शनिवार, 17 सितंबर 2016

सम्पादकाचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा की दी हुई उलझनें


अरुण माहेश्वरी


 ‘इकोनामिस्ट’ पत्रिका के ताजा (21-27 मई 2016) अंक के अंतिम पृष्ठों पर भाषाशास्त्री जान्सन के नाम के स्तंभ ‘Prevailing winds’ (अभी की हवा) में अंग्रेजी भाषा में आधी सदी से चल रहे एक भारी युद्ध और उसके अब लगभग शमित हो जाने की दिलचस्प कहानी कही गई है। यह युद्ध है भाषा में शब्दों के प्रयोग के बारे में युद्ध। इसमें वे बताते हैं कि कैसे अंग्रेजी के भाषाविज्ञानी अब तक दो शिविरों में बटे हुए थे। एक ओर कोशकार और अकादमिक भाषाशास्त्री थे तो दूसरी ओर परंपरागत लेखक और संपादक। 1961 में वेबस्टर्स का तीसरा नया अन्तरराष्ट्रीय शब्दकोश आया था और उसमें ‘ain’t’ तथा ‘irregardless’ की तरह के चलताऊ शब्दों को शामिल किया गया था। इसने सबको बुरी तरह से चौंका दिया। दो खेमे तैयार होगये - लीक पकड़ कर चलने की नसीहत देने वाले नुस्खेबाज (prescriptionist) और जीवन में आ रहे परिवर्तनों को स्वीकारने की बात पर बल देने वाले वास्तववादी (describer)। दोनों एक दूसरे का खूब मजाक उड़ाते थे। नुस्खेबाजों पर आरोप था कि वे वास्तविक दुनिया से इंकार करके तानाशाह बने हुए हैं और वास्तववादियों को कहा जाता था कि इनके पास अपना कोई मानदंड ही नहीं है, जो चीज सामने आई उसी पर ठप्पा लगा देते हैं।

बहरहाल, इसी बीच एक वास्तववादी स्टीवन पिंकर की किताब आई - ‘The sense of style’। इस किताब का अंत एक अच्छे लेखन के बारे में दिये गये सुझाव अर्थात नुस्खे से किया गया था - यह करना चाहिए, यह नहीं करना चाहिए। यद्यपि उनकी बातें वास्तव पर, अर्थात चलन की भाषा पर ही आधारित थी, लेकिन सवाल यह था कि अंत में वे भी तो एक नुस्खे तक ही पहुंच गये थे।

इसके अलावा, ब्रायन गार्नर की दो किताबें आई - ‘Garner’s Modern English Usage’ और ‘The Chicago Guide to Grammar, Usage, and Punctuation’। इनके शीर्षक ही यह बताते हैं कि इनका घोषित उद्देश्य ही भाषा के प्रयोग में क्या करना चाहिए और क्या करने से बचना चाहिए के नुस्खे बताना था। लेकिन गार्नर अपने को एक वास्तवपरक नुस्खेबाज (descriptive prescriber) बताते हैं, अर्थात उनके नुस्खे या सुझाव किसी रूढि़बद्ध नियम के मुहताज नहीं है बल्कि चलन की ठोस जमीन से ही पैदा हुए हैं। गार्नर ने अपनी दूसरी किताब में अखबारों की कतरनों आदि को आधार बनाने के बजाय गूगल को अपना आधार बनाया है। गूगल ने इस बीच करोड़ों किताबें स्कैन की है और उससे कौन से शब्द किस प्रकार और कितने बड़े पैमाने पर प्रयुक्त हो रहे हैं, इसके बारे में ढेर सारे तथ्य सामने आए हैं। मसलन्, गार्नर ने देखा कि ‘he pleaded guilty’ की तुलना में ‘he pled guilty’, का अर्थात pleaded की जगह pled का चलन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अब तक भी pleaded का प्रयोग करने वालों की संख्या pled वालों की तुलना में तीन गुना ज्यादा है। इसी के आधार पर गार्नर ने pleaded का प्रयोग करने का सुझाव दिया। इसी, बहुमत के प्रयोग के बिनाह पर उन्होंने पारंपरिक ‘run the gantlet’ की जगह चालू ‘run the gauntlet’ के प्रयोग को स्वीकारा क्योंकि गूगल की गणना में इसका प्रयोग करने वाले ‘run the gantlet’ से काफी ज्यादा पाए गयें।

इसप्रकार, लकीर के फकीर और तानाशाह कहे जाने वाले ‘नुस्खेबाज’ तथा जनतंत्र और प्रगति के झंडाबरदार मान लिये गये ‘वास्तववादी’, दोनों ने ही कालक्रम में यह स्वीकार लिया कि मानक अंग्रेजी का यथार्थ अत्यंत वैविध्यपूर्ण है। यहां तक कि नियमों के मामले में भी इसमें विविधताएं भरी हुई हैं। इसके चलते नुस्खेबाज अब वास्तव की ज्यादा खोज-खबर रखने लगे और वास्तववादी मानक अंग्रेजी में सही-गलत की राय देने वालों के प्रति उदार हो गये। चलन के शब्दों पर अब दोनों खेमों में एक विवेकशील आम सहमति बनती दिखाई दे रही है। इस प्रकार, स्तंभकार के अनुसार, अंग्रेजी भाषा की दुनिया में दशकों से चला आ रहा एक तीखा संघर्ष अब समाप्ति पर है।

अंग्रेजी भाषा में चले इस खास प्रकार के भीषण युद्ध के वृत्तांत से अनायास ही हमें  हिंदी में महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके काल की याद ताजा हो गयी। हिंदी में भाषा के सवाल पर वास्तव में यदि कभी कोई युद्ध की तरह की स्थिति रही है तो वह द्विवेदी जी के काल में ही थी। वह एक तरह से आज की हिंदी के निर्माण का काल भी कहा जाता है। उस युद्ध में तब जो तय हो गया, हिंदी लेखन भाषा के मामले में आज तक कमोबेस उन्हीं नियमों के अधीन चल रहा है।

पिछले दिनों हमें गुलजार द्वारा किये गये रवीन्द्रनाथ की कविताओं के दो संकलनों को देखने का मौका मिला था। रवीन्द्रनाथ को मूल बांग्ला के साथ ही उनके हिंदी अनुवादों को हम हमेशा देखते रहे हैं। अपने अब तक के देखे इन अनुवादों की तुलना में देवनागरी लिपि में गुलजार के उर्दू में किये गये अनुवादों में हमें कुछ दूसरे ही प्रकार की ताजगी का अहसास हुआ था। ‘लहक’ के पृष्ठों पर ही हमने उन खंडों की एक छोटी सी समीक्षा लिखी। उसमें अनुवाद के इसी प्रसंग को उठाते हुए हमने लिखा था कि
‘‘ अच्छे अनुवाद के बारे में कहा ही जाता है कि यह फूलदान की तरह की किसी भी जीवित कृति को तोड़ कर शुरू किया जाता है। रचना पहले टुकड़ों में बिखर कर अनुवादक के सामने आती है, और अनुवादक इस फूलदान के टुकड़ों को जोड़ता है। फूलदान को तोड़ना ही अनुवाद के रूप में उसके नवनिर्माण की शर्त है। दुनिया की क्लासिकल कृतियां इसी तरह तमाम भाषाओं और कालों में पहले बिखर कर फिर पुनर्रचना के जरिये कालजयी बन कर सामने आती है।’’

