रविवार, 22 मार्च 2015

अमर शहीद भगतसिंह : हवा में जिसके विचारों की खुशबू आज भी है, वो रहे, रहे न रहे


- सरला माहेश्वरी

(23 मार्च 1931 के दिन भगत सिंह को फांसी दी गयी थी। उस दिन को याद करते हुए उनकी स्मृति में श्रद्धार्थ सरला माहेश्वरी का लेख )


‘‘ब्रिटिश हुकूमत के लिए मरा हुआ भगतसिंह जीवित भगतसिंह से ज्यादा खतरनाक होगा। मुझे फांसी हो जाने के बाद मेरे क्रांतिकारी विचारों की खुशबू हमारे इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जाएगी। यह नौजवानों को मदहोश करेगी और वे स्वतंत्रता और क्रांति के लिए पागल हो जायेंगे। नौजवानों का यह पागलपन ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के विनाश को नजदीक ले आयेगा। यह मेरा दृढ विश्वास है। मैं बेसब्री से उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब मुझे देश के लिए मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वोच्च पुरस्कार मिलेगा। (फांसी पर चढ़ाये जाने के लगभग आठ महीना पहले जेल में भगतसिंह से मिलने गये प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा को कही गयी भगतसिंह की बात।)

उपरोक्त जो बात जुलाई 1930 में भगतसिंह ने कामरेड शिव वर्मा को कही थी, इतिहास गवाह है कि भगतसिंह की फांसी (23 मार्च 1931) के ठीक बाद वह पूरी तरह से सच साबित हुई थी। आजादी की लड़ाई के दौरान सन् 30-32 के व्यापक जनउभार से लेकर सन् 45-46 के अभूतपूर्व क्रांतिकारी संघषोंर् के बीच के लगभग 15-16 वर्षों का पूरा घटनाक्रम देख लीजिये, इस बात की सच्चाई के लिये किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं रहेगी।

आज भले ही कोई एक दल आजादी की पूरी लड़ाई पर अपने एकाधिकार का दावा क्यों न करे, उस लड़ाई में भगतसिंह और उनके साथियों के अवदान से इंकार करने की हिम्मत किसी में नहीं है। सन् 47 में भारत आजाद हुआ; अंग्रेज चले गये, लेकिन दिल पर हाथ रखकर कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि भारत तब पूरी तरह से साम्राज्यवाद के नागपाश से मुक्त हो गया था। आजादी के इन 59 वर्षों बाद आज की विश्व परिस्थति और भी ज्यादा जटिल है। इसे एकध्रुवीय विश्व कहा जा रहा है। लगता है जैसे अब सिर्फ एक साम्राज्य रह गया है, और बाकी पूरा विश्व उसका उपनिवेश है। ऐसे काल में भारत कितना संप्रभु है, अपनी तमाम आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक नीतियों को निर्धारित करने में वह कितना स्वतंत्र है, इसपर गहरा संदेह किया जा सकता है। कहना न होगा कि ऐसे जटिल और चुनौती भरे समय में साम्राज्यवाद से समझौताहीन संघर्ष का संदेश देने वाले शहीद भगतसिंह फिर एक बार जीवित भगतसिंह से भी कहीं ज्यादा विशाल और प्रभावी रूप में हमें अपने आगे के रास्ते की दिशा दिखा सकते हैं। अर्थात, जो बात भगतसिंह ने 75 साल पहले कामरेड शिव वर्मा से कही थी, वह आज भी उतनी ही सत्य दिखाई देती है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

भगतसिंह का जन्म 5 अक्तूबर 1907* के दिन तत्कालीन पंजाब के लायलपुर जिले (अब पाकिस्तान में) के बंगा गांव में हुआ था। यही वह वर्ष था जब ब्रिटिश शासकों ने सन् 1818 के रेगुलेशन तीन का, जिसमें बिना कोई मुकदमा चलाये किसी को भी जेल के सींखचों में बंद करने का अधिकार भारत की ब्रिटिश सरकार को दिया गया था, राष्ट्रीय आंदोलन के दमन के लिए निरंकुश ढंग से प्रयोग करना शुरू किया था। दुनिया की सबसे सभ्य कही जाने वाली अंग्रेज जाति के इस ‘जनतांत्रिक कानून‘ के प्रयोग पर तब पूरे भारत में भारी गुस्सा छाया हुआ था। सन् 1857 के पहले स्वतंत्रता संघर्ष से शिक्षा लेकर ही ब्रिटिश सरकार ने अपने तरकश में दमन के इन तीरों को भरा था। इसके अलावा, इसी काल में पुणे में चापेकर बंधुओं द्वारा प्लेग कमीश्नर मि. रैण्ड और एवस्र्ट की हत्या, बंगाल में अनुशीलन समिति के नाम से बने क्रांतिकारियों के संगठन और राष्ट्रीय कांग्रेस सहित विभिन्न मंचों से उठ रही स्वतंत्रता की आवाज उस समय की फिजा में गूंज रही थी।

भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह और उनके दोनों चाचा अजीतसिंह और स्वर्णसिंह भी इसी नये उभार की उपज थे। इन तीनों भाइयों को अपने आर्यसमाजी पिता अर्जुनसिंह से तर्क और विवेक की चेतना मिली थी। चाचा स्वर्णसिंह 23 वर्ष की अल्पायु में ही जेल की यातनाओं के कारण इस दुनिया से चल बसे। चाचा अजीतसिंह को 1818 के रेगुलेशन तीन के चलते जलावतन का दंड दिया गया था। आजादी के कुछ दिनों पहले ही वे स्वदेश लौटे थे और इसे नियति की अजीब विडम्बना ही कहा जायेगा कि जिस दिन देश आजाद हुआ, उसी दिन इस वीर स्वतंत्रता सेनानी ने अपने प्राण त्यागे;
जैसे शायद इसी दिन के लिए उन्होंने अपने प्राणों को संजो कर रखा था! भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह भी आजादी के आंदोलन से पूरी तरह जुड़े हुए थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे।


गदर पार्टी और 20 के दशक का भारत

एक ऐसे पारिवारिक और राजनीतिक माहौल में पैदा हुए भगतसिंह का पंजाब तब भारत की आजादी के क्रांतिकारी संघर्ष के नये दौर की एक अग्रिम चौकी हुआ करता था। यह शायद इतिहास की एक और नियति ही थी कि सन् 57 के पहले स्वतंत्रता संघर्ष से उत्तरी भारत के जो दो प्रमुख प्रदेश बंगाल और पंजाब अलग रहे थे, वे ही परवर्ती दिनों में एक नये उग्र राष्ट्रवादी उभार के प्रमुख केंद्र बने। सन् 1913 में पंजाब में जिस गदर पार्टी का गठन हुआ, उसके स्थापनाकर्ताओं में सोहन सिंह भखना (अध्यक्ष), केशर सिंह (उपाध्यक्ष) और लाला हरदयाल (महासचिव) शामिल थे। इनमें लाला हरदयाल को भारत का प्रथम मार्क्स वादी होने का गौरव प्राप्त है, जिन्होंने मार्क्स और एंगेल्स के कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र का सबसे पहले हिंदी में अनुवाद किया था। ‘ऋषि मार्क्स‘ शीर्षक से लिखी गयी उनकी पुस्तिका भारत में कार्ल मार्क्स के जीवन पर लिखी गयी पहली पुस्तक थी। गदर पार्टी का असली नाम हिंदी एशोशियेसन आफ पैसिफिक कोस्ट था। इसकी स्थापना अमेरिका के ओरिगन राज्य के पोर्टलैंड में की गयी थी। चूंकि इस एशोशियेसन के उर्दू मुखपत्र का नाम ‘गदर’ था, इसीलिये भारत में इसे लोग ‘गदर पार्टी’ के नाम से जानते थे। लाला हरदयाल ही इस मुखपत्र के संपादक थे। भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में गदर पार्टी को पहला धर्मनिरपेक्ष हस्तक्षेप कहा जा सकता है। गदर पार्टी के धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण के विपरीत बंगाल की अनुशीलन समिति और पुणे के चापेकर बंधुओं और उनके सहयोगियों के दृष्टिकोण में एक प्रकार का हिंदू पूर्वाग्रह काम किया करता था। गदर पार्टी की खूबी यह थी कि उसने शुरू से ही राजनीति को धर्म से अलग रखने और आर्थिक प्रश्नों को राजनीति के केंद्र में रखने की नीति अपनायी थी। उसका दृष्टिकोण अन्तर्राष्ट्रीय था। लाला हरदयाल हर उस देश में क्रांति चाहते थें जहां गुलामी और शोषण मौजूद हो। उनका कहना था-‘‘स्वामी और सेवक में कोई समानता नहीं हो सकती भले ही वे दोनों मुसलमान हों, सिख हों अथवा वैष्ण्व हों। दौलतमंद हमेशा गरीब आदमी पर शासन करता रहेगा। आर्थिक समानता के अभाव में भाईचारे की बात सिर्फ एक सपना है।‘‘ अमेरिका में अप्रवासियों द्वारा गठित किये जाने के बावजूद गदर पार्टी की गतिविधियों का प्रभाव भारत के पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ रहा था।

इसी गदर पार्टी के मात्र 19 वर्षीय कार्यकर्ता करतारसिंह सराभा को 16 नवम्बर 1915 के दिन ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी पर चढ़ाया था। यह घटना तब मात्र आठ वर्ष के भगतसिंह के दिल पर सदा के लिए अंकित हो गयी थी। अदालत में जब जज ने करतारसिंह को आगाह किया कि वह सेाच समझकर बयान दें वरना परिणाम बहुत भयावह हो सकता है, तब इस दिलेर नौजवान ने मस्ती में बड़े बेफिकराना अंदाज में कहा था-‘‘फांसी ही तो चढ़ा देंगे, और क्या? हम इससे नहीं डरते।‘‘ आखिरी समय में जेल में मुलाकात के लिए आए दादा ने जब उससे कुछ सवाल किये तो उसने लंबी उम्र पाकर मरने वाले अपने कई परिचितों का हवाला देते हुए यह प्रतिप्रश्न किया था कि लम्बी उम्र हासिल करके उन्होंने कौन सी उपलब्धि हासिल कर ली? मात्र साढे़ अठारह वर्ष का यह युवक उस समय वास्तव में अपनी कुर्बानी से राष्ट्रनायक बन गया था। भगतसिंह पर इस घटना का क्या प्रभाव पड़ा था इसे उन्होंने बाद के दिनों में हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिका ‘‘चांद‘‘ के फांसी अंक में करतारसिंह सराभा पर लेख लिखकर जाहिर किया था। भगतसिंह इसी सराभा की तस्वीर को हर समय अपने सीने से लगाये रहते थे और कहा करते थे कि यह मेरा गुरू, साथी व भाई है।

भगतसिंह की आरम्भिक शिक्षा उनके गांव में ही हुई थी। सन् 1916-17 में वे लाहौर में अपने पिता के पास आगये और वहां के डी ए वी स्कूल में दाखिला लिया। यह वह काल था जिस समय 1917 की रूस की समाजवादी क्रांति ने सारी दुनिया के मुक्तिकामी लोगों में एक नयी प्रेरणा का संचार किया था। सन् 1919 से 1922 के काल को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के भी एक स्वर्णिम काल के रूप में याद किया जाता है। इसी दौरान सन् 1919 में ब्रिटिश सरकार के दमनकारी रौलट ऐक्ट के खिलाफ गांधी जी ने ‘सत्याग्रह सभा’ का गठन करके देश भर में जबर्दस्त आंदोलन छेड़ा था। 13 अप्रैल 1919 के दिन अंग्रेजों ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में नरसंहार किया जहां बदनाम अंग्रेज फौजी अधिकारी डायर ने सैंकड़ो लोगों को एक स्थान पर गोलियों से भून दिया था। इसके खिलाफ देश भर में तीव्र गुस्से की लहर दौड़ गयी थी। मजदूरों के मोर्चे पर अहमदाबाद के 40 हजार कपड़ा मिल मजदूरों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जंगी लड़ाई शुरू कर दी थी। कलकत्ता, मुंबई, आदि सभी शहरों में, पंजाब, संयुक्त प्रांत, बिहरा-उड़ीसा में व्यापक जन-असंतोष फूट पड़ा था। मजदूरों की हड़तालें चरम पर थी। अकेले 1920 के छ: महीनों में 200 से ज्यादा हड़तालें हुई जिनमें 5 लाख से ज्यादा मजदूरों ने हिस्सा लिया था। किसान आंदोलन ने पंजाब में अकाली आंदोलन का, मालाबार में मोपला विद्रोह का और संयुक्त प्रांत में जमींदारों तथा साम्राज्यवाद के विरुद्ध व्यापक आंदोलन का रूप ले लिया। आदिवासियों का प्रसिद्ध काडो डोरा विद्रोह (आंध्रप्रदेश) और राजपुताने का भील विद्रोह इसी काल में हुआ। सन् 1921 में मजदूरों द्वारा हड़तालों की संख्या बढ़ कर 396 होगयी जिनमें 6 लाख मजदूरों ने हिस्सा लिया था।

इतिहासकारों ने 1920-22 के जमाने को क्रांतिकारी परिस्थिति का काल बताया है, जब राष्ट्रीय मुक्ति की विभिन्न शक्तियां साम्राज्यवादी शत्रुओं पर टूट पड़ने को तैयार थीं। सन् 1920 के सितंबर महीने में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पंजाब के नेता लाला लाजपत राय ने अध्यक्ष पद से कहा था,  इस सचाई से आंख बंद कर लेने से कोई लाभ नहीं कि हम एक क्रांतिकारी जमाने से गुजर रहे हैं। ...परंपरा से हम धीरे-धीर बढ़ने वाले लोग हैं, लेकिन जब हम चलने का फैसला लेते हैं तो हम जल्दी से और तेज लंबे डग भर कर चलते हैं। कोई भी जीवित प्राणी अपने जीवन में क्रांतियों से एकदम बचकर नहीं रह सकता। ( रजनी पाम दत्त, इंडिया टुडे, पृ.339)

सन् 1921 में गांधी जी ने भी एक सम्मेलन में कहा था कि वर्ष के अंत के पहले स्वराज्य पाने का मुझे इतना पक्का विश्वास है कि 31 दिसंबर के बाद स्वराज पाए बिना जिंदा रहने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। (द इंडियन स्ट्रगल 1920-1934, सुभाष चंद्र बोस, लंदन, पृ.84)

कांग्रेस के उसी कलकत्ता अधिवेशन में गांधीजी ने क्रमिक अहिंसक आंदोलन का कार्यक्रम स्वीकार किया था जिसके आह्वान पर अनेक लोगों ने सरकारी खिताब लौटा दिये, हजारों छात्रों ने सरकारी और अद्र्ध-सरकारी स्कूल और कालेज छोड़ दिए। इसी समय भगत सिंह भी स्कूल छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे।

इसी काल में दिसंबर 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में हसरत मोहानी ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पेश किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए ‘नेशनल वालंटियर्स’ का गठन किया गया और सविनय अवज्ञा आंदोलन के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन एक निर्णायक मुकाम पर पहुंचा हुआ दिखाई देता था। 1 फरवरी 1922 के दिन गांधी जी ने वायसराय को ‘अल्टीमेटम’ दिया था कि यदि एक हफ्ते में अंग्रेज सरकार ने अपने दमनचक्र को बंद न किया तथा सभी गिरफ्तार लोगों को रिहा न कर दिया तो वे सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ करेंगे।

लेकिन इसी समय 5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के चौरी चौरा की घटना घटी। इस घटना का आरंभ एक सुसंगठित स्वयंसेवी दस्ते द्वारा अनाज की बढ़ती हुई कीमतों और शराब की बिक्री के विरोध में स्थानीय बाजार में धरना देने से हुआ था। गांधीजी ने भी यह स्वीकारा था कि उकसावे के पर्याप्त कारण मौजूद थे। स्वयंसेवकों के नेता भगवान अहीर को पुलिस ने पीटा था तथा थाने के सामने प्रदर्शन करने आए लोगों पर गोलियां चलाईं। भीड़ उत्तेजित हो गई तथा उसने थाने में आग लगा दी। इसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गांधी जी इस घटना से बहुत क्षुब्ध हुए। उन्होंने इस घटना के बाद ही एक आदेश जारी करके अपने सत्याग्रह आंदोलन को रोक दिया और सत्याग्रह आंदोलन के सिपाहियों को आदेश दिया कि अब केवल रचनात्मक काम करो, चरखा कातो, खादी बुनो, लोगों को नशे की आदत छुड़ाओ, शिक्षा का प्रचार करो, अस्पृश्यता दूर करो आदि।

गांधी जी के इस आकस्मिक फैसले का तत्कालीन पूरे आंदोलन पर काफी बुरा असर पड़ा। लोगों में बेहद निराशा फैली। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मजीवनी में लिखा :  जब हमें मालूम हुआ कि ऐसे वक्त जबकि हम अपनी स्थिति को मजबूत करते जा रहे थे और सभी मोर्चों पर आगे बढ़ रहे थे, हमारी लड़ाई बंद कर दी गयी है, तो हम काफी बिगड़े।

सुभाष चंद्र बोस ने कहा कि इससे कांग्रेस शिविर में बाकायदा विद्रोह फैल गया। कोई भी न समझ सका कि महात्मा ने चौरी चौरा की विच्छिन्न घटना का इस्तेमाल सारे देश के आंदोलन का गला घोंट देने के लिये क्यों किया।

लाला लाजपतराय ने गांधीजी के यंग इडिया की भूमिका में लिखा कि 1921 में कंाग्रस सदस्यों की संख्या एक करोड़ थी, 1923 में घट कर वह कुछ लाख रह गयी। 1925 उन्होंने में उस समय की परिस्थति का वर्णन कुछ इस प्रकार किया-राजनीतिक परिस्थिति और चाहे जो कुछ हो, लेकिन वह आशाप्रद और उत्साहवद्र्धक नहीं। लोग हताशा में डूबे हुए हैं। हर चीज, सिद्धांत, पार्टियां और राजनीति विभाजन और विघटन की हालत में दीख पड़ती हैं।

लालाजी का आकलन बिल्कुल सही था। देखते ही देखते राष्ट्रीय कांगे्रस से अलग कई राजनीतिक धाराएं फूट पड़ी। जो तमाम लोग गांधीजी के असहयोग के आह्वान पर एक झंडे के नीचे इकट्ठा हुए थे वे सभी उनके इस एकतरफा निर्णय से हताश हुए और इसप्रकार राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक बारगी भारी बिखराव दिखाई देने लगा। यही वह काल था जब साम्प्रदायिक शक्तियों ने फिर से सर उठाना शुरू कर दिया था। इतिहासकारों ने इस काल को भारतीय राजनीति में एक अवसाद का काल कहा है और इसी अवसाद के चलते बाद में सांप्रदायिकता आदि अनेक प्रकार के भटकावों का जन्म हुआ।

गांधीवाद से मोहभंग

भगतसिंह भी उन लोगों में एक थे जिन्होंने सन् 1921 में गंाधीजी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर पढ़ाई छोड़ दी और असहयोग आंदोलन में कूद पड़े थे। अपने पारिवारिक संस्कारों और रोज ब रोज राजनीतिक क्षेत्र में घट रही घटनाओं ने भगत सिंह को आजादी की भावनाओं से भर दिया था। जब जलियांवाला बाग का जनसंहार हुआ तब भगतसिंह सिर्फ 12 वर्ष के थे। इस घटना के चंद रोज बाद वे जलियांवाला बाग गये थे और वहां की मिी को अपने साथ ले आये थे। ऐसे भगत सिंह 20 के जमाने के इस क्रांतिकारी उभार के दिनों में खामोश नहीं रह सकते थे। इसीलिये गांधीजी के असहयोग के आान का उनपर सीधा असर पड़ा और अपना स्कूल छोड़ने में उन्होंने जरा भी देर नहीं लगायी।

लेकिन असहयोग आंदोलन को अचानक वापस लिये जाने की घटना ने भगत सिंह को उतना ही अधिक मर्माहत भी किया था और यहीं से गांधी तथा उनके विचारों से भगतसिंह का एक प्रकार से मोहभंग होगया। 1922 में वे फिर से आगे की पढ़ाई के लिये लाहौर के नेशनल कालेज में दाखिल होगये। सन् 1923 में एफ.ए (इंटर मीडिएट) की परीक्षा पास की तथा बीए में भर्ती हुए। गांधीवाद से मोहभंग के साथ ही भगत सिंह ने क्रांतिकारी राजनीति की ओर कदम बढ़ाए। कालेज में ही उनका संबंध क्रांतिकारी अध्यापकों और साथियों से हो गया था। अपने कालेज जीवन में वे जन-जागरण के लिए ड्रामा-क्लब आदि की तरह की सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लिया करते थे। उन दिनों भारत की आजादी कैसे हासिल की जाए, इस विषय पर राजनीतिक क्षेत्र में भारी बहस-मुबाहिसा चला करता था। भगतसिंह भी इस पूरे विमर्श में पूरी शिद्दत से शामिल हो गये।

‘खिदमते वतन’ का क्रांतिकारी रास्ता

उधर, भगतसिंह के घर पर कुछ दूसरा  ही विमर्श चल रहा था। घर में दादी अपने पोते की शादी के लिए उत्सुक थी। उन्होंने एक जगह बात भी चला दी। इस खबर के मिलते ही भगत सिंह चिंतित होगये। उन्होंने दादी को समझाने की भी कोशिश की, लेकिन दादी के सामने अपना तर्क न चलते देखकर पिता के नाम एक पत्र लिखा और तत्काल अपने घर से रुखसत हो लिए। यह पत्र इस बात का सूचक है कि तब तक भगत सिंह ने अपने भविष्य का रास्ता निश्चित कर लिया था। यहां हम उस पूरे पत्र को ही उद्धृत कर रहे है:

