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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

मार्क्सवाद-लेनिनवाद के विज्ञान पर एक सोच

(लेनिन के 147 वें जन्मदिन पर खास)
-अरुण माहेश्वरी


आज रूस की नवंबर क्रांति के महान रूपाकार लेनिन का 147 वां जन्मदिन है। यही साल मानव समाज के लिये उनके सबसे बड़े कर्तृत्व, नवंबर क्रांति का शताब्दी वर्ष भी है। और भी गौर करने लायक बात है कि आगामी 5 मई को कार्ल मार्क्स के जन्मदिन पर हम मार्क्स के जन्म के द्वि-शताब्दी वर्ष में प्रवेश करेंगे।

नवंबर क्रांति के शताब्दी वर्ष के प्रारंभ में अपने एक लेख में हमने लिखा था कि जरूरत है इस पूरे साल दुनिया को हिला देने वाली इस दूरगामी प्रभाव की क्रांति पर गंभीरता से चर्चा कि्या जाए। किसी भी विषय का गहराई से अवलोकन स्वयं उस विषय के इस हद तक संस्कार, शोधन और परिमार्जन की भूमिका अदा करता है कि उससे बिल्कुल नये अर्थ स्फूट होने लगते है। यह कोई भाववाद नहीं है, यह भावों का भौतिकवाद है। बहुत पुरानी बात है कि मंत्र मनन से मंत्रित होता है।

तभी हमने यह भी लिखा था कि ‘‘हम नहीं मानते कि रूस में महान लेनिन के नेतृत्व में मार्क्सवाद के प्रयोग से जिस सामाजिक क्रांति का निरूपण हुआ उसके अब और नये-नये रूपों और अर्थों के विस्तार की संभावनाएं शेष हो गई हैं। अर्थात, नवंबर क्रांति के अब कोई अवशेष नहीं बचे हैं । रात गई बात गई । दुनिया बदल गई है, वह समय नहीं रहा और इसीलिये नवंबर क्रांति भी नहीं रही।”

मार्क्सवाद एक विज्ञान है। सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान। मार्क्स का यह एक अक्सर दोहराया जाने वाला कथन है कि मनुष्य अपने समाज का निर्माण स्वयं करता है, मगर दी हुई परिस्थिति में। अपनी पुस्तक ‘जर्मन विचारधारा’ में मार्क्स जब मनुष्य की चर्चा करते है, वे ‘एक सचमुच जीवित इंसान’ (a real living man) की बात करते हैं, चेतना संपन्न मनुष्य की।

‘मनुष्य अपने समाज का निर्माण  स्वयं करता है’, इसी समझ ने भौतिकवाद के तब तक के, आदिम जीवन से जुड़े भौतिकवाद से लेकर फायरबाख तक के दर्शनशास्त्रीय भौतिकवाद के नियतिवादी स्वरूप को बदल कर उसे द्वंद्वात्मकता के नये आधार पर स्थापित किया था। एक जमाने में भाववाद के खिलाफ फायरबाख के तीखे संघर्ष को अपने पर एक ऋण मानते हुए भी मार्क्स यह कहने से नहीं चूके थे कि उनके कोरे विश्वास भौतिकवादी नहीं बल्कि ‘असली भाववादी’ थे। वे लिखते है कि ‘फायरबाख का असली भाववाद उस समय प्रगट हो जाता है, जब हम उनके धर्म और आचार-नीति के दर्शन पर आते हैं।’’


इसकी तुलना में जिन हेगेल के विचारों को, जो सर के बल खड़ा था उन्होंने पैर के बल खड़ा किया, उसके बारे में वे कहते थे कि ‘‘राष्ट्र के बौद्धिक विकास पर इतना प्रचण्ड प्रभाव डालने वाली हेगेल के दर्शन जैसी महाकृति केवल नजरअन्दाज कर देने से ही खत्म नहीं की जा सकती थी। उसे तो ठीक उसके ही अर्थ में ‘गलत साबित’ करने की जरूरत थी, इस अर्थ में कि उसके रूप को तो आलोचना के जरिये समाप्त कर दिया जाता, पर उसके द्वारा उपलब्ध नयी अन्तर्वस्तु को बचा लिया जाता। ---हेगेलवादी पद्धति-विधि और अन्तर्वस्तु दोनों में - भाववादी ढंग से सिर के बल उलटा खड़ा भौतिकवाद प्रस्तुत करती है।’’

