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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

पूरा भारत एक भ्रातृघाती रणक्षेत्र का रूप लेने लगा है

अरुण माहेश्वरी



ऊपर एक तस्वीर है श्रीनगर की आज तक वहाँ पर ऐसा दृश्य शायद पहली बार ही देखने को मिला होगा स्कूल की छात्राएँ झुंड के झुंड सुरक्षा बलों के लोगों पर पत्थर फेंक रही है  

अभी के सेनाध्यक्ष रावत पहले ही कह चुके हैं कि वे भी ईंट का जवाब पत्थर से, अर्थात कश्मीर में पूरे प्रतिशोध के भाव से काम करेंगे  

पूरी कश्मीर घाटी क्रमश: एक रणक्षेत्र में बदल रही है  

दूसरी तस्वीर है छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के सुकमा क्षेत्र की वहाँ नक्सलपंथियों ने घात लगा कर फिर एक बार सीआरपीएफ़ के 26 सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया काफी समय से यह इलाक़ा भी रणक्षेत्र बना हुआ है। 

तीसरी ओर पूरे देश में गाय की रक्षा के नाम पर कई साधु-साध्वियाँ और गोरक्षक (गोगुंडे) हुंकारें भर रहे हैं, उससे पूरा राष्ट्र अभी रण-ध्वनियों से गूँजने लगा हैं देश के विभिन्न शहरों में भाजपा और संघ के लोग किसी भी पर्व-त्यौहार के बहाने तलवारें चमकाते हुए बड़े-बड़े जुलूस निकाल रहे हैं  

आज याद रही है, 2014 के मई महीने में मोदी जी की जीत के ठीक बाद लिखे अपने लेख की 'भाजपा की अभूतपूर्व जीत : एक नये युग का सूत्रपात' के शीर्षक से 17 मई 2014 के दिन अपने ब्लाग पर हमने लिखा था

"भाजपा को संसद में अकेले पूर्ण बहुमत और एनडीए को तीन सौ छत्तीस सीटें मिलना निस्संदेह एक ऐतिहासिक घटना है। इसे कुछ मायनों में भारतीय राजनीति के एक नये युग का प्रारंभ भी कहा जा सकता है। मनमोहन सिंह ने नव-उदारवादी नीतियों के तहत भारत के आधुनिकीकरण का एक पूरा ब्लूप्रिंट तैयार किया था और अपनी शक्ति भर वे उसपर अमल भी कर रहे थे। लेकिन यह काम टुकड़ों-टुकड़ों में हो रहा था। खुद भाजपा और दूसरी कई पार्टियों के रुख के चलते उसे लगातार संसदीय अवरोधों का सामना करना पड़ता था। फलत:, सरकार में एक प्रकार की प्रकट नीतिगत पंगुता दिखाई देने लगी थी। 

"अब, संसद के पूरी तरह से बदल चुके गणित में उस ब्लूप्रिंट पर ही बिना किसी बाधा के पूरी ताकत के साथ अमल करना संभव होगा। यही मोदी का गुजरात मॉडल भी है। इसका असर अभी से दिखाई देने लगा है।
"सेंसेक्स अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है, रुपये की कीमत भी बढ़ रही है। विदेशी निवेशक स्पष्ट तौर पर भारत में अब राजनीतिक-आर्थिक स्थिरता देखेंगे और इसीलिये भारत को निवेश की दृष्टि से एक पसंदीदा गंतव्य के तौर पर माना जायेगा। निवेश बढ़ेगा तो आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ेगी, शहरों की चमक बढ़ेगी, थोक-खुदरा सब प्रकार के व्यापार में विदेशी पूंजी के निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा और बाजारों का रूप बदलेगा। चीन में लगातार तीन दशकों के सुधारवाद के बाद अब क्रमश: जिसप्रकार उत्पादन खर्च में कमी का लाभ सिकुड़ता जा रहा है, ऐसी स्थिति में पश्चिमी निवेशकों को भारत विनिर्माण के क्षेत्र में भी एक नये और सस्ते विकल्प के रूप में उपलब्ध होगा। भूमि कानून में संशोधनों के जरिये भूमि के विकास के रास्ते की बाधाएं कम होगी, शहरीकरण की प्रक्रिया को सीधे बल मिलेगा। 