पूज्य पिताजी,
नमस्ते।
मेरी जिंदगी मकसदे-आला (उच्च उद्धेश्य) यानी आजादी-ए-हिंद के असूल (सिद्धांत) के लिए वक्फ (दान) हो चुकी है।इसलिए मेरी जिंदगी में आराम और दुनियाबी खाहशात (सांसारिक इच्छाएं) बायसे कशिश (आकर्षक) नहीं है।
आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बाबूजी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन (देश सेवा) के लिए वक्फ कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतीज्ञा पूरी कर रहा हूं।
उम्मीद है आप मुझे माफ फरमाएंगे।
आपका ताबेदार
भगतसिंह
(कोष्ठ में दिये गये शब्दार्थ लेखक द्वारा)

पत्र को घर में छोड़कर भगतसिंह कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के पास पहुंच गये और उनके अखबार ‘प्रताप‘ में काम करने लगे। यहीं पर उनकी मुलाकात बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा, विजय कुमार सिन्हा की तरह के क्रांतिकारियों से हुई।

जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, आधुनिक क्रांतिकारी विचारों की भगतसिंह की पाठशाला लाहौर का नेशनल कालेज था। यहीं पर वे प्रिंसिपल छबीलदास, आचार्य जुगलकिशोर, भाई परमानंद और जयचंद विद्यालंकार के संपर्क में आए और इन सबने उनके अंदर क्रांति की जो ज्योति जलाई, उसकी आंच बाद में उनके जीवन की आखिरी घड़ी तक कभी भी मद्धिम नहीं हुई थी। छात्र भगतसिंह कालेज के पुस्तकालय और लाला लाजपतराय की द्वारकादास लाइब्रेरी में बैठकर सारी दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्ययन करते थे। उनके अध्ययन की इन्हीं तैयारियों ने कानपुर के प्रताप कार्यालय में रंग दिखाया और उस कार्यालय में ही सन् 1924 से विभिन्न विषयों पर उनकी लेखनी जो चल पड़ी, तो उसने जीवन के अंतिम दिन तक रुकने का नाम नहीं लिया।

द्वारकादास लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन राजा राम शास्त्री ने लिखा है कि 1924 से 1928 के बीच भगतसिंह जैसे ‘‘किताबों का भक्षण‘‘ किया करते थे। शिव वर्मा के अनुसार तब उनके प्रिय विषय थे-रूसी क्रांति, सोवियत संघ,आयरलैंड, फ्रांस, भारत के क्रांतिकारी अंादोलन,अराजकतावाद और माक्र्सवाद। इस गहन अध्ययन का ही परिणाम हुआ कि 1928 के अंत तक भगतसिंह ने समाजवाद को अपने आंदोलन का चरम लक्ष्य घोषित कर दिया।

गौर करने लायक बात है कि तब तक समाजवाद क्रांतिकारियों के एक नये आदर्श के रूप में सामने आ गया था। विभिन्न स्रोतों से रूस में समाजवादी क्रांति के प्रयोग की खबरें भारत में आने लगी थी और बिटिश सरकार भी समाजवाद के इस नये आदर्श को कुचलने के लिए पूरी तरह तत्पर हो गयी थी।

हिप्रसं और काकोरी कांड

बहरहाल, 1922 के बाद के अवसाद के काल में देश के क्रांतिकारियों में भी गांधीजी के प्रति काफी रोष था और उन्होंने फिर से शस्त्र उठाने का मन बना लिया और नये विकल्प के निर्माण की दिशा में अपनी गतिविधियां तेज कर दी। बंगाल के क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल ने देश भर के क्रांतिकारियों को एक अखिल भारतीय पार्टी के रूप में संगठित करने का बीड़ा उठाया और 1923 के अंतिम दिनों में रामप्रसाद बिस्मिल, जोगेश चटर्जी, चंद्रशेखर आजाद की तरह के तपे-तपाये क्रांतिकारियों को लेकर सशस्त्र क्रांति के जरिये भारत में अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन का अंत करके ‘फेडरल रिपब्लिक आफ यूनाइटेड स्टेट्स आफ इंडिया’ (भारत के संयुक्त राज्य का संघीय गणतंत्र) की स्थापना के लिये ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन’ (हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक संघ) (हिप्रसं) का गठन किया। शचीन्द्रनाथ सान्याल की पुस्तक बंदी जीवन‘‘ उस समय के क्रांतिकारियों के लिये गीता की तरह काम कर रही थी। भगत सिंह और उनके साथी इसी ‘हिप्रसं’ से जुड़ गये।

‘हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ’ की शाखाएं पूरे देश में फैली हुई थी। इसके जरिये लाहौर, कानपुर और बंगाल के क्रांतिकारियों के सूत्र जुड़ गये थे। उन्हीं दिनों, सन् 1924 के जनवरी महीने में क्रांतिकारी गोपीनाथ साहा ने कलकत्ता के घृणित पुलिस आयुक्त चाल्र्स टेगर्ट की हत्या की कोशिश की। लेकिन गल्ती से उन्होंने डे नामक एक अंग्रेज को मार डाला और पकड़े गये। तब देश भर में भारी विरोध के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने गोपीनाथ साहा को फांसी दे दी थी।

हिप्रसं की एक बड़ी कार्रवाई 9 अगस्त 1925 के दिन हुई जब लखनऊ के निकट के एक गांव काकोरी में 8-डाउन गाड़ी पर दस लोग चढ़ गये और उस गाड़ी से जारहे रेलवे के सरकारी खजाने को लूट लिया। इसपर ब्रिटिश सरकार ने व्यापक गिरफ्तारियां की और काकोरी मुकदमे में ही अशफाकउल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह और राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी के फंदे पर लटका दिया, और चार लोगों को कालापानी की सजा सुनाई गयी तथा 17 को लंबी कैद की सजा सुनाई गयी।
भगतसिंह के साथी शिव वर्मा के अनुसार तब क्रांतिकारियों की प्रथम पंक्ति के नेताओं में सिर्फ चंद्रशेखर आजाद और कुंदनलाल गुप्ता गिरफ्तार होने से बच गये थे। उन दिनों हिप्रसं का काम भगतसिंह और सुखदेव देखा करते थे।

भगतसिंह और उनके साथियों ने 1927 में ‘नौजवान भारत सभा‘ का गठन किया जिसमें क्रांग्रेस के कुछ वामपक्षी लोग भी शामिल थे। संगठन के घोषणापत्र में कहा गया था कि जन-क्र्रांति के जरिए ही देश की गुलामी खत्म की जा सकती है। इस संगठन के निर्माण के पीछे भगतसिंह पर दुनिया के अराजकतावादी आंदोलन का भारी प्रभाव था। भगतसिंह की नौजवान भारत सभा के अलावा भी उस समय देश के विभिन्न हिस्सों में युवकों के खुले और गुप्त संगठन काम कर रहे थे। बंगाल के युगांतर, अनुशीलन और चट्रगांव रिपब्लिकन आर्मी, संयुक्त प्रांत आगरा व अवध को केंद्र बनाकर काम कर रही हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी आदि ऐसे ही दल थे।

समाजवाद और हिसप्रसं

भगतसिंह के परिपक्व राजनीतिक व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए उनके लेखों के संग्रहकर्ता चमनलाल ने अपने निबंध ‘भारतीय क्रांतिकारी चिंतन के प्रतीक भगतसिंह‘ में बताया है कि 1925 के काकोरी बम कांड के बाद क्रांतिकारियों का संगठन ‘हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ‘ बिखर गया था। उस संघ के बिखरे हुए सूत्रों को जोड़कर समाजवाद की नयी विचारधारा के आधार पर एक नया संगठन, ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ‘ (हिसप्रसं) का गठन करने में भगतसिंह ने ही नेतृत्वकारी भूमिका अदा की थी। चमनलाल ने बताया है कि किसप्रकार विश्व के क्रांतिकारी चिंतन के अध्ययन से भगतसिंह माक्र्सवाद की ओर बढ़ रहे थे तथा माक्र्स, एंगेल्स और लेनिन के लेखन और व्यक्तित्व ने उन पर जबरदहस्त असर छोड़ा। इसीका प्रभाव था कि 8 व 9 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में चार प्रांतों, पंजाब, राजस्थान, बिहार और संयुक्तप्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) के 8 क्र्रांतिकारी कार्यकर्ता भारत के क्र्रांतिकारी आंदोलन को नयी दिशा देने के लिए एकत्र हुए थे। इस बैठक में चंद्रशेखर आजाद भी आने वाले थे लेकिन सुरक्षा के कारणों के चलते वे नहीं आ पाये। बैठक के मूल विषयों पर उनसे पहले ही सहमति ले ली गयी थी। इस बैठक में भगतसिंह ने भारत में क्रांति के जरिये समाजवाद की स्थापना का प्रस्ताव रखा था और ‘हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ‘ का नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ‘ रख दिया गया। शिव वर्मा के अनुसार इस बैठक में भगतसिंह के प्रस्ताव को दो के मुकाबले 6 के बहुमत से स्वीकारा गया। इसके सैनिक संगठन का नाम रिपब्लिकन आर्मी ही रह गया।

अत्यंत सीमित साधनों के बावजूद इस संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों ने इसे बहुत जल्द ही सारे देश में लोकप्रिय बना दिया था। इस संगठन के निर्माण के ठीक बाद दिसम्बर 1928 में भगतसिंह कलकता आये थे। शिव वर्मा ने बताया है कि कलकता में उनकी मुलाकात क्रांतिकारी त्रैलौक्यनाथ चक्रवर्ती और प्रतुल गांगुली से हुई थी। दिल्ली बैठक के समय ये दोनों क्रांतिकारी नेता जेल में थे और उनकी अनुपस्थिति में किसी दूसरे नेता ने दिल्ली बैठक का बहिस्कार कर दिया था। भगतसिंह ने अपनी कोलकाता यात्रा के दौरान दोनों नेताओं को दिल्ली बैठक की जानकारी दी और उसपर उनकी सहमति भी प्राप्त कर ली। दोनों नेताओं ने उन्हें बम बनाने का प्रशिक्षण देने के लिए यतीन्द्रनाथ दास को आगरा भेजने का आश्वासन दिया।

डा. महादेव साहा ने अपने एक लेख में यह बताया है कि भगतसिंह की मुलाकात प्रसिद्ध क्रांतिकारी भूपेन्द्रनाथ दत्त से भी हुई थी। भूपेन्द्रनाथ दत्त तब बम-पिस्तौल की राजनीति छोड़कर मजदूरों-किसानों को संगठित करके सामाजिक क्रांति करने की कम्युनिस्ट राजनीति को अपना चुके थे। भूपेन्द्रनाथ दत्त का स्थान उग्रवादी क्रांतिकारी राजनीति में पितामह समान रहा है। भगतसिंह जब उनसे मिलने गये तो भूपेन्द्रनाथ दत्त उन्हें बम-पिस्तौल की राजनीति की असारता को समझाने की कोशिश की थी। डा. महादेव साहा ने यह भी बताया है कि भूपेन्द्रनाथ दत्त ने भगतसिंह को कम्युनिस्ट पार्टी के नेता का. मुजफ्फर अहमद से मिलने की सलाह भी दी थी।

बहरहाल, अपने अध्ययन और भूपेन्द्रनाथ की तरह के वरिष्ठ क्रांतिकारी के परामर्श से अराजकतावादी राजनीति की सीमाओं को समझने के बावजूद भगतसिंह अपने ‘हिसप्रसं‘ के संगठन के साथ इतना आगे बढ गये थे कि शायद तब उनके लिए अपने पुराने रास्ते को छोड़कर किसी नये रास्ते पर बढ़ना नामुमकिन सा हो गया था।

सन् 1927 में भारत में राजनीतिक सुधारों के बारे में सुझाव देने के लिये ब्रिटिश सरकार ने साइमन आयोग का गठन किया था। इस आयोग में सर जॉन साइमन के अलावा बाकी सभी छ: सदस्य भी अंग्रेज ही थे। राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1927 की अपनी मद्रास बैठक में इस आयोग के ब्हिष्कार का फैसला किया। इसके कारण देश भर में इस आयोग के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हुए।

सान्डर्स की हत्या

इन्हीं विरोध प्रदर्शनों की श्रंखला में 30 अक्तूबर 1928 के दिन लाहौर में लाला लाजपतराय और मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में एक जोरदार प्रदर्शन किया गया। वहां के पुलिस प्रमुख स्काट ने शहर भर में जुलूसों और सभाओं पर रोक लगा दी थी। लेकिन इसके बावजूद हजारों लोग इस प्रदर्शन में शामिल हुए। स्काट ने इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन को अपने बर्बर हमले का निशाना बनाया। लालाजी के सर पर लाठी से जबरदस्त एक के बाद एक कई प्रहार किये गये। अंत में लालाजी निढ़ाल होकर जमीन पर गिर गये। इस हमले के चलते 18 दिनों बाद 17 नवंबर 1928 के दिन लाला जी की मृत्यु होगयी। भगतसिंह ने लालाजी पर हुए इस बर्बर हमले को खुद अपनी आंखों से देखा था। लालाजी की मौत के बाद जाहिर है भगतसिंह और उनके साथियों के दिलों में अत्याचारी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नफरत का ज्वार उबल पड़ा। भगत सिंह के शब्दों में यह हमारे पौरुष को चुनौती थी। भारत के क्रांतिकारियों ने इस चुनौती को स्वीकार लिया। तय किया गया कि लालाजी की मृत्यु के लिये जिम्मेदार, लाठी चार्ज कराने वाले पुलिस अधिकारी को कलंक मान कर उसे धोया जाए। उन्होंने इस अत्याचार का मुंहतोड़ जवाब देने का निश्चय किया।

इस काम को पूरा करने के लिये चन्द्रशेखर ‘आजाद’ लाहौर आए। क्रांतिकारियों से बातचीत के बाद इस पुलिस अफसर को मार डालने की योजना बनी और इसके लिये चार लोगों को नियुक्त किया गया: चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरू और जयगोपाल। उस घटना के ठीक एक महीने बाद, 17 दिसम्बर 1928 को ही भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव ने स्काट को मारने की योजना बनाई थी। दुर्भाग्य से गलत पहचान की वजह से स्काट के बदले एक जूनियर अधिकारी साण्डर्स मारा गया।

सान्डर्स की हत्या के बाद हिसप्रसं की ओर से पोस्टर लगाये गय जिन पर लिखा था: लाखों लोगों के चहेते नेता की एक सिपाही द्वारा हत्या पूरे देश का अपमान था। इसका बदला लेना भारतीय युवकों का कत्र्तव्य था। सांडर्स की हत्या का हमें दुख है, पर वह उस अमानवीय और अन्यायी व्यवस्था का एक अंग था, जिसे नष्ट करने के लिये हम संघर्ष कर रहे हैं।

गौर करने लायक बात यह है कि जिन लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिये भगत सिंह और उनके साथियों ने स्काट की हत्या करने की योजना बनायी थी, उन्हीं लालाजी के साथ भगत सिंह और उनके साथी कितने तीखे विवाद किया करते थे, यह ‘किरती’ पत्रिका की संपादकीय टिप्पणियों और लालाजी के नाम भगतसिंह के खुले पत्रों को देखने से पता चलती है। इनमें लालाजी पर विदेशों में बसे भाइयों से बंटोर कर लाये गये रुपयों के एक हिस्से को खुद हड़प जाने तक का आरोप है। एक पत्र में भगत सिंह ने उन पर 1. राजनीतिक ढुलमुलपन, 2. राष्ट्रीय शिक्षा के साथ विश्वासघात, 3. स्वराज्य पार्टी के साथ विश्वासघात, 4. हिन्दू-मुस्लिम तनाव को बढ़ाने और 5. उदारवादी बन जाने के अभियोग लगाये थे।
उस समय पूरे देश में एक नये प्रकार का जन उभार भी दिखाई दे रहा था। शिव वर्मा लिखते हैं-‘‘मजदूर वर्ग की ओर से देश भर में लड़ाकू किस्म की हड़तालें हो रही थीं और संगठित मजदूर संघों की गतिविधियां बढ रही थी जिसके फलस्वरूप मजदूर काम करने की बेहतर स्थितियों और अधिक वेतन के लिए ज्यादा प्रभावशाली ढंग से संघर्ष करने में समर्थ हो रहे थे। श्रमिकों ,युवकों और छात्रों में साम्यवाद का प्रभाव तेजी से बढ रहा था। देश में पहली बार एक संगठित और व्यापक वामपंथी राजनीतिक आंदोलन आकार गृहण कर रहा था। ‘‘

बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट

इसी सिलसिले में शिव वर्मा लिखते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी इस समूचे घटनाक्रम से भारी चिंतित थे और उन्होंने इस जन उभार को कुचलने के लिए केंद्रीय एसेम्बली में दो विधेयक लाने का निर्णय किया। पहला था पब्लिक सेफ्टी बिल और दूसरा था ट्रेड डिस्प्यूट बिल। इन दोनों का उद्धेश्य साम्यवादियों और टे्रड यूनियन आंदोलन का दमन था। तत्कालीन केंद्रीय एसेम्बली में समूचे विपक्ष ने इसका विरोध किया था और 24 सितम्बर 1928 को इन्हें अस्वीकृत भी कर दिया गया। फिर भी, सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही और 1929 के जनवरी महीने में पब्लिक सेफ्टी बिल को फिर से संशोधित रूप में पेश किया गया।
शिव वर्मा बताते हैं कि सरकार के इस निर्णय से भगतसिंह और उनके साथी बेहद नाराज थे। उन्होंने इसके प्रतिवाद में कोई न कोई ठोस कार्रवाई करने का निर्णय लिया। आगरा में हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ की केंद्रीय समिति की बैठक बुलाई गयी और इसमें जो प्रस्ताव रखे गये वे संक्षेप में इसप्रकार हैं-‘‘(1) पार्टी को एसेम्बली में बम फेंककर सरकार की हठधर्मिता के विरुद्ध अपना आक्रोश प्रकट करना चाहिए। (2) इस काम के लिए जो लोग चुने जांए वे कार्रवाई करने के बाद भागने की कोशिश न करें बल्कि आत्मसमर्पण कर दें, और मुकदमें के दौरान अदालत का इस्तेमाल पार्टी के उद्धेश्यों और प्रयोजनों के प्रचार के लिए करें तथा (3) एक और कामरेड के साथ मिलकर उन्हें इस निर्णय को क्रियान्वित करने की अनुमति दी जाए।‘‘

केंद्रीय समिति ने भगतसिंह के पहले दो प्रस्तावों को तो तत्काल मान लिया लेकिन अंतिम प्रस्ताव को दो दिनों की बहस के बाद ही माना गया।

बहरहाल, 4 सितम्बर 1928 के दिन केंद्रीय एसेम्बली में दूसरा बिल टे्रड डिस्प्यूट बिल पेश किया गया था जिसे विचार के लिए सलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया गया। यही बिल थोड़े रद्दोबदल के बाद 2 अप्रैल 1929 के दिन फिर से एसेम्बली में रखा गया। 8 अप्रैल 1929 को यह बिल 38 के मुकाबले 56 के बहुमत से पारित कर दिया गया। शिव वर्मा के शब्दों में-‘‘अध्यक्ष महोदय मतदान का परिणाम घोषित करने के लिए खड़े हुए, भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों ने एक-एक बम फेंका। इसके साथ ही उन्होंने नारे लगाए और इश्तहार बांटे। इश्तहारों में यह समझाया गया था कि बम विस्फोट की कार्रवाई के पीछे क्या उद्धेश्य है।‘‘

उल्लेखनीय है कि बम फेंकने के बाद ये दोनों नौजवान ‘इन्कलाब जिंदाबाद‘ और ‘हिंदुस्तान हिंदुस्तानियों का है‘ के नारे लगाते हुए बैठे रहे। बमों के धमाकों से भय से कंाप रहे अंग्रेज सरकार के रक्षकों को बुलाकर इन्होंने खुद को गिरफ्तार करवाया। अपनी पुस्तक ‘साम्राज्यवाद का उदय और अस्त‘ में अयोघ्यासिंह ने इस घटना के बारे में लिखा है-‘‘ इस घटना के बाद ही ब्रिटिश शासकों ने सारे देश के नौजवान क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी,हिंदुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसियेशन के लाहौर में गुप्त केंद्र और बम के कारखाने का पता उन्हें लग गया। चन्द्रशेखर आजाद को जो बाद में इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में हथियारबंद पुलिस के साथ अकेले लड़ते मारे गये, छोड़कर सभी नेता गिरफ्तार कर लिए गये। गिरफ्तारियां पंजाब से लेकर बंगाल तक हुई और लाहौर में ले जाकर मामला चलाया गया। यह मामला इतिहास में लाहौर ाड़यंत्र के नाम से मशहूर है। भगतसिंह, सुखदेव राजगुरु, यतीनदास, बटुकेश्वर दत्त, अजय घोष, जो बाद में हिंदुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेके्रटरी बने, शिव वर्मा जो कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय मुखपत्र ‘लोकलहर‘ के संपादक बने, विजय कुमार सिन्हा, यशपाल जो आज हिंदी के उच्च कोटि के कहानी और उपन्यास लेखक हैं, जयदेव कपूर, का. गयाप्रसाद, कुंदनलाल गुप्त वगैरह इसके अभियुक्त थे।‘‘

असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ की ओर से जो पर्चा फेंका था उसका प्रारम्भ इन शब्दों से होता है- ‘‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज की जरूरत होती है, प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलिया के यह शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।‘‘