जाहिर है, इस प्रकार मार्क्स के जरिये मनुष्य के अस्तित्व और उसकी चेतना के परस्पर संबंधों के एक नये विज्ञान की स्थापना हुई थी। इसके साथ ही युक्त हुआ सामाजिक-आर्थिक विकास के इतिहास का मार्क्स का गहन अध्ययन, जिसे सामान्य तौर पर ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम से जाना जाता है। उन्होंने इस बात को गहराई से लक्षित किया कि मनुष्यों पर जीवन में धर्म, विज्ञान, राजनीति, और कला आदि तमाम पक्षों से जुड़ी जो इतनी विचारधाराएं लदी हुई है, उन सबके मूल में है मनुष्य द्वारा जीविका के तात्कालिक भौतिक साधनों का उत्पादन। इस समग्र विवेचन से ही यह मर्म की बात सामने आई कि मनुष्य की चेतना के सामाजिक स्वरूप के निरूपण में वर्ग संघर्ष वह उत्प्रेरक तत्व है जो किसी भी समाज के एक संपूर्ण रूपांतरण के संयोग का कारण बनता है। जब समाज के उत्पादन संबंधों में ऐसी परिस्थिति पैदा होती है, जिसमें उत्पादन में विकास का क्रम व्याहत होने लगता है, उत्पादक शक्तियों में शोषण और वंचना का भाव पैदा होने लगता है, तभी पुराने उत्पादन संबंधों पर टिका पूरा सामाजिक ताना-बाना जर्जर हो कर बिखरने लगता है और उत्पादन के नये संबंधों पर आधारित नये समाज के निर्माण का प्रारंभ होता है।


मार्क्स एक दार्शनिक, वैज्ञानिक के साथ ही सर्वोपरि क्रांतिकारी थे। दर्शन और इतिहास के अध्ययन के उनके इस निचोड़ ने ही सामाजिक क्रांति के एक नये विज्ञान की आधारशिला रखी जिसमें नियति के किसी दीर्घ क्रम पर परिस्थितियों को छोड़ने के बजाय सामाजिक समृद्धि और न्याय के लिये सचेत और संगठित सामूहिक प्रयत्नों के बारे में सुसंगत सिद्धांत और पद्धति के विकास का प्रयत्न निहित था।

पूंजीवाद के विकास के प्रारंभिक चरण में ही उससे प्रकट हो चुके लक्षणों के विश्लेषण के आधार पर मार्क्स ने ही पूंजीवाद की कोख से पैदा हुए मजदूर वर्ग के सर्वहारा रूप को, जिसके पास अपनी श्रम शक्ति के अलावा  जीविका का और कोई साधन नहीं होता, इस युग की एक सर्वप्रमुख क्रांतिकारी शक्ति के रूप में चिन्हित किया। पूंजीवादी उत्पादन की अपने वक्त की प्रणालियों के गहन विश्लेषण से उन्होंने इस वर्ग में संगठन, क्रांति और नव-निर्माण की सारी संभावनाएं देखी और समाज के इसी सचेत तबके को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी के गठन से एक क्रांतिकारी प्रक्रिया के बीच से स्वतंत्र और साम्यवादी समाज के निर्माण की पूरी परिकल्पना पेश की। साम्यवाद को उन्होंने बिल्कुल सही मानवता का भवितव्य, एक स्वतंत्र, समानतापूर्ण और न्यायपूर्ण समाज का आदर्श रूप बताया।


इस प्रकार, किसी भी विज्ञान के लिये जरूरी एक सिद्धांत, उस पर अमल के खास औजार और  अमल की विधि - इन तीनों की ही एक समग्र अवधारणा पेश करने की वजह से मार्क्सवाद को सामाजिक-ऐतिहासिक विकास का एक विज्ञान माना जाता है।