इसके साथ ही यह भी कहा था कि ‘‘ इसमें शक नहीं है कि किसी भी क्लासिकल कृति में हस्तक्षेप करने के अपने तमाम जोखिम भी होते हैं। इसमें सफलता के कोई निश्चित नुस्खे नहीं होते। और, यह भी सच है कि अक्सर इसप्रकार के प्रयोगों की दुर्गतियां ही ज्यादा दिखाई देती हैं। लेकिन वह भी हमेशा नहीं होता। इन सबके विपरीत सचाई यह है कि किसी भी क्लासिकल कृति के प्रति निष्ठापूर्ण रहने का मतलब ही है कि उसके साथ इसप्रकार का जोखिम उठाया जाना चाहिए। कृति के पारंपरिक रूप और ढांचे से चिपके रहना क्लासिक की भावना के साथ विश्वासघात करने का सबसे सुरक्षित उपाय कहा जा सकता है।

‘‘रवीन्द्रनाथ की रचनाओं के हिंदी अनुवादों के मामले में इसप्रकार की लकीर की फकीरी के विध्वसंक परिणामों को हम लगातार देखते रहे हैं। खास तौर पर जिन लोगों ने रवीन्द्रनाथ के गीतों का रवीन्द्र संगीत की धुन को बनाये रखते हुए हिंदी में अनुवाद किया है, उन गीतों को सुन कर तो यह अनुमान लगाना भी कठिन होता है कि वे हिंदी में हैं या बांग्ला में या किसी और ही नयी, अबूझ सी भाषा में ! इस प्रकार के अनुवादों को हम ‘मच्छरमार अनुवाद’ कह सकते हैं, अर्थात ऐसा अनुवाद जिसमें मूल प्रति में किसी वजह से मरा हुआ मच्छर चिपका हो तो अनुवादक भी खोज कर वहां एक मच्छर को मार कर चिपका देता है।

‘‘ ऐसे ‘मच्छरमार’ अनुवाद के बजाय, किसी भी दूसरी भाषा की क्लासिकल कृति को जीवित रखने का एक मात्र तरीका उसे ‘खुला’ रखना है, भविष्य की ओर ले जाने वाला, काल को पार करने वाला - एक ऐसी फिल्म जिसको विकसित करने का रसायन बाद में आता है !

‘‘गुलजार की कविता की एक पंक्ति है - ‘‘मैंने काल को तोड़के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया।’’

‘‘रवीन्द्रनाथ के इन दो संकलनों का गुलजार का अनुवाद भी ऐसा ही है, काल को तोड़ कर लम्हे-लम्हे को जीने के समान। रवीन्द्रनाथ के औपनिषदिक चिंतन के खोल को आसमान की तरह और भी खोल देने वाला, उसमें और भी रंगों को भरने की संभावना पैदा करने वाला।

‘‘अपने इन अनुवादों में गुलजार ने अपनी सुविधा के अनुसार कहीं मूल बांग्ला की कविताओं को अपना अवलंब बनाया है तो कहीं रवीन्द्रनाथ के अंग्रेजी अनुवादों को। रवीन्द्र विशेषज्ञों की यह मान्यता रही है कि वे खुद अपनी कविताओं के अच्छे अनुवादक नहीं थे। गुलजार ने अच्छे-बुरे अनुवाद के इस पहलू की बिना कोई परवाह किये उनके ढांचे को तोड़ कर एक दूसरी भाषा के चौखटे में उतारने के लिये अपनी मर्जी से कविताओं के मूल बांग्ला या अंग्रेजी पाठों का चयन किया है।’’

इसके बाद ही इस समीक्षा में अनायास हिंदी का, खास तौर पर उसकी ‘साहित्यिक भाषा’ का प्रश्न आ जाता है। साफ तौर पर कहा गया है कि ‘‘ हिंदी की साहित्यिक भाषा का रवीन्द्रनाथ की बांग्ला भाषा से काफी मेल है, क्योंकि कुछ ऐतिहासिक कारणों से ही यह भाषा मूलत: बांग्ला के प्रभाव के तहत ही विकसित हुई है। आलोक राय की पुस्तक ‘हिंदी नेशनलिज्म’ से हिंदी की साहित्यिक भाषा के इस पहलू की सचाई को बखूबी जाना जा सकता है। इसीलिये उस किताब की भूमिका में निलाद्रि भट्टाचार्य ने हिंदी की साहित्यिक भाषा को एक मृत भाषा भी कहा है - हिंदी भाषी जनता और कथित हिंदी साहित्य के बीच का एक बड़ा अवरोध जिसकी ओर रवीन्द्रनाथ की रचनाओं के हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय सहित साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित उनके रचना संचयन में शामिल किये गये हिंदी अनुवाद भी संकेत करते हैं। हिंदी की साहित्यिक भाषा के मानदंड पर प्रामाणिक होने पर भी रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का जो असर बांग्ला भाषी लोगों पर पड़ता है, उसका एक प्रतिशत भी हिंदी भाषी जनता पर नहीं पड़ता।‘‘

निलाद्रि भट्टाचार्य के शब्दों में - ‘‘साहित्यिक सृजन के क्षेत्र की एक मृत भाषा यह ‘हिन्दी’ समाज के सांस्कृतिक जीवन में एक जहर की तरह मौजूद है।’’ वे यह भी कहते हैं कि हिंदी को यदि अपनी आंतरिक शक्ति को प्राप्त करना है और संपर्क की एक राष्ट्रीय भाषा का रूप लेना है तो उसे अपने खुद के दमित इतिहास को मुक्त करना होगा और राष्ट्रीय आधिपत्य कायम करने के लिये बदहवास स्वार्थी उच्च वर्ण के आभिजात्यों द्वारा खोजी गई ‘हिन्दी’ से अपने को अलग करना होगा।’’

आलोक राय कहते हैं, ‘‘हिन्दी एक मर्ज का नाम है। और यही मर्ज की एक दवा भी है।’’

यहां हम आलोक राय की जिस पुस्तक ‘हिंदी नेशनलिज्म’ का जिक्र कर रहे हैं उसे पुस्तक कहने के बजाय एक लगभग सवा सौ पन्नों की पुस्तिका कहना ही ज्यादा संगत होगा। लेकिन, उसमें उर्दू और उसकी अरबी-फारसी लिपि के बरक्स हिंदी और देवनागरी लिपि के लिये जिस संघर्ष का आख्यान रचा गया है, वह अपने में किसी महायुद्ध के आख्यान से कम नहीं है। ऊपर जान्सन के हवाले से अंग्रेजी भाषा के अंदर ‘नुस्खेबाजों’ और ‘वास्तववादियों’ के जिस युद्ध की चर्चा की गई है वह तो हिंदी के इस भाषाई युद्ध की तुलना में बच्चा कहलायेगा। हिंदी के इस भाषा-युद्ध में भाषा की तुलना में दूसरे सामाजिक-राजनीतिक विषय ज्यादा जुड़े हुए थे। इसीलिये आलोक राय ने इसे हिंदी राष्ट्रवाद की लड़ाई का आख्यान कहा है।

यह था - भाषा में सुधार की लड़ाई के जरिये अर्जित राष्ट्रवाद ! जड़ों की ओर वापसी से अर्जित राष्ट्रवाद ! यहां जड़ का मतलब है संस्कृत ; कुछ उत्साहितजनों की दृष्टि में दुनिया की समस्त भाषाओं का गोमुख। हिंदी के तत्कालीन कथित रूप से उर्दू-प्रभावित अंश को ठुकरा कर अर्जित किया गया हिंदी राष्ट्रवाद ! वर्तमान की बाधा को नकार कर मीमांसा में अर्जित अपने ही प्राचीन स्व पर टिका राष्ट्रवाद ! लेकिन अफसोस कि उस ‘विस्मृत’ स्व को प्राप्त करने की इस प्रक्रिया का परिणाम इतना घातक हुआ कि हमने इस मंथन से जो ‘साहित्यिक भाषा’ पाई वह निलाद्रि भट्टाचार्य के शब्दों में एक ‘मृत भाषा’ है। अपने वर्तमान के नकार का इससे त्रासद परिणाम क्या हो सकता है कि हम किसी मृतयुग में पहुंच जाए ! अभिनवगुप्त के शक्ति प्राप्त करने के ‘प्रत्याभिज्ञान’ तत्व का नारी के शरीर में प्रवेश करके अंधेरे तंत्रलोक में खो जाने की तरह की त्रासदी जैसा ही !