इस पर्चे में उन्होंने उपरोक्त दोनों विधेयकों के दमनकारी स्वरूप पर गुस्सा जाहिर करते हुए कहा था कि ‘‘ विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे परंतु उसकी वैद्यानिकता की नकाब फाड़ देना आवश्यक है।‘‘ इस पर्चे के अंत में कहा गया कि‘‘हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम इंसान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परंतु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
इस पर्चे में साफ कहा गया था कि भारतीय क्रांतिकारी दल का मकसद समाजवाद की स्थापना है और हमारा नारा है इंकलाब जिन्दाबाद।

अदालत में मुकदमे के दौरान भगतसिंह और उनके साथियों ने अपने उद्धेश्य के प्रचार के लिए उस मंच का भरपूर इस्तेमाल किया और देखते ही देखते जी.एस. देओल के अनुसार इससे राष्ट्रीय आंदोलन को नयी गति मिली और ‘‘भारतीय राष्ट्रीय क्रांग्रेस के लिए दिसम्बर 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने और पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास करने का पथ प्र्रशस्त किया।‘‘

मार्क्सवाद की ओर

कामरेड शिव वर्मा ने बताया है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त,  दोनों पर रूसी अराजकतावादी बकुनिन का भारी प्रभाव था। यहां यह गौर किया जा सकता है कि 8 अप्रैल 1929 के दिन जब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बहरों को सुनाने के लिए केंद्रीय एसेम्बली में बम फेंका था, तब भी उनकी यह कार्रवाई यूरोपीय अराजकतावादी वैलेट के कारनामे से प्रेरित थी। वीर भारत तलवार ने हंस के अप्रैल 1987 के अंक में अपने एक लेख में यह बताया है कि वैलेंट ने भी भगतसिंह की भंाति एसेम्बली में बम फेंकने के बाद कहा था- ‘बहरों को सुनाने के लिए बड़ी बुलंद आवाज की जरूरत है’।

कामरेड शिव वर्मा लिखते हैं कि भगतसिंह को अराजकतावाद के प्रभाव से मुक्त करके समाजवाद की तरफ लाने का श्रेय दो व्यक्तियों को है- स्वर्गीय कामरेड सोहनसिंह जोश और लाला छबीलदास। 1928 के शुरू होते न होते उन्होंने (भगतसिंह) ने अराजकता को छोड़ कर समाजवाद को स्वीकार लिया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने माक्र्सवाद को पूरी तरह समझ लिया था। अतीत के कुछ प्रभाव अभी बाकी थे।

भारत के क्रांतिकारी आंदोलन में भगतसिंह और उनके साथियों का जेल जीवन एक नये निर्णायक मोड़ का सूचक था। उधर बंगाल में भी क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास से पता चलता है कि जेल और काला पानी की सजा के दिनों में यहां के क्रांतिकारियों को माक्र्सवाद से संबंधित साहित्य के अध्ययन का जो मौका मिला उसने बहुतों को कम्युनिस्ट क्रांतिकारी में तब्दील कर दिया। बिल्कुल उसी प्रकार भगतसिंह और उनके साथियों को भी जेल जीवन में अध्ययन और विचार-विमर्श का जो मौका मिला, उसने उनके अंदर एक नयी समझ पैदा की। ‘‘इसके आधार पर उन्होंने अपने पूर अतीत को खासकर वैयक्तिक कार्यकलापों और शौर्य-प्रदर्शन के आदर्श को नये सिरे से जांचा-परखा और अब तक की कार्यप्रणाली को छोड़कर समाजवादी क्रांति का रास्ता अपनाने का निश्चय किया। गहन अध्ययन और बोस्टल जेल में दूसरे साथियों के लम्बे विचार-विमर्श के बाद भगतसिंह इस निर्णय पर पहुंचे कि यंहा-वंहा कुछ भेदियों और सरकारी अफसरों की वैयक्तिक हत्याओं से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है।‘‘ (शिव वर्मा, क्रांतिकारी अंादोलन का वैचारिक प्रकाश, भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, राजकमल प्रकाशन,पृष्ठ 27)

गौर करने लायक बात हेै कि जेल से ही भगतसिंह ने 19 अक्तूबर 1929 के दिन पंजाब स्टूडेंट्स कांफ्रेंस के नाम अपने संदेश में कहा था-‘‘आज नौजवानों को बम और पिस्तौल अपनाने के लिए नहीं कह सकते...उन्हें औद्यौगिक क्षेत्रों की गंदी बस्तियों और गांवों के टूटे-फूटे झोंपड़ों में रहने वाले करोड़ों लोगों को जगाना है।‘‘

8 अप्रैल 1929 के बाद से लेकर उम्र की आखिरी घड़ी (23 मार्च 1931) तक भगतसिंह जेल की सींखचों से बाहर नहीं आ पाये। जेल में रहते हुए उन्होंने और उनके साथियों ने कई बार जेल अधिकारियों के दुव्र्यवहार के खिलाफ भूख हड़तालें की। भगत सिंह के साथी यतीन दास 63 दिन तक भूख हड़ताल पर रह जिसके अंत में उनकी मृत्यु भी होगयी। अप्रैल 1929 से लेकर 1930 के आखिर तक ये देशभक्त जेल में रहे।

6 जुन 1929 को दिल्ली की सेशन अदालत में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बयाान दिया था वह उनके क्रांतिकारी दर्शन को जानने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। अपने इस बयान में उन्होंने कहा था कि-‘‘यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा विद्वेष की भावना से नहीं किया है। ...बहुत कुछ सोचने के बाद भी एक ऐसी संस्था का औचित्य हमारी समझ में नहीं आ सका, जो बावजूद उस तमाम शानौ-शौकत के, जिसका आधार भारत के करोड़ों मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई है, केवल मात्र एक दिल को बहलाने वाली थोथी, दिखावटी और शरारतों से भरी हुई संस्था है। ... मानवत के प्रति हार्दिक सद्भाव और अमिट प्रेम के कारण उसे व्यर्थ के रक्तपात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया है।‘‘

इस घटना के पीछे के अपने अभिप्राय को बताते हुए उन्होंने साफ किया कि वे किसी भी व्यक्ति को कोई नुकसान पहुंचाना नहीं चाहते थे। असेम्बली भवन में फेंके गये बमों से वंहा की एक खाली बैंच को ही कुछ नुकसान पहुंचा। क्रांति से अपने अभिप्राय को जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि-

‘‘क्रांति में व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।‘‘ अपने इस वक्तव्य के अंत में उन्होंने कहा-‘‘क्रांति की इस पूजा वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाये हैं क्योंकि ऐसे महान आदर्श के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कम है।‘‘

दिल्ली के सेशन जज ने असेम्बली बम कांड के लिए भगतसिंह को आजीवन कारावास का दंड दिया था। लाहौर के हाईकोर्ट में उसकी अपील की गयी। हाईकोर्ट के समक्ष उन्होंने अपने बयान में सेशन अदालत के फैसले की आलोचना करते हुए फिर इस बात को दोहराया कि-‘‘इंकलाब जिंदाबाद से हमारा यह उद्धेश्य नहीं था, जो आम तौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। और यही चीज थी जिसे हम प्रकट करना चाहते थे।

इसी दौरान ब्रिटिश सरकार को मुखबिरों से यह पता लग गया कि सान्डर्स की हत्या में भगत सिंह और उनके साथियों का हाथ था। भगत सिंह और उनके साथियों पर इस कांड के लिये भी मुकदमा चलाया गया। यह मुकदमा लाहौर षड़यंत्र मुकदमे के नाम से प्रसिद्ध है।

उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश सरकार ने बाकायदा एक अघ्यादेश जारी करके लाहौर षड़यंत्र मुकदमे को जल्द निपटाने के लिए एक ट्रिब्यूनल की नियुक्ति की थी। इस ट्रिब्यूनल के गठन के पीछे काम कर रही ब्रिटिश सरकार की बदनीयती को समझते हुए ही भगतसिंह सहित उने छ: साथियों ने इस मुकदमे की कार्रवाई में भाग न लेने का ऐलान किया था। ट्रिब्यूनल के कमीश्नर के नाम अपने पत्र में उन्होंने कहा था-‘‘हमारा विश्वास है कि ऐसी सरकारें, विशेषकर अंग्रेजी सरकार जो असहाय और असहमत भारतीय राष्ट्र पर थोपी गयी है, गुंडो, डाकुओं का गिरोह और लुटेरों का टोला है जिसने कत्लेआम करने और लोगों को विस्थापित करने के लिए सबप्रकार की शक्तियां जुटाई हुई है। ...वर्तमान सरकार के कानून विदेशी शासन के हितों के लिए चलते हैं और हम लोगों के हितों के विपरीत है। इसलिए उनकी हमारे ऊपर किसी भी प्रकार की सदाचारिता लागू नहीं होती।‘‘

उपरोक्त तमाम उद्धरणों से जाहिर है कि किसप्रकार भगतसिंह अदालत के मंच से उपनिवेशवादी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष करने के अपने इरादों का ऐलान करते हैं। भगतसिंह और उनके साथियों ने जिस विशेष ट्रिब्यूनल के साथ सहयोग न करने का निर्णय लिया था उसी ट्रिब्यूनल ने 7 अक्तूबर 1930 के दिन भगतसिंह, सुखदेव और शिवरात राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई थी। फांसी पर चढ़ाये जाने के पहले भगतसिंह ने अपने साथियों के नाम जो अंतिम पत्र लिखा था उसमें उन्होंने कहा था कि-‘‘एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका। अगर स्वतंत्रत, जिंदा रह सकता तब शायद उन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता। इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।‘‘

यह था भगतसिंह के जेल-जीवन और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उनकी घृणा तथा मानवता की सेवा की उनकी अधूरी रह गयी इच्छाओं का एक पहलू।

अदालत में भगतसिंह और उनके साथी लगातार अंग्रेज सरकार से वैचारिक लड़ाई लड़ते रहे और देश की आजादी के लिए अपनी लड़ाई के औचित्य को साबित करने के प्रयास में लगे रहे । देश भर में भगतसिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों को छोड़ देने की जबरदस्त मांग उठ रही थी। लेकिन इन सबका अंगेज सरकार पर कोई असर नहीं हुआ।  निर्दयी अंग्रेज हुकूमत ने भगतसिंह ,राजगुरु और सुखदेव को फांसी का हुक्म सुनाया। 23 मार्च 1931 की शाम 7 बज कर 23 मिनट पर इन तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गयी। इसके बाद ही देश भर में ‘‘भगतसिंह जिंदाबाद‘‘ की आवाज गंूज उठी। जवाहरलाल नेहरू को जैसे ही यह खबर लगी, उन्होंने कहा कि ‘‘हमारे और इंगलैंड के बीच अब भगतसिंह की लाश रहेगी‘‘। 24 मार्च को शोक दिवस का पालन किया गया। महात्मा गांधी के जीवनीकार जी. डी. तेंदुलकर ने लिखा है कि लाहौर में अधिकारियों ने यूरोपीयन महिलाओं को 10 दिन तक यूरोपीयन क्र्वाटर में ही रहने की चेतावनी दी। मुम्बई और मद्रास में जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए।  कोलकाता की सड़कों पर सशस्त्र पुलिस बल पहरा दे रहे थे। प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़पें हुई जिनमें 141 लोग मारे गये,586 लोग घायल हुए और 341 लोगों को गिरफ्तार किया गया। असेम्बली में वित्त विध्ेायक पर चल रही बहस की उपेक्षा करते हुए सदस्यों ने सदन से वाक आउट किया।

जेल में अध्ययन

भगतसिंह के जेल-जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू एक उत्कट अघ्येता और क्रांतिकारी विचारक के विकास का पहलू है। जेल में रहते हुए ही उन्होंने राष्ट्रीय क्रांग्रेस की विचारधारा और गांधीजी के दर्शन को अस्वीकारते हुए क्रांति के अपने दर्शन की व्याख्या की थी जिसे ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र‘ का घोषणापत्र कहा गया था। यह भगतसिंह के क्रांतिकारी साथी भगवतीचरण वोहरा का ‘बम का दर्शन‘ शीर्षक लेख था जिसे भगतसिंह ने जेल में रहते हुए अंतिम रूप दिया था। अपने जेल जीवन में ही भगतसिंह ने अपना प्रसिद्ध लेख, ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूं‘‘ लिखा था। इस लेख में उन्होंने सभी आस्थावान लोगों से यह सवाल किया था कि -‘‘तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है ? ... उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने हेतु भावना क्यों नहीं पैदा की ? वह क्यों नहीं पूंजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत संपत्ति का अपना अधिकार त्याग दें और इसप्रकार न केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय,वरन समस्त मानव समाज को पूंजीवाद की बेडि़यों से मुक्त करे। ... मैं आपको यह बता दूं कि अंग्रजों की हुकूमत यंहा इसलिए नहीं है कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं है। ... कहां है ईश्वर ? वह क्या कर रहा है ? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मजा ले रहा है ? वह नीरो है, वह चंगेज है, तो उसका नाश हो।‘‘(भगतसिंह और उनके दस्तावेज, राजकमल प्रकाशन,पृष्ठ 367 से 380)

इसी प्रकार उनका एक दूसरा महत्वपूर्ण लेख जिसका अनुवाद शिव वर्मा ने किया है, उनके एक दोस्त लाला रामशरण दास की कविताओं का संकलन ‘ड्रीम लैंड‘ की भूमिका है। इस भूमिका में उन्होंने कविता की समीक्षा करने में अपनी असमर्थता को जाहिर करते हुए मुख्य रूप से एक क्रांतिकारी राजनीतिक नेता के नाते अपनी टिप्पणी की है। वे कहते हैं कि राजनीति के क्षेत्र में ‘ड्रीम लैंड‘ का एक महत्वपूर्ण स्थान है। वह सामान्यतौर पर राजनीति के आदर्शविहीन स्वरूप की कमी को पूरा करता है। इसी सूत्र के आधार पर उन्होंने इसमें क्रांति की अपनी अवधारणा, रहस्यवादी विचारों से अपनी असहमति और भविष्य के कम्युनिस्ट समाज के बारे में अपने सोच को रूपायित किया है। लाला रामशरन दास को आजीवन कैद की सजा मिली थी। अपने जेल जीवन में ही उन्होंने जो कविताएं लिखी, यह पुस्तक उन्हीं कविताओं का संकलन थी। इसमें उन्होंने एक माक्र्सवादी के नजरिये से रामशरन दास के विचारों को परखा था और यह साफ शब्दों में कहा था कि-‘‘अन्य किसी व्यक्ति की अपेक्षा क्रांतिकारी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि समाजवादी समाज की स्थापना हिंसात्मक उपायों से नहीं हो सकती बल्कि उसे अंदर से ही प्रस्फूटित और विकसित होना चाहिए।

इसी निबंध में भगत सिंह ने अपने भविष्य के कम्युनिस्ट समाज के बारे में जो टिप्पणी की है, वह काफी महत्वपूर्ण है। इसमें वे कहते हैं : भविष्य के समाज में अर्थात् कम्युनिस्ट समाज में जिसका हम निर्माण करना चाहते हैं, हम धर्मार्थ संस्थाएं स्थापित करने नहीं जा रहे हैं, बल्कि उस समाज में न गरीब होंगे न जरूरतमन्द, न दान देनेवाले न दान लेनेवाले। ...पुस्तक में लेखक ने समाज की जिस साधारण रूपरेखा पर बहस की है वह बहुत कुछ वैसी ही है जैसी वैज्ञानिक समाजवाद की।

इसीमें आगे भगतसिंह ने समाजवाद में कायिक और मानसिक श्रम के विषय पर विचार करते हुए अपनी जिस वैज्ञानिक सूझ-बूझ का परिचय दिया, वह देखने लायक है। वे कहते हैं : उसमें (ड्रीमलैंड पुस्तक में - लेखक) कुछ ऐसी बातें भी है जिनका विरोध या प्रतिवाद आवश्यक है, या यूं कहा जाय कि उनमें सुधार आवश्यक है। मिसाल के तौर पर 427वें पद के नीचे दी हुई टिप्पणी में वह लिखता है कि राजकर्मचारियों को अपनी रोजी कमाने के लिये प्रतिदिन चार घंटे खेतों पर या कारखानों में काम करना चाहिए। लेकिन यह अव्यवहारिक तथा हवाई बात है। यह बात शायद आज की व्यवस्था में राजकर्मचारियों को जो ऊंचा वेतन दिया जाता है, उसके खिलाफ प्रतिक्रिया की ही उपज है। दरअसल बोल्शेविकों को भी यह स्वीकार करना पड़ा था कि दिमागी काम उतना ही उत्पादक श्रम है, जितना कि शारीरिक श्रम, और आने वाले समाज में जब विभिन्न तत्वों के आपसी संबंधों का समायोजन समानता के आधार पर होगा तो उत्पादक और वितरक दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण माने जायेंगे। आप एक नाविक से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह हर 24 घंटे बाद अपना जहाज रोक कर रोजी कमाने के लिये चार घंटे काम करने चला जायेगा, या एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला और अपना प्रयोग (काम) छोड़ का खेत पर अपने काम का कोटा पूरा करने चला जायेगा। यह दोनों ही बहुत उत्पादक काम कर रहे हैं। समाजवादी समाज में इतने ही अंतर की आशा की जाती है कि दिमागी काम करने वाला शारीरिक काम करने वाले से ऊंचा नहीं माना जायेगा।(भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, राजकमल प्रकाशन, पृ. 385-386)

भगतसिंह ने 2 फरवरी 1931 को ‘‘युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम ‘‘ एक अपील लिखी थी। इस अपील में उन्होंने जनसाधारण के बीच काम करने के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि -‘‘गांवों और कारखानों में किसान और मजदूर ही असली क्रांतिकारी सैनिक हैं।‘‘ उन्होंने पूरी ताकत के साथ अपने पर लगाये गये इस इल्जाम से इंकार किया कि वे एक आंतकवादी हैं। उनके शब्दों में-‘‘मैंने एक आंतकवादी की तरह काम किया है, लेकिन मैं आंतकवादी नहीं हूं। मैं तो एक ऐसा क्रांतिकारी हूं जिसके पास एक लम्बा कार्यक्रम और उसके बारे में सुनिश्चित विचार होते हैं। ... मैं पूरी ताकत के साथ बताना चाहता हूं कि मैं आंतकवादी नहीं हूं और कभी था भी नहीं, कदाचित उन कुछ दिनों को छोड़कर जब मैं अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत कर रहा था। मुझे विश्वास है कि हम ऐसे तरीकों से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं।‘‘ उन्होंने नौजवानों से माक्र्स और एगेंल्स को पढ़ने,उनकी शिक्षाओं को अपना मार्ग-दर्शक बनाने, जनता के पास जाने, मजदूरों, किसानों, और शिक्षित मध्यवर्गीय नौजवानों के बीच काम करने, उन्हें राजनीतिक रूप से सचेत बनाने, उनमें वर्ग चेतना पैदा करने और उन्हें संघों में संगठित करने का आह्वान किया था। लेनिन के शब्दों को दोहराते हुए उन्होंने कहा था कि हमें पेशेवर क्रांतिकारियों की जरूरत है। उन्होंने क्रांति के लिए एक क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण की जरूरत पर भी बल दिया था।

यहां उल्लेखनीय है कि जिस समय भगतसिंह ने यह पत्र लिखा था, उस समय भारत के राजनीतिक वातावरण में गांधी-इर्विन समझौता वार्ताओं की चर्चा सबसे अधिक गर्म थी। भगत सिंह ने तब एक क्रांतिकारी की दृष्टि से संघर्ष की राह में समझौतों के सवाल पर अपनी राय दी थी। इसमें उन्होंने 1917 की रूस की क्रांति के बाद लेनिन द्वारा किये गये शान्ति के लिये समझौते का भी जिक्र करते हुए कहा था :

“समझौता एक ऐसा जरूरी हथियार है जिसे संघर्ष के विकास के साथ ही साथ इस्तेमाल करना जरूरी बन जाता है, लेकिन जिस चीज का हमेशा ध्यान रहना चाहिए वह है आन्दोलन का उद्देश्य। जिन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये हम संघर्ष कर रहे हैं, उनके बारे में, हमें पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए। ...आप अपने शत्रु से सोलह आना पाने के लिये लड़ रहे हैं। आपको एक आना मिलता है, उसे जेब में डालिए और बाकी के लिये संघर्ष जारी रखिये।“

इसी संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस के अंदर चल रही कसमकश पर टिप्पणी की और कहा कि नरम दल के लोगों में जिस चीज की कमी हम देखते हैं, वह उनके आदर्श की है। वे इकन्नी के लिये लड़ते हैं और इसलिये उन्हें मिल ही कुछ नहीं सकता।

आगे वे कांग्रेस के उद्देश्य पर टिप्पणी करते हैं और राय देते हैं कि वर्तमान आंदोलन किसी न किसी समझौते या पूर्ण असफलता में समाप्त होगा। वे इसके पीछे कांग्रेस के आंदोलन के वर्ग चरित्र की व्याख्या करते हैं और बताते हैं कि यह संघर्ष मध्यवर्गीय दुकानदारों और चंद पूंजीपतियों के बल किया जा रहा है। यह दोनो वर्ग, विशेषत: पूंजीपति, अपनी सम्पत्ति या मिल्कियत खतरे में डालने की जुर्रत नहीं कर सकते। वास्तविक क्रांतिकारी सेना तो गांवों और कारखानों में हैं - किसान और मजदूर। लेकिन हमारे ‘बूज्र्वा’ नेताओं में उन्हें साथ लेने की हिम्मत नहीं है, न ही वे ऐसी हिम्मत कर सकते हैं। गांधीजी को उद्धृत करते हुए वे कहते हैं, ‘1920 में अहमदाबाद के मजदूरों के साथ अपने प्रथम अनुभव के बाद महात्मा गांधी ने कहा था, हमें मजदूरों के साथ सांठ-गांठ नहीं करनी चाहिए। कारखानों के सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल करना खतरनाक है।

