रविवार, 16 जुलाई 2023

फासीवाद के कैंसर के खिलाफ संघर्ष में विपक्ष की बहुलतापूर्ण एकता और राहुल गांधी

 −अरुण माहेश्वरी 



कल से बंगलुरू में विपक्ष की दो दिनों की बैठक शुरू होगी । इस बैठक की राजनीतिक पृष्ठभूमि और अहमियत की हम दो दिन पहले ही चर्चा कर चुके हैं । (देखे − https://chaturdik.blogspot.com/2023/07/blog-post.html) 2024 का चुनाव भारत में जनतंत्र और फासीवाद, दोनों के लिए ही निर्णायक महत्व का चुनाव साबित हो सकता है । मोदी और भाजपा फासीवाद के दूत हैं तो उनके खिलाफ देश का समूचा विपक्ष जनतंत्र के पक्ष में लड़ रहा है । 

रोमन साम्राज्य के खिलाफ गुलामों के संघर्ष (स्पार्टकस) का इतिहास यह बताता है कि उस साम्राज्य में जितने ज्यादा गुलाम मालिक से विद्रोह करके भाग कर साम्राज्य के दूर-दराज के विभिन्न इलाकों में फैल गए थे, स्पार्टकस के संघर्ष का दायरा उतना ही विस्तृत होता चला गया था और उस विद्रोह में हर क्षेत्र की अपनी-अपनी विशिष्टताएं शामिल हो गई थी । विद्रोही गुलामों की टुकड़ियों का कोई एक चरित्र नहीं था । सिर्फ गुलामी से मुक्ति ही उन सब अलग-अलग टुकड़ियों को एक सूत्र में बांध रही थी । पर रोमन साम्राज्य की एक भारी-भरकम सेना के खिलाफ विद्रोही गुलामों की अपनी ख़ास प्रकार की इन अलग-अलग टुकड़ियों की विविधता ही उस पूरी लड़ाई को दुनिया से गुलामी प्रथा के अंत की एक व्यापक सामाजिक क्रांति का रूप देने में सफल हुई थी । संघर्ष का दायरा जितना विस्तृत और वैविध्यपूर्ण होता गया, रोमन साम्राज्य की केंद्रीभूत शक्ति उतनी कमजोर दिखाई देने लगी और साम्राज्य को अनेक बिंदुओं पर एक साथ चुनौती देने की विद्रोहियों की ताकत उसी अनुपात में बढ़ती चली गई । देखते-देखते निहत्थे गुलामों के सामने रोमन साम्राज्य के तहत सदियों से चली आ रही समाज व्यवस्था का वह विशाल, महाशक्तिशाली किला बालू के महल की तरह ढहता हुआ नजर आया ।

रोमन साम्राज्य में गुलामों के विद्रोह का यह गौरवशाली खास इतिहास इस बात का भी गवाह है कि संघर्ष की परिस्थितियां ही वास्तव में भविष्य की नई ताकतों के उभार की प्रक्रिया और उसके स्वरूप को तय करती है । हर उदीयमान निकाय का संघटन उसके घटनापूर्ण वर्तमान की गति-प्रकृति पर निर्भर करता है । 

कहना न होगा, आज हमारे यहाँ विपक्ष का वास्तविक स्वरूप भी शासक दल की चुनौतियों के वर्तमान रूप से ही तय हो रहा है । यह आज के हमारे समय की सच्चाई है कि बीजेपी को जितने ज़्यादा राज्यों में कड़ी से कड़ी टक्कर दी जा सकेगी, विपक्ष 2024 की लड़ाई में उतना ही अधिक शक्तिशाली और प्रभावी बन कर उभरेगा और दुनिया भर के संसाधनों से संपन्न बीजेपी उतनी ही लुंज-पुंज और उनका ‘विश्व नायक’ नरेन्द्र मोदी उतना ही एक विदूषक जैसा दिखाई देगा । 

जॉक लकान का गढ़ा हुआ एक शब्द है under erasure । हर निकाय समय की थपेड़ों के साथ अपने मौजूद स्वरूप को खोने के लिए मजबूर होता है । वह हमेशा एक रंदे के नीचे होता है । यह बात जहां किसी भी विकसित शरीर पर लागू होती है, तो वहीं गुणसूत्रों (क्रोमोजोम्स) के योग से विकसित हो रहे भ्रूण और नवजात शिशु के गठन पर भी लागू होती है । राजनीति में जहां हर संगठन का स्वरूप उसकी वैचारिकता और संगठन की परिस्थितियों से तय होता है, वहीं संगठन का वर्तमान स्वरूप भी उसकी वैचारिकता और सांगठनिक स्थिति को निर्धारित करता है । 2024 में भाजपा के खिलाफ विपक्ष का अंतिम समग्र स्वरूप भी कुछ इसी प्रक्रिया से निकल कर सामने आयेगा । हर राज्य की अपनी विशेषता, अलग-अलग दलों की वैचारिक और सांगठनिक शक्ति का सम्मिलित योग ही इसे कोई अंतिम रूप देगा । राजनीति का अर्थ ही होता है − बहुलता की संभावनाओं की साधना ।

राहुल गांधी का सवाल 



जहां तक इस पूरी प्रक्रिया में विचारधारा के पहलू की भूमिका का सवाल है, इसे खास तौर पर अकेले राहुल गांधी की व्यापक छवि में हो रहे तेज बदलाव के जरिए बहुत अच्छी तरह से समझा जा सकता है । वैसे इस लेखक ने तो 2014 के फरवरी महीने में ही अर्नब गोस्वामी के द्वारा राहुल गांधी के साक्षात्कार को देख कर अपने ब्लाग ‘चतुर्दिक’ पर लिखा था : 

“अर्नब गोस्वामी को दिये साक्षात्कार में राहुल गांधी का लगातार व्यवस्थागत प्रश्नों पर बल देना बहुत सुखदायी लगा । वे सत्ता के भूखे राजनीतिज्ञों से बिल्कुल विपरीत लगातार आम जन के सशक्तीकरण पर, महिलाओं, नौजवानों के हाथ मज़बूत करने पर बल देते रहे । उनकी बातचीत का मुहावरा आज के समय के बड़बड़ करते, चालाक-चतुर दिखने की होड़ में लगे नेताजी लोगों के बिल्कुल विपरीत था । उनकी तुलना में नरेंद्र मोदी आज की राजनीति के एक सबसे बदतर प्रतिनिधि दिखाई देते हैं ।

“एक बात और साफ़ दिखाई दी कि अर्नब की तरह के एक बड़बोले एंकर के उकसाने में न आना राहुल की सायास कोशिश नहीं थी, यही उसकी प्रकृति है ।

“सालों बाद, इस प्रकार के मूलभूत सवालों पर संकेंद्रित राजनीतिज्ञ को सुनना बहुतों को अटपटा लग सकता है । राजनीतिक विमर्श के नाम पर आरोपों-प्रत्यारोपों का हंगामा देखने की अभ्यस्त आँखों को इसमें सब कुछ सारहीन भी दिखाई दे सकता है । लेकिन भारत के मुट्ठी भर राजनीतिज्ञों ने राज्य की समूची शक्ति को हड़प कर जिस प्रकार के आततायियों का रूप ले लिया हैं,  इस परिस्थिति में सत्ता को सच्चे अर्थों में आम लोगों को सौंपने के सांस्थानिक परिवर्तनों की बात ही सबसे गंभीर राजनीति है । बाक़ी सब गर्जना-तर्जना पहले से ही अशक्त बना कर रख दिये गये भारत के मेहनतकशों को और निर्बल बनाने वाली अब तक चली आ रही राजनीति को आगे भी जारी रखने की बेशर्म कोशिशें हैं ।” (रविवार, 2 फ़रवरी 2014)

इस प्रकार, दस साल पहले ही राहुल गांधी ने अपने व्यक्तित्व के जो संकेत दिये थे, आज दस साल बाद, सोशल मीडिया के सारे बौद्धिक हलकों में उसे खुल कर स्वीकारा जाने लगा है । ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद तो, उम्मीद के अनुरूप ही, वे एक नई राजनीति की धुरी नज़र आने लगे हैं । नई राजनीति, अर्थात् कांग्रेस या विपक्ष की राजनीति की जानी-पहचानी हुई सूरत से एक बिल्कुल भिन्न राजनीति की धुरी ।

 


यह तो सब जानते हैं कि राहुल गांधी गांधी-नेहरू परिवार के वंशज और कांग्रेस दल के अभी सबसे बड़े नेता हैं। लेकिन आज वे अपनी उस मूल काया और भाषा से, जिसे उनका डीएनए माना जाता है, अर्थात् जो उनके खून में है, अलग उसकी सीमा का अतिक्रमण करते हुए एक बिल्कुल अलग प्रभाव पैदा करते हुए दिखाई देने लगे हैं । 

जब भी कोई व्यक्ति अपने शरीर और भाषा की सीमा के बाहर जाकर कोई प्रभाव पैदा कर पाता है, वास्तव अर्थों में तभी उसे अपना खास व्यक्तित्व मिलता है । व्यक्तित्व व्यक्तियों के ‘मैं’ या ‘हम’ के सर्वनामों में भी नहीं मिलता, बल्कि हमेशा उनके बाहर, अपवाद-स्वरूप होता है । भाषा में जब शब्द का अभिहित अर्थ उसकी संरचना से व्यक्त नहीं होता, बल्कि दूसरे ही संकेतों से व्यक्त होता है, तभी वह शब्द विशिष्ट और स्वतंत्र हुआ करता है । ‘जिसकी कोई जगह नहीं होती’ − इसी बात से उसकी संभावनापूर्ण स्थिति भी जाहिर होती है । जिसे अभी होना नहीं चाहिए था, वह अनायास ही जैसे लोकांतरण के नियम के अनुसार एक बहुरंगी परिदृश्य में अपने सत्य के साथ एक खास रंग में सामने आ जाता है । सत्य हमेशा विचारों के झुंड में किसी ब्लैक शीप की तरह होता है । उसे ही धारण करके व्यक्तित्व अपने को प्रभावी बनाता है, समग्र परिस्थिति के ताने-बाने में एक दरार और तनाव पैदा करता है। अन्यथा, सामान्य काया तो एक बेजान लाश ही होती है, निष्प्रभावी, निष्प्रयोजन । 

राहुल गांधी ने भारत में ‘नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान’ के नारे के साथ व्यापक जनता को लामबंद करने की जिस मुहिम का प्रारंभ किया, उसका सिर्फ हमारे देश तक सीमित स्थानीय महत्व नहीं है । सारी दुनिया में जातीय स्वायत्तता आदि की रक्षा के नाम पर आप्रवासियों और विधर्मियों इत्यादि ‘अन्यों’ के प्रति नफरत की धुर-दक्षिणपंथी राजनीति का अभी जो तूफान चल रहा है, उसमें यह मुहिम विश्व मानवता के सत्य को फिर से एक ठोस रूप में सामने लाने की तरह है । राजनीति की यह एक बुनियादी जरूरत होती है कि उसके इस मानवीय सत्य को परिस्थितियों की बहुलता के बीच बार-बार ठोस निकायी रूप में सामने लाया जाए । राहुल गांधी का संपूर्ण व्यक्तित्व भारत और विश्व की द्वंद्वात्मकता के बीच जैसे राजनीति की इसी जरूरत को पूरा कर रहा है । उन्होंने अपने को अभी भारत के प्रधानमंत्री की दौड़ से अलग करके विश्व के बहुत बड़े फलक में खड़ा कर दिया है । जैसे सन् ’47 में भारत की आजादी से दुनिया के अनौपनिवेशीकरण की प्रक्रिया का प्रारंभ हुआ था, वैसे ही भारत में फासीवाद की पराजय दुनिया भी सभी धुर-दक्षिणपंथी विचारधाराओं के अस्त का रास्ता खोलेगी । 

बीजेपी एक कैंसर है



इसमें कोई शक नहीं है भारतीय राजनीति के शरीर में बीजेपी कैंसर की कोशिका के मानिंद है । यह राजनीति मात्र के खिलाफ एक ऐसा विद्रोह है जो उसके अंत पर आमादा है । 

प्रसिद्ध लेखक और जाने-माने कैंसर विशेषज्ञ डा.सिद्धार्थ मुखर्जी अपनी अंतिम किताब ‘कोशिका का गीत’ (The song of the cell) में लिखते हैं कि “कोशिका जब शरीर से विद्रोह करती है तो शरीर मर जाता है । कैंसर की कोशिका की विशेषता है कि वह तेजी से विभाजित होती हुई पूरे शरीर में फैल जाती है । पर उसका इस प्रकार तेजी से बढ़ना उसका अपना करिश्मा नहीं होता है । वह हमेशा दूसरों की, बल्कि जो कोशिका जीवनदायी होती है और जिसमें अभिवृद्धि की क्षमता होती है, उसकी शक्ति को आत्मसात करते हुए ही बढ़ा करती है । इस प्रकार कैंसर का संक्रमण भी प्राकृतिक ढंग से ही हुआ करता है । कोशिका जिन जीन और प्रोटीन का प्रयोग उन ईंटों के निर्माण के लिए करती है जिनसे शरीर का गठन होता है, जीवन के शुरू में विकसित होता हुआ भ्रूण अपने विस्फोटक विस्तार के ईंधन के तौर पर उन्हीं जीन और प्रोटीन का इस्तेमाल किया करता है । कैंसर की कोशिका शरीर के विशाल क्षेत्र में फैलने के लिए जिन मार्गों का प्रयोग करती है वे उनके द्वारा ही शासित होते हैं जो शरीर में स्थित जीवनदायी कोशिका के अनियंत्रित विभाजन के मार्ग होते हैं । पर कैंसर की कोशिका के फैलाव को बढ़ाने वाला जीन सामान्य कोशिका के विभाजन की अनुमति देने वाले जीन का विरूपित संस्करण होता है । अर्थात्, कैंसर की कोशिका का रूप कोशिका का एक ऐसा जैविक रूप है जो शरीर में रोग के दर्पण में नजर आता है । इसीलिए डा. मुखर्जी कहते हैं कि कैंसर विशेषज्ञ मूलतः होता तो कोशिका का जीव विज्ञानी ही है, पर फर्क सिर्फ इतना है कि वह कोशिका के सामान्य जगत के बजाय उस जगत के एक दर्पण में प्रतिबिंबित उसके उलटे रूप को लेकर विचार किया करता है ।

बीजेपी की तरह की फासिस्ट ताकतें राजनीति के जगत में मौजूद सांप्रदायिक और तमाम प्रकार के विभाजनकारी, विरूपित जीन आदि के सहारे फैला करती हैं । 

अगर हम इसके इलाज पर विचार करें तो देखेंगे कि जैसे आज कैंसर के इलाज के लिए मोलिक्यूलर टारगेटेड थिरैपी के साथ ही शरीर की रोधक शक्ति के विकास के सूत्रों पर सबसे अधिक भरोसा किया जा रहा है, उसी प्रकार राजनीति के जगत के फासीवादी कैंसर के लिए भी एक  दोतरफा रणनीति की जरूरत है । 2024 के लिए न सिर्फ विपक्ष की, बल्कि सभी गैर-भाजपा दलों की एकता का जो महत्व है, उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है प्रेम के नारे के साथ ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की तरह का राहुल के नेतृत्व वाला व्यापक जन-आंदोलन का। इस पूरी लड़ाई में राहुल के प्रधानमंत्री बनने, न बनने का सवाल बिल्कुल गौण हो जाता है ।              



गुरुवार, 13 जुलाई 2023

बंगलुरू बैठक के संदर्भ में

-अरुण माहेश्वरी 



विपक्ष की बंगलुरू बैठक की पृष्ठभूमि में वर्तमान राजनीति की यह मूलभूत समझ है कि भारत में फासीवाद के उग्रतम रूप का ख़तरा साफ़ तौर पर मंडराने लगा है । 

अगर इतने सारे विपक्षी दलों के एक साथ मिलने के पीछे यह बुनियादी कारण नहीं है तो इस बैठक का सचमुच कोई राजनीतिक महत्व भी नहीं है । 

एक, दो या चंद नहीं, सचाई यह है कि आज भारतीय संघ की प्रत्येक पार्टी का अस्तित्व मात्र दांव पर है । इसमें भारत के राजनीतिक अथवा भौगोलिक नक़्शे के वैविध्य और विभाजन का भी कोई असर नहीं पड़ने वाला है । 

क्षत्रप अपने प्रभुत्व के सपनों में आज भी खोए रह सकते हैं और दक्षिण भारत के नेता उत्तर भारत के नेताओं से तथा पूरब के नेता पश्चिम से अपने भेद का भ्रम पाले रख सकते हैं, पर उनकी इन सारी खुशफहमियों के विपरीत एक एकात्मवादी, निरंकुश फ़ासिस्ट तानाशाही की स्थापना के लिए राजसत्ता के अंगों में जिस शक्ति और विस्तार की ज़रूरत है, बीजेपी-आरएसएस ने इसी बीच सभी स्तर पर इसके कारक तत्वों की ठोस सिनाख्त कर ली हैं और उसके निर्माण की पूरी रूप-रेखा उसके सामने साफ़ है । 

