रविवार, 29 मई 2016

और महावीर प्रसार द्विवेदी !


आज के ‘टेलिग्राफ’ में ‘The Emperor of all Maladies’ के प्रसिद्ध लेखक सिद्धार्थ मुखर्जी की एक नई किताब ‘The Gene : An intimate history’ की एक समीक्षा प्रकाशित हुई है।

हमने इस किताब को देखा नहीं है, लेकिन ‘टेलिग्राफ’ की समीक्षा में उससे एक उद्धरण है - “illness might vanish but so might identity. Grief might be diminished but so might tenderness. Traumas might be erased but so might history.”
(रोग दूर हो सकते हैं, वैसे ही आदमी की पहचान भी। कष्ट कम हो सकते हैं, वैसे ही कोमलता भी। आघात खत्म हो सकते हैं, वैसे ही इतिहास भी।)

ओरहन पामुक अपने उपन्यास ‘My name is red’ में एक जगह लिखते हैं - ‘‘नुक्स से ही अंदाज पैदा होता है।’’

ऐब ही आदमी की पहचान है।

याद आती है, अंबर्तो इको की बात। वे उपलब्ध भाषा की तुलना फासीवाद से करते हैं। कहते हैं, फासीवाद बोलने से रोकता नहीं, बोलने को थोपता है। प्राप्त भाषा का विन्यास इतना घातक हैं कि वह अपने अंदर गुलाम बना लेती है। उपलब्ध भाषा से छल करके, एक प्रकार की गैर-ईमानदारी और स्वस्थ तथा मुक्तिदायी चालाकी से साहित्य पैदा होता है।

कहना न होगा, भाषा के मानकीकरण पर अतिरिक्त जोर साहित्य का आखेट है। और महावीर प्रसाद द्विवेदी !

Close the history with respect

राष्ट्रपति ओबामा की वियतनाम यात्रा के संदर्भ में हमारे पुराने संस्मऱण -



अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अभी वियतनाम की यात्रा पर गये थे । वहां उनका भारी स्वागत हुआ। चालीस साल पहले तक जो अमेरिका वियतनाम को नेस्तनाबूद कर देने की लड़ाई में उतरा हुआ था, आज उसी का राष्ट्रपति उस धरती पर जाकर वहां के लोगों से सीधे बात कर रहा है। वह कहता है कि हम दो देशों के अनुभव से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है। सीख सकती है कि लोगों के हृदय बदल सकते हैं। हम अपने अतीत के बंदी होकर नहीं रह सकते।
ओबामा की इन बातों से अनायास ही अढ़ाई साल पहले की हमारी वियतनाम यात्रा की यादें ताजा होगई। उस यात्रा के बाद हमने जो लिखा था, आज उसे मित्रों से साझा करके बहुत अच्छा लग रहा है।
9 अक्तूबर 2013 को हम वियतनाम पहुंचे थे और वही से 17 अक्तूबर 2013 को हमने यह पोस्ट लिखी थी - जनरल जियाप, वियतनाम और इतिहास का प्रश्न। हम जब वियतनाम में थे, तभी वहां वियतनाम युद्ध के किवंदंती नायक जनरल जियाप की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार की सरकारी रश्में पूरी हो रही थी। वह टिप्पणी इस प्रकार थी -

जनरल जियाप, वियतनाम और इतिहास का प्रश्न

आठ अक्तूबर को हम हो चि मिन्ह शहर पंहुचे । चार दिन पहले ही वियतनाम के मुक्ति युद्ध के एक किंवदंती पुरुष जनरल जियाप की १०२ साल की उम्र में मृत्यु हुई थी । सोच रहे थे कि वियतनाम में शोक का माहौल होगा । प्रकृत अर्थ में वियतनाम को पूरी तरह आज़ाद हुए ४० साल भी पूरे नहीं हुए हैं । सन् '७५ में ही तो उसका एकीकरण हुआ, तमाम विदेशी सेनाएँ वियतनाम की धरती से पूरी तरह हटीं और इस नवोदित स्वतंत्र राष्ट्र को शांति से जीने का मौक़ा मिला ।

जनरल जियाप इस राष्ट्र के उन चंद नायकों में एक थे, जिनकी बदौलत तक़रीबन दो सौ साल बाद वियतनाम विदेशी सैनिकों के जुएँ से पूरी तरह आजाद हो पाया था । ख़ास तौर पर दियेन बियेन फू की जिस लड़ाई में दुनिया के इतिहास में पहली बार गोरों की किसी सेना को ग़ैर-गोरों की सेना के हाथों लड़ाई के मैदान में धूल चाटनी पड़ी थी, उस लड़ाई में फ़्रांसीसी सेना के ख़िलाफ़ वियतकांग के सैनिकों की कमान जनरल जियाप के हाथ में ही थी ।

'बर्फ़ में ढंके ज्वालामुखी', हो चि मिन्ह के शब्दों में 'युवती की तरह ख़ूबसूरत' जनरल जियाप का एक और नाम था - लाल नेपोलियन । माओ के गुरिल्ला युद्ध में दीक्षित जियाप जानते थे कि ज़मीनी लड़ाई में व्यापक जनता के सहयोग से अधुनातन सेना के भी छक्के छुड़ाये जा सकते हैं । हांलाकि तब तक द्रोण की तरह के आकाश से निशाने पर अचूक वार करने की तकनीक आज के जितनी विकसित नहीं हुई थी ।

दियेन बियेन फू उत्तर-पश्चिम वियतनाम की घनी पहाड़ियों के बीच किसी कटोरे जैसी घाटी है, जिसे फ़्रांसीसी सेना ने उसके पहाड़ी घेरे की वजह से ही अपने लिये सबसे सुरिक्षत समझा था । उन्हें यक़ीन नहीं था कि इन पहाड़ों को चीर कर कोई उन पर हमला कर पायेगा । द्वितीय िवश्वयुद्ध में जापानियों ने यहाँ एक मज़बूत हवाईपट्टी बनाई थी, और फ़्रांसीसियों को इस पट्टी पर भी बहुत भरोसा था कि कुमुक और उसके लिये रसद को पंहुचाने में उनको कोई परेशानी नहीं होगी ।

लेकिन जियाप ने कहा कि जब बकरी इन ऊँची पहाड़ियों के शिखरों पर चढ़ सकती है तो आदमी भी चढ़ सकता है । और यदि एक आदमी चढ़ सकता है तो हज़ारों की फ़ौज भी चढ़ सकती है । गुरिल्ला युद्ध के इन बुनियादी सोच के साथ जियाप ने शत्रु को औचक पकड़ने की नेपोलियन की रणनीति को जोड़ा । पहाड़ों से लेकर घाटी तक खंदकों का जाल बिछा कर फ़्रांसीसी सेना के बिल्कुल निकट तक घेरेबंदी कर ली और जब नियत समय पर हल्ला बोला तो फ़्रांसीसी सेना के बेहतर हथियार, अमेरिकी एम-२४ टैंकों के परखचे उड़ते दिखाई दिये । दियेन बियेन फू में पराजित फ़्रांस वियतनाम छोड़ कर जाने और १९५४ के जेनेवा कांफ्रेंस पर हस्ताक्षर करने के लिये मजबूर हुआ ।

सामरिक नेतृत्व के अलावा जनरल जियाप वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व के भी अंग थे ।

ऐसे जनरल जियाप की मृत्यु पर पूरे वियतनाम में शोक के माहौल के बारे में हमारा अनुमान ग़लत नहीं था । लेकिन हो चि मिन्ह शहर में ऐसा कोई वातावरण न देख कर दूसरे दिन हमने मेकांग डेल्टा की यात्रा के अपने टूरिस्ट गाइड थामस से बात छेड़ दी । जियाप के शोक की बात सुनते ही उसने बताया कि अब तक उनके प्रति श्रद्धांजलि का कार्यक्रम हनोई में चल रहा था । अगले दिन, अर्थात १० अक्तूबर से १२ अक्तूबर तक हो चि मिन्ह सिटी में चलेगा । इस दौरान शहर के रीयूनिफिकेशन प्रासाद में उनकी तस्वीर पर बड़ी संख्या में शहर और गाँव के कतारबद्ध लोग फूल चढ़ायेंगे । इसके बाद हनोई में उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा ।