भगत सिंह का यह पत्र दरअसल उनके द्वारा तैयार किया गया क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा था। इसी के अंतिम हिस्से में वे गांधीवाद और आतंकवाद पर भी सारगर्भित टिप्पणी करते है, जिसे यहां उद्धृत करना जरूरी है क्योंकि इस लेख में आगे हम गांधी और भगतसिंह के विषय में काफी विस्तार से चर्चा करेंगे। ‘गांधीवाद’ उपशीर्षक के साथ वे लिखते हैं : कांग्रेस आन्दोलन की सम्भावनओं, पराजयों और उपलब्धियों के बारे में हमें किसी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। आज चल रहे आन्दोलन को गांधीवाद कहना ही उचित है। यह दावे के साथ आजादी के लिए स्टैण्ड नहीं लेता, बल्कि सत्ता में ‘हिस्सेदारी’ के पक्ष में है। ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ के अजीब अर्थ निकाले जा रहे हैं। इसका तरीका अनूठा है, लेकिन बेचारे लोगों के किसी काम का नहीं है। साबरमती के सन्त को गांधीवाद कोई स्थायी शिष्य नहीं दे पायेगा। यह एक बीच की पार्टी - यानी लिबरल-रैडिकल मेल-जोल - का काम कर रही है और करती भी रही है। मौके की असलियत से टकराने में इसे शर्म आती है। इसे चलानेवाले देश के ऐसे ही लोग है जिनक हित इससे बंधे हुए हैं और वे अपने हितों के लिए बूज्र्वा हठ से चिपके हुए हैं। यदि क्रांतिकारी रक्त से इसे गर्मजोशी न दी गयी तो इसका ठण्डा होना लाजिमी है। इसे इसीके दोस्तों से बचाने की जरूरत है।

इसमें आगे वे ‘आतंकवाद’ उपशीर्षक के तहत लिखते हैं :बम का रास्ता 1905 से चला आरहा है और क्रांतिकारी भारत पर यह एक दर्दनाक टिप्पणी है।...आतंकवाद हमारे समाज में क्रांतिकारी चिंतन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है; या एक पछतावा। ...सभी देशों में इसका इतिहास असफलता का इतिहास है।

इसीमें आगे वे फिर एक बार गांधीवाद पर जो टिप्पणी करते हैं, वह बताती है कि भगत सिंह ने किस प्रकार क्रांति की वास्तविक प्रक्रिया के मर्म को समझ लिया था। इसमें वे कहते है, एक प्रकार से गांधीवाद अपना भाग्यवाद का विचार रखते हुए भी, क्रान्तिकारी विचारों के कुछ नजदीक पहुंचने का यत्न करता है, क्योंकि यह सामूहिक कार्रवाई पर निर्भर करता है, यद्यपि यह कार्रवाई समूह के लिए नहीं होती। उन्होंने मजदूरों को आन्दोलन में भागीदार बना कर उन्हें मजदूर-क्रांति के रास्ते पर डाल दिया है। यह बात अलग है कि उन्हें कितनी असभ्यता या स्वार्थ से अपने राजनीतिक कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल किया गया है। क्रांतिकारियों को ‘अहिंसा के फरिश्ते’ को उसका योग्य स्थान देना चाहिए। (देखे, भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, राजकमल प्रकाशन, पृ. 389-401)

आधार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित,चमनलाल द्वारा संपादित ‘भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज‘ में भगतसिंह की वह जेल डायरी भी संकलित है जिसे उन्होंने 404 पृष्ठों में लिखा था। इस डायरी में उन्होंने दुनिया के अनेक विचारकों की उद्धृतियों को नोट किया था। इस डायरी को देखने से पता चलता है कि किसप्रकार अपने जेल जीवन के दौरान भगतसिंह अन्य अनेक विचारकों के साथ ही मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन की कृतियों का गहराई से अध्ययन कर रहे थे। शिव वर्मा ने बताया है कि भगतसिंह ने जेल में चार और पुस्तकें लिखी थी जिनके शीर्षक थे-(1) समाजवाद का आदर्श (2) आत्मरक्षा (3) भारत के क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास (4) मृत्यु के द्वार पर। ये चारों पुस्तकें पता नहीं कहां गुम हो गयी हैं। यदि ये पुस्तकें प्रकाशित हो पाती तो भगतसिंह ने अपने गहन अघ्ययन के आधार पर जिस माक्र्सवादी विचारधारा को अर्जित किया था उसकी एक बहुत ही साफ तस्वीर हमारे सामने आती। निश्चित तौर पर इससे भारत में समाजवादी क्र्रांति की रणनीति और कार्यनीति के बारे में उनके विचारों को जानने का हमें मौका मिलता।

इस महान क्रांतिकारी जीवन पर गहराई से विचार करने पर एक बात खुलकर सामने आती है कि उन्होंने एक सच्चे क्रांतिकारी की तरह किसी भी प्रकार के सुधारवादी और समझौतावादी दृष्टिकोण को स्वीकारने से इंकार किया था। उन्होंने एक बहरी औपनिवेशिक सत्ता को सुनाने कि लिए बम का धमाका अवश्य किया था लेकिन वे इस सच्चाई को अच्छी तरह समझते थे कि क्रांति का अर्थ सिर्फ बम और पिस्तौल को चमकाना नहीं है जिसे उन्होंने पटाखेबाजी भी कहा था। क्रांति का अर्थ देश के मजदूरों और किसानों को संगठित करना और उनके नेतृत्व में एक व्यापक सामाजिक रूपान्तरण को हासिल करना होता है। क्रांति का अर्थ साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के जुए से मानव सभ्यता को मुक्त करके समता और न्याय के आधार पर एक सुखी और समृद्ध समाज का निर्माण करना होता है।

भगत सिंह का अन्य लेखन

जैसा कि हमने पहले ही कहा है, भगत सिंह जब कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ कार्यालय में आये, तभी से भारत की आजादी और क्रांतिकारी संघर्षों से जुड़े विभिन्न विषयों पर उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। देश की स्वतंत्रता का संघर्ष भारत की विभिन्न जातियों की अस्मिता की लड़ाई से गहरे से जुड़ा हुआ था। भगतसिंह ने 1924 के अपने प्रारम्भिक लेख में ही पंजाबी की भाषा और लिपि की समस्या पर विचार किया था। किसी भी सामाजिक परिवर्तन में साहित्य की कितनी बड़ी भूमिका होती है इसे रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा था-शायद गैरीबाल्डी को इतनी सेनाएं न मिल पाती यदि मेजिनी ने 30 वर्ष देश में साहित्य तथा साहित्यिक जाग्रति पैदा करने में ही न लगा दिये होते। आयरलैंड के पुनरुत्थान के साथ गैलिक भाषा का प्रभाव भी उसी वेग से किया गया।...यदि टालस्टाय, कार्ल माक्र्स तथा मैक्सिम गोर्की इत्यादि ने नवीन साहित्य पैदा करने में वर्षों व्यतीत न कर दिये होते, तो रूस की क्रांति न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार तथा व्यवहार तो दूर रहा। इसी संदर्भ को सिख गुरुओं के मत के प्रचार तथा गुरुमुखी लिपि के विकास से जोड़ते हुए भगतसिंह ने गुरुमुखी तथा आगे हिंदी के संबधों पर मजहब से दूर रहकर विचार करने पर बल दिया। वे लिखते हैं-हरेक अपनी बात के पीछे डंडा लिये खड़ा है। इसी अडं़गे को किस तरह दूर किया जाय यही पंजाब की भाषा तथा लिपि विषयक समस्या है। परन्तु आशा केवल इतनी है कि सिखों में इस समय जाग्रति पैदा हो रही है। हिंदुओं में भी है। सभी समझदार लोग मिल-बैठकर निश्चय ही क्यों नहीं कर लेते। यही एक उपाय है इस समस्या के हल करने का।‘‘ इस लेख पर भगतसिंह के विचारों पर आर्यसमाज के किंचित प्रभाव को देखा जा सकता है। यह एक परिपक्व क्रांतिकारी के रूप में भगतसिंह के निर्माण का प्रारम्भिक काल था।

जातीय अस्मिता का सवाल परवर्ती दिनों में भी भगतसिंह की चिंता का एक प्रमुख विषय रहा। पंजाब के एक भूतपूव गवर्नर सर माईकेल ओडायर ने अपनी एक पुस्तक में यह आरोप लगाया था कि पंजाब राजनीतिक हलचलों में सबसे पीछे है। भगतसिंह को यह बात नागवार गुजरी थी। यह सवाल उठाते हुए कि पंजाब क्यों राजनीतिक आंदोलनों में पीछे है, अन्य बातों के अलावा उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि पंजाब की अपनी कोई विशेष भाषा नहीं है। भाषा न होने के कारण साहित्य के क्षेत्र में भी कोई प्रगति नहीं हो सकी। अत: शिक्षित समुदाय को पश्चिमी साहित्य पर ही निर्भर रहना पड़ा। इसका खेदजनक परिणाम यह हुआ कि पंजाब का शिक्षित वर्ग अपने प्रांत की राजनीतिक हलचलों से अलग-थलग सा रहता था। इसी सिलसिले में उन्होंने 20 वीं सदी के प्रारम्भ से ही पंजाब में राजनीतिक हलचलों का एक ब्यौरा लिखा जिसका शीर्षक था-‘स्वाधीनता के आंदोलन में पंजाब का पहला उभार‘। यह लेख उन्होंने अपने जेल के दिनों में लिखा था जिसके कुछ अंश 1931 में लाहौर के साप्ताहिक ‘वंदे मातरम‘ में प्रकाशित हुए थे।

इसके बाद हर बीतते दिन के साथ भगतसिंह का दृष्टिकोण किसप्रकार और ज्यादा व्यापक होता चला गया, इसकी झलक उनके बाद के लेखों में मिलती है। कोलकाता से प्रकाशित ‘मतवाला‘ के 15 नवम्बर 1924 और 22 नवम्बर 1924 के अंकों में बलवंतसिंह के छद्म नाम से उनका एक लेख ‘विश्व प्रेम‘ प्रकाशित हुआ। इस लेख में उन्होंने लिखा-‘‘जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, धनी-निर्धन, छूत-अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है तब तक कहां विश्व-बंधुता और विश्व-प्रेम? यह उपदेश स्वतंत्र जातियां कर सकती है। भारत जैसी गुलाम जाति इसका नाम नहीं ले सकती।‘‘ इस लेख का अंत वे इसप्रकार करते है-‘‘यदि वास्तव में चाहते हो कि संसारव्यापी सुख-शांति और विश्व-पे्रम का प्रचार करो तो पहले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। मां के बंधन काटने के लिए कट मरो। बंदी मां को स्वतंत्र करने के लिए आजन्ंम काले पानी में ठेाकरें खाने के लिए तैयार हो जाओ। सिसकती मां को जीवित रखने के लिए मरने को तत्पर हो जाओ। तब हमारा देश स्वतंत्र होगा। हम बलवान होंगे। हम छाती ठोंककर विश्वप्रेम का प्रचार कर सकेगें। संसार को शांतिपथ पर चलने को बाध्य कर सकेगें।‘‘

‘प्रताप‘ के 15 मार्च के अंक में ‘भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का परिचय‘ शीर्षक से उनका एक लेख प्रकाशित हुआ। उसी की श्रंखला में मई 1927 में ‘काकोरी के वीरों से परिचय‘ लेख प्रकाशित हुआ जिसे उन्होंने ‘विद्रोही‘ नाम से छपवाया था। इस लेख के प्रकाशन के बाद ही भगतसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया था। ‘भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज‘ के संपादक चमनलाल के अनुसार चारपाई पर हथकड़ी लगे बैठे भगतसिंह का प्रसिद्व चित्र इसी गिरफ्तारी के समय लिया गया था। जनवरी 1928 की किरती में काकोरी के शहीदों के बारे में एक और लेख लिखा जिसमें राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशनसिंह, अशफाकउल्ला, और रामप्रसाद बिस्मिल के बहुत ही भावनापूर्ण चित्र खींचे गये हैं। इसी प्रकार उन्होंने एक लम्बा लेख ‘कूका विद्रोह‘ पर लिखा था जो ‘महारथी‘ पत्रिका के फरवरी 1928 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इनके अतिरिक्त मदनलाल ढींंगरा, सूफी अम्बाप्रसाद, श्री बलवंत सिंह, डा. मथुरासिंह, शहीद करतारसिंह सराभा की तरह के क्रांतिकारियों के बारे में उनके लेख उस समय की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। ‘किरती’ पत्रिका में उन्होंने ‘आजादी की भेंट शहादतें‘ शीर्षक से एक लेखमाला भी लिखी थी। भगतसिंह पर उस वक्त के बंगाल के विद्रोही कवि नजरूल इस्लाम का कितना प्रभाव था यह श्री मदनलाल ढींगरा पर लिखे उनके लेख को देखने से ही पता चलता है। ढींगरा के निर्भीक चरित्र का चित्रण करते हुए उन्होंने नजरूल इस्लाम की प्रसिद्ध कविता ‘विद्रोही‘ को उद्धृत किया -

बोलो वीर-चिर उन्नत मम शीर
शिर नेहारी आमारि नत शिर ओेई शिखर हिमाद्रीर।

(कहो वीर चिर उन्नत मेरा मस्तक, नत है वह हिमालय की चोटी, देखकर मेरा उन्नत मस्तक)

यहां साम्प्रदायिकता के बारे में भगत सिंह के विचारों के कुछ उद्धरण रखना भी जरूरी है। ‘किरती’ के जून 1928 के अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ था - ‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’। इसमें वे सांप्रदायिकता की आर्थिक जड़ों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं : विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। ...इसी सिद्धांत के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई जो अवर्णनीय है।

धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए, क्योंकि यह सबको मिल कर एक जगह काम नहीं करने देता। इसीलिए गदर पार्टी जैसे आंदोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़ कर फांसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे। (भगतसिंह के संपूर्ण दस्तावेज, आधार प्रकाशन, पृ. 152-155)

मात्र 24 वर्ष की उम्र में भगतसिंह शहीद हो गये थे। लेकिन इस छोटी सी उम्र में ही उन्होंने क्रांतिकारी भावनाओं के साथ जिस प्रखर क्र्रांतिकारी चिंतन और समाजवाद के आदर्शों को आत्मसात किया था, वह सचमुच अपने आप में एक मिसाल है।

* भगत सिंह की जन्म तिथि को लेकर कई मत देखने को मिलते हैं। चमन लाल ने ‘भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज में उनकी जन्म तिथि 28 सितंबर 1907 बताई है; रमेश विद्रोही ने अपनी ‘भगतसिंह जीवन, व्यक्तित्व, विचार’ पुस्तक में इसे 29 सितंबर 1907 बताया है; ‘भगत सिंह क्रांति संबंधी धारणा’ पुस्तिका में इसे 5 अक्तूबर 1907 कहा गया है; ज्योत्सना कामथ ने इस तिथि को 27 सितंबर 1907 बताया है; वीकीपीडिया के वेबसाइट पर यह तिथि 17 अक्तूबर 1907 है; ईश्वर चन्द्र ने इसे 28 सितंबर 1907 बताया है।  






शुक्रवार, 20 मार्च 2015

क्रांतिकारी पार्टी के सामने चुनौतियां


अरुण माहेश्वरी


सीपीआई(एम) की 21वीं पार्टी कांग्रेस (14-19 अप्रैल 2015) होने जा रही है। क्रांतिकारी वामपंथ के अभी भारी दुर्दिन चल रहे हैं। यह समय इतिहास से संक्रमण के तमाम बिंदुओं को मिटाने का समय कहलाता है। संक्रमण का अर्थ सिर्फ चीजों का बदलना नहीं है, बल्कि परिवर्तन के मानदंडों तक का भी बदलना है ; जीवन के सच के पूरे फलक का बदलना है। वैसे तो बदलाव प्रकृति का नियम है। आज हमे घेरी हुई तमाम चीजें अकल्पनीय गति से बदल रही है। हर दिन एक तकनीक पुरानी होती है, एक नयी तकनीक जन्म लेती है। माक्र्स ने कहा था कि उत्पादन के साधनों के लगातार क्रांतिकरण के बिना पूंजीवाद जीवित नहीं रह सकता। लेकिन यह बदलाव ऐसा है जिसमें चीजें बदलती है, ताकि समाज न बदले, सामाजिक संबंध न बदले। घुमा कर कहे तो यह यथास्थितिकारी परिवर्तन है।

सामाजिक क्रांति की परिकल्पना से ऐसे बदलाव का कोई संबंध नहीं है। राजनीतिक क्रांति सामूहिक मुक्ति की एक सर्वथा नयी परिकल्पना से समाज को बांधती है। यहां से समाज के पुनर्विन्यास के एक नये दीर्घकालीन यज्ञ का प्रारंभ होता है। यह एक ऐतिहासिक संयोग है जब सिर्फ चीजें नहीं बदलती, बदलाव के सिद्धांत और मानदंड तक बदल जाते हैं। यह संयोग स्वत:स्फूर्त ढंग से पैदा नहीं होता। ऐसे संयोग को बनाने के लिये, परिवर्तनकामी सामाजिक शक्तियों को संगठिन करने के लिये क्रांतिकारी राजनीतिक पार्टी को गहरी निष्ठा के साथ लगातार कड़ी मेहनत करनी पड़ती है; अकूत त्याग-बलिदान करने पड़ते हैं।

एक समय था, जब पूंजीवाद उदीयमान था और उसकी सारी चमक-दमक को कोरा भ्रम बताते हुए वामपंथी क्रांतिकारी आसानी से यह भविष्यवाणी कर देते थे कि यह चमक ज्यादा दिन नहीं चलने वाली, शीघ्र ही इस पूंजीवादी विकास का खोल फट जायेगा। यह खुद अपने गर्भ से अपनी कब्र खोदने वाले संगठिन और अनुशासित सर्वहारा वर्ग को पैदा कर रहा है। कम्युनिस्ट पार्टी उसीकी पार्टी है। और इसप्रकार उसमें एक अनोखा आकर्षण था। दुनिया की एक तिहाई आबादी उसकी छत्र-छाया में आगयी थी। सोवियत संघ हर मायने में अमेरिका को टक्कर देने वाली महाशक्ति था।

लेकिन आज ! समाजवाद के पराभव की बाद की इस नयी सहस्त्राब्दी के इन 15 सालों को देखिये। यह पहले के किसी भी समय से कहीं ज्यादा उथल-पुथल से भरा हुआ है। 2008 के अमेरिकी संकट ने सभ्यता के अंतिम सत्य कहे जाने वाले नव-उदारवाद को ध्वस्त कर दिया। आज हमारे पड़ौस के पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लेकर रूस सहित पूरा मध्य और मध्यपूर्व एशिया धधक रहा है। मध्यपूर्व में तो इराक, सीरिया, मिस्र, फिलिस्तीन - देश के देश खंडहरों में तब्दील किये जा रहे हैं। अमेरिका का पिछवाड़ा कहलाने वाले लातिन अमेरिका के तमाम देशों ने पिछले तीन दशकों में क्रमश: अमेरिकी दादागिरी और उसकी नव-उदारवादी नीतियों को, अमेरिका के पिछलग्गूपन को नफरत के साथ ठुकरा दिया है। ग्रीस, स्पेन सहित पूरे यूरोप में इस भूकंप के झटके महसूस किये जाने लगे हैं। अफ्रीका के अधिकांश देशों में ‘सभ्यता-प्रसारी’ पूंजी के प्रवेश के पहले ही उसे मध्ययुगीन बर्बरता के अंधेरे में पड़े रहने के लिये छोड़ दिया गया है। जापान, चीन, कोरिया और हिंद-चीनी जातियों के देशों के साथ डालर-साम्राज्य की परस्पर-निर्भरशीलता इतनी जटिल गांठों से बंध गयी है कि कौन किसके हित को साध रहा है, निश्चयात्मक रूप से कहना मुश्किल लगता है। लेकिन यह सच है कि लातिन अमेरिका, अफ्रीका के देशों की तुलना में, जो हाल के काल तक विश्व पूंजी की खुली लूट और सस्ते श्रम के सबसे बड़े स्रोत बने हुए थे, इस हिंद-चीनी जगत में गरीबी उतनी उत्कट और नग्न रूप में नहीं दिखाई देती है।

कहने का मतलब है कि इस नयी सहस्त्राब्दी में दुनिया एक बेहद विकट रूप ले चुकी है। युद्ध, आतंक, विद्रोह, गला-काट प्रतियोगिता, मुनाफे की तलाश में पूंजी का बेतहाशा एक देश से दूसरे देश भागना। चारो और कुछ भी स्थिर नहीं दिखाई देता। यह सहस्त्राब्दी घनघोर अस्थिरता, अनिश्चयता और संकटों से भरी सहस्त्राब्दी बनती नजर आती है। दुनिया के कोने-कोने में जैसे हर क्षण संक्रमण के ऐतिहासिक संयोग, सब-कुछ उलट-पुलट जाने के क्षण बनते दिखाई दे रहे हैं। भारत में ही कांग्रेस-शासन के अंत और मोदी सरकार के आने के बाद भी कहीं कोई स्थिरता नहीं है। मोदी और आरएसएस का हिंदुत्व एक दिन के लिये भी चलता नजर नहीं आता। अभी से लोगों में इससे निजात पाने की खलबली है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की अभूतपूर्व जीत इसी नये संक्रमण के साफ संकेत दे रही है।

इस पूरे परिप्रेक्ष्य में गौर करने की बात यही है कि दुनिया में कहीं भी आज संक्रमण के ऐसे तमाम ऐतिहासिक संयोगों के नेतृत्व में क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टियां नहीं दिखाई दे रही है। यहां तक कि हाल में ग्रीस में, जहां की कम्युनिस्ट पार्टी ऐतिहासिक तौर पर वहां की राजनीति में एक प्रमुख स्थान रखती है, नव उदारवाद - विरोधी विकल्प के रूप में सिर्जिया नामक एक नयी पार्टी सामने आगयी। कुल मिला कर, ऐसा लगता है जैसे कम्युनिस्ट पार्टियां इस सारे उथल-पुथल का किनारे से नजारा करते हुए पूंजीवाद के आवर्तित संकट और उसके विखंडन के आलाप में डूबी हुई है, इसे संगठित करने में उनकी कोई भूमिका नहीं है। और, शायद यही वजह है कि चीजें कहीं भी वह रूप नहीं ले पारही है जिसे सामाजिक क्रांति की संज्ञा दी जासके - ऐसे संक्रमण की संज्ञा जिसके बाद जीवन का कुछ भी वैसा नहीं रहेगा, जैसा कि अब तक रहा है ; जब परिवर्तन के ही मानदंड बदल जायेंगे !

