बुधवार, 28 जनवरी 2015

हिटलर के काल के और दो व्हिस्पर जोक्स :


1.एक प्रार्थना :
गूंगा बना दे भगवान
कि यातना शिविर न जाऊं
बहरा बना दे भगवान
कि रेडियो न सुन पाऊं
अंधा बना दे भगवान
कि सब अच्छा ही अच्छा लगे
गूंगा, बहरा और अंधा बना दे भगवान
कि अडोल्फ की शरण मिलें।
Dear good Lord, please make me dumb,
that I don't go to a concentration camp.
Dear good Lord please make me deaf,
that I don't tamper with the radio.
Dear good Lord please make me blind,
that I think everything is fine:
If I'm deaf and dumb and blind,
I am Adolf’s favourite child..
2.बौसेन के एक सेल में तीन कैदी बैठे थे।
एक ने दूसरे से पूछा - तुम क्यो जेल में आए?
दूसरे ने कहा - मैं हमेशा काम पर पांच मिनट पहले आता था। इसीलिये मुझे जासूस मान कर सजा दे दी गयी।
दूसरे ने पहले से पूछा - तुम कैसे आए?
पहले ने कहा - मैं हमेशा काम पर पांच मिनट लेट आता था, इसीलिये मुझ पर अन्तर्घात का आरोप लगा कर सजा दे दी गयी।
दोनों ने तीसरे से पूछा - तुम कैसे जेल में आए?
तीसरे ने कहा - मैं हमेशा ठीक वक्त पर आता था, इसीलिये उन्होंने खोज निकाला कि मेरे पास विदेशी घडि़यां हैं।
Three prisoners are sitting in the cell in Bautzen:
1. prisoner: "How come you’re in jail?"
2. prisoner: "I always came five minutes early. So I was convicted (?) of spying."
2. prisoner: "And why are you in jail?"
1. prisoner: "I always came five minutes late. So I was convicted of sabotage."
1. prisoner is turning to the third prisoner: "And now you have to tell us why you are in jail."
3. prisoner: I always came on time. So they discovered that I had West-watches."

अरविंद पानगढि़या

पत्रकार जॉन इलियट के ब्लाग Riding the Elephant में जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल के बारे में एक दिलचस्प रिपोर्ट है। तीन वयोवृद्ध सेलिब्रिटीज नोबेलजयी नायपॉल, पूर्व राष्ट्रपति कलाम और अभी-अभी अमेरिका से आए नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगढि़या के प्रति नौजवान साहित्यप्रेमियों के उत्साह की रिपोर्ट। इसमें सबसे उल्लेखनीय है पानगढि़या से जुड़ा अंश।
एक कार्यक्रम में पानगढि़या जी का सामना हुआ था जनसत्ता के संपादक ओम थानवी से। थानवी जी इकोनामिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित एक शोध प्रबंध के आधार पर बता रहे थे कि राजस्थान आज आर्थिक तौर पर खस्ता हाल है। इसे बीमारू राज्यों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
गौर करने लायक बात यह है कि पानगढि़या साहब ही अभी राजस्थान सरकार के आर्थिक सलाहकार बने हुए हैं।
ओम थानवी ने जब तथ्य दे-देकर उनकी सलाह पर चलने वाली सरकार की विफलताओं का लेखा-जोखा देना शुरू किया, पानगढि़या बुरी तरह उखड़ गये। जॉन इलियट का कहना है कि भारत के हिंदी अखबार का संपादक उनको कठघरे में खड़ा करें, यह उन्हें गंवारा नहीं था। अमेरिकी विश्वविद्यालय में हर रोज छात्रों के सवालों से बींधे जाने वाले पानगढि़या के इस प्रकार आपे से बाहर होजाने ने इलियट जैसे सब दर्शको को चौंका दिया। स्थिति तब तो चरम पर चली गयी जब पानगढि़या बहस छोड़ कर उठ खड़े हुए और ऊंची आवाज में थानवी जी को चुनौती देते हुए बोले कि आपके पास हमसे कोई अच्छा समाधान हो, तो बता दीजिये।
पानगढि़या का यह तेवर यह बताने के लिये काफी है कि नीति आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में इनके कार्यकाल में भारत पर क्या बीतने वाली है। वे भारतीय अर्थ-व्यवस्था का बंटाधार करके यह कहते हुए रुखसत करने में देर नहीं करेंगे कि उनके पास करने के लिये इसके अलावा और कुछ नहीं था। अमेरिकी पूंजीवाद के जिस पिटे हुए रास्ते को लेकर वे भारत में हाजिर हुए है, उसका इसके अलावा दूसरा और कोई हश्र नहीं होने वाला है।

ओबामा और मोदी

हंसी आती है यह सुन कर कि कितना साम्य है ओबामा और मोदी में। एक रसोइये का पोता तो दूसरा खुद चायवाला। और दोनों दुनिया के दो बड़े जनतंत्रों के प्रधान।
क्या सचमुच इनकी इस यात्रा का कोई संबंध इनकी पैदाइश के किसी मूल तत्व से है? सच तो यह है कि वे अपने मूल से जितना दूर हुए हैं, उतना ही ज्यादा राजनीति के शिखर की सीढि़यों पर चढ़े हैं।
कोई आडवाणी जी, मुरली मनोहर जोशी या सुषमा जी से ही पूछे मोदी जी की कहानी। राजनीति की बिसात पर वे किसी सीधे-सादे चायवाले से मात खाये या फिर घोड़े की तरह की अढ़ाई घर की टेढ़ी चाल चलने वाले शातिर खिलाड़ी से।
आस्थावादी इस सबको भाग्य का खेल कहेंगे। हम जैसे नास्तिक जीवन के न जाने कितने घात-प्रतिघातों, संगति और विसंगतियों की उपज।
लेकिन इन सबका रत्ती भर संबंध भी इनके किसी मूल से शायद ही होगा ! और तो और, जनतंत्र से भी शायद नहीं। अमेरिका के अब तक के जनतांत्रिक राजनीतिक इतिहास में ही कितने शासक परिवारों की परंपरा कायम हो चुकी है, हम सब जानते हैं। भारतीय जनतंत्र का भी अविभाज्य अंग है - परिवारवाद। इसमें कोई भी अपवाद सिर्फ सामान्य की ही पुष्टि करता है, सामान्य नियम नहीं होता।

सोमवार, 26 जनवरी 2015

मोदी जी की कूटनीतिक विफलताओं का चक्र पूरा होने को है


अरुण माहेश्वरी


मोदी सरकार को अभी आठ महीने पूरे हुए हैं। इसीबीच उनकी कूटनीति  विफलताओं का जैसे एक संपूर्ण वृत्त पूरा करने जा रही है।

सबसे पहले, अपनी ताजपोशी के समय ही उन्होंने पड़ौसी देशों और सार्क को छुआ था। छ: महीने बीतते न बीतते, उनका उत्साह इतने चरम पर चला गया कि नवंबर 2014 में सार्क के 18वें सम्मेलन में उन्होंने उसका दम ही निकाल दिया। अब यह कहना मुश्किल है कि सार्क का अगला सम्मेलन होगा भी या नहीं। पाकिस्तान के साथ तो बातचीत के रिश्ते भी नहीं बचे।

पड़ौसी देशों के बाद 15-16 जुलाई 2014 में ब्राजील के फोर्टालेज़ा और ब्रासीलिया में भारी जोशो-खरोश के साथ वे ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के)  सम्मेलन में गये। चारो देश के नेताओं से गलबहियों में वैसा ही उत्साह था जैसा अभी ओबामा के मामले में दिखाई दे रहा है। ब्रिक्स देशों के सुर में सुर मिलाते हुए 100 बिलियन डालर के कोष के साथ न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनबीडी) के गठन की घोषणा से आईएमएफ और वल्‍​र्ड बैंक को चुनौती दी। उसका सदर दफ्तर शंघाई में होगा और पहला अध्यक्ष भारत का। सभी क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की औपचारिकता के साथ बात खत्म होगयी।

ब्रिक्स सम्मेलन के दो महीने बाद ही सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आएं। बंगलौर गये, गुजरात गये, कुछ वाणिज्यिक संधियां की। लेकिन जब वे भारत में थे, उसी समय लद्दाख की सीमा पर भारतीय और चीनी फौज के बीच तनातनी चल रही थी। आज अब स्थिति यह है कि चीन साफ कह रहा है कि वह पाकिस्तान का दामन नहीं छोड़ सकता है। ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री के साथ शी जिनपिंग की गलबहियों से जुड़े विशेष तार टूट गये। चीन ने ओबामा की भारत यात्रा पर छींटाकशी में कोई कोताही नहीं बरती है।

अबतक की इन सारी कूटनीतिक कसरतों के शीर्ष पर आई है ओबामा की यह भारत यात्रा। इसके पहले नवंबर 2014 में ही मोदी जी अमेरिका घूम आये थे और न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर पर जो तमाशा किया, उसे याद करते हुए आज भी ओबामा अपने भाषण में हॉलिवुड के नायकों की चर्चा कर रहे थे। ओबामा की भारत यात्रा ही तो वह अंतिम मुकाम था, जहां मोदी जी के अब तक के सारे कूटनीतिक कर्मों को फलीभूत होना था। मोदी जी की कूटनीति के लिये यह कुछ ऐसी ही है, जिसे कहते हैं, अंत भला तो सब भला। अब तक अच्छा-बुरा जो भी क्यों न हुआ हो, अमेरिका अगर मान गया तो फिर भवसागर पार ही समझो। इसीलिये हर प्रोटोकोल और औपचारिकता को बालाएं ताक रख कर उन्होंने खुद अपने हाथों से ओबामा को चाय पिलाई, उन्हें नाम से पुकारा और उनसे अपनी पक्की दोस्ती की बाकायदा घोषणा भी कर दी। तथाकथित परमाणविक संधि, जिसे भूलवश भारतवासियों ने भारत-अमेरिका संबंधों की कुंजी मान लिया है,  उसपर अमल की सारी बाधाएं दूर कर दी गयी।

इन सबके बाद भी, अचरज की बात है कि यह सवाल रह गया है - आगे क्या? एक बात साफ हो चुकी है कि परमाणु ऊर्जा संयत्रों की स्थापना तो एक शुद्ध मृग-मरीचिका है। आज के पूरी तरह से बदल चुके ऊर्जा के विश्व-परिदृश्य में भला भारत की ऐसी कौन सी निजी कंपनी होगी, जो अपनी बलि चढ़ाके ऐसे भारी नुकसानदायी प्रकल्पों में अपना हाथ जलायेगी ?

रही बात, भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों को सुधारने की, तो यह सिलसिला अपने खुद के तर्कों पर ही सारी दुनिया के देशों के बीच चल रहा है और चलता रहेगा। इसके लिये शायद राष्ट्राध्यक्षों की आपस में गहरी दोस्ती की जरूरत नहीं है।

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में भी, हथियारों के उत्पादन और व्यापार को लेकर जो बातें हुई है, उनमें ऐसा नया कुछ नहीं है जो खास तौर पर भारत का ही हित साधता हो। उल्टे, भारत आने के पहले, पाकिस्तान को ओबामा ने जिस प्रकार आश्वस्त सा किया था, उस मनोभाव में किसी प्रकार के परिवर्तन के कोई आसार नहीं दिखाई दिये हैं।

इसमें ग़ौर करने लायक एक बात यह भी है कि ओबामा की भारत यात्रा की ख़बर मिलते ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत का एक तूफ़ानी दौरा (13-14 दिसंबर को) कर गये और एक झटके में रक्षा तथा ऊर्जा को लेकर वे सारे समझौते करा ले गये कि अागे ओबामा के साथ करने के लिये बहुत कुछ शेष नहीं रह गया । भारत की धरती से ओबामा का पुतिन के खिलाफ विष-वमन, उन्हें दादागिरी न करने की सलाह देना इसीलिये अकारण नहीं था ।

कुल मिला कर, आसानी से इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि इन आठ महीनों की मोदी की सारी कूटनीतिक पहलकदमियां उनकी राष्ट्रीय नीतियों की तरह ही थोथे दिखावे की ज्यादा रही है। राष्ट्रीय क्षेत्र में ऐसा दिखावा भी प्रचार माध्यमों की कृपा से कुछ दिनों तक चल जाता है, भ्रम बना रहता है, लेकिन कूटनीति के क्षेत्र में विफलताओं की गूंज तत्काल और बड़ी तेजी से सुनाई देने लगती है। इसीलिये, नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय नीतियों की अवहेलना करते हुए कूटनीतिक सफलताओं के बल पर राष्ट्रीय राजनीति में अपने महत्व को बनाये रखने की जो उल्टी चाल चली है, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को बैठा कर अकेले ही बाजी मार लेने की जो हड़बड़ी दिखाई है, उसके दुष्परिणामों को उन्हें जल्द ही भुगतना पड़ेगा।

दिल्ली के चुनाव में ओबामा उनकी रक्षा नहीं करेंगे।  












हिटलर के जमाने के व्हि्स्पर जोक्स

हिटलर के जमाने के व्हि्स्पर जोक्स। नाजी सैनिक और जासूस जानते थे, लेकिन मजे की बात है कि इन्हें रोकते नहीं थे, क्योंकि यह उनके वश में नहीं था।
आदमी बुरी से बुरी स्थिति में भी हंसना नहीं भूलता।
हिटलर के यातना शिविर में दो यहूदी कैदियों को गोली मार देने का हुक्म आया। अचानक, आखिरी समय में निर्देश हुआ कि गोली से नहीं, फांसी देकर उन्हें मारा जाएं।
दोनों कैदियों ने हंसते हुए कहा - वाह ! सालो के पास गोलियां खत्म होगयी है।

उन दिनों जर्मनी में मुट्ठी के साथ हाथ लहराते हुए हेल हिटलर कहते हुए सलाम करने का रिवाज था। जो ऐसा न करे, उसे दंड भी भुगतना पड़ सकता था।
एक बार हिटलर अपने सहयोगियों के साथ एक पागलखाने को देखने गया। वहां पर भी सभी पागल ‘हेल हिटलर, हेल हिटलर का शोर करते हुए हिटलर का अभिवादन कर रहे थे। लेकिन उनमें से एक ने ऐसा नहीं किया।
हिटलर ने उससे पूछा, तुम क्यों सलाम नहीं कर रहे हो ?
उसने कहा - सर, मैं यहा नर्स हूं, पागल नहीं हूं।


पूरा जर्मनी जब हिटलर के बूटों तले पिस रहा था, उन्हीं दिनों एक बार :
हिटलर और गोअरिंग बर्लिन के एक ऊंचे टावर पर खड़े पूरे शहर को देख रहे थे।
हिटलर कहता है - गोअरिंग, मैं इस शहर के तमाम नागरिकों को खुशी से भर देना चाहता हूंं। बोलो क्या करूं?
गोअरिंग कहता है - फ्युह्रर, अभी इस टावर से नीचे कूद जाओ।


‘‘प्रश्न -शुद्ध आर्य कौन है ?
उत्तर - वह जो हिटलर जैसा भूरे केश वाला हो, गोअरिंग की तरह छरहरा और गोयेबल्स की तरह लंबा हो।’’
सब जानते हैं न हिटलर भूरे बालो वाला था, न गोअरिंग छरहरा और गोयेबल्स तो नाटा और खोड़ा था। हिटलर के बाल काले थे और गोअरिंग थुलथुल था। नीचे के चित्र में बायें से हैं - हिटलर, गोअरिंग और गोयेबल्स ।