आज भी जो पार्टियाँ या नेताओं के समूह मोदी के संघीय शासन में अपने स्वतंत्र अस्तित्व के भ्रम को पाले हुए हैं, और इसके लिए भाजपा से नाना प्रकार से भाव-तौल भी कर रहे हैं, उनकी इस भ्रमासक्ति के लिए इसके सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता है कि ‘बकरे की माँ आख़िर कब तक खैर मनायेगी’। 

मसलन्, आंध्र प्रदेश के वाइएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी या तेलुगुदेशम के चंद्रबाबू नायडू, तेलंगाना के केसीआर, ओड़िसा के नवीन पटनायक, महाराष्ट्र के अजित पवार, एकनाथ शिंदे और कुछ हद तक आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, यूपी के अखिलेश यादव और मायावती तथा पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी को भी लिया जा सकता है । इनमें से किसी को भी अगर अपने पर यह भरोसा है कि वे अकेले अपनी ताक़त के बल पर 2024 में जीत कर अपने अस्तित्व को बचाये रख पायेंगे, तो यह कसाई से रहम की उम्मीद करने जैसा उनका मतिभ्रम ही कहलायेगा । 

2024 में मोदी की सत्ता पर फिर से वापसी का अर्थ होगा भारत के संविधान को ताक पर रख देना, धर्म-आधारित तानाशाही राज्य की स्थापना, जनतांत्रिक और नागरिक अधिकारों का अंत, संवैधानिक और जनतांत्रिक संस्थाओं की समाप्ति और विपक्ष के प्रत्येक दल और नेता का घनघोर दमन । 

भारत की आज़ादी से हमारे देश के लोगों ने न्याय और समानता के जो भी अधिकार अर्जित किये हैं, वे सब एक-एक कर छीन लिए जायेंगे । 

न सिर्फ़ दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण का अंत होगा, मज़दूरों के अधिकारों और किसानों की माँगों का खुला दमन होगा, बल्कि देश की एकता और अखंडता तथा लोगों के बीच का भाईचारा भी भारी ख़तरे में पड़ जायेगा । 

मोदी की अमेरिका यात्रा के वक्त पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने भारतीय समाज के तनावों के अपने चरम तक पहुँच जाने की जो चेतावनी दी थी, वह सौ प्रतिशत सही साबित होगी । 

बीजेपी के ही नेतृत्व में देश को टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित करने वाली नाना प्रकार की ताक़तें देश के कोने-कोने में पूरी तरह से सक्रिय नज़र आने लगेगी और उन ताक़तों के हवाले से ही केंद्रीय सत्ता का दमनचक्र हर बीतते दिन के साथ अपने चरम की ओर बढ़ता चला जायेगा । 

राजसत्ता का चरम राक्षसी रूप सामने आने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी । 

नोटबंदी की तरह का सत्ता का पागलपन ख़तरनाक जन-हत्यारों की ख़ूँख़ार सत्ता के बिल्कुल नए रूप में दिखाई देगा । 

आज जो ऊपर से नज़र आता है, उसमें ऐसा गुणात्मक परिवर्तन होगा कि उसकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती है । 

एक फ़ासिस्ट तानाशाह के दमनचक्र पर तालियाँ पीटने वालों की भी कोई कमी नहीं रहेगी । 

ज़ाहिर है कि अभी सत्ता के लिए विपक्ष की चुनौतियां जितनी बढ़ेगी, उसी अनुपात में संघी फासीवाद की पैंतरेबाज़ी और ख़ूँख़ार गतिविधियाँ भी बढ़ती जाएगी । 

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि अभी से परिस्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि 2024 का चुनाव हमारे देश में जनतंत्र और फासीवाद, दोनों के लिए ही जीवन-मृत्यु का प्रश्न बन गया है । 

बंगलुरू बैठक में हर दल को इस मौक़े की गंभीरता और नाजुकता के अहसास का परिचय देना होगा । 

यहाँ तक कि जो तमाम दल अभी मोदी के तथाकथित एनडीए में शामिल होने की जुगत में हैं, उनसे भी संवाद क़ायम करके उन तक परिस्थिति की इस गंभीरता को प्रेषित करने की ज़रूरत है । 

फासीवाद के विरूद्ध जनतंत्र की रक्षा के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता ही जनतंत्र और जीवन के अधिकारों की रक्षा के प्रश्नों के प्रति आम जन को भी गंभीर बना सकती है । 


शनिवार, 17 जून 2023

पार्टी के सिपाही बाबू और उनकी विरासत

(पिता को याद करने के इस दिन पर हम सालों पहले लिखे गए अपने एक लेख को मामूली सुधारों के साथ यहां दे रहे हैं । यह लेख पिता रमन माहेश्वरी के बारे में हमारी बड़ी बहन दुर्गा डागा के द्वारा संपादित पुस्तक ‘धारा के विरुद्ध’ में प्रकाशित हुआ था )   

− अरुण माहेश्वरी



बात सन् 62 की है। लोकसभा के लिये आम चुनावों के साथ ही पश्चिम बंगाल की विधान सभा के चुनाव थे। कोलकाता उत्तर-पश्चिम सीट से कांग्रेस के अशोक सेन के खिलाफ सीपीआई के स्नेहांशुकांत आचार्य तथा बड़ाबाजार विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दक्काक उम्मीदवार ईश्वरदास जालान के खिलाफ सीपीआई के किशन लाल माखरिया मैदान में उतारे गये थे। तब मेरी उम्र बमुश्किल 11 वर्ष थी। हम बड़ाबाजार क्षेत्र में ही पाटनी हाउस में रहते थे। पांच मंजिलों का दो चौक वाला विशाल मकान था। शाम का वक्त था। हमेशा की तरह हम मकान की छत पर खेल रहे थे कि अचानक नीचे सड़क पर लाल झंडों का एक चुनावी जुलूस निकला। हमारे एक मित्र ने चिल्ला कर कहा, अरे, लल्लू के बाबू जुलूस में जा रहे है। झांक कर जब नीचे देखा तो पाया कि हां, तेजी से गुजरते उस जुलूस में एक हाथ में अखबार लिये, कुहनी तक लपेटी हुई पूरी बाह की सफेद कमीज और काली पैंट पहने हाथ के अखबार को लहराते हुए हमारे पिता जुलूस के बिल्कुल आगे अपनी बुलंद आवाज में जोर-जोर से नारे देते हुए जा रहे थे। और, तभी पता चला कि हमारे पिता कम्युनिस्ट है। 

‘62 का जमाना था। वैसे ही हवा में कम्युनिस्टों के प्रति नफरत का धुआं फैला हुआ था। ऊपर से बड़ाबाजार की एक बड़ी बाड़ी का खास माहौल, जहां कम्युनिस्ट होना तो दूर की बात, किसी भी राजनीतिक जुलूस में शामिल होना तक अनुचित माना जाता था। ऐसे में बाबू को कम्युनिस्टों की कतार में देख कर हमारे जैसे बच्चे अचंभित और शर्मसार होने के अलावा और कुछ महसूस नहीं कर सकते थे। तभी से मन के गहरे कोने में जुलूस में शामिल अखबार लहराते बाबू का दृश्य हमेशा के लिये अंकित होकर रह गया। 

आज भी बाबू के व्यक्तित्व पर सोचते वक्त उनकी वहीं छवि सबसे पहले मस्तिष्क में उबर कर आती है। उसके बाद तो एक लंबे अर्से तक पूरी तरह मूक रह कर घर में बाबू की गतिविधियों, उनकी मित्र मंडलियों, साहित्यिक गोष्ठियों और राजनीतिक बहस-मुबाहिसों को तकता रहा, और पता नहीं कब खुद मार्क्स, एंगेल्स, माओ से लेकर राहुल, मुक्तिबोध की किताबों को टटोलने लगा कि अभी उच्च माध्यमिक परीक्षा भी पास नहीं किया था, लेकिन माओ का गोरिल्ला युद्ध मेरी दिमागी चर्चा का हिस्सा बन गया था। जाहिर है कि एक समय में सड़क के जिस औचक दृश्य ने बड़ाबाजार की बाड़ियों के साधारण परिवेश में अचकचा दिया था, वही दृश्य घर के परिवेश से अभिन्न होकर आगे हमारे संस्कारों में रचने-बसने लगा। 

हम नहीं जानते थे कि बाबू ने क्या पढ़ाई की थी, लेकिन इतना जरूर जानते थे कि वे मकान के अन्य लोगों की तुलना में कुछ अलग, परिष्कृत और प्रांजल हिंदी बोला करते थे। उनके मित्र भी कुछ वैसे ही थे। सबसे करीबी थे शंकर माहेश्वरी। नाजुक बदन के नाजुक मिजाज आपाद-मस्तक कवि। प्रसादजी के भक्त और छायावादी कविता में गहरे तक पैठे हुए। झूम-झूम कर सुरीले गले से अपने गीत गाया करते थे। निराला जी किस ओज के साथ काव्यपाठ किया करते थे, कामायनी के एक-एक सर्ग से कैसे गहरे दार्शनिक संकेत मिलते हैं, मुक्तिबोध की षंकाओं में कितना दम है और दिनकर की उवर्षी पर तब चली बहस की गूंज-अनुगूंज बाबू की मित्र मंडली की गोष्ठी में तभी सुनने को मिली थी। लगभग हर रविवार को वे हमारे यहां जुटा करते थे। इसी मित्र-मंडली के एक अंशीदार थे जमनालाल दम्माणी, आनंदबाजार पत्रिका के परम भक्त और एक कट्टर नास्तिक। बाबू की भारी और बुलंद आवाज भी बहस-मुबाहिसे में जमनालाल जी की आवाज को नहीं दबा सकती थी। दास वृत्ति उन्हें कत्तई स्वीकार्य नहीं थी, इसीलिये सचेत रूप में उन्होंने अपना नाम जमनादास नहीं, जमना लाल किया था। एक और, कुछ अपनी ही पीनक में रहने वाले कवि मित्र थे एस नारायण। इनके अतिरिक्त यदा-कदा उपस्थित होने वाले हिंदी के एक प्रोफेसर प्रकाश शंकर चतुर्वेदी थे। एक थे काफी रईस तबियत के दिखने वाले, हमेशा पान चबाते होठों को सदा लाल किये रखते मृदु भाषी आशाराम जी, और जब कलकत्ते में होते तो हरीशजी भी इन गोष्ठियों में शामिल रहते। बाबू, शंकर माहेश्वरी, जमनालाल दम्माणी, एस नारायण और आशारामजी - ये सभी छोटे-मोटे व्यवसाय से जुड़े हुए लोग थे, लेकिन अपने घर में इन्हें कभी व्यवसाय की बातें करते हमने नहीं देखा। इन मित्रों ने आपस में मिल कर भी कभी कोई व्यवसाय नहीं किया। साथ मिल कर यदि कोई काम किया तो वह ‘जुही कुंज’ के नाम से एक प्रकाशन संस्थान खोला जो शंकर माहेश्वरी के कविता संकलन ‘कणिका’, प्रकाश शंकर चतुर्वेदी के उपन्यास ‘उड़ते पत्ते’ और हरीश भादानी की कविताओं के संकलन ‘सपन की गली’ के प्रकाशन के बाद ही बंद होगया। एस नारायण के कविता संकलन ‘कटाक्ष की उड़न किश्त’ के प्रकाशन का ऐलान जरूर किया गया था, लेकिन शायद वह कभी प्रकाशित नहीं हो सका। बाबू की इस मित्र-मंडली के साथ ही एक और नाम को जोड़ना चाहूंगा - देवकिशन बिन्नानी का। एक प्रसिद्ध प्रैस के मालिक देवकिशन जी ही बाबू की मित्र-मंडली में तब सबसे सफल व्यवसायी हुआ करते थे।  कहने का अर्थ है कि ये ही वे लोग थे जिन्हें हमने बाबू के सबसे प्रारंभिक मित्रों के रूप में पाया और अंतिम समय तक उनके जीवन में इन सबका स्थान कुछ हद तक बना रहा। अब ये सबं चल बसे हैं। ये सभी हमेशा हमारे पूरे परिवार के गहरे सम्मान और श्रद्धा के पात्र बने रहे ।

देखते ही देखते, बाबू अपने इन मित्रों की तुलना में राजनीति की ओर कहीं ज्यादा प्रवृत्त होगये और बाबू के साथ जिन चंद नये चेहरों को देखा जाने लगा उनमें थे धनराज दफ्तरी, पन्नालाल नाहटा, रामलाल दूगड़। ये सभी कम्युनिस्ट थे। मृदुभाषी धनराज दफ्तरी, विदेशी किताबों के व्यवसायी, पढ़े-लिखे मार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे। पन्नालाल नाहटा भी छोटे व्यवसायी ही थे लेकिन असाधारण वक्ता और कवि थे। इनमें रामलाल दूगड़ लंबे-चौड़े डीलडौल वाले अलमस्त, थोड़े अक्खड़, बड़ाबाजार की एक प्रसिद्ध कोठी, पारख कोठी के मैनेजर थे। इन तीनों कामरेडों के साथ ही जुड़ा हुआ एक और नाम था अतुल दत्ता, किसी समय कोलकाता के थोक व्यापार के केंद्र बागड़ी मार्केट में एक अंग्रेजी दवाओं की थोक दुकान के मालिक, लेकिन तब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की बड़ाबाजार लोकल कमेटी के पूरावक्ती सचिव। यह सन् 64-65 का जमाना रहा होगा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को भारी सरकारी दमन का सामना करना पड़ रहा था। ‘चीन के दलाल’ का लेबल अभी उतरा ही नहीं था कि ‘65 में उसे पाकिस्तान का दलाल भी घोषित कर दिया गया। देश में तब आपातकाल चल रहा था और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सभी नेताओं की धर-पकड़ की जा रही थी। बीटीआर की तरह के कुछ नेताओं को, जिन्हें चीन युद्ध के समय गिरफ्तार किया गया, तब तक छोड़ा भी नहीं गया था। एक समय ऐसा आया जब पार्टी की प्रांतीय कमेटी का पूरा नेतृत्व ही जेल की सींखचों के पीछे था। उस समय पार्टी के नेतृत्व में चलाया जा रहा खाद्य आंदोलन अपने शिखर पर था। तभी पार्टी के प्रांतीय नेतृत्व की दूसरी पंक्ति के पियूष दाशगुप्ता और गणेश घोष सरीखे नेताओं ने एक वैकल्पिक प्रांतीय कमेटी का गठन करके आंदोलन की कमान संभाली और उन तूफानी दिनों में पाटनी हाउस का हमारा घर ही इन नेताओं की गोपनीय गतिविधियों का एक प्रमुख अड्डा हुआ करता था। उसी ऐतिहासिक खाद्य आंदोलन की पृष्ठभूमि में सन् 67 का चुनाव हुआ और पहली बार कांग्रेस की पराजय तथा संयुक्त मोर्चा सरकारों के गठन के साथ ही कृषि तथा औद्योगिक, दोनों क्षेत्रों में जन-आंदोलनों का एक बिल्कुल नया ज्वार दिखाई दिया। लगभग इसी समय से राजनीति हमारी नसों में भी पूरी तरह बसने लगी थी। हम खुद स्वयंसेवकों के उन जत्थों में शामिल थे, जिनके बारे में नारा दिया गया था कि ‘आजकेर स्वेच्छासेवकई होबे कालकेर मुक्तिवाहिनी’। हमारी दुकान पर भी अब अक्सर अतुल दत्ता और बड़ाबाजार के सुकुमार सेन की तरह के नेता दिखाई देने लगे थे। बाबू के समूचे साहित्यिक, सांस्कृतिक सोच के केंद्र में राजनीति ने अपना प्रमुख स्थान बना लिया। बाबू कथित रूप में डीक्लास तो कभी नहीं हो पाये, लेकिन विचारों और व्यवहार में उत्कट नास्तिकता के साथ ही ‘वर्गीय घृणा’ के लक्षणों के संकेत देने लगे थे। उनके मित्रों में कोई और व्यवसायी मित्र शामिल नहीं हो पाया । परिवार के अन्य जनों और व्यापक रूप में समाज से ही वे कटते चले गए । बाबू के नये साहित्यिक मित्रों में इसराइल, विमल वर्मा और श्री हर्ष शामिल हो गये। हरीश जी तो सदा से थे ही। नामवर सिंह को भी उन्हीं दिनों हमने अपने घर पर देखा था। 