थामस से बात करने से पता लगा कि वह एक पढ़ा-लिखा, राजनीतिक तथ्यों का जानकार नौजवान है । उसने ट्रैवलिंग के पेशे में स्नातक किया है, और इसी नाते अपने देश के इतिहास से जुड़े तथ्यों की पूरी जानकारी रखता है । इसीलिये और विषयों पर भी बात शुरू हो गयी । मैंने उससे पूछा कि वियतनाम पर अमेरिकियों ने जो ज़ुल्म किये, उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, फिर भी अमेरिका ही वियतनाम में अधिक से अधिक निवेश कर रहा है और यहां की सरकार भी उसका सबसे अधिक स्वागत करती है ।

हमने चीन-वियतनाम संबंधों और १९७९ में इनके बीच के सीमा-संघर्ष की बात भी उठाई ।

एक शैलानी से १९७९ के चीन-वियतनाम संघर्ष की बात सुन कर थामस बेहद हैरान होगया।

उसने कहा, हम वियतनाम के लोग भी कभी उस घटना का ज़िक्र नहीं करते । हमारे लिये १९७५ ही युद्ध का अंतिम इतिहास है । इसके साथ ही उसने यह जोड़ा कि वियतनाम सरकार की यह साफ़ राय है कि इतिहास को सम्मान के साथ बंद कर दिया जाना चाहिए । ' Close the history with respect.' इतिहास के प्रति पूरा सम्मान है, लेकिन उसे वर्तमान पर बोझ नहीं बनने देना चाहिए । अर्थात इतिहास की सीख और शिक्षा का मान होने पर भी वह एक बंद अध्याय है ।

हो चि मिन्ह शहर में देखे युद्ध के अवशेषों के संग्रहालय और जनरल जियाप की कीर्तियों के प्रति वहाँ के लोगों के गहरे सम्मान के बावजूद आज वियतनाम युद्ध की स्मृतियों से कोसों आगे निकल चुका है । पूरे वियतनाम में चल रहा आधुनिक निर्माण का महायज्ञ भी इसी सच्चाई का बयान कर रहा है ।

हमारे जैसे अति प्राचीन इतिहास के तमाम अवशेषों के बोझ से दबे राष्ट्र के लिये भी ससम्मान इतिहास की विदाई की इस छोटी सी बात का क्या कम महत्व है ?



इस पोस्ट पर कई मित्रों ने टिप्पणियां की थी लेकिन उदय प्रकाश जी की टिप्पणी तीखी और विस्तृत भी थी। उन्होंने लिखा -
Uday Prakash :" लेकिन समस्या यह भी है कि हाल फिलहाल (१ ९ ७ - ७ ९) का विएतनाम जैसा इतिहास हमारे पास नहीं है . फिर ग्लोबल कार्पोरेट एकानामी गरीब-वंचित लोगों को , भले ही विकास के ज़रिये लूट और संहार के माध्यम से , बेहतर आर्थिक सुविधा, चैरिटी और चांस, लाटरी, अपराध और जुए से श्रम-मुक्त कमाई मुहैय्या करती है , जो पुरानी समाजवादी व्यवस्था नहीं कर सकी, इसलिए इसे फिलहाल बेहतर माना जाने लगा है. इस 'बेहतरी का भ्रम' वे लोग और फैला रहे हैं, जो पुरानी अर्थ-व्यवस्था में 'मध्यवर्गीय' और इस नयी अर्थ-व्यवस्था में 'नव-अमीर' हो चुके हैं. ट्रेवेल एजेंसी चलाने वाले लोग, जैसा थामस है या काल सेंटर्स में काम करते एम् एन सी के युवा जिस सर्विस क्लास से आते हैं , वह पुराने मज़दूर वर्ग का नया अनुवाद नहीं है.
फिर आपने एक जगह यह लिखा है :
' हांलाकि तब तक द्रोण की तरह के आकाश से निशाने पर अचूक वार करने की तकनीक आज के जितनी विकसित नहीं हुई थी '
इसका आशय समझ में नहीं आया. क्या अगर ड्रोन की तकनीक उस समय होती , तो क्या जन . जियाप की अगुआई के बावजूद विएतनाम युद्ध हार जाता ?
अभी का उदाहरण लें. अफगानिस्तान में ड्रोन के इस्तेमाल के बावज़ूद अमेरिकी-नाटो फौजें वापस लौट रही हैं . अफगानिस्तान एक दूसरा उदाहरण है, जिसे अभी तक कोई कोलोनियलाइज नहीं कर सका. ब्रिटेन, रूस और अब अमेरिका .
आज सुबह ही अमेरिका के एक दोस्त से बात हो रही थी . शट डाउन इसीलिए है कि 'विकास' और 'बाज़ार' का रास्ता भयावह आर्थिक विषमता और सामाजिक असंतुलन के हालात पैदा कर रहा है. चाहे ओबामा हों या राहुल या मोदी या कोई कम्युनिस्ट, आज गरीबों की बात करने, उनके पक्ष में बोलने के लिए सभी मज़बूर हैं. ..और अगर इतिहास का अंत कहीं हो रहा है , तो यही वह जगह है, जहां पहले के लेफ़्ट और राइट के बीच की विभाजक रेखा धुंधलॆ हो चुकी है. बल्कि मिट चुकी है।"

इसके साथ ही उदयप्रकाश जी ने यह आग्रह किया था कि

Uday Prakash : Arun Maheshwari ji ..is bahas ko aage baDhaayaa jaaye ..!

हमने भी उन्हें लिखा - बहुत ज़रूरी बातें आपने उठाई है । इन पर पूरी गंभीरता से चर्चा होगी । आज हम लौट रहे है ।


इसके बाद ही फिर कोलकाता लौट कर 20 अक्तूबर को हमारी पोस्ट थी -

“उदय जी,

‘जनरल जियाप, वियतनाम और इतिहास का प्रश्न’ पर आपकी तीखी और सार्थक टिप्पणी के लिये धन्यवाद। खास तौर पर आपका आग्रह कि ‘इस बहस को आगे बढ़ाया जाए’ और भी अच्छा लगा।

फेसबुक का अर्थ ही है दूरदराज बैठे मित्रों के साथ एक जीवंत सार्थक विमर्श, एक वर्चुअल गोष्ठी। लेकिन अक्सर सुचिंतित टिप्पणियां भी ‘समझदारों’ की लाइक्स और ‘उत्साहियों’ की अजीबो-गरीब, आशय-खोजी नोक-झोंक और फब्तियों से आगे नहीं जा पाती। अनोखे प्रकार के उकसावेबाजों की धमाचौकड़ियों का नजारा दिखाई देने लगता है। फिर भी, आश्वस्ति की बात यह है कि इस पूरी अराजकता में भी एक व्यवस्था है; इसके जरिए मुद्दे की बात दूसरे किसी भी माध्यम की तुलना में कम दूरी तक नहीं जाती है।

बहरहाल, अपनी टिप्पणी में उठाये गये विषयों पर बहस को आगे लेजाने का मेरा आग्रह भी किसी से कम नहीं है। इसलिये और भी क्योंकि लेखक हमेशा प्रचारक नहीं होता। वह हमेशा किसी विमर्श का अंशीदार ही हो सकता है।

ट्रैवल गाईड थॉमस की बातों में एक नये ‘उपभोक्ता’ की लिप्सा की छाया देखकर आपका बरसना खास तौर पर बहुत प्रिय लगा। लेकिन ‘Close the history with respect’ वाली उसकी बात का मेरे लिये बिल्कुल भिन्न संदर्भ था। मेरे दिमाग में वियतनाम और समाजवाद के अलावा बौद्ध धर्म का तर्कप्रधान और मध्यममार्गी पहलू भी काम कर रहा था। बुद्ध का एक प्रमुख कथन की धर्म का बेड़े की तरह इस्तेमाल करो, पार उतरने के लिये न कि उसे बोझ बना कर ढोने के लिए।

‘‘धर्म कोलोपम है। यह निस्तार के लिये है, ग्रहण के लिए नहीं। इसीलिये जो ज्ञानी है, उनको धर्म का परित्याग करना चाहिए, अधर्म का भी।‘‘

