड़ी है, जो यह मानती है कि इन मूल्यों के बिना देश की एकता और अखंडता तथा स्थिर विकास को जारी रखना संभव नहीं होगा। वहीं दूसरी ओर भाजपा के नेतृत्व में दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतें हैं जो अपने जन्म काल से आज तक आजादी की लड़ाई और उसके जनतांत्रिक, सामंतवाद-विरोधी मूल्यों के खिलाफ रही है और जो यह मानती है कि आक्रामक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिके उग्र राष्ट्रवाद और हिटलरी एकनायकत्व के केन्द्रीकृत शासन से ही भारत महान बन सकता है। आजादी को तो वे हिंदओं की पराजय मानते रहे हैं । एक ओर कांग्रेस, वामपंथी ताकतें और सामाजिक न्याय की ताकतें हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा, शिवसेना और दूसरी क्षेत्रीय संकीर्णतावाद पर टिकी ताकतें हैं। चुनाव आदि के मौकों पर उनके साथ सभी दलों के अवसरवादी भ्रष्ट तत्व भी जमा हो जाते हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के चुनावों के वक्त खुद मोदी जी ने बैठ कर देश के तमाम कोनों से अपने दक्ष राजनीतिक कार्यकर्ताओं की फौज को चुनाव को जीतने के काम में जिस प्रकार उतारा था, वह यह बताने के लिये काफी है कि सभी स्तरों पर एक प्रकार की सामरिक तैयारियों के साथ पूरे भारत में जनतंत्र को रौंद डालने और मोदी के नेतृत्व में एक दल का एकछत्र राज कायम करने का अभियान छेड़ दिया गया है। इसके अलावा, मोदी जी संसद का, खास तौर पर राज्य सभा का अपमान करने में जिस प्रकार की निष्ठुरता का परिचय दे रहे हैं, वह संसदीय जनतंत्र के प्रति उनके अंदर गहराई तक बैठे हुए तिरस्कार के भाव का प्रमाण है।




यूरोप में फासीवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चा और पॉपुलर फ्रंट का इतिहास हमें बताता है कि इस प्रकार के एक प्रकृत अर्थों में प्रभावशाली मोर्चे का रूप लेने में वहां 1931 से 1940 तक के लगभग दस साल लग गये थे। पूरे यूरोप में संसदीय जनतंत्र में दक्षिणपंथ के सामान्य उभार के साथ इटली में मुसोलिनी के फासीवादी और जर्मनी में हिटलर के नाजीवादी शासन के अनेक दर्दनाक अनुभवों, हिटलर के नेतृत्व में युद्ध के मैदान में हिटलर-मुसोलिनी-तोजो की धुरी के निर्माण और इस धुरी के द्वारा एक के बाद एक देश को रौंदते जाने के भयानक अनुभवों के बाद ही मित्र शक्तियों की सरकारों और जर्मनी सहित यूरोप के सभी देशों के प्रतिरोध आंदोलनों (Resistance Movements) का संयुक्त मोर्चा बन पाया था जिससे (1) इस धुरी की अग्रगति को रोकने के लिये दुनिया की सारी ताकतें युद्ध के मैदान में उतर पाई थी, (2) यूरोप के प्रत्येक देश में प्रतिरोध के संघर्ष की एक यथार्थवादी नीति तैयार हो पाई थी और (3) इस धुरी के खिलाफ लड़ाई में उतरी हुई सरकारें उस प्रतिरोध की नीति पर अमल के लिये जरूरी सभी प्रकार की सहायता मुहैय्या कराने के लिये तैयार हो पाई थी। जब दुनिया के लोगों को संयुक्त प्रतिरोध का यह त्रिमुखी हथियार, अर्थात त्रिशूल हासिल हुआ, तभी द्वितीय विश्वयुद्ध में फासीवाद-नाजीवाद की पराजय मुमकिन हुई थी।