इसराइल साहब एक अच्छे कहानीकार और पार्टी के हिंदी साप्ताहिक मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ के पूरावक्ती कार्यकर्ता थे। गप करने में उनकी सानी नहीं थी। वे अक्सर अलीमुद्दीन स्ट्रीट से बड़ाबाजार हमारे घर आ जाया करते थे। सन् ’67 और ’69 में बांग्ला कांग्रेस के अजय मुखर्जी के नेतृत्व में बनी मुख्यतः वामपंथियों की संयुक्त मोर्चा सरकारें क्रमशः 9 और 13 महीनों बाद ही गिरा दी गयी। सन् ’71 में फिर से विधान सभा का चुनाव हुआ और बड़ाबाजार सीट पर कांग्रेस के रामकृष्ण सरावगी के खिलाफ सीपीआई(एम) की ओर से ‘स्वाधीनता’ के संपादक कामरेड अयोध्या सिंह को खड़ा किया गया और इसके साथ ही मैं भी प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में उतर आया। तब तक उच्च माध्यमिक पास करके कालेज जाने लगा था और कालेज अलीमुद्दीन स्ट्रीट के निकट होने के कारण हमारे कदम ‘स्वाधीनता’ के दफ्तर में भी गिरने लगे थे। 1971 में स्वाधीनता में ही पार्टी सदस्यता लीं और इस प्रकार बाबू के दिये प्रगतिशील साहित्यिक-राजनीतिक परिवेश ने अपने सांचे में हमें पूरी तरह से ढाल लिया। तब पार्टी की केंद्रीय कमेटी का कार्यालय कोलकाता में ही था और हमें सीधे तौर पर कामरेड बी टी रणदिवे की तरह के महान नेता के अन्तर्गत काम करने का मौका मिला। हमारी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक-साहित्यिक गतिविधियों का सिलसिला यहीं से शुरू हो गया। विमल वर्मा ने ‘सामयिक’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, जिसमें मेरा सबसे पहला समीक्षा निबंध, काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘अपना मोर्चा’ पर प्रकाशित हुआ था। 1971 में ही नामवरजी ने ‘आलोचना’ में मेरा एक लेख प्रकाशित किया। 

बाबू दुकान भी जाते थे और अन्य तमाम प्रकार की गतिविधियों में भी शामिल रहते थे। उनकी गतिविधियों में नया संयोजन बांग्ला नाट्यमंडली ‘गंधर्व’ के साथ उनका जुड़ाव था। गंधर्व ने एक पत्रिका भी प्रकाशित की जिसके संपादक थे नृपेन साहा। बाद में वे ही ‘ग्रुप थियेटर’ पत्रिका के संस्थापक संपादक बने और अपने अंतिम दिनों में बांग्ला नाट्य अकादमी की पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे। किसी भी पत्रिका के प्रस्तुतीकरण, अर्थात मेकअप, गेटअप के मामले में सचमुच नृपेन साहा अतुलनीय थे। ‘गंधर्व’ नाट्यमंडली के निदेशक थे देवकुमार भट्टाचार्य। उनके पहले श्यामल चटर्जी निदेशक हुआ करते थे, लेकिन हमने श्यामल बाबू को बहुत कम देखा था। रंगमंच पर अनूठी दखल रखने वाले अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि के देबू भट्टाचार्य द्वारा निदेशित कई नाटकों को हमने दक्षिण कोलकाता के ‘मुक्तांगन’ रंगमंच पर देखा था और तभी से ‘मुक्तांगन’ भी हमारी स्मृतियों में हमेशा के लिये बसा हुआ है। देबू भट्टाचार्य एक प्रतिभाशाली निदेशक थे, जिनकी कुछ प्रस्तुतियों ने शंभु मित्रा, उत्पल दत्त, अजितेश बंदोपाध्याय की तरह के बांग्ला रंगमंच के सबसे उज्जवल सितारों से भरे परिवेश में भी अपनी किंचित पहचान बनायी थी। लेकिन परवर्ती दिनों में वे कहां लुप्त हो गये, पता नहीं चला। अत्यधिक राजनीति-केंद्रित हो चुके बांग्ला रंगमंच से उनके सूत्र नहीं जुड़ पायें। उनके भाई, हड्डियों के डाक्टर, डा. दिलीप भट्टाचार्य काफी अर्से तक हमारे परिवार के डाक्टर बने रहे।


बाबू की तरह ही दुकान और राजनीति, दोनों के साथ-साथ चलने का सिलसिला हमारे साथ भी समान रूप से जारी रहा। सन् ‘71 के बाद बंगाल की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया। इसके पहले ही नक्सलबाड़ी आंदोलन को केंद्र में रख कर भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन में एक और विभाजन हो चुका था और सीपीआई(एम-एल) का गठन हुआ था। बाबू के राजनीतिक मित्र धनराज दफ्तरी, पन्नालाल नाहटा और रामलाल दूगड़ पर भी नक्सलवादी आंदोलन का असर पड़ा और वे सीपीआई(एम) से अलग होकर चारू मजुमदार, कानू सान्याल की सीपीआई(एम-एल) से जुड़ गये। ’71 के चुनाव में 280 सीटों की विधानसभा में 113 सीटों के साथ सीपीआई(एम) ही विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, फिर भी उसे सरकार बनाने का मौका नहीं दिया गया। पार्टी के खिलाफ लगातार खूनी षड़यंत्र किये जाने लगे, कार्यकर्ताओं की खुले आम हत्याएं की जाने लगी और राज्य में एक प्रकार से अर्द्ध-फासिस्ट आतंक का शासन कायम होगया। इसी माहौल में सन् 72 के चुनाव का प्रहसन हुआ जब बंदूक की नोक पर सरे आम चुनावों को लूट लिया गया था। पार्टी के 1100 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गयी, पार्टी के हजारों लोगों को उनके घरों से उजाड़ दिया गया। ऐसे समय में ही जोड़ाबगान के मंडल स्ट्रीट स्थित अपने घर से उजाड़ दिये गये हरेकृष्ण घोष महीनों पाटनी हाउस के हमारे घर पर ही रहे । जोड़ाबागान के उस क्षेत्र से लेकर उत्तर में बारानगर तक तब नक्सलवादियों का ‘मुक्तांचल’ बना हुआ था। नक्सली तत्व अपने क्षेत्र के विस्तार के लिये काठगोला-जोड़ाबागान के इलाके पर अक्सर हमले किया करते थे। मंडल स्ट्रीट काठगोला के पास ही था। 


घोष बाबू आयकर के वकील, एक व्यवहारिक आदमी थे और पार्टी ने उन्हें अपने गोपनीय विभाग का जिम्मा सौंप रखा था। बाबू ने उन्हें ही हमारे व्यवसाय का भी वकील बना रखा था। बाद के दिनों में जब 1977 में वाममोर्चा सरकार बनी और कोलकाता के निकटवर्ती विधाननगर को बसाने का बीड़ा उठाया गया, तब घोष बाबू को उसके विकास में काफी अहम भूमिका सौंपी गई थी।


सन् ‘72 से ‘77 के जमाने को पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) के इतिहास का सबसे कठिन जमाना कहा जा सकता है। याद पड़ता है इसी दौर में वियतनाम युद्ध भी अपने चरम पर था। वियतनाम युद्ध में मुक्ति सेना की एक के बाद एक जीतों से उस कठिन दौर में बंगाल के कम्युनिस्टों को भारी प्रेरणा मिलती थी। उन्हीं दिनों वियतनाम युद्ध की ताजा स्थितियों के बारे में मेरी एक रिपोर्ट पहली बार ‘स्वाधीनता’ की सुर्खी के रूप में प्रकाशित हुई थी, जिसके रोमांच को मैं आज तक नहीं भुला पाया हूं। 30 अप्रैल 1975 के दिन सैगोन का पतन हो गया और अमेरिकी सेना को वियतनाम छोड़ कर वापस जाना पड़ा था। उन्हीं दिनों बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जोरदार आंदोलन शुरू हुआ, गुजरात में कांग्रेस पराजित हुई और जनता पार्टी के नाम से संयुक्त सरकार का गठन किया गया। जयप्रकाश का ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा पूरे देश के नौजवानों को इंदिरा गांधी की एकदलीय तानाशाही के खिलाफ उद्वेलित कर रहा था। तभी 12 जून 1975 के दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को खारिज कर दिया और इसकी प्रतिक्रिया में इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 के दिन आंतरिक आपातकाल की घोषणा करके भारत में संसदीय  जनतंत्र का पूरी तरह से गला घोंट देने की कोशिश की। 


कहना न होगा कि आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास में इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आंतरिक आपातकाल और उसके खिलाफ भारत की जनता का वीरतापूर्ण संघर्ष तत्कालीन सभी राजनीतिक पार्टियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। इसने वामपंथी राजनीति के भी समूचे दृश्यपट को बदल दिया था। जो सीपीआई(एम) कल तक सशस्त्र संघर्ष और वियतनाम युद्ध से प्रेरणा लेकर गुरिल्ला युद्ध की रणनीतियों पर अपने को केंद्रित कर रही थी, क्रांति के सीमाई और लगुआ क्षेत्रों की सिनाख्त करने की तरह के काम किए जा रहे थे, उसी ने यकबयक सन् 72 से पश्चिम बंगाल में चले आ रहे अर्द्ध-फासिस्ट आतंक और ’75 के आंतरिक आपातकाल की घोषणा के बाद भारत में संसदीय जनतंत्र की रक्षा की लड़ाई के असीम महत्व को गहराई से आत्मसात किया। गौर करने लायक बात यह है कि पार्टी की नीतियों में आए इस भारी परिवर्तन का शायद प्रथम साक्षी हमारा घर ही बना था। आंतरिक आपातकाल की घोषणा के बाद ही सभी पार्टियों के नेताओं की व्यापक गिरफ्तारियां की जाने लगी थी। सीपीआई(एम) के भी ज्योतिर्मय बोस और ए. के. गोपालन को बंदी बना लिया गया था। बाकी के सभी नेता अंडरग्राउंड चले गये थे। ऐसे में देश के कोने-कोने से, कामरेड पी. सुंदरैय्या, ईएमएस, बीटीआर, पी राममूर्ति, एम वसवपुनैय्या, और हरकिशन सिंह सुरजीत छिप-छिप कर कोलकाता आए थे और सभी को हमारे पार्क स्ट्रीट स्थित घर में रखा गया था। पांच कमरों के उस फ्लैट के दो कमरों में ये सभी नेता रह रहे थे और ज्योति बसु तथा प्रमोद दाशगुप्त सिर्फ बैठक के समय कोलकाता के अपने गुप्त स्थान से आ जाया करते थे। आंतरिक आपातकाल की घोषणा के बाद पोलिट ब्यूरो की पहली बैठक हमारे उसी 48एम, पार्क स्ट्रीट पर हुई थी, जिसमें कामरेड सुंदरैय्या ने पार्टी के महासचिव पद से इस्तीफा दिया था। इस बैठक के बाद काफी दिनों तक कामरेड रणदिवे हमारे घर में ही रह गये थे और उनसे मिलने के लिये अक्सर ज्योति बसु, प्रमोद दाशगुप्त वहां आया करते थे। कामरेड रणदिवे का वह प्रेरणादायी सान्निध्य हमेशा हमारे जीवन का पाथेय बना रहेगा, इसमें कोई शक नहीं है। उस महान प्रतिभाशाली नेता, अध्येता, चिंतक और विचारक की सीखों ने हमें अपने अंतर से कितना समृद्ध और उदात्त बनाया है, इसका हम शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते। पार्क स्ट्रीट के हमारे घर पर ही उन्होंने अमृतलाल नागर के ‘मानस के हंस’ और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के ‘कुआनो नदी’ और रघुवीर सहाय की कविताओं के संकलनों को पढ़ा था और उनके बारे में कामरेड रणदिवे से हमारी विस्तार से बातें भी हुई थी। कामरेड बीटीआर पर लिखे अपने एक लेख में हमने उन बातों का जिक्र किया है। कामरेड बीटीआर बाद में भी अपनी यात्राओं के पड़ाव में, कोलकाता आने पर अनेक बार हमारे साल्ट लेक स्थित घर पर रुकते रहे हैं। 


सन् ‘75 के पहले ही मेरी शादी हो गयी थी और मेरे साथ सरला भी परिवार के अन्य सदस्यों की तरह आपातकाल के उन दिनों में हमारे घर में इकट्ठा हुए पार्टी के नेताओं का पूरा ख्याल रखती थी। मेरी शादी सन् ’74 में उस वक्त हुई थी जब ऐतिहासिक रेल हड़ताल चल रही थी। सरला से मेरा संपर्क काफी पहले ही हो गया था। खास तौर पर सन् ’71 में जब बीकानेर में विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग पर ऐतिहासिक आंदोलन चला था और हरीश जी का घर उस आंदोलन का केंद्र हुआ करता था, उन दिनों मैं बीकानेर में उन्हीं के घर रह रहा था। उसी आंदोलन के दौरान सरला ने बीकानेर में अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया था। ’74 आते-आते जब मैंने सरला से शादी करने का निर्णय लिया तो मेरा परिवार इस फैसले को स्वीकारने के लिये कत्तई तैयार नहीं था। यह एक अन्तर्जातीय विवाह था। लेकिन अपने परिवार के प्रगतिशील परिवेश, और खास तौर पर बाबू के विद्रोही तेवर की पृष्ठभूमि में मेरी शादी के प्रति परिवार का रुख मेरे लिये कुछ न समझ में आने वाला अप्रत्याशित रुख था। उसी समय बाबू से मेरे कुछ अजीबो-गरीब पत्राचार भी हुए। तथापि मोहब्बत के जुनून के सामने आज तक कौन टिक पाया है! शादी करने के मेरे दृढ़ निश्चय को कोई प्रभावित नहीं कर सका और रेल हड़ताल तथा राजस्थान में भारी बाढ़ के उन दिनों में हवाई जहाज से पहले दिल्ली और फिर तीन बसों को बदलता हुए मैं अकेला ही बिना किसी ताम-झाम के ऐन विवाह के दिन दोपहर को अकेले बीकानेर पहुंच गया। बढ़ी हुई दाढ़ी और अति साधारण पोशाक में हजारों लोगों के सामने सिर्फ एक भाषण के जरिये साथ रहने का संकल्प लेकर हमने विवाह की रश्म अदा की और सरला को लेकर कोलकाता आ गया। कोलकाता लौटने पर बाबू ने धीरे से कान में कहा, तुमने अच्छा किया। बाद में पार्क स्ट्रीट के घर पर एक अच्छी सी दावत हुई जिसमें ज्योति बाबू, प्रमोद दा आदि सबने हिस्सा लिया था। 


जाहिर है कि ’75 तक आते-आते हमारा अपना स्वतंत्र राजनीतिक-साहित्यिक विवेक पूरी तरह से विकसित हो चुका था। हमने खुद अपना लिखने-पढ़ने का रास्ता तैयार किया। सरला भी पार्टी की ‘स्वाधीनता’ शाखा में शामिल हो गयी। आपातकाल के दिनों में हरेकृष्ण घोष ने चाहा था कि हम स्वाधीनता छोड़ दें, उनकी यूजी शाखा में शामिल हो जाएं। लेकिन हमें यूजी शाखा में जाना जमींदोज हो जाने जैसा प्रतीत हुआ। सन् 75 के बाद के राजनीतिक संघर्षों के चरित्र ने हमें सही साबित किया । सरला को पार्टी ने पहली बार सन् ’82 में विधान सभा का चुनाव लड़ाया, फिर सन् ’87 में। पार्टी ने सन् ’90 में उसे राज्य सभा का सांसद बना दिया। सन् 97 में उसने फिर विधान सभा का और ’98 में लोक सभा का चुनाव लड़ा। पुनः सन् ’99 में उसे राज्य सभा में भेज दिया गया। हम लोगों ने ‘कलम’ का प्रकाशन किया, जनवादी लेखक संघ के गठन में नेतृत्वकारी भूमिका अदा की और इस दौरान काफी कुछ लिखा-पढ़ा तथा हमारी कई किताबें भी प्रकाशित हुई। 


इसप्रकार, बाबू ने हमारे घर को जो राजनीतिक और साहित्यिक माहौल प्रदान किया, उसने हमारे जीवन की दिशा तय करने में अहम भूमिका अदा की है। राजनीति की ओर बाबू के भारी रूझान, साहित्य से लेकर जीवन के सभी मानदंडों में राजनीति को सर्वप्रमुख स्थान देने की उनकी विशेष मानसिकता ने बाबू के समग्र व्यक्तित्व को पार्टी के एक वफादार सिपाही का रूप दे दिया। वे जीवन की अंतिम घड़ी तक जिस निष्ठा और लगन के साथ ग्रुप थियेटर पत्रिका के प्रकाशन में लगे रहे और जीवन के अंतिम समय तक ‘स्वाधीनता’ के संपादक-मंडल के अध्यक्ष भी रहे, वह सचमुच उल्लेखनीय है । 