एक जहाज, जिसपर हिटलर, गोअरिंग और गोयेबल्स बैठे हुए थे, अचानक भयंकर समूद्री तूफान में फंस गया।
जहाज के क्रू से लोगों ने कहा, अब तो सब खत्म हो जायेगा।
क्रू के सदस्यों ने कहा - जर्मनी बच जायेगा।


‘‘गोअरिंग अपने दफ्तर में था तभी सेना के एक उत्तेजित अधिकारी ने आकर उसे बताया, पार्लियामेंट में आग लग गयी है। गोरिंग ने फौरन घड़ी देखी और कहा, ‘अरे ! इतनी जल्दी।’
27 फरवरी 1933 के दिन जर्मन पार्लियामेंट राइखस्टाग में भारी आग लगी थी। वह आग किसने लगाई, इसे आज तक कोई नहीं जानता। लेकिन उसका इल्जाम कम्युनिस्टों पर मढ़ने की कोशिश की गयी थी। आम लोग आज भी यही जानते हैं कि खुद नाजियों ने वह आग लगाई थी।






UNDERSTANDING THE GREEK COMMUNISTS


[ग्रीस के चुनाव में एक वामपंथी पार्टी सिरिजा को ऐतिहासिक विजय मिली है। वामपंथ की इस जीत से जुड़े कुछ खास पक्षों को और भी गहराई से समझने में निकोस लुंतोस का यह लेख - Undertanding the Greek Communists एक बहुत उपयोगी लेख प्रतीत होता है। इसीलिये मित्रों के साथ हम इस लेख को साझा कर रहे हैं। आगे मौका पड़ने पर इसकी रोशनी में बात को और आगे बढ़ाया जायेगा।]


Syriza is not the only left-wing party in Greece. Where did the Communist Party come from and where is it going?
by Nikos Lountos


The prospect of a Syriza victory in Sunday’s Greek election is big news, and the international left has taken notice. The attention is welcomed, but Alexis Tsipras’ electoral prowess has obscured what the real political landscape in the country is like.
After all, Syriza is not the only left-wing party in Greece, and by some measures it’s not even the largest. In organizational terms, the Communist Party of Greece (KKE) is bigger. Ignoring it, as most of the Left is content to do, means ignoring a force with important roots in the trade union movement and the longest history of all surviving Greek parties.
Communist Party representatives hold ten out of the forty-five seats on the board of Greece’s labor confederation, and in the last student union elections in 2014, its lists received 18.5 percent of the vote. Those affiliated with Syriza got only 6.5 percent.
What’s more, many of the labor struggles of the last years cannot be understood without KKE participation, and in some cases — like that of the nine-month steel worker strike in Athens — it was KKE unionists who led the struggle. Even in electoral terms, the Communist Party had the largest share of votes on the Left from the fall of the dictatorship in 1974 until Syriza’s rise in May 2012.
Proof of the general pull to the left that Greece has experienced in recent years, in the elections of May 2012, the KKE not only avoided being squeezed by Syriza’s success, but had its best performance in twenty years (8.5 percent). But things changed immediately after, in the June elections. The party won only 4.5 percent, its worst result in the modern era.
The KKE’s rhetoric is clearly to Syriza’s left. Its programs declare that capitalism cannot be reformed, and that we shouldn’t have illusions of transforming European Union institutions. In a recent speech, Dimitris Koutsoumbas, the party’s general secretary said:
KKE serves one goal: for the working class to take power so that we can live better days, with prosperity for the people. The proposals of KKE lead to this goal and follow this criterion. Not on the basis of how much the economy can take. Because this is a capitalist economy, which — under whichever management or government — produces crises, unemployment, and poverty.
This anti-capitalist discourse makes the Communist Party an easy target for those who label it a “political fossil” engaging in an out-of-touch ultra-leftism. Some — including members of its small internal opposition — attribute its recent electoral failures to this radical discourse.
The reality is that the KKE has been paying for its sectarianism more than its radicalism. The KKE not only opposes common action with other political forces on the Left, but it’s stood apart from the broader mass movement in recent years.
One of the most notorious examples of this mentality can be found in the KKE’s analysis of the “Squares’ movement,” the series of occupations and mass assemblies in squares that emerged in Greece in 2011. The Nineteenth Congress of KKE comments, “The so-called ‘movement of the outraged’ was supported, encouraged — if not even planned — by mechanisms of the ruling class, with the aim of manipulating, preventing radicalization.”
In recent analysis, party intellectuals claim that both the rise of the neo-Nazi Golden Dawn and Syriza are byproducts of the “confusion” of the movement developed in Syntagma Square. So, far from being an ultra-leftist party, in the traditional sense of the concept that describes parties that don’t recognize the need for any intermediate action but the call to revolution, the KKE is actually sketching out an unbridgeable gap between an indispensable revolution and the movement’s miserable condition today.
The level of the movement is, of course, measured by the number of votes the KKE takes in the elections. This circular argument produces a self-fulfilling prophecy: the movement cannot go forward if the party doesn’t become stronger, but the party is weak because of the movement’s low level of class consciousness.
This argumentation, in its essence, is not very far from Syriza’s claims that the moderation of its own slogans is a result of the supposedly low level of struggles.
This shouldn’t be all that surprising. After all, the two parties share a common history. The KKE was founded in 1918 as the Socialist Workers Party of Greece and took its present name in 1924. Its foundation was part of a twin birth with the General Confederation of Greek Workers (GSEE).
In a country for which the Great War started two years earlier, in 1912, with the First Balkan War, and ended four years later, in 1922, with the defeat of the Asia Minor Campaign, the antiwar movement fused with internationalist labor traditions from the recently annexed Macedonia and with inspiration from the Russian Revolution.
Pandelis Pouliopoulos, the party’s first general secretary, was removed from the leadership in 1927 for aligning with Leon Trotsky’s Left Opposition. In 1931, Nikos Zachariadis, with the support of Stalin’s Comintern, became the new leader of the party, beginning a conservative turn. An analysis of Greece as a half-feudal country served as a basis for replacing the goal of socialist revolution with that of a “bourgeois democratic” one.
In May 1936, the version of Popular Front tactics adopted by the Communists paralyzed it as the government crushed a tobacco worker revolt in Salonika and other labor insurgencies. The dictatorship imposed in August of that year almost completely destroyed the KKE.
The Communist Party, however, managed to resurrect itself and become a mass party within years, not least of all for its efforts resisting Axis occupation during World War II. Party membership rose from 15,000 in 1942 to 412,000 within two years.
Under the KKE’s leadership, the goal of national liberation was tied with the push for deep social change. But constrained by the Soviet Union, the KKE put its armed forces under Allied command in 1944, didn’t dare take power during the revolt of December 1944, and disarmed the movement two months later. When the Greek Civil War erupted in 1946, the Communists found themselves outgunned and less prepared than they would have been just a few years before.
But even after defeat in 1949, the KKE once again showed its resilience. Despite the massive repression, a new working-class movement helped the Greek Democratic Left’s (EDA, the front group of the underground KKE) electoral surge in 1958. A round of struggles in the 1960s culminated with the July Days of 1965, when successive governments imposed undemocratically by King Constantine collapsed under the pressure of mass mobilizations. EDA’s and KKE’s strategic limitations didn’t provide a way forward other than elections to a movement that wanted to challenge the whole regime.
The return of dictatorship in 1967 showed the power that the Greek ruling class still possessed. This defeat, combined with international crisis in the Communist parties, triggered by May ’68 and the Soviet response to the Prague Spring, led to the split of KKE’s Central Committee in two parts, and consequently into two parties, KKE andKKE Interior, which would later embrace Eurocommunism. It is in this second grouping that the majority of Syriza has its origins.
In the 1970s, the KKE survived as the bigger of the two parties and consolidated this position after the fall of the dictatorship. But following the trend of other Southern European countries, it couldn’t match the rise of the center-left (Pasok, the social democrats, went from 13.6 percent to 48 percent in seven years).
The KKE offered a moratorium to the first Pasok’s government in 1981, holding back any labor and student struggle against the social democrats. The party had run in the elections asking to be voted as a junior coalition partner in government. But in 1985, when Pasok made a sharp turn to austerity, the Communist Party joined the ranks of the labor movement and managed to gain from the disaffection from Pasok in the 1986 local elections, but distanced itself from the most militant sections of the working class who were launching an indefinite strike action.
The response of the two Greek Communist Parties to the new conditions was influenced by the changing global political climate in the late 1980s. Celebrating their common endorsement of the European Community and acceptance of private sector entrepreneurship, they merged into an electoral coalition (Synaspismos) that was later turned into a party. The decision to form a coalition government with New Democracy (June 1989), and some months later with both New Democracy and Pasok, led to the disappointment of hundreds of thousands of radicals.
KKE split from Synaspismos in 1992 after having already seen the majority of its youth splitting to its left, but some of the KKE’s well-known cadre and MPs remained in the more moderate formation. Meanwhile, Pasok was left almost unchallenged in the movement against the neoliberal New Democracy government. The results of the 1993 elections reflect this: Synaspismos remained out of parliament, not being able to pass the 3 percent threshold. KKE fell to a new low, 4.5 percent.
The two decades that followed present the key to explaining today’s constellation of the Left. In a way, one could talk of a Greek exception: both radical parties passed through a bumpy period of reorganization and accumulation of forces, but with a general shift to the left.
Unlike other European countries where Communist Parties were transformed into full-fledged social-democratic parties in the 1990s, in Greece this move was resisted. Greece was different, because the movement itself provided a milieu of new radicalization, forcing the left parties to compete in order to relate with it. The role of the organized presence of the anti-capitalist left in the struggles of that decade is also indispensable to understanding this process.
Throughout the 1990s, the KKE managed to rebuild its youth section and the party machine, through the consecutive rounds of school student and university occupations and through leading the movement against the war in Yugoslavia in 1999. Until the first years of the 2000s, the Communist Party leadership, even as it avoided common action with the rest of the Left, still attempted to relate with the working class breaking from PASOK, even inaugurating a coalition with Dikki, a left-wing split from Pasok that won 6.85 percent in the 1999 European elections.
But a hard isolationism took over quite quickly within the Communist Party. The tactics of calling separate demonstrations during labor strikes gave way to completely separate calls for antiwar demonstrations during the Iraq War in 2003. In effect, the KKE stood at a safe distance from the explosion of activism around the anti-war movement, allowing the Pasok-controlled union bureaucracy to assume leadership of strike actions against the war.
Isolationism was not another turn to the left. On the contrary, it was a result of an inability to combine the pressures coming from radicalizing movements with the electoralist strategy of the party. This turn had its reflection into a process of ideological re-positioning by the KKE’s leadership. A vivid example of this transformation is that after publishing the second volume of the history of the party, covering the years 1949–1968, in 2012, the central committee decided to directly rewrite the first volume of the history (1918–1949) that was published in 1991.
The rewriting is deep and iconoclastic, up to the point of recognizing that the Popular Front policy of KKE in the 40s led to the defeat of the 1944 uprising. If we don’t see this left turn as far as theory and history are concerned, through the prism of the tactics of isolationism in the real movement, the rebuff of the December 2008 uprising from KKE’s general secretary would seem an enormous contradiction.
Aleka Papariga, then general secretary of the party, said infamously that Communist Party was not supporting the events that erupted in Greece after the murder of a school student by a police office because “in the real popular revolution, not even one glass would break.” The KKE can make references to the civil war as the culmination of the class struggle in Greece — overshadowing even resistance to Nazi occupation — but reject barricades set up by school students.
All this doesn’t mean that the KKE was not part of the struggles. Communist militants and trade unionists have led strikes in a way that at some point made well-known neoliberal journalists (and their bosses) start refusing to invite KKE members to participate in TV debates, because it’s a party that “doesn’t respect the law.”
The KKE’s discourse claims that it isolates itself because the most important task is not to let the vanguard of the movement get carried away by the opportunist tendencies that shape the mass movements. The result has been that party didn’t manage to act as a home for the radicalized layers coming from two sides: the youth that could not see themselves in a revolution with no glasses broken, and other workers disillusioned from voting Pasok after 2011 and the introduction of the austerity programs.
During the latest round of massive struggles since 2012, the gap between the KKE’s radical discourse and actual tactics grew even more apparent. Koutsoumbas began to say that there is no governmental solution to the crisis, except if the working class itself takes power: “Representatives of the workers, who will be elected in the workplace … will be controlled by those who elected them, will be revocable at any time, will not be taken out of production, will not have any extra privileges.”
On this line, he could have lots of common ground with Antarsya, the radical grouping of the extraparliamentary left. But, unlike Antarsya, the KKE says that fighting for not paying the debt or breaking with the European Union and the eurozone, are demands that can’t be articulated by the movement here and now, but they will be products of this “people’s power” in the distant future.
The KKE managed to regain some of the lost electoral ground in the2014 European elections — a sign of another type of disillusionment, this time with perceived moderation on the part of Syriza. It seems that in Sunday’s general elections this rebound will go on. KKE positions itself as a left opposition to a coming Syriza government.
But this left opposition will only be useful if it’s willing to work in joint action with all the sectors of the working class who want to break with austerity using their own organized force, rather than just waiting for Syriza’s strategy of accommodation to fail.