इसी उत्तेजना में, 30 मई 2016 के दिन अनायास ही हमने फेसबुक पर एक छोटी सी पोस्ट लगाई थी -
“और महावीर प्रसाद द्विवेदी !”

इसमें लिखा था - ‘‘ आज के ‘टेलिग्राफ’ में ‘The Emperor of all Maladies’ के प्रसिद्ध लेखक सिद्धार्थ मुखर्जी की एक नई किताब ‘The Gene : An intimate history’ की एक समीक्षा प्रकाशित हुई है। हमने इस किताब को देखा नहीं है, लेकिन ‘टेलिग्राफ’ की समीक्षा में उससे एक उद्धरण दिया गया है - “illness might vanish but so might identity. Grief might be diminished but so might tenderness. Traumas might be erased but so might history.”
(रोग दूर हो सकते हैं, वैसे ही आदमी की पहचान भी। कष्ट कम हो सकते हैं, वैसे ही कोमलता भी। आघात खत्म हो सकते हैं, वैसे ही इतिहास भी।)

ओरहन पामुक अपने उपन्यास ‘My name is red’ में एक जगह लिखते हैं - ‘‘नुक्स से ही अंदाज पैदा होता है।’’ ऐब ही आदमी की पहचान है।

याद आती है, अंबर्तो इको की बात। वे उपलब्ध भाषा की तुलना फासीवाद से करते हैं। कहते हैं, फासीवाद बोलने से रोकता नहीं, बोलने को थोपता है। प्राप्त भाषा का विन्यास इतना घातक हैं कि वह अपने अंदर गुलाम बना लेती है। उपलब्ध भाषा से छल करके, एक प्रकार की गैर-ईमानदारी और स्वस्थ तथा मुक्तिदायी चालाकी से साहित्य पैदा होता है।

कहना न होगा, भाषा के मानकीकरण पर अतिरिक्त जोर साहित्य का आखेट है।

और महावीर प्रसाद द्विवेदी !”

किसी भी कथित ‘ऐब’ को दूर करने की जिद के परिणाम क्या हो सकते हैं, सिद्धार्थ मुखर्जी के हवाले से हमारा ध्यान आलोक राय की पुस्तिका में हिंदी के भाषाई महायुद्ध के महानायक महावीर प्रसाद द्विवेदी तक चला गया था। सिद्धार्थ मुखर्जी की किताब ‘द जीन’ में ही एक बात आती है - ‘‘Normalcy is the antithesis of evolution” । कहना न होगा, हिंदी को उसके संस्कृत मूल से बांध कर ‘स्थिर’ (सामान्य) बनाने के चक्कर में इस भाषा का वंध्याकरण कर दिया गया।

गुलजार के अनुवाद और उसके सामने मृत समान लगते हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय आदि के रवीन्द्रनाथ के अनुवादों ने सवाल पैदा किया कि क्या स्व को प्राप्त करने की पूर्ण प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया से ही फिर एक बार हमें अपने वर्तमान को नकार कर उस स्व को प्राप्त करने की जरूरत नहीं है, जो महावीर प्रसाद द्विवेदी के काल में ही भारतेंदु और शिवप्रसाद सितारे हिंद आदि के साहित्य से लेकर प्रेमचंद और उनके बाद मंटो, कृशन चंदर, अब्बास, बेदी, इस्मत आदि के साहित्य में धड़कता था ; जो छायावादी ‘महानों’ से मुक्त हिंदी के उस पूरे परवर्ती लेखन में भी जिंदा रहा है जिसने लेखन के केंद्र में पाठक को रखना जरूरी समझा है। अर्थात, गुलजार के अनुवाद ने हिंदी में द्विवेदी जी कंपनी के नकार के नकार की एक गहरी जरूरत की ओर ध्यान आकर्षित किया।

हिंदी नवजागरण के कथित अग्रदूत द्विवेदी जी ने हिंदी भाषा के क्षेत्र में ऐसा क्या किया था कि जिसके कारण अंग्रेजी में चले ‘नुस्खेबाजों’ और ‘व्यवस्थावादियों’ के युद्ध की यादों से कहीं ज्यादा, एक ऐसे भाषाई महायुद्ध की यादें ताजा हो गई जिसने कइयों की दृष्टि में हिंदी की ‘साहित्यिक भाषा’ के प्राण ही हर लिये ? ‘नवजागरण’ से ‘चिरनिद्रा’ तक का यह परम प्रत्यावर्तन कैसे संभव हुआ ?

महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली का पहला खंड हिंदी में चलाये गये इसी भाषाई महाभारत की कथा है, जिसके अंत में पांडवों के लिये भी सबकुछ छोड़ कर जंगलों की ओर प्रस्थान करने के अलावा कुछ शेष नहीं रह गया था। हिंदी का यह प्रत्यावर्तन कोई मामूली प्रत्यावर्तन नहीं, बल्कि ‘वैज्ञानिक प्रत्यावर्तन’ था, क्योंकि इस रचनावली के संपादक भारत यायावर ने प्रथम खंड की भूमिका में लिखा है कि ‘‘द्विवेदी जी का हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के लिये किया गया संघर्ष कितना ठोस और वैज्ञानिक है, इस खंड को पढ़ कर स्वत: ही समझा जा सकता है।’’

द्विवेदी जी का यह हस्तक्षेप ‘ठोस’ तो जरूर रहा होगा क्योंकि बिना उसके हिंदी के तत्कालीन स्वाभाविक विकास पर, जिसे खुद द्विवेदी जी ने बार-बार ‘अनस्थिरता’ से अभिहित किया था, इतना प्रभावशाली प्रहार करना मुमकिन नहीं था। लेकिन वह कितना विवेकशील अथवा वैज्ञानिक था इसे हम साहित्य की एक मृत, उनके द्वारा छोड़ी गई उस अध्यापकीय भाषा की विरासत को देख कर आसानी से प्रश्नों के घेरे में ला सकते हैं, जिसमें आज तक हिंदी का अकादमिक जगत पूरी तरह जकड़ा हुआ दिखाई देता है। सवाल उठता है कि बहुलता की स्वीकृति के बिना क्या कभी कोई वैज्ञानिक ज्ञान मीमांसा संभव है, जो नये विचारों के जन्म की संभावनाओं को बनाये रखती है ? बहुलता का निषेध ही तो धर्मशास्त्र की प्रमुख लाक्षणिकता है।