हमारी मां की मृत्यु 4 अप्रैल 2005 के दिन हुई थी । पिता के साथ ही मां का भी विशेष उल्लेख करना हमें कम जरूरी नहीं लगता है । बाबू कुल मिला कर हमेशा एक पारिवारिक व्यक्ति भी रहें और वे ही वस्तुतः हमारे परिवार की धुरी भी थे। तथापि बाई के अपने खास व्यक्तित्व ने पूरे परिवार में उनका बहुत ही विशेष स्थान बना लिया था। इसीलिये हमें लगता है कि बिना बाई की विशेषताओं का जिक्र किए, हमारे परिवार को और परिवार के मुखिया बाबू के व्यक्तित्व को पूरी तरह से नहीं जाना जा सकेगा। बहरहाल, बाई की मृत्यु के वक्त तक बाबू बिल्कुल स्वस्थ थे । इसके तीन साल बाद ही सन् 2008 के जनवरी महीने में हमारे छोटे भाई अनिल की कैंसर से मृत्यु हो गई । इसके बाद से बाबू में फेफड़ों से जुड़ी बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगे । इस लंबी बीमारी से ही 3 जुलाई 2011 के दिन घर पर ही बाबू की मृत्यु हुई । उनकी इच्छा के अनुसार ही उनके शव को हमने कोलकाता मेडिकल कालेज को सुपुर्द कर दिया ।  

बाबू के दिये साहित्यिक-राजनीतिक परिवेश ने हम लोगों में लिखने-पढ़ने की दुनिया में और आगे छलांग लगाने का जो माद्दा उत्पन्न किया, उसके लिये हम हमेशा उनके प्रति श्रद्धावनत रहेंगे। उनका दृढ़, निष्ठावान, पार्टी के प्रति समर्पित राजनीतिक चरित्र हम सबके लिये हमेशा प्रेरणादायी बना रहेगा। 




 


शुक्रवार, 16 जून 2023

टेलिग्राफ का संपादकीय पृष्ठ और जी एन देवी का लेख

 

 -अरुण माहेश्वरी


‘टेलिग्राफ’ अखबार के संपादकीय पृष्ठ में कुछ लेखकों के लेख अक्सर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं । उनमें उठाये गये विषयों में एक प्रकार की ताजगी होती है, किंचित विचारोत्तेजना और इतिहास के नाम पर कोरी कहानियों तथा आर्थिक आंकड़ों की फोटोग्राफिक तस्वीरों वाली जड़ता के बखान के बजाय हमारे आज के वैशिष्ट्य के बारे में कहीं ज्यादा मूलगामी दृष्टि पर आधारित एक गतिशील समझ के संकेत देने की कोशिश पाई जाती हैं । यहां हम खास तौर पर वरिष्ठ पत्रकार सुनंदा के. दत्ता-राय, प्रभात पटनायक, जी एन देवी, ए. रघुरामराजू और इधर चंद दिनों से ही लिखना शुरू करने वाले हिलाल अहमद का नाम लेना चाहेंगें । अक्सर उनके लेख हमें आगे टिप्पणी करने या उन लेखों की संस्तुति करने के लिए उकसाते हैं । 

यह सच है कि पढ़ने के लिए आकर्षित तो रामचंद्र गुहा के लेख भी करते हैं, पर उनमें किसी विचारोत्तेजना के बजाय इतिहास के कथामूलक ब्यौरों का आधिक्य होता है । इसी प्रकार रुचिर जोशी की मन की उड़ानों और उड्डालक मुखर्जी की ललित निबंधों वाली शैली का भी एक आकर्षण होता है । भाजपा के पूर्व सांसद स्वपन दासगुप्त को सिर्फ इसलिए पढ़ने की इच्छा होती है ताकि भारत में गोयेबल्सीय प्रचार की धारा की सूक्ष्मताओं की सिनाख्त की जा सके । अक्सर वे शुद्ध रूप से झूठी बातों को ही अपने ‘गंभीर टिप्पणियों’ का आधार बनाया करते हैं । गोपालकृष्ण गांधी के लेखों में तीक्ष्ण बौद्धिक दृष्टि के बजाय आदर्शवाद ज्यादा होता है । रेणु कोहली या उन जैसे ही आर्थिक विषयों के चंद लेखक परिशुद्ध आर्थिक टिप्पणीकार की नैतिक सीमाओं के कायल होने के कारण किसी भी क्रिया के दूरगामी, विपरीत सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों की चर्चा से परहेज करते हैं और यही वजह है कि वे आर्थिक आंकड़ों का प्रयोग हमारे पूण्यप्रसून वाजपेयी की तरह लक्षणों के नए विश्लेषणों के बीच टिप्पणी के विस्तार के लिए भरती के माल की तरह न करने पर भी एक सीमित विषय पर सीमित दायरे में महज एक रनिंग कमेंट्री करते से जान पड़ते हैं ।

बहरहाल, आज के ‘टेलिग्राफ’ में जी एन देवी के लेख ‘भारत का विशिष्ट मिश्रित सर्वाधिकारवाद : प्रेत की वापसी’ (India’s totalitarianism is of a peculiar mix : The spectre returns) ने हमारा विशेष ध्यान आकर्षित किया है । उन्होंने इस टिप्पणी में भारत में नेहरू की मिश्रित अर्थनीति की तरह ही नरेन्द्र मोदी की मिश्रित तानाशाही की बात कही है । जैसे नेहरू समाजवाद के विस्तार के युग में जनतांत्रिक पूंजीवाद का प्रयोग कर रहे थे, देवी कह रहे हैं कि मोदी कृत्रिम बुद्धि (एआई) के युग में हिटलर-स्तालिन की दमनकारी, उन्मूलनवादी तानाशाही का प्रयोग कर रहे हैं । देवी दो लेखक हाना ओरंत और मेतिआस दिसमित की क्रमशः दो किताबों, The Origins of Totalitarianism (1951) और  The Psychology of Totalitarianism के उल्लेख से बताते हैं कि कैसे हिटलर और स्तालिन के जमाने में लोगों को ऐतिहासिक न्याय पाने के लिए आक्रामक बना कर एक चरम दमनकारी राज्य के प्रति स्वीकार्यता के लिए उन्हें तैयार किया जाता था और अब दुनिया में खुद के हितों के प्रति अति-सुरक्षा का भाव पैदा करके लोगों को अगाध डिजिटल नियंत्रण की शक्ति से लैस राज्य के हाथ में अपनी निजता और स्वायत्तता को सौंप देने के लिए तैयार किया जा रहा है । ये दोनों किताबें ही अलग-अलग समय में तानाशाही को स्वीकारने के लिए जनता के मनोविज्ञान को तैयार करने की पेशकश की कहानियां कहती हैं। देवी बताते हैं कि भारत में आज मोदी के तानाशाही शासन की विशेषता यह है कि वह तानाशाही के पक्ष में जन-मानस को तैयार करने के इन दोनों उपायों के एक अनोखे संकर का उदाहरण पेश कर रही है । जैसा कि नेहरू ने बताया था कि भारत में गोबर युग और राकेट युग साथ-साथ वास करते हैं, भारत में चल रहे तानाशाही शासन का सत्य उसी के सादृश्य है जिसमें दमन के आदिम और आधुनिकतम औजारों का साथ-साथ प्रयोग करने की कोशिश की जा रही है । इससे भारतीय राज्य के दमनकारी रूप के भावी विकास के बहुत गहरे संकेत पाए जा सकते हैं । यह भारतीय राज्य का अपना विशिष्ट रूप होगा । 

पिछले दिनों इसी प्रकार सुनंदा के. दत्ता-राय ने 10 जून के अपने लेख ‘Missing the sparks’ (चमक की कमी) में सेंगोल के संदर्भ में भारत में राजशाही की दमित आकांक्षाओं की ओर वैश्विक संदर्भ में जो संकेत किया था और इधर 12 जून को रघुरामराजु ने ‘Macaulay’s Trap’ (मैकाले का जाल) शीर्षक लेख में शिक्षा के क्षेत्र में परंपरा और आधुनिकता के बीच के द्वंद्व का जो चित्र रखा, जी एन देवी का लेख कुछ इसी प्रकार राज्य के स्वरूप के विकास के एक संक्रमण काल की सूरत पेश करता है ।     

जी एन देवी के इस लेख को भी जरूर पढ़ा जाना चाहिए :    

  https://epaper.telegraphindia.com/imageview/436842/191320601/71.html            


मंगलवार, 13 जून 2023

क्या अवसादग्रस्त बीजेपी मृत्यु-जाल में फंसती जा रही है ?

 

−अरुण माहेश्वरी 



कर्नाटक चुनाव के पहले और कर्नाटक चुनाव के बाद की बीजेपी में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ आ चुका है । कर्नाटक चुनाव के पहले तक उसमें कमोबेस एक विश्व-विजेता का भाव था । आज उसके विपरीत, वह पूरी तरह से पर्युदस्त, युद्ध में धराशायी, पराजित के भाव में चली गई है । कर्नाटक युद्ध के पहले वह संभावित विजय के अभाव के प्रागभाव से चालित थी, आज कर्नाटक की पराजय के बाद विध्वंस से उत्पन्न अभाव के प्रघ्वंसाभाव में बुरी तरह से फँस चुकी है । 

हताश बीजेपी ने अलग-अलग राज्यों में फिर एक बार जिस प्रकार से नए-नए साथियों की तलाश शुरू कर दी है − पंजाब में अकाली दल को टटोल रही है, आंध्र में तेलुगू देशम को, यूपी में कुशवाहाओं को, कर्नाटक में जेडीएस और तमिलनाडू में हास्यास्पद ढंग से सेंगोर नामक डंड के सहारे को जिस प्रकार तलाश रही है − उसकी ये सारी ताबड़तोड़ गतिविधियां इस तथ्य की खुली स्वीकृति है कि मोदी की बीजेपी 2024 के चुनाव के पहले ही चारों खाने चित हो चुकी है । हिमाचल और कर्नाटक ने मोदी को सिर्फ एक झुनझुना साबित करके, अकेले मोदी की छंटा पर टिकी समूची बीजेपी के पैर के नीचे की जैसे ज़मीन खींच ली है । संसद में छाती पीट कर मोदी का यह कहना कि ‘एक अकेला सब पर भारी’ आज बीजेपी की ही सबसे बड़ी कमजोरी की घोषणा साबित हो रहा है ।  

बीजेपी का करोड़ों-अरबों रुपयों का खजाना, लुटेरे पूंजीपतियों की बेशुमार दौलत का सहारा, गोदी मीडिया की कथित अगाध प्रचार शक्ति और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहलाने वाला सांगठनिक ताना-बाना भी अब उसे जगत के मिथ्यात्व के वैराग्य भाव से बचा नहीं पा रहा है । जैसे उत्तर प्रदेश में मायावती अपने महल में दुबकी बैठी रहती है, बीजेपी भी अभी से अपनी उसी दशा के अंदेशे से दुबली हुई जा रही है । 

नफ़रत के खिलाफ प्रेम के नारे के साथ एक जन-आलोड़न का बिगुल बजा कर कांग्रेस ने बीजेपी के अस्तित्व को तात्विक स्तर पर ललकार दिया है । अब बीजेपी के पास सिवाय इसके कि वह पूरी नंगई के साथ अपने को असभ्य और जंगली घोषित करके मणिपुर की हिंसा की तरह की आग में समूचे देश को झोंक दे, दूसरा कोई सभ्य, धार्मिक और राजनीतिक प्रत्युत्तर भी नहीं बचा दिखाई देता है । 

राम मंदिर और उसके सामने साष्टांग मोदी की तस्वीरों पर बीजेपी को ही नहीं, आरएसएस को भी कोई भरोसा नहीं है । आरएसएस ने अभी से अपना मुंह छिपाने के लिए अपने मूलभूत गिरगिट-चरित्र का खुला प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है । उसने अपने मुखपत्र में साफ कहा है कि मोदी नामक ईश्वर मर चुका है, और अब जब बीजेपी का ऐसा कोई ईश्वर नहीं बचा है, तब वह चाहता है कि बीजेपी के सभी लोग खुद से अपने-अपने ईश्वर की भूमिका अपना लें । उसने राज्यों के, और स्थानीय स्तर के नेतृत्व को खुद अपनी बागडोर थामने का आह्वान किया है । 

जाहिर है कि एकचालिकानुवर्तित्व की नीति-नैतिकता के परिवेश में निर्मित संघ और बीजेपी के नेताओँ-कार्यकर्ताओं से आज आरएसएस की ऐसी खुद-मुख्तारी की मांग, उनसे किसी आत्म-हत्या की मांग से कम नहीं है । सचमुच अवसादग्रस्त बीजेपी और आरएसएस इसी मृत्यु-उद्दीपन (death drive) के चक्र में फंस गये हैं । 

मोदी-शाह ही नहीं, आरएसएस को भी किसी कीमत पर पराजय स्वीकार्य नहीं है, और सच्चाई यह है कि जनतंत्र के वर्तमान कमजोर ढांचे में भी अब अपनी पराजय को, संसद में अल्पमत होने के भवितव्य को टालना उनके वश में नहीं रहा है । इस डर से पैदा हुई बदहवासी में अब वे क्रमशः जैसे फांसी के फंदे को चूम लेने की दिशा में बढ़ते जा रहे हैं ।

अमित शाह तमिलनाडु में अपने सहयोगी एआईडीएमके और उसकी नेता जयललिता तक को गालियां देते हुए सीधे लोगों से इस बात पर बीजेपी के लिए वोट मांगने लगे हैं कि उनके मोदी जी ने तमिलों के चोल वंश के एक कल्पित प्रतीक, सेंगोल कहे जाने वाले डंड को संसद की नई इमारत में स्थापित कर दिया है ! यही बात अकाली दल और तेलुगुदेशम से सटने की बीजेपी की कोशिशों पर भी लागू होती है । बदहवास बीजेपी चाहती हैं कि ये दल संसद में बीजेपी की सीटों को बढ़ाने के लिए अपना ही बलिदान कर दें । 

मोदी-शाह यह अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि 2024 में बीजेपी को खुद से पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो अन्य सहयोगियों के बल पर उसका सत्ता पर लौटना असंभव होगा । और कांग्रेस की शक्ति में वृद्धि तथा विपक्ष की बढ़ती हुई एकता, बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, बंगाल आदि की जमीनी सच्चाई को देखते हुए इन सभी राज्यों में बीजेपी की सीटों में भारी गिरावट को कोई रोक नहीं सकता है । ऐसी स्थिति में 2024 में मोदी की सत्ता के पतन को टालना असंभव है । इसीलिए बीजेपी बुरी तरह से आतंकित हैं और बदहवासी में मृत्यु के महाशून्य में छलांग लगाने की दिशा में बढ़ती जा रही है । उसके इन आत्मघाती कदमों को रोकना किसी के लिए भी संभव नहीं लगता है । 

कहा जा रहा है कि आरएसएस के वैचारिक दंडधारियों ने अंदर ही अंदर बीजेपी की इस दशा के लिए मोदी-शाह की प्रशासनिक अयोग्यता और राजनीतिक मूर्खताओं को कोसना शुरू कर दिया है । पर सच यह है कि आज की मोदी सरकार आरएसएस के शुद्ध विचारों का ही सामने उपस्थित एक ठोस रूप के अलावा कुछ नहीं है । सच कहा जाए तो संघ के ये मठाधीश वास्तव में मोदी-शाह को नहीं, खुद को ही कोस रहे हैं । आरएसएस के किसी प्रचारक की बुद्धि राम मंदिर, धारा 370, मुस्लिम-विरोध और जनतांत्रिक ताकतों के दमन से आगे जा ही नहीं सकती थी । मोदी ने अपने शासन से इन सब मामलों में अपनी योग्यता को अच्छी तरह से साबित किया है । पर शासन का मूल काम देश को एकजुट करके उसे विकास के आधुनिक रास्ते पर आगे ले जाना होता है, लोक कल्याण और न्याय की व्यवस्था कायम करना होता है − संघ के पूरे आंतरिक विमर्श में इन विषयों की कभी कोई जगह ही नहीं रही है । 

आरएसएस अपनी सार्वजनिक गतिविधियों में नाना प्रकार की ‘सांस्कृतिक’ चालाकियों का अभ्यस्त रहा है, लेकिन शायद उसने भी नहीं सोचा होगा कि उसकी तमाम चालाकियों के आवरण के पीछे का उसका नग्न स्वरूप इतना कुरूप और जुगुप्सा पैदा करने वाला होगा, जैसा मोदी शासन के रूप में सामने आया है ! आज पराजय के मुहाने पर पहुंच चुकी मोदी सरकार की यह सूरत संघ को ही डराने लगी है । 

तमिलनाडु में अमित शाह ने कहा बताते हैं कि देश का प्रधानमंत्री किसी गरीब तमिल को होना चाहिए । सवाल उठता है कि क्या मोदी तमिलनाडु से चुनाव लड़ने की सोच रहे हैं ? क्या अमित शाह ने मोदी जी की डिग्रियों की तरह ही उनके लिए तमिल होने का भी कोई प्रमाणपत्र जुटा लिया है ?  

