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सोमवार, 15 मई 2017

कार्ल मार्क्स : जिसके पास अपनी एक किताब है (11)

-अरुण माहेश्वरी

‘‘बर्लिन में कोई भी कला-कृति जेनी जितनी सुंदर नहीं है ।’’

कार्ल 1836 की गर्मियों में बर्लिन विश्वविद्यालय में गये। इसके पहले ही वे जेनी फॉन वेस्टफालेन के प्रेम में पड़ गये थे। लेकिन प्रेम में पड़ना ही तो इस दुनिया में काफी नहीं होता है। व्यवस्था का अर्थ ही है हर तूफान पर अंकुश लगाना, फिर वह प्रेम का झंझा ही क्यों न हो। जेनी मार्क्स से चार साल बड़ी थी और उसके पिता लुडविग कितने ही उदार क्यों न हो, शादी-विवाह के मामले में सिर्फ प्रेम को ही काफी नहीं मानते थे। उन्हें मार्क्स के बेलल्लापन से शिकायत थी। वे उनके खिलंदड़ेपन से भी नाराज थे। अभी मार्क्स की उम्र ही क्या हुई थी कि उनमें कोई वैसी हिसाबी-किताबी वाली परिपक्वता दिखाई देती ! लेकिन मार्क्स के पिता गर्वित थे कि जेनी की तरह की लड़की उनके बेटे मार्क्स के लिये कोई भी त्याग के लिये तैयार थी। इसमें वे अपने बेटे के आकर्षक चरित्र की जीत देख रहे थे। ( देखें, फ्रेंज मेहरिंग, पूर्वोक्त, पृष्ठ 5-6)

बहरहाल, कार्ल और उनके पिता के बीच कार्ल के बाॅन और बर्लिन प्रवास में काफी पत्राचार हुआ था। इन पत्रों की पंक्तियों के बीच से बड़ी आसानी से भावी मार्क्स के लक्षणों को देखा जा सकता है। हेनरिख की उनसे बराबर शिकायत रही कि वह बहुत निष्ठुर है। 8 नवंबर 1835 के एक पत्र में वे लिखते हैं: ‘‘तुमको गये तीन हफ्ते बीत गये है, और तुम्हारा कोई पता ही नहीं है ! तुम अपनी मां को जानते हो, वह कितनी व्यग्र रहती है, फिर भी तुम इस कदर बेइंतहा लापरवाही दिखाते हो ! दुर्भाग्य से तुम्हारे अनेक गुणों के बावजूद तुम्हारे बारे में मेरी इस राय की ही जोरदार पुष्टि करता है कि तुम्हारे हृदय में अहंवाद प्रमुख है।’’(देखें, MECW, Vol.1, page, 645)। हेनरिख ने और भी कई पत्रों में बेटे से अपनी इस शिकायत को दोहराया है।

लेकिन बाप बेटे के बीच संपर्कों का असली रूप क्या था, इसे कार्ल मार्क्स के पिता के नाम 10 नवंबर 1837 के इस लंबे पत्र से बहुत अच्छी तरह देखा जा सकता है। यह पत्र उन्होंने बर्लिन से ही लिखा था। यह पत्र एक प्रेमी के साथ ही उत्कट बौद्धिक और विचारक के रूप में मार्क्स के अंदर पनप रहे बीज के भी भरपूर संकेत देता है। इससे पता चलता है कि बर्लिन में रहते हुए कैसे इस कवि हृदय में किसी आत्मवादी भाववाद की तुलना में यथार्थ को देखने की हेगेल के द्वंद्वमूलक दृष्टिकोण के बीज ने जड़े पकड़ना शुरू कर दिया था। वे बर्लिन में उन नौजवान हेगेलपंथियों की कतार में शामिल नहीं हुए थे जो हेगेल के दर्शन से नास्तिकतावाद और क्रांतिकारी राजनीतिक सिद्धांत खोज रहे थे। उन्होंने हेगेल को अपने खुद के परवर्ती दर्शनशास्त्रीय रास्ते के औजार के रूप में अपनाया था।

पिता के नाम अपने इस पत्र का प्रारंभ कार्ल इन शब्दों से करते हैं - ‘‘ हर किसी के जीवन में कुछ ऐसे क्षण होते है जब सीमा की अग्रिम चौकी की तरह एक काल के पूरा होने के साथ ही साफ तौर पर एक नई दिशा को सूचित करते हैं।

‘‘संक्रमण के ऐसे क्षण में हम अपनी स्थिति को जानने के लिये अतीत और वर्तमान को चिंतन की चील की विहंगम दृष्टि से देखने के लिये मजबूर हो जाते हैं। दरअसल, विश्व इतिहास इसी प्रकार खुद को पीछे मुड़ कर देखता है और परखता है, जिसमें अक्सर प्श्चगामिता या गतिरोध का आभास होता है, जबकि यह सिर्फ एक प्रकार से आराम कुर्सी पर बैठ कर खुद को समझने और अपनी खुद की दिमागी हलचलों को आत्मसात करने की तरह होता है।’’

मार्क्स इसमें आगे लिखते हैं, ‘‘ ऐसे ही क्षण में आदमी गुनगुनाने लगता है, उसका प्रत्येक कायांतर अंशतः किसी शायर की गजल की तरह, अंशत किसी बड़ी नई शायरी के प्रारंभ की तरह होता है, जो अभी भी आपस में घुल रहे रंगों में से कोई सुंदर आकृति बनाने का उपक्रम होती है। ...जो भी आपत्तिजनक और गलत है, उसे वास्तविक स्थिति की एक निश्चित जरूरत की अभिव्यक्ति मान लेने से अधिक संशोधन और मुक्ति क्या हो सकता है ?

‘‘...मैंने जब आपको छोड़ा था, मेरे लिये एक नई दुनिया, प्रेम की दुनिया खुल गई थी जो दरअसल शुरू में एक एक तीव्र कामना और हताश प्यार की भांति थी।’’

इसी में कार्ल आगे कहते हैं कि वे बर्लिन में आकर बहुत उत्साहित नहीं थे, ‘‘क्योंकि यहां की चट्टानें हमारी आत्मा की भावनाओं से ज्यादा खुरदुरी नहीं थी।’’ इसी में आगे यह पंक्ति आती है, बर्लिन की ‘‘कोई भी कलाकृति जेनी जितनी सुंदर नहीं थी।’’

‘‘ऐसे में मेरे सबसे पहले विषय के रूप में गीत का होना स्वाभाविक था, मेरा सबसे प्रिय और तात्कालिक विषय।...मेरा स्वर्ग, मेरी कला, वैसे ही मेरे से दूर की दुनिया हो गये जितना दूर मेरा प्यार था। हर यथार्थ चीज धुंधली हो गई और जो धंुधली थी, उनकी कोई रेखा ही नहीं रही। मैंने जेनी को कविताओं के जो पहले तीन खंड भेजे हैं, उनमें हमारे समय की अनुभूतियां छितरी हुई और असंगत रूप में व्यक्त हुई है।’’ (MECW, Vol.1, page, 10-12)

क्रमशः