बुधवार, 12 अप्रैल 2017

घायल हाथों के रिसते लहू से लिखी गई कविता

(डा. सुलक्षणा दत्ता के कविता संकलन 'भोडल भरी चुनरियां' की एक समीक्षा)

-अरुण माहेश्वरी



फैज साहब ने लिखा था -

मता-ए-लौह-ओ-कलम छिन गयी तो क्या गम है
कि खून-ए-दिल में डुबो ली है उंगलिया मैंने

लेकिन जब कवि से किसी ने कुछ छीना न हो, बस उसकी दवात खाली हो, फिर भी लिखना हो ! यह तभी संभव है जब उसकेे हाथ जख्मी हो और उन जख्मों से खून रिस रहा हो !

अब सोचिये, रीती दवात लिये बैठे कवि के जख्मी हाथों के रिसते लहू से जब कवि लिख रहा हो तो उसमें यह संशय तो रहेगा ही कि ऐसे कलाम का क्या होगा। कैसे ग्रहण किया जायेगा इसे !

‘‘क्या जाने यह कलाम/दुनिया को भाये.../न भाये...।’’

इसी प्रकार, हमेशा तीन बिंदुओं से किसी अनंत की दिशा में खुलने वाले वाक्यों में लिखी गई ‘होने, न होने’ के अस्तित्वीय भाव बोध की कविताओं के डा.सुलक्षणा दत्ता के इस संकलन का शीर्षक है -‘भोडल भरी चुनरिया’। इस संकलन की पहली कविता का शीर्षक। लेकिन कहा जा सकता है  - कवि की पूरी भाव-भूमि को परिभाषित करने वाली कविता और उसका शीर्षक।

भोडल अर्थात अबरख का चूरा, चमकी।  चांदी (रजत) और सीप (शुक्ति) की बहुचर्चित भ्रांति का ही एक प्रमुख तत्व जिसके असंख्य आयामों के विवेचन पर हजारों सालों की भारतीय दर्शनशास्त्रीय चर्चा, यहां तक की ब्रह्म चर्चा भी टिकी हुई है।

ध्यान देने की बात यह है कि सीप को देख कर चांदी की भ्रांति तभी होती है, जब हम जानते हंै कि चांदी भी इस दुनिया में मौजूद है, उसका भी अपना एक संपूर्ण सत्य है। अर्थात भ्रांति का इंद्रियातीत अनुभव चांदी के ठोस इंिद्रयगम्य रूप से ही मन में अवभासित होता है। कवि को भोडल की तारो समान टिमटिमाती चमक ललचाती है, वह उस झिलमिल को बड़ी आस के साथ ओढ़ लेती है, लेकिन है तो वह भोडल ही !

‘‘यह क्या...!
सब भोडल था...!
चिपक गया जो चूनर पर उसकी...!
अब वो भी चमकती है...
छूट नहीं पाती...’’

यही है वेदांतियों की माया की ‘अनादि भ्रांति’, जिसे लाख कोशिश करके भी हम अपने शरीर से अलग नहीं कर पाते हैं। इसे ही सत्य मान कर अन्य सभी मनुष्यों की तरह मन के सुख-दुख की छोटी-बड़ी अनुभूतियां ही अब कवि की नियति है।

‘चूनर है.../उतारे कैसे...???

धर्मशास्त्रीय दार्शनिक विमर्श की यह एक मूलभूत मान्यता है कि जिसने धर्म तत्व का साक्षात्कार कर लिया ऐसे ऋषिगण नित्य-प्रतिदिन इंद्रियातीत सूक्ष्मवाक् का दर्शन करते हैं और उसे अन्यों के लिये इन्द्रियगम्य बनाने के लिये वेद, वेदांग की रचना करते हैं। इसीप्रकार, कवि कर्म के बारे में भी कहते हैं - स्थूल जीवनानुभवों से इन्हीं अतिन्द्रिय सूक्ष्म वाक्ों का निरूपण करके अन्यों के लिये बोधगम्य बनाना।

सुलक्षणा जी के इस संकलन की शुरू की कुछ कविताओं को पढ़ते हुए ही पता नहीं क्यों हम जैसे शास्त्र-विरोधी के मन में इस दार्शनिक चर्चा की बातें थपेड़े मारने लगी। इस संकलन के प्रारंभ में अपने ‘दो शब्द’ में उन्होंने ‘ब्रह्मलीनता’ की चर्चा भी की है। और, कहते हैं कि ब्रह्म प्राप्ति अहम् कीर्तन से ही होती है। लेकिन यह अहम् कीर्तन इस संकलन में कैसी-कैसी सूरत लेता है, इस जिज्ञासा के साथ हमने इस संकलन की कविताओं को पढ़ना शुरू किया और सचमुच पूरी तल्लीनता से एक के बाद एक पढ़ता चला गया। आइये, यहां हम थोड़ा उसी क्रम में इन कविताओं की चर्चा कर लेते हैं:

संकलन की दूसरी कविता है - ‘बदल कर’। करवट बदलना यहां जीवन की सुंदरता को कायम रखने के प्रण के व्यतीत हो जाने के दंश की तरह है।

‘‘बदल कर/करवट बार बार.../किया करी मै.../इकट्ठा.../यादों के खलिहान में/ मोतियों की फसल.../वादा था.../किसी दिन किया.../नहीं कटेगी ये जमीं/बस्तियां नहीं बसेगी.../फूल महका करेंगे.../लोग देखा करेंगे दूर से/भीतर की इजाजत नहीं होगी...।’’

तीसरी कविता: ‘नाम तुम्हारा’। लेखिका नाम कीर्तन से मुक्ति की तलाश में है, लेकिन मुक्ति है कहां ? कविता खत्म होती है - ‘‘ये जख्मी पहला हर्फ ही/पहरों रुलाता है...।’’

इसके बाद की कविता अपने में एक अनोखा आर्त बिंब है - ‘हरी दूब पे’। हरी दूब पर रात भर की ओस में घुल गये इंद्रधनुषी तितली के सारे रंग, और मिला क्या ! एक ढर्रेवर कर्मकांडी जिंदगी - तुलसी विवाह, मंगल गान, विदाई की रुलाई और मंडप की घेरेबंदी।
आगे की जिंदगी गिलहरी के सख्त पंजों के नीचे हौले-हौले कुतर कर मृत्यु के आनंद की प्राप्ति तक के लिये छोड़ दी जाती है। अग्नि को सुपुर्द हो जल में समर्पित हो जाने के लिये !  (देखें ‘गिलहरियों सा’, और ‘नश्वर’ कविताएं)

कह सकते हैं, इस प्रकार शुरू की छः कविताओं से जैसे जीवन का एक चक्र पूरा पूरा हो जाता है।

आगे की कविताएं इस अनादि भ्रांति से ग्रसित जीवन में रह-रह कर उभरने वाली छायाओं के, अर्थात मायामय दुनिया के छोटे-छोटे बिंबों की कविताएं है। इसी में जब अंतर के कीर्तन से बाहर के किसी अन्य का अवभास होता है, अनायास ही कवि में संघर्ष और भविष्य की आशा का भाव जाग उठता है -

‘‘इस एक को आस है
पतझर से लड़ेगा...
सूखे शज़र को फिर से
हरा करेगा...
जीत जायेगा देखना
जो जानता है लड़ना हालात से
उसके अक्सर हालात बदल जाते हैं...। ’’ (‘जो जानता है लड़ना’)

कवि भले अपने अंतर में कामना-मुक्त हो, सत्यदर्शी बन कर कर्म की जरूरत से आजाद हो गया हो, लेकिन उसके बाहर की दुनिया तो अलग है ! यह कर्मठ लोगों की दुनिया है। और कवि की सकारात्मकता इस स्वीकृति में है कि -लड़ने वाला जीतेगा।

निष्पृह जीवन की अब तक की इस पूरी भाव भूमि से बिल्कुल असंगत अचानक एक कविता आती है - ‘लोग अपने’। जिसके अंत में कला को परिभाषित करते हुए एक सस्ता जुमला आया है -

‘‘कला वह...
जिसे देखते ही...
वाह...!
निकल जाए...!’’

इस कविता में वाक्यों के खत्म न होने को बताने वाली तीन बिन्दियां हमें कवि के बच निकलने की पतली गली की तरह लगते हैं, उनकी अब तक की निबिड़ आत्मिकता की रक्षा के प्रयास की तरह, लेकिन हमारी दृष्टि में - वह एक व्यर्थ प्रयास ही है !

‘सूरज का लालटेन’। अर्थात अखिल ब्रह्मांड का लालटेन। ‘दूधिया चांदनी में डुबा डुबा अंगुलियों से बनाई गई बत्तियों’ की लौ से दमकता लालटेन। कवि की एक ही तत्व-चिंता है - ‘‘वह कौन जो जलाता है.../लालटेन...!!!’’

एक कविता है - ‘अपनी यादों की’। लेखक तो लिख कर मुक्त हो जाता है, लेकिन पीछे छोड़ जाता है पाठकों के जी का अंतहीन जंजाल। कवि के शब्दों में -

‘‘अपनी यादों की
मिर्च...
झोंक कर आँखों में
किसी की...
गुम हो गया कोई...
जिंदगी के बीहड़ में...!
बस दर्द भरी चीखें...
ही हैं...
उसके पीछे...!!’’

लेकिन यहां गौर करने की चीज है - ‘यादों की मिर्च’। ब्रह्मज्ञानी लेखक मान कर चलता है कि उसकी स्मृतियां, उसके अनुभव कोरा धोखा है, और उन्हंे ही मिर्च की तरह पाठक की आंख में झोंक कर वह खुद निभ्र्रान्त हो जाता है और अपनी मूल दिशा पकड़ कर फिर सत्य से विमुख भी !