सचमुच गीदड़ की जब मौत आती है तो वह शहर की ओर भागता है !




गुरुवार, 18 मई 2023

कर्नाटक ने भारत के राजनीतिक भविष्य की झलक दी है

 

−अरुण माहेश्वरी 



अन्ततः, कर्नाटका के नए मुख्यमंत्री की घोषणा के साथ ही, कह सकते हैं कि कर्नाटका का चुनाव संपन्न हुआ । विजयी कांग्रेस दल के विधायकों की पहली पसंद सिद्दारमैया फिर से एक बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री होंगे और इस शानदार जीत में अपनी मेहनत और निष्ठा के लिए बहुचर्चित नेता डी.के.शिवकुमार उप-मुख्यमंत्री। 

एक वाक्य में कहें तो कर्नाटक की यह जीत भारतीय जनतंत्र के अपने तर्क की जीत है । अगर इसे सुसंगत रूप में जीवित रहना है तो यह अपने शरीर में मोदी और बीजेपी की तरह की विजातीय फ़ासिस्ट शक्ति के साथ अधिक दिन तक कायम नहीं रह सकता है । इसे घुमा कर यूं भी कह सकते हैं कि अगर किसी भी तरह भारत के शासन का यह जनतांत्रिक ढांचा कायम रह जाता है तो इसमें आरएसएस-मोदी की तरह के फासिस्ट ज्यादा समय तक बचे नहीं रह सकते हैं । जनतंत्र के स्वास्थ्य की यह एक बुनियादी शर्त है कि इसे सांप्रदायिक फासिस्टों की जकड़ से मुक्त रहना पड़ेगा । शासन में जनतंत्र और आरएसएस लंबे काल तक साथ-साथ नहीं चल सकते हैं । ये ऐसे परस्पर-विरोधी है जिनका सामंजस्य नहीं चल सकता है । मोदी और आरएसएस जनतंत्र के लिए किसी काल से कम नहीं हैं । कर्नाटक में मोदी की हार ने सन् 2024 के आम चुनाव के परिणामों की एक झलक दे दी है । जनतंत्र बनाम फासीवाद का संघर्ष ही इन चुनावों का सबसे निर्णायक संघर्ष साबित होने वाला है । 2024 में जनतांत्रिक और धर्म-निरपेक्ष ताकतों की किसी भी प्रकार की गफलत अब सीधे तौर पर हमारे देश की सत्ता को नग्न फासिस्टों के हाथ में सौंपने से कम बड़ी भूल नहीं साबित होगी । मोदी विगत नौ सालों में ही अपने असल खूनी पंजों का परिचय दे चुके हैं । 

जहां तक कर्नाटक के चुनाव का प्रश्न है, इन परिणामों के बाद भी कांग्रेस में विधायक दल के नेता के चयन की जिस जनतांत्रिक प्रक्रिया की दरारों पर मोदी-शाह की गिद्ध दृष्टि थी, जिन दरारों से प्रधानमंत्री मोदी गोदी मीडिया नामक अपनी प्रेत-सेना के कुहराम से अपनी खोई हुई साख को थोड़ा छिपाने की आशा कर रहे थे, उस पूरे शोर ने भी अंततः कांग्रेस की कमी के बजाय उसके अंदर के लचीलेपन की ताकत को ही और जोरदार ढंग से उजागर किया है । उसने यही दिखाया है कि देश की राजनीति में अभी जो कुछ भी हो रहा है उसमें मोदी सत्ता क्रमशः बिल्कुल लाचार और लचर साबित होने लगी है । उसका ईडी-सीबीआई-आइटी का त्रिशूल भी अब सुप्रीम कोर्ट की झिड़कियों का विषय बन चुका है । सुप्रीम कोर्ट में ईडी को कहा गया है कि जांच करो, पर डर पैदा मत करो । ऊपर से, जिस प्रकार किरण रिजिजू और राज्य मंत्री बघेल को हटा कर कानून मंत्रालय की सफाई की गई है, उसे भी कर्नाटक चुनावों का ही परिणाम कहा जा रहा है । मोदी के निर्देशों पर ही पिछले दिन यह मंत्रालय भारत की न्यायपालिका के लिए आंख का कांटा बन चुका था, उसने अब तक मोदी सरकार की ही हालत पतली कर दी है । सुप्रीम कोर्ट मोदी सरकार के गैर-कानूनी क्रियाकलापों पर उंगली रखने से किसी भी मामले में चूक नहीं रहा है ।     

कर्नाटक चुनाव में मोदी का कितना कुछ दाव पर लगा हुआ था, उसे इस चुनाव के दौरान मोदी की तमाम हरकतों से भी जाना जा सकता है । गौर से देखने पर पता चलता है कि इस चुनाव में अंत तक आते-आते मोदी की दशा किसी विक्षिप्त व्यक्ति की तरह की हो गई थी । विक्षिप्त आदमी ही किसी भी हालत में अपनी शक्ति में जरा भी कमी को नहीं देख सकता है । उसे हमेशा यह सवाल परेशान किया करता है कि आखिर क्यों, किसी दूसरी चीज के लिए, जो उसकी है ही नहीं, उससे बलिदान की मांग की जा रही है ? भारत का जनतंत्र और संविधान होगा किसी के लिए कितना भी मूल्यवान, पर उसके लिए मोदी क्यों कोई कीमत अदा करेंगे ? विक्षिप्त व्यक्ति कुछ इस प्रकार की फैंटेसी में जीता हैं कि यदि कोई उसके रास्ते में फिजूल के रोड़े न अटकाए तो उसके पास तो ईश्वरीय परमतत्त्व को पा लेने जैसी शक्ति है । मोदी ने कांग्रेस-मुक्त भारत के अपने सपने के साथ अगले पचास साल तक भारत पर आरएसएस के राज की फैंटेसी से अपने को जोड़ लिया था । वे हिमाचल के धक्के को तो किसी तरह से झेल गए, लेकिन कर्नाटका का धक्का एकदम नाकाबिले-बर्दाश्त था । अपनी इसी धुन में उन्होंने कर्नाटका के चुनाव में खुले आम कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाने और ‘जय बजरंगबली’ की तरह की धार्मिक हुंकारें भरने तक से परहेज नहीं किया । 

मोदी जान गए थे कि कर्नाटका में हार का अर्थ होगा उनके तमाम विश्वासों और मंसूबो का हार जाना । यही उनके सोच की फासिस्ट विकृति है जिसमें वे खुद के अलावा अन्य किसी की उपस्थिति को देख ही नहीं पाते हैं । बेबात, खुद पर ही मुग्ध रहते हैं । हमेशा दिखाते तो ऐसा हैं कि वे बहुत कुछ कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में कोरे प्रदर्शनों के सिवाय कुछ भी नया नहीं कर रहे होते हैं । इसीलिए मोदी को आप जब भी उनकी खुद के बारे में की गई फैंटेसी से काट कर देखेंगे, आपको उनका असल तात्विक रूप साफ रूप  दिखाई दे जाएगा । यह पता चलने में कोई बाधा नहीं रह जायेगी कि आखिर उनकी प्रेरणाएं क्या हैं ? कैसे वे अपने प्रत्येक क्रियाकलाप में हिटलर और उसकी नाजी विचारधारा से प्रेरित रहते हैं । इससे कोई भी उनके सभी कामों को परखने का एक सही नजरिया हासिल कर सकता है ।

मनोविश्लेषण की दुनिया में मनोरोगी के सच को परखने का यही सबसे कारगर तरीका है कि उसकी प्राणीसत्ता को उसकी अपनी फैंटेसियों से काट कर देखा जाए । कर्नाटक में मोदी ने उसका खुला प्रदर्शन कर दिया था । 

इस चुनाव ने बीजेपी की क्या दशा की है उसे इस तथ्य से भी जाना जा सकता है कि चुनाव परिणाम के ठीक बाद ही शोक में डूबी बीजेपी ने एक बड़बोले बागेश्वर बाबा की गोद में मुँह छिपा लिया है । 

बहरहाल, हिमाचल के बाद कर्नाटक में भी सत्ता से बीजेपी को हटाने की घटना का आवर्तन अब भारत के जनतंत्र के सामान्य व्यवहार का संकेत दे रहा है । यह बात हर प्रमाता पर, व्यक्ति और व्यक्तियों के समूहों पर समान रूप से लागू होती है । प्रमाता के जो लक्षण उसकी मूल पहचान को दिखाते हैं, उनमें उसके वर्तमान व्यवहार के साथ ही उसकी भविष्य की गति का भी मिश्रण होता है । वह गति कब और किस रूप में अपने को जाहिर करेगी, यह समय और पारिस्थितिकी पर निर्भर करता है । कर्नाटक के चुनाव से यही जाहिर हुआ है कि भारत की मौजूदा परिस्थितियां अब जनतंत्र की अपनी गति को व्यक्त करने के अनुकूल होती जा रही है । इसीलिए इन चुनावों का भारत के राजनीतिक भविष्य के लिए असीम महत्व माना जाना चाहिए । 


गुरुवार, 11 मई 2023

मोदी महज एक झुनझुना रह गये हैं


−अरुण माहेश्वरी 



कर्नाटक में एग्जिट पोल के परिणामों से साफ है कि मोदी बहुत तेजी से आर्थिक गतिरोध में फंसी कंपनियों पर लागू होने वाले ‘लॉ आफ डिमिनिसिंग रिटर्न’ के चक्र में फंस कर अब पूरी तरह से दिवालिया हो जाने की दिशा में बढ़ चुके हैं । 

हर राजनीतिक विश्लेषक यह जानता है कि मोदी और आरएसएस के पास राजनीति के नाम पर धर्म और सांप्रदायिकता के अलावा देने के लिए और कुछ नहीं है । उनके प्रति लोगों के आकर्षण का यदि कोई कारण है तो वह शुद्ध सांप्रदायिकता का उन्माद है, और उन्माद तो उन्माद ही होता है, जिससे निकलने में आदमी को काफी कीमत अदा करनी पड़ती है । 

दुनिया के सभी सभ्य समाज आज यह जानते हैं कि धर्म सार्वजनिक जीवन के लिए एक नितांत अनुपयोगी, बल्कि विध्वंसक चीज है । भारत के लोगों को भी धर्म के विध्वंसक रूपों का प्रत्यक्ष अनुभव रहा है । पर, धर्म-आधारित शासन भी उतना ही अनुपयोगी, और विध्वंसक है, भारत के लोगों को मोदी के पहले तक उसका अनुभव लेना बाकी था । पड़ोसी पाकिस्तान में समय-समय पर धार्मिक उन्माद की पुनरावृत्ति यहां भी लोगों में धर्म की राजनीति के प्रति वितृष्णा के साथ ही एक आकर्षण भी पैदा करती रही है । इसीलिए भारत के लोगों के एक तबके में आरएसएस की सांप्रदायिक राजनीति के अलावा ‘सांप्रदायिक शासन’ के उन्माद के अतिरिक्त मजे का आकर्षण बना रहा है । 

कहना न होगा, 2002 के गुजरात जनसंहार के उत्पाद नरेन्द्र मोदी आरएसएस की सांप्रदायिक राजनीति के उन्माद के इसी ‘अतिरिक्त मजे’ के आकर्षण का एक मूर्त रूप हैं । उन्होंने 2014 के पहले के भारत को बिल्कुल ऊसर और अनाकर्षक बताने के लिए थोथे ‘गुजरात मॉडल’ की माया का खूब प्रचार किया, जिसने उन्हें सांप्रदायिक उन्माद के केंद्र में ला दिया । जन-जीवन में सुधार और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में शासन की भूमिका के लिहाज से मोदी की वास्तव में अपनी कभी कोई उपयोगिता प्रदर्शित नहीं की, फिर भी वे एक ऐसी राजनीतिक शख्सियत के रूप में गिने जाने लगे, मानो वे त्रिभुवन के राजा हैं । अर्थात् कहीं भी नहीं हैं, पर वे ही सर्वत्र हैं । 

बहरहाल, बच्चों को फुसलाने के लिए हवा से फुलाए गए ऐसे गुब्बारे का धीरे-धीरे फुस्स होना हमेशा लाजिमी होता है । कर्नाटक के एग्जिट पोल ने उनके इस पिचके हुए, अनुपयोगी और अनाकर्षक रूप को जैसे एक झटके में सामने ला दिया है । अब हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि मोदी तेजी के साथ भाजपा के लिए राजनीतिक लिहाज से अवांछनीय साबित होने के लिए अभिशप्त हैं । 2024 में भारत के लोग उन्हें एक फट चुके अनुपयोगी गुब्बारे की तरह फेंक कर उनसे मुक्ति पायेगी, इसमें कोई शक नहीं दिखाई देता है । 

कर्नाटक के चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने जितने करतब दिखाएं, उनका कोई हिसाब नहीं है । गाड़ी से लटक कर फूलों की बारिश के बीच रोड शो के नाम पर पूरे शहर को बंद करके घूमना तो उनका इधर का खास शगल हो गया है । इसके लिए वे सिर्फ फूलों पर लाखों रुपये फुंकवा देते हैं । कर्नाटक में भी उन्होंने अपने इस प्रदर्शन को दोहराया ।  कभी-कभी गाड़ी से उतर कर सब को किनारे कर चौड़ी सड़क पर अकेले किसी दीवाने की तरह मचलते हुए भी दिखाई दिए ।  इस बार, इन सबसे अधिक दिलचस्प था सभाओं में उनका ‘जय बजरंगबली’ का नारा । ‘जय बजरंगबली, तोड़ दुश्मन की नली’ के आक्रामक उन्माद का वे खुले आम प्रदर्शन कर रहे थे। 

कहने का अर्थ यह है कि मोदी कर्नाटक में किसी उन्मादी व्यक्ति की बाकी सभी हरकते कर रहे थे, लेकिन जो एक मात्र चीज नहीं कर पा रहे थे वह यह कि वे राजनीति नहीं कर रहे थे । राजनीति और अर्थनीति के विषय, जिन पर किसी राजनेता से सबसे अधिक अपेक्षाएं की जाती हैं, मोदी के भाषणों से एक सिरे से ग़ायब थे । संवाददाता सम्मेलन तो वे करते ही नहीं है । इस चुनाव प्रचार में मोदी ने न राष्ट्रीय राजनीति पर एक शब्द कहा और न अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर । खुद कांग्रेस और विपक्ष को खरी-खोटी सुनाते रहे, पर कांग्रेस पर उन्हें गालियां देने का रोना रोते रहे । यहां तक कि उन्होंने अपने उस महान करिश्मे का भी जिक्र नहीं किया कि कैसे उन्होंने रूस के राष्ट्रपति पुतिन को फोन करके यूक्रेन पर रूस के हमले को कुछ घंटों के लिए रुकवा दिया और वहां से भारत के फँसे हुए छात्रों को निकाल लाए । न उन्होंने कभी पाँच ट्रिलियन डालर की इकानामी का उल्लेख किया, तो न कोरोना की महामारी से निपटने में अपनी महान सफलता की कोई शेखी बघारी । अर्थात्, मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में राजनेता से अपेक्षित बातों के अलावा, उनके लिए जो कुछ संभव था वही सब किया । 

मोदी का कर्नाटक का चुनाव प्रचार ही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनकी राजनीतिक हवा पूरी तरह से निकल चुकी है । कांग्रेस के सवालों की बौछार के सामने वे हर कदम पर बेहद लचर और लाचार दिखाई दिये ।

यह जाहिर है कि शुरू से ही मोदी ने कभी भारत के विकास और जनता की समस्याओं के समाधान के रास्ते का कभी कोई संकेत नहीं दिया था। बाद में, भ्रष्टाचार से लड़ने के नाम पर ईडी, आईटी, सीबीआई आदि को उनके वास्तविक कामों से भटका कर विपक्ष के खिलाफ लगा दिया और सभी लुटेरों को या तो लूट का माल ले कर देश से भागने में मदद की या अडानियों की तरह देश में जमकर लूट-मार करने का मौका देकर उनसे भाजपा की तिजोरी को पूरी बेशर्मी से भरा । 

इन सबके बावजूद, आम लोगों के बीच यदि मोदी का आकर्षण इन कुछ सालों तक बना रहा है तो इसकी एकमात्र वजह यही है कि मोदी का खुद में कोई उपयोग मूल्य नहीं होने पर भी उनका सांप्रदायिक उन्माद और सांप्रदायिक शासन का अतिरिक्त आकर्षण मूल्य बना हुआ था । इसे मनोविश्लेषण की भाषा में अतिरिक्त विलास मूल्य (surplus enjoyment) कहते हैं । जैसे मार्क्सवादी विश्लेषण के अनुसार किसी भी माल में उसके उपयोग मूल्य के अलावा मुनाफे का अतिरिक्त मूल्य होता है, जिसका उपयोग मूल्य से कोई संबंध नहीं होता है । वैसे ही हर वस्तु के प्रति आकर्षण में एक अतिरिक्त विलास मूल्य शामिल होता है । आदमी का हर प्रकार का उन्माद इसी अतिरिक्त विलास की श्रेणी में पड़ता है और इसके चक्कर में ही आदमी अक्सर बहुत कुछ ऐसा कर देता है, जिसके लिए बाद में उसे भारी कीमत चुकानी पड़ती है, वह पछताता है । मोदी के प्रति लोगों का आकर्षण भी उसी अतिरिक्त विलास के उन्माद की श्रेणी में आता है । 

जहां तक मोदी की राजनीतिक उपादेयता में तेजी से हो रहे ह्रास का संबंध है, इसकी गूंज अब सिर्फ हमारी राष्ट्रीय राजनीति में ही नहीं, अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी पुरजोर सुनाई पड़ने लगी है । भारत की अपने पड़ौसियों के बीच जो साख है, उसे तो सब जानते हैं । मोदी की चर्चा श्रीलंका और बांग्लादेश में अडानी के एजेंट के रूप में की जाती है । यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस पर लगे प्रतिबंधों का लाभ उठा कर उससे रुपयों में तेल की खरीद का जो सिलसिला शुरू किया था, रूस ने अचानक उस पर रोक लगा दी है । रूस के विदेश मंत्री सर्जेई लेवरोव ने भारत में ही रहते हुए साफ शब्दों में यह पूछा है कि उनके पास जो लाखो करोड़ रुपये फालतू जमा हो गए हैं, वे उनका क्या करें ? 

हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पहली बार मोदी को राजकीय भोज के लिए अमेरिका निमंत्रित किया है । इसके पहले मनमोहन सिंह को ऐसे भोज के लिए दो बार और नेहरू जी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी तथा अटलबिहारी वाजपेयी को भी निमंत्रित किया जा चुका था । लेकिन मोदी को सत्ता में आए नौ साल बीत जाने के बाद बड़ी हिचक के साथ उन्हे निमंत्रित किया गया हैं । पर विडंबना देखिए कि मोदी को दिये गए इस निमंत्रण पर अमेरिका में तत्काल अनेक सवाल उठने लगे हैं । कल ही जब अमेरिकी सचिव ने संवाददाताओं के सामने इस बात की घोषणा की तो संवाददाताओं की ओर से साफ पूछा गया कि एक ऐसे व्यक्ति को राजकीय भोज के लिए बुलाना क्या बुरा नहीं लगेगा जो मानव अधिकारों के मामले में बेहद बदनाम है ! 

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि मोदी का महत्व क्रमशः अब जनता के उस मंदबुद्धि अंश के लिए एक झुनझने से अधिक नहीं बच रहा है जो आरएसएस के सांप्रदायिक जहर के दंश के बुरी तरह से शिकार है । जो आज भी मोदी-मोदी चिल्लाते हैं, वे शुद्ध उन्माद की दशा में हैं । वे जरा भी नहीं जानते कि वे क्यों चिल्ला रहे हैं ! मोदी उनके लिए सिर्फ एक नशा, एक अतिरिक्त मौज की चीज़ की तरह है । ‘एक के साथ एक अतिरिक्त’ के बिक्री के नुस्खे में जैसे अतिरिक्त के प्रति आकर्षण मूल से ज्यादा होता है, मोदी का आकर्षक कुछ वैसा ही है । इसे ही कुछ लोग ‘मोदी मैजिक’ कहते रहे हैं । सांसदों, विधायकों को चुनने के साथ ही एक अतिरिक्त लाभ के रूप में मोदी भी मिलेगा ! अर्थात्, मोदी के प्रति आकर्षण मुफ़्त की चीज़ के प्रति आकर्षण की तरह का रह गया है । स्वयं में मोदी का एक झुनझुने से ज्यादा कोई उपयोगिता मूल्य नहीं बचा है । लोग जब यह समझ जायेंगे कि यह झुनझुना भी ऐसे प्लास्टिक का बना हुआ है, जो बच्चों के लिए नुकसानदेह हो सकता है, तो उसे हाथ से फेंक देने में जरा भी समय नहीं लगायेंगे । कर्नाटक चुनाव के संकेतों में मोदी के इस अंत को बहुत साफ तौर पर देखा जा सकता है ।  



मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

बीजेपी की संघी प्राणीसत्ता को भूल कर उसके बारे में किसी सैद्धांतिकी का कोई औचित्य नहीं है


(हिलाल अहमद के लेख पर एक टिप्पणी)



−अरुण माहेश्वरी


आज के ‘टेलिग्राफ’ में हिलाल अहमद का एक दिलचस्प लेख है – ‘जनतांत्रिक’ बीजेपी के सामने चुनौतियां : संभावित अशांति । (The challenges faced by ‘democratic’ BJP : Potential Turbulence) इस ‘संभावित अशांति’ को दूसरे शब्दों में ‘अशनि संकेत’ भी कहा जा सकता है । 

यह लेख भारत की संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की परिस्थिति में सत्ता में जमी हुई बीजेपी के बारे में है । किसी भी प्रमाता (subject) को खास पारिस्थितिकी (topology) में कीलित (wedged) करके देखने से उसकी जो एक जड़ छवि बन सकती है, भारत की जनतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में आरएसएस की राजनीतिक शाखा बीजेपी की ‘जनतांत्रिक बीजेपी’ वाली छवि, वैसी ही एक छवि है ।

हिलाल अहमद अपने इस लेख का अंत इस वाक्य से करते हैं – “ इस अर्थ में, एक जनतांत्रिक पार्टी के रूप में बीजेपी का बने रहना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और जनतांत्रिक दृष्टि से वांछनीय है ।” (The survival of the BJP as a democratic party, in this sense, is politically crucial and democratically desirable.)

‘इस अर्थ में’ ! क्या तात्पर्य है इससे ? हिलाल अहमद बताते हैं कि – “बीजेपी सिर्फ एक राजनीतिक विचारधारा की प्रतिनिधि नहीं है; वह उतनी ही इस देश के जनतांत्रिक परिवेश का अंग भी है । उसके सामने जो भी चुनौतियां हैं वे हमारे जनतंत्र की व्यवहारिकताओं से जुड़ी हुई हैं ।”

किसी भी विषय पर विचार के क्रम में यही वह ‘तात्कालिकता’ का बिंदु है जब हम अनायास ही प्रमाता को उसकी अपनी प्राणीसत्ता (being) से बिल्कुल अलग करके उसे महज उसके तात्कालिक परिवेश की उपज, उसी तक सीमित, और उसी में पूरी तरह से जकड़ा हुआ मान लेते हैं । अर्थात् उसके जन्म, जीवन और मृत्यु के वृत्तांत को, पूर्वापर विवेचन को अर्थहीन समझते हैं । हम भूल जाते हैं कि हर निकाय की स्वयं के अपने नियम-नीतियों से आबद्ध अपनी एक प्राणीसत्ता होती है । शुद्ध रूप में विवेचित किये जाने पर वह अपनी प्राणीसत्ता के नियम से ही चालित होता हुआ नजर आ सकता है । राजनीतिक दलों की बहुत सी कर्मकांडों की तरह की गतिविधियों में उसे साफ देखा जा सकता है ।

जहां तक भाजपा का संबंध है, उसके अध्ययन के लिए तो किसी के भी लिए एक अतिरिक्त सुविधा यह है कि आरएसएस के रूप में उसका शुद्ध रूप सबके सामने बिल्कुल जीता-जागता, ठोस रूप में विद्यमान है । आरएसएस के तमाम राजनीतिक लक्ष्य हो सकते हैं, पर वह इसीलिए अपने को समग्र राजनीतिक परिवेश से अछूता रखे हुए हैं, क्योंकि उसने अपने को एक ऐसी स्थिति में रख छोड़ा है जब राजनीति के जगत की अन्य शक्तियों से सीधे अन्तर्क्रिया करने की उसके सामने कोई अनिवार्यता नहीं है । पर उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा को निश्चित तौर पर यह सुविधा नहीं मिली हुई है । राजनीतिक दल के नाते उसे समग्र राजनीतिक परिवेश में ही काम करना पड़ता है । इसीलिए, वह यह जानती है कि जनतंत्र में राजनीतिक दल क्या नहीं होता है; राजनीतिक दल अपनी पहचान को राजनीतिक दलों के बीच ही पाते हैं; और वह अपने को इसीलिए जनतांत्रिक राजनीतिक दल कहती है क्योंकि अन्यथा अन्य राजनीतिक दल उसे राजनीतिक दल ही नहीं मानेंगे ।

यही वजह है कि आरएसएस का जो एकचालिकानुवर्तित्व का सिद्धांत उस संगठन के समग्र क्रियाकलापों और सिद्धांतों पर लागू होता है, भाजपा के मामले में वह सिद्धांत कुछ हद तक पीछे छिप जाता है । चुनाव आयोग के कायदे-कानून और राजनीतिक गंठजोड़ों की जरूरतों के तमाम नीति-नियम स्वाभाविक तौर पर उस पर लागू होने लगते हैं । यहां तक कि उसे धर्म-निरपेक्षता की भी कसमें खानी पड़ती है । इस अर्थ में देखें तो वह अपने मूल संगठन, आरएसएस से विच्छिन्न हो जाती है ।  

यह प्रमाता की विच्छिन्नता का एक सामान्य नियम है । प्रमाता का अपना परिवेश उसके अवचेतन का स्थान होता है । जिस क्षण प्रमाता में इस अवचेतन का, अर्थात् उसके अंदर का अप्रकट प्रकट होता है, उसी क्षण उसमें एक विच्छिन्नता पैदा होती है । वह अपनी मूल प्राणीसत्ता से कटता जाता है । इसके अलावा, प्रमाता में अन्य के साथ संपर्क से एक क्षति भी पैदा होती है । वह जब अन्य में अपने को पाने की कोशिश करता है, तब वह वहां अपने को क्षतिग्रस्त अंश के रूप में ही पा सकता है । 

मनोविश्लेषण की भाषा में, आरएसएस बीजेपी का master signifier है, प्रमुख संकेतक, उसका एक ईश्वर । ईश्वर के नाते आरएसएस किसी न किसी रूप में बीजेपी को petrified, जड़ीभूत करता है। इससे भी राजनीतिक दल के रूप में उसकी अपनी सत्ता क्षतिग्रस्त होती है । अपनी इस क्षतिग्रस्त प्राणीसत्ता से भी विच्छिन्न हो कर प्रमाता के रूप में बीजेपी राजनीतिक जगत की संकेतक श्रृंखला में अपनी एक अहमइदम की, अन्य राजनीतिक दलों के संदर्भ से जुड़ी, पहचान हासिल करती है । और कहना न होगा, उसकी यही पहचान आरएसएस के साथ उसके नाभि-नाल संबंध को, उसकी नैसर्गिक पहचान को छिपाती है ।

बड़ी आसानी से सामान्य राजनीतिक टिप्पणीकार भाजपा की मूलभूत, संघी, एकचालिकानुवर्तित्व के सिद्धांत से जुड़ी फासिस्ट प्रवृत्तियों को भूल जाते हैं और उसके विच्छिन्न, राजनीतिक जगत के ढांचे में उसके पुनरोदित रूप को ही अपने मन में बसा लेते हैं । प्रमाता अपनी प्राणीसत्ता से विच्छिन्न हो कर इसी प्रकार उसके लिए प्रतीक्षारत भाषा के क्षेत्र में उदित होता है और अन्य के स्थान पर उत्कीर्ण (inscribed) हो जाता है, अर्थात् वह अन्य के कागज पर लिखा जाता है ।

जब भी कोई ‘जनतांत्रिक’ भाजपा की बात करता है, तो वह भूल जाता है कि यह उसका अपने मूल रूप से कटा हुआ एक भ्रष्ट रूप है, जो उसके खुद के नहीं, सिर्फ ‘अन्य’ के कागज पर लिखा होता है । जहां तक  उसकी अपनी मूल प्रकृति का सवाल है, वह अपनी जगह कायम है ; खास तौर पर भाजपा के मामले में तो आरएसएस के जरिए उसके निखालिस रूप में साक्षात मौजूद हैं । ‘अन्य’ के साथ उसका संबंध इस प्रकार का द्वंद्वात्मक होता है कि उसमें वह जितना अपने को खोता है, उतना ही अन्य के जगत में अपना स्थान बना पाता है, और जितना अपने में बना रहता है, उतना ही ‘अन्य’ से कटता जाता है । 

पिछले नौ साल के मोदी के शासन को देखिए । देश की सभी संवैधानिक और जनतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता का हनन यही बताता है कि भाजपा की अपनी मूलभूत संघी, एकाधिकारवादी प्राणीसत्ता अपने को स्थापित करने के लिए किस प्रकार पूरा जोर मार रही है । जाहिर है कि उसी अनुपात में भारत की जनतांत्रिक राजनीति से उसका अलगाव भी बढ़ रहा है । अब यदि वह समग्र परिस्थितियों को इस हद तक बदल देने में सफल हो जाते हैं कि देश की तमाम संवैधानिक और जनतांत्रिक संस्थाओं की हत्या ही कर दी जाती हैं, जैसा कि हिटलर के काल में हुआ था, तब उस पारिस्थितिकी (topology) के चौखटे में बीजेपी के साथ ‘जनतांत्रिक’ का तमगा लगाना असंभव हो जाएगा । इसीलिए बीजेपी तभी तक ‘जनतांत्रिक’ है, जब तक हमारे देश में जनतंत्र बचा हुआ है । जिस दिन बीजेपी की आकांक्षाओं की पूर्ति के मूल मंत्र, एकचालिकानुवर्तित्व का पूर्ण प्रभुत्व हो जाएगा, बीजेपी जनतांत्रिक नहीं, सिर्फ अपने निपट नंगे, मूल फासिस्ट रूप में सामने होगी । 

यही वजह है कि जब भी कोई बीजेपी के बने रहने की ‘वांछनीयता’ की सैद्धांतिकी तैयार करता है, उसके लिए पहली शर्त यह है कि उसे बीजेपी की मूल संघी प्राणीसत्ता को ताक पर रख कर, अर्थात् भूल कर चलना होगा । वह जो आज है, खुद में जितनी क्षतिग्रस्त और देश की राजनीति को उसने जितना क्षतिग्रस्त कर दिया है, उसे ही स्थायी मान कर चलने पर ही बीजेपी के प्रति इस प्रकार के किसी उदारमना सैद्धांतिकी का कोई, मामूली ही क्यों न हो, औचित्य हो सकता है । वास्तविकता यह है कि ऐसी सैद्धांतिकी महज एक पत्रकारितामूलक, तात्कालिक खपत के लिए किए गए लेखन से अधिक कोई मायने नहीं रखती है । चीजों को उनकी गत्यात्मकता में न देखना पत्रकारितामूलक लेखन का सबसे बड़ा दोष होता है, जो सिर्फ सत्य पर पर्दादारी का काम करता है, उसके विकासमान स्वरूप की कोई समझ नहीं देता । 

बीजेपी या कोई भी फासिस्ट विचारों पर टिका हुआ राजनीतिक संगठन किसी भी सैद्धांतिकी के अनुसार जनतंत्र के लिए वांछनीय नहीं हो सकता है ।       


गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

कर्नाटक अभी से बीजेपी के भविष्य का संकेत देने लगा है

  

−अरुण माहेश्वरी 



कर्नाटक में सभी सूत्र अब कांग्रेस की भारी जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं । 

सी वोटर के यशवंत देशमुख, जो मोदी-शाह के तमाम नैतिक-अनैतिक चुनावी दांव-पेंचों के पंचमुख प्रशंसक रहे हैं, और राजनीति की अपनी खास समझ के अनुसार इन सारी करतूतों को ही राजनीति माने हुए हैं,  वे भी, मन मार के ही क्यों न हो, कर्नाटक में कांग्रेस को उसकी बढ़त की स्थिति से हटा नहीं पा रहे हैं । 