द्विवेदी जी चिंतामणि घोष के उस इंडियन प्रेस की पत्रिका ‘सरस्वती’ के पूरे अठारह सालों तक संपादक रहे जिसके पास सन् 1922 तक, जब तक शांतिनिकेतन में रवीन्द्रभारती की स्थापना नहीं हुई थी, रवीन्द्रनाथ की तमाम रचनाओं के प्रकाशन का एकाधिकार था। रवीन्द्रनाथ की ‘गीतांजलि’ को प्रचारित करने तक में उनकी भूमिका को याद किया जाता है। हम जानते हैं कि हर भाषा की अपनी एक गति होती है, लेकिन यदि उसपर किसी चीज का प्रभाव पड़ता है तो साहित्य का पड़ता है। वह साहित्य के संकेतों के प्रति संवेदनशील होती है, शासन या विद्वानों के निर्देशों पर नहीं चलती। दुनिया में इस प्रकार के असंख्य उदाहरण मौजूद है, जब शासन के भाषाई निर्देश काल-क्रम में ऐसे गायब हो गये जैसे वे कभी थे ही नहीं। और साहित्य के संकेत किसी समय में न अपनाये जाने पर भी समय के अंतराल के साथ सामान्य भाषा के अंग गये। बांग्ला भाषा के क्षेत्र में रवीन्द्रनाथ की भूमिका कुछ ऐसी मानी जाती है कि उनके साहित्य के जरिये ठीक उसी प्रकार आधुनिक बांग्ला भाषा का निर्माण हुआ था जिस प्रकार कहा जाता है कि रवीन्द्रनाथ के परिवार, यानी ठाकुरबाड़ी के जरिये बांग्ला जाति को अपना आधुनिक सांस्कृतिक इतिहास प्राप्त हुआ था। इसीलिये रवीन्द्रनाथ के लेखन ने बंगाली अस्मिता को तैयार करने में एक भूमिका अदा की और साथ ही वह अस्मिता के सांस्कृतिक उपभोग से मिलने वाले आनंद का भी स्रोत बना। पाठक इसमें अपने स्व के विलय की प्रक्रिया से खुद को नये सिरे से जानता है, इस ढांचे की क्रियाशीलता से पैदा होने वाले आनंद का भोग करता है। वह कदापि पाठक की सत्ता से इंकार नहीं करता।

बिल्कुल इन्हीं कारणों से हिंदी भाषी क्षेत्र में रवीन्द्रनाथ और उनके लेखन की भाषाई संरचना की वह भूमिका कभी नहीं हो सकती थी, जो बांग्ला में थी। इस क्षेत्र की साहित्यिक अभिव्यक्ति की भाषा का अपना खास निश्चित ऐतिहासिक चरित्र था। उसमें तत्सम शब्दों की भरमार नहीं थी, बल्कि बोलचाल की भाषा से लेकर साहित्य की भाषा तक में उर्दू का, अरबी-फारसी मूल के शब्दों का काफी बड़ा स्थान था। उर्दू भारत की आर्य भाषाओं में से ही एक थी जिसका विकास आज के पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पूर्वी पंजाब में हुआ था। हिंदी, हिंदवी, जबाने देहलवी, रेखता, दक्षिण में दकिनी और गुजरात में गुजरी आदि नाना नामों से जानी जाने वाली इस भाषा में स्वाभाविक तौर पर मुसलमानों के आने के बाद फारसी और अरबी शब्द शामिल हुए थे। लेकिन यह बाजारों में पनपी और सूफी संतों के जरिये संवारी गई थी। इसीलिये यह इस क्षेत्र के लोगों की बोलचाल की भाषा के साथ ही काफी हद तक उसकी सांस्कृतिक अस्मिता की एक भाषा भी रही है। उद्गम के लिहाज से इसमें कोई शक नहीं है कि उर्दू वही है जो हिंदी है। अठारहवीं सदी में ही इसमें मीर, सौदा, इंशा आदि दर्जनों नामी-गिरामी शायरों के साथ ही नजीर अकबराबादी हुए जिनकी शायरी में इस पूरे क्षेत्र की जनता के दिलों की धड़कने बोलती थी। 19वीं सदी में जौक(1852), मोमिन (1855) , गालिब(1869) और जफर तो इतने बड़े शायर हुए जो डेढ़ सदी बाद भी हमारी साहित्यिक अस्मिता के अभिन्न अंग बने हुए हैं। इधर के सालों के जोश, मजाज, फैज, फिराक, शाहिर, मजरूह, गुलजार और जावेद अख्तर तक आज हर हिंदी भाषी की जुबान पर है।

हिंदी भाषी क्षेत्र की एक ऐसी प्रमुख भाषा के प्रति ‘हिंदी नवजागरण के अग्रदूत’ महावीर प्रसाद द्विवेदी का क्या रवैया था ? वे इसे इस क्षेत्र के लोगों की नहीं, बल्कि एक धर्म की भाषा मानते थे, सिर्फ मुसलमानों की, और सीधे तौर पर उसे हिंदी की प्रतिद्वंद्वी, बल्कि दुश्मन समझते थे। द्विवेदी जी की रचनावली के पहले खंड में ‘हिंदी भाषा की उत्पत्ति’ शीर्षक से हिंदी संबंधी उनके लेखों का जो संकलन शामिल किया गया है, उसकी भूमिका की शुरूआत ही वे इसप्रकार करते हैं –

‘‘कुछ समय से विचारशील जनों के मन में यह बात आने लगी है कि देश में एक भाषा और एक लिपि होने की बड़ी जरूरत है, और हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि ही इस योग्य है। हमारे मुसल्मान भाई इसकी प्रतिकूलता करते हैं। वे विदेशी फारसी लिपि और विदेशी भाषा के शब्दों से लबालब भरी हुई उर्दू को ही इस योग्य बतलाते हैं। परन्तु वे हमसे प्रतिकूलता करते किस बात में नहीं ? सामाजिक, धाम्र्मिक, यहां तक कि राजनैतिक विषयों में भी उनका हिन्दुओं से 36 का संबंध है। भाषा और लिपि के विषय में उनकी दलीलें ऐसी कुतर्कपूर्ण, ऐसी निर्बल, ऐसी सदोष, ऐसी हानिकारिणी हैं कि कोई भी न्यायनिष्ठ और स्वदेशप्रेमी मनुष्य इनसे सहमत नहीं हो सकता। बंगाली, गुजराती, महाराष्ट्री, और मदरासी तक जिस देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा को देशव्यापी होने योग्य समझते हैं वह अकेले मुट्ठी भर मुसल्मानों के कहने से अयोग्य नहीं हो सकती। आबादी के हिसाब से मुसल्मान इस देश में हैं ही कितने ? फिर थोड़े होकर भी जब वे निर्जीव दलीलों से फारसी लिपि और उर्दू भाषा की उत्तमता की घोषणा देंगे तब कौन उनकी बात सुनेगा ?’’(पृ : 21)

हम समझते हैं कि इसके बाद शायद द्विवेदी जी के भाषा संबंधी वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। यह धर्म की संकीर्णता से दूषित दृष्टिकोण है। जिस भाषा और लिपि के बारे में उनका दावा है कि बंगाली, गुजराती, मदरासी सब अपनी भाषाओं और लिपियों को छोड़ कर एक टांग पर उसे अपनाने की आतुर प्रतीक्षा में हैं, वह आज तक संवैधानिक प्रतिज्ञाओं के बावजूद कायदे से राजभाषा तक बनने की स्थिति में नहीं है। उसके वर्चस्व का विरोध मुसलमान नहीं कर रहे हैं! आज तो हिंदी की विशेष स्थिति खत्म होने के कगार पर है। आज का सबसे बड़ा सच यह है कि देशभर के लोग हिंदी पर नहीं, अंग्रेजी पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। राष्ट्रभाषा का नारा सरकार का एक दिखावटी नारा रह गया है। जो इसपर ज्यादा जोर डालेगा, वह देश पर विभाजनकारी दबाव डालने का अपराधी नजर आने लगेगा।