आज के क्रांतिकारी राजनीतिक आंदोलन को इन सारे उथल-पुथल वाले संयोगों में अपनी भूमिका के बारे में सही जवाबदेही करनी है। प्रतिरोध और परिवर्तन के सभी  कटे-छटे अराजक द्वीपों को सामाजिक रूपांतरण के एक सकारात्मक कार्यक्रम से कैसे एक सूत्र में पिरोया जाए, इसके रास्ते की तलाश करनी है। अन्यथा यह समूचा प्रतिरोध, विस्फोट पूरी तरह नपूंसक और निरर्थक साबित होगा क्योंकि इसे दिशा देने वाली चेतना और संगठित कोशिश जो नदारद है। इस निरर्थकता के संकेत भी सर्वत्र दिखाई देने लगे हैं। अरब की वसंत क्रांति जिसमें तुनिसिया से शुरू करके मिस्र, लीबिया, येमन, बहरीन, सीरिया, अल्जीरिया, इराक, जार्डन, कुवैत, मोरक्को, इसराइल, सुडान, मोरिशस, ओमन, सउदी अरबिया, जिबोती, पश्चिमी सहारा और फिलिस्तीन आदि सब जगह व्यापक जन-आक्रोश फूट पड़ा था, उसकी परिणतियां सबके सामने हैं।

कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि दुनिया की परिस्थिति में अभी संक्रमण की जितनी ज्यादा संभावनाएं दिखाई देती है, उसके राजनीतिक रूपाकारों में उतनी ही ज्यादा नपूंसकता, नया कुछ भी देने में असमर्थता दिखाई देती है। हमारे यहां ही बुद्धिजीवियों और जुझारू कार्यकर्ताओं तक के पास जैसे कहने-करने को कुछ नहीं रह गया है।

आज इस असंभव सी दिखाई दे रही परिस्थिति के मूल सामाजिक कारणों की भी ठोस पड़ताल की जरूरत है। जिस संगठित मजदूर वर्ग को सामाजिक क्रांति का मूल वाहक माना गया था, जो अपनी मुक्ति के साथ शोषण की व्यवस्था के पूरे टाट को उलट देगा, उसे तो इस व्यवस्था ने क्रमश: स्वयं एक निवेशक का रूप दे दिया है। जैसे एक पूंजीवादी निवेशक मुनाफे के लिये कर्ज लेता है वैसे ही यह संगठित मजदूर भी शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और कई उपभोगों के लिये बैंकों से कर्ज लेता है। मार्क्स ने कहा था कि पूंजी और श्रम के बीच आदान-प्रदान के बाद ही पूंजीपति और श्रमिक के रूप में हमारी सामूहिक पहचान सामने आती है। लेकिन ऋण नामक औजार के जरिये यह पहचान एक नया रूप ग्रहण कर रही है - मुनाफे के लिये कर्ज लेने वाले पूंजीवादी उद्यमी और खुद के लिये कर्ज लेने वाले मजदूर उद्यमी। फर्क सिर्फ यह है कि एक मुनाफे लिये कर्ज लेता है और दूसरा जिंदा रहने के लिये। जो पूंजीपति का एक स्वतंत्र निर्णय है वह मजदूर के जीवन की मजबूरी है; महाजनी व्यवस्था में कर्ज उसकी गुलामी का सबब है।

कर्ज तो बड़े-बड़े देशों की स्वतंत्रता को हर लेता है। अभी कुछ साल पहले ही जब अर्जेंतिना ने वेनेजुएला की मदद से आईएमएफ के कर्ज को चुका दिया तो उससे आईएमएफ के अधिकारी खुश होने के बजाय रुष्ट होगये थे। वे इससे अर्जेंतिना में वित्तीय अनुशासनहीनता फैल जाने का खतरा देखने लगे थे। अर्जेंतिना को आईएमएफ का कर्ज उसे अनुशासित रखने के लिये था। इसीलिये कर्ज में डूबा आदमी गुलाम मान लिया जाता है, भले वह कर्ज महाजन से मिले या राज्य से ।

ऐसे और भी कई पहलू हो सकते है जिन्हें आज के समय में श्रमजीवियों के पांवों की नयी बेडि़यों के रूप में देखा जा सकता है। मसलन हमारे यहां भूमि के विषय को ही लिया जाए। एक समय जमींदारों से भूमि को छीन का गरीबों में बांट देने के कृषि क्रांति, भूमि सुधार आंदोलन और सहभागी जनतंत्र के पंचायती राज ने गांव के गरीबों को आंदोलित किया था। आज किसानों की जमीन को पूंजीपतियों की लोलुपता से बचाने की चिंता प्रमुख है। गांव में साइकिल की जगह मोटरसाइकिल ने आकर पूंजीवाद के दूतों की पैठ को तीव्र और गहरा किया है।

इसीलिये क्रांतिकारी पार्टी की पहली जरूरत यह है कि वह दृढ़ता के साथ ‘विकास’ के मिथक को तोड़े। विकास का यह रूप आदमी की स्वतंत्रता नहीं, उसकी दयनीयता, उसकी गुलामी की जंजीरें पैदा करता है। चमकते शहरों के गर्भ में और ज्यादा वैषम्य, आमलोगों की जिंदगी की और भी भारी दुर्दशा पनप रही है। यह गरीबी के आधुनिकीकरण का रास्ता है। क्रांतिकारी आंदोलन को तमाम गरीबों, उत्पीडि़तों, विस्थापितों के ऐसे नये गठजोड़ को कायम करने के काम को प्राथमिकता देनी होगी जो राजनीति में एक निर्णायक हस्तक्षेप करने में समर्थ हो। यूपीए -2 के अंतिम दिनों में अपनाया गया भूमि अधिग्रहण विधेयक इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जो किसान जनता के हितों में ऐसे ही संयुक्त प्रतिरोध से उत्पन्न एक निर्णायक कदम था। यह गांवों की खुली लूट पर टिके झूठे विकास के अंत का रास्ता भी दिखाता है। भारत में इस विधेयक के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर 17 मार्च को समूचे विपक्ष का संसद भवन से राष्ट्रपति भवन तक पैदल मार्च करके राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपना निश्चित तौर पर संक्रमण के संयोग को पैदा करने में सक्षम राजनीतिक कार्रवाई की दिशा में उठा हुआ कदम है।

ऐसा ही एक और मसला मोदी सरकार से अभिन्न आरएसएस और सांप्रदायिक जहर फैलाने की उसकी नीतियों का है। वे देश की जनता की एकता को तोड़ कर कॉरपोरेट फासीवाद के लिये रास्ता साफ करना चाहते हैं। इसके प्रतिरोध में भी समूचे विपक्ष की एकता राजनीति  एक और संक्रमणकारी संयोग की स्थिति पैदा करने की संभावना लिये हुए है।

इस प्रकार के एक पूरे परिप्रेक्ष्य में जब हम सीपीआई(एम) की पार्टी कांग्रेस में विचार के लिये उसकी केंद्रीय कमेटी द्वारा जारी किये गये दो दस्तावेज, राजनीतिक और कार्यनीतिक लाइन की समीक्षा का मसौदा और राजनीतिक प्रस्ताव का मसौदा, को देखते हैं तो हमें गहरी निराशा हाथ लगती है। राजनीतिक कार्यनीतिक लाइन का अर्थ होता है पार्टी के दूरगामी रणनीतिगत लक्ष्यों की दिशा में कदम ब कदम आगे बढ़ने की ठोस जमीनी राजनीति। सीपीआई(एम) ने अपने इस मसौदे में पार्टी की सिर्फ इधर के सालों की राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन की समीक्षा नहीं की है, बल्कि 1990 के बाद से इन 25 सालों के बहाने सीपीआई(एम) के जन्मकाल से लेकर अब तक की समूची कार्यनीतिक लाइन पर प्रश्न उठा दिया है।

हमारी दृष्टि में किसी भी क्रांतिकारी पार्टी के लिये यह ऐसा खतरनाक सोच है, जो तत्वत: पार्टी के अब तक के अस्तित्व के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगा देता है और यही सीपीआई(एम) के वर्तमान नेतृत्व के खोखलेपन को भी दर्शाता है। यह पूरा मामला कुछ अजीब से गोरखधंधे सा दिखाई देता है। इस मसौदे में ‘वाम मोर्चा’, ‘वाम जनतांत्रिक मोर्चा’, ‘वाम जनतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतों का गठबंधन’, ‘संयुक्त मोर्चा’ और ‘तीसरा मोर्चा’ आदि पदों के साथ ऐसी अमूर्त चर्चा की गयी है कि जिसके ठोस राजनीतिक मायनों को समझने में अच्छो-अच्छो का सिर चकरा जाए। सच यह है कि वास्तविक इतिहास से काट कर देखने पर इन पदों का अपने में कोई मूल्य नहीं है। वे स्वयं में भविष्य को संवारने के लिए कोई नुस्खा या योजना पेश नहीं करते। असल कठिनाई तो तब आती है जब हम इन अमूर्त पदों से जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री का वास्तविक चित्रण शुरू करते हैं।

मजे की बात यह है कि लगभग 15 पृष्ठों के इस दस्तावेज में इसी ‘वास्तविक चित्रण’ के काम की, पार्टी के सामने आई बड़ी-बड़ी राजनीतिक चुनौतियों और भूमि सुधार, पंचायती राज और सत्ता के विकेंद्रकरण आदि के क्षेत्र में उसकी बड़ी-बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों को रखने की कोई कोशिश नहीं है। न इसमें 34 साल तक एक राज्य में सरकार चलाने के विरल ऐतिहासिक अनुभवों का कायदे से उल्लेख है, न ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के ऐतिहासिक प्रस्ताव का, न यूपीए -1 के ठोस अनुभवों का। इस दस्तावेज के अंत में जिस प्रकार यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के निर्णय को गलत समय पर लिया गया निर्णय बता कर और पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा की विफलता की चर्चा से उसे  संतुलित किया गया है, वह भारत में वामपंथ की पराजयों के कारणों के विषय पर सिवाय एक लीपापोती के अलावा और कुछ नहीं है। इसमें और जो भी हो, राजनीति जरूर नहीं है। यह कहता कम छिपाता ज्यादा है; सीपीआई(एम) के वर्तमान नेतृत्व की राजनीतिक अकर्मण्यता पर महज पर्दादारी का काम करता है।

यही वह बिंदु है जब राजनीति के नये आयतन को हासिल करने के पहलू पर नये रूप में विचार करने की जरूरत है। यह किसी भी सर्वसमावेशवाद से कत्तई हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिये एकता और निर्मम संघर्ष का नजरिया जरूरी है। सर्वसमावेशी दृष्टि से कभी भी संक्रमण के ऐतिहासिक संयोग पैदा नहीं हो सकते, न पार्टी के बाहर और न पार्टी के अंदर ही। अब तक जो हुआ, उसके प्रति अत्यधिक क्षमायाचना के चक्कर में पड़ने की कोई वजह समझ में नहीं आती। यह एक प्रकार से स्मारकों को ढहा कर अतीत से मुक्ति पाने का नपुंसक तरीका है। पुरानी भूलों के बजाय चर्चा उन भूलों के कारणों की, उनके पीछे की सामाजिक-राजनीतिक विफलताओं की होनी चाहिए। और सबसे बड़ी जरूरत इन ऐतिहासिक भूलों के कारकों से निष्ठुरता के साथ मुक्ति पाने की है, न कि किसी सर्वसमावेशवाद के तहत लाशों के बोझ को ढोने की।

प्रश्न है कि क्या भारतीय वामपंथ में ऐसे किसी गहरे नश्तर को सह पाने की ताकत बची हुई है ? इसी सवाल पर भारत में संक्रमण के संयोग और सामाजिक रूपांतरण के घटक वामपंथ का भविष्य निर्भर करता है।
गालिब का बहुत लोकप्रिय शेर है :

‘‘रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।’’

हमारी यही कामना है कि सीपीआई(एम) की आगामी 21वीं कांग्रेस ‘भले-भले’ में पूरी न हो !







गुरुवार, 19 मार्च 2015

हम न होने देंगे तुम्हें लापता

आज के ‘जनसत्ता’ के 'दुनिया मेरे आगे' स्तंभ में विष्णु नागर की एक रिपोर्ट पर सरला माहेश्वरी की कविता :

आज, 19 मार्च 2015 का जनसत्ता
विष्णु नागर बता रहे हैं
मुंबई के दादाभाई नौरोजी थाने के
किसी इंस्पेक्टर राजेन्द्र धोंदू भोंसले की कथा
यह कथा है भोंसले के असाधारण जुनून की
गुमशुदा 166 लड़कियों और 174 लड़कों की खोज की
अपने काम में ऐसा जुटा ये दीवाना
कि 165 लड़कियों और १७१ लड़कों को वापस मिल गया अपना ठिकाना
लेकिन वह अब भी बेचैन है
जारी जो है अब भी 166वीं की तलाश
गुमशुदा पूजा की तलाश
क़ायम है उसका विश्वास
जैसे होती है हर पिता की आस
इंस्पेक्टर राजेंद्र धोंदू भोंसले
शुक्र है कि बचे हैं तुम जैसे कुछ पगले
तुम जैसे भोंदू पगलों से ही बचे हैं
जीवन के अनमोल घोंसले
तुम हो जैसे किसी बीहड़ में जलती मशाल
अब तुम सिर्फ एक नाम नहीं हो
जो हो जाये गुमनाम
दफ़्न हो जाय अनाम
हम न होने देंगे तुम्हें लापता
ज़िंदगी ढूँढ ही लायेगी तुम्हारा पता
जैसे ढूँढ लाये थे तुम
गुम हो गयी ज़िंदगियों का पता ।

आज मार्कण्डेय भाई की पुण्यतिथि है ।


मार्कण्डेय ऐसे लेखक थे जिनके साहित्य ही नहीं, मनुष्य संबंधी मानदंड भी उनके निकट के हर किसी के लिये एक बड़ी चुनौती हुआ करते थे । वे सिर्फ पाठ के नहीं, इंसान के भी आर-पार देख लेने वाली पैनी नजर के धनी थे । इसीलिये साहित्य में हो या सामाजिक व्यवहार में, मिथ्याचार उनकी आँखों से बच नहीं सकता था । उनकी उपस्थिति ही बौने लोगों को असहज कर देने के लिये काफी हुआ करती थी । अपनी नुकीली मुस्कान के साथ वे कभी अशालीन नहीं होते थे, लेकिन सामने वाले को उसकी स्थिति का अंदाज ज़रूर दिला देते थे । ' कहानी की बात' की उनकी टिप्पणियों को देखिए -उनकी पकड़ और शैली, बल्कि पूरी जीवन-शैली तक का अंदाज देने के लिये काफी है । इसीलिये उनके इर्द-गिर्द ही अपनी कुंठा की भड़ास निकालने वाले छिछले लोगों की भी कमी नहीं रही।
हमारा सौभाग्य रहा कि लेखन में हमारा बिस्मिल्ला ही ऐसे गुरुओं के ज़रिये हुआ । डा.महादेव साहा, मार्कण्डेय, चंद्रबली सिंह, चंद्रभूषण तिवारी, हरीश भादानी, इसराइल - ये सभी अपने-अपने प्रकार के परफ़ेक्शनिस्ट और हमारे प्रकृत गुरू, मित्र और परिवार के अभिन्न सदस्य भी । आज भी लिखते वक़्त हमारी क़लम की नोक पर इन सबका दबाव हमेशा बना रहता है । मार्कण्डेय भाई की पुण्य तिथि को याद दिलाने के लिये उनकी बेटी Swasti Thakur का और उन्हें याद करने के लिये अन्य सबका तहे-दिल से आभारी हूँ ।
'आज मार्कण्डेय भाई की पुण्यतिथि है ।
मार्कण्डेय ऐसे लेखक थे जिनके साहित्य ही नहीं, मनुष्य संबंधी मानदंड भी उनके निकट के हर किसी के लिये एक बड़ी चुनौती हुआ करते थे । वे सिर्फ पाठ के नहीं, इंसान के भी आर-पार देख लेने वाली पैनी नजर के धनी थे । इसीलिये साहित्य में हो या सामाजिक व्यवहार में, मिथ्याचार उनकी आँखों से बच नहीं सकता था । उनकी उपस्थिति ही बौने लोगों को असहज कर देने के लिये काफी हुआ करती थी । अपनी नुकीली मुस्कान के साथ वे कभी अशालीन नहीं होते थे, लेकिन सामने वाले को उसकी स्थिति का अंदाज ज़रूर दिला देते थे । ' कहानी की बात' की उनकी टिप्पणियों को देखिए -उनकी पकड़ और शैली, बल्कि पूरी जीवन-शैली तक का अंदाज देने के लिये काफी है । इसीलिये उनके इर्द-गिर्द ही अपनी कुंठा की भड़ास निकालने वाले छिछले लोगों की भी कमी नहीं रही।
हमारा सौभाग्य रहा कि लेखन में हमारा बिस्मिल्ला ही ऐसे गुरुओं के ज़रिये हुआ । डा.महादेव साहा, मार्कण्डेय, चंद्रबली सिंह, चंद्रभूषण तिवारी, हरीश भादानी, इसराइल - ये सभी अपने-अपने प्रकार के परफ़ेक्शनिस्ट और हमारे प्रकृत गुरू, मित्र और परिवार के अभिन्न सदस्य भी । आज भी लिखते वक़्त हमारी क़लम की नोक पर इन सबका दबाव हमेशा बना रहता है । मार्कण्डेय भाई की पुण्य तिथि को याद दिलाने के लिये उनकी बेटी :Swasti Thakur] का और उन्हें याद करने के लिये अन्य सबका तहे-दिल से आभारी हूँ ।'

मंगलवार, 17 मार्च 2015

एन एच - 10 : एक छवि

एन एच 10' फिल्म पर सरला माहेश्वरी की एक कविता :


राष्ट्रीय राजमार्ग - 10
यह सिर्फ एक संख्या नहीं
न कोई इकलौता राष्ट्रीय राजमार्ग
इसकी सीमा सार्वभौम है
इसकी पहचान सार्वभौम है
इसका चरित्र सार्वभौम है
इसका मालिक सार्वभौम है
इसका शिकार सार्वभौम है
यह पितृसत्ता का वो नर्क-मार्ग है
जहाँ सारी पवित्र घोषणाएँ ख़त्म हो जाती हैं
लुप्त हो जाती है सारी मानवीय सत्ताएँ
जैसे लुप्त हो जाती है
नदियों की लय, उनका छंद, उनका मिठास
और बचा रह जाता है
सिर्फ खारा, नमकीन पानी समुद्र का
नदियाँ चीख़ती हैं, चिल्लाती हैं
बेचैन, बदहवास भागती हैं
तपते किनारों से चोटें खा-खाकर लहुलुहान हो जाती हैं
थक-थक जाती हैं, पर हारकर बैठती नहीं
क्या यही पीड़ा, छटपटाहट
और सीने में बंद आक्रोश
किसी हठ की तरह
फूट पड़ते हैं सुनामी बन ?
तोड़ डालते हैं
सारी हदें, बंदिशें
पितृसत्ता के सारे क़ैदखाने
बची रह जाती है सिर्फ चीख़ें
मौत और दहशत
श्मशान की नीरवता
शायद ऐसे ही खिलेगा कोई नया अंकुर
जन्म लेगा नया प्राण
खुलेगा नया मार्ग
एक नया जनपथ ।

