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मंगलवार, 23 मई 2017

वैश्वीकरण की गुत्थी और बुद्धिजीवी


-अरुण माहेश्वरी 

पूँजीवादी वैश्वीकरण का विकल्प है सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद इन भेदों में जो अभेद है वह है -अन्तरराष्ट्रीयतावाद वसुधैवकुटुंबकम  

तमाम द्वंद्वों का लक्ष्य है विकास वर्गों के बीच द्वंद्व (वर्ग संघर्षही समाजवाद से साम्यवाद का रास्ता खोलता है बिना समाजवाद और साम्यवाद के अभेद तत्व के वर्ग-संघर्ष में सक्रिय भेदों का कोई अर्थ नहीं है शैव दर्शन में स्वातंत्र्य को ऐसे परम अभेद तत्व के रूप में चिन्हित किया गया था हेगेल ने भी इतिहास की गति का मूल लक्ष्य स्वातंत्र्य (freedom) को माना इसे मनुष्य मात्र से लेकर राष्ट्रों और समूचे ब्रह्मांड के आत्म-विस्तार का परम तत्व कहा जा सकता है, जो भेद-भेदाभेद-अभेद की निरंतर क्रियाओं के ज़रिये विस्तार और विकास के एक अनवरत क्रम को सूचित करता है  

ऐसे में क्या विस्तार के बजाय संकुचन, अन्तरराष्ट्रीयतावाद के बजाय राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयतावाद के बजाय संप्रदायवाद या क्षेत्रीयतावाद या जातिवाद या सामाजिकता के बजाय वयक्तिवाद कभी कोई प्रगतिशील चयन हो सकता है - हमारी समझ के परे है  !

इसीलिये वैश्वीकरण मात्र का विरोध भी हमें कभी समझ में नहीं आता पूँजीवादी वैश्वीकरण और उसके नीतिगत स्वरूप नव-उदारवाद के बरक्स जनता का जनवाद, समाजवाद से लेकर सर्वहारा का अन्तराराष्ट्रीतावाद एक अलग रास्ते का संधान देता है लेकिन पूँजीवादी वैश्वीकरण का प्रत्युत्तर आक्रामक राष्ट्रवाद नहीं है, बल्कि यह उसी का एक किंचित भिन्न विकृत रूप है आक्रामक राष्ट्रवाद विस्तारवादी मंसूबों से जुड़ कर नाज़ीवाद का, अर्थात पूँजीवाद का सबसे बर्बर रूप ले लेता है  

आज सवाल नव-उदारवाद के नाना स्थानीय प्रतिरूपों से लड़ने का है  और यह लड़ाई गुलामी और शोषण के खिलाफ मनुष्यों के साझा संघर्षों की लंबी परंपरा से ही लड़ी जा सकती है और इन्हीं स्थानीय संघर्षों से क्रमश: उसी प्रकार वैश्विक विकल्प के निर्माण की जमीन तैयार होगी, जिसे लेनिन ने 'एक देश में समाजवाद' के अपने सिद्धांत में देखा था इसी तर्क पर हमारे देश में सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ लड़ाई को भी सीधे तौर पर नव-उदारवाद के खिलाफ लड़ाई से जोड़ कर देखा-समझा जा सकता है संघर्षों के अलग-अलग चरणों को गड्ड-मड्ड करना ही दार्शनिक भाववाद अर्थात शुद्ध अद्वैतवाद है भेदों के बाद भेदाभेद के मध्यवर्ती क्रम के बिना किसी अभेद की दिशा में यात्रा संभव नहीं है यह भेदाभेद ही एक प्रकार से सदा परिवर्तनशील सनातन सामाजिक यथार्थ का सच है, जिसमें अभेद हमेशा अप्राप्य ही रहता है

आज के 'टेलिग्राफ़' में बुद्धिजीवियों के अलगाव पर प्रभात पटनायक के लेख ' A growing chasm - The disconnect of the intellectuals' में  जिस प्रकार नव-उदारवाद या वैश्वीकरण के प्रति बुद्धिजीवियों के दृ्ष्टिकोण को सारी समस्या के मूल में रखा गया है, वह हमें एक प्रकार के भाववादी चिंतन से पूरी तरह दूषित लगता है आज के अध्यापकों की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव को इसमें जिस प्रकार पेश किया गया है, उसमें ऊपरी तौर पर एक सचाई नज़र आने पर भी गहराई में जाने से हम यह सवाल करने के लिये मजबूर होते हैं कि कौन सा ऐसा युग रहा है जब बौद्धिकों के एक बड़े तबके ने शासक वर्गों की सेवा नहीं की है ? आज भी यदि वैसा ही कुछ नज़र आता है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है

इसीलिये तो अंतोनियो ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी बुद्धिजीवी के बीच फ़र्क़ किया और जैविक बुद्धिजीवियों की एक पूरी अवधारणा पेश की  

सचाई यह है कि आज वामपंथी बुद्धिजीवियों की समस्या उनकी अपनी नहीं, वामपंथी राजनीतिक पार्टियों की समस्या है और वामपंथी राजनीतिक पार्टियों की समस्या उस भाववादी चिंतन से उत्पन्न समस्या है जिसका उदाहरण ख़ुद प्रभात पटनायक ने अपने इस लेख में पेश किया है राजनीति को समकाल से काट कर किसी परम ब्रह्म की साधना में नियोजित करने की व्यर्थ कसरत की समस्या  

हम एक बार फिर, पहले भी हमने इसे कई बार दोहराया है, कहना चाहेंगे कि नव-उदारवाद मात्र से लड़ाई हमारी वर्तमान की राजनीति का परम मानदंड कभी नहीं बन सकता इसे सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताक़तों की व्यापकतम एकता पर ही केंद्रित होना होगा यही वामपंथी बुद्धिजीवियों को भी उनके सामाजिक विलगाव से मुक्त करेगा  

हम यहाँ प्रभात पटनायक के इस लेख को मित्रों से साझा कर रहे हैं :

A growing chasm https://www.telegraphindia.com/1170524/jsp/opinion/story_153112.jsp#.WSUpmZ-vlfw.twitter