"संसद में भाजपा के पूर्ण बहुमत के कारण एक सकारात्मक संभावना यह भी है कि एक बार के लिये प्रत्यक्ष राजनीतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, जिसने पिछले दिनों इतना विकराल रूप ले लिया था कि नेता का अर्थ ही अनैतिक और भ्रष्ट व्यक्ति माना जाने लगा था। 

"कहने का तात्पर्य यह है कि अब नव-उदारवादी नीतियों के पूरी तरह से खुल कर खेलने का नया दौर शुरू होगा। इसमें आम जनता को खैरात के तौर पर दी जाने वाली तमाम राहतों में कटौती होगी। सरकार नहीं, हर किसी को खुद अपनी सुध लेनी होगी। बलशाली का अस्तित्व रहेगा और निर्बल रहेगा भाग्य-भरोसे। 

"यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्टों में नव-उदारतावाद की नीतियों के तहत होने वाले इस चकदक विकास कोरोजगार-विहीन, वाणी विहीन, जड़-विहीन, निष्ठुर विकास’ (jobless, voiceless, rootless, ruthless) बताया जाता है। यह आज के अत्याधुनिक तकनीकी युग की बीमारी का परिणाम है। न्यूनतम श्रम-शक्ति के प्रयोग से अधिकतम उत्पादन की संभावनाओं का सामाजिक परिणाम। एक शक्तिशाली राजसत्ता की दमन की बेइंतहा ताकत का परिणाम। विदेशी निवेशकों द्वारा आरोपित नीतियों का परिणाम। पूंजी के हितों से जुड़ी मानवीय संवेदनशून्यता का परिणाम। 

"यह भावी तस्वीर का एक पहलू है। दूसरा पहलू, आरएसएस से जुड़ा हुआ पहलू है। अब पहली बार आरएसएस वास्तव में भारत की राजसत्ता पर पहुंचा है। भारतीय समाज के बारे में उसका अपना एक अलग कार्यक्रम है जिसे वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर चलाता है। हिंदुत्व का कार्यक्रम, हिंदू राष्ट्र के निर्माण का कार्यक्रम। यह भारत के वर्तमान धर्म-निरपेक्ष संविधान को बदल कर उसकी जगह धर्म-आधारित राज्य के निर्माण का कार्यक्रम है। यह सन् 2002 के गुजरात वाला कार्यक्रम है। आज मोदी भारत के संविधान के प्रति निष्ठा की कितनी भी बातें क्यों कहें, आरएसएस का प्रचारक होने के नाते वे भी आरएसएस के इस कार्यक्रम से प्रतिबद्ध है। 

"नव-उदारवाद के आर्थिक कार्यक्रम को छोड़ कर मोदी यदि आरएसएस के कार्यक्रम पर अमल की दिशा में बढ़ते हैं, तो ऊपर हमने आर्थिक क्षेत्र के संदर्भ में जो तमाम बातें कही है, उनके बिल्कुल विपरीत दिशा में परिस्थितियों के मुड़ जाने में थोड़ा भी समय नहीं लगेगा। वह भारतीय समाज को फिर से कबिलाई समाज की ओर लेजाने का रास्ता होगा। उसकी अंतिम परिणति कुछ वैसी ही होगी, जैसी हिटलर और मुसोलिनी ने जर्मनी और इटली की कर दी थी। हाल के लिये, हम यह उम्मीद करते हैं कि मोदी सरकार इस आत्मघाती पथ की दिशा में कदम नहीं बढ़ायेगी।


"इसीलिये हम इन चुनाव परिणामों को भारत के आधुनिकीकरण की दिशा में एक स्पष्ट और दृढ़ दक्षिणपंथी मोड़ के रूप में देख पा रहे हैं। आने वाले भारत में यही वे नयी परिस्थितियां होगी, जिसके अन्तर्विरोधों पर आगे की राजनीति की सीमाएं और संभावनाएं तय होगी।"

अब किसी को भी यह समझने में चूक नहीं होनी चाहिए कि मोदी सरकार ने अंतत: आरएसएस का रास्ता पकड़ लिया है वे अपने पीछे एक किस प्रकार के विध्वस्त और युद्धरत भारत को छोड़ कर जायेंगे, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है