शनिवार, 14 मार्च 2015

आम आदमी पार्टी



आम आदमी पार्टी (आप) में आज जो चल रहा है, चिंताजनक है। अभी तक हम सिर्फ यह सोच रहे हैं कि हम दूर बैठे इस पूरी परिघटना के एक दर्शक भर है। मीडिया की लाख रिपोर्टिंग और स्टिंग के बावजूद, अभी उसके कर्णधारों की मानसिकता की पूरी तफसील में जाना शायद हमारे लिये मुश्किल है। मीडिया की हर बात तो एक कहानी होती है।
इसके अलावा हम ‘आप’ के उदय और अब तक के उसके विकास की पूरी परिघटना को किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के कामों का कोरा करिश्मा नहीं मानते। हमें यह कभी यकीन नहीं हुआ कि अरविंद केजरीवाल सरीखा एक औसत प्रतिभा का व्यक्ति राजनीति से सदा दूर रहने वाले मुट्ठी भर पेशेवरों की मदद से इतनी थोड़ी सी कोशिश से पलक झपकते कुछ ऐसा कर सकता था, जो न सिर्फ दिल्ली के लिये बल्कि पूरे देश के लिये किसी मिसाल जैसा प्रतीत होता है। हमारी हमेशा यह राय रही कि हर ऐसे तेजी से उभरने वाले व्यापक आंदोलन के पीछे कोई न कोई सामाजिक आवश्यकता होती है जिसकी पुरानी पड़ चुकी संस्थाएं पूर्ति नहीं कर पा रही है। इसके अलावा हमें ऐसे किसी भी नये और व्यापक उभार का दूसरा कोई वाजिब कारण नहीं दिखाई देता।
फिर भी, ‘आप’ के अंदर अभी जो चल रहा है वह तो एक अनोखा, सामान्य जीवन का बहुत ही जाना-पहचाना खेल जैसा है। शत्रु की तलाश का खेल। एक सामान्य, ठहरे हुए उबाऊ जीवन में झूठी उत्तेजना पैदा करके उसे मजे में जीने के लिये शत्रु की तलाश जरूरी मानी जाती है। क्षयिष्णु संगठनों में किसी को लंगी मार कर आगे बढ़ने का आज़माया हुआ तरीक़ा । जीवन में यथास्थितिवाद का यह सबसे अधम रूप है जिसका प्राण-तत्व होता है - ईर्ष्या । शत्रु की तलाश का धंधा इसी अधमता का नमूना है। क्या ‘आप’ की घोषित नीति-विहीनता उसके कुछ लोगों में इसी रोग का कारण बन रही है ; उनके जीने की, उनके राजनीतिक अस्तित्व की एक अधम जरूरत ?
अभी हम सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि ‘आप’ के अंदर जो लोग अभी एक दूसरे के शत्रुओं की
तलाश में जुटे हुए हैं, वे प्रकारांतर से ‘आप’ को एक नर्क बना देने के काम में लगे हुए हैं ; भारत की मौजूदा कई दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह का ही एक साक्षात नरक-कुंड। और कहना न होगा कि जब किसी पार्टी की सारी पूंजी इसी तथ्य की जानकारी में सिमट कर रह जाती है कि अमुक-अमुक व्यक्ति पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उसका भविष्य बेहद निराशाजनक हो जाता है।
सार्त्र के नाटक No Exit को याद कीजिये। नर्क पहुंची तीन नीच आत्माओं को खौलते तेल में डुबो कर यातना देने के बजाय एक कमरे में हमेशा-हमेशा के लिये बंद कर दिया जाता है। ये अधम आत्माएं एक दूसरे को ही शत्रु मान कर बिना किसी बाहरी यंत्रणादायी के परस्पर को यंत्रणाएं देने में जुट जाती हैं । बंद कमरा और शत्रु की तलाश की प्रवृत्ति - फिर किसी और नर्क की जरूरत थोड़े होती है ! ‘आप’ को अंधेरे बंद कमरों के ऐसे भूतों से बचते हुए, व्यापक जनता के जीवन-संघर्षों के आंगन की खुली हवा में सांस लेना होगा। जो बौने लोग इसे अपनी मुट्ठियों में कैद कर इसके दम को घोंट देना चाहते हैं उनका कोई भविष्य नहीं है। ‘आप’ का उदय भारतीय समाज और राजनीति की एक ऐतिहासिक जरूरत है।

गुरुवार, 12 मार्च 2015

लेसली उडविन

सरला माहेश्वरी की कविता :

मैं भारत की बेटी निर्भया
तुम्हें सलाम करती हूँ
बेटियाँ चाहे इंडिया की हो या इंग्लैंड की
अमरीका की हो या अफ़्रीका की
या फिर पृथ्वी के और किसी भू-भाग की
सबकी पीड़ा की भाषा एक होती है
यह पीड़ा ही थी
जिसने मिटा दी थी सारी दूरियाँ
भूला दिये थे सारे भेद
भेद में क्या है अभेद
मन-मस्तिष्क में कैसे कैसे छेद
तुम्हारे कैमरे की आँखे
खोल रही थी सारे बंद दरवाज़े
बलात्कारियों के दिमाग़ के पुर्ज़े-पुर्जे
ओह! कितना मवाद भरा है यहाँ
कितनी बदबू, कितनी सड़ांध है यहाँ
कितना विभत्स दृश्य है यहाँ
हर औरत बस एक शिकार है यहाँ
कैसा नग्न सत्य है यह
ना क़ाबिले बर्दाश्त है यह
बंद करो ! बंद करो ! बंद करो !
चिल्ला रहे हैं वे
सच्चाई से भाग रहे हैं वे
खुद से ही डर रहे हैं वे
धर्म और परंपरा के ठेकेदार हैं वे।
आओ उडविन
मेरे हाथों में अपना कैमरा दो
देखो ! कैमरा अब भी वही देख रहा है
सत्य कहाँ बदलता है
है अगर यह कोई साज़िश
तो औरत के खिलाफ है यह साज़िश
आधी मानवता के खिलाफ है यह साज़िश
आओ! सब मिलकर करे बेपर्द इसे ।

वित्त आयोग की आड़ में केंद्र का स्वेच्छाचार


अरुण माहेश्वरी



इस 9 मार्च को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। उनकी मुलाकात के राजनीतिक उद्देश्यों को लेकर ढेर सारे कयास लगाये जा रहे हैं, लेकिन इसका घोषित उद्देश्य प्रधानमंत्री को पश्चिम बंगाल की संकटजनक वित्तीय स्थिति से परिचित कराना तथा उसके समाधान के लिये केंद्र से अतिरिक्त सहायता प्राप्त करना था।

इस मुलाकात के बाद ममता बनर्जी ने एक संवाददाता सम्मेलन में सिर्फ इतना कहा कि प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल सरकार की आर्थिक पहलकदमियों की प्रशंसा की है। उन्होंने पश्चिम बंगाल को किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा देने के बारे में कोई आश्वासन दिया है या नहीं, इसके बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया। दूसरे सूत्रों के हवाले से अखबारों के जरिये पता चला कि प्रधानमंत्री ने उनसे यह भी कहा कि 14वें वित्त आयोग ने पश्चिम बंगाल को 13वें वित्त आयोग की सिफारिश की तुलना में लगभग 20500 करोड़ रुपये की जो अतिरिक्त राशि के अंतरण की सिफारिश की है, उसके अलावा वे और कुछ नहीं कर सकते हैं। उनकी दलील थी कि और कुछ भी करने से दूसरे राज्य भी इसी प्रकार की मांगों को उठाने लगेंगे। केंद्र और राज्यों के बीच बांटने लायक कर राजस्व के 42 प्रतिशत हिस्से को सीधे राज्यों के सुपुर्द कर देने के बाद केंद्र के हाथ बंध चुके हैं।

बहरहाल, यह एक असमंजस की स्थिति है। वित्त आयोग की सिफारिशों से ऊपरी तौर पर तो लगेगा कि केंद्र ने पहले की तुलना में अपने कर राजस्व का बड़ा हिस्सा राज्यों को सौंप दिया है। लेकिन, वास्तव में इससे राज्यों की वित्तीय स्थिति पर क्या असर पड़ने वाला है, इसका किसी को कोई साफ अनुमान नहीं है। 14वें वित्त आयोग ने देश के दूसरे वित्तीय संकट में पड़े हुए पूर्वी राज्य बिहार को भी 13वें आयोग की सिफारिश की तुलना में लगभग 11500 करोड़ रुपये अतिरिक्त देने की सिफारिश की है। लेकिन पिछड़े हुए क्षेत्र को मिलने वाले अनुदान के खत्म होने और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा न दिये जाने की स्थिति में बिहार पर इसका कुल मिला कर क्या असर पड़ेगा, यह विचार का विषय है।

14वें वित्त आयोग की इस रिपोर्ट पर आयोग के एक सदस्य प्रोफेसर अभिजीत सेन ने अपनी असहमति दर्ज करायी है। असहमति के अपने नोट में उन्होंने बताया है कि इस आयोग ने अतीत की रिपोर्टों की तुलना में पांच मामलों में एक भिन्न रास्ता अपनाया है। पहला यह कि केंद्र के कर राजस्व के आबंटन की राशि में काफी वृद्धि की गयी है। दूसरा, राज्यों के घाटे के लिये दिये जाने वाले अनुदान को कूतने में योजनाबद्ध राजस्व खर्च को शामिल किया गया है। तीसरा, राज्यों के बीच ‘विशेष दर्जा प्राप्त’ और ‘अन्य’ के फर्क को खत्म कर दिया है। चौथा, राज्यों को दिये जाने वाले अनुदानों के साथ अक्सर जिस प्रकार की अनेक शर्तें जुड़ी होती थी उस परिपाटी को खत्म किया गया है। और पांचवा, एक प्रकार के ‘सहकारी संघवाद’ को हासिल करने और वित्तीय नियमों की बेहतर ढंग से निगरानी के लिये कुछ सांस्थानिक व्यवस्थाओं की सिफारिशें की गयी है। इससे राज्यों को पहले की तुलना में बिना किसी शर्त के ज्यादा कोष उपलब्ध हो पायेगा।

अभिजीत सेन को इन बातों से कोई आपत्ति नहीं है। उनका सिर्फ यह कहना है कि इन प्रस्तावों से केंद्र द्वारा राज्यों को योजना की मद में मिलने वाले अनुदान पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। केंद्र को अपनी कई कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करनी पड़ेगी। पिछड़े हुए क्षेत्रों को मिलने वाले अनुदान में भी कटौती हो सकती है, जिसका सीधा असर बिहार पर भी पड़ेगा।

अभिजीत सेन ने कहा है कि चूंकि राज्यों की यह धारणा होती है कि वित्त आयोग की सिफारिशों से केंद्रीय योजना की मद में आने वाले पैसों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, इसीलिये  इस बात की आशंका है कि आने वाले समय में सभी राज्यों को अचानक ही परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि केंद्र कभी भी बजट में योजना की मद में घोषित परिव्यय में कटौती कर सकता है। आज ममता बनर्जी द्वारा केंद्र से और सहायता की दरख्वास्त करने और केंद्र द्वारा यह कहने में कि उसने पहले ही काफी ज्यादा दे दिया है जो एक प्रकार की अस्पष्ट सी स्थिति दिखाई देती है, उसके पीछे मूल कारण यही है कि केंद्र के कर राजस्व के राज्यों के बीच बंटवारे के मामले में अभी भी कई ऐसे बिंदु है, जिनके बारे में स्थिति बहुत भ्रामक है।

दरअसल, भारत में केंद्रीय कर राजस्व को राज्यों के बीच वितरण की अब तक दो प्रमुख एजेंशियां काम करती रही है - योजना आयोग और वित्त आयोग। योजना आयोग एक स्थायी निकाय रहा है जो राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को निर्धारित करने के साथ ही उन लक्ष्यों की पृष्ठभूमि में केंद्रीय सहायता प्राप्त योजनाओं का खाका तैयार करके उन पर अमल के लिये राज्यों को वित्त मुहैय्या कराता था। इसीलिये इसकी सिफारिशें गतिशील और कुछ पूर्वधारणाओं पर आधारित हुआ करती थी। केंद्रीय कर राजस्व का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा योजना आयोग के जरिये ही राज्यों के पास पहुंचता था। अब मोदी सरकार के आने के बाद इस आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन किया गया है। यह नीति आयोग केंद्र के कर राजस्व के आबंटन में कोई भूमिका अदा करेगा या नहीं ; यदि करेगा तो किस प्रकार करेगा, ये सारी बातें अभी स्पष्ट नहीं है। ऊपर से, 14वें वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार राज्यों को गैर-योजना मद में 42 प्रतिशत तक की राशि दिये जाने के कारण योजना की मद में अनुदानों के मामले में केंद्र सरकार दिक्कत में है। 2015-16 के केंद्रीय बजट में भी इसका असर दिखाई दिया है, जिसमें कई ग्रामीण विकास योजनाओं की मद में लागत को कम किया गया है।

बहरहाल, सन् 1983 में जब केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिये न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में सरकारिया आयोग का गठन किया गया था, उसकी पृष्ठभूमि यह थी कि (1) राज्य सरकारें सिर्फ प्रशासनिक एजेंशिया बन कर रह गयी है। विधायी, प्रशासनिक, और वित्तीय क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक केंद्रीकरण से राज्यों को हानि हुई है। (2) अधिकांश समवर्ती विषयों पर केंद्र का अधिकार कायम होगया है, राज्यों के लिये कुछ नहीं रह गया है। एक प्रकार की निरर्थक एकरूपता को बनाने की कोेशिश हो रही है। (3) राज्यों के संसाधनों में उस दर से वृद्धि नहीं हुई है जिस दर से उनकी जिम्मेदारियों में वृद्धि हुई है। साधनों और दायित्वों के बीच अंतराल बढ़ता जा रहा है। (4) योजनाबद्ध विकास से केंद्र के हाथ मजबूत हुए है। (5) नियंत्रण, लाइसेंस-परमिट की प्रणाली के कारण ऐसे केंद्रीकरण का आविर्भाव हुआ जिसमें मुट्ठी भर लोगों को अनावश्यक शक्ति प्राप्त हो जाती है। इनके अलावा, इस पृष्ठभूमि में केंद्र द्वारा राज्यपालों का बेजा इस्तेमाल करने की तरह के शुद्ध राजनीतिक सवालों का भी एक पहलू था।

सरकारिया आयोग की इस रिपोर्ट में केंद्र और राज्यों के बीच के वित्तीय संबंधों पर भी एक अध्याय है। उसमें साफ कहा गया था कि ‘‘वित्तीय संसाधन जुटाना, उनकी भागीदारी एवं उपयोग सरकार की बहुस्तरीय व्यवस्था में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और यदि इसे आपसी समझदारी तथा मेल-मिलाप की भावना से न सुलझाया गया तो इससे अंत:सरकारी संबंधों की कठिन समस्या पैदा होजाती है।’’ सरकारिया आयोग ने इस बात को नोट किया था कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच करों, उधार लेने तथा परिव्यय के संबंध में समवर्ती शक्तियां हैं। इसी में प्राय: गंभीर आर्थिक और प्रशासनिक समस्याएं उत्पन्न होती है जिन्हें मुश्किल बातचीत, समझौतों के माध्यम से निपटाना होता है, अन्यथा न्यायपालिका का सहारा लेना पड़ता है।

सन् 1983 में गठित इस आयोग की रिपोर्ट 1988 में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद के इन 27 सालों में दुनिया काफी बदल गयी है। 1991 के बाद के उदारतावादी दौर में, जब क्रमश: यह साफ होने लगा कि विकास के कामों में सरकार प्रत्यक्ष रूप में ज्यादा शामिल नहीं होगी और निजी क्षेत्र के जरिये ही निवेश को हासिल करना होगा, देश के सभी राज्यों के बीच निजी निवेश को लुभाने के लिये करों में नाना प्रकार की छूट देने की होड़ शुरू होगयी। राज्यों के बीच इस कर-युद्ध के चलते राज्यों की आय में क्रमश: अपेक्षाकृत गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ और राज्य सरकारें अपने खर्च चलाने के लिये ज्यादा से ज्यादा उधार पर आश्रित होने लगी। निवेश को लुभाने के लिये न जाने कितना रुपया बर्बाद होगया, लेकिन अंत में देखा यह गया कि जिन राज्यों में पहले से ही इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित था, उन्हीं में ज्यादा से ज्यादा निजी निवेश भी हुआ और उन्हीं राज्यों को बहु-स्तरीय सरकारी सहायता भी सबसे ज्यादा मिली।

सरकारिया आयोग की रिपोर्ट के शुरू में ही भारत में संध और राज्य की द्वि-स्तरीय सरकार की व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा गया था कि वास्तविकता में हमारे यहां संविधान का स्थायी स्वरूप नहीं है। वह बदलते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश से प्रभावित होता है और उसीमें लगातार एकता और विविधता के बीच संतुलन को बनाये रखने के लिये प्रयत्नशील रहता है। यह शासनप्रणाली इतनी गतिशील है कि इसमें तमाम नियंत्रणों और संतुलनों के बावजूद केंद्र और राज्यों के बीच अनेक समस्याएं और मतभेद उत्पन्न होते हैं। राष्ट्र की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाती है। इसीलिये ‘‘यह जरूरी होता है कि केंद्र-राज्य संबंधों की समय-समय पर समीक्षा की जाए ताकि सहयोगी प्रयास की भावना से प्रेरित समाज कल्याण के लक्ष्य को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके।’’

इन तमाम कारणों से केंद्र और राज्यों के बीच पैदा होने वाले वित्तीय असंतुलनों को दूर करने में वित्त आयोग से भी कहीं ज्यादा योजना आयोग की भूमिका हुआ करती थी। वह अनुदानों  की राशि को तय करने में राज्यों की आबादी, क्षेत्रफल, प्रतिव्यक्ति आय की शक्ति और वित्तीय अनुशासन, इन सब पहलुओं को ध्यान में रखता था जबकि वित्त आयोग सिर्फ क्षेत्रफल का संज्ञान लेता है। आज हमारे राजनीतिक क्षेत्र में इस विषय पर जो धुंधलका दिखाई देरहा है, उसके मूल में यही है कि योजना की मद मंे होने वाले खर्च में कटौती का राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, इसका अभी कोई भी सही-सही अनुमान नहीं लगा पा रहा है।

इतिहास का व्यंग्य देखिये कि एक समय में सरकारिया आयोग ने यह नोट किया था कि योजनाबद्ध विकास की अवधारणा ने राज्यों की तुलना में केंद्र के पक्ष में संतुलन को बिगाड़ा है। और आज चिंता इस बात की की जारही है कि योजना की मद में कमी से भारत के संतुलित और समान विकास का मार्ग बाधित होगा। लोगों ने योजना के साथ जुड़े लाइसेंस-परमिट राज की बुराई को देखा था। अब लोग निजी निवेश को आकर्षित करने के लिये कर-युद्ध के दुष्परिणामों को भोग रहे हैं; संतुलित राष्ट्रीय विकास के लिये केंद्रीय योजना मद में खर्च में कमी घातक दिखाई दे रही है। यह स्थिति तब और भी चिंताजनक होजाती है जब नीति आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष अरविंद पानगढि़या वित्त आयोग की सिफारिशों को मान लेने के लिये प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, लेकिन योजना की मद में खर्च में कटौती को लेकर जरा भी विचलित नहीं है। इसी से पता चलता है कि नीति आयोग का गठन योजना आयोग की हत्या करके किया गया है। जिन्हें भ्रम है कि नीति आयोग कमोबेस वही काम करेगा जो योजना आयोग किया करता था, वह बहुत जल्द ही दूर हो जायेगा। और यदि ऐसा होता है तो यह राज्यों तक केंद्रीय राजस्व के अंतरण की एक महत्वपूर्ण एजेंशी की हत्या होगी, जो राज्यों के आर्थिक स्वास्थ्य के लिये एक बुरी खबर है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वित्त आयोग की सिफारिशों के पीछे के रहस्य को बिल्कुल सही पकड़ा है। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इसका कड़ा विरोध किया है और साफ कहा है कि केंद्रीय कर राजस्व के अंतरण में 10 प्रतिशत की वृद्धि दिखावटी है और इससे बिहार को लाभ नहीं, हानि होगी। बिहार के विभाजन के बाद  पिछड़े हुए क्षेत्र और गाडगिल-मुखर्जी सूत्र के अनुसार उसे जो अतिरिक्त लाभ मिल रहे थे, उन्हें इसकी आड़ में खत्म कर दिया गया है। सचाई यह है कि 13वें वित्त आयोग की तुलना में केंद्रीय कर राजस्व में बिहार का हिस्सा 1.3 प्रतिशत कम होगया है। इस मामले में पश्चिम बंगाल और झारखंड के हिस्से में बहुत मामूली क्रमश: .078 और .337 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन योजना की मद में होने वाली कटौती के नुकसान को देखते हुए यह नहीं के बराबर ही है।

नरेन्द्र मोदी अपने चुनाव अभियान के दौरान पूर्वांचल के सभी प्रदेशों में दहाड़ते हुए यह वादा कर रहे थे कि वे विकास के मामले में भारत के पूरबी और पश्चिमी हिस्से के बीच के फर्क को खत्म कर देंगे। लेकिन उनकी सरकार के कदमों में तो उनके इस वादे की कोई छाप नहीं दिखाई देती है। पूर्वांचल की वंचना के इतिहास को उलटने का कोई संकेत नहीं है। इस मामले में मोदी सरकार का रुख वैसा ही है जिसके बारे में सरकारिया आयोग की रिपोर्ट में यह कटुक्ति की गयी थी कि ‘‘‘‘राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग सत्ता में होते हैं उन्हें राज्य स्तर की शक्तियों पर अपना नियंत्रण बनाये रखने के लिए ऐसी विरोधी नीतियों और उक्तियों को विवश होकर अपनाना पड़ता है जो सदैव राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों के प्रतिकूल होती है।’’ जाहिरा तौर पर अगर केंद्र का यही रुख जारी रहा तो आने वाले समय में फिर एक बार राष्ट्र की एकता और अखंडता के हित में नये सिरे से केंद्र-राज्य संबंधों की गहराई से समीक्षा की जरूरत पड़ेगी।  