शनिवार, 17 जनवरी 2015

‘‘कुछ ऐसी स्वतंत्रताएं है जिनपर सभ्य समाज में कोई सौदेबाजी नहीं हो सकती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक ऐसी ही स्वतंत्रता है। ’’



ग्यारह जनवरी को दस श्रेष्ठ कार्टूनिस्टों के हत्याकांड के बाद  आज सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुकी फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर सन् 2007 एक मुकदमा चला था। तब इस पत्रिका में डैनिस अखबार ‘जिलैट पोस्तन’ में छपे इस्लामी उग्रपंथियों पर व्यंग्य करने वाले कार्टूनों को पुनर्प्रकाशित किया गया था। इसपर पूरे पश्चिम एशिया में भारी बवाल मचा था। फ्रांस के कई मुस्लिम संगठनों ने, जिनमें पेरिस की जामा मस्जिद भी शामिल थी, शार्ली एब्दो पर यह कह कर मुकदमा किया कि इसमें इस्लाम का सरेआम अपमान किया गया है। लेकिन, न्यायाधीशों ने इस मुकदमे को खारिज करते हुए साफ राय दी कि इसमें मुसलमानों के खिलाफ नहीं, इस्लामी उग्रपंथियों के खिलाफ व्यंग्य किया गया है।

उसी समय, सन् 2008 में फिल्मकार डैनियला लिकोंत ने इस मुकदमे पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई - It is hard to be loved by Idiots ( मूर्खों से प्यार पाना मुश्किल है)। फ्रांस के वर्तमान राष़्ट्रपति फ्रांस्वा ओलेंद ने उसी डाक्यूमेंट्री में यह बात कही थी - ‘कुछ स्वतंत्रताएं ऐसी है जिन पर कोई बात नहीं हो सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार की सौदेबाजी नहीं की जा सकती है।’’

डैनियला लिकोंत की इस डाक्यूमेंट्री पर तब लोगों का विशेष ध्यान नहीं गया था। लेकिन आज यही डाक्यूमेंट्री फ्रांस के लोगों के प्रतिवाद और ‘शार्ली एब्दो’ के प्रति एकजुटता का प्रतीक बन गयी है। वहां के फिल्म समाज ने यह निर्णय लिया है कि देश भर के सौ से भी ज्यादा सिनेमागृहों में इस डाक्यूमेंट्री का पूरे एक हफ्ते तक प्रदर्शन किया जायेगा। इसमें पेरिस, मार्सै, स्ट्रासबेरी, ले हाफ्रे की तरह के बड़े शहरों से लेकर वहां के ब्रिटेनी की प्लुएस्केत जैसे छोटे शहरों के सिनेमागृह भी शामिल है।  

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

अशोक वाजपेयी की 74वीं सालगिरह के मौके पर :


अशोक जी की ‘साहित्य की नागरिकता’ पर सोचते हुए :
अरुण माहेश्वरी
एक ओर है वैश्वीकरण। दुनिया को एक ही ढांचे में ढालने की जिद। एक से शहर, एक से गांव, खान-पान-पहनावा, जीवन का ऊपरी रूप सर्वत्र एक सा। और अंदर - एक सी विषमता, एक सी लाचारी, एक सा ही आतंक। सारी दुनिया पर एक सर्वशक्तिमान ईश्वर का राज्य। ‘विश्व ग्राम’ और सर्वमान्य, सर्वपूज्य, गांव का सामंत अमेरिका - अकेला पंच। संयुक्त परिवार का एक कर्ता और बाकी सब भर्ता। सारे संसाधनों पर उसकी मिल्कियत, सारी खोजों पर उसका कॉपीराइट। हरीश भादानी के एक संकलन का शीर्षक है - ‘एक अकेला सूरज खेले’। सबको रोशनी और अंधेरा बांटने वाला। फुकुयामा जैसे कुछ की नजरों में - ‘सबका राजा राम’। अर्थात ‘रामराज्य’। सभ्यता का अंतिम पायदान। अब सबको और कुछ नहीं करना है सिवाय इसके कि - ‘राम का गुनगान करिये, सभ्यता का मान करिये’।
और दूसरी ओर है, आदमी-आदमी की असंख्य स्वायत्त-स्वतंत्र नागरिकताओं का गान। राष्ट्र की नागरिकता, धर्म की नागरिकता, जाति की नागरिकता, राजनीति की नागरिकता, अर्थशास्त्र की नागरिकता, साहित्य की नागरिकता, संस्कृति की नागरिकता, पर्यावरण की नागरिकता, नारीवाद की नागरिकता, दलितवाद की नागरिकता, बस्ती, मोहल्ला और कुटुंब से लेकर अकेले आदमी तक की नागरिकता। कुल मिला कर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’, कहीं भी धूनी रमा कर, आसन बिछा कर बैठ जाओ। नागरिकता न हो जैसे आत्मलीनता (ऑटिज्म) का ही एक और नया नाम हो! आधा-अधूरा, लुंज-पुंज जीवन - चमकदार पैकेजिंग में!
अमेरिकी प्रभुत्व का विश्वग्राम और ‘आत्मलीन’ नागरिक। एक की मुट्ठी में सब कुछ और बाकी अपनी धुनों में लीन, जिनके पास समग्र बोल कर कुछ भी नहीं। कितने पूरक लगते हैं ये एक दूसरे के!
समानता, न्याय, स्वतंत्रता और भाईचारे पर टिका विश्व-समाज अगर कोरे वागाडम्बरों और लफ्फाजियों से तैयार नहीं होगा तो अपनी-अपनी नागरिकताओं से बंधे आत्मलीनों से भी कत्तई नहीं बनेगा। समकालीन सार्वजनिक जीवन के प्रश्नों और राजनीतिक संघर्षों के प्रति तटस्थता खुद को हेय बनाने के उपक्रम जैसा है। जीवन के तमाम पक्षों पर यथार्थमूलक और पैनी नजर की जरूरत है, अध्ययन और सजगता की जरूरत है, समग्रता की, एक समग्र विश्वदृष्टिकोण की जरूरत है। यह सब मनुष्यता की जरूरत है।
आज भी यह सोच कर रोमांच होता है कि सारी दुनिया को सोचने-विचारने का एक नया ढंग देने वाला कार्ल माक्‍र्स ‘पूंजी’ जैसी अमरकृति की रचना करने के बाद भी अपने जीवन के अंतिम दिनों में एक असंतुष्ट प्राणी ही था। वह इस अभिलाषा के साथ ही इस संसार से विदा हुआ था कि काश बाल्जाक के उपन्यासों पर वह अच्छी तरह से काम कर पाता!
कहने का तात्पर्य यही है कि बहुविध अध्ययन और सोच मनुष्य की एक प्रमुख जरूरत है। लेकिन विचार का यह संस्कार जहां विश्वविद्यालयों के आत्मलीन विभागों की कक्षाओं से पाना बिल्कुल असंभव है। वैसे ही, छोटी-छोटी नागरिकताओं के स्वायत्त संसारों के मुखियाओं के विचारों से भी मुमकिन नहीं है।
अशोक जी को उनकी 74वीं सालगिरह पर बधाई

‘हम सब शार्ली एब्दो है’



अरुण माहेश्वरी
ग्यारह जनवरी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये पेरिस मार्च को देखकर फैज की इस पूरी नज्म को दोहराने का दिल करता है :
"बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले "

पेरिस में जो हुआ वह दूसरे किसी भी सच से कहीं बड़ा सच है । मनुष्यता का शाश्वत सच । तीन दिन पहले दो जनूनी हत्यारों ने दस श्रेष्ठ कार्टूनिस्टों को भुन डाला था । सोचा था कि इस प्रकार उन्होंने विरोध की आवाज़ को सदा के लिये कुचल डाला है । लेकिन 11 जनवरी को पेरिस की सड़कोंपर दुनिया के चालीस देशों के प्रमुख नेताओं के नेतृत्व में लाखों की संख्या में लोगों ने उतर कर सिर्फ एक घोषणा की - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आने देंगे । ख़बरों के अनुसार इस प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों की संख्या तक़रीबन बीस लाख थी । इस प्रदर्शन का नेतृत्व किया फ़्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलोंद ने । ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन, इटली के प्रधानमंत्री मैटियो रेंजी, यूक्रेन के राष्ट्रपति पेत्रो पोरशेंको, जार्डन के किंग अब्दुल्ला, बराक ओबामा के प्रतिनिधि अटार्नी जनरल एरिक होल्डर, इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतान्याहू, जर्मनी के चांसलर एंजेला मर्केल, माली के राष्ट्रपति इब्राहिम कीटा, फ़िलिस्तीन के राष्ट्र प्रधान आदि इस मार्च की पहली पंक्ति में शामिल थे । यह अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रश्न पर मानव एकजुटता की एक प्रेरणादायी शानदार मिसाल है । इसमें दुनिया के सभी धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्र के लोग शामिल थे । अपनी इस आज़ादी की रक्षा के लिये पेरिस की सड़कों पर उतरे लोगों की आँखे दृढ़संकल्प और आत्म-विश्वास से छलछला रही थी ।

पता नहीं क्यों, हम उन लोगों के साथ अपने को जरा भी नहीं जोड़ पारहे है जिन्हें शार्ली एब्दो हत्याकांड के प्रतिवाद में हुए सभी राष्ट्रों के ऐतिहासिक प्रदर्शन में शामिल राजनेताओं की इस सहभागिता में उनका मिथ्याचार दिखाई देता है। हम सिर्फ उस हत्याकांड के प्रतिवाद-प्रतिवाद और प्रतिवाद तक ही सीमित रहना चाहते हैं। इस हत्याकांड के प्रतिवाद में दुनिया के किसी भी अंधेरे या उजले कोने से जो भी आवाज उठे, हम उसके स्वागत के अलावा दूसरी कोई बात सोच ही नहीं पा रहे हैं।
जो लोग यह मांग कर रहे हैं कि ये नेता क्यों नहीं नाईजीरिया के बोकोहरम में गये, या इराक के बच्चों के आंसू पोंछने या श्रीलंका के तमिल विस्थापितों के जख्म भरने गये, क्यों नही असम में आदिवासियों की हत्या के खिलाफ उन्होंने आवाज उठायी वगैरह-वगैरह - हमें उनकी ये बातें जरा भी नहीं छू रही हैं। उल्टे मन में उपहास का यह भाव पैदा होता है कि तब तो सभी राष्ट्राध्यक्षों का काम देश-देश में घूम कर तमाम प्रकार के जुल्मों के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होना ही रह जायेगा !
दरअसल, पेरिस प्रदर्शन एक ठोस, चाक्षुस और लाखों लोगों का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रदर्शन था, कोई कल्पना नहीं। दो आतंकवादियों ने दस श्रेष्ठ कार्टूनिस्टों को मार डाला, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि ये कार्टूनिस्ट जिस प्रकार के कार्टून बनाते थे, वैसे कार्टून बनायें। दुनिया के एक सबसे विकसित राष्ट्र में इस प्रकार के जघन्य हत्याकांड से सारी दुनिया सन्न रह गयी, विश्व भर में लोगों में आक्रोश की लहर दौड़ गयी। पेरिस प्रदर्शन दुनिया के उसी गुस्से का इजहार था। यह जेहाद के नाम पर चल रही मध्ययुगीन राजनीति और गुंडागर्दी के खिलाफ जमा हो रहे व्यापक जन-असंतोष का एक विस्फोट है ।
सवाल है कि क्या दुनिया के लोगों की आगे की दिशा में एक ऐसी सजीव, सक्रिय कार्रवाई को हम महज किसी विचार या सोच में बदल कर उसपर कोई प्रतिक्रिया दे सकते हैं। हम जो यह समझते आए है कि आदमी की मुक्ति एक ऐतिहासिक क्रिया है, मानसिक क्रिया नहीं, वे मनुष्यों की ऐसी व्यवहारिक कार्रवाई को कैसे कल्पना में एक शुद्ध सिद्धांतों की लड़ाई में तब्दील करके उसमें विचारधारात्मक संघर्ष के सूत्र खोजने लगते हैं !
सचमुच, हमें ऐसी बातें कोरी भ्रांतियां लगती है। भ्रांतियां कल्पना से पैदा नहीं होती। उनका भी अपना कोई न कोई ठोस आधार होता है। जब हम अपने प्रत्यक्ष की किसी वस्तु में कोई दूसरी चीज देखने लगते हैं तब निश्चित तौर पर उस दूसरी वस्तु का, भले ही वह वहां न हो, कहीं न कहीं अस्तित्व जरूर होता है। जिन नेताओं ने इस प्रदर्शन में भाग लिया, उनकी अन्यत्र कुछ दूसरी भूमिका हमने देखी है, इसीलिये इस प्रदर्शन में भी हम सिर्फ वही देख रहे हैं। अर्थात जो प्रत्यक्ष है, उसे यथार्थ न मान कर अपने पूर्व ज्ञान और अनुभव को ही यथार्थ मान हम उसे प्रत्यक्ष पर आरोपित करते हैं। जो चीज चेतना या स्मृति में है उसमें और प्रत्यक्ष दिखाई दे रही वस्तु में कोई फर्क न कर पाना ही तो तमाम भ्रांतियों के मूल में होता है।
इसके अलावा, हम हमेशा यह मानते हैं कि राजनीति का अधिक से अधिक सरोकार प्रत्यक्ष से हैं। राजनीति कभी किसी प्रकार की ब्रह्म-चर्चा का रूप नहीं ले सकती। मार्क्स जब कहते हैं कि मनुष्य अपना इतिहास खुद बनाता है लेकिन मनमाने ढंग से नहीं, तो इससे भी उनका तात्पर्य यही था कि जो सच व्यवहारिक और प्रत्यक्ष रूप से सामने हैं, उसकी अवहेलना करके कोई ऐंतिहासिक काम नहीं किया जा सकता है।
इतिहास निर्जीव तथ्यों का संग्रहालय नहीं होता, न ही कोरी कल्पना। यह सक्रिय जीवन प्रक्रिया का वर्णन होता है। पेरिस प्रदर्शन अभिव्यक्ति की आजादी पर हुए हमले का एक सक्रिय प्रतिवाद का मामला है। इसके साथ जुड़ने मतलब ही है, वास्तविक ऐतिहासिक प्रक्रिया से जुड़ना और कई मायनों में इतिहास को निर्जीव तथ्यों के संग्रह से मुक्त करना। जो सक्रिय मनुष्य की कार्रवाइयों की धड़कनों को महसूस नहीं करते, परिस्थितियों के संयोग से पैदा होने वाले ऐतिहासिक क्षणों की आहट नहीं सुन पाते, वे दरअसल कुछ अजीबोगरीब, अपने बंद कमरों में कैद लोग है। अपने खुद के शास्त्रों और परंपराओं के बंदी ये लोग तभी कुछ हलचलों में आते हैं जब उन्हें अपने किसी शास्त्रोक्त कर्मकांड का पालन करना होता है। अन्यथा, जीवन के दूसरे सारे कार्य-व्यापार उनके लिये वृथा होते हैं। मठों-मंदिरों के अंदर के जीवन को देख लीजिये, आपको सारी बात समझ में आजायेगी।
पेरिस प्रदर्शन के प्रति कुछ खास प्रकार की सनक भरी नकारात्मक प्रतिक्रियाओं में हमें ऐसी ही, वास्तविक ऐतिहासिक जीवनी शक्ति गवां रही, अप्रासंगिक हो रही राजनीति की झलक मिलती है। इसीलिये हम उसके साथ जरा सा भी नहीं जुड़ पाते हैं।

फ्रांस में जो हुआ वह दुनिया के किसी भी कोने में कभी भी हो सकता है। भारत में आज जिस प्रकार धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर संगठित रूप से तमाम असहिष्णुताएं पैदा की जा रही है, उसमें ऐसी घटनाएं तो जैसे हमारी नियति जान पड़ती है।
इन हालात में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों के एक ऐसे व्यापक मंच की जरूरत है जिसका एक और अकेला मुद्दा होगा - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा; नि:शर्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला समाज में अन्य सभी स्वतंत्रताओं को एक कोरा भ्रम बना देता है। स्वतंत्रता का एक रूप ठीक वैसे ही दूसरे को शासित करता है जैसे शरीर का एक अंग दूसरे को करता है। जब भी किसी एक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाया जाता है तो स्वतंत्रता के सामान्य रूप पर प्रश्न उठा दिया जाता है। जब स्वतंत्रता के एक रूप को खारिज किया जाता है तो सामान्य तौर पर स्वतंत्रता को ही खारिज कर दिया जाता है।
घोषित रूप से इस मंच की कोई राजनीतिक संबद्धता नहीं हों। यह सरकारी-गैर-सरकारी, सत्तापक्ष और विरोधपक्ष - किसी भी कोने से लेखकों, कलाकारों की अभिव्यक्ति की आजादी पर होने वाले हमलों का विरोध और प्रतिरोध करने के लिये प्रतिबद्ध रहें। इसके अलावा इसकी दूसरी कोई प्रतिश्रुति नहीं हो ।





