सोमवार, 10 मार्च 2014

उदय प्रकाश की पोस्ट पर एक टिप्पणी

उदय जी, बहुत सुंदर।
अनायास ही लू शुन याद आगये। डार्विन के विकासवाद को मानने वाले लू शुन। एक साक्षात्कार में उनसे पूछा गया - यदि बंदर से ही आदमी बना तो फिर आज भी इस धरती पर बंदर नाम का प्राणी क्यों मौजूद है?

क्रांतिकारी लू शुन का जवाब था - बंदरों के एक तबके ने जीवन के अनुभव से चार टांगों के बजाय दो टांगों पर चलने को अपनाया लेकिन एक हिस्सा अपने पूर्वजों की हजारों साल की परंपराओं की दुहाई देता हुआ चार टांगों की जीवन-पद्धति से ही चिपका रह गया। लू शुन ने आगे और जोड़ा - जो लोग जीवन में आने वाले परिवर्तनों को अस्वीकारते हैं, मानव सभ्यता के इतिहास में वे सभी मानव रूपी बंदरों की तरह पड़े रह जाते हैं, सभ्यता परिवर्तनशील मनुष्यों के साथ आगे बढ़ती जाती है।

लेकिन असल त्रासदी तो चयन-विहीनता की त्रासदी है। युद्धों, दंगा-फसादों, जन-हत्याओं, जातीय उन्मूलनों से लेकर आर्थिक-राजनीतिक क्रांतियों तक में जबरन उजाड़ दिये जारहे विस्थापितों, निर्वासितों, शरणार्थियों, आप्रवासियों की है। ‘सर्जनात्मक विध्वंस’ से जुड़ी असंख्य रूपों में व्यक्त होने वाली मानवीय त्रासदियां।

पाब्लो नेरूदा की रचनाओं में ‘जड़ों’ का बार-बार जिक्र आया है। निहायत स्थूल रूप् में - लगातार बारिस से हमेशा गीले रहने वाले पहाड़ी जंगलों में ढहते हुए बूढ़े पेड़ों की नग्न जड़ों के रूप में। और सूक्ष्म रूप में, आत्मिक संसार में बसे देश, परंपरा और संस्कृति की जड़ों के रूप में भी। लेकिन वही नेरूदा यह कहने से भी नहीं चूकते - ‘‘मैं अपनी जड़ों से अलग हुआ/सारे विश्व का होगया’’।

मनुष्य की प्राणी सत्ता का मामला बेहद पेचीदा है। इसकी अभिव्यक्ति का कोई एक निश्चित रूप कभी नहीं हो सकता।

याद आते हैं एडवर्ड सईद भी। उनकी किताब है - Reflections on exile। अपनी धरती से उखाड़ दिये गये विस्थापितों, निर्वासितों, शरणार्थियों और प्रवासियों को ध्यान में रखते हुए वे लिखते हैं - “(they) must make do in new surroundings, and the creativity as well as sadness that can be seen in what they do is one of the experiences that still has to find its chroniclers”
(उन्हें नये परिवेश में रहना होगा और वे जो करते हैं उससे जाहिर होने वाली उनकी सर्जनात्मकता और साथ ही साथ उनकी निराशा ऐसे अनुभवों में एक है जिसके लेखाकारों की अब तक तलाश है।)

सईद नतीजा यह निकालते हैं कि न वह प्रतिरोध चल सकता है कि ‘चलो, अपनी महान पुस्तकों तक लौट चलो’ और न गैर-यूरोपीयों को गंभीरता से न लेने की मानसिकता चल सकती है। ‘यूरोप-केंद्रिकता’ की आलोचना से जुड़ी सांस्कृतिक बहस के बीच से उनके सामने ‘‘पहचान की राजनीति की दरिद्रता, मूल-तत्व की शुद्धता की निकृष्टता, अन्यों की तुलना में किसी एक परंपरा की प्रमुखता का चरम झूठ’’ स्पष्ट हुआ था। ‘पौर्वात्यवाद’ के उस प्रवर्त्तक ने साफ कहा कि संस्कृति हमेशा एक मिश्रित, बहुरूपी और कभी-कभी अन्तर्विरोधी विमर्शों की उपज होती है, पंडितों-मुल्लाओं के फतवों की मुहताज नहीं होती। हजारों फतवे भी संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते।

और भी दिलचस्प है ‘आवास प्रश्न’ में एंगेल्स की यह बात। जर्मनी में अपने घर और उसके साथ लगे बाग का भोग करने वाला मजदूर वह सब छोड़ कर जब औद्योगिक शहरों की ओर दौड़ता है तो एंगेल्स कहते हैं - ‘‘मकान और बाग का भोग अब आवागमन की पूर्ण स्वतंत्रता के भोग के मुकाबले कहीं कम मूल्य का होगया।’’

अभी चंद रोज पहले, पिछले जनवरी महीने की घटना है। पश्चिम बंगाल में बोलपुर के निकट के एक आदिवासी गांव में 20 साल की आदिवासी युवती का सामूहिक बलात्कार किया गया। गांव के आदिवासी मुखिया ने सामूहिक बलात्कार का यह दंड सुनाया था, ऊपर से 50 हजार रुपये का हर्जाना और। लड़की का दोष यह था कि वह काम के लिये शहर गई थी, एक लड़के से दोस्ती की थी और शहर से एक टेलिविजन लाकर उसपर गाने सुना करती थी।

क्या कहेंगे बंदर से आदमी बनने की इन कभी न खत्म होने वाली दास्तानों को ? क्या आदमी की प्राणी-सत्ता की ही चिरंतन त्रासदियां नहीं !

https://www.facebook.com/notes/uday-prakash/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4/642304319150299






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