द्विवेदी जी के इस संकलन में ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षणों में इकट्ठा की गई सामग्री का प्रयोग करके लिखे गये जो पत्रकारितामूलक लेख शामिल किये गये हैं, उनको अगर छोड़ दिया जाएं तो लगेगा जैसे हिंदी के नाम पर वे उर्दू और उसके साथ ही थोड़े अंश तक मुसलमानों के खिलाफ किसी धर्म-युद्ध में उतरे हुए थे। हिंदी के जरिये सारे देश को सिर्फ एक भाषा के सूत्र में पिरोने का उनका राष्ट्रप्रेम भी मूलत: उर्दू को खारिज करने पर केंद्रित था। अन्यथा, एक बंगाली मिल्कियत के प्रेस के मुलाजिम के रूप में ही वे इतना तो भली-भांति जानते थे कि बंगाली जाति बांग्ला को छोड़ कर हिंदी को अपनाने वाली नहीं है।

इसीप्रकार, बार-बार हिंदी के पक्ष में गुजरातियों और मदरासियों के समर्थन की उनकी बातों में भी रत्ती भर दम नहीं था। घुमा-फिरा कर उनका सारा जोर इसी बात पर रहता था कि ‘उर्दू कोई जुदी भाषा नहीं। वह हिन्दी ही का एक भेद है’ (पृ : 57) ; ‘देवनागरी लिपि के जाननेवालों की संख्या फ़ारसी लिपि के जाननेवालों की संख्या से कई गुना अधिक है। इस दशा में सारे भारत में फारसी लिपि का प्रचार होना सर्वथा असम्भव और नागरी का सर्वथा संभव है। यदि मुसल्मान सज्जन हिन्दुस्तान को अपना देश मानते हों, यदि स्वदेश-प्रीति को भी कोई चीज समझते हों, यदि एक लिपि के प्रचार से देश को लाभ पहुंचाना सम्भव जानते हों तो हठ, दुराग्रह और कुतर्क छोड़ कर उन्हें देवनागरी लिपि सीखनी चाहिए। ’’(पृ : 61) ‘हम देखते हैं कि कुछ हिन्दी जाननेवालों का आग्रह उर्दू के समान दोषपूर्ण भाषा की लेख-प्रणाली और उसके व्याकरण की तरफ मतलब से अधिक बढ़ रहा है’ (पृ : 147); ‘बंगला, मराठी, गुजराती, संस्कृत और अंगरेजी भाषायें हिन्दी से बहुत बढ़ी-चढ़ी अवस्था में हैं। उनकी प्रणाली न स्वीकार करके देहली और लखनऊ की महा अनस्थिर, व्याकरणविरुद्ध और अस्वाभाविक भाषा की नकल करके ‘जहाज बे-नाखुदा’ बन कर प्रमाद महासागर में जान-बूझकर डूबना है’ (पृ : 152) ।

कुछ जगहों पर द्विवेदी जी ने उर्दू से नफरत न करने की हिदायतें भी दी हैं, लेकिन उनका सारा जोर इस भाषा की सामाजिक-सांस्कृतिक सचाई से इंकार करने पर ही रहा। अपनी सभ्यतावश उन्होंने खुद उर्दू या उर्दू वालों के लिये गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग तो नहीं किया, लेकिन अपने इस संकलन के परिशिष्ट में शामिल किये गये, उन्हीं के शब्दों में, अपनी ‘अभिन्नात्माओं’ के लेखों के जरिये वे उसे ‘उर्दू-शुर्दू’, ‘वर्णसंकरी सत्यानासिन उर्दू’, ‘मुँहकाली उर्दू’, ‘दोगली उर्दू’, ‘उर्दू निगोड़ी’, ‘कुलच्छनी उर्दू’ आदि कहने से नहीं चूके हैं।

इस लेख के शुरू में अंग्रेजी भाषा में ‘नुस्खेबाजों’ और ‘वास्तववादियों’ के बीच लंबे संघर्ष का शमन इस बात में देखा गया था कि दोनों पक्षों ने ही सब मामलों में विविधता को स्वीकारा था और इसी वजह से दोनों के बीच क्रमश: एक सहमति कायम होती चली गई। लेकिन, हमारे हिंदी नवजागरण के अग्रदूत के यहां यथार्थ में वैविध्य के प्रति सहनशीलता का भाव नहीं के बराबर था। उनका वश चलता तो भारत की दूसरी सभी भाषाओं को खत्म करके अकेले हिंदी का वर्चस्व कायम कर देते। लेकिन इस अपूर्ण कामना से पैदा हुई खीज को उन्होंने हिंदी क्षेत्र की ही एक और सशक्त भाषा उर्दू पर उढ़ेल देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

अंग्रेजी में ब्रायन गार्नर ने भी कौन से शब्दों को चलन में रखा जाए और किन्हें छोड़ दिया जाए, इसके लिये संख्या-तत्व का प्रयोग किया है। उन्होंने गूगल की गणना के आधार पर ही plead और gauntlet के प्रयोग को स्वीकारा हैं और  pled और gantlet के प्रयोग को ठुकरा दिया है। लेकिन द्विवेदी जी तो संख्या के आधार पर शब्दों के प्रयोग पर नहीं, बल्कि भाषाओं के अस्तित्व पर ही अंतिम राय दे रहे थे ! ‘‘ आबादी के हिसाब से मुसल्मान इस देश में हैं ही कितने ? फिर थोड़े होकर भी जब वे निर्जीव दलीलों से फारसी लिपि और उर्दू भाषा की उत्तमता की घोषणा देंगे तब कौन उनकी बात सुनेगा’’ !

और हिंदी के अकादमिक जगत की स्थिति यह है कि उसके लिये तो जैसे डा. रामविलास शर्मा ने अपनी किताब ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ से एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी है कि उसे लगता है मानो उसके बाहर कदम रखते ही उसके सतीत्व के हरण का खतरा पैदा हो जायेगा। यह जगत अपने में बंद, खुद तक सीमित एक ऐसा जगत है जो हमेशा से अपने अंदर ही अंदर गुंथ कर निर्मित होता रहा है। लेवी स्ट्रास के संरचनावाद की तरह, इस पाठ का बाह्य कुछ न होने से इसपर बाहर का न कोई असर पड़ता है, न इसकी बाहर से व्याख्या की जा सकती है। संरचनावाद में विचार के उत्स के बारे में नहीं सोचा जाता है। जो एक बार है वह हमेशा हैं। कोई उससे बाहर नहीं जा सकता। ज्यादा से ज्यादा उस उत्स को मिथक में बदला जा सकता है। डा. रामविलास शर्मा की तरह के प्रगतिशीलों ने हिंदी के इस जगत में रामचंद्र शुक्ल के जरिये ‘रहस्यवाद-विरोध’ का एक बाहरी जीवाणु डाल कर साहित्यिक क्रियाशीलता के मिथकीकरण का ऐसा काम किया, जो साहित्य में आत्मगतता से इंकार का एक उत्कट, कुत्सित और कुवचनों से भरा रुच्छता का रोग साबित हुआ। इसे देखते हुए आज यह कहने में जरा भी हिचक नहीं होती कि इससे तो बेहतर है उस भाववाद की शरण में जाना जो कम से कम अलौकिक ईश्वरीय ‘अन्य’ की खाई तैयार करके हमारे शरीर की, हमारी पहुंच की सीमाओं के संकेत तो देता है !