मंगलवार, 6 जनवरी 2015

यह शुद्ध ढीठाई है

अर्चना वर्मा जी ने अभी विज्ञान कांग्रेस को लेकर चल रही बातों के सिलसिले में अपनी वाल पर लिखा हैं - ‘‘दो बिल्कुल विपरीत अतिवादी सिरे हैँ अपने अतीत को लेकर। दोनो को ही अपनी अपनी तरह से भारत-व्याकुल कहा जा सकता है। एक भारत-मोह और महिमा-व्याकुल है तो दूसरा भारत-विद्वेष और निन्दा-व्याकुल। दोनो के बीच में एक बहुत क्षीण सा तीसरा सिरा है जो तथ्यों की छानबीन और यथार्थ की समझ के लिये उत्सुक दिखायी देता है। व्यक्तिगत रूप से मैँ इस क्षीण से तीसरे वाले सिरे को लेकर ज़्यादा उत्सुक रहती हूँ। अभी शायक आलोक के स्टेटस पर भी कुछ ऐसी ही उत्सुकता का आभास दिखा। अच्छा लगा। आगे इस बारे में समान चित्त लोगों से संवाद की संभावना तलाशना चाहती हूँ। वैज्ञानिक अनुशासनों के लोगों के साथ विशेषकर। फ़िलहाल एक जानकारी शेयर करना चाहती हूँ। गूगल पर टाइप करें - Five Thousand Year Old AirCraft In An Afghan Cave . नतीजे देखें । और बतायें इसके बारे में क्या ख़याल है “

हमारा उनसे कहना है कि अर्चना जी, क्या आप सचमुच यह मानती है कि यह सब जो चल रहा है, वह कुछ ऐसा नया है जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ?1926 में जब से गीता प्रेस की ‘कल्याण’ पत्रिका निकलनी शुरू हुई तभी से इस प्रकार की सारी बकवासें निरंतर चल रही हैं, अर्थात हिंदी में इस प्रकार की बकवासों का लगभग 90 साल का तो एक लिखित इतिहास मौजूद है। इन कोरे अंधविश्वासों पर टिकी बातों की पहले ही काफी आलोचना की जा चुकी हैं और यह भी कहा जा सकता है कि, भले कल्पना में ही क्यों न हो, उन्हें उड़ाया भी जा चुका है। इसलिये आज जो सामने आरहा है उसमें अंतर्वस्तु की दृष्टि से नवीनता का लेश मात्र भी नहीं है। पहले से फर्क सिर्फ इतना है कि उन बेतुकी, पिटी-पिटाई बातों को अब भारी ढिठाई के साथ, और सरकारी मंचों से कहा जा रहा है। यह सचमुच एक युगांतकारी बात मानी जा सकती है। लेकिन यह सब, जिसे बांग्ला में ‘गायेर जोरे’ कहते हैं, अर्थात शुद्ध मांसपेशियों के बल पर किया जा रहा है। इस अभियान में अगर कुछ नया है तो बस यही है। पुरानी, पिटी-पिटाई बातों को कुछ इस प्रकार से, विज्ञान कांग्रेस जैसे मंचों से कहा जा रहा हैं मानो उन्होंने कोई नयी खोज की हो। वे सबको ललकारते हुए, विज्ञान की सबसे ‘पवित्र’ वैदिक-औपनिषदिक उपलब्धियों का दम भरते हुए, दरअसल आधुनिक विज्ञान की खिल्ली उड़ा रहे हैं। उनके इस काम के पीछे की ढीठाई, विज्ञान के प्रति उनका तिरस्कार, एक प्रकार का व्यंग्य सबको चौंका रहा है। और इसी ‘चकाचौंध’ में शायद वे अपनी जीत समझते हैं। आपसे अनुरोध है कि दया करके किसी भी विवेक के नाम पर इसप्रकार की उत्तेजक करतूतों पर गंभीरता से विचार करने की सलाह न दें। सचाई तो यह है कि विज्ञान की दुनिया में यह सब चर्चा के योग्य भी नहीं है। इन सनसनीखेज बातों की विज्ञान में उतनी ही भूमिका है जितनी ललित साहित्य में हो सकती हैं।

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

हिंसा और जनसंहार

अरुण माहेश्वरी

असम के दो जिलों कोकराझड़ और सोनितपुर में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के एक सोंबजीत गुट ने उस क्षेत्र के आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां चला कर 80 से ज्यादा लोगों को भुन डाला। कहते हैं, एनडीएफबी के इस गुट ने गरीब आदिवासियों का यह कत्लेआम उनके खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादतियों का बदला लेने के लिये किया। आज वह पूरा क्षेत्र अद्​र्ध-सैनिक बलों को सौंप दिया गया है। अब अद्​र्ध-सैनिक बलों की ज्यादतियों के नाम पर इस क्षेत्र में आगे और क्या गुल खिलेंगे, कहना मुश्किल है। सन् 1980 से ही असम से ‘विदेशी घुसपैठियों’ को भगाने के नाम पर भारत के इस अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र में खुली हिंसा की राजनीति का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने देखते ही देखते नाना रूपों में कैसे पूरे उत्तरपूर्वी क्षेत्र को अपनी जद में ले लिया, सचमुच यह एक गहरे अध्ययन का विषय है।

भारत के एक कोने में यदि कश्मीर हमारे गणतंत्र के शरीर पर नासूर बना हुआ है तो दूसरे कोने पर असम, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड, सात बहनों का यह उत्तरपूर्वी क्षेत्र कम बुरी स्थिति में नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार आज पूरे भारत में तकरीबन 800 से ज्यादा आतंकवादी संगठन सक्रिय है जिनमें कोई जातीय पहचान के लिये लड़ रहा है, तो कोई धार्मिक उद्देश्यों के लिये, तो कोई शोषणमुक्त समाज के लिये जनमुक्ति  के वामपंथी नारों की ओट में यही काम कर रहा है। और, गृह मंत्रालय तथा दूसरे अन्तरराष्ट्रीय सूत्रों के अनुसार मजे की बात यह है कि इन सबमें एक सामान्य सूत्र की तरह नशीली दवाओं, हथियारों का व्यापार, रंगदारी, और दूसरे तमाम गैर-कानूनी रास्तों से आने वाले धन का खुला प्रयोग हो रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक, शायद ही कोई राज्य होगा, जिसमें इस प्रकार की सामूहिक हिंसा की संगठित गतिविधियां न चल रही हो।

समाज के रंध्र-रंघ्र में फैल चुकी इस सामूहिक हिंसा और आतंकवादी संगठनों के जाल ने सन् 2002 के गुजरात में एक और चरम रूप लिया जब खुद राज्य भी प्रत्यक्ष रूप में इस प्रकार की हिंसक जन-हत्याकारी गतिविधियों में शामिल होगया। एक राज्य सरकार ने खून के प्यासे बहुसंख्यक समाज के उन्मादित जनसमूह को तीन दिनों के लिये खुली छूट दे दी कि वह अल्पसंख्यक समाज के सफाये के लिये इन तीन दिनों में जो कर सकता है, करें। यह भारत में एक हिंसक समाज की कोख से पनपने वाले जन-हत्याकारी हिंसक राज्य के निर्माण की लोमहर्षक कहानी है जिसका चरम रूप यूरोप में हिटलर और उसके नाजी शासन में दिखाई दिया था।

भारत की चारों दिशाओं में फैले इन तमाम हिंसक और आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों, आये दिन होने वाली हिंसक वारदातों और खुद राज-सत्ता का बढ़ता हुआ हिंसाचार, इन सबको यदि हम समग्रता से देखें तो भारत की आज की तस्वीर हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान से कोई बेहतर नहीं दिखाई देगी। फिर भी हम इतराते हैं कि ‘हम पाकिस्तान नहीं है’। पाकिस्तान को आतंक और अराजकता का प्रतीक मानते हैंं और भारत को शांति और सुशासन का !

संयुक्त राष्ट्र संघ ने द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवों के आधार पर 9 दिसंबर 1948 के दिन कन्वेंशन ऑन द प्रिवेंशन एंड पनिसमेंट ऑफ द क्राइम ऑफ जिनोसाइड (सीपीपीसीजी) को अपनाया था, जिसमें कहा गया था कि किसी भी राष्ट्रीय, जातीय, नस्ली अथवा धार्मिक समूह को समूल नष्ट कर देने के उद्देश्य से उस समूह के सदस्यों की हत्या, उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक हानि पहुंचाना, सुनियोजित ढंग से किसी समुदाय के भौतिक अस्तित्व को आंशिक रूप से या पूरी तरह से खत्म कर देने की जीवन की परिस्थितियां तैयार करना, उस समूह में बच्चों के जन्म को रोकना और जबर्दस्ती एक समूह के बच्चों को दूसरे समूह में ले जाना - ये सब काम जनसंहार के अपराध की कोटि में आते हैं।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जनसंहार के अपराधों की इस परिभाषा पर थोड़ी सी बारीकी से भारतीय समाज की मौजूदा हिंसक परिस्थितियों के संदर्भ में सोचे तो यह बात आईने की तरह साफ दिखाई देने लगेगी कि किस तरह आज यहां समाज के बिल्कुल नीचे के स्तर से लेकर राज्य के सर्वोच्च स्तर तक इसी अपराधमूलक मानसिकता का विस्तार हो चुका है जो राष्ट्रसंघ के मानदंडों पर जनसंहारकारी अपराधों की श्रेणी में आती है।

कहना न होगा, भारत की हिंसा से भरी सामाजिक परिस्थितियां क्रमश: व्यापक जनसंहारकारी अभियानों के लिये तेजी से तैयार हो रही जमीन की ओर साफ संकेत करती है। जनसंहार की कार्रवाई कोई आकस्मिक उन्माद या विस्फोट की शक्ल में प्रकट होने वाली कार्रवाई ही नहीं होती। यह एक सु​िंचंतित संगठित र्कारवाई है। लगातार और लंबे अर्से तक चलने वाली कार्रवाई। समाज की रगों पर दीर्घ काल तक बने रहने वाला दबाव, और इस दबाव के तले पूरे समाज को एक विकृत रूप दे देने की कार्रवाई। इसकी हमेशा किसी व्यापक जन-हत्या की विस्फोटक घटना मात्र से व्याख्या नहीं की जा सकती है। जनहत्या दरअसल किसी भी समूह विशेष के खिलाफ बार-बार दोहराये जाने वाला, लगातार हमलों का एक लंबा सिलसिला होता है। हिटलर ने गैस-चैंबरों में डाल कर यहूदियों का सफाया करने का पैशचिक काम अचानक और रातो-रात नहीं कर दिया था। इसके लिये वह सालों तक तमाम प्रकार के झूठ और गंदी बातों को आधार बना कर यहूदी समाज के खिलाफ लगातार प्रचार और हमले चला रहा था। और इसी के चरम पर, जब उसने गैस चैंबरों में डाल कर एक झटके में लाखों यहूदियों की हत्या जैसा निर्दयता और निष्ठुरता का अकल्पनीय काम किया, पूरे यूरोप को एक व्यापक कसाईखाने में बदल दिया तब भी जर्मन राष्ट्र का बहुसंख्य तबका उसकी इन पैशाचिक हरकतों पर तालियां बजा रहा था। गुजरात में बाबू बजरंगी एक गर्भवती महिला के गर्भ तक को काट डालने की पैशाचिकता का पूरे उत्साह के साथ वर्णन करता है, फिर भी वह बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों का एक चहेता नेता बना रहता है, यह आकस्मिक नहीं है। जनसंहारकारी समूहों की यही चारित्रिक विशेषता है। यह एक समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत और हिंसा के लगातार और लंबे प्रचार के बीच से तैयार किये हुए समूह के बढ़ते सामाजिक प्रभुत्व के बाद ही संभव हो सकता है।

जो कोकड़ाझार आज बोडो उग्रवादियों की खुली हिंसा का क्षेत्र बना हुआ है, वहीं पर ‘80 के जमाने में विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ चलाये गये आंदोलन के काल में बांग्लाभाषी मुसलमानों के खिलाफ सबसे जघन्य हिंसा का इतिहास रहा है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के लाल पट्टी वाले क्षेत्र की नक्सली हिंसा वहां हिंदू सांप्रदायिक हिंसक समूहों के लिये और एक प्रतिहिंसक राज्य के लिये जमीन तैयार कर रही है। इससे नागरिक अधिकारों के प्रति एक संवेदनहीन सामाजिक परिवेश तैयार होता है। नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनहीनता से ही प्रतिहिंसक राज्य कब एक समूह विशेष के समूल नाश के उद्देश्य से काम करने वाले जनसंहारक राज्य की दिशा में बढ़ सकता है, नाजीवाद और फासीवाद का इतिहास इसके सबसे बड़े गवाह है। इस दिशा में अगर सतर्कता न बरती गयी तो भारत में इस प्रकार के राज्य के उदय की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। जनसंहार के सामाजिक-व्यवहारिक स्रोतों की ठोस पहचान के प्रति सामान्य जागरूकता पैदा करके ही इसका प्रक्रिया का प्रतिकार संभव है।


गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

क्यूबा और अमेरिका के बीच कूटनीतिक संबंधों की पुनर्स्थापना:



‘‘बहुत दिनों बाद खुला आसमान 
निकली है धूप, हुआ खुश जहान’’

अरुण माहेश्वरी

आधी सदी से भी ज्यादा समय बीत गया। अमेरिका से सिर्फ 90 मील दूर छोटा सा देश क्यूबा। उसने शक्ति और वैभव के विश्वप्रभु को, उसके मूल्यों को, उसके इरादों को, उसकी शक्ति को चुनौती दी थी। राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने कहा था, यह अमेरिकी एकाधिपत्य चल नहीं सकता, उसके सारे वैभव की रोशनी के तले गहरा अंधेरा ही अंधेरा है। यह लूट और अन्याय का साम्राज्य है; अंधेरे का राज्य है। सम्य समाज में अमेरिका और क्यूबा के बीच की लड़ाई की तुलना हमेशा तूफान और दीये के बीच की लड़ाई से की जाती थी। 1959 में क्यूबा की क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो की सरकार कायम हुई और तभी से अमेरिका इस दीये की रोशनी को कुचल देने के लिये मचल उठा था। क्या-क्या नहीं किया। सीआईए का एक पूरा महकमा इसी काम के लिये झोंक दिया गया। फिदेल तक की हत्या की न जाने कितनी कोशिशें की गयी। सैनिक कार्रवाई तक हुई। आर्थिक नाकेबंदी कर दी। संयुक्त राष्ट्र संघ में इस दादागिरी की खुल कर निंदा हुई फिर भी दुनिया का कोई देश क्यूबा के साथ आर्थिक लेन-देन नहीं कर पा रहा था। इन सारी बाधा-विपदाओं के बावजूद क्यूबा अपनी स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता की रक्षा की जिद के साथ अड़ा रहा। एक समय में उसे विश्व समाजवादी शिविर का समर्थन रहा तो सन् ‘89 के बाद से ही लातिन अमेरिका के राजनीतिक परिदृश्य में आए भारी परिवर्तन ने अमेरिका की एक न चलने दी। क्यूबा लातिन अमेरिका में स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता की रक्षा का प्रकाशस्तंभ बना रहा।
और आज - निराला जी की पंक्ति याद आती है :

‘‘बहुत दिनों बाद खुला आसमान
निकली है धूप, हुआ खुश जहान’’

‘‘हारी नहीं, देख, आंखें
आयी है फिर मेरी ‘बेला’ की यह वेला’’