यूरोप के फासीवाद-विरोधी इतिहास से यह भी पता चलता है कि बिहार के महागठबंधन की तरह यूरोप में जब सभी देशों में फासीवाद-विरोधी ताकतों के पॉपुलर फ्रंट के निर्माण की रणनीति अपनाई गई तब 1936 के फरवरी महीने में स्पेन में और इसी वर्ष के मई महीने में फ्रांस में पॉपुलर फ्रंट की नाटकीय जीते हुई थी। फिर भी, यह तथ्य है कि पॉपुलर फ्रंट बनने मात्र से इसमें शामिल रेडिकलों, कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों के जन-समर्थन में कोई बहुत बड़ी वृद्धि नहीं हुई थी और दक्षिणपंथियों का जन-समर्थन बहुत ज्यादा घटा नहीं था। यह तब था जब नाजीवाद और फासीवाद विरोधी ताकतों में आपस में जो विरोध थे, वे भी हिटलर के सत्ता में आने के बाद ज्यादा दिनों तक नहीं बचे थे। जो कम्युनिस्ट पार्टी जर्मनी में सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी की प्रबल विरोधी थी, उसने हिटलर के शासन के अठारह महीनों के अंदर ही आपसी मतभेदों को भुला कर विपक्ष की सभी ताकतों के व्यापकतम संयुक्त मोर्चे की रणनीति को अपना लिया था। उन्हीं दिनों दक्षिणपंथियों के उभार के खिलाफ फ्रांस के कम्युनिस्टों ने कैथोलिक चर्च से हाथ मिलाया था, तो ब्रिटेन के कम्युनिस्टों ने कट्टर वाम-विरोधी चर्चिल से मित्रता कर ली थी।

अर्थात सिर्फ पॉपुलर फ्रंट का बनना और विपक्ष के दलों की एकता मात्र ही इस लड़ाई में हिटलर के नेतृत्व की धुरी को, खास तौर पर दक्षिणपंथ के उभार को परास्त करने के लिये काफी नहीं था। इसीलिये 1939 में जर्मनी में हिटलर के युद्ध के अभियान को रोका नहीं जा सका था। यहां तक कि हिटलर के पोलैंड कूच के पहले तक ब्रिटेन और रूस, दोनों में ही कुछ भ्रम था कि शायद कूटनीतिक पहलकदमियों से किसी प्रकार से हिटलर को काबू में किया जा सकेगा। उन्होंने जर्मनी से ऐसी कुछ संधियां भी की थी । लेकिन बाद के घटनाक्रम से साफ होगया कि वह मुमकिन नहीं था।



जैसे हिटलर के नाजीवाद के साथ किसी का भी निबाह करना असंभव था, क्योंकि वह पूरी तरह से अविवेकपूर्ण और सीमाहीन सत्ता की लिप्सा पर टिका हुआ था, कमोबेस, उसी प्रकार, नाजीवाद के उन सारे लक्षणों को मोदी और आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में भी देखा जा सकता है। इसीलिये यदि हिटलर-मुसोलिनी का मुकाबला चालू ढर्रे की राजनीति के बल पर करना नामुमकिन था, तो पूरे दावे के साथ कहा जा सकता है कि मोदी और आरएसएस का मुकाबला भी चालू प्रकार की राजनीति से नहीं हो सकता है। अर्थात, इस प्रवृत्ति का मुकाबला सामान्य प्रकार की संसदीय राजनीतिक गतिविधियों से नहीं किया जा सकेगा। यह सच जितनी जल्दी सभी जनतांत्रिक राजनीतिक दलों की चिंता के केंद्र में आयेगा, उतना ही इस देश के लिये भला होगा। जैसे हिटलर मान-मनौवल की चीज नहीं था, आरएसएस और मोदी के साथ भी कुछ ऐसा ही मान कर चलना होगा। फासीवाद का मतलब ही था युद्ध। उसका मुकाबला सिर्फ कूटनीति से मुमकिन नहीं था। हिटलर ने यूरोप की उन सभी सरकारों के पैर के नीचे से जमीन निकाल ली थी, जो उसके खिलाफ युद्ध में नहीं जाने का भ्रम पाले हुए थे। चर्चिल फासिस्ट इटली के पक्ष में था, लेकिन मसला इटली का नहीं, हिटलर का था !