लेकिन, जैसा कि हर प्रामाणिक विज्ञान के क्षेत्र में यह एक मान्य सत्य है कि व्यवहार ही उसका परम तत्व नहीं हुआ करता है। बल्कि, व्यवहार विज्ञान के सिद्धांत के विस्तृत फलक पर एक खास क्षण भर होता है, संयोगों का क्षण, जब सिद्धांत का मर्म एक खास विचारधारात्मक स्वरूप (ज्ञान) अथवा व्यवहारिक स्वरूप (समस्या के निदान) का रूप ग्रहण कर लेता है। इस बात को आज भी लगातार प्रयोग के द्वारा प्रमाणित हो रहे आइंस्टाइन के सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में अच्छी तरह से समझा जा सकता है।

हमारे कहने का तात्पर्य यही है कि भले किसी सिद्धांत के अमल की विधि और उसके स्वरूप के विकास में कोई भी सफलता क्यों न मिल जाए, वह विधि और उसके परिणामों को तब तक किसी विज्ञान की मान्यता नहीं मिल सकती जब तक ठोस प्रमाणों के आधार पर मूलभूत सिद्धांत उसकी अनुमति नहीं देता। आज रूस की नवंबर क्रांति और उसके बाद उसकी 1991 के वक्त की परिणति पर भी यही बात लागू होती है। यह बात लेनिन पर लागू नहीं होती, क्रांति को उसके रास्ते पर ले जाने के क्रम में उनके द्वारा किये जाने वाले न जाने कितने प्रयोगों पर लागू नहीं होती। लेकिन परवर्ती काल में, जिन्होंने नवंबर क्रांति को किसी आधिभौतिक सत्य का रूप दे दिया, उन पर जरूर लागू होती है।

लेनिन के नेतृत्व में जब रूस की क्रांति हुई थी, वह दुनिया के इतिहास में अपने प्रकार का मार्क्सवाद का प्रथम प्रयोग था। पेरिस कम्यून तो सिर्फ ऐसी किसी संभावना की एक झलक भर था। लेनिन ने इस पर अमल के दौरान क्रांति की रक्षा के लिये ‘एक देश में समाजवाद’, ‘शांति के प्रश्न’ और क्रांति के फलीभूत होने के लिये ‘नयी आर्थिक नीति' (NEP) की तरह के जो लगातार प्रयोग किये, जिस प्रकार बोल्शेविक क्रांति के बाद के अपने लगभग छः साल के जीवन में वे एक के बाद एक व्यवहारिक सवालों से जूझते रहे, उन पर यदि कोई भी गहराई से ध्यान दें तो पता चलता है कि कैसे लेनिन ने मार्क्स के सामाजिक विकास के विज्ञान से ही निःसृत एक सामाजिक क्रांति के पूरे विज्ञान की आधारशिला रखी थी। हमारा मानना है कि आगे ऐसे न जाने कितने और प्रयोग, कितने स्तरों पर कितने रूपों में जारी रहेंगे, इसकी कोई पूरी कल्पना नहीं कर सकता है। लेकिन यह सच है कि इस क्रांति के परिणाम आज की पीढ़ी के जीवंत अनुभवों के अंग हैं। इन अनुभवों की महत्ता और इनकी भूमिका से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है। समाजवादी क्रांति और सामाजिक रूपांतरण की जितनी भी समस्याएं है लेनिन ने अपार धैर्य और गहरी सूझ-बूझ के साथ उनका सामना किया था। उनके विशाल साहित्य का पन्ना-पन्ना इसकी गवाही देता है।


मार्क्स ने खुद लिखा था कि “समाज - उसका रूप चाहे जो हो - क्या है ? वह मानवों की अन्योन्यक्रिया का फल है। क्या मनुष्य को समाज का जो भी रूप चाहे चुन लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है ? कदापि नहीं।...उत्पादन, वाणिज्य और उपभोग के विकास की कोई खास अवस्था ले लीजिए, तो आपको उसके अनुरूप ही सामाजिक गठन का रूप, परिवार का, सामाजिक श्रेणियों या वर्गों का संगठन भी, या एक शब्द में कहें तो नागरिक समाज भी मिलेगा। किसी खास नागरिक समाज को ले लीजिए तो आपको खास राजनीतिक व्यवस्था भी मिलेगी, जो नागरिक समाज की आधिकारिक अभिव्यक्ति मात्र है।”