आज क्यूबा की सड़के नौजवानों के उच्छवास से फूट पड़ी है। वाशिंगटन और हवाना, दोनों राजधानियों से 17 दिसंबर की रात, एक साथ यह घोषणा की गयी कि दोनों देशों के बीच पचास साल से भी ज्यादा समय से टूटे हुए कूटनीतिक संबंधों को फिर से कायम किया जाता है। खुद राष्ट्रपति ओबामा ने यह खुले आम स्वीकारा  कि क्यूबा को अलग-थलग करने की बाबा आदम के जमाने की नीति विफल हुई है। क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने ऐलान किया है कि और भी समृद्ध तथा दीर्घस्थायी समाजवाद की दिशा में क्यूबा की यात्रा जारी रहेगी। नेरुदा के शब्दों में :
‘‘हर रोज मैंने धमकियां सुनी,
रिश्वतें, क्षोभ और झूठ,
और मैं अपने सितारे से पीछे नहीं हटा।
नहीं मेरे दोस्तों।

कहना न होगा, चीजें इसी तरह मिटती हुई बनती रहती है। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की पुनर्स्थापना की घोषणा के पहले दिन, 16 दिसंबर को राष्ट्रपति ओबामा और राष्ट्रपति रॉउल कास्त्रो के बीच पूरे एक घंटे टेलिफोन पर बात हुई थी। 55 सालों में इन दोनों देश के राष्ट्रप्रधानों के बीच यह पहली बातचीत थी। और इसके बाद, 24 घंटे बीतते न बीतते, कूटनीतिक संबंधों की फिर से स्थापना की घोषणा कर दी गयी। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलज माउरो ने कहा कि ‘‘यह जीत क्यूबा की जीत है, फिदेल की जीत है।’’ अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के नेता जॉन मैकैन ने कहा - ‘‘अमेरिका पीछे हटा है।’’

सच कहा जाए तो यह उस पूरी राजनीति की जीत है जो आज दुनिया में एक खास लातिन अमेरिकी परिघटना के रूप में चिन्हित की जा रही है।

दुनिया में कोई भी नहीं कहेगा कि कूटनीतिक संबंधों की वापसी से इन दो देशों के बीच के बुनियादी मतभेद दूर होगये है। कोई नहीं कहेगा कि क्यूबा ने अमेरिकी रास्ते को स्वीकृति दे दी है या अमेरिका ने क्यूबा के समाजवाद को मान लिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि ये दो समाज दो अलग-अलग सामाजिक मान्यताओं के आधार पर बन-बिगड़ रहे हैं। लेकिन यह जानना कम महत्वपूर्ण नहीं है कि जो कुछ हो रहा है, उसके परे और क्या हो रहा है और जो नहीं है, उसके परे क्या नहीं है। स्थायी कुछ नहीं होता। कार्य-कारण संबंधों के परे मनुष्यता का सच विजयी होता है, उसी से मुक्ति का मार्ग खुलता है।

रॉउल कास्त्रो ने तो साफ शब्दों में कहा है कि ‘‘ मानवाधिकार, विदेश नीति और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के सवाल पर हमारे गहरे मतभेद हैं। लेकिन मतभेदों के बावजूद हमें सभ्य तरीके से सह-अस्तित्व के रास्ते को अपनाना होगा।’’ रॉउल कास्त्रो ने दोनों देशों के बीच लगभग एक साल से चल रही वार्ता को सफल बनाने में कनाडा की सरकार और पोप फ्रांसिस के प्रति कृतज्ञता जाहिर की है।





मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

वामपंथ की अपनी अलग पहचान बने

अरुण माहेश्वरी

(‘जनसत्ता’ के 14 दिसंबर, रविवार के अंक में असीम सत्यदेव जी ने मेरे एक लेख की स्थापनाओं का विरोध करते हुए एक उनके ‘मतांतर’ स्तंभ में एक टिप्पणी की थी - ‘पराजित नहीं हुआ समाजवाद। यहां मैं उसका एक प्रत्युत्तर प्रसारित कर रहा हूं। )

कार्ल मार्क्स का एक बहुत प्रसिद्ध कथन है - दार्शनिक अन्वेषण की पहली आवश्यकता एक साहसी, स्वतंत्र मस्तिष्क है।
कोरी आस्था किसी भी नये सच को जानने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है।

असीम सत्यदेव की मेरे लेख ‘अवाम से वाम दूर क्यों’ पर की गयी टिप्पणी को देखिये। उनका आरोप है कि हमने ‘रोग के बजाय दवा की ज्यादा आलोचना’ की है। हम नहीं समझ पा रहे वे किसे रोग बता रहे हैं, किसे दवा। अगर वे समाजवाद को दवा बताते हुए हमारे लेख को समाजवाद की आलोचना मान रहे हैं, तो हमें कहना होगा - ‘‘या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात / दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और”
और भी कहूंगा कि ‘‘वो बात, सारे फसाने में जिसका जिक्र न था वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी।’’

उन्होंने अपने अभियोग का आधार बनाया है हमारे लेख की इस पंक्ति को - ‘‘ आज इतना तो साफ है कि दो शिविरों, पूंजीवादी और समाजवादी शिविरों में दुनिया के विभाजन और प्रतिद्वंद्विता के जरिये समाजवाद की अनिवार्य विजय के सारे अनुमान आधारहीन साबित हुए हैं।“

ठीक इसके बाद की पंक्ति है - ‘‘ समाजवाद के अन्तर्गत आर्थिक विकास का स्तर अमेरिका और विकसित औद्योगिक देशों में सामने आए पूंजीवादी उत्पादन की अवस्था को स्थानापन्न करने के लिये नाकाफी था।“

इन सबकों मिला कर ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि यह एक वस्तु स्थिति का बयान भर है। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवाद के पराभव के बाद सारी दुनिया के कम्युनिस्टों और कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस समझ को गलत माना था कि पूंजीवाद में अब विकास की कोई संभावना नहीं बची है; समाजवाद उत्पादन के सभी मानको पर पूंजीवाद को पीछे छोड़ देगा। सोवियत संघ की अर्थ-व्यवस्था गतिरोध का शिकार हुई लेकिन पूंजीवाद अपने तमाम आवर्तित संकटों के बावजूद उत्पादन के क्रांतिकरण तथा दूसरे उपायों से उन संकटों से निकलता रहा। सोवियत संघ के पराभव के इन 25 साल बाद सत्यदेव जी के पास इससे उल्टे यदि कोई दूसरे तथ्य हो तो वह उनकी संपत्ति है, दुनिया अभी तक उनसे वाकिफ नहीं है। और अगर मामला कोरी आस्था का हो तो हम क्या कहेंगे ! आस्था के विषय बहुत संवेदनशील होते हैं !

दरअसल, पता नहीं किस उत्तेजनावश वे हमारे लेख को सही ढंग से पढ़ ही नहीं पायें। उस लेख का प्रतिपाद्य विषय यही है कि समाजवाद समस्याग्रस्त नहीं है, समस्याग्रस्त है कम्युनिस्ट पार्टियां, जिन्होंने समाजवाद लाने के ऐतिहासिक मिशन की कमान संभालने का बीड़ा उठाया है। अब अगर कम्युनिस्ट पार्टी को दवा मान कर सत्यदेव जी हमारे पर आरोप लगा रहे हो कि हमने ‘मर्ज की नहीं दवा की ज्यादा आलोचना की है’, तो इस अभियोग को हम स्वीकारते हैं। लेकिन हम सिर्फ इतना कहेंगे कि जिसे वे दवा मान रहे हैं, वह दरअसल अपने अभी के रूप में दवा है ही नहीं। अंग्रेजी में जिसे प्लेसिबो कहते है, एक बेअसरदार दवा। ऐसा हमने अपने लेख में भी कहा था और उसमें इसी बात पर विचार किया गया था कि आखिर यह दवा बेअसर होगयी है, तो इसकी वजह क्या है ?

अपने लेख में कम्युनिस्ट पार्टी और समाजवाद के बीच एक अविभाज्य संबंध के सच को मानते हुए हमने इसाई धर्म और सेंट पॉल्स तथा चर्च के बीच के अभिन्न संबंध की समरूपता का उल्लेख किया है। लेकिन आज के चर्च के लिये सेंट पॉल्स और उनके काम एक संदर्भ बिंदु भर है। उसी प्रकार, दुनिया में समाजवाद के लिये लड़ाई के इतिहास से कोई भी सोवियत संघ के अनुभव को मिटा नहीं सकता। लेकिन सोवियत संघ आगे के समाजवाद के लिये एक संदर्भ बिंदु भर है। और हमारा मानना है कि यदि रूस की क्रांति की तर्ज पर आगे कोई समाजवादी क्रांति नहीं हो सकती तो बोल्शेविक पार्टी के संगठन की तर्ज पर गठित कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी आगे के समाजवादी आंदोलन का नेतृत्व भी नहीं दे सकती।

राजनीतिक पार्टी व्यक्ति नहीं, व्यक्तियों का समूह होती है। उन लोगों का समूह जो एक मान्य विचारधारा के अनुसार पूरे समाज को ढालने के लिये एकत्रित हुए हैं। उनका लक्ष्य होता है कि यह पार्टी क्रमश: फैलते-फैलते पूरे समाज या पूरी जनता का रूप ले लें। पार्टी का जनता में पूरी तरह से लोप ही पार्टी का अंतिम गंतव्य है। अपने उस लेख में हमने मूलत: कम्युनिस्ट पार्टी के सांगठनिक सिद्धांत ‘जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद’ पर विचार किया था। और कम्युनिस्ट पार्टी का मानना है कि इसी सिद्धांत के आधार पर आगे पूरे समाज का क्रांतिकारी रूपांतरण होगा।

जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद के सांगठनिक सिद्धांत का एक मूल तत्व है - बहुमत के समक्ष अल्पमत का समर्पण। हमने अपने लेख में उसकी तुलना संसदीय जनतंत्र के सिद्धांत से की है - जिसमें बंदों को गिना जाता है, तौला नहीं जाता। इसीलिये हमने यह आशंका जाहिर की कि यह सिद्धांत समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण का आधार नहीं बन सकता। उल्टे, आज के समय के सभी जनतांत्रिक विमर्शों में जनतंत्र के इस प्रभुत्वकारी संख्या-तत्व को उसकी बुनियादी कमजोरी के तौर पर देखा जाता है और लगातार इस बात पर बल दिया जाता है कि ऐसी हरचंद कोशिश की जानी चाहिए ताकि अल्पमत की आवाज को बहुमत की आवाज की बराबरी का दर्जा मिल सके। इसी सिलसिले में अपने लेख में हमने सहभागी जनतंत्र संबंधी विमर्श का उल्लेख किया था।

इसके विपरीत, जो कम्युनिस्ट पार्टियां वर्तमान संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प देने के लिये मेहनतकशों को लामबंद कर रही है, वे इस प्रकार के ‘सहभागी जनतंत्र’ की तरह के किसी नये विमर्श की दिशा में बढ़ने के बजाय ‘जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद’ को एक ऐसा पवित्र सिद्धांत माने हुए हैं जिसपर सवाल उठाना किसी पाप से कम नहीं है। इसी पर हमने गहरी आपत्ति की। अभी हाल में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 18वीं केंद्रीय कमेटी ने देश के लिये कानून के शासन का खाका तैयार किया है। लेकिन कानून के शासन की चर्चा के साथ ही वहां की कम्युनिस्ट पार्टी इस बात को दोहराने से कभी नहीं चूकती कि कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व अक्षुण्ण रहेगा, वह अलग से संविधान द्वारा सुरक्षित रहेगा, जो एक प्रकट द्वैत है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भी जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद को अपना सांगठनिक सिद्धांत मानती है।

समाजवादी क्रांतियों के मूल में सामाजिक गैर-बराबरी, अन्याय और वंचना की सचाई काम करती रही है। पैरिस कम्यून के छोटे से प्रयोग के बाद पहली समाजवादी क्रांति साम्राज्यवाद की सबसे कमजोर कड़ी में हुई और बाद में भी पिछड़े हुए और विकासशील देशों में इसका विस्तार हुआ। इसी आधार पर दुनिया में समाजवाद के अप्रतिम इतिहासकार एरिक हाब्सवाम ने अब तक के समाजवाद को सारी दुनिया के आधुनिकीकरण के प्रकल्प का ही एक अविभाज्य हिस्सा माना है।

इन स्थितियों में, कम्युनिस्ट पार्टियों की अपनी अलग पहचान बनाने के लिये भी उन्हें जनतंत्र और उसके विकास के प्रति निष्ठा का विशेष परिचय देना होगा। सिर्फ बाहर नहीं अपने अंदर भी। जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद के बहुमत के सामने अल्पमत के समर्पण के बजाय अपने अंदर अल्पमत को समान रूप से सम्मानित स्थान देने के उपाय खोजने होंगे। ‘समान रूप से सम्मानित स्थान’ का मतलब है कि पूरे समाज में जैसे पार्टी के बहुमत की आवाज सुनी जाती है, वैसे ही हमेशा अल्पमत की आवाज को भी सामने आने देना होगा। वास्तव में देखा जाए तो जनतांत्रिक विमर्श ‘जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद’ के दायरे से काफी आगे निकल चुका है। राष्ट्रीय विधायी सभाओं में सानुपातिक प्रतिनिधित्व तो आज दुनिया के बहुत से जनतांत्रिक देशों का सच है। जनतंत्र को सारवान बनाने के ऐसे और भी कई ठोस उपाय हो सकते हैं।

यही हमारे लेख की मुख्य चिंता है जिसके आधार पर पूरे वामपंथी आंदोलन के पुनर्विन्यास पर हमने बल दिया था। पूंजीवाद की जगह समाजवाद की लड़ाई की एक महत्वपूर्ण कड़ी है - जनतंत्र और बहुलतावाद। अभी हाल में जनसत्ता में ही प्रकाशित अपने एक लेख ‘पूंजीवादी विकास का चरित्र’ में हमने यही बताने की कोशिश की है कि पूंजीवाद नैसर्गिक रूप में इजारेदारी, तानाशाही और एकरूपता से जुड़ा हुआ है। समाजवाद को हर रूप में अपने को इससे अलगाना होगा। सीपीआई(एम) ने 1978 में अपने सलकिया प्लेनम में पार्टी को एक जनक्रांतिकारी पार्टी बनाने का निर्णय लेकर उसे बोल्शेविक पार्टी की तरह के लौह सामरिक अनुशासन वाली पार्टी के ढांचे से मुक्त करने का रास्ता अपनाया था। लेकिन यह कम्युनिस्ट आंदोलन का दुर्भाग्य रहा कि वह उस दिशा में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई।

इसी संदर्भ में अपने लेख में हमने जनतांत्रिक केंद्रीयतावाद के बंद ढांचे को तोड़ने की बात कही थी। जाहिर है ऐसे ‘अनादि अपौरुषेय सिद्धांत’ पर सवाल उठाना एक पाप है और किसी भी आस्थावादी के कोप का भाजन बनने का यथेष्ट कारण। हम इस अपराध को स्वीकारते हैं।

गालिब बुरा न मान , जो वाइज बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

गोडसे की मूर्ति हिंदू महासभा क्यों लगा रहा है ?