फिर भी, अपने पर क़ाबू रखते हुए इतना ज़रूर कर रहे हैं कि किसी न किसी बहाने यह मानने से इंकार करते हैं कि कांग्रेस की बढ़त हर बीतते दिन के साथ बढ़ रही है । वहां बीजेपी लगभग पूरी तरह से बिखर चुकी है, उसके पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार के स्तर के परंपरागत रूप से आरएसएस से जुड़े व्यक्ति तक बीजेपी को छोड़ कर कांग्रेस के पाले में चले गए हैं । उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी पहले ही कांग्रेस का झंडा उठाए घूम रहे हैं । और कई विधायक तथा भारी संख्या में बीजेपी के कार्यकर्ता उसे छोड़ चुके हैं । कर्नाटक में बीजेपी के नाम पर अभी सिर्फ पैसा फेंक कर थोथे दिखावे का खेल बच गया है । मोदी तिरछी टोपी लगा कर भाड़े की भीड़ के सामने हाथ हिलाते हुए घूम रहे हैं और अपने पर फूलों की बारिस कर रहे हैं । वास्तविकता यह है कि उसकी दशा जेडीएस से भी कमजोर हो चुकी है । जेडीएस के पास अपना एक खास वोट बैंक हैं, पर बीजेपी के पास थोथे अहंकार के अलावा कुछ नहीं है । 

फिर भी सी वोटर के यशवंत देशमुख यही कह रहे हैं कि अभी यह कहना मुश्किल है कि ‘कांग्रेस की स्थिति में कोई गिरावट आई है’ । अर्थात् बीजेपी की अगाध शक्ति के प्रति आज भी उनकी आस्था इतनी प्रबल है कि वे कांग्रेस की स्थिति में तेज वृद्धि की बात को खुल कर नहीं स्वीकार सकते हैं ।     

कुछ यही स्थिति देशमुख के सैद्धांतिक जोड़ीदार, कम्युनिस्टों के वर्गवादी मानदंडों की तर्ज पर भारतीय समाज के सभी लक्षणों के जातिवादी निदान के अमोघ शस्त्र के धारक अभय दूबे जी की भी है । वे भी बीजेपी और खास तौर पर मोदी की ईश्वरीय शक्ति के प्रति अगाध आस्था रखते हैं । 

दरअसल, यह मामला मोदी की शक्ति का नहीं, मूलतः हर दबंग सत्ताधारी के प्रति पूजा भाव का वह खास मामला है जो गोदी मीडिया का तो एक मात्र भाव होने के साथ ही गोदी मीडिया की ओर रुझान रखने वाले कई दूसरे मीडियाकर्मियों और टिप्पणीकारों का भी स्थायी भाव हुआ करता है । 

हमें हमेशा यह सोच कर आश्चर्य होता है कि ऐसे विश्लेषक कैसे आपातकाल की तरह के काल के अंत में जो व्यापक जन-प्रतिरोध उभर कर सामने आया था वे तब उसकी कैसे कोई व्याख्या करते होंगे ! ऐसे किसी भी काल में जब मनुष्य एक झटके में अपने अंतर की सभी अन्य पहचान-मूलक बाधाओं को तोड़ कर अपनी मानवीय प्राणीसत्ता का परिचय देता हुआ स्वातंत्र्य के मूल मंत्र से चालित होने लगता है और बड़ी से बड़ी आततायी शक्ति के शासन को तहस-नहस कर देता है ; संक्रमण के जिस बिंदु पर जो दृश्य के बाहर होता है, वही चमत्कार की तरह यकबयक पूरे दृश्यपट पर छाने लगता है − तब ‘स्थिर जातिवादी-वर्गवादी पहचान के सिद्धांतों से चिपके रहने वाले व्याख्याकार कितने बौने हो जाते हैं, लगता है भारतीय राजनीति में फिर से एक बार इन दृश्यों को देखने का समय आ गया है । कर्नाटक में हमारी राजनीति का एक ऐसा ही संक्रमण बिंदु आभासित होने लगा है ।  


बहरहाल, हम इतना जरूर कहेंगे कि कर्नाटक में जो हो रहा है या होने जा रहा है, वह सिर्फ कांग्रेस की जीत नहीं, मोदी-शाह के भ्रष्ट और अपराधी शासन के प्रति भारत के लोगों का ज़बर्दस्त अस्वीकार है । जहां तक कांग्रेस का सवाल है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के ज़रिए कांग्रेस के तार को सीधे तौर पर भारत के आम लोगों के साथ जोड़ दिए हैं । अब वह अपने पुराने भ्रष्ट नेताओं के बजाये क्रमशः जन-आकांक्षाओं से चालित हो रही है, जन-भावनाओं के मंच के रूप में सामने आने लगी है । कांग्रेस की जन-कल्याणकारी प्रतिश्रुतियों के अलावा जाति-गणना की तरह की युगांतकारी सामाजिक न्याय की माँगों का आज एक राष्ट्रीय मंच कांग्रेस बन रही है । 

इसमें कोई शक नहीं है कि राहुल गांधी ने कांग्रेस को फिर एक बार वह आंतरिक विचारधारात्मक संहति प्रदान की है जो कांग्रेस को उसके परंपरागत दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समूहों से जोड़ती है, उसके अंदर की पुरानी परिवर्तनकारी गतिशीलता को पुनर्जीवित करती है । आज कांग्रेस का आम कार्यकर्ता पहले के किसी भी समय से ज्यादा उत्साहित और एकजुट है और कांग्रेस भारत में विपक्ष की राजनीति की धुरी बन चुकी है ।

आगे 2024 तक आते-आते, भारतीय राजनीति में बीजेपी और मोदी-शाह के धुर्रे कैसे उड़ेंगे, कर्नाटक से इसके सारे संकेत मिलने लगे हैं ।     


बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

मनुष्य क्या है ?

 

गांधी-गोडसे वितंडा पर असग़र वजाहत ने एक जगह अपनी सफ़ाई में लिखा है — मनुष्य मनुष्य होता है, कोई देवता नहीं होता । गांधी भी एक मनुष्य थे और गोडसे भी एक मनुष्य । 

इससे पता चलता है कि वे यह नहीं जानते कि मनुष्य क्या होता है ? वे नहीं जानते कि मनुष्य सिर्फ एक शरीर, या एक प्राणी नहीं होता । उसके शरीर के साथ जुड़ा होता है उसका भाषाई अस्तित्व । वह एक सोचने-बोलने वाला प्राणी होता है । जन्म के बाद से ही अपनी शारीरिक प्राणीसत्ता से अलग  एक सामाजिक प्राणीसत्ता। उसकी यह आदिम विच्छिन्नता उसे भाषाई भेदों के जगत का प्राणी बनाती है । इससे ही हर मनुष्य की अपनी अलग-अलग पहचान होती है । 

इसीलिए ‘ मनुष्य मनुष्य होता है’ की तरह की दलील का कोई मायने नहीं होता । जब मनुष्य की श्रेष्ठता की बात की जाती है तो मानव योनि में जन्में प्राणी के लिए नहीं, मनुष्यत्व के उन गुणों लिए होती है जो मनुष्यों के प्रतीकात्मक जगत के संकेतों से परिभाषित होते हैं । उनसे ही हम गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में और गोडसे को एक सांप्रदायिक हत्यारे के रूप में पहचानते हैं । गांधी और गोडसे पर कोई भी चर्चा उनके अस्तित्व की इन पहचानों के साथ ही शुरू हो सकती है, उन्हें अनदेखा करके नहीं । 

हम नहीं जानते कि कोई कथाकार कैसे मनुष्यों के समाज में शुद्ध ‘मनुष्यमात्र’ की कथा लिख सकता है ! यह वैसी ही कथा होगी, जैसी पंचतंत्र की कथाएं हैं जिनमें पशु-पक्षी मनुष्यों की शिक्षा की बातें कहते हैं । वहाँ चरित्र नहीं, बातें प्रमुख होती है । अगर मनुष्यों के बीच संवाद का मसला उतना ही सरल होता तो गांधी-गोडसे के संवादों को तोता-मैना के संवाद के रूप में भी रखा जा सकता था ! 

असग़र वजाहत की तरह के आम तौर पर अभिधा में एकायामी चरित्रों की उपदेशात्मक कहानियाँ लिखने वाले लेखक ही ऐसा कर सकते हैं, और उन्होंने यही किया भी है । इसी वजह से उन्हें ‘मनुष्य’ के नाम पर मनुष्य की जटिल अस्मिताओं के विषय के कुत्सित सरलीकरण के आरोप की बात कभी समझ में नहीं आ सकती है । यह अभिधा-शैली के लेखक की ख़ास विडंबना है । इस शैली के लेखक की कथित ‘कलात्मक उड़ान’ का शायद यही हश्र हुआ करता है !

-- अरुण माहेश्वरी

सोमवार, 5 दिसंबर 2022

प्रतिवाद को क्या शब्दों का अभाव !

 

—अरुण माहेश्वरी


एक युग हुआ । सन् 2010 के बसंत का महीना था । तब अरब देशों में ‘सदियों’ की तानाशाहियों की घुटन में बसंत की एक नई बहार आई थी । ‘अरब स्प्रिंग’ । कहते हैं कि वह इस अरब जगत के लोगों के अंतर के सुप्त आकाश में इंटरनेट की एक नई भाषा के स्पर्श से उत्पन्न हर्षातिरेक का आंदोलनकारी प्रभाव था । बिना किसी पूर्व संकेत के रातो-रात लाखों लोग राजधानी शहरों के मुख्य केंद्रों में जमा होकर अपने देश की ‘अजेय’ तानाशाहियों को चुनौती देने लगे थे । सामने बंदूके ताने सैनिक और टैंक खड़े थे । पर जैसे जान की किसी को कोई फिक्र ही नहीं थी । बेजुबान जिंदगी के होने, न होने का वैसे ही कोई अर्थ नहीं था ! आदमी तभी तक जिन्दा है जब तक उसके पास अपनी जुबान है । ‘अपनी’ जुबान, अन्य की उधार ‘जुबान’ नहीं । अर्थात् स्वतंत्रता है तो मनुष्यता है, अन्यथा जीने, मरने का कोई अर्थ नहीं ! 

तुनीसिया से मोरक्को, इराक, अल्जीरिया, लेबनान, जौर्डन, कुवैत, ओमान और सुडान से होते हुए जिबोती, मौरिटौनिया, फिलीस्तीन और सऊदी अरबिया तक के मुख्य शहरों के केंद्रीय परिसरों में प्रतिवाद की आवाजों की जो ध्वनि-प्रतिध्वनि तब शुरू हुई थी, सच कहा जाए तो वह आज तक भी पूरी तरह से थमी नहीं है । इस दौरान इस क्षेत्र में न जाने कितने प्रकार के विध्वंसक संघर्ष और युद्ध हो गए, पर वह आग अब तक बुझी नहीं है । क्रांति के अपेक्षित परिणामों की तलाश कहीं भी थमी नहीं है । इसीलिए, क्योंकि वहां के लोगों ने जीवन की जिस एक नई भाषा को पाया है, उसे उनसे कोई छीन नहीं पाया है और न ही कभी छीन पायेगा । सदियों के धार्मिक अंधेरे से निकलना अब उनकी भी नियति है, जैसी बाकी सारी मनुष्यता की है ।   

दरअसल, मनुष्य का प्रतिवाद महज किसी भाषाई उपक्रम का परिणाम नहीं होता है, अर्थात् अभिनवगुप्त की भाषा में वह ‘शब्दज शब्द’ नहीं है । प्रतिवाद खुद में एक भाषाई उपक्रम है । इसे रोका नहीं जा सकता । भाषा की इस लाग से जीवित आदमी की कभी भी मुक्ति नहीं, बल्कि वही मनुष्य की पहचान होती है ।

आज की ही खबर है, आक्सफोर्ड में अंग्रेजी शब्दकोश बनाने वाले लेक्सिकोग्राफरों ने इस साल के सबसे अच्छे तीन नए पदबंधों में से एक को चुनने के लिए आम लोगों से राय मांगी थी । ये तीन शब्द थे — मेटावर्स, #आईस्टैंडविथ और गोबलिन मोड (goblin mode)। कुल 3,18,956 लोगों ने इन तीनों में से सबसे पहले स्थान के लिए जिस शब्द को चुना, वह है — गोबलिन मोड । इसका अर्थ होता है ऐसा बेलौस, अव्यवस्थित जीवन-यापन जो किसी सामाजिक अपेक्षा की परवाह नहीं करता है । ‘मेटावर्स’ को दूसरे स्थान पर रखा गया और ‘#आईस्टैंडविथ’ को तीसरे पर । 

अर्थात् लोगों की पहली पसंद है — स्वतंत्रता । नई तकनीक से परिभाषित पाठ के लिए मेटावर्स और समाज के साथ एकजुटता के भाव से अधिक सार्थक शब्द है — व्यक्ति स्वातंत्र्य का बोध कराने वाला पदबंध ‘गोबलिन मोड’। उसे ही वर्ष 2022 का सबसे श्रेष्ठ नया शब्द घोषित किया गया है । 

आज हम जब चीन में शासन के द्वारा कोविड के नाम पर चल रहे मूर्खतापूर्ण प्रतिबंधों के खिलाफ A4 आंदोलन की हकीकत को देखते हैं और जब ईरान में नैतिक पुलिस की स्त्री-विरोधी गंदगियों के खिलाफ जान पर खेल कर किए जा रहे प्रतिवाद के सच को देखते हैं, तब भी अनायास मनुष्य के अंतर में स्वातंत्र्य के भाव से उत्पन्न उसके उद्गारों के अनोखे यथार्थ के नाना रूप सामने आते हैं । ये दोनों आंदोलन आज आततायी राज्य के सामने भारी पड़ रहे हैं ।

नोम चोमश्की को आधुनिक भाषा विज्ञान का प्रवर्तक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने भाषा के मामले को मूलतः मनुष्य की जैविक क्रिया के रूप में देखने पर बल दिया था । वे मनुष्य की भाषा और उसके शरीर की क्रियाओं को अलग-अलग देखने के पक्ष में नहीं है । उन्होंने भाषा शास्त्र को जैविक-भाषाई (bio-lingual) आधार पर स्थापित करने की बात की थी ।  

हमारे यहां तो हजारों साल पहले पाणिनी से लेकर अभिनवगुप्त तक ने शब्दों के बारे में यही कहा है कि यह मनुष्य के शरीर के मुख प्रदेश से निकली हुई, उसकी जैविक क्रिया के परिणाम हैं । अभिनवगुप्त ने ही शब्द की ध्वनियों को खौलते हुए पानी के बर्तन की वाष्प से उसके छिद्र (शरीर के मुख) के आकाश के संपर्क से उत्पन्न प्रतिध्वन्यात्मक प्रतिबिंब कहा था । (पिठिरादिपिधानांशविशिष्टछिद्रसंगतौ / चित्रत्वाच्चास्य शब्दस्य प्रतिबिम्बं मुखादिवत् ) अपने तंत्रालोक में वे शरीर के अलग-अलग अंगों से बिम्बित-प्रतिबिम्बित भावों की ध्वनियों के अलग-अलग, हर्ष और विषाद के ध्वनि रूपों तक का विश्लेषण करते हैं । पाणिनी के व्याकरण से लेकर अभिनवगुप्त के तंत्रशास्त्र में वर्णों के स्वर-व्यंजन रूपों के उद्गम की इस कहानी को पढ़ना सचमुच एक बेहद दिलचस्प अनुभव है ।    

पर आज चीन में तो हम भाषा की नहीं, भाषाहीनता की, मौन, बल्कि शास्त्रीय भाषा में कहे तो नश्यदवस्था वाले अप्रकट शब्द की, अर्थात् अप्रतिध्वनित ध्वनि के एक अद्भुत संसार के साक्षी बन रहे हैं । 

कल (5 दिसंबर 2022) के टेलिग्राफ में चीन में चल रहे प्रतिवाद के बारे में एक खबर का शीर्षक है — ‘चीन में तलवार से ज्यादा ताकत है A4 में’ । अर्थात् ए4 साईज के खाली कागज में । कागज के अंदर फंसी पड़ी अलिखित, अप्रकट, अव्यक्त, ध्वनि में । 

सचमुच थ्यानमन स्क्वायर (1989) वाले चीन में आज खाली कागज का टुकड़ा ! कभी एक महाशक्तिशाली राज्य के टैंकों से भिड़ जाने का तेवर और आज सिर्फ एक सादा कागज ! बस इतना ही महाबली की जीरो कोविड नीति की अप्राकृतिक अमानुषिकता के लिए भारी साबित हो रहा है ! पिछले कई दिनों से यह सिलसिला इंटरनेट के मीम्स के जरिए और चीन की चित्रमय मैंडरीन भाषा में नुक्ते के फेर से सारे अर्थों को बदल डालने के भाषाई प्रयोगों के जरिए चल रहा था । अब  उसका स्थान बिना किसी आकृति के कोरे कागज ने ले लिया है ।  


चंद रोज पहले रूस में लोग एक कागज पर स्वातंत्र्य के गणितीय समीकरण को लिख कर लहरा रहे थे । यह गणितज्ञ एलेक्स फ्राइडमान का एक ऐसा अंतहीन समीकरण है जिसे उसकी अनंतता के कारण ही ‘फ्रीमैन’ की संज्ञा दी गई है । इसके अलावा कुछ लोग कागज पर सिर्फ विस्मयादिबोधक चिन्ह (!) को एक लाल वृत्त में घेर कर लहरा रहे थे । जब ‘व्हाट्सएप’ या ‘वी चैट’ की तरह के ऐप से कोई संदेष सामने वाले को प्रेषित नहीं हो पाता है, तब उसके सामने यही विस्मयादिबोधक चिन्ह उभर कर आ जाता है । अर्थात् अप्रेषित संदेश जो अदृश्य कारणों से अपने गंतव्य तक जा नहीं पाया है । विस्मय का वह चिन्ह ही अदृश्य राज्य के दमन के खिलाफ प्रतिवाद का प्रतीक बन गया । 

रूस में जब ऐसे एक प्रदर्शनकारी से इसका अर्थ पूछा गया तो उसका संक्षिप्त सा जवाब था — ‘सब जानते हैं’ । अर्थात् अव्यक्त भावों के लिए कोई भी चिन्ह पहले से सुनिश्चित नहीं होता है । उसके कोई रूप ग्रहण करने का निश्चित नियम नहीं होता है । वह महज एक सुविधा का विषय है ।  

सोचिए, क्रांति का रास्ता रूसी क्रांति जैसा होगा, या चीनी क्रांति या किसी और जगह जैसा ? कितना बचकाना है यह सवाल !

