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सोमवार, 8 मई 2017

मैक्रों की जीत: यह भी एक इतिहास का न्याय है !


-अरुण माहेश्वरी


सिर्फ तीन साल हुए है, जब फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने अपने देश के नोबेल पुरस्कार से नवाजे गये अर्थशास्त्री ज्यां तिरोल  के साथ ही विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थामस पिकेटी को भी फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान से विभूषित करने का प्रस्ताव किया था, तब थामस पिकेटी ने उनके प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा था कि सरकार का काम लोगों को सम्मानित करने का नहीं है, देश के लोगों को प्रभावित करने वाली नीतियों को सुधारने का है। उन्होंने फ्रांस की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए ओलांद से कहा था हम जैसों को सम्मान देने के बजाय बेहतर होगा कि वे अर्थ-व्यवस्था पर अपना ध्यान केंद्रित करे।

आज फ्रांस में उग्र दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी ली पेन को पराजित करके जिस प्रकार मैंक्रों की जीत हुई है, वह जीत अनायास ही हमें पिकेटी की उस बात की याद दिला देती है। लगता है जैसे तब पिकेटी किसी शुद्ध अर्थ-शास्त्री की भाषा नहीं बोल रहे थे, वे फ्रांस की जनता के दिलों की बात बोल रहे थे। जनता के दिल की बात, जिसे आम तौर पर लोकप्रियतावाद कहा जाता है, वह भी कभी इतनी संतुलित और व्यवहारिक हो सकती है, मैक्रों की इस जीत ने आज सारी दुनिया के सामने जाहिर कर दिया है।

फ्रांस के इस चुनाव के बारे में एक वाक्य में कहा जा सकता है, वहां के लोगों ने ली पेन नाम की एक शैतानी शक्ति के खिलाफ मतदान किया है।

वहां के लोग परिवर्तन चाहते थे, ठीक उसी प्रकार जैसे 2013 में भारत के लोग दस साल से चली आ रही मनमोहन सिंह की सरकार का परिवर्तन चाहते थे, या ब्रिटेन के लोग भी अपने जीवन के सारे कष्टों के लिये यूरोपियन यूनियन को जिम्मेदार मान कर ब्रेक्सिट के पक्ष में मतदान किया, और अमेरिका में वहां का मजदूर वर्ग चाहता था कि कोई तो जुगत बैठे कि उनके यहां बंद हो रहे कल-कारखाने फिर से खुल जाए और उनके लिये रोजगारों की कोई कमी न रहे।

लेकिन 2013 से अब तक के तीन सालों में दुनिया के तीन गणतंत्रों में परिवर्तन की इन तीन घटनाओं में जो ताकतें सत्ता पर आ बैठी हैं, वे इसी बीच इतनी कुत्सित और जन-विरोधी साबित हुई है कि किसी भी विवेकवान व्यक्ति के लिये इस नतीजे पर पहुंचने में शायद ही कोई कठिनाई होगी कि यह तो परिवर्तन के नाम पर कूएं से निकल कर खाई में गिरना हुआ है।

इतिहास का न्याय देखिये कि मोदी, ब्रेक्सिट और ट्रम्प ने थोड़े से दिनों में ही यह साफ कर दिया है कि वैश्वीकरण तो इतिहास की एक नियति या गति का नियम है, लेकिन किसी भी वजह से इसके प्रतिरोध के बहाने किसी शैतानी शक्ति का वरण करना सीधे-सीधे आत्म-हत्या करने के समान है।

आज मैक्रों की जीत का महज उनका भाग्य कहा जा रहा है, एक चमत्कार। लेकिन इतिहास तो ऐसे चमत्कारों की श्रृंखला का ही नाम होता है। मैंक्रों कहता है, वे न दक्षिणपंथी है और न वामपंथी। अर्थनीति के बारे में उनके व्यवहारिक नजरिये की बातों से अनेक लोगों की भृकुटियां तनी हुई है। लेकिन, फ्रांस के लोगों ने जान लिया है कि जीवन की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिये जादू की छड़ी तो किसी के पास नहीं है। जो पक्ष भी ऐसी जादू की छड़ी होने की बात करता है, वह कोरा विभ्रम पैदा कर रहा होता है, धोखा दे रहा होता है।

आज के ‘टेलिग्राफ’ में न्यूयार्क टाइम्स के संवाददाता एडम नौसिटर की रिपोर्ट में इस जीत का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि जिन मतदाताओं ने मैक्रों को वोट दिया उनमें से अधिकांश मुक्त बाजार और पूंजीवाद के विरोधी लोग हैं। फिर भी उन्होंने ली पेन की बला को दूर रखने के लिये मैक्रों को चुना है। मैक्रों की किसी स्पष्ट नीति पर न चलने और एक प्रकार के टैक्नोक्रेट की तरह के उनके दृष्टिकोण से लोगों में उनके प्रति थोड़ी शंकाएं है। लेकिन अर्थ-व्यवस्था के मुद्दों पर शांत और स्थिर मन से काम करने का उनका यह नजरिया ही एक प्रकार से उनकी सबसे बड़ी ताकत भी साबित हुआ हैं।

हमें तो इस पूरी घटना और इस पर अनेकों की प्रतिक्रिया को देख कर फ्रांस में ही पिछली सदी के साठ के दशक में कैम्पस विद्रोह की उपज हर्बर्ट मार्कीज की किताब One-dimensional Man की याद भी आ रही है। औद्योगिक समाज में आदमी कैसे अपनी बहुआयामिता को गंवा कर इस या उस दल का, वाम या दक्षिण का एक परिशुद्ध गुलाम हो जाता है, वैसी ही समग्र एकायामिता का आख्यान थी वह किताब।

बहरहाल, इसे ही कहते हैं इतिहास का न्याय और इतिहास और राजनीति के तात्कालिक कार्यक्रमों के अन्तर्विरोध !

हम यहां आज के ‘टेलिग्राफ’ की इस रिपोर्ट को मित्रों के साथ साझा कर रहे हैं:


https://www.telegraphindia.com/1170509/jsp/frontpage/story_150633.jsp#.WRFHxlWGPIU