खबर सरगर्म है कि हिंदू महासभा वालों ने नाथूराम गोडसे की प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया है। नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार हिंदू महासभा ने राजस्थान के किशनगढ़ से गोडसे की प्रतिमा तैयार करवाई है। इस प्रतिमा को उस रूम में रखा गया है, जहां गोडसे अपने दिल्ली दौरे में हत्या की योजना बनाने के लिए ठहरा करता था। हालांकि, प्रतिमा लगाने के लिए स्थान और तारीख का चुनाव अब तक नहीं हो पाया है।
हमारी आशंका है कि हिंदू महासभा द्वारा गोडसे की प्रतिमा की स्थापना की खबर कहीं आरएसएस के साथ गोडसे के संबंधों पर पर्दादारी की एक सोची समझी चाल तो नहीं है ? इतिहास का तथ्य यह है कि गांधी जी की हत्या के समय तक गोडसे हिंदू महासभा के नेतृत्व का आलोचक हो गया था और उस पर आरएसएस के विचारों का पूरा प्रभाव था। इस संदर्भ में हम अपनी किताब ‘आरएसएस और उसकी विचारधारा’ के उस अंश को यहां दे रहे हैं जो गांधी हत्या से जुड़े इस सच को उजागर करता है।

गांधी की हत्या

"वे (आरएसएस) गांधीजी की हत्या से इंकार करते है। सरकार ने भी मामले की जाँच करने के बाद सीधे तौर पर आर एस एस को उसके लिए अपराधी घोषित नहीं किया।यह बात सच है कि नाथूराम गोडसे पर चले मुकदमें में यह साबित नहीं किया जा सका था कि गोडसे आरएसएस का सदस्य था। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि उस समय तक आरएसएस का अपना कोई संविधान नहीं था, और न ही उसके सदस्यों का कोई बाकायदा रेकर्ड। आरएसएस की इसी सख्त गोपनीयता के कारण शुद्ध रूप से तकनीकी स्तर पर अदालत में तब यह साबित नहीं किया जा सका था कि गांधीजी का हत्यारा नाथूराम आरएसएस का सदस्य था। लेकिन आरएसएस के साथ नाथूराम के लंबे काल से संपर्क थे, इसके बारे में अब तक ढेरों तथ्य प्रकाश में आ चुके हैं। गोडसे की विचारधारा आरएसएस की विचारधारा से जरा भी भिन्न नहीं थी और वह एक समय में आरएसएस का सक्रिय प्रचारक था, इसे अब साबित करने की जरूरत नहीं है।

जिस प्रकार आरएसएस भारत की आजादी को ’’मुसलमानों के हाथों हिंदुओं की पराजय’ बताता रहा है, उसी तर्क पर नाथूराम ने अदालत में दिये गये अपने बयान में गांधीजी की हत्या को एक देशभक्तिपूर्ण काम बताया था और छाती ठोक कर कहा था कि ’’यदि देशभक्ति पाप है तो मैं जानता हूँ मैंने पाप किया है। यदि प्रशंसनीय है तो मैं अपने आपको उस प्रशंसा का अधिकारी समझता हूँ।...मैंने देश की भलाई के लिए यह काम किया। मैंने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीति से हिन्दुओं पर घोर संकट आए, हिन्दू नष्ट हुए।’’ (गोपाल गोडसे, ’’गांधी वध क्यों’ में नाथूराम गोडसे के अदालत को दिए गए बयान से, पृ. 113)

गांधी जी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे ने अदालत में जो बयान दिया उसमें उसने खुद स्वीकार किया था कि उसने ’’कई वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में काम किया है।’’ बाद में वह हिन्दू महासभा में आ गया था, लेकिन आजादी के बाद कांग्रेस सरकार के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, इस प्रश्न पर हिन्दू महासभा के नेता सावरकर से उसके मतों का मेल नहीं बैठा। सावरकर आजादी की रक्षा के लिए नई सरकार को समर्थन देने के पक्ष में थे जो गोडसे को सही नहीं लगा और उसने सावरकर का साथ छोड़ दिया। (गोपाल गोडसे, वही, पृ. 62)

"वास्तविकता यह है कि सावरकर जहाँ देश की आजादी को एक महत्त्वपूर्ण विजय समझते थे, वहीं आर एस एस इसे राष्ट्रीय पराजय, हिन्दुओं को मिली मात मानता था। आर एस एस का पुराना स्वयंसेवक रह चुका नाथूराम गोडसे इस मामले में पूरी तरह आर एस एस के मत का था। सावरकर तिरंगे झण्डे को राष्ट्रीय ध्वज की मर्यादा देना उचित समझते थे, नाथूराम आर एस एस के विचारों का हामी होने के नाते इसका भी विरोधी था।

उसी के शब्दों में : ’’वीर सावरकर ने स्वयं आगे बढ़कर कहा कि चक्रवाले तिरंगे झण्डे को राष्ट्रध्वज स्वीकार किया जाएँ। हमने इस बात का खुला विरोध किया।’’ (गोपाल गोडसे, वही, पृ. 63)

"पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये की शेष राशि दिए जाने के प्रश्न पर भी आर एस एस और गोडसे के विचार एक थे। गांधी जी की हत्या के ठीक पहले के ’’आर्गनाइजर’, ’’पाँचजन्य’ के अंकों को देखने से ही साफ पता चल जाता है कि आर एस एस किस प्रकार गांधीजी के खिलाफ जहरीला वातावरण तैयार कर रहा था। नाथूराम गोडसे ने फाँसी के फंदे पर उसी प्रार्थना को दोहराया था जो आर एस एस के स्वयंसेवक रोज शाखा के कार्यक्रम में किया करते हैं।

"खुद गोलवलकर जिन शब्दों में गांधी जी की हत्या के समय की परिस्थिति का बयान किया करते थे, वही परोक्ष रूप में यह साबित करता है कि इस हत्या को वे एक प्रकार से परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम मानते थे। गोलवलकर के जीवनीकार प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे के शब्दों में : ’’सम्पूर्ण देश में क्षोभ फैला हुआ था। महात्मा गांधी ने उस समय अपना मुकाम हेतुत: दिल्ली में रखा था। प्रतिदिन अपनी सायं प्रार्थना-सभा में वे लोगों को शान्ति, प्रेम एवं बनु-भावना का महत्त्व समझाते थे। भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये अवश्य दें, ऐसा वे कहते थे। उसके लिए वे आमरण अनशन के लिए भी जिद किए हुए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से आहत और व्यथित लोग गांधी जी को बुरा-भला कहने लगे।

’’इनके इस प्रकार से बोलने से ही मुसलमान सिर पर चढ़ बैठे हैं। इनके वक्तव्यों से पाकिस्तान को बल मिलता है।’’ इस प्रकार की आलोचना सर्वत्र होने लगी। कुछ युवक आपे से बाहर हो गए। उनमें से एक ने 30 जनवरी, 1948 की शाम को, प्रार्थना-सभा में पिस्तौल चलाकर गांधी जी की हत्या कर दी।’’ (प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे, श्री गुरू जी, एक जीवन यज्ञ, पृ. 59)

"गाधीजी की हत्या के ठीक बाद ही इस तथ्य को अनेक ने नोट किया था कि आरएसएस के लोगों ने खुशी मनाते हुए आपसे में मिठाइयां बांटी ।  गांधीजी के निजी सचित प्यारेलाल की पुस्तक ’’महात्मा गांधी द लास्ट फेज’ के दूसरे खंड में गांधीजी की हत्या के पूरे षड़यंत्र का और उसमें आरएसएस  वालों की भूमिका का विस्तार से जिक्र किया गया है। इसमें उन्होंने बताया है कि सरकार को हत्या के इस षड़यंत्र के पुख्ता सबूत मिल गये थे। पहला विफल प्रयास तो 20 जनवरी के दिन ही कर लिया गया था, जिसमें गोडसे भी शामिल था। सरदार पटेल ने इस पर गांधीजी से अनुरोध किया था कि आगे से उनकी प्रार्थना सभा में शामिल होने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पुलिस तलाशी लेगी। लेकिन गांधीजी ने यह कह कर पुलिस के पहरे से इंकार कर दिया कि कि प्रार्थना सभा में जब वे खुद को ईश्वर की पूर्ण सुरक्षा के सुपुर्द कर देते हैं, उस समय उन्हें मनुष्य द्वारा दी गयी सुरक्षा मंजूर नहीं है। सरदार पटेल को गांधीजी की जिद को मानना पड़ा था। लेकिन प्यारेलाल ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि जब सरकार को इस प्रकार के षड़यंत्र का पता चल गया था, तब फिर क्यों नहीं उस षड़यंत्र को पहले ही विफल कर देने के लिये अन्य स्तरों पर उचित कार्रवाइयां की गयी। इसी सिलसिले में वे आगे लिखते हैं कि सरकार की ’’यह विफलता इस बात का संकेत थी कि किस हद तक यह गंदगी (आरएसएस के विचारों की गंदगी -अ.मा.) प्रशासन की अनेक शाखाओं तक फैल चुकी थी, जिससे पुलिस भी नहीं बची थी। दरअसल, यह बाद में प्रकाश में आया कि आरएसएस के संगठन की शाखाए-प्रशाखाएं सरकारी विभागों तक में फैल चुकी थी, आम कर्मचारी तो क्या, यहां तक कि पुलिस अधिकारियों में से भी कइयों की उसके प्रति सहानुभूति थी और वे आरएसएस के कामों में शामिल लोगों की सक्रिय सहायता किया करते थे। ...सरदार पटेल को हत्या के बाद एक नौजवान, जिसने खुद स्वीकारा था कि वह भी कभी आरएसएस का सदस्य था लेकिन बाद में उसका मोहभंग होगया था, से जो पत्र मिला उसमें बताया गया है कि कैसे कुछ स्थानों पर आरएसएस के सदस्यों को यह कहा गया था कि वे उस भाग्यशाली शुक्रवार के दिन ’’अच्छी खबर’ सुनने के लिये अपने रेडियो चालू रखे। खबर आने के बाद दिल्ली सहित कई स्थानों पर आरएसएस के लोगों ने आपस में मिठाइयां बांटी।’’

"प्यारेलाल ने इस षड़यंत्र में नाथूराम गोडसे के साथ प्रत्यक्ष रूप से शामिल पुणे से निकलने वाले ’’हिंदू राष्ट्र’ अखबार के संपादक नारायण डी आप्टे, दिगंबर डी बेज, गोपाल गोडसे, करकरे, मदनलाल पहवा आदि के जो नाम दिये हैं, उन सबके बारे में साफ लिखा है कि ’’वे सभी हिंदू महासभा अथवा आरएसएस के सदस्य थे।’’      

"सहस्त्रबुद्धे ने गांधी जी की शान्ति, प्रेम की बातों तथा पाकिस्तान को 55 करोड देने की बात पर नौजवानों के जिस गुस्से की बात लिखी है, वह गुस्सा और कहीं नहीं आर एस एस के मंचों पर ही व्यक्त किया जाता था। "


http://navbharattimes.indiatimes.com/india/nathuram-godses-statue-made-preparing-to-install-in-delhi/articleshow/45528068.cms

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

उबर, पूंजीवाद, प्रतिद्वंद्विता और इजारेदारी




अरुण माहेश्वरी

उबर कांड ने दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक में एक भारी हलचल पैदा की है। सारी दुनिया में अभी इस कंपनी का शोर है। मात्र चार साल पहले सैन फ्रांसिस्को में यात्रियों को बड़ी और आलीशान गाडि़यों की सुविधा आसानी से मुहैय्या कराने के उद्देश्य से बनायी गई इस कंपनी ने देखते ही देखते सारी दुनिया के पूरे टैक्सी बाजार पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेने का आतंक पैदा कर दिया है। अब तक 50 देशों के 230 शहर में इसने अपने पैर पसार लिये हैं और हर हफ्ते इसके दायरे में एक नया शहर आता जा रहा है। चार साल पहले की इस मामूली कंपनी की आज बाजार कीमत 40 बिलियन डालर कूती जा रही है।

उबर और ऐसी ही सिलिकन वैली की दूसरी तमाम कंपनियों के इस विश्व-प्रभुत्व अभियान ने दुनिया में प्रतिद्वंद्विता बनाम इजारेदारी की पुरानी बहस को फिर एक बार नये सिरे से खड़ा कर दिया है। दिल्ली की सत्ता के गलियारों में गृह मंत्रालय और परिवहन मंत्री के परस्पर-विरोधी बयानों में भी कहीं न कहीं, सूक्ष्म रूप से ही क्यों न हो,  उसी वैचारिक द्वंद्व की गूंज सुनाई देती है।
व्यापार और वाणिज्य की दुनिया में यह एक अनोखे प्रकार का घटनाक्रम है। मार्क्स ने पूंजीवाद के तहत पूंजी के संकेंद्रण को पूंजीवाद की नैसर्गिकता बताया था। सामान्य तौर पर मार्क्स के उस कथन की ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है’ की तरह के मतस्य-न्याय से तुलना की जाती रही है। इसके मूल में संकेन्द्रण की प्रक्रिया को दर्शाने वाला मार्क्स का यह कथन था कि संपत्तिहरणकारियों का संपत्तिहरण होता है। लेकिन आज जिस प्रकार कुकुरमुत्तों की तरह विश्व इजारेदारी कायम करने वाली ढेर सारी कंपनियों का कोलाहल सुनाई दे रहा है, इस प्रकार के नये परिदृश्य का इससे कोई भान नहीं होता था। इस लिहाज से यह एक बिल्कुल नयी परिघटना प्रतीत होती है - जिसे आज के अर्थशास्त्री ‘नेटवर्किंग एफेक्ट’ (इंटरनेट की संतानें) बताते हैं। इंटरनेट के तानेबाने से उत्पन्न एक नयी सामाजिक परिघटना। इसीकी रोशनी में इजारेदारी बनाम प्रतिद्वंद्विता की बहस ने भी आज एक नया आयाम ले लिया है।
पूंजीवादी अर्थशास्त्री आज तक प्रतिद्वंद्विता को पूंजीवाद की सबसे बड़ी आंतरिक शक्ति, उसकी आत्मा बताते रहे हैं। पूंजीवाद के निरंतर विकास और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता का तथाकथित प्रमुख स्रोत ; बाजार का मूल तत्व। इसके बरक्श पूंजीवाद के पैरोकार इजारेदारी को हमेशा एक सामाजिक बुराई, एक विचलन के तौर पर देखते हैं, जो उनके अनुसार पूंजीवाद की आंतरिक गतिशीलता का, उसकी आत्मा का हनन करती है और व्यापक समाज का भी अहित करती है। अमेरिका सहित सभी विकसित पूंजीवादी देशों के संविधान में इजारेदारी को रोकने के कानूनी प्राविधान है और गाहे-बगाहे इन प्राविधानों का अक्सर प्रयोग भी किया जाता रहा है। भारत में भी उन्हीं की तर्ज पर बदस्तूर एमआरटीपी एक्ट बना हुआ है।
अमेरिकी इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब राज्य की ओर से सीधे हस्तक्षेप करके आर्थिक इजारेदारियों को तोड़ने के कदम उठाये गये। अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडर रूजवेल्ट को तो इतिहास में ‘ट्रस्ट बस्टर’ अर्थात ‘इजारेदारी भंजक’ की ख्याति प्राप्त है, जिन्होंने 1901-1909 के अपने शासन काल में 44 अमेरिकी इजारेदार कंपनियों को भंग किया था। अमेरिका में सबसे पहला इजारेदारी-विरोधी कानून शरमन एंटी ट्रस्ट एक्ट 1850 में बना था। उसके बाद  क्लेटन एंटी ट्रस्ट एक्ट और फेडरल ट्रेड कमीशन एक्ट (1914), रॉबिन्सन-पैटमैन एक्ट (1936) तथा सेलर-केफोवर एक्ट (1850) आदि कई कानून बने। अमेरिका में कंपनियों की इजारेदाराना हरकतों को लेकर हमेशा अदालतों में कोई न कोई मुकदमा चलता ही रहता है।
लेकिन, आज वेंचर कैपिटल के सहयोग से कुकुरमुत्तों की तरह अमेरिकी गराजों से विश्व विजय पर निकलने वाली इन नये प्रकार की इजारेदाराना कंपनियों के सिलसिले में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सचमुच इजारेदारी पूंजीवाद की आंतरिक ऊर्जा को सोखती है और समाज का अहित करती है ? आज की दुनिया की सबसे बड़ी माने जानी वाली कंपनियां माइक्रसोफ्ट, गूगल, एपल, फेसबुक आदि सब रास्ते के छोकरों का ऐसा करिश्मा है जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। और आज इन कंपनियों की स्थिति यह है कि इनसे सारी दुनिया की सरकारें एक स्तर पर खौफजदा होने पर भी कोई इनसे आसानी से किनारा करने के लिये भी तैयार नहीं है। सबके लिये ‘न निगलते बने न उगलते बने’ वाली स्थिति बनी हुई है। खुद अमेरिका में भी यही हाल है। पिछले दिनों अमेरिकी अदालतों में माइक्रोसोफ्ट, गूगल आदि को लेकर जितने भी मुकदमे चले, उन सबमें न्यायाधीशों ने इन कंपनियों के बारे में कोई साफ राय देने में अपने को लगभग असमर्थ पाया है। इनपर रोक, या इन्हें भंग करने के बजाय अधिकांश फैसलें इन्हें आगे एहतियात बरत कर चलने की हिदायत देने तक सीमित रहे हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है गूगल पर इजारेदारी कायम करने के लिये चलाये गये मुकदमे का परिणाम। इसमे गूगल को सिर्फ डांट पिला कर छोड़ दिया गया। जानकारों का कहना है कि उससे गूगल के काम करने के ढंग में जरा सा भी फर्क नहीं आया है।