चीन में जो नए-नए नारे तैयार हो रहे हैं, उनमें ‘शी जिन पिंग मुर्दाबाद’, ‘कोविड का परीक्षण नहीं चाहिए’ या ‘हमें आजादी चाहिए’ जैसे नारे तो शामिल हैं ही, पर साथ ही ऐसे विपरिअर्थी नारे भी है कि — ‘हमें और ज्यादा लॉक डाउन चाहिए’ ; ‘हमें कोविड परीक्षण चाहिए’ (I want more Lockdowns, I want to do Covid Tests) । माओ की चर्चित उक्तियां भी प्रयोग में लायी जा रही है — अब चीन के लोग संगठित हो गए हैं, और उनमें सिर घुसाने की कोशिश मत करो ।(Now the Chinese people have organised and no one should mess with them) 

चीन की चित्रात्मक भाषा में एक ही वर्तनी के भिन्न उच्चारण से शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं । मसलन् banana skin को फेंको को ही भिन्न रूप में उच्चारित करने पर ध्वनित होता है — शी जिन पिंग को फेंको । फुटबाल विश्व कप के खेलों में बिना मास्क पहने दर्शकों की तस्वीरें भी वहां कोविड के प्रतिबंधों के प्रतिवाद का रूप ले चुकी है ।  

सचमुच, सवाल है कि प्रमुख क्या है ? प्रतिवाद का भाव या उसका रूप । शब्द या मौन ! आकृति या खाली कैनवास ! भाव खुद अपनी अभिव्यक्ति की आकृतियां गढ़ लेते हैं । भाषा तो मनुष्य के भावोच्छ्वासों के आकाशीय प्रतिबिंबों की उपज है । उन्हें भला कोई कैसे और कब तक दबा कर रख सकता है !


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

अपने उद्देश्य की सही दिशा में सफलता से आगे बढ़ रही है — भारत जोड़ो यात्रा

 

— अरुण माहेश्वरी 





इसमें कोई शक नहीं है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा‘ कांग्रेस नामक राजनीतिक दल से जुड़ी उस सांकेतिकता को सींच रही है, जिससे भारतीय राजनीति में स्वतंत्रता, धर्म-निरपेक्षता, जनतंत्र और राज्य के संघीय ढाँचे के मूल्य ध्वनित होते हैं । 


ये मूल्य आरएसएस और मोदी के शासन के खिलाफ संघर्ष के अनिवार्य पहलू है । राजनीति में इन मूल्यों की कमजोरी के समानुपात में ही फासीवादी हिंदुत्व की जड़ें मज़बूत होती है । 


अगर 2024 की लड़ाई सांप्रदायिक फासीवाद बनाम धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र, केंद्रीयकृत राजसत्ता बनाम राज्य का संघीय ढाँचा, स्वेच्छाचार बनाम क़ानून का शासन, एकाधिकारवाद बनाम संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, हिंदुत्व बनाम सर्वधर्म सम भाव — कुल मिला कर तानाशाही बनाम जनतंत्र की तरह के वैचारिक संघर्ष के मुद्दों पर लड़ी जानी है, तो ‘भारत जोड़ो यात्रा‘ निश्चित तौर पर इस लड़ाई में कांग्रेस पक्ष के लिए एक पुख़्ता ज़मीन तैयार करने का काम कर रही है । 


स्थानीय निकायों से लेकर विधानसभा सभा चुनावों तक में उम्मीदवारों की पहचान, उनकी लोकप्रियता और छोटी-छोटी अस्मिताओं के सवाल और बूथ-स्तर के संगठनों की जितनी बड़ी भूमिका होती है, लोकसभा चुनाव का परिप्रेक्ष्य इन सबसे बहुत हद तक अलग हुआ करता है । 


यह एक लकानियन सिद्धांत है कि जानकारी पर टिका हुआ प्रमाता और संकेतकों का प्रमाता दो बिल्कुल अलग-अलग चीजें हुआ करते हैं । There is nothing in common between the subject of knowledge and the subject of signifier. 


भारत में विधान सभा और लोकसभा के चुनावों में subject of knowledge और subject of signifier के उपरोक्त भेद को बिल्कुल साफ़ तौर पर देखा जा सकता है । लोकसभा चुनावों के लिए पार्टियों की सांगठनिक शक्ति के ताने-बाने को तैयार करने के साथ ही उसके विचारधारामूलक सांकेतिक पक्षों को तीव्र रूप में सामने लाने का काम अतीव महत्व का काम होता है । 


सचमुच यह संतोष की बात है कि भारत में विपक्ष की सबसे प्रमुख पार्टी कांग्रेस ने अपने अध्यक्ष के चुनाव के साथ ही जहाँ अपने सांगठनिक ढाँचे पर क्रियाशीलता को एक प्राथमिकता दी है, वहीं ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की तरह के एक सर्व-समावेशी, व्यापक जन-आलोड़न पैदा करने के कार्यक्रम के ज़रिये ‘विविधता में एकता’ की अपनी राजनीति के संदेश के प्रसार के कार्यक्रम को संजीदगी से अपनाया है । निःसंदेह, कांग्रेस की तैयारियों का यही दो-तरफ़ा स्वरूप 2024 की लड़ाई में उसके लिए पुख़्ता ज़मीन तैयार कर रहा है । 


इसमें सबसे अच्छी बात यह भी है कि राहुल गांधी अपनी सदाशयता और प्रेम की सारी बातों के बावजूद बीच-बीच में सामने आने वाले कठोर विचारधारात्मक सवालों से सीधे टकराने में जरा सा भी परहेज़ नहीं कर रहे हैं । 


मसलन्, सावरकर के प्रश्न पर ही, राहुल गांधी ने अंग्रेजों के प्रति उनकी वफ़ादारी के दस्तावेज़ों को सबके सामने रखने में कोई कोताही नहीं बरती । राष्ट्रवाद और देशभक्ति की तरह के वैचारिक सवालों पर कांग्रेस के पक्ष को बिल्कुल साफ़ रूप में पेश करने के लिए ही यह ज़रूरी है कि आरएसएस के पूरे नेतृत्व की मुखबिरों वाली देशभक्ति का बेख़ौफ़ ढंग से पर्दाफ़ाश किया जाए । ऐसे सवालों से कतराना या इन पर किसी प्रकार की हिचक दिखाना संघर्ष की साफ़ दिशा को ओझल करता है । और हर प्रकार के वैचारिक भ्रम या अस्पष्टता की स्थिति फासिस्टों के लिए बहुत लाभकारी हुआ करती है । 


इसमें कोई शक नहीं है कि 2024 के चुनाव में महंगाई, बेरोज़गारी तथा आर्थिक बदहाली के साथ ही राष्ट्रीयता और देशभक्ति की तरह के सांकेतिक मुद्दे कम निर्णायक भूमिका अदा नहीं करेंगे । इसीलिए, इस बात को बार-बार बताने की ज़रूरत है कि सावरकर ने न सिर्फ़ लिख कर अंग्रेजों की सेवा की इच्छा ज़ाहिर की थी, बल्कि अपनी वास्तविक राजनीति के ज़रिए भी वही किया था । यह नहीं भूलना चाहिए कि साम्राज्यवाद का कोई चाकर ही भारत में हिंदुत्व की विभाजनकारी राजनीति का प्रवर्तक और गांधी जी की हत्या का षड़यंत्रकारी हो सकता था। सावरकर में इस विषय पर कोई द्वैत नहीं बचा था कि भारत की राजनीति में उनकी भूमिका के अलग-अलग अर्थ निकाले जा सकें । 


‘भारत जोड़ों यात्रा’ को न सिर्फ़ भारत के बहुलतावाद और सर्वधर्म सम भाव पर आधारित धर्मनिरपेक्ष राज्य के मुद्दों को दृढ़ता के साथ सामने लाना है, बल्कि सावरकर की तरह के मुखबिरों की विभाजनकारी ‘देशभक्ति’ के बरक्स गांधी-नेहरू-पटेल सहित राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल समाज के सभी तबकों के त्याग और बलिदान की गौरवशाली परंपरा को भी स्थापित करना है । राहुल गाँधी ने दृढ़ता के साथ इस प्रसंग को उठा कर देशभक्ति के धरातल पर भी आरएसएस-मोदी के सामने एक सीधी चुनौती पेश की है । 


चुनावी गणित के नितांत स्थानीय और तात्कलिक मुद्दों के शोर में शामिल होने वाले संकीर्ण सोच के विश्लेषकों में लोकसभा चुनावों में सांकेतिक मुद्दों के महत्व की कोई समझ नहीं होती है । इसीलिए वे कभी या तो राहुल गांधी की यात्रा के रूट को लेकर परेशान रहते हैं, तो कभी उनके द्वारा सावरकर का नाम लिए जाने पर सिर पीट रहे होते हैं । इसकी वजह है उनके पास एक सर्वग्रासी फ़ासिस्ट शासन के विरुध्द व्यापकतम जनतांत्रिक प्रतिरोध की लड़ाई की रणनीति की समझ का अभाव । 


हमने इस यात्रा के प्रारंभ में ही इसे न सिर्फ़ भारत में, बल्कि सारी दुनिया मे फासीवाद के विरुद्ध समूची जनता को लामबंद करने का एक नायाब प्रयोग बताया था । हर बीतते दिन, और इस यात्रा के हर बढ़ते हुए कदम के साथ पूरे देश में इसके प्रति जिस उत्सुकता और उत्साह का वातावरण तैयार हो रहा है और जिस प्रकार क्रमशः आम लोगों के अंदर फ़ासिस्ट शासन के प्रति ख़ौफ़ की ज़ंजीरें टूट रही हैं, वह इसी बात का प्रमाण है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ अपने उद्देश्य और दिशा, दोनों दृष्टि से ही सफलतापूर्वक आगे बढ़ रही है । हर सच्चे जनतंत्र प्रेमी व्यक्ति और शक्ति को इसकी सफलता के लिए यथासंभव योगदान करना चाहिए।


(20.11.2022)

गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

रवीश कुमार ज़िंदाबाद !

 

— अरुण माहेश्वरी 



मोदी-अडानी, अर्थात् सरकार-कारपोरेट की धुरी का एनडीटीवी पर झपट्टा भारत के मीडिया जगत में एक घटना के तौर पर दर्ज हुआ है । एक ऐसी घटना के तौर पर जो अपने वक्त के सत्य को सारे आवरणों को चीर कर सामने खड़ा कर दिया करती है । नंगे राजा के बदन के मांस, मज्जा को भी खींच कर निकाल देती है । आज का शासन हर स्वतंत्र आवाज़ को पूरी ताक़त के साथ कुचल डालने के लिए आमादा है, इस पूरे घटनाक्रम ने इसे पूरी तरहसे पुष्ट कर दिया है । 




और, कहना न होगा, इस पूरी घटना को एक ठोस, वैयक्तिक रूप प्रदान किया है रवीश कुमार ने । एनडीटीवी पर सरकार-कारपोरेट धुरी का क़ब्ज़ा जैसे सिर्फ़ एक व्यापारिक मीडिया घराने की मिल्कियत पर एक और मालिक का क़ब्ज़ा भर नहीं, बल्कि भारतीय जनतंत्र में सच की आवाज़ का एक प्रतीक बन चुके रवीश कुमार का गला घोंटने की कोशिश का भी सरे आम एक निर्मम, निकृष्ट प्रदर्शन है । 




इसमें शक नहीं है कि रवीश कुमार-विहीन एनडीटीवी का सचमुच स्वयं में कोई ऐसा विशेष मायने नहीं है, कि उस पर सत्ताधारियों के क़ब्ज़े को मीडिया जगत के लिए किसी अघटन के रूप में देखा जाता । पर रवीश महज़ एक एंकर नहीं रह गये हैं । वे इस समय में फ़ासिस्ट दमन के प्रतिरोध और प्रतिवाद की आवाज़ के आदर्श प्रतीक के रूप में उभरे हैं । 




एक पत्रकार के रूप में उनकी कड़ी मेहनत, विषय की परत-दर-परत पड़ताल करने की तीक्ष्ण दृष्टि, अदम्य साहस के साथ एक अद्भुत लरजती हुई आवाज और धीर-गंभीर मुद्रा में उनकी प्रस्तुतियों ने उनमें पत्रकारिता के उन श्रेष्ठ मानकों को मूर्त किया हैं जो दुनिया के किसी भी पत्रकार के लिए किसी आदर्श से कम नहीं हैं । 




इसीलिए, आज उनका मज़ाक़ सिर्फ़ वे फूहड़ और बददिमाग़ लोग ही उड़ा सकते हैं, जो पत्रकारिता के पेशे में होते हुए भी किसी भी मायने में पत्रकार नहीं बचे हैं । वे या तो शुद्ध रूप में सत्ता के दलाल है या ‘चतुर सुजान’ की भंगिमा अपनाए हुए महामूर्ख इंसान । वे मनुष्य के प्रतीकात्मक मूल्य के पहलू से पूरी तरह से अनजान, सिर्फ़ उसके हाड़-मांस के अस्तित्व की ही जानकारी रखते हैं और अपनी इसी जानकारी पर इतराते हुए आत्म मुग्ध रहा करते हैं । मुख्यधारा के मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में ऐसे ‘चतुर सुजानों’ की आपको एक पूरी जमात नज़र आ जाएगी । ऐसे लोगों के लिए प्रमाता के प्रतीकात्मक मूल्य से इंकार करके उसे लघुतर बनाना हमेशा एक खेल की तरह होता है । इसमें उन्हें कुछ वैसा ही मज़ा आता है, जैसे पौर्न के फेटिश खेल में जीवित इंसान को सिर्फ़ एक शरीर मान कर उससे मज़ा लूटा जाता है । 




इस लेखक ने तीन साल पहले ही अपनी एक विस्तृत टिप्पणी में रवीश कुमार को भारतीय मीडिया की एक विशेष परिघटना कहा था । आज एनडीटीवी पर सत्ताधारियों के क़ब्ज़े के वक्त गंभीर पत्रकारिता की पूरी बिरादरी ने जिस प्रकार की भावनाओं को व्यक्त किया है, उससे भी यही ज़ाहिर हुआ है कि एनडीटीवी और रवीश कुमार की तरह की पत्रकारिता पर कोई भी हमला पत्रकारिता-धर्म पर हमला है । यह जनतंत्र का एक स्तंभ कही जाने वाली एक प्रमुख संस्था पर हमला है । 




हम जानते हैं, सत्य को दबाने की जितनी भी कोशिश होती है, सत्य हमेशा नए-नए रूपों में सामने आने के रास्ते खोज लेता है । वह दमन की कोशिश की हर दरार के अंदर से और भी ज़्यादा तीव्र चमक के साथ आभासित होता है।  वह अपनी अनुपस्थिति में भी हमेशा उपस्थिति रहता है । मौक़ा मिलते ही सिर्फ़ लक्षणों में नहीं, ठोस रूप में भी प्रकट होता है । सत्य की संभावनाओं का कभी कोई अंत नहीं होता है । 




इसीलिए रवीश की संभावनाओं का भी कोई अंत नहीं होगा । जो कीर्तिमान उन्होंने स्थापित कर दिया है, उसे शायद ही कभी कोई मलिन कर पायेगा । और इस घटना को उनकी पारी का अंत मानना भी पूरी तरह से ग़लत साबित होगा ।