सच यह है कि वर्तमान का डर ही अतीत पर रहस्य के आवरण डालता है। अतीत रहने का स्थान नहीं होता। वह तो सीखों का एक कुआं है जिससे हम अपने काम की चीजें निकालते हैं। लेकिन ऐसे सांस्कृतिक रहस्यीकरण का दुहरा नुकसान यह होता है कि हम खामखाह किसी भी कृति को बहुत दूर की चीज बना लेते है, जिससे अपने काम की चीज निकालना हमारे लिये दुष्कर हो जाता है।

साल भर पहले, वर्धा के महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की पत्रिका बहुवचन का महावीर प्रसाद द्विवेदी पर एक विशेषांक (अप्रैल-जून 2015) आया था। इसका प्रत्येक लेख डा. शर्मा की एकपक्षीय बातों के पिष्टपेषण के अलावा कुछ नहीं है। एक भी विद्वान के मन में उर्दू भाषा के प्रति द्विवेदी जी के शत्रुतापूर्ण रुख के बारे में कोई सवाल पैदा होता नहीं दिखाई देता है ! यह एक ही चीज को बार-बार दोहराये जाने के खोखलेपन की छुद्रता का उदाहरण है।

द्विवेदी जी बीसवीं सदी के प्रारंभ के उस काल में, जब बांग्ला नवजागरण अपने उरूज पर था, एक बंगाली व्यवसायी की महत्वाकांक्षी हिंदी पत्रिका के लगातार अठारह साल तक संपादक रहे। इसके पहले वे एक दक्ष रेलवे कर्मचारी थे और रेलवे में नौकरी के दौरान ही सरस्वती के मालिक ‘चिंतामणि घोष ने उन्हें अपनी पत्रिका के लिये चुन लिया था। ‘सरस्वती’ का प्रकाशन सन् 1900 में काशी के नागरी प्रचारणी सभा के सहयोग से शुरू हुआ था। इसके सात साल बाद इसी प्रैस से कोलकाता से ‘प्रदीप’ और ‘प्रवासी’ जैसी प्रसिद्ध बांग्ला पत्रिकाओं के संपादक रमानंद चटर्जी ने अंग्रेजी में ‘माडर्न रिव्यू’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस जमाने में पूरे भारत के बौद्धिक विमर्श का सबसे प्रमुख मंच बन कर सामने आई थी। इसी ढर्रें पर स्वाभाविक ही था कि ‘सरस्वती’ की तरह की हिंदी की एक महत्वपूर्ण पत्रिका में भी उसके संपादक के नाते द्विवेदी जी ने अपने समय के विविध विषयों पर उल्लेखनीय पत्रकारितामूलक लेखन किया।

लेकिन ध्यान से देखा जाए तो इतिहास, पुरातत्व, श्रद्धांजलियों और विविध प्रसंगों के  अलावा उनके लेखन का अधिकांश हिस्सा साहित्य और भाषा से संबंधित ही था। मसलन्, रचनावली के पहले भाषा विषयक खंड के बाद उसका दूसरा खंड भी साहित्य संबंधी टिप्पणियों का संकलन है। और इन तमाम टिप्पणियों में मूलत: उनका क्या नजरिया था ? वे साहित्य को रचनाकार के अन्त:करण में उपजे रस का शब्द-रूप मानने पर भी खुद को जैसे साहित्य-रसिक नहीं, बल्कि साहित्य-संचालक मानने लगे थे। अपनी ‘नाट्यशास्त्र’ पुस्तिका में वे कहते हैं कि ‘नाट्य शास्त्र के आचार्य भरत जी की आज्ञा है कि दृश्य काव्य की भाषा बहुत ही परिमार्जित होनी चाहिए। ...इस नियम का पालन दृश्य काव्य के कवियों ने बड़ी दृढ़ता से किया।’

अर्थात श्रेष्ठ नाटक लिखे गये आचार्य भरत के निर्देशों का पालन करके !

और कहना न होगा, ‘सरस्वती’ के संपादक की पीठ से आचार्य द्विवेदी ने अपने लिये हिंदी भाषा और साहित्य के बारे में आचार्य भरत की पीठ को सुरक्षित कर लिया। कविता में छंद, भाषा, अर्थ और विषय - सभी मामलों में वे कवियों के कर्तव्यों को निर्धारित करने लगे। परिणाम यह हुआ, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, वे खुद कालिदास, भवभूति और भक्त कवियों की रचनाओं के रसिक और बाद की रचनाओं के कोरे निदेशक बन कर रह गये ; हिंदी समालोचना के क्षेत्र में वह जमीन तैयार कर दी जिस पर रामचंद्र शुक्ल (1884-1941) ने छायावादी रचनाकारों से लेकर प्रेमचंद तक की आसानी से लानत-मलामत की। डा. रामविलास शर्मा ने भी इससे शास्त्रों के प्रयोग से साहित्य को हांकने की भरपूर सीख ली। मुक्तिबोध, शमशेर ही नहीं, जैनेन्द्र, यशपाल तक उनके दंडों की मार से नहीं बचे।

शास्त्रों की चौखटाबंदी की विडंबना यह है कि वह खुद भी चौखटाबंद हो जाता है। शास्त्रों का बंदी विद्वान यथार्थ में रमने की अपनी जैविक-क्षमता को गंवा देता है। इसी के चलते डा. शर्मा अंतत: खुद एक जीते-जागते अन्तर्विरोध बन कर रह गये - ‘एक तरफ यह और दूसरी तरफ वह’ - एक तरफ गदर और दूसरी तरफ छायावाद - एक तरफ अंग्रेजी से विरोध और दूसरी तरफ उर्दू से विरोध - के बीच मेल बैठाने वाली बाजीगरी से तत्काल में बाजी मात करने वाली टुटपुंजिया अहम्मन्यता के खिलाड़ी, जिनका अपना लेखन अन्त में अपने सामान्य नैतिक तत्व को भी गंवा कर शांत होता है। डा. शर्मा के अंतिम भारी-भरकम ग्रंथ, ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ के दो खंड इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। इन ग्रंथों तक आते-आते खुद उनके लिये ‘हिंदी नवजागरण’ का दो कौड़ी का मोल नहीं रह जाता है और जिस हिंदू सांप्रदायिकता के विरोध में उन्होंने हिंदी जाति के तत्व को खड़ा करना चाहा था, अन्त में वे सारत: उसीके सेवकों की कतार में शामिल दिखाई देने लगते हैं ! अपने लेखन के नैतिक तत्व को भी गंवा देते हैं !

बहरहाल, लंबे समय तक अपने समय की एक महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी पत्रिका के संपादक के नाते अनेक विषयों पर द्विवेदी जी की सूचनामूलक टिप्पणियों के महत्व से उसी प्रकार इंकार नहीं किया जा सकता है, जिस प्रकार हिंदी में ‘सरस्वती’ पत्रिका की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। आज के जमाने में जब हम दुनिया की ‘इकोनामिस्ट’ आदि की तरह की बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं को देखते हैं तो पाते हैं कि अक्सर बहुत ही महत्वपूर्ण, ऐसी सूचनामूलक टिप्पणियों-लेखों पर उसके लेखक का नाम ही नहीं होता है। पत्रिका का ब्यूरो एक-एक विषय पर बड़े-बड़े परिशिष्ट तैयार करता है। मसलन्, इसके बिल्कुल ताजा 28 मई 2016 से 3 जून 2016 के अंक में ही ‘आप्रवासन (migration) विषय पर चौदह पृष्ठों की ढेर सारी सामग्री है, जिसमें आदमी की घर की तलाश, इस विषय पर होने वाले विमर्श की पदावली, इसकी राजनीति, इसका एक कामचलाऊ समाधान, इससे हासिल की जाने वाली श्रमशक्ति, इसके भौगोलिक पहलू, इसकी अनित्यता और इसके संभावित सुफल पर अलग-अलग महत्वपूर्ण सामग्री और उन पर टिप्पणियां भी है। लेकिन किसी पर उसके किसी लेखक का नाम नहीं है। यह सारी सामग्री एक अन्तरराष्ट्रीय समस्या को समझाने में एक पत्रिका की भूमिका के रूप में सामने आती है। ‘इकोनोमिस्ट’ के अंकों में इस प्रकार के विशेष पृष्ठों के परिशिष्ट अक्सर आते रहते हैं। इन सामग्रियों से ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका का संपादक आज के समाज में खुद को किसी संक्रांतिमूलक घटना का अग्रदूत नहीं बता सकता।