मार्क्स इसके साथ ही यह भी कहते हैं कि “ मानव अपनी उत्पादन शक्तियों का - जो उसके पूरे इतिहास का आधार है - स्वाधीन विधाता नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक उत्पादक शक्ति अर्जित शक्ति होती है, भूतपूर्व कार्यकलाप की उपज होती है।”

इसीलिये, जो लोग नवंबर क्रांति को किसी उल्कापात की तरह स्वर्ग से अवतरित और फिर एक चमक दिखा कर अंतरीक्ष में ही गुम हो जाने के रूपक की तरह देखते हैं, वे ही उसे मनुष्य के सामाजिक विकास के इतिहास से पृथक मान कर उसके पूर्ण विलोप की तरह का विचार व्यक्त कर सकते हैं।

मानव समाज आज कृत्रिम बुद्धि द्वारा उत्पादन के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। सन् ‘91 के बाद एकध्रुवीय विश्व के पहले चरण में ही रोजगार-विहीन (job-less) विकास के सारे लक्षणों की पहचान कर ली गई थी। इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रतिफल के रूप में एक श्रीहीन (growth-less), वाणी-हीन, (voice-less) और निर्दयी (ruthless) परिस्थितियों की बातें भी स्पष्ट थीं। लेकिन अभी रोजगार-विहीनता का नहीं, बल्कि रोजगार-संकुचन का समय आ रहा है। बिल्कुल सही अनुमान किया जा रहा है कि आगामी एक दशक से भी कम समय में भारत में 69 प्रतिशत रोजगार कम हो जायेंगे। कमोबेस कुछ ऐसा ही हाल बाकी दुनिया का भी होगा।



इस सचाई को भांप कर ही विकसित देशों में आने वाले मानवीय अस्तित्व के संकट की परिस्थितियों से बचने के लिये राज्य की ओर से सभी नागरिकों के लिये एक न्यूनतम आमदनी को हर हाल में सुनिश्चित करने के नाना रूपों पर विचार शुरू हो गया है। हाल में स्विट्जरलैंड में ‘यूनिवर्सल बेसिक इन्कम’ की ऐसी स्कीम पर एक जनमतसंग्रह हो चुका है और फिनलैंड ने ऐसी एक योजना पर अमल की घोषणा भी कर दी है। इसके समानांतर ही, विचारों के स्तर पर, इस पूर्ण आटोमेशन के काल में पूर्ण आटोमेटेड आनंदमय कम्युनिस्ट समाज (Fully automated luxury communism) की कुछ हवाई किस्म की बातें भी की जा रही है।

मूल बात यह है कि हवाई हो या ठोस, मनुष्यों द्वारा अर्जित नई उत्पादन शक्तियों के अनुरूप मानव समाज के नये स्वरूपों के निरूपण को कोई रोक नहीं सकता है। और, नवंबर क्रांति और समाजवादी समाज इस निरूपण में हमेशा एक प्रकाश स्तंभ का काम करेंगे, इसमें कोई शक नहीं है।

शोषण की ताकतें इस नई परिस्थिति का इस्तेमाल राज्य को अधिक से अधिक दमन-मूलक बनाने के लिये करेगी। हमारे जैसे देश में बेरोजगारों की बढ़ती हुई फौज को गुंडों-बदमाशों (गोगुंडों) की फौज में बदलने की कोशिश आज भी जारी है और आगे भी जारी रहेगी। इससे दंगाइयों की, अन्ध-राष्ट्रवाद के नशे में चूर आत्म-घाती युद्धबाजों की फौज बनाई जायेगी। लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि यह हिटलर का, औद्योगिक पूंजीवाद के प्रथम चरण का जमाना नहीं है। यह मनुष्यों के आत्म-विखंडन से लेकर समान स्तर पर विखंडित, अकेले मनुष्यों की नई सामाजिकता का जमाना भी है। मार्क्स ने आन्नेनकोव के नाम अपने उसी पत्र में, जिससे हमने उपरोक्त उद्धरण लिया है, यह भी लिखा था कि “मानव का सामाजिक इतिहास उसके व्यक्तिगत विकास के इतिहास के अलावा और कुछ भी नहीं है - भले ही उसको इसकी चेतना हो या न हो।”