सोमवार, 9 मार्च 2015

अंग्रेज शासकों का जैविक व्यवहार

अरुण माहेश्वरी


(सालों पहले, उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ पर एक नोट लिखा था, जिसका बाद में कभी प्रयोग नहीं किया जा सका। आज अचानक हमारे कमप्यूटर पर वह नोट हमें मिल गया। आज ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रसंग में इच्छा हो गयी कि क्यों न इस नोट को साथियों के साथ साझा किया जाए। अंग्रेज व्यापारियों और शासकों के सामान्य जैविक व्यवहार को इस नोट में समझने की एक छोटी सी कोशिश की गयी है। बाद में कभी किसी लेख में इसका सही रूप में इस्तेमाल किया जायेगा। )


वारेन हेस्टिंग्स का सांड़। उदय प्रकाश की बहुचर्चित कहानी। चार साल पहले ‘इंडिया टुडे’ के साहित्य अंक में जब यह छपी थी, पूरा हिंदी जगत इसकी बुनावट पर अचंभित हुआ था। भारत में औपनिवेशिक शासन के शुरू के समय के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के कथित प्राच्य प्रेम की कहानी पर केंद्रित यह कहानी कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में लगी उस तस्वीर से जुड़ी कल्पनाओं से उपजी थी जिसमें हेस्टिंग्स अपनी युरोपीय बीबी के साथ अकड़ कर खड़े हैं और बीबी के बगल में खड़ी नेटिव लड़की चोखी अपनी सहजता से अनायास ही किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। लाट गवर्नर और उनकी बीबी के साथ चोखी की इस सहजता को देख कर लेखक चोखी को हेस्टिंग्स के ‘प्राच्य प्रेम’ और अंग्रेज अफसरानों की भारतीय मिस्ट्रेस की आम बात से जोड़ देता है और एक ऐसा किस्सा तैयार होता है जो पाठकों को प्राय: एक प्रकार के सम्मोहन में बांधने के साथ ही औपनिवेशिक शासन और उसके प्रतिरोध की समस्या के कई गहरे और बहसतलब विषयों को उठा देता है।

‘हंस’ के पृष्ठों पर राजेन्द्र यादव ने इस कहानी में गाय प्रजाति के सांड़ के रूपक से उपनिवेशवाद के प्रतिरोध में प्राच्यवाद की हिंदुत्ववादी अवधारणा को स्थापित करने का आरोप लगाते हुए जो बहस शुरू की थी, वह भी ऐसी ही एक बहस का मुद्दा था। दिल्ली में हाल के राष्ट्रीय नाट्य-उत्सव के अवसर पर इसी कहानी पर ‘अस्मिता’ नाट्यमंडली के नाटक को देख कर लगा कि इस नाटक ने इस प्रकार की बहस की संभावना को और भी ज्यादा मूर्त कर दिया है। खास तौर पर आज के राजनीतिक परिवेश में इस कहानी के वास्तविक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को पकड़ने में जरा सी चूक करने पर ही इसपर हिंदुत्व के विचारों की छाया का अभियोग आराम से लगाया जा सकता है। इसलिये यह जरूरी जान पड़ा कि इस कहानी और नाटक के बहाने ही इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का जायजा लिया जाये और देखा जाये कि इस कहानी में कितना कुछ ऐतिहासिक तथ्यों का दुहराव है और कितना उदय प्रकाश की कल्पना का योगदान है? तभी उदयप्रकाश के अपने आशय और विचारधारा पर भी कोई सही राय दी जा सकेगी।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि वारेन हेस्टिंग्स ने उन प्राच्यवादियों को काफी बढ़ावा दिया था जो उन दिनों भारत के इतिहास, यहां के आम लोगों के रीति-रिवाजों, और स्थानीय भाषाओं को सीखने के काम में लगे हुए थे। प्राच्य-विद्या के क्षेत्र में उसी समय से काफी महत्वपूर्ण काम शुरू हो गये थे। वारेन हेस्टिंग्स औपनिवेशिक प्रशासन का ‘भारतीयकरण’ करना चाहता था ताकि यहां के गुलाम लोगों की मानसिकता को समझा जा सके और औपनिवेशिक नीतियों के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं का सही अंदाजा लगाया जा सके, और अचानक किसी भी व्यापक अव्यवस्था के खतरे से औपनिवेशिक शासन को बचाया जा सके। इसे वह भारत में अंग्रेजों के शासन के स्थायित्व के लिये जरूरी मानता था। अंग्रेज इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि वे भारत की तरह के इतने बड़े देश पर शासन करने के लिये संख्या की दृष्टि से ही बेहद कमजोर स्थिति में हैं। कहते हैं कि लार्ड क्लाइव जब प्लाशी के युद्ध के ठीक बाद बंगाल की राजधानी मुर्शीदाबाद में घुसा था तो उसे सिर्फ मुर्शीदाबाद शहर का विशाल आकार और यहां के लोगों की समृद्धि ने ही आकर्षित नहीं किया था, बल्कि वह यहां की इतनी बड़ी आबादी को देख कर यह सोच कर  चिंतित था कि यदि यह विशाल जन-समुदाय ठान लें कि भारत से युरोपियनों का अंत करना हैं तो वे यह काम सिर्फ पत्थरों और डंडों के बल पर ही कर सकते हैं। लेकिन फिर भी यहां के लोगों ने ऐसा क्यों नहीं किया, यह एक ऐसा सवाल है जिस पर काफी बहस हो सकती है। लेकिन यह सच है कि भारत में अपने पैर जमाने की प्रक्रिया में अंग्रेजों को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। इस मामले में सिर्फ इतना कह देना काफी नहीं हो सकता कि सात समुंदर पार से एक विकसित सभ्यता और संस्कृति ने एक पिछड़ी हुई सभ्यता और संस्कृति पर वर्चस्व कायम कर लिया। सभ्यता पर सभ्यता की विजय इतनी इकतरफा और सरलरेखीय नहीं हो सकती है।

डेविड कॉफ ने अपनी किताब ‘ब्रिटिश ओरियंटलिज्म एंड द बेंगोल रिनैसांस - द डायनामिक्स ऑफ इंडियन मौडर्नाइजेशन’ में लिखा है कि भारत में अंग्रेजों के वाणिज्य के शुरूआती दिनों में अन्य व्यापारिक समुदायों की तरह ही अंग्रेज भी स्थानीय भाषाओं को सीखते थे, कुछ स्थानीय जीवन शैली को अपना लेते थे, मसलन हुक्का पीना या धोती और कुर्ता पहनना और कुछ मामलों में तो यहां की औरतों से शादी भी कर लेते थे।(पृ:15) कोलकाता के निर्माता के रूप में जाने जाने वाले जाब चार्नोक का एक चित्र कोलकाता के बारे में एचईए कॉटन की किताब में मिलता है जिसमें चार्नोक एक पीपल के पेड़ के नीचे हुक्का लिये हुए पायजामा पहने बैठकखाना बाजार के अपने व्यापारी दोस्तों के साथ बतिया रहे हैं। उन्होंने एक बंगाली विधवा से शादी की थी, जिसके बारे में कहते हैं कि चार्नोक उसे जलती हुई चिता से बचा कर लाये थे और उससे उन्होंने तंत्र विद्या सीखी थी। अन्य अनेक परिवारों की तरह ही घरेलू मामलों में उनकी पत्नी ही महत्वपूर्ण फैसले किया करती थी। चार्नोक कंपनी के कामों में व्यस्त रहता था।
कहने का तात्पर्य यह है कि मानवीय जीवन-व्यापारों से जुड़ा सारा मामला ऐसा नहीं होता कि ‘वे आये, देखा और जीत लिया’। व्यक्ति जीवन और शासन की नीतियां, दोनों की ही कईं तहें होती है। यह बात आर्थिक तत्व की नियामकता को स्वीकार कर भी कही जा सकती है और यही से वे सारे किस्से पैदा होते हैं जो ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ की तरह की कहानी के रूप में सामने आते हैं।
मसलन, एक मामले में अंग्रेजों के शासन और अफगान तुर्कों के शासन में अनोखा साम्य दिखाई पड़ता है। ये दोनों ही भारत की तरह के विशाल देश में अपनी नगण्य संख्या की सचाई से अच्छी तरह परिचित थे। भारत को जीत तो इन्होंने काफी आसानी से लिया, लेकिन असल समस्या यहां शासन करने की थी। यह चीज तब तक मुमकिन नहीं थी जब तक गुलाम बनायी गयी आबादी के प्रभावशाली तबकों के साथ उनका कोई गठजोड़ कायम नहीं होता। इसीलिये अफगान तुर्कों ने जिस तरह यहां की आबादी के धर्मांतरण को अपने शासन का प्रमुख मुद्दा नहीं बनाया उसी प्रकार अंग्रेजों ने भी ऐसा नहीं किया। शासन के अंदर  के कुछ लोगों का मत भले ही ऐसा रहा हो, लेकिन मोटे तौर पर इन साम्राज्यों ने स्थानीय धर्म और रीति-रिवाजों के साथ जोर-जबर्दस्ती करने से बचने का रास्ता ही चुना था। यद्यपि प्रकारांतर से वे हमेशा यह कोशिश जरूर करते रहे कि यहां की आबादी में शासकों की तुलना में एक प्रकार की हीन ग्रंथी को भरा जाए। इसके साथ ही स्थानीय लोगों से अपने संपर्क सूत्र के तौर पर यहां के समाज के ही एक वर्ग को तैयार भी करते रहे, और स्थानीय आबादी को धर्म, जाति आदि के नाम पर बांट कर रखते रहें, ताकि वह कभी भी औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ एकजुट न हो सके। इसलिये यदि मुगलों ने गोवध पर रोक को मान लिया था तो अंग्रेज भी उसी नीति पर चलते रहें। इसीलिये यदि किसी रचना या निबंध में इस तथ्य को बताया जाता है कि अंग्रेजों ने यहां गोवध पर रोक को मान लिया था या अन्य किसी प्रथा, मान्यता या रीति-रिवाज को छेड़ा नहीं था तो सिर्फ इसी बात से इन सारी मान्यताओं और विश्वासों का औचित्य प्रमाणित नहीं हो जाता। कुछ हद तक औचित्य तो तब प्रमाणित होता जब ऐसी मान्यताएं और विश्वास ब्रिटिश जीवन के अंग बन गये होते। अफगान तुर्कों और अंग्रेजों ने भारत के लोगों के परंपरागत जीवन को काफी हद तक अछूता छोड़ने का निर्णय लिया तो सिर्फ इसलिये कि वे इन मामलों में दखलंदाजी से पैदा होने वाली व्यापक अव्यवस्था से आतंकित थे और यहां की आबादी की तुलना में अपनी अतिअल्प संख्या पर विचार करके ही ऐसे किसी जोखिम को उठाने के लिये तैयार नहीं थे। यहां सती प्रथा और बाल विवाह के बारे में अंग्रेजों द्वारा कानूनी कदम उठाने के इतिहास पर भी गौर किया जा सकता है। जो लोग इन मामलों में राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारा हिंदू समाज के अंदर ही चलाये गये शास्त्रार्थ के इतिहास से परिचित है वे आसानी से इस निष्कर्ष पर पंहुच सकते है कि लार्ड बेंटिक ने सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाने का जोखिम तभी उठाया जब उसे इस बात का पूरा भान हो गया कि स्थानीय मान्यताओं और शास्त्रों के आधार पर भी उस कानून की पुष्टि होती है।

वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ के संदर्भ में इस पूरी चर्चा से तात्पर्य यही है कि जब इसमें गोवध पर रोक की बात को शासक की प्रशंसा के तौर पर कहा जाता है तो यह एक अल्पसंख्यक शासक तबके की नीतियों को पेश करने वाले सिर्फ एक ऐतिहासिक तथ्य का बयान होता है न कि गोवध या इसी तरह के विषयों पर पारंपरिक विश्वासों को दी गयी लेखक की स्वीकृति। इस बात को समझने में असमर्थ दर्शक या पाठक कथा के मर्म को पकड़ने में निश्चित तौर पर चूकेगा।
इसी प्रकार हेस्टिंग्स की कृष्ण भक्ति, गीतगोविंद के पदों से मस्त चोखी के साथ उसकी केलियों को मालिक के बेटे की किशोर वय की सहजताओं से जोड़ कर देखा जाना चाहिये, न कि भारत की धरती, यहां के हवा-पानी में समाये अनोखे विस्मयों की गाथाओं की स्वीकृति के रूप में। यदि ऐसा नहीं होगा तो कल्पनाओं के घोड़ों पर सवार जवान हसरतों की अनूठी बातों का कही भी कोई मायने नहीं रह जायेगा। जिस हेस्टिंग्स की मसे भी अभी नहीं फूटी थी, वह हमउम्र नेटिव लड़की के आकर्षण में कृष्ण सज कर बांसुरी बजाता फिरे तो क्या आश्चर्य है? यह दीगर है कि गोरे छोकड़े का ही यह व्यवहार दासों को इसलिये आह्लादित करता है क्योंकि वे मालिक के बेटे से ऐसे सहज मानवीय व्यवहार की उम्मीद जो नहीं करते थे। यही दासवृत्ति आज तक हमारे पाठकों और दर्शकों के मानस को विकृत किये हुए है। वर्ना जहां हेस्टिंग्स अथवा चोखी भी किशोर वय के दायरे के बाहर जाते हैं उनके व्यवहारों की उस निश्छलता को गायब होते जरा भी देर नहीं लगती है। दोनों अपनी सीमाओं और अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं। युवा से प्रौढ़ हो चुका गवर्नर जनरल हेस्टिंग्स तो किसी भी अन्य शासक जितना ही निष्ठुर, स्वार्थी और कपटी होता है। उसका ‘प्राच्य प्रेम’ चोखी या  उसकी संगत की देन नहीं था, जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, वह एक अति-अल्पमत वाले शासकवर्ग की शुरू के दिनों की नैसर्गिक आवश्यकता थी।
जो भी हो, कहानी के इस किशोर-वय के प्रेम के अतिरिक्त दूसरे कई ऐसे पहलू है जो ब्रिटिश शासकों की खास मानसिकता के पक्षों को उजागर करती है। मसलन, अंग्रेज अधिकारियों का आम सेक्स व्यवहार। यह इतिहास है कि भारत में अंग्रेजों के काफी पहले ही पोर्तुगीज आकर बस गये थे। पोर्तुगीज लोगों के बारे में यह अनुभव था कि स्थानीय लोगों के साथ सेक्स संबंधों को बनाने के मामले में वे काफी बेपरवाह थे और इसी के चलते काल-क्रम में यह देखा गया कि वे अपने रूप-रंग और सामान्य आदतों के मामलों में भी स्थानीय लोगों से प्राय: एकाकार हो गये थे। उनकी अलग पहचान ही खत्म हो गयी थी। इसीलिये अंग्रेज अफसरों को यह खास हिदायत थी कि वे अपने सेक्स व्यवहार को नियंत्रण में रखे और स्थानीय औरतों के संसर्ग में न आये अन्यथा वे भी भारतीयों की भारी भीड़ में खो जायेंगे, उनका अपना कुछ नहीं रह जायेगा। यही वजह है कि शुरू के दिनों में अंग्रेजों के बीच भी भारतीय पत्नी या रखैल रखने की प्रथा काफी चल पड़ी थी, लेकिन बाद में वे बिलायत से अपनी पत्नियां लाने लगे। केनेथ बाल्हशेत ने अपनी किताब ‘रेस, सेक्स एंड क्लास अंडर राज’ में बताया है कि अंग्रेजों के लिये शासक नस्ल की प्रतिष्ठा का सवाल उनके लिये गंभीर चिंता का विषय बन गया। (पृ:2) बिलायत से लायी गयी बीबियों ने अंग्रेज अधिकारियों को स्थानीय लोगों से सामाजिक तौर और दूर रखने में एक अहम भूमिका अदा की। बाल्हशेत के अनुसार ही 1784 के बाद से यूरेशियनों को सभी महत्वपूर्ण स्थानों से हटाया जाने लगा, क्योंकि  वे (शासक और शासित के बीच) सामाजिक दूरी को खत्म करने का खतरा पैदा करते थे।
एचईए कॉटन की किताब से पता चलता है कि शुरू के लंबे काल तक अंग्रेजों के भारतीय पत्नियां और रखैल हुआ करती थी। अंग्रेज औरतों वाले काफी कम होते थे, और अधिकांश व्यापारियों के भारतीय पत्नियां होती थी और वे अधिकांशत: भारतीय जीवन शैली को अपना लेते थे। कारखाने से लौटने के उपरांत वे चटाई पर बैठ कर भोजन किया करते थे और भारतीय पोशाक पहनते थे।  (पृ:5) लेकिन राजनीतिक सत्ता हासिल करने के बाद बड़े पैमाने पर पत्नियां बिलायत से आने लगी। उनके आने के साथ ही भारतीय बीबियां घरों से हटायी जाने लगी, हुक्का बंद होने लगा और घर पर बिलायती बीबी का कब्जा होने लगा। इसके साथ ही अंग्रेजों की जीवन शैली पूरी तरह से अलग होने लगी जो शासकों की जीवन शैली थी न कि व्यापारियों की।
यदि इस समूची पृष्ठभूमि में वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ का पाठ किया जाये तो उन सभी प्रसंगों का अर्थ खुल जायेगा जो इस कहानी में हेस्टिंग्स और अन्य अंग्रेज अफसरों के व्यवहारों, हेस्टिंग्स की बीबी के रौब-दाब और नेटिव लड़की से प्रेम करने के जुर्म में तबादला कर दिये गये अफसर के प्रसंग साफ  हो जाते है। इसके साथ ही अंग्रेजों के भारतीय संपर्क सूत्र  की सचाई की भी ऐतिहासिकता जाहिर होती है।



   

शनिवार, 7 मार्च 2015

एक और ब्रह्मांड


विश्व महिला दिवस के मौके पर :