‘सरस्वती’ के बारे में डा. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘‘जब वह पत्रिका प्रसिद्ध हो गई, तब भी उपयुक्त लेख प्राप्त करते रहना सरल नहीं था। यदि द्विवेदी जी अपना दल बना कर सरस्वती में इस दल के लेखकों की चीजें ही छापते, उसके स्तर का ध्यान न रखते, तो सरस्वती हिन्दी की जातीय पत्रिका न होती, वह हिन्दी की प्रतिनिधि पत्रिका न होती।’’(रामविलास शर्मा, महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, पृ: 365)
लेकिन, पत्रिकाओं में काम करने वाले ऐसे दल को ही आज ब्यूरो कहा जाता है, जो उसके लेखक या संपादक का नहीं, समग्रत: पत्रिका का चरित्र बनाता है, जैसा कि हमने ऊपर ‘इकोनोमिस्ट’ के संदर्भ में कहा।

द्विवेदी जी ने, जिसे स्वतंत्र पुस्तक कहते हैं, एक ही पुस्तक लिखी -‘संपत्तिशास्त्र’। उनकी प्रकाशित अकेली पुस्तक। कभी जवानी के दिनों में ‘टके साधने’ के लिये एक और अत्यंत रसभरी किताब जरूर लिखी थी और उसे लेकर काफी बड़े-बड़े सपने भी देखे थे, लेकिन वह उनकी स्वाभिमानी पत्नी का कोपभाजन बन कर जो एक संदूक में बंद हुई तो फिर उसने कभी दिन का उजाला नहीं देखा।

‘संपत्तिशास्त्र’ की भूमिका में द्विवेदी जी ने बड़ी विनम्रता से यह स्वीकारा है कि ऐसे विषय की ‘‘पुस्तक लिखने की हममें योग्यता नहीं’’ होने पर भी जब दूसरा कोई योग्य व्यक्ति हिंदी में यह नहीं कर रहा है तब ‘अकरणान्मन्दकरण श्रेय:’ के तर्क पर ‘‘हमारे सदृश अयोग्य जन भी यदि अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस शास्त्र के स्थूल सिद्धांत हिन्दी में लिख कर उनके प्रचार का यत्न करें तो कोई दोष की बात नहीं।’’

इसी भूमिका में द्विवेदी जी ने अंग्रेजी, बंगला, उर्दू, मराठी और गुजराती की उन 17 किताबों का नाम गिनाया है जिनसे इस किताब को लिखने में सहायता ली गई। इनके अतिरिक्त समाचारपत्रों, मासिक पुस्तकों और सरकारी रिपोर्टों से भी मदद ली गई। यहां तक कि उन्होंने पण्डित माधवराव सप्रे बी.ए. की हिन्दी में अर्थशास्त्र संबंधी पुस्तक की उस पांडुलिपि का भी उल्लेख किया है जो सप्रे ने सालों पहले लिख लेने के बाद भी प्रकाशित नहीं कराई थी और द्विवेदी जी के मांगने पर उन्हें भेज दी थी।

इस पुस्तक को लिखने की इस प्रकार की तैयारी के बाद भी द्विवेदी जी अपनी भूमिका के अंत में लिखते हैं कि ‘‘संभव है उन्हें (पुस्तक की त्रुटियों को) देख कर किसी योग्य विद्वान को हिंदी पर दया आवे, और उसके उदार हृदय में सम्पत्तिशास्त्र पर एक निर्दोष, निर्भ्रांत और निरुपम पुस्तक लिखने की इच्छा उत्पन्न हो। यदि हमारी यह संभावना, कभी किसी समय फलीभूत हो जाय तो हम समझेंगे कि हमारी त्रुटिपरिपूर्ण पुस्तक ने बड़ा काम किया।’’

यह था द्विवेदी जी का बड़प्पन। सरस्वती में उनके लेखन की विपुल सामग्री से लगभग 85 किताबें प्रकाशित हुई थी, लेकिन खुदकी किताब के रूप में उन्होंने सिर्फ ‘सम्पत्तिशास्त्र’ को मान्यता दी। बाकी साहित्य, इतिहास और पुरातत्व, दुनिया के नाना विषयों तथा अनेक व्यक्तियों पर अपनी टिप्पणियों को उन्होंने अपने संपादकीय काम की जरूरतों की उपज माना। द्विवेदी जी कितने महत्वपूर्ण और  निष्ठावान संपादक थे, उसे उनके ‘आत्मनिवेदन’ के इस अंश से भी जाना जा सकता है जिसमें वे लिखते हैं –

‘‘सरस्वती के सम्पादन का भार उठाने पर मैंने अपने लिये कुछ आदर्श निश्चित किये। मैंने संकल्प किया कि (1) वक्त की पाबंदी करूँगा; (2) मालिकों का विश्वासपात्र बनने की चेष्टा करूँगा ; (3) अपने हानि-लाभ की परवा न करके पाठकों के हानि-लाभ का सदा खयाल रक्खूँगा ; (4) न्याय-पथ से कभी न विचलित हूँगा। ’’

इसी में आगे वे विस्तार से यह भी बताते हैं कि उन्होंने अपनी इन प्रतिज्ञाओं का किसप्रकार सदैव पूरी निष्ठा से पालन करने का यत्न किया। ‘‘...प्रेस की मशीन टूट जाय तो उसका जिम्मेदार मैं नहीं। पर कापी समय पर न पहुँचे तो उसका जिम्मेदार मैं हूँ। मैंने अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह जी-जान होमकर किया। चाहे पूरा का पूरा अंक मुझे ही क्यों न लिखना पड़ा हो, कापी समय पर ही मैंने भेजी। मैंने तो यहां तक किया कि कम से कम छ: महीने आगे की सामग्री सदा अपने पास प्रस्तुत रक्खी। सोचा कि यदि मैं महीनों बीमार पड़ जाऊँ तो क्या हो ?...(2) मालिकों का विश्वासभाजन बनने की चेष्टा में मैं यहां तक सचेत रहा कि मेरे कारण उन्हें कभी उलझन में पड़ने की नौबत नहीं आई। सरस्वती के जो उद्देश्य थे उनकी रक्षा मैंने दृढ़ता से की। ...(3) इस समय तो कितनी ही महारानियाँ तक हिन्दी का गौरव बढ़ा रही है; पर उस समय एकमात्र सरस्वती ही पत्रिकाओं की रानी नहीं; पाठकों की सेविका थी।...अल्पज्ञ होकर भी किसी पर अपनी विद्वता की झूठी छाप लगाने की कोशिश मैंने कभी नहीं की। (4) सरस्वती में प्रकाशित मेरे लघु लेखों (नोटों) और आलोचनाओं ही से सर्वसाधारण जन इस बात का पता लगा सकते हैं कि मैंने कहाँ तक न्याय मार्ग का अवलम्बन किया।’’