और, “ मनुष्य जो उपार्जित करता है उसे फिर कभी छोड़ता नहीं। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह उस सामाजिक रूप का भी परित्याग नहीं करता जिसमें उसने किन्हीं उत्पादक शक्तियों को प्राप्त किया है। इसके विपरीत, प्राप्त परिणाम से वंचित न होने, और सभ्यता के फलों को न गंवाने के लिए, मनुष्य उस क्षण से ही अपने सारे परंपरागत सामाजिक रूपों को बदलने को बाध्य होता है जब से उसके वाणिज्य के रूप का अर्जित उत्पादक शक्तियों के साथ सामंजस्य नहीं रह जाता।”

यह सच है कि मार्क्सवाद को यदि ठोस रूप में सामाजिक बदलाव की शक्ति के रूप में देखना है तो लेनिन के बिना उसकी शायद ही कोई तस्वीर बन पायेगी। ‘दर्शन की भूमिका दुनिया की व्याख्या भर करना नहीं, उसे बदलना है’ - मार्क्स का यह कथन मार्क्सवादी दर्शन के संदर्भ में सबसे पहले लेनिन के जरिये ही चरितार्थ हुआ था। आधुनिक समाज के अन्तर्विरोधों पर मार्क्स ने कहा था ‘पूंजीवादी निजी संपत्ति की घंटी बज चुकी है। संपत्तिहारकों का संपत्तिहरण हो रहा है’। मार्क्स के इस प्रसिद्ध कथन को जमीनी हकीकत का रूप देने का रास्ता लेनिन ने ही सबसे पहले दुनिया को दिखाया था।



कहना न होगा, नवंबर क्रांति की विद्रोही विरासत तबाह की जा रही उच्छिष्ट मानव-शक्ति को सामाजिक रूपांतरण की एक नई संगठित, सृजनात्मक शक्ति में बदलने का संदेश देती है। जीवन के सभी स्तरों पर मार्क्सवाद के प्रयोग की स्थितियों को समझते हुए उन्हें मूर्त करने में ही यह क्रांतिकारी विज्ञान चरितार्थ होता है। हर समाज में बनने वाले द्वंद्वात्मक संयोगों को मानव-मुक्तिकारी समाज व्यवस्थाओं में उतारना ही क्रांतिकारियों का काम है।

अंत में हम यही कहेंगे कि कम्युनिस्ट आंदोलन के इस कठिन दौर में यह जरूरी है कि लेनिन के साहित्य को फिर एक बार गहराई से पढ़ा जाए - उनसे कुछ आप्त वाक्यों को ढूंढ लाने के लिये नहीं, बल्कि खास-खास सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में सामाजिक रूपांतरण को संभव बनाने के लिये जरूरी यथार्थ बोध, वैचारिक निष्ठा और जीवन-संकल्प को, सच को समझने की अन्तरदृष्टि को हासिल करने के लिये। कम्युनिस्ट पार्टी की शायद ही ऐसी कोई समस्या होगी, जिसका सामना लेनिन ने न किया हो, और वह भले बीज रूप में ही क्यों न हो, लेनिन के साहित्य में मौजूद न हो।

हमारे देश में हमें अपने धर्म-निरपेक्ष और कल्याणकारी राज्य के संविधान की रक्षा की लड़ाई के जरिये पूरे समाज के हितार्थ मनुष्यों की इन अर्जित शक्तियों के प्रयोग को सुनिश्चित करना है। नवंबर क्रांति हमें अपने संविधान के सार-तत्व को पूरे ओज और विस्तार के साथ प्रकाशित करने वाली शक्तियों के निर्माण की प्रेरणा देती है। सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें इसे समाज की आत्म-विनाशकारी शक्ति में बदलना चाहती है। नवंबर क्रांति का संदेश विनाश के खिलाफ सृजन और न्याय के लिये दृढ़ प्रतिज्ञ संघर्ष का संदेश है।

लेनिन की 147वीं जयंती के मौके पर गहरी श्रद्धा और सम्मान के साथ हम उनका स्मरण करते हैं।