सारी दुनिया में इंटरनेट और मोबाइल के जरिये भुगतान करने की सुविधा उपलब्ध कराने वाली कंपनी पे पॉल के संस्थापक पीटर थियेल की अभी इसी सितंबर महीने में किताब आई है - जीरो टू वन (नोट्स आन स्टार्ट्स अप ऑर हाउ टू बिल्ड द फ्यूचर)। थियेल ही है जिसने जुकरबर्ग के फेसबुक में सबसे पहले निवेश किया था। अपनी इस किताब में थियेल ने प्रतिद्वंद्विता के प्रति सामान्य तौर पर अर्थशास्त्रियों और सरकारों के अति-आग्रह को लताड़ते हुए कहा कि यह सोच कि प्रतिद्वंद्विता से ग्राहक को लाभ होता है, इतिहास के कूड़े पर फेंक देने लायक सोच है। प्रतिद्वंद्विता सफलता की नहीं विफलता की द्योतक है। किसी भी समस्या के समाधान के ‘एकमात्र’ हल को प्राप्त करना ही सफलता है और इसीलिये इजारेदारी में ही समाज का हित है।



मार्क्स ने पूंजीवाद के तहत उत्पादन के साधनों के क्रांतिकारण की जिस लगातार और अनिवार्य प्रक्रिया की बात कही थी, थियेल लगभग उसी बात को थोड़े दूसरे अंदाज में, नाक को घुमा कर पकड़ने के अंदाज में कह रहा है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र में कहा गया था कि ‘‘उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी परिवर्तन और उसके फलस्वरूप उत्पादन संबंधों में, और साथ-साथ समाज के सारे संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन के बिना पूंजीपति वर्ग जीवित नहीं रह सकता। ...उत्पादन प्रणाली में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तन, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल-पुथल, शाश्वत अनिश्चयता और हलचल - ये चीजें पूंजीवादी युग को पहले के सभी युगों से अलग करती है। सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वाग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रंखला होती है, मिटा दिये जाते हैं, और सभी नये बननेवाले संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है, वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों को, मानव मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।’’
घोषणापत्र में व्यक्त यह सचाई आज और भी प्रकट रूप में हमारे सामने हैं। प्रतिद्वंद्विता को पूंजीवाद की पवित्र आत्मा मानने वाले पूंजीवादी अर्थशास्त्री उसके अंदर की खोजपरकता (innovativeness) में निहित बाजार पर इजारेदारी कायम करने की प्रवृत्ति पर पर्दादारी करते हैं और पूंजीवाद को आर्थिक जनतंत्र के साथ, बहुलता के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा बताते हैं। पूंजीवाद के सबसे उल्लेखनीय प्रवक्ता जोसेफ शुम्पेतर ने ‘30 के दशक में ही नयी खोज के जरिये बाजार पर कब्जा करने के सच को लक्षित किया था, लेकिन पीटर थियेल ने तो अपनी किताब के जरिये पूंजीवाद के तहत इजारेदारी का पूरा शास्त्र ही रच दिया है। वे अपनी किताब में उद्यमियों को प्रतिद्वंद्विता की नहीं, इजारेदारी कायम करने की सीख देते हैं। उसकी दृष्टि में ‘‘प्रतिद्वंद्विता तो पराजितों का राग है। आप यदि टिकाऊ मूल्य पैदा और प्राप्त करना चाहते हैं तो इजारेदारी कायम करो।’’

‘जीरो टू वन’ के प्राक्कथन की पहली पंक्ति ही है - ‘‘ व्यापार में हर क्षण सिर्फ एक बार घटित होता है। अगला बिल गेट्स ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं बनायेगा। अगला लैरी पेज या सर्गे ब्रिन सर्च इंजन नहीं बनायेगा। और अगला जुकरबर्ग सोशल नेटवर्क तैयार नहीं करेगा। आप यदि इन लोगों की नकल कर रहे हैं तो आप उनसे कुछ नहीं सीख रहे हैं।’’


आज सिलिकन वैली की गूगल, माइक्रोसोफ्ट की तरह की तमाम कंपनियों के बीच भी कभी-कभी प्रतिद्वंद्विता के जो चिन्ह दिखाई देते हैं, वे बेहद कमजोर से चिन्ह हैं। सचाई यह है कि सिलिकन वैली की तमाम कंपनियां उन क्षेत्रों से अपने को धीरे-धीरे हटा लेती है, जिन क्षेत्रों में एक कंपनी ने बढ़त हासिल कर ली है। और जो दूसरे उपेक्षित क्षेत्र, जिनकी ओर अभी दूसरों का ध्यान नहीं गया है, उन पर अपने को केंद्रित करती है। विश्व विजय में उतर रहे उबर की तरह के नये रणबांकुरे भी अभी किसी भी क्षेत्र में सीधे ताल ठोक कर किसी पहले से स्थापित कंपनी से प्रतिद्वंद्विता के लिये काम नहीं कर रहे हैं। इस मामले में उनकी दृष्टि हमारे ‘एक और ब्रह्मांड’ के नायक राधेश्याम जैसी ही है, जिसने स्थापित ब्रांडों से टकराते हुए अपना ब्रांड बनाने के बजाय ‘‘किसी निर्जन या उजड़े हुए पथ पर ही अपनी बांसुरी की तान छेड़ना श्रेयस्कर समझा। प्रसाधन के आधुनिक क्षेत्र के बजाय पुरातन, आयुर्वेद के क्षेत्र का चयन किया। ...आज की चकदक पैकिंग में आयुर्वेदिक उत्पाद - रॉक की थाप पर ‘रघुपति राघव राजा राम’ - आधुनिकता की प्रक्रिया में पूर्व-आधुनिक सम्मोहन की छौंक का उत्तर-आधुनिक सौन्दर्यशास्त्र...पुरातन के इंद्रजाल पर टिका एक सर्वाधुनिक रास्ता।’’

फेसबुक को देखिये। छात्रों के एक समूह के बीच आपसी संपर्कों के उद्देश्य से तैयार किया गया सोशल नेटवर्किंग साइट रातो-रात सारी दुनिया में अरबों लोगों के बीच संपर्कों का साइट बन गया। यह एक खास सामाजिक परिस्थिति की उपज भी है। जब तक व्यापक पैमाने पर लोगों के हाथ में मोबाइल फोन या टैब्लेट, कमप्यूटर न हो, तब तक इसप्रकार के पूरे संजाल और उसपर आधारित इन नयी इजारेदारियों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
समग्र रूप से आज विश्व अर्थनीति की परिस्थितियां किस दिशा में जा रही है, उसका एक ब्यौरा मिलता है सन माउक्रोसिस्टम्स के सह-संस्थापक, कमप्यूटर तकनीक के क्षेत्र के एक बादशाह विनोद खोसला की 11 जून 2014 की ‘फोर्ब्स’ पर लगायी गयी पोस्ट से। चीज़ें जिस गति से बदल रही है,  वास्तव में उसका आसानी से अंदाज भी नहीं लगाया जा सकता है ।

विनोद खोसला कमप्यूटर की दुनिया का एक विश्वप्रसिद्ध नाम है, जिसने कमप्यूटर की जावा प्रोग्रामिंग की भाषा और नेटवर्क फाइलिंग सिस्टम को तैयार करने में प्रमुख भूमिका अदा की थी। आज उनकी कंपनी खोसला वेंचर्स सूचना तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में एक हैं। अपनी इस पोस्ट, ”The Next Technology Revolution Will Drive Abundance And Income Disparity” (अगली तकनीकी क्रांति समृद्धि और आमदनी में असमानता लायेगी) की शुरूआत ही वे इस बात से करते हैं कि आगे आने वाले समय में और भी बड़ी-बड़ी तकनीकी क्रांतियां होने वाली हैं, लेकिन जिस एक चीज का मनुष्य पर सबसे अधिक असर पड़ेगा, वह है ऐसी प्रणालियों का निर्माण जिनमें मनुष्य की विचार करने की शक्ति से कहीं ज्यादा गहराई से विचार करने की, निर्णय लेने की क्षमताएं होगी। विचारशील मशीन, जिसे दूसरे शब्दों में कृत्रिम बुद्धि कहा जाता है, उसमें जटिल से जटिल विषयों पर निर्णय लेने में समर्थ तकनीकी प्रणाली के निर्माण की दिशा में बड़ी तेजी से काम चल रहा है। उदाहरण के तौर पर, पांच साल पहले तक गाड़ी चलाना कमप्यूटर के लिये एक बेहद कठिन चीज समझी जाती थी, लेकिन अब यह एक सचाई बन चुकी है।


खोसला लिखते हैं कि इस बात पर बिना मगजपच्ची किये कि क्या-क्या संभव है, कम से कम इतना जरूर कहा जा सकता है कि सृजनात्मकता के क्षेत्र में, भावनाओं और समझदारी के क्षेत्र में, मसलन, श्रोताओं को मुग्ध करने वाली संगीत की सबसे अच्छी बंदिश, पाठकों के मन को छूने वाली प्रेम कहानी या अन्य रचनात्मक लेखन में तो यह प्रणाली बहुत ही कारगर साबित होगी, क्योंकि उसके पास श्रोताओं और पाठकों को छूने वाले तमाम पक्षों और संगीत तथा लेखन के अब तक के विकास की पूरी जानकारी होगी।

इस विषय पर आगे और विस्तार से जाते हुए खोसला बताते हैं कि मनुष्य की श्रम-शक्ति और मानवीय विचारशीलता की जरूरत जितनी कम होगी, पूंजी की तुलना में श्रम शक्ति की और विचारशील मशीन की तुलना में मनुष्य के विचारों की कीमत उतनी ही कम होती जायेगी। ‘‘प्रचुरता और आमदनी में बढ़ती हुई विषमता के युग में हमें पूंजीवाद के एक ऐसे नये संस्करण की जरूरत पड़ सकती है जो सिर्फ अधिक से अधिक दक्षता के साथ उत्पादन पर केन्द्रित न रह कर पूंजीवाद के अन्य अवांछित सामाजिक परिणामों से बचाने के काम पर केन्द्रित होगा।’’

अपने इस लेख में खोसला ने विचारवान मशीन के निर्माण के उन तमाम क्षेत्रों की ठोस रूप में चर्चा की हैं जिनमें खुद उनकी कंपनी तेजी से काम कर रही है और जिनके चलते खेतिहर मजदूरों, गोदामों में काम करने वाले मजदूरों, हैमबर्गर बनाने वालों, कानूनी शोधकर्ताओं, वित्तीय निवेश के मध्यस्थों तथा हृदय रोग और ईएनटी रोग के विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों आदि की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी। इनके कामों को मशीनें कहीं ज्यादा दक्षता के साथ कर दिया करेगी।

उनका साफ कहना है कि अतीत के आर्थिक इतिहास में, हर तकनीकी क्रांति से जहां कुछ प्रकार के रोजगार खत्म हुए तो वहीं कुछ दूसरे प्रकार के रोजगार पैदा हुए। लेकिन आगे ऐसा नहीं होगा। ‘‘आर्थिक सिद्धांत मुख्य रूप से कार्य-कारण के बजाय अतीत के अनुभवों पर टिके होते हैं, लेकिन यदि रोजगार पैदा करने के मूल चालक ही बदल जाए तो उसके परिणाम बिल्कुल अलग होसकते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से तकनीक आदमी की क्षमताओं को बढ़ाती और तीव्र करती रही है, जिससे मनुष्य की उत्पादनशीलता बढ़ी है। लेकिन यदि किसी भी ख़ास काम के लिये बुद्धि और ज्ञान, इन दोनों मामलों में बुद्धिमान मशीन आदमी से श्रेष्ठ बन जाती है तो कर्मचारियों की कोई जरूरत ही नहीं रह जायेगी और इसके चलते आदमी का श्रम दिन प्रति दिन सस्ता होता जायेगा।’’ उनकी राय में कोई भी आर्थिक सिद्धांत बेकार साबित होगा यदि उसमें अतीत की तकनीकी क्रांतियों और इन नयी विचारशील मशीनी तकनीक के बीच के फर्क की समझ नहीं होगी।

इस सिलसिले में खोसला कार्ल मार्क्स को उद्धृत करते हैं - ‘‘इतिहास की गाड़ी जब किसी घुमावदार मोड़ पर आती है तो बुद्धिजीवी उससे झटक कर औंधे मूंह गिर जाते हैं।’’ अर्थशास्त्रियों का अतीत के अनुभवों को अपना अधिष्ठान बनाने का ढंग भविष्य के लिये वैध साबित नहीं होगा । एक नये कार्य-कारण संबंध से पुराने, ऐतिहासिक परस्पर-संबंध टूट सकते हैं। जो लोग कमप्यूटरीकरण से रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का हिसाब-किताब किया करते हैं, और अब भी कर रहे हैं, वे इस बात को समझ ही नहीं रहे हैं कि आगे तकनीक क्या रूप लेने वाली है और उनके सारे अनुमान अतीत के अनेक ‘सत्यों’ की तरह झूठे साबित हो सकते हैं।