द्विवेदी जी की उपरोक्त सारी बातें इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि वे एक बड़े संपादक से अपेक्षित मूल्यबोध के ज्वलंत उदाहरण थे। यह स्वयं में हिंदी को उनका कम बड़ा अवदान नहीं था। किसी भी दृश्यपट में एक व्यक्ति के प्रवेश से दृश्य बदल जाता है। इतिहास में भी व्यक्ति का प्रवेश एक घटना होता है। हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में आचार्य द्विवेदी का प्रवेश एक ऐसा ही सर्व-स्वीकृत ऐतिहासिक तथ्य है जिससे हिंदी लेखन का परिदृश्य बदल गया था। लेकिन हमारी मुश्किल यह है कि हम एक अकल्पनीय गति से बदल रही चीजों के काल में रह रहे हैं। और जब कोई भी विचार निश्चयात्मक नहीं होता, तब मुमकिन नहीं रह जाता कि किसी भी चीज को ईश्वर की तरह का अंतिम सत्य मान कर हम उसका पूजन करने लगे। कोई भी सही समझ जब गलत रूप में पेश की जाती है तो उससे उलझनें पैदा होती हैं, लेकिन उससे बहुत ज्यादा उलझनें तब पैदा होती हैं जब किसी गलत समझ को सही रूप में पेश किया जाने लगता है। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को हिन्दी नवजागरण का अग्रदूत बनाने की रामविलास शर्मा की पूरी तरह से गलत समझ ने हिंदी की अकादमिक दुनिया को इसीलिये भारी परेशानी में डाल रखा है। इतिहास के मनगढ़ंत आख्यानों को रचने वाले बुद्धिजीवियों से पैदा होने वाली यह एक सामान्य समस्या है।

डा. शर्मा ने पहले खुद हिंदी नवजागरण के एक मिथकीय मिशन को अपनाया। सरस्वती पत्रिका के खास परिवेश से अलग करके महावीरप्रसाद द्विवेदी को एक अलग व्यक्ति की शक्ल दी और फिर इस आत्म-विखंडित व्यक्ति के जरिये उसके यथार्थ जगत को एक आत्मिक रूप दे दिया। इसप्रकार एक अगोचर जादूई शक्ति से एक काल में भाषा, साहित्य, विचार के सभी रूपों को मायावी बनाकर एक नये यथार्थ की सृष्टि की गई। व्यक्ति में देवत्व की स्थापना हमेशा उसका सर्वस्व छीन कर ही की जाती है। तभी जन्म से ही सृष्टि के उद्देश्यों की पूर्ति के लिये अवतरित चरित्र - भगवान की बाल लीलाओं से लेकर अंत समय तक की लीलाओं वाला लीला पुरुष तैयार होता है। संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी के अंत से नवजागरण के दूत महावीर प्रसाद द्विवेदी का उदय हुआ। द्विवेदी जी अपने ‘कृत कार्यों’ को ‘उदरपूर्ति’ का परिणाम बताते हैं, लेकिन डा. शर्मा उसे कहते हैं हिंदी नवजागरण के लिये समर्पित प्राण का कृतित्व। जब द्विवेदी जी से उनके जीवन के यथार्थ को छीन कर उन्हें नवजागरण का दूत बना दिया जाता है, तभी तो डा. शर्मा का हिंदी नवजागरण का गढ़ा हुआ, मिथकीय यथार्थ निर्मित हो पाता है।

किसी भी कृति के वैज्ञानिक अध्ययन की सबसे पहली शर्त यह है कि हम उस कृति में जो और जैसा लिखा गया है, सबसे पहले बिल्कुल वैसे ही उसे पढ़ें, न कि जो उसमें नहीं लिखा गया है, उसे पढ़ने पर जोर देने लगे। यही बात व्यक्तियों के अध्ययन पर भी लागू होती है।


इन्हीं कारणों से, ऐसा लगता है कि आज यदि हमें द्विवेदी जी की वास्तविक पहचान  कायम करनी है तो सबसे पहले हिंदी नवजागरण के दूत बना दिये गये द्विवेदी जी की हत्या करनी होगी। ईश्वरीय प्रतिमाओं को नकारा नहीं जा सकता है। इसके लिये जरूरी होता है कि ईश्वर के उस व्यक्ति रूप को नकारा जाए जो कुछ आस्थावानों की बदौलत ईश्वर संबंधी कपोल-कल्पनाओं को जन्म देता है। माइथोलोजी शुरू होती है संसार में ईश्वर के अवतरण के पहले के उसके रहस्यमय संसार की कहानियों से। इसीलिये जब भी किसी व्यक्ति का मिथक तैयार किया जाता है तो ईश्वर की तरह सबसे पहले उसके इतिहास को रहस्यमय बना दिया जाता है, उसे समय-काल से काट दिया जाता है। उसका सामान्य आदमी का रूप उसका सच नहीं रह जाता। अपने देश-काल से निर्मित सामान्य मनुष्य जब किसी मनुष्य का सच नहीं रह जाता, बल्कि उसका सच उसके बाहर का, दैवी शक्तियों जैसा दिखाई देने लगता है, तभी आदमी आदमी नहीं रह जाता, ईश्वर बन जाता है। सामान्य लोगों पर लागू होने वाले मानदंडों के परे की चीज बन जाता है। वह सदा से स्वयं-संपूर्ण होता है; सनातन रूप से सभी प्रभावों से मुक्त, सभी तर्कों से परे।

ऐसे में, मिथकीय प्रतिमा में कैद मृत ईश्वर के सच तक पहुंचने का सही तरीका ईश्वर के बारे में अपनी सोच में आए ऐतिहासिक परिवर्तनों को सिर्फ बताने तक सीमित रहने के बजाय खुद ईश्वर का इतिहास लिखने की ओर बढ़ना है। सरस्वती पत्रिका के संपादक महावीरप्रसाद द्विवेदी के प्रति आंतरिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम उन्हें उन तमाम ज्ञानी-गुणी अध्यापक-जनों की कैद से मुक्त कराने का आह्वान करते हैं जो सब मिल कर इस बात को साबित करने में जुटे हुए हैं कि आधुनिक हिंदी अकेले महावीर प्रसाद द्विवेदी के हाथों, उनकी करिश्माई, दैविक शक्ति से, उनके संपादन में निकली एक पत्रिका के जरिये वैसे ही निकली है जैसे कभी शंकर जी की जटा से गंगा निकली थी।

सिद्धार्थ मुखर्जी अपनी किताब ‘The Laws of Medicine’ में कहते हैं कि चिकित्सा की दुनिया इतनी बेतरतीब और अनिश्चित होती है, इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। शरीर के अंगों, बीमारियों और रसायनिक प्रतिक्रियाओं के तमाम नामकरण से डाक्टरों ने ज्ञान के एक लगभग असंभव क्षेत्र से खुद को बचाने के तरीके खोजे हैं। तथ्यों की भीड़ ने एक कहीं ज्यादा गंभीर और महत्वपूर्ण समस्या को ओझल किया है - ज्ञान (सुनिश्चित, तयशुदा, सही और ठोस) तथा विवेक (अनिश्चित, तरल, अधूरा और अमूर्त) के बीच संगति कायम करने की समस्या को। चिकित्सा के नियम अधूरेपन और लक्षणों पर टिके नियम हैं। ये ज्ञान के सभी अनुशासनों पर समान रूप से लागू होते हैं। फिर कहा यही जाता है कि बुराई के चयन के बाद हम अच्छाई को तभी प्राप्त करते हैं जब हम अपनी परिस्थिति की दुरावस्था से परिचित हो जाते हैं।
बहरहाल,  इस लेख का अंत हम एक चालू उक्ति से करना चाहेंगे - ‘जख्म को वही चाकू भर सकता है जो उसे चीर देता है’।




 


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