‘कुछ तारे उग आये’। यहां भी अंतर का ही आकाश है जिसमें स्फुर्लिंग की तरह कुछ तारे आस-पास चमकते जरूर रहते हैं, लेकिन असली उजास, चंद्रमा का उजास तो आत्मप्रकाश है।

‘‘तुम झांको तो चाँदनी फैले...’’।

‘नाम तुम्हारा’ कविता का ही एक नया अवतार है - ‘चाहती तो हूँ’। यहां भी एक प्रकार से नामोच्चार से मुक्ति की बात है, लेकिन थोड़े भिन्न रूप में। इसमें एक और, मुक्ति की कोशिश के साथ अपनी मासूम कैद की अनुभूति भी जुड़ जाती है। मुक्ति यहां कैद बन कर आती है, खुद की ही नहीं, कवि के ईश्वर की भी। इसे इस रूप में भी पढ़ा जा सकता है कि चाहती तो हूँ तुम्हारा नाम अपने से बाहर कर दूँ, लेकिन कहां हो पाता है ! खुद को ही दिलासा देते हुए अपने ईश्वर से पूछती है, खैर

‘‘खुश तो हो तुम...??/मासूम की कैद में...???’’

‘एक रीती दवात लिए’ का जिक्र तो हम बिल्कुल शुरू में ही कर चुके हैं। जगत को मिथ्या मान लेने से खाली हुई दवात को लेकर क्यों कोई किसी कर्म की दिशा में कदम बढ़ायेगा। कर्म का आधार तो कामना है। कर्म मार्ग को त्याग कर, निष्काम वीतराग होकर ही कोई सत्य के संधान अर्थात ब्रह्म को जानने की ओर बढ़ सकता है ! तब भी यदि लिखने की कोई मजबूरी है तो यह निश्चय है कि कहीं न कहीं कोई जख्म है, रिसता हुआ जख्म जिसका खून रीती दवात में स्याही की कमी को पूरा कर देता है। फैज साहब तो जानते हैं कि उनके पास तो कामनाओं से लबरेज दिल है, जिसमें अंगुलियों को डुबों कर वे सफे दर सफे लिखते चले जायेंगे। लेकिन किसी कामना-विहीन का लिखना बहुत ही दुष्कर काम है, फिर भी जब वह लिख रही है तो जाहिर है कि माया-मुक्त नहीं हुई है। कहना न होगा, लेखिका का यही वह आत्म-संघर्ष है जो इन कविताओं में व्यक्त हुआ है।

ऐसी ही तमाम गहन जिज्ञासाओं और महीन अहसासों से भरे अंतरमन की अंतरग छवियों की 85 कविताओं के इस संकलन को पढ़ना मेरे लिये एक ताजगी भरा सुखद संयोग ही रहा। शायद इसकी ताजगी की एक प्रमुख वजह यह भी हो सकती है कि कवयित्री का हिंदी के अध्यापन जगत से कोई नाता नही है !

कवयित्री से मेरा कभी कोई परिचय नहीं रहा है। बीकानेर की होने पर भी किसी से उनका नाम नहीं सुना। वे हमारी फेसबुक मित्र हैं और अनायास ही उन्होंने मुझे कुछ दिनों पहले अपने दो संकलन भेज दिये थे। सामने पड़ी किताबों को उलट-पुलट कर देख लेने के क्रम में ही कविताओं ने, बल्कि कवयित्री की समग्र जीवन दृष्टि के अनुमान ने मुझे खींच लिया, और एक के बाद एक कविता पढ़ता चला गया। और, इसीप्रकार एक रौ में, तत्काल, पता नहीं इसपर क्या कुछ लिख मारा !

कवयित्री अपनी एक कविता में चाहती है कि पाठक उनकी इस किताब के सफों को हौले से पलटे, क्योंकि ‘नाजुक जज़्बात है ठेस न लगने पाए...।’ सच बात यह है कि ऐसी नाजुकता तो हमें ‘70 के जमाने की फिल्मों की रूमानियत जैसी लगती है। इसीलिये मुमकिन है कि हम उनकी कविताओं के साथ कवयित्री के मनोनुकूल न्याय न कर पाये हो। लेकिन, जो हमें बेहद प्रिय है, वह है आदमी के मनोविज्ञान की पर्तों को टटोलना। उसकी निर्मलता का अपना आकर्षण होता है। बस ऐसी ही कुछ पते-बेपते की बातों के बल हमने सुलक्षणा जी की इन कविताओं के साथ आज का पूरा दिन व्यतीत किया। अपने प्रकार की इन अनोखी कविताओं के लिये वे सचमुच बधाई की पात्र हैं।

(डा. सुलक्षणा दत्ता ; भोडल भरी चुनरिया (कविता संकलन); बोधि प्रकाशन, जयपुर, 2014, मूल्य: 70.00; पृष्ठ संख्या: 104)

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