इस पूरे विषय में स्पेन के गृहयुद्ध (1936-39) के अनुभवों से भी कुछ सीखा जा सकता है। यूरोप के भूगोल में स्पेन फ्रांस की सीमा से लगा हुआ उसके दक्षिण-पश्चिम में पिरेनीस पर्वत श्रंखला की लंबी दीवार की वजह से एक प्रकार का कटा हुआ हिस्सा रहा है। जिस वजह से नेपोलियन की सेना स्पेन की ओर नहीं गई थी, उसी वजह से द्वितीय विश्वयुद्ध भी स्पेन की ओर नहीं बढ़ पाया था। लेकिन मजे की बात यह है कि राजनीति की हवा इस कटे हुए हिस्से में भी, ऊंची पर्वत-श्रंखलाओं को लांघ कर उसी प्रकार बह रही थी, जैसी रूस को छोड़ कर यूरोप के दूसरे हिस्सों में बह रही थी। दक्षिणपंथ का प्रसार यूरोप के अन्य देशों की तरह ही स्पेन में हुआ था और उसके खिलाफ संयुक्त प्रतिरोध की राजनीति भी वहां फ्रांस की तरह ही पहुंची थी। जनरल फ्रांसिस फ्रैंको दक्षिणपंथ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। 1936 में स्पेन में पॉपुलर फ्रंट की सरकार की जीत के बाद, दक्षिणपंथी उसे स्वीकारने के लिये तैयार नहीं थे और फ्रैंको के नेतृत्व में मैड्रिड पर सैनिक हमला कर दिया गया। स्पेन में इस दक्षिणपंथी विद्रोह का पूरे यूरोप से आए प्रगतिशील कलाकारों, बुद्धिजीवियों और जनतांत्रिक विचारों के लोगों ने मिल कर जम कर तीन साल तक सशस्त्र मुकाबला किया। इसी काल को स्पेन का गृहयुद्ध का काल कहा जाता है। हिटलर और मुसोलिनी की फौजों की विश्वयुद्ध में जीतों ने स्पेन के दक्षिणपंथियों में अतिरिक्त उत्साह पैदा किया और वे जनरल फ्रैंको के नेतृत्व में वहां के शासन को अपने हाथ में लेने में सफल हुए। लेकिन यह भी कहा जाता है कि 1939 में यदि विश्वयुद्ध की शुरूआत नहीं हुई होती और सामान्य ढंग से ही 1940 में स्पेन में चुनाव हुए होते तो कोई आश्चर्य नहीं है कि उस चुनाव में दक्षिणपंथी वहां विजयी हो गये होते ! स्पेन विश्वयुद्ध में शामिल नहीं हुआ लेकिन फासीवाद के साथ उसकी बराबर सहानुभूति बनी रही। विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद भी फ्रैंको 1975 तक स्पेन का शासक बना रहा।



यूरोप के दूसरे हिस्सों में युद्ध और स्पेन में गृहयुद्ध का यह खास घटनाक्रम फासीवाद के खिलाफ लड़ाई के सभी आयामों के प्रति एक समग्र दृष्टि प्रदान कर सकता है। आज की दुनिया और भारत के अपने राजनीतिक इतिहास में भले यह मुमकिन न लगे कि हिटलर की तरह मोदी की कोई सेना भारत के सभी राज्यों को सेना का प्रयोग करके कुचल डाले। सेना का बहुजातीय चरित्र भी ऐसा कभी नहीं होने दे सकता है। लेकिन बनारस में गुजरात के लोगों की एक पूरी प्रशिक्षित लोगों की फौज को उतार कर मोदी-शाह जिस प्रकार का खेल खेल रहे थे, उसमें ताकत के बल पर राज्यों को अपने अधीन लाने वाला एक तत्व निश्चित तौर पर शामिल है। और इसीलिये, राजनीति की लड़ाई में भारत की नाना राष्ट्रीय अस्मिताओं के प्रयोग की भी एक नई संभावना तैयार होती है।

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि मोदी-शाह-आरएसएस की तुरत-फुरत पूरे देश को अपने अधीन लाने की हमलावर योजनाओं को गंभीरता से देखना होगा और इसके प्रतिरोध के लिये उतनी ही साफ समझ से राजनीतिक और सांगठनिक तैयारियां करनी होगी। आने वाले प्रत्येक चुनावी संघर्ष को इसी व्यापक राजनीतिक, विचारधारात्मक और सांगठनिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। हर जगह, हर चुनाव में सभी मोदी-विरोधी ताकतों को अपनी पूरी शक्ति झोंक कर उन्हें मात देनी चाहिए। चुनावों में पराजित होने के बाद भी किसी भी प्रकार से अपनी सरकार कायम करने की उनकी साजिशों को विफल किया जाना चाहिए।
खास तौर पर, गुजरात के आगामी चुनाव में मोदी के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी, बसपा और अन्य सभी दलों के साथ ही वामपंथी दलों का एक व्यापकतम संयुक्त महागठबंधन कायम हो। जो भूल यूपी में हुई, और जो भूल अभी दिल्ली में भी दोहराई जा रही है, उसे गुजरात में दोहराना भारत में जनतंत्र मात्र के लिये बहुत महंगा साबित होगा।

मोदी सरकार की चरम विफलताओं से वह राजनीतिक जमीन तैयार हो रही है, जिसपर उसकी पराजय को सुनिश्चित किया जा सकता है। यूरोप में फासीवाद के खिलाफ लड़ाई के तमाम अनुभवों से सबक लेते हुए अभी से उस दिशा में सभी मोदी-विरोधी ताकतों को संयुक्त लड़ाई का एक नक्शा तैयार करने की जरूरत है।

अंत में मजाज का एक शेर कहना चाहूंगा –
 बहुत मुश्किल है दुनिया का संवरना
तेरी ज़ुल्फ़ों का पच-ओ-ख़म नहीं है ।