मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

'भयंकर रूप से घातक’


-अरुण माहेश्वरी

आज ‘लहक’ के कार्यालय में निर्भय देवयांश जी से मिलने गया था। काफी दिन हो गये थे उनसे ढंग से कोई बात किये। अंतिम मुलाकात ‘आलोचना के कब्रिस्तान से’ के लोकार्पण समारोह में हुई थी। उनसे जानना चाहता था कि उनकी पत्रिका पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया आ रही है। खास तौर पर उसके ताजा अंक में जितनी उत्तेजक सामग्रियां है, उस पर मैं स्वभाविक तौर पर बहुत ही तीखी प्रतिक्रियाओं का कयास लगा रहा था।
देवयांश जी ने बताया कि कुछ लोग तो बेहद उखड़े हुए हैं। उनका कहना था कि खास तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी पर मेरे लेख से तो कुछ की रीढ़ में सिहरन सी दौड़ गई है। एक आलोचक प्रवर का नाम लेकर उन्होंने बताया कि वे तो उसे ‘भयानक रूप से एक घातक लेख’ कह रहे थे। लोग सांसे थामे पढ़ रहे हैं, कुनमुना रहे हैं, चिढ़ रहे हैं, घुट भी रहे है, लेकिन अंत में गहरी उदासी से भी घिर जा रहे हैं।

मैं सोच रहा था, यह क्या हो रहा है ? चिढ़-घुटन-और उदासी सब साथ-साथ। क्या कहा जा सकता है इस खास प्रकार की विडंबना को ! ऐसी असहायता कि आदमी हाथ मलता रह जाए, कुछ समझ में न आए !

हमें यह मामला एडगर एलेन पो की बहुचर्चित अमेरिकी कहानी ‘‘The facts in the case of M. Valdamar” की तरह का लगने लगा। वशीकरण मंत्र को जानने वाला इसका कथाकार अपने मित्र वाल्दामार को ऐन उस वक्त वशीकृत कर लेता है जब वह अपनी अंतिम सांसें ले रहा होता है। वह देखना चाहता था कि इस वशीकरण का उस पर क्या असर पड़ता है। वशीकृत अवस्था में ही वह उसे सात महीनों के लिये छोड़ देता है। सात महीने बाद वह उसके पास जाकर कुछ पूछता है तो मर जाने की वजह से वाल्दामार का मूंह और जबड़ा तो जकड़ा हुआ था, लेकिन उसके कंठ से खरखराती हुई आवाज निकली - मैं मर गया हूं, मर गया हूं। जब वह एक ही बात को बार-बार कहता है तो कथाकार उसे जगाने की कोशिश करता है। और इस कोशिश के साथ ही वह देखता है कि वाल्दामार का पूरा शरीर सड़ कर गाढ़ी पीप में बदल जाता है।

जाहिर है कि अचानक एक शरीर के इस प्रकार सड़ी हुई पीप में बदल जाने से कोई भी दहशत में आ जायेगा !
‘हिंदी नवजागरण’ के वशीकरण मंत्र से जिन चंद मृत शरीरों को अब तक वशीकृत करके रखा गया है, अब जब आप उनसे सवाल करते हैं तो उनके अंदर से व्लादामार की तरह की ही छटपटाहट भरी आवाजें आती हैं।

महावीर प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि ‘अरे, मैं एक पत्रिका का संपादक, मुझे ‘नवजागरण’ की भारी चट्टान के नीचे दबा कर मार दिया गया है, मैं मृत हूं।’

ऐसे में उन्हें जगाने की कोशिश करने वालों के हाथ में शायद वाल्दामार की तरह की सड़ी हुई पीप ही रह जाती होगी ! इसीकी दहशत ने संभव है कुछ को संज्ञाशून्य कर दिया हो। ऐसे में ‘भयंकर रूप से घातक’ के अलावा उनकी दूसरी क्या प्रतिक्रिया हो सकती है !

(17.10.2016)

यहां मित्रों की सुविधा के लिये मैं महावीर प्रसाद द्विवेदी पर अपने इस लेख का लिंक भी दे रहा हूं, जिसे ‘लहक’ में छपने के बाद मैंने अपने ब्लाग पर लगा दिया था -

https://chaturdik.blogspot.in/2016/09/blog-post_43.html

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