अंध-परंपरा से मुक्त निरीक्षण के लिये प्रेरित करने वाली नैतिकता और आध्यात्मिकता की तर्कसम्मत और हृदयग्राही व्याख्या ही बौद्धों की शक्ति थी जो मार्क्सवादियों को भी आकर्षित करती रही है। आनंद को कहे बुद्ध के अंतिम शब्द थे : ‘‘सब संस्कार अनित्य है। अपने निर्माण के लिए बिना प्रमाद यत्नशील हो। तुम अपने लिए स्वयं दीपक हो। ‘अत्तदीपा विहरथ‘ - दूसरे का सहारा न ढूंढ़ो।‘‘

उदय जी, वियतनाम का अपने ‘पुनर्निर्माण में बिना किसी प्रमाद’ के लगने और ‘इतिहास को ससम्मान विदा करने’ की थॉमस की उक्ति को हम अपनी जिद से खारिज नहीं कर सकते। बौद्ध धर्म तापसों का धर्म नहीं है। दुनिया ने आधुनिक तापसों का एक सबसे विभत्स रूप कंबोडिया के पौल पॉट में देखा है।

अब हम दूसरी बात पर आते हैं - ‘‘हांलाकि तब तक द्रोण की तरह के आकाश से निशाने पर अचूक वार करने की तकनीक आज जितनी विकसित नहीं हुई थी।‘‘
आपने लगभग क्षेपक की तरह, कुछ अवांतर ढंग से ही आए इस वाक्य को बहुत सही पकड़ा है। मैं जानता हूं कि यह वाक्य अनायास ही नहीं लिखा गया था। बिल्कुल आशयपूर्ण था और आपने एकदम सही, इससे हमारे आशय को साफ करने की मांग की है।

जहां तक वियतनाम की मुक्ति युद्ध में जीत अथवा हार का सवाल है, इस वाक्य से उसका कोई संबंध नहीं है। हम उत्तर-औपनिवेशिक काल में रह रहे हैं। जब दुनिया में कहीं भी उपनिवेशवाद कायम नहीं रह सका, मुक्ति की आकांक्षा का दमन नहीं हो सका तो फिर वियतनाम में क्या होता !

यहां संकेत सिर्फ युद्ध के खास-खास तरीकों की सीमाओं और संभावनाओं की ओर है। इसका प्रमुख आशय आज के समय में गुरिल्ला युद्ध के रास्ते की सीमाओं की ओर संकेत करना है। इस बारे में अफगानिस्तान का आपका उदाहरण सही नहीं लगता। इराक को तबाह करके अमेरिका लौट गया, तो इसे युद्ध के मैदान में अमेरिका की पराजय नहीं कहा जा सकता। भारत के माओवादी ‘तापसों‘ की रणनीति का भी एक सवाल है।
हमने अपनी टिप्पणी में कहा है कि दुनिया के इतिहास में पहली बार युद्ध के मैदान में गोरों की सेना यदि कहीं गैर-गोरों के हाथों पराजित हुई तो वह वियतनाम है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि दुनिया में और कहीं राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष नहीं हुए या उपनिवेशवादियों को उपनिवेशों को आजाद करके भागना नहीं पड़ा। किसी भी रणनीति की सफलता देश-काल की परिस्थितियों, इतिहास और भूगोल के भी सवालों से निरपेक्ष नहीं हो सकती।

इन तमाम बातों के बाद भी आपकी यह बुनियादी चिंता कि विकास से वास्तविक तात्पर्य क्या है, पूरी तरह जायज है और इसपर हमें आगे खुल कर बात करने की जरूरत है।

अमेरिकी ‘शट डाउन’ का प्रसंग एक भिन्न प्रसंग है। 17 दिन बाद उनकी इस आंतरिक राजनीतिक समस्या का समाधान होगया है। चूंकि मामला अमेरिका का है, जहां घटने वाली हर चीज के अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव होते हैं, इसीलिये इसपर इतनी बात हो रही है। लेकिन अकेली इस घटना ने अमेरिकी जनता के सामने उनके सिनेटरों की पोल खोल दी है। स्थिति यह बतायी जा रही है कि लोग इस मामले में अपने सिनेटरों के चरित्र को देख कर यह कह रहे हैं कि इनमें से अधिकांश को आगामी चुनाव में छांट कर बाहर कर देना चाहिए। हेल्थ केयर का सवाल अमेरिकी मतदाताओं के लिये एक बेहद संवेदनशील प्रश्न है। इसपर एक सैद्धांतिक रुख अपना कर ओबामा ने निश्चित तौर पर अपने विरोधियों को बुरी स्थिति में डाला है।“

आज ओबामा की वियतनाम यात्रा और उनके भाषणों के संदर्भ में फेसबुक पर अपनी पोस्ट और उस पर हुई थोड़ी सी बहस को स्मरण करना अच्छा लग रहा है। उम्मीद है, मित्रों को भी यह सार्थक लगेगा।





मंगलवार, 24 मई 2016

ईरान में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के जमाने के कामों को आगे बढ़ाया


-अरुण माहेश्वरी

प्रधानमंत्री ईरान गये। हमारे पुराने फारस, सन् 2000 ईस्वी पूर्व के आर्यामा या आई-यार्मा में, अर्थात ‘आर्यों के स्थान’ में और पश्चिम वालों के पर्शिया में। एक समय यह फारस ही हमारा पिछवाड़ा हुआ करता था। लेकिन इधर सात समंदर पार से भी दूर लगने लगा था।

अब पश्चिम ने अपनी नाकेबंदी तोड़ी, तो फारस का दरवाजा दुनिया के लिये एक बार फिर खुल गया है। इसमें प्रवेश के लिये सारी दुनिया के नेताओं की कतार में शामिल होकर हमारे प्रधानमंत्री भी वहां पहुंच गये।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति हसन रूहानी के बीच दोनों देशों के बीच संपर्क की बात चली। चाहबहार बंदरगाह का विषय तो आना ही था। दक्षिणपूर्व ईरान में ओमान की खाड़ी में चाहबहार बंदरगाह एक ऐसा बिंदु है जहां से पाकिस्तान की दखलंदाजी को दरकिनार कर सीधे अफगानिस्तान, रूस और मध्य एशिया से परिवहन के संपर्क को साधा जा सकता है। ‘90 के जमाने में भारत ने ही ओमान, ईरान, उज़्बेकिस्तान, कज़ाखिस्तान, तुर्कमेनिस्तान को लेकर अश्बागात संधि के अन्तर्गत इस बंदरगाह के एक हिस्से को तैयार किया था। अब उसने इस संधि में शामिल होने का निर्णय किया है । भारत ने और निवेश करके इस बंदरगाह को आगे और विकसित करने की इच्छा जाहिर की। प्रधानमंत्री की इस यात्रा में जब इसके करारनामे पर हस्ताक्षर किये जा रहे थे, उसी मौके पर हमारे प्रधानमंत्री ने गालिब का एक फारसी शेर पढ़ा -

‘‘ज़नूनत गर्बे नफ़्से ख़ुद तमाम अस्थ
जे काशी पे बाँ काशाँ ऩीम गाम अस्थ।’’

(मन में ठान ले तो काशी और काशाँ (ईरान का एक शहर) के बीच की दूरी आधा कदम भर रह जायेगी।)

प्रधानमंत्री मोदी के मुंह से इस शेर को सुन का राष्ट्रपति रूहानी धीमे से मुस्कुरा रहे थे। और, कहते हैं कि उनके पीछे खड़े इराक के विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ़ अपने साथी को कुहनी मार रहे थे।

प्रधानमंत्री ने अपनी इस यात्रा में ईरान के साथ भारत के प्राचीन संबंधों की जरूर कई मर्तबा दुहाई दी होगी। रूहानी ने भी भारत को अपना पुराना दोस्त कहा। लेकिन रूहानी यह कहने से नहीं चूके कि आज जो हो रहा है, वह पश्चिम की नाकेबंदी के खत्म होने की बदौलत ही हो रहा है।