खोसला की तरह पीटर थियेल ने भी अपनी किताब में इजारेदारी के पक्ष में यही दलील दी है कि इजारेदारी से दुनिया में एक बिल्कुल नये प्रकार की समृद्धि पैदा होती है। इजारेदारी के तहत होने वाली खोजों से जिन्दगी नये रूप में संवरती है। 1911 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जब ट्रस्ट विरोधी कानून के जरिये स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी को 34 अलग-अलग कंपनियों में विभाजित कर दिया था, उस फैसले में भी इस तथ्य को नोट किया गया था कि 1880 से तेल के व्यापार पर एकाधिकार बनाये रखने वाली इस कंपनी ने अतीत में कुछ ऐसे काम भी किये हैं जिनसे उपभोक्ता का और पूरे समाज का भला हुआ था। मसलन, इसी कंपनी ने केरोसिन तेल को इजाद किया जो जलकर चमकता है, लेकिन उसमें विस्फोट नहीं होता, जबकि बाकी सभी ज्वलनशील तेल में चमक के साथ ही विस्फोट हो जाता है। उस कंपनी ने शोध कार्य और दूसरी ढांचागत सुविधाओं के विकास में अच्छा खास निवेश किया था। उसीने कई प्रकार की चिकनाई वाले तेल भी विकसित किये। ये सारे काम तेल के क्षेत्र में इजारेदारी और भारी पूंजी की उपलब्धता के बिना संभव नहीं हो सकते थे।

इन्हीं तमाम तथ्यों की रोशनी में खोसला ने अपनी पोस्ट में साफ कहा है कि वे पूंजीवाद के कट्टर समर्थक है और इसी नाते वे साफ शब्दों में कहते हैं कि आज जो कुछ चल रहा है, उसे अबाध गति से और भी तेजी के साथ चलने दिया जाना चाहिए। खोसला की इस पोस्ट पर पिछले दिनों अपने ब्लाग में इस लेखक ने एक टिप्पणी की थी। उसमें हमने श्रम का कोई मूल्य न रह जाने वाले उनके कथन के पहलू पर यह बुनियादी सवाल उठाया था कि यदि किसी समाज में श्रम शक्ति का मूल्य नहीं रहता है तो फिर पूँजी का भी क्या मूल्य रह जायेगा ? श्रमिक और पूँजीपति का अस्तित्व परस्पर निर्भर है । यदि पूँजीपति की भूमिका उत्पादन के काम में ख़त्म हो जाती है तो श्रमिक की तरह ही उसके अस्तित्व का भी कोई कारण बचा नहीं रह जाता है। अगर कुछ बचा रह जाता है, तो वह है, राज्य की भूमिका । ऐसे में हमारा यह निष्कर्ष था कि समाज के अंदर वर्गीय अन्तर्विरोधों के अंत के साथ राज्य के वर्गीय चरित्र का भी लोप हो जाता है । हमने पूछा था, क्या सचमुच, एक शोषण-विहीन, राज्य-विहीन समाज के निर्माण का मार्क्स का यूटोपिया आदमी की जद के इतना क़रीब है ?

बहरहाल, तेजी के साथ कुकुरमुत्तों की तरह पनप रही नाना प्रकार की इजारेदारियों और तमाम सामाजिक संबंधों में आने वाले भूचाल को देखते हुए पिटर थियेल और बिनोद खोसला जिस साफगोई के साथ पूंजीवाद के सच का बयान कर रहे हैं, उससे कम्युनिस्ट घोषणापत्र से लिये गये उपरोक्त उद्धरण की उस बात की एक साफ झलक मिलती है जिसमें कहा गया था कि ‘‘ जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है, वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों को, मानव मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।’’ थियेल और खोसला जिस संजीदगी से जीवन की मौजूदा वास्तविक स्थिति को देख पा रहे हैं, वह पारंपरिक अर्थशास्त्रियों की दृष्टि पर छाये हुए कोरे भ्रमों से पूरी तरह मुक्त है। थियेल साफ कहता है कि अमेरिकी प्रतिद्वंद्विता को एक मिथक बना दे रहे हैं और इस बात का श्रेय लेते है कि वे इसके जरिये समाजवाद से रक्षा कर रहे हैं। सच यह है कि पूंजीवाद और प्रतिद्वंद्विता दो विरोधी चीजें हैं। पूंजीवाद पूंजी के संचय पर टिका हुआ है, लेकिन वास्तविक प्रतिद्वंद्विता की परिस्थिति में तो सारा मुनाफा प्रतिद्वंद्विता की भेंट चढ़ जायेगा।’’

All fixed, fast-frozen relations, with theirtrain of ancient and venerable prejudices and opinions, are swept away, all new-formed ones become antiquated before they can ossify. All that is solid melts into air, all that is holy is profaned, and man is at last compelled to face with sober senses his real conditions of life, and his relations with his kind
थियेल साफ कहता है कि पेटेंट देने के काम के जरिये सरकार का एक विभाग भी तो इजारेदारी कायम करने के काम में ही लगा हुआ है।

‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के एक ताजा अंक में, इजारेदारियों से आच्छादित इस पूरे आर्थिक परिदृश्य के वृत्तांत के अंत में अमेरिकी सिनेटर जॉन सरमैन के इस कथन को उद्धृत किया गया है कि ‘‘हमें उत्पादन, परिवहन और जीवन की जरूरत की किसी भी चीज के विपणन के लिये शहंशाह की कामना नहीं करनी चाहिये, भले वे हमारे लिये चीजों को कितना भी आसान क्यों न बनाते हो।’’ इसप्रकार, सरमैन अभी भी, वही पुराना पूंजीवाद और प्रतिद्वंद्विता, पूंजीवाद और जनतंत्र तथा पूंजीवाद और बहुलतावाद वाला राग ही अलाप रहे है, जबकि जो सच सामने आरहा है वह इन सबके सर्वथा विपरीत है। पूंजीवाद की नैसर्गिकता प्रतिद्वंद्विता में नहीं, जनतंत्र में नहीं और न ही बहुलतावाद में है। पूंजीवाद का अन्तर्निहित सच है इजारेदारी, तानाशाही और एकरूपता। इसीलिये यह सभ्यता के सच्चे जनतंत्रीकरण के रास्ते की एक पहाड़ समान बाधा है और, इसीलिये यह आश्चर्य नहीं है कि अमेरिका के खास हलकों में चीन का शासनतंत्र आजकल काफी ज्यादा चर्चा में हैं ! दिल्ली की सत्ता के गलियारे में भी उबर पर पाबंदी के फौरन बाद उतनी ही जोरदार आवाज में इस कदम के पीछे विवेक की कमी की आवाज का उठना भी अस्वाभाविक नहीं है। पूंजीवादी विकास का रास्ता सिर्फ और सिर्फ इजारेदारियों के जरिये ही आगे बढ़ सकता है।











सोमवार, 8 दिसंबर 2014

नन्द भारद्वाज के नाम खुला पत्र


प्रिय नन्द भारद्वाज जी,
‘नया पथ’ और उसकी सामग्री को पुस्तकाकार में प्रकाशित किये जाने के प्रसंग पर जलेस के एक और वरिष्ठ अधिकारी जवरीमल पारीख का भी एक खुलासा आया है। इसमें वे लिखते हैं : ‘‘ नया पथ के अंकों की सामग्री लेकर जो पुस्तकें तैयार की गयी, वह किया जाना उचित था या अनुचित मैं नहीं जानता. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पुस्तकों की जरूरत थी... इन अंकों के पुस्तकाकार छपने से नया पथ को भी लाभ हुआ है. मसलन १८५७ वाले अंक का पूरा खर्चा नया पथ का बच गया था क्योंकि प्रकाशक ने पत्रिका छाप कर दे दी थी और उसके बदले में नया पथ को एक भी पैसा नहीं देना पड़ा था. उसमें जो विज्ञापन मिले थे वह नया पथ की आय हो गयी थी. पिछले चार पांच सालों में निकलने वाले कुछ विशेषांक ही पुस्तकाकार प्रकाशित हुए हैं अन्य बहुत से अंकों का व्यय नया पथ के ही अकाउंट से किया गया है.”
पारीख जी के उत्तर से जाहिर है, संजीव कुमार के जिस उत्तर को आप ‘सटीक और तथ्यपूर्ण’ मान रहे थे, वह सही नहीं था। वैसे मेरे लिये तो वह जानकारी भी मेरी जानकारी से काफी ज्यादा थी। लेकिन अब जवरीमल जी की पोस्ट से पता चलता है कि संजीव कुमार के पत्र में बताया कम, छिपाया ज्यादा गया था।
मसलन संजीव कुमार का पत्र इस ओर जरा भी इशारा नहीं करता कि ‘नया पथ’ की सामग्री को पुस्तकाकार देने के लिये किसी भी प्रकाशक से किसी प्रकार का कोई आर्थिक लेन-देन किया गया था, जबकि जवरीमल जी बता रहे हैं कि प्रकाशक के पैसों से ही नया पथ का एक पूरा अंक प्रकाशित हुआ।
इसी से संजीव के जवाब का यह तर्क भी बेबुनियाद साबित होता है कि ‘‘ भारतीय भाषा परिषद् वाले मामले के साथ इन किताबों का मामला तुलनीय नहीं है। भारतीय भाषा परिषद् ने किताबें खुद छापीं और उन्हें, जैसी कि अरुण जी की जानकारी है, बड़ी संख्या में पुस्तकालय ख़रीद का हिस्सा बनवाया। इसका मतलब है कि उसने बाकायदा व्यवसाय किया”।
नया पथ की सामग्री को पुस्तककार में निकालने के लिये ‘नया पथ’ अर्थात जलेस को बाकायदा भुगतान किया गया था।
संजीव कुमार ने अपने पत्र में यह भी बताया है कि ‘‘ किताबों में शामिल सभी लेखकों को मानदेय भेजे गए हैं, किताबें भी भेजी गयी हैं। ‘नया पथ’ की ओर से (पत्रिका में प्रकाशन के लिए) मानदेय अलग और प्रकाशक की ओर से अलग।“
अपने अनुभव के आधार पर मैं इस बात की गवाही दे सकता हूं कि संजीव की इस बात में सचाई नहीं है। नया पथ द्वारा लेखकों को मानदेय दिया जाता है, मैं नहीं जानता। मेरी भी एकाध चीज नया पथ में छप चुकी है, लेकिन न किसी प्रकार का कोई मानदेय मिला और न ही हमने उसकी कोई उम्मीद की। इसके अलावा जिस रचना के लिये लेखक को संगठन की ओर से मानदेय दिया गया, उसे किसी व्यवसायिक प्रकाशक को मुहैय्या कराके उसपर निजी स्वत्वाधिकार कायम कर लिया गया ! यह तो और भी अजीब सा लगता है।
ऐसी स्थिति में संजीव कुमार की इस बात में भी कोई दम नहीं लगता कि ‘‘ हममें से कौन नहीं जानता कि श्रेय ही महत्वपूर्ण है, स्वत्वाधिकार के नाम पर रोयल्टी का अंश इतना भी नहीं होता कि साल भर में एक-एक बार किताब के contributors से फोन पर बात कर लेने का खर्चा निकल आये।“
भाषा परिषद के मामले में तो अशोक जी ने बताया था कि वागर्थ के दो अंकों के पुस्तकाकार रूप की साढ़े चार सौ प्रतियां बाकायदा राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन को बेची गयी थी। इन पुस्तकों की वैसी कोई थोक खरीद नहीं हुई, इसे शपथ लेकर कौन कह सकता है ! प्रकाशकों ने इनके प्रकाशन में घाटा उठाने के लिये तो निवेश नहीं ही किया होगा !
नन्द जी, यह सब कुछ अजीब प्रकार का गोरखधंधा सा लगने लगा है। इसपर भगवान दास मोरवाल जी ने जो सवाल उठाया है कि ‘‘ कहीं ऐसा तो नहीं है कि जनवादी लेखक संघ का यह निर्णय कुछ बड़े प्रकाशकों और उनसे जुड़े प्राध्यापक किस्म के कुछ लेखकों को लाभ पहूंचाने के लिए लिया गया है ? समझ में नहीं आता कि आज तक मैंने कभी किसी लेखक संगठन को किसी लेखक के हक में रॉयल्टी वाले मामले में बोलते नहीं सुना l हम इस सच्चाई को क्यों नहीं स्वीकारते कि हमारे लेखक संघों का इस्तेमाल कुछ लोगों द्वारा निजी जायदाद की तरह किया गया है ? " वह जरा भी अनुचित नही जान पड़ता।
अब जहां तक इसप्रकार का काम करके साहित्य और संगठन की सेवा करने की जो बात है, उसके बारे में क्या कहूं ! जवरीमल जी लिखते हैं - ‘‘ नया पथ के अंकों की सामग्री लेकर जो पुस्तकें तैयार की गयी, वह किया जाना उचित था या अनुचित में नहीं जानता. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पुस्तकों की जरूरत थी” । कुछ और मित्रों ने भी साहित्य की इस महती सेवा का जिक्र किया है।
ये दलीलें फिर मेरा ध्यान आस्ट्रेलिया के अपराधी जोसेफ फ्रिजल वाली घटना की ओर खींच ले जाती है। ‘‘उसने अपने बच्चों को दुनिया की बुराई से बचाने के लिये सालों तक अपने घर के तहख़ाने में क़ैद रखा और उनसे तमाम प्रकार के दुष्कर्म किये । बाहर के ख़तरों से अपनी बेटी को बचाने के लिये उसे बेटी को नष्ट कर देना मंज़ूर था । वह अपने पक्ष में ऐसी ही दलील देता था कि यदि मैंने ऐसा न किया होता और बेटी को बाहर के बुरे संसार में जाने दिया होता तो उसकी बेटी ज़िन्दा नहीं रहती । उसने कम से कम उसकी हत्या तो नहीं की ! वह चाहता तो उन्हें मार भी सकता था , लेकिन उसने जिंदा रखा ।’’
मैं नहीं जानता, जनवादी लेखक संघ के सदस्यों को इन सब बातों की कितनी जानकारी रही है। इन्हें स्वीकारने के तर्कों से भी मेरी गहरी आपत्ति है। इन सबसे यह जरूर पता चलता है कि पिछले दिनों नया पथ के अंकों का भारी-भरकम संकलनों की शक्ल में आने और उनके पीछे की 'मेहनत' का सच क्या रहा है।
चंद्रबली जी की मृत्यु पर उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इस लेखक ने अपने लेख में लिखा था कि ‘‘ यह खिलखिलाहटों का, और गंभीरता का भान करने वालों के लिये सुंदर पैकेजिंग में मुर्दा सामानों को चलाने का समय है।“ यह सच है कि हमारे उस मंतव्य के पीछे नयापथ का वर्तमान स्वरूप ही काम कर रहा था।
उस लेख के अंत में हमने लिखा था : प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के क्षय को उन्होंने देखा था और उन्हीं अनुभवों के आधार पर नये जनवादी मूल्यों पर टिके एक नये और व्यापक साहित्य-आंदोलन को नेतृत्व दिया था। इसीलिये उनमें हौसला कम नहीं था। लेकिन प्रश्न था कि अब लड़े तो किससे लड़े और कैसे विकल्प के भरोसे! उल्टे, उन्होंने अपने को संगठन में ही एक अजीब किस्म के कुत्सित परिवेश से घिरा पाया।“
यह सब जो सामने आरहा है, उन्हीं बातों की पुष्टि करता है। अंदर ही अंदर सब कितना बदला जाता है, जो उससे जुड़े होते हैं, उन्हें भी इसका पता नहीं होता! इसीलिये बाहर से सवाल उठाने की अहमियत बची रहती है।
हम यहां आपकी सुविधा के लिये जवरी मल पारीख के खुलासे का लिंक दे दे रहे हैं :
https://www.facebook.com/jawarimal.parakh?fref=ts&ref=br_tf