रूढि़वादी विचारों से मुक्ति जरूरी है
सरला माहेश्वरी
क्लारा जेटकिन


क्लारा जेटकिन, जर्मनी की विश्व प्रसिद्ध माक्र्सवादी सिद्धांतकार और महिलाओं के हितों की लड़ाई की एक अथक योद्धा। सन् 1911 में उन्होंने ही आठ मार्च के दिन पहले अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का पालन किया था। 8 मार्च 1908 में न्यूयार्क की पंद्रह हजार से भी ज्यादा महिलाओं ने काम की दयनीय परिस्थितियों और पुरुषों की तुलना में कम वेतन के खिलाफ और मताधिकार की मांग पर एक हड़ताल का पालन किया था। प्रथम विश्वयुद्ध की पूर्व संध्या पर सन् 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में समाजवादी महिलाओं के द्वितीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में युद्ध और सैन्यवाद, भूख और गरीबी के खिलाफ कई प्रस्ताव पारित किये गये थे। उसी सम्मेलन के मंच से क्लारा जेटकिन ने ट्रेडयूनियन आंदोलन की दूसरी महिलाओं के साथ मिल कर यह आह्वान किया था कि महिलाओं के खिलाफ जुल्मों के प्रतिरोध के लिये सारी दुनिया में उसी प्रकार अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का पालन किया जाना चाहिए जिस प्रकार 1 मई के दिन अन्तरराष्ट्रीय श्रम दिवस का पालन किया जाता है। उस सम्मेलन ने जेटकिन के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार लिया था, लेकिन तब भी कोई दिन निश्चित नहीं किया गया था।
इसके बाद ही क्लारा जेटकिन ने ही अपनी पहल पर 8 मार्च के दिन के न्यूयार्क की महिलाओं के संघर्ष को याद करते हुए 8 मार्च 1911 को जर्मनी मेंं पहले अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का पालन किया और तभी से दुनिया की इस सबसे अधिक प्रताडि़त आधी आबादी को न्याय दिलाने के लिये संघर्ष के दिन के तौर पर इसे विश्व भर में मनाया जाता है।
सन् 1908 के बाद से अब तक 107 साल पूरे हो चुके हैं। 1908 में न्यूयार्क की महिलाओं ने जिन मांगों के लिये हड़ताल का पालन किया था उनमें समान वेतन की मांग के साथ ही एक प्रमुख मांग थी काम की परिस्थितियों में सुधार की मांग।
इन 107 सालों में गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका है। पहले विश्व युद्ध और दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया वह नहीं रही है, जो तब हुआ करती थी। हाल में थामस पिकेटी के दुनिया में सामाजिक गैर-बराबरी के बारे में आए ऐतिहासिक अध्ययन से भी पता चलता है कि तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी अन्य गैर-बराबरियों की तरह ही लैंगिक गैर-बराबरी का ग्राफ भी हमेशा एक सा नहीं रहा है। दुनिया की  राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार इसमें उतार-चढ़ाव दिखाई देता है। जिस दौर में भी दुनिया व्यापक राजनीतिक उथल-पुथल के बीच से गुजरी है, सामाजिक गैर-बराबरी में कमी आई है और जब भी पूंजी का प्रभुत्व बिना किसी बाधा के बढ़ता चला गया है, सामाजिक गैर-बराबरी भी उसी अनुपात में बढ़ती चली गयी है। दोनों विश्व युद्धों और समाजवादी शिविर के उदय और यहां तक कि शीत युद्ध के काल में भी गैर-बराबरी का ग्राफ अबाध रूप से बढ़ा नहीं बल्कि उसमें कुछ कमी या ठहराव आया था। लेकिन इन्हीं अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि आज, 1990 के बाद के एकध्रुवीय विश्व की इस चौथाई सदी में आधुनिकता की सारी लंबी-चौड़ी बातों के बावजूद फिर एक बार सामाजिक गैर-बराबरी में तेजी से वृद्धि के खतरनाक संकेत मिलने लगे हैं। जाहिर है कि इसमें लैंगिक गैर-बराबरी के भी तेजी से बढ़ने का खतरा शामिल है।
आज जब हम अपने देश को देखते है तो 107 साल पहले काम की परिस्थितियों की जिस समस्या को न्यूयार्क की महिलाओं ने उठाया था, वह आज भी हमारे देश की कामकाजी महिलाओं के लिये एक सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। काम का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें महिलाओं के साथ दुराचार आम बात न हो। अखबारों में रोजाना न्यायपालिका से लेकर पत्रकारिता की तरह के अपेक्षाकृत जागरूक और पवित्र माने जाने वाले क्षेत्रों में भी महिला कर्मचारियों के साथ बदसलूकी की खबरें आती रहती है। कारपोरेट क्षेत्र की तो यह एक सामान्य बीमारी है।
अभी निर्भया कांड और उसके एक फांसी की सजा पाए अपराधी के जिस साक्षात्कार को लेकर संसद और पूरे देश में हंगामा हो रहा है, उसमें भी एक बात खुल कर सामने आरही है कि उस अपराधी ने जो जघन्य बातें कही है, वे कोई नई बातें नहीं हैं। राजनीति से लेकर समाज के दूसरे सभी क्षेत्रों के प्रभावशाली लोग तक स्त्रियों के प्रति उन्हीं प्रकार की बातों को दोहराते हुए पाये जाते हैं। स्त्रियों को एक समय के बाद घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, उन्हें अपनी पोशाक के मामले में सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि इन सबसे पुरुषों को बलात्कार करने की उत्तेजना मिलती है आदि, आदि।  और, इसप्रकार, प्रकारांतर से स्त्रियों को ही उनके बलात्कार के लिये दोषी बताने की दलीलें संसद के अंदर और बाहर, लगभग हमेशा सुनाई देती रही हैं। तमाम प्रकार के धार्मिक संगठनों के नेता तो इस मामले में सबसे अधिक आगे दिखाई देते हैं।
दुनिया के धर्मशास्त्रों में ऐसी अनेक बातें पाई जाती है जो स्त्रियों की स्वतंत्र मानवीय अस्मिता के विपरीत दिखाई देती है। भारत की प्राचीन संहिताओं में तो ऐसे असंख्य उदाहरण भरे हुए हैं। इसीलिये सारी दुनिया में जनतंत्र के विकास के स्तर के एक मानदंड के रूप में स्त्रियों के विकास को माना जाता है। तदनुरूप दुनिया में स्त्रियों की समानता के अधिकारों को लेकर आधुनिक कानूनी प्राविधानों का भी अपना एक पूरा इतिहास है। उस इतिहास के पूरे ब्यौरे में जाने के बजाय यहां हम सिर्फ यही कहना चाहेंगे कि भारत में भी, स्त्रियों की समानता की कानूनी व्यवस्थाओं का समान रूप से एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें भारतीय नवजागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय से लेकर ईश्वरचंद विद्यासागर और नवजागरण के दूसरे सभी पुरोधाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही वजह थी कि भारत स्त्रियों को समान मताधिकार देने वाले दुनिया के देशों की अग्रिम कतार में शामिल दिखाई देता है। गांधीजी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को स्त्रियों के मानवाधिकार के आंदोलन से अभिन्न रूप में जोड़ दिया था।
भारत की स्वतंत्रता और समाज-सुधार के इस गौरवशाली इतिहास के बावजूद आज भी सचाई यही है कि हमारा समाज पुरातन स्त्री-विरोधी रूढि़वादी विचारों से मुक्त नहीं हुआ है। इसी के चलते उस मानसिकता का जन्म होता है, जो निर्भया के बलात्कारी की मानसिकता है। अभी बीबीसी के लिये लेसली उडविन की फिल्म ‘भारत की बेटी’ (इंडियाज डाटर) के संदर्भ में भारत सरकार का जो अविवेकपूर्ण रवैया देखने को मिला, वह भी हमारे समाज पर चरम रूढि़वादी शक्तियों की जकड़ का ही उदाहरण है।
भारत का अनुभव यह है कि पंजाब, हरयाणा की तरह के जो प्रदेश प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से सबसे आगे है, उन्हीं प्रदेशों में स्त्री-पुरुष अनुपात सबसे बुरा है। हाल में ‘वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम’ द्वारा जारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार 2014 की स्त्री-पुरुष अंतर सूचकांक में भारत का स्थान दुनिया के 142 देशों में 114वां है जबकि बांग्लादेश का स्थान 65वां है। सिर्फ एक दशक पहले तक 2006 में भारत का स्थान 96वां था, जो 2010 में गिरकर 112 पर पहुंच गया। वही गिरावट आज तक जारी है।
इकोनोमिक फोरम की इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘आम लोग और उनकी योग्यताएं ही दीर्घकालीन टिकाऊ विकास के प्रमुख चालक होते हैं। यदि उनकी प्रतिभाओं का आधा हिस्सा अविकसित रह जाता है या उसे पूरा काम में नहीं लगाया जाता है तो अर्थ-व्यवस्था कभी भी वांछित रूप में विकसित नहीं हो सकती है।’’
इस बार के आठ मार्च के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सारी दुनिया से यह आान किया है कि इस दिन को इस रूप में पेश किया जाना चाहिए जिससे सबको यह संदेश मिले कि महिला सशक्तीकरण का अर्थ है मानवता का सशक्तीकरण। इस वर्ष के अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर संयुक्त राष्ट्र का यही मुख्य नारा भी है। गौर करने की बात यह है कि जिस समय इस बात का आान किया जा रहा है कि महिला सशक्तीकरण को मानव सशक्तीकरण का पर्याय बताते हुए उसे सबके सामने प्रदर्शित किया जाए, उसी समय हमारे देश में एक ऐसी फिल्म पर सरकार ने पाबंदी लगादी है जिसमें एक महिला पर बलात्कार और उसकी हत्या के बाद उसके प्रतिवाद में गूंज उठी भारत की सड़कों का एक जीवंत चित्र पेश किया गया है।
संयुक्त राष्ट्र की महिला कार्यकारी निदेशक फ्लुमजिलो मिलाम्बो नूको ने दुनिया के सामने यह लक्ष्य रखा है कि सन् 2030 तक स्त्री-पुरुष अनुपात को बराबर के स्तर तक लाकर लैगिंक समानता के लक्ष्य को हासिल किया जाना चाहिए। यह काम उस समय तक संभव नहीं है जब तक हम अपने समाज को स्त्री-विरोधी सभी रूढि़वादी विचारों से मुक्त करके स्त्री-पुरूष समानता के आधार पर एक स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं करते। आज का दिन इसी की शपथ लेने का दिन है।








गुरुवार, 5 मार्च 2015

अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र


प्रिय अरविंद जी,

आज (4 मार्च 2016) आम आदमी पार्टी (आप) की राजनीतिक परामर्श समिति(पीएसी) में जो कुछ हुआ उससे हम ज्यादा हतप्रभ नहीं है। जो भी हमारे देश में और सारी दुनिया में राजनीतिक पार्टियों के काम करने के तौर-तरीकों के इतिहास को जानता है, उसे इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं लगेगा। किसी भी विषय में लंबी बहस के बाद भी जब किसी फैसले पर पहुंचना मुमकिन नहीं दिखाई देता है तब संगठन के संचालन की यह एक साधारण रीति है कि मतदान का रास्ता अपनाया जाए और जो भी बहुमत में हो उसकी बातों को मान्य माना जाए। संगठन जितना भी जनतांत्रिक क्यों न हो, बहुमत के सामाने अल्पमत की अधीनता को ‘आंतरिक जनतंत्र’ वाले संगठनों का एक अटल सिद्धांत माना जाता है। ‘आप’ की पीएसी में भी संगठनों की इस सर्वमान्य परिपाटी को ही दोहराया गया। इसीलिये एक नजर में किसी का इससे विस्मित या दुखी होना गैर-लाजिमी ही माना जायेगा।

संगठन संबंधी इस सर्वकालिक और सर्वमान्य सिद्धांत की सचाई के बावजूद यह बात भी समान रूप से सच है कि ‘आप’ के इस घटनाक्रम ने बहुत सारे लोगों को काफी आहत किया है। हमीं ने इसपर फेसबुक में अपनी पोस्ट में लिखा कि ‘‘कहा जा रहा है कि योगेंद्र यादव को 'आप' की पीएसी से हटा दिया गया है । अगर यह सच है तो यह दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात और 'आप' के क्रमश: एक गिरोह में तब्दील होने की प्रक्रिया की ओर संकेत करता है ।**

राजनीतिक पार्टियों के सांगठनिक सिद्धांतों के बारे में इतिहासबोध पर टिके अपने सारे विवेक के बावजूद जब हम आज के इस घटनाक्रम को आसानी से नहीं स्वीकार पा रहे हैं तब हमें खुद की आहत-भावनाओं पर ही सोचने की जरूरत पड़ रही है। जो बात राजनीतिक संगठनों के मामले में आम दिखाई देती है, वही ‘आप’ के बारे में हमें उतनी साधारण क्यों नहीं नजर आती?

इस सवाल के साथ विचार करने पर हमें लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अभी तक ‘आप’ को सामान्य अर्थों में एक राजनीतिक पार्टी नहीं मानते हैं और इसीलिये उस पर उन सांगठनिक सूत्रों और सिद्धांतों का लागू होना उतना अनिवार्य या वांछित नहीं मानते जिन्हें अन्य पार्टियों के मामले में हम नितांत सामान्य बात के तौर पर देखते रहे हैं?

दरअसल, हम समझ रहे थे कि ‘आप’ का उदय भारतीय राजनीति की नयी परिघटना है जो हिंदुत्व की एक फासीवादी पार्टी की चुनौतियों के सामने कांग्रेस और पारंपरिक वामपंथी दलों की प्रकट विफलता की पृष्ठभूमि में एक नये स्वस्थ जनतांत्रिक आंदोलन का प्रतिनिधित्व करती है और जिसका रूझान भ्रष्टाचार-विरोधी तथा गरीबों के पक्ष में होने के कारण वामपंथ की ओर थोड़ा झुका हुआ है। इसके अलावा, यह भी सच है कि हमें ‘आप’ की यह परिघटना भारत की अपनी कोई अनोखी परिघटना भी नहीं लगती थी। इसप्रकार के वामपंथी रूझान वाले नये प्रकार के जन-आंदोलन के प्रमाण हाल के सालों में दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिले हैं। पूरा लातिन अमेरिका ऐसे नये वाम-जनतांत्रिक विकल्प की राजनीति का पिछले एक दशक से बहुत बड़ा प्रयोगस्थल बना हुआ है। कमोबेस भारत की तरह की परिस्थितियों में ही इन देशों में 21वीं सदी के आगमन के साथ वामपंथी रूझान की पार्टियों के उभार का सिलसिला शुरू हुआ और देखते-देखते वेनेजुएला में हुगो सावेज, चिले में रिकार्डो लागोस और मिशैल बाशलेत, ब्राजील में लुला द सिल्वा और दुल्मा रूसेफ, अर्जेन्तिना में नेस्तर किर्शने और उनकी पत्नी क्रिस्तिना फर्नान्दिज, उरुग्वे में होशे मुखीका, बोलीविया में एवो मोरालेस, निकारागुआ में दनियल ओर्तेगा, इक्वाडोर में रफायल कोरिआ, पैरागुआ में फर्नांदो लुगो, होंडुरस में मैनुअल खेलाया, अल सल्वाडोर में मोरिशिओ फ्यूनस की सरकारें बन गयी। ये सभी अपने को वामपंथी, समाजवादी, लातिन अमेरिकापंथी अथवा साम्राज्यवाद-विरोधी कहते हैं। आज सिर्फ होंडुरस, कोलंबिया और पनामा में दक्षिणपंथी सरकारें है। इनमें होंडुरस और पनामा बहुत छोटे देश है। हाल में ग्रीस में बनी सिर्जिया की सरकार को भी इसीका एक नया विस्तार माना जा सकता है।

जब हम दुनिया की 1990 के बाद की इन 25 सालों की राजनीतिक स्थिति पर गौर करते है तो एक ओर अमेरिकी वाशिंगटन कंसेंशस वाली नव-उदारवादी नीतियों की मुहिम है तो इसके विपरीत छोर पर उन नीतियों को एक सिरे से ठुकराने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां है, जिनके समाजवादी विकल्प को सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में ठुकराया गया था और जो आज भी चीन की सारी उपलब्धियों के बावजूद किसी जनतांत्रिक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर पा रही है। नाना कारणों से अब तक दुनिया भर में नव-उदारवादी नीतियों के प्रतिकार में कम्युनिस्ट पार्टियों का विकल्प लोगों के गले नहीं उतर रहा है। इसी परिस्थिति में लातिन अमेरिका में जो नया जनतांत्रिक उभार देखने को मिला, उसी से संगति रखते हुए दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उभार ने भी सभी जनतंत्रप्रिय लोगों की अन्याय के खिलाफ एक नये जन-आंदोलन की कल्पनाओं को छुआ है। भारत में फासीवाद के खतरे के सामने इसमें जनतंत्र की रक्षा के एक व्यापक मंच की संभावनाओं ने भी सबको इसके प्रति उत्साहित किया है। दिल्ली में ‘आप’ की इतनी बड़ी ऐतिहासिक जीत सिर्फ उसके संगठन की बदौलत नहीं, बल्कि जनता की कल्पनाओं को छूने वाली उसकी इसी आंदोलनात्मक छवि की वजह से संभव हुई है।

अरविंद जी, जब कोई पार्टी उदीयमान जन-आंदोलन के रूप में सामने आती है तब उसपर आम तौर पर राजनीतिक पार्टी के सामान्य सांगठनिक सिद्धांत लागू नहीं होते हैं। आजादी की लड़ाई के पूरे काल में राष्ट्रीय कांग्रेस का पूरा इतिहास देख लीजिये। उसके संचालन के लिये विरले ही कभी अनुशासन के सख्त डंडे की कोई जरूरत पड़ी होगी। वह आजादी की लड़ाई का एक व्यापक मंच था जिसमें लोगों का अपनी मर्जी से आना-जाना अबाध रूप से चलता रहता था। तमाम विचारों के लोगों ने उस आंदोलन के मंच को विकसित करने में अपनी भूमिका अदा की थी।

‘आप’ को भी आज के इस दौर में राष्ट्रीय जीवन की भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता की तरह की कुछ खास समस्याओं से निपटने के मंच के रूप में लोग देखते हैं। पिछले अक्तूबर महीने में जब दिल्ली में ‘आप’ की विजय हुई थी, तब बहुत से लोगों ने उसे स्वाभाविक तौर पर एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में भी देखना शुरू कर दिया था। लेकिन लोक सभा चुनाव में इजारेदार घरानों की खुली मदद से मोदी के तूफानी अभियान के कारण दूसरी कई पार्टियों की तरह ही ‘आप’ भी उसमें कोई विशेष उपलब्धि नहीं कर पाई। फिर भी, ‘आप’ की ओर से देश के विभिन्न हिस्सों में रातो-रात एक सांगठनिक ढांचा खड़ा करने के जो दुस्साहसी कदम उठाये गये थे, उसने सबको चौका दिया था। ‘आप’ द्वारा चंदा उगाहने और पार्टी के आय-व्यय के हिसाब के मामले में जिसप्रकार की पारदर्शिता का परिचय दिया गया था उससे पार्टी संगठन के निर्माण को लेकर भी कुछ नयी प्रकार की उद्भावनाओं के संकेत लोगों को दिखाई दिये थे।

ऐसी परिस्थति में, दिल्ली के आज के घटनाक्रम ने हम जैसों को हताश किया है क्योंकि इससे कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ‘आप’ ने जिस नयी सांगठनिक पहलकदमी का परिचय देकर अपने को अन्य बंद संगठनों से एक भिन्न स्थान पर रखा था और जनतांत्रिक राजनीति की नयी संभावनाओं की ओर संकेत किया था, वह क्रम इस घटना से यकबयक जैसे थम ही नहीं गया बल्कि पूरी तरह उलट सा गया है। यह एक व्यापक जन-आंदोलन के संभावनापूर्ण विस्तार के पहले ही उसे सख्त अनुशासन की जंजीरों से बांध देने की तरह का उपक्रम लगता है। निश्चित तौर पर किसी भी संगठन को अपने नियमों के आधार पर चलाने से ही उसे व्यक्तियों के स्वेच्छाचार से बचाया जा सकता है। लेकिन किसी को यह समझ में नहीं आरहा है कि ऐसी कौन सी आपदा आ गयी थी कि जिसके कारण अभी-अभी जनता के इतने व्यापक समर्थन को पाने के बाद इतनी हड़बड़ी में पार्टी के दो वरिष्ठ और लोकप्रिय नेताओं के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई करने की जरूरत आगयी ?

योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण, दोनों की ईमानदारी को लेकर कोई किसी प्रकार का सवाल नहीं उठा रहा है और इस बात को भी कोई झुठला नहीं सकता कि ये दोनों ही आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय ऐसे व्यक्ति रहे है जिन्होंने जनता के दिलों में ‘आप’ की इस पूरी परिघटना का एक खाका तैयार करने में अहम भूमिका अदा की है। ऐसे महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी लोगों को संगठन में तत्काल उनकी औकात बताने वाली कार्रवाई की क्या जरूरत थी ?

अरविंद जी, जनतंत्र एक लगातार विकासमान अवधारणा है। यह एक ऐसी बहुमतवादी सामूहिकता है जिसमें व्यक्ति और समूह के अधिकारों के बीच द्वंद्व जितने कम होंगे, जनतंत्र के लिये उतना ही अच्छा होगा । समूह की संगति में व्यक्ति की शक्ति का बढ़ना ही जनतंत्र की सफलता है । दार्शनिक लहजे में कहें तो जनतंत्र नामक 'परम चित्त' का आरोहण व्यक्ति स्वातंत्र्य को अधिक से अधिक साध कर ही संभव है।  लक्ष्य हमेशा समूह और व्यक्ति के बीच के फासलों को कम करना होता है। समूह के बरक्स व्यक्ति का सशक्तीकरण जनतंत्र के विकास के स्तर की कसौटी है। इसीलिये एक ऐतिहासिक विजय के तीन हफ़्तों के अंदर ही उस विजय के दो प्रमुख कर्णधारों पर लगभग अकारण ही गाज का गिरना अनुचित सा जान पड़ता है ।

अरविंद जी, शास्त्रीय ढंग से सोचा जाए तो राजनीतिक पार्टी व्यक्ति नहीं, व्यक्तियों का समूह है। उन लोगों का समूह जो एक मान्य विचारधारा के अनुसार पूरे समाज को ढालने के लिये एकत्रित हुए हैं। उनका लक्ष्य होता है कि यह पार्टी क्रमश: फैलते-फैलते पूरे समाज या पूरी जनता का रूप ले लें। पार्टी का जनता में पूरी तरह से लोप ही पार्टी का अंतिम गंतव्य है। जनहित और पार्टी-हित अभिन्न, और हमेशा के लिये एकाकार हो जाते हैं। कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक तौर पर पार्टी का कोई अंतिम रूप नहीं होता, बल्कि जनता में उसका विलोपन होता है। इस अंत तक पहुंचने की दीर्घ प्रक्रिया में संक्रमण के कई पड़ाव आते हैं, ऐतिहासिक तौर पर संभव नये-नये तत्वों, व्यक्तियों और व्यक्तियों के समूहों को यह अपने में आत्मसात करती है।

लेकिन जब तक कोई पार्टी अपने इस अंत तक नहीं पहुंचती, वह पार्टी ही रहती है, समाज या जन नहीं हो पाती, उसे संपूर्ण समाज या जनता नहीं माना जा सकता।  इसीलिये यह जरूरी नहीं होता कि पार्टी-हित और जन-हित हमेशा एक और अभिन्न हो। यद्यपि, कुछ ऐतिहासिक संधि-क्षणों में जब जन-हित और पार्टी-हित एक समान हो जाते हैं, तब पार्टी वास्तव अर्थों में जन-आंदोलन का रूप लेकर सामने आती है।
इसके अलावा, जो समस्या पार्टियों और उनके पार्टी-हितों की है, वे किसी भी जनतांत्रिक व्यक्ति और नागरिक की नहीं होती है। शायद यही कारण है कि कोई स्वतंत्र व्यक्ति या नागरिक जितनी आसानी से अपने समय के जन-हित के विषयों के साथ खुद को एकात्म कर लेता है, पार्टियां नहीं कर पाती है - इस प्रकार की तमाम उदात्त घोषणाओं के बावजूद कि जनहित के अलग पार्टी-हित कुछ भी नहीं होता है। इस वजह से भी पार्टी में व्यक्ति की भूमिका को जितना बना कर रखा जा सके, व्यापक अर्थों में वह उतना ही श्रेयस्कर होता है।

जिन दो व्यक्तियों को ‘आप’ की इस बैठक में निशाना बनाया गया है वे दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के जाने-माने बुद्धिजीवी है। और इसी वजह से उनकी भूमिका को अक्षुण्ण रखने में हमें ‘आप’ के जनतांत्रिक स्वरूप के हित दिखाई पड़ते हैं। इस मामले में सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियां एक गहरे संकट से गुजर रही है। समाजवाद के श्रेष्ठ दिन वे थे जब दुनिया के तमाम बौद्धिक विमर्शों में भी समाजवाद की श्रेष्ठता बनी हुई थी।

ऐसे में ‘आप’ का यह संकट हमें गहराई से आशंकित करता है। यदि इस मामले को विवेक और उदारता के साथ नहीं सुलझाया जाता है और उनकी भूमिका को सुरक्षित नहीं रखा जाता है तो यह ‘आप’ की विश्वसनियता के लिये भी खतरा पैदा कर देगा।

सादर
अरुण माहेश्वरी