हाल में हम कश्मीर गये थे। कहते हैं कि कश्मीर का भूगोल, वहां की आबोहवा, और वहां के लोग भी ईरान से बहुत मिलते-जुलते हैं। आल्प्स-हिमालय के भंजतंत्र (फोल्ड सिस्टम) में बसा ईरान उत्तर और दक्षिण में एलबुर्ज और जर्गस के ऊंचे पर्वतों से घिरा हुआ है जिसके मध्य का पठार ठीक उसी प्रकार चार हजार फुट की ऊंचाई पर है, जैसे हमारा श्रीनगर। इतिहास में ईसापूर्व सोलहवीं सदी में ईरान की एलाम की प्राचीन सभ्यता और उसकी समकालीन मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा की सिंधु घाटी की सभ्यता को उत्तर से आए घोड़े पर सवार आर्यों ने समान रूप से रौंद कर अपने अधीन कर लिया था और इन दोनों देशों के ही मूल निवासी बन गये। जरतुश्त धर्म और भारत के वैदिक धर्म में तथा अवेस्था और वेदों में अनोखी समानताएं हैं। भारत की तरह ही ईरान भी कई धर्मों का, ईसाई, बौद्ध और जरत्शु धर्म का मिलन-स्थल रहा। हमारे कश्मीर के कई सुदूर पहाड़ी अंचलों की भाषा पश्तो है, इंडो-ईरानियन मूल की एक प्रमुख भाषा। सेब, चेरी, खुबानी, अंजीर, तरबूज, अंगूर जो ईरान में सबसे अधिक पैदा किये जाते हैं, तो हमारे यहां कश्मीर भी इन्हीं चीजों के लिये विख्यात है। इसीप्रकार, कालीन, दरियां, और हस्तकला की दूसरी कारीगरियों के मामले में भी ईरान और कश्मीर में अनोखा साम्य है। और, आर्यों की कद-काठी तो अपनी जगह है ही। ईरान में अरबों की जीत के साथ इस्लाम आया, और कश्मीर ने भी हिंदू राजा होने के बावजूद पूरी तरह से इस्लाम को अपना लिया। इतना फर्क जरूर रहा कि ईरान ने इस्लाम के शिया पंथ को अपनाया, जबकि कश्मीर सहित अन्यत्र सुन्नी पंथ को ही ज्यादातर अपनाया गया। इसीलिये फारस कभी सूफियों के लिये मुफीद जगह नहीं रही। भारत के लोग यहां से आए महमूद गजनवी और नादिरशाह के शैतानी किस्सों को काफी जानते हैं।

बहरहाल, ईरान कभी हमारा पड़ौसी भले रहा हो, आज नहीं है। इसीलिये मोदी जी की ईरान यात्रा पर हम निश्चिंत थे कि उन पर पड़ौसियों पर धौंस जमाने का भूत सवार नहीं हो पायेगा। मोदी जी जिस संघ की पाठशाला से तैयार हुए हैं, उसके गुरू गोलवलकर अपने पूर्वजों की ‘तेजस्वी वृत्ति’ का बड़ी शान से जिक्र करते हुए कहते थे कि ‘‘हमारे लोगों में यह कहने का साहस था कि जो हमारी स्वभावसिद्ध समाज-व्यवस्था को नहीं मानता वह म्लेच्छ है।’’ यह साहसी ‘तेजस्विता’ राजनय में क्या गुल खिलाती है, इसे हम पड़ौसी मुल्कों के साथ अपने संबंधों में इधर आई तेज गिरावट में देख सकते हैं। ईरान के साथ हमारी प्राचीन संस्कृति की साझा विरासत के बाद उसके दूसरी दिशा में बढ़ जाने पर उसके प्रति इस प्रकार की ‘तेजस्वी’, ‘म्लेच्छों’ वाली समझ कितनी बेहुदा होती, इसे आसानी से समझा जा सकता है।

कहने का तात्पर्य यही है कि ईरान में मोदी जी ने सन् ‘90 में शुरू किये गये कामों को ही आगे बढ़ाने की बात की। वहां वे ‘कांग्रेसी-विहीन भारत’ के झूठे आवेश से बचे रहे और उन्होंने संघी तेवर को तरजीह नहीं दी। उसी सीमा तक उनकी यह यात्रा सफल भी हुई।

शुक्रवार, 20 मई 2016

पश्चिम बंगाल के चुनाव


-अरुण माहेश्वरी

पश्चिम बंगाल के चुनाव पर पहले भी कुछ लिखने से बचता रहा। अब परिणामों के बाद भी कुछ खास लिखने का मन नहीं कर रहा।

ऐसा नहीं है कि ये चुनाव इतने ढर्रेवर प्रकार के थे कि इनमें किसी की कोई विशेष दिलचस्पी नहीं हो सकती थी। उल्टे, इनमें नाटकीय तत्वों की कोई कमी नहीं थी। सबसे बड़ी चीज तो कांग्रेस और वाममोर्चा का अघोषित गठबंधन था। ‘अघोषित’ इसलिये क्योंकि कुछ लोगों को यह अवैद्य संबंधों के किस्म की नापाक सी चीज लग रही थी, जिसे खुले आम स्वीकार लेने पर उनके सतीत्व पर आंच आ सकती थी। लेकिन, ‘घोषित -‘अघोषित’ कुछ भी क्यों न हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसमें राजनीतिक सिद्धांतकारों की हैरत के वे सारे उपादान मौजूद थे जिन पर आगे भी लगातार टीका-टिप्पणियों के जरिये दफ्ती की तलवारें भांजते हुए वे अपने राजनीतिक आदर्शों की लड़ाई का अभ्यास चला सकते हैं।

इसके अलावा, शारदा, नारदा, फ्लाईओवर, सिंडिकेट की तरह के विषय भी कम दिलचस्प नहीं थे। बांग्ला चैनलों पर इन विषयों की एक साथ बाढ़ सी आ गई थी।  यह एक ऐसा नजारा था कि शायद कइयों को किसी अतियथार्थवादी (surrealist) चित्र की तरह लगने लगा। इसे यथार्थ माने या कोई नया विभ्रम, समझ के परे होगया। चुनाव के बाद तो अब डंके की चोट कहा जा रहा है कि ये सब अविद्या से उत्पन्न जगत-मिथ्या के सदृश थे - ‘बंगाल में भ्रष्टाचार है ही नहीं’।

बहरहाल, सवाल उठता है कि अगर यह सब जगत-मिथ्या ही था तो इस जगत का ‘ब्रह्म सत्य’ क्या था ? चुनाव परिणामों को देख कर तो लगता है, यह सारा जगत जिस एक ब्रह्म सत्य की माया के रूप में सामने आया वह वही पुराना वाममोर्चा का चौतीस साल का शासन और सीपीएम का सांगठनिक जंजाल ही था। आज भले वह शासन अतीत का विषय हो और सीपीएम का संगठन महज किसी मृतक का कंकाल। लेकिन इसमें शक नहीं कि पांच साल पीछे के अतीत की छाया और कंकाल का रूप ले चुके संगठन का डर ही इस चुनाव पर छाये रहे। यह चुनाव नहीं गोया, अतीत में गहरे जाकर उसे पोछ डालने का आज भी जारी उपक्रम भर था। परास्त और लुप्त हो चुके वाममोर्चा को ही फिर एक बार हराया गया।

दरअसल, सिर्फ पश्चिम बंगाल की ही बात क्यों की जाए ! जब पूरे भारत को हजारों साल पहले के अतीत में घुस कर उसे मिटाने के काम में नियोजित करने की योजनाएं बन रही है, तब पश्चिम बंगाल के लोगों के लिये तो पांच साल पहले की बात अतीत नहीं, एक जीवित सचाई है। पिछले पांच सालों में न सिर्फ उसी दौर के शुरू किये गये प्रकल्पों पर कुछ काम किये गये, बल्कि उसी दौर की अन्य वैचारिक विरासतों को भी, जिंदा या मुर्दा, बाकायदा ढोया गया। जो फ्लाईओवर गिरा, उसका प्रारंभ उसी काल में हो चुका था, तो टाटा को राज्य से अलविदा भी उसी काल में किया जा चुका था। वाममोर्चा सरकार ने अपने नये भूमि कानून को पारित करके भी उस पर अमल नहीं किया। बनिस्बत, जिस क्रांतिकारी भूमि सुधार मंत्री रज्जाक मोल्ला ने उस पर अमल में सबसे बड़ी बाधा पैदा की, वही आज तृणमूल की जमात में शामिल हो कर उसकी क्रांतिकारिता के बिल्ले को चमका रहा है।

कुल मिला कर, पांच साल बाद भी पश्चिम बंगाल वहीं खड़ा था, जहां पहले था। और इसके साथ ही यथार्थ या विभ्रम, किसी भी रूप में क्यों न हो, उसके राजनीतिक जीवन के मुद्दे भी वे ही रह गये, जो पांच साल पहले थे। ठहरे हुए पानी की तलछट के तौर पर कुछ गंदगियां जरूर पैदा हुई, लेकिन उनसे बाकी और कुछ नहीं बदला। पांच साल पहले जो पराजित हुआ था, वह किसी भी रूप में मिटा नहीं था। फलत:, न टाटा वापस आयें और न औद्योगीकरण का कोई दूसरा रास्ता बना।

ऐसे में, जब चुनाव के ऐन मौके पर कांग्रेस और वाममोर्चा का गठबंधन बना, तो एक बार के लिये लगा था कि शायद यह किसी जादूई चिराग का काम करें और अतीत के छायाभास से चल रहे एक निरर्थक युद्ध का अंत हो। कुछ हलकों द्वारा नीम अंधेरे नीम उजाले के रहस्य में लिपटे इस गठबंधन से अतीत को विदा करके चुनावों को वर्तमान की नई जमीन पर लड़े जाने की उम्मीद लगाई जा रही थी। लगा था कि यह जादूई चिराग किसी नई राह को रौशन करेगा - जब आज पर रोशनी गिरेगी तो अतीत सचमुच व्यतीत होगा, जिसे जाना तो जा सकता है लेकिन फिर से जिंदा नहीं किया जा सकता। हेगेल के शब्दों में ‘‘स्वर्ग का उल्लू तभी उड़ान भरता है जब रात के रंग गहराने लगते हैं।’’(The owl of Minerva takes its flight only when the shades of night are gathering.)

लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गाड़ी वहीं अटकी रह गई, जहां पांच साल, बल्कि उसके भी पहले अटक गई थी। ये चुनाव परास्त को ही एक बार फिर परास्त करके, मृत को ही फिर एक बार मार कर शव-साधना से शक्ति अर्जित करने की तंत्रविद्या का उल्लास भर बन कर रह गये। औद्योगीकरण से तात्पर्य समग्र जीवन का एक रूपांतरण होता है, इस सत्य की साधना में वाममोर्चा के बलिदान ने उस मार्ग को इतना कठिन कर दिया है कि आगे कौन, कब और कैसे इस दिशा में कोई कदम बढ़ा पायेगा, यह सवाल आज भी भविष्य के अंधेरे में ही है। ये चुनाव इस दिशा में बढ़ने की संभावना पैदा कर पायेंगे, इस पर यथेष्ट संदेह के कारण ही इसके परिणाम पश्चिम बंगाल के राजनीतिक जीवन में कोई घटना नजर नहीं आते।

गुरुवार, 12 मई 2016

कश्मीर में बीते तीन दिनों के बाद

कश्मीर में बीते अब तक के तीन दिनों के बाद -

हम कश्मीर आए हैं । शुद्ध शैलानी के तौर पर । मनुष्य समाजों द्वारा अपनी गढ़ी हुई और हमेशा बदलती अस्मिताओं से जुड़े तमाम मसलों को दरकिनार करते हुए, देखने, जानने और उपभोग करने की मनुष्य की शुद्ध प्राणी-सत्ता की नैसर्गिकता के साथ । और, कहना न होगा, इन तीन दिनों में ही, सालों से कथित तौर पर धधक रहे इस 'भू-स्वर्ग' पर इस प्रकार आना हमें बहुत ही मोहक लग रहा है ।

श्रीनगर, गुलमर्ग,पहलगाम  - कहीं भी जैसे तिल धरने की जगह नहीं है । गुलमर्ग में गंडोला से चौदह हज़ार फ़ुट की ऊँचाई पर बर्फ़ के पहाड़ों तक जाने के लिये हज़ारों लोगों की इतनी लंबी लाईन थी कि हमें तो मन मसोस कर ही रह जाना पड़ा । किराये पर लिये गये ग़म बूट और प्लास्टिक के यूज एंड थ्रो वाले सस्ते से हाथ के मोज़े किसी काम न आ सके ।

सिर्फ पर्यटन के लिये कश्मीर में पहुँच रहे ये लाखों लोग बिना किसी दूसरे स्वार्थ के, न धर्म-कर्म से किसी मोक्ष की प्राप्ति के लिये या न किसी वैज्ञानिक शोध-अनुसंधान के लिये, महज अपनी कुछ मूलभूत मानवीय आकांक्षाओं की तृप्ति के लिये, यहाँ आ रहे हैं । जिस क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में देश और दुनिया के तमाम कोनों से शुद्ध मानवीय अंत:करण के साथ लोगों का आना हो, वही क्षेत्र दरअसल भू-स्वर्ग कहलाने का हक़दार हो सकता है । कश्मीर आज हमें इसीलिये सचमुच भू-स्वर्ग लग रहा है ।

कश्मीर का प्राकृतिक सौन्दर्य तो पहले भी था और आज भी है । लेकिन कितने साल हो गये, मनुष्यों की स्वार्थपूर्ण अस्मिताओं और वर्चस्व- प्रतिवर्चस्व के खेल ने इसे आतंक से भरा एक नर्क बना रखा था । अभी इन वादियों से ख़ौफ़ के बादल कुछ छँटे हुए दिखाई दे रहे हैं । शैलानियों के साथ स्थानीय लोगों की अंतरंगता इतनी साफ़ है कि उस पर धर्म और मज़हब के भेद-भाव की कोई छाया देखना भी किसी पाप से कम नहीं है । और, साथ ही ध्यान देने की बात यह भी है कि हमें कश्मीर भारत के दूसरे किसी भी हिस्से से रंच मात्र भी भिन्न नहीं लग रहा है ।

वही ग़रीबी, वही विषमता, वैसा ही भ्रष्टाचार और शहरों में वैसी ही गंदगी, जो पूरे भारत में हैं, समान रूप से कश्मीर में भी है । और स्वाभाविक तौर पर यहाँ भी आम आदमी के दिलो-दिमाग़ में इनसे मुक्ति की उतनी ही प्रबल इच्छाएँ भी है । समान रूप से हक़ों की लड़ाइयाँ और वैसा ही सरकारी दमन भी है । हमारे टैक्सी ड्राइवर के शब्दों में अब्दुल्ला-मुफ़्ती-उमर फारूक- यासीन मल्लिक-गिलानी की राजनीतिक दुकानदारियां हैं और सीआरपी के कैंपों की तरह ही पत्थरबाजों की गिरोहबंदी भी है । देश-व्यापी समानताओं की इसी पृष्ठभूमि में, राजनीतिक नैतिकता-अनैतिकता के प्रश्नों से परे, यहाँ की पीडीपी-भाजपा सरकार भी है ।

कश्मीर की यह स्वाभाविक लय ही है कि पिछले दिनों जब यहाँ एनआईटी में कुछ बाहरी छात्रों ने तिरंगा फहराने को लेकर एक संघी-छाप राष्ट्रवाद का विवाद पैदा करने की कोशिश की तो उससे शुद्ध क़ानून और व्यवस्था के एक मसले के तौर पर निपटा गया । यहाँ तक कि कश्मीरी पंडितों के एक बड़े समूह ने भी ऐसे तिरंगाधारी झूठे राष्ट्रवादियों की कड़ी भर्त्सना की ।

एक पर्यटक के नाते हम इस स्वाभाविकता की लय का बाक़ायदा लुत्फ़ ले पा रहे हैं ।

कहते है पर्यटन तो यथार्थ को किसी दूरस्थ खिड़की से देखना होता है । लेकिन धरती की ऐसी समंजित तस्वीर को देख कर ही तो कल्पना चावला ने अंतरीक्ष से कहा था कि आह, इस खूबसूरत पृथ्वी पर स्वार्थों की कितनी मार-काट मची हुई है ! पर्यटकों के अंतर में बसी यह सुंदरता की तस्वीर ही शायद असुंदरता से नफ़रत का भाव पैदा कर सकती है !

कश्मीर के इन हालात को देख कर हमारा यह विश्वास दृढ़ हो रहा है कि  शायद अकेले 'पर्यटनवाद ज़िंदाबाद' के नारे से ही इस भू-स्वर्ग की अपनी हमेशा की ख्याति को फिर से पाया जा सकता है । कश्मीर कोई अजूबा नहीं है । यह अकल्पनीय प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ अपने अंतर में मानव-मानव को मिलाने वाली सबसे पवित्र भूमि की संभावनाओं को छिपाये हुए हैं ।

कश्मीर ज़िंदाबाद !

सोनमर्ग की यात्रा के अनूठे अनुभव के बाद : सचमुच देखना भी क्या चीज़ है !


-अरुण माहेश्वरी


आज सोनमर्ग के अभिभूत कर देने वाले प्राकृतिक दृश्यों के अनुभव के बाद फ़ेसबुक पर जब हमने कुछ चुनिंदा तस्वीरों को पोस्ट किया तो उसके साथ लिखा कि "सोनमर्ग के ग्लेशियर्स की यह यात्रा अपने में एक ऐसा अनुभव था जिसे बयान करना मुश्किल है । हम सचमुच इस समय किसी और ही दुनिया में चले गये थे । ये तस्वीरें उस अनुभव का अंश ही बयान करती हैं -"।

दूर-दूर तक फैली सफ़ेद झक्क पहाड़ियों का एक अनंत विस्तार, उस पर तेज़ बारिश से छाई हुई एक पारदर्शी धुँध, तेज़ हवा और कड़ाके की ठंड । इसमें स्लेजिंग के तखतों के साथ दौड़ते-भागते लोग, घोड़ेवालों की गहमा-गहमी और चार बॉंस पर टांग दी गई हवा में फड़फड़ाती प्लास्टिक की सीटों के कमज़ोर से शेड के नीचे चाय, काफ़ी, कहवा और न जाने क्या खाने-पीने की चीज़ें बेचने को आतुर आदमी के कर्मोद्दम का एक दूसरा ही लुभावना नज़ारा । ऐसे एक प्राकृतिक और कर्मरत मनुष्य के सौन्दर्य के योग से बने अभावनीय दृश्य में से अपनी पसंद की कुछ चुनी हुई तस्वीरों को साझा करते हुए इसके अलावा और क्या कहा जा सकता था कि जो देखा, जो अनुभव किया, उसका शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता है । यह सचमुच कुछ ऐसा ही था जैसे कोई अपने प्रियतम को देख कर जिस तृप्ति का अहसास करता है, उसे कभी भी पूरी तरह से शब्दों से, यहाँ तक कि किसी आलिंगन से भी व्यक्त नहीं कर सकता है । प्रेम करके वह सिर्फ़ इस समग्र अनुभूति के चौखटे में सामयिक तौर पर अपने को रख देता है, लेकिन उस देखने के समग्र अहसास को ख़ारिज नहीं कर पाता है ।

सचमुच, कोई विचार या चेतना की कितनी ही बात क्यों न कर लें, आदमी के शब्दों से पहले उसके सामने हमेशा दृश्य ही आया करता है । देख कर ही तो हम अपने चारों ओर की दुनिया में अपनी जगह खोज पाते हैं । हम शब्दों से भले उसे व्यक्त करें, लेकिन शब्द उस चारों ओर के परिवेश का विकल्प नहीं बन सकते । क्या यही वजह नहीं है कि हमारे देखने और जानने के बीच का संबंध हमेशा काफी हद तक अपरिभाषित ही रहता है ! सरियलिस्ट कलाकार मैगरिटा ने अपनी एक कला कृति में दृष्ट और शब्द के बीच के फ़र्क़ को 'सपनों की कुंजी' (Key of dreams) कहा है ।

हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि देखने की क्रिया में आदमी के अपने चयन का एक पहलू भी काम करता रहता है । हम वही देखते है जिसकी ओर अपनी नज़र डालते हैं । जिस बात ने बर्फ़ की चादर में ढंके इन जन-शून्य अनंत पहाड़ों को देख कर  हमें सबसे ज़्यादा परेशान किया वह यह थी कि हमारे देखने का तात्पर्य तो हमेशा यह भी होता है कि हमें भी देखा जा रहा हैं । अन्य की नज़रों से दो-चार होने से ही तो यह पता चलता है कि हम इस दृश्य- जगत के अंग है । जब हम कहते है कि हम उस जगह को देख रहे हैं, तो प्रकारांतर से यह भी कहते है कि वहाँ से हमें भी देखा जा सकता है । लेकिन एक ऐसे दृश्य के अनंत विस्तार से साक्षात्कार, जिसमें हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि वहाँ से हमें देखने वाला कोई दूसरा नहीं है, तब इसके सिवाय दूसरी कोई अनुभूति पैदा नहीं हो सकती है कि जैसे हम 'किसी और ही दुनिया में आ गये हैं ।'

सामने मनुष्यों का कोई संसार नहीं, सायं-सांय करती बर्फ़ीली तेज़ हवा में जैसे कोहरे में लिपटी कोई अंतहीन सफ़ेद चादर फड़फड़ा रही है । यहाँ दृष्टि के आदान-प्रदान की कोई गुंजाइश भी नहीं है । ऐसे में हमारे पास कहने और जानने के लिये खुद के ही शब्दों के आंशिक सत्य के अलावा और क्या रह जाता है? जीवन के शायद इसी, एकतरफ़ा संवाद के सच को ही सभी प्रकार के रहस्यवाद की जड़ कहा जा सकता है । ऐसे में शब्दों की तुलना में तस्वीरों से, भले ही फ़ोटोग्राफ़ी से ही क्यों न हो, बनाये गये बिंब बहुत ज़्यादा सार्थक लगने लगते हैं ।

फ़ोटोग्राफ़ी को भी सिर्फ़ चीज़ों को दर्ज करने की कोरी यांत्रिकता कहना उचित नहीं है । हर बिंब की तरह ही इससे रचे गये बिंब भी अक्सर अपने विषय की सीमाओं के पार जाने की सामर्थ्य रखते हैं । इसमें भी तमाम बिंबों की तरह ही देखने की एक दृष्टि निहित रहती है । जैसे हमारे इन साझा किये गये फ़ोटोग्राफ़ में 'पर्यटनवाद जिंदाबाद' की दृष्टि बहुत साफ़ तौर पर देखी जा सकती है ।

हम जानते है कि बिंब अक्सर कुछ पहले से अनुपस्थित चीज़ों के निर्माण के लिये बनाये जाते है । लेकिन परवर्ती समय में उनसे यह पता चलने लगता है कि कोई चीज़ या व्यक्ति एक समय कैसे दिखते थे, या घुमा कर कहे तो किसी चीज़ या व्यक्ति को एक समय में दूसरे कैसे देखते थे । और इसीसे आगे  बिंब या प्रतिमा को गढ़ने के पीछे के नज़रिये की सिनाख्त होती है ।

इस कश्मीर यात्रा के प्रारंभ से ही हमारा सारा ज़ोर तमाम प्रकार की अस्मिताओं के सवालों को दरकिनार करके मनुष्य की अपनी प्राणी-सत्ता के साथ, शुद्ध रूप में एक पर्यटक की तरह इस यात्रा का लुत्फ़ उठाने और मानव-मानव के मिलन की अकूत संभावनाओं से भरे इस भू स्वर्ग को महसूस करने पर रहा । सोनमर्ग के ग्लेशियर्स के इन अनूठे अनुभवों के आह्लाद ने हमारे इस मिशन को और भी पूरा किया । अब और एक दिन श्रीनगर में बिता कर हम फिर दिल्ली होते हुए इन वादियों को अलविदा कहके कोलकाता में अपनी दुनिया में लौट जायेंगे ।

उन सभी मित्रों को धन्यवाद जो किसी न किसी रूप में हमारी इस सम्मोहक यात्रा के साक्षी बने हैं ।

मंगलवार, 10 मई 2016

कश्मीर की घाटियों में 'धर्म चर्चा' का एक समानांतर वैचारिक यात्रा वृत्तांत -जगदीश्वर चतुर्वेदी की रवीन्द्रनाथ, मार्क्सवाद और धर्म संबंधी हाल की कुछ पोस्ट की प्रतिक्रिया में

कश्मीर की घाटियों में 'धर्म चर्चा' का एक समानांतर वैचारिक यात्रा वृत्तांत
-जगदीश्वर चतुर्वेदी की रवीन्द्रनाथ, मार्क्सवाद और धर्म संबंधी हाल की कुछ पोस्ट की प्रतिक्रिया में

-अरुण माहेश्वरी

जगदीश्वर जी, गुलमर्ग से पहलगाम के रास्ते में एक जाम में फँस कर आपके रवीन्द्रनाथ और धर्म विषयक लंबे लेख को पूरा पढ़ गया था । उसमें रवीन्द्रनाथ की धर्म चर्चा के संदर्भ में कतिपय मार्क्सवादियों और क्रांतिकारियों पर भी टीका-टिप्पणियाँ की गई थी । तभी, रास्ते से ही आपके लेख पर फेसबुक में मैंने एक छोटी सी टिप्पणी की थी और रवीन्द्रनाथ की बौद्धिक संरचना के गठन में भारतीय उपनिषदों की भूमिका को समझने पर ज़ोर दिया था ।

कोई भी बड़ा विचारक रातों-रात या जन्मजात बड़ा नहीं होता है । उसके पूरे वैचारिक व्यक्तित्व के विकास का अपना एक क्रम होता है । वह लगातार अपनी ही कई पूर्वधारणाओं को ख़ारिज करता हुआ कैसे विचार के नये क्षितिज खोलता है, उसी में उसका बड़प्पन निहित होता है । मैंने अपनी उस तात्कालिक प्रतिक्रिया में लिखा था -

"अभी पहलगाम के रास्ते में जाम में यह पूरा लेख पढ़ गया । पहलगाम पहुँच कर होटल में स्थिर होकर इस विषय पर जरूर आज कल में ही लिखूँगा । रवीन्द्रनाथ बचपन से ही औपनिषदिक ब्रह्म-चिंतन के परिवेश में संस्कारित हुए थे । उनकी यह पूरी चिंतन प्रणाली वेदांत की दीर्घ धारा से नि:सृत है । यह हेगेलियन भाववाद से ज़रा भी भिन्न नहीं है । हेगेल का परम विचार ही वेदांत का ब्रह्म दर्शन है । इस भाववादी द्वंद्ववाद में मानव मन की गहराइयों के प्रवेश के सारे उपादान मौजूद है । बिना इस द्वंद्वात्मकता के मनुष्य को समझा ही नहीं जा सकता है । मार्क्सवादी दर्शन ने इस द्वंद्ववाद को पूरी तरह से अपनाया है । इसीलिये एक विचारधारा के रूप में उसमें हर प्रकार के जड़सूत्रवाद से लड़ने की आंतरिक शक्ति और सामर्थ्य है । हेगेल के भाववादी द्वंद्ववाद से मार्क्सवादी भौतिकवादी द्वंद्ववाद में जो बुनियादी फर्क है, वह मानव जीवन पर उससे स्वतंत्र भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव को लेकर है । मार्क्सवाद उसके प्रभाव की प्रमुखता को स्वीकारने के कारण उसे बदलने की सचेत कार्रवाइयों पर बल देता है । इसीलिये वह क्रांतिकारी भी है । इसीलिये सही कहा गया है कि मार्क्स ने हेगेल को, जो सिर के बल खड़ा था, पैर के बल खड़ा किया, लेकिन उसे ठुकराया नहीं था, बल्कि अपनाया था । इससे वेदांत के साथ हमारे व्यवहार का भी दिशा-निर्देश मिल सकता है ।
"बहरहाल, शांति से रवीन्द्रनाथ की औपनिषदिक पृष्ठभूमि को उसके मूल से समझना और भी ज्यादा दिलचस्प है और कब और कैसे खुद रवीन्द्रनाथ उसका अपने लेखन और चिंतन में अतिक्रमण  करते हैं , यह भी देखने की चीज है । और यह तभी संभव हुआ है क्योंकि रवीन्द्रनाथ मूलत: एक लेखक थे और बदलते हुए मानव जीवन का संधान उनके लेखन कर्म का अभिन्न हिस्सा था ।
"रवीन्द्रनाथ का महत्व इसमें है कि वे एक साहित्यकार है जिनके पास गहरे तात्विक विषयों में प्रवेश की अन्तरदृष्टि होने के नाते उनकी रचनाएँ बेहद स्थाई महत्व की होती है । यह संयोग दुनिया में बहुत कम मिलता है । इस मामले में उनकी तुलना श्रेष्ठ मार्क्सवादी लेखकों से ही की जा सकती है । अगर वे लेखक न होते तो उनके वैचारिक भाषणों का दूसरे अनेक आध्यात्मिक गुरुओं से शायद ही कोई विशेष मान होता । "

जहाँ तक रवीन्द्रनाथ की औपनिषदिक पृष्ठभूमि और उनके चिंतन के विकास के क्रम का सवाल है , उनकी 150वीं जयंती पर अपने लेख 'रवीन्द्रनाथ की आध्यात्मिक पर आधारित विश्वदृष्टि' में मैंनें काफी विस्तार से, उनकी रचनाओं और लेखों के सिलसिलेवार उद्धरणों के साथ चर्चा की है । फेसबुक की बदौलत, इस रवीन्द्र जयंती के मौक़े पर हमने परसों ही उसे अपने ब्लाग के ज़रिये मित्रों से साझा किया था ।

आज सुबह-सुबह, इसी से जुड़ी आपकी एक और टिप्पणी 'मार्क्स और धर्म' को फेसबुक पर देखा । मार्क्स अपने वैचारिक जीवन के प्रारंभ के कई वर्षों तक जिस एक विषय से जूझते रहे थे, वह विषय धर्म ही था । जब तक उन्होंने इस विषय से जुड़े तमाम दार्शनिक और सामाजिक पक्षों को खंगाल कर पूरी तरह से जान नहीं लिया, वे अपने परवर्ती चिंतन की दिशा में एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ा पाये थे । मार्क्स के बारे में अध्ययन का स्वयं में यह एक बेहद दिलचस्प पहलू है । हमने इसकी गहराई से पड़ताल करके 'उत्तरगाथा' पत्रिका में धर्म के विषय में चली एक बहस को समेटते हुए उसी पत्रिका में एक लंबा लेख लिखा था - 'धर्म और मार्क्स' । उस बात को काफी साल बीत चुके हैं । जहाँ तक मुझे याद है उस बहस में भी हिंदी के कई नामी-गिरामी लेखकों ने हिस्सा लिया था, जैसे आपने अपने लेख में उदयप्रकाश की बातों का हवाला दिया है । हमारा वही लेख हमारी किताब 'चतुर्दिक 2, धर्म, संस्कृति और राजनीति' का पहला लेख है । उस लेख के क्रम में जो बात हमारे सामने आई, वह यही थी कि धर्म के प्रति मार्क्स के दृष्टिकोण और अन्य घोषित नास्तिकतावादियों के दृष्टिकोण में कुछ बुनियादी फर्क है । इसके अलावा हमने यह भी पाया कि जब कोई व्यक्ति किसी विषय को पूरी गहराई में जाकर उसे आद्योपांत जान लेता है, तभी वह उस विषय से पूरी तरह से मुक्त भी हो जाता है । मार्क्स सालों तक इस विषय से जूझते रहे और जब वे इसके सारे रहस्य को भेद कर राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन और अपने द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन के विकास की दिशा में बढ़ गये तो फिर कभी उन्होंने धर्म के विषय की ओर मुड़ कर देखा तक नहीं । यह खुद में एक बहुत दिलचस्प तथ्य ही नहीं है, बल्कि पूरे मानव चिंतन को दी गई उनकी एक सबसे बड़ी सौग़ात है । उन्होंने मनुष्य को धर्म नामक तत्व से सदा के लिये मुक्ति पाने का एक सैद्धांतिक आधार प्रदान कर दिया । मार्क्स के बाद धार्मिक विमर्श कोई अंतिम विमर्श नहीं, बल्कि मानव चिंतन के विकास की एक और कड़ी भर बन कर रह गया, जिसके हज़ारों सालों के एकाधिपत्य को देखते हुए आप एक काफी महत्वपूर्ण कड़ी जरूर कह सकते हैं ।

बहरहाल, रवीन्द्रनाथ और धर्म के विषय में आपके लेख की उत्तेजक टिप्पणियों ने मुझे धर्म और मार्क्सवाद के अलावा भारतीय चिंतन में धर्म के स्थान के बारे में अभी कुछ लिखने के लिये उत्तेजित किया था । अपनी उक्त तात्कालिक प्रतिक्रिया में हमने यही कहा था कि आगे यात्रा में फ़ुर्सत निकाल कर इस विषय पर कुछ विस्तार से लिखना चाहूँगा । रवीन्द्रनाथ और उपनिषदों के बारे में हमारी बात तो उनकी 150वीं जयंती पर लिखे गये लेख में आ ही गई है । इसी प्रकार 'मार्क्स और धर्म' लेख में इस विषय पर मार्क्स के दृष्टिकोण पर काफी विस्तार से लिखा जा चुका है । अब रही बात 'भारतीय चिंतन में धर्म' की ।

'पर्यटनवाद जिंदाबाद' के नारे के अपने सुख और इसकी गहमा-गहमी के बीच स्वाभाविक यही था कि हम एक प्रकार की विचार-शून्य आध्यात्मिकता की शरण में चले जाते । लेकिन पता नहीं क्यों , आपके लेख का विषय इस परिवेश में भी हमें घेरे रहा है और अभी तो इस पर सोचना एक प्रकार के प्रीतिकर भटकाव जैसा लग रहा है । संभव है, इसमें शायद इस कश्मीर घाटी का भी कुछ अपना योगदान भी है । क्योंकि जब श्रीनगर की एक पहाड़ी के शिखर पर दूर से ही हमने शंकराचार्य के भव्य मठ की झलक देखी, तभी हमारे दिमाग़ में इस घाटी में बस गये भारत के एक श्रेष्ठतम दार्शनिक, तांत्रिक, सौन्दर्यशास्त्री, तर्कशास्त्री, संगीतकार, कवि और नाटककार अभिनवगुप्त और उनके शैवमत और अद्वैत की भव्यता की भी याद आगई थी ।

आज दुनिया के प्रसिद्ध मार्क्सवादी दार्शनिक स्लावोय जिजेक किसी भी संक्रमण के बिंदु को एक ऐसी घटना के रूप में देखते है जो सिर्फ नये भविष्य का ही निर्माण नहीं करती, बल्कि उलट कर अतीत की गहरी गुहा में जा कर उसके भी पूरी तरह से एक नये आख्यान की रचना करती है । इस प्रकार संक्रमणकारी घटना अतीत की भी पुनर्रचना करती है, तमाम पूर्व-धारणाओं को नये सिरे से परिभाषित करती है । जिजेक इसे हेगेल की शब्दावली में एक 'परम प्रत्यावर्तन '(Absolute Recoil) कहते हैं और सबसे अधिक ग़ौर करने लायक बात यह है कि वे इसी 'परम प्रत्यावर्तन' में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के नये रूप को स्थापित करने का दावा करते हैं । अभिनवगुप्त का 'प्रत्याभिज्ञान' भी तो बिल्कुल यही, एक प्रत्यावर्तन ही तो था । उन्होंने भी संक्रमण को सिर्फ वर्तमान के संदर्भ में नहीं, बल्कि अतीत तक गहरे धस कर वर्तमान के तमाम संदर्भों को नए रूप में परिभाषित करने की शक्ति के रूप में देखा था । मज़े की बात यह है कि अभिनवगुप्त के इसी दर्शन से, परिवर्तन के बिंदु से अर्जित शक्ति और बौद्ध दर्शन के वज्रयान के योग से आगे उनकी तंत्र विद्या का विकास हुआ - इस शक्ति ने सिद्धि और विभूति के ज़रिये चमत्कारी तंत्र विद्या को जन्म दिया । अभिनवगुप्त के 'तंत्रलोक' में परिवर्तन के संयोग का यह बिंदु, जहाँ से जीवन और विचार का एक नया लोक उद्घाटित होता है, संभोग के क्षण में बदल जाता है । स्त्री को पुरुष की शक्ति का केंद्र बना कर उसमें प्रवेश से वे पुरुष की आत्मोपलब्धि, खुद के पुनर्राविस्कार की तांत्रिकता का शास्त्र तैयार करते है, और हम जानते ही हैं कि परवर्ती समय में इस तंत्र विद्या के तहत स्त्री के शरीर के साथ कितने प्रकार के विकट और विकृत प्रयोगों का एक सिलसिला हमारे यहाँ शुरू हो जाता है । सचमुच यह देख कर आश्चर्य होता है कि जिजेक भी अपने दार्शनिक विमर्श में बेहिचक पोर्नोग्राफ़ी के प्रसंगों का धड़ल्ले से प्रयोग करने के लिये काफी बदनाम है !

बहरहाल, धर्म संबंधी चर्चा के क्रम में अभिनवगुप्त, उनके 'प्रत्याभिज्ञान' और तंत्रविद्या और जिजेक तथा उनके 'परम प्रत्यावर्तन ' और पोर्नोग्राफ़ी की इस अनायास और किंचित अप्रासंगिक सी दिखाई दे रही चर्चा के बावजूद जब हम भारतीय चिंतन के संदर्भ में धर्म की स्थिति के बारे में सोचते हैं तो यह उतनी अप्रासंगिक भी नहीं जान पड़ती है । 'प्रत्याभिज्ञान' का एक दार्शनिक पहलू था और तंत्र विद्या के रूप में उसका एक भ्रष्ट कर्मकांडी रूप सामने आया था । कमोबेस इसी प्रकार भारतीय चिंतन में भी धर्म का कोई एक ही निश्चित रूप नहीं रहा है -दर्शनशास्त्रीय स्तर पर भी और कर्मकांडी स्तर पर भी । उपरोक्त चर्चा के प्रारंभ से ही एक बात तो साफ़ है कि रिलीजन या वर्च्यूज के जिस अर्थ में आज धर्म को देखा जाता है, वैसा सुदूर अतीत में न पश्चिम में था और न ही भारतीय चिंतन में । एक लंबे काल तक दोनों जगह धार्मिक और दार्शनिक विमर्श के बीच कोई फर्क नहीं था । वह मनुष्य की पारलौकिक ही नहीं, इहलौकिक जिज्ञासाओं के भी केंद्र में था । हेगेल का 'परम विचार' तक कहीं न कहीं ईश्वर से जुड़ता था और व्यवहार के धरातल पर राज्य के संचालक के नाते राजा में ईश्वर के अंश को देखता था । इसप्रकार कहीं भी धर्म का कोई एक रूढ़ स्वरूप नहीं रहा है ।

कुमारिल के 'मीमांसा सूत्र' का पहला वाक्य ही है - 'अथातो धर्म-जिज्ञासा' - अर्थात धर्म के स्वरूप के बारे में जिज्ञासा । उनकी इस धर्म-जिज्ञासा में वेदों का सबसे केंद्रीय स्थान था । उनके यहाँ धर्म का मतलब है वैदिक आदेश-निर्देश, वैदिक यज्ञ और  इनसे भी महत्वपूर्ण है वैदिक विधि-निषेध । इसे आदमी के मंगल का अंतिम, अत्यांतिक मार्ग माना गया, तमाम संदेहों और प्रश्नों से परे । स्वर्गादि शुभ फलों के प्रदाता वैदिक यज्ञों के रूप में जब वे धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हैं तो उससे यही जाहिर होता है कि दूरदर्शितापूर्ण कार्यों से वांछित फल की प्राप्ति ही धर्म है, बशर्ते इसे प्राप्त करने में वैदिक विधि-निषेधों का बाक़ायदा पालन किया गया हो । मसलन्, आदमी को चोट पहुँचाना अवांछनीय है, इसीलिये शत्रु को चोट पहुँचाना भी धर्म नहीं है । इस धर्म को श्रुति के द्वारा विधि-निषेधों से जाना जा सकता है ।

इस प्रकार साफ़ है कि मीमांसक कुमारिल की धर्म की अवधारणा में ईश्वर या किसी रहस्यवादी धार्मिक भावावेश का कोई स्थान नहीं था । इसमें किसी प्रकार के संवेगों, रहस्यात्मकता भावों या बुद्धि या विचारों का भी कोई ख़ास स्थान नहीं था । यह मूलत: श्रुति-आदेशों के निष्ठापूर्ण पालन से जुड़ा हुआ कार्य था । इसमें अहिंसा का एक स्थायी तत्व जरूर था, जो जीने और जीने दो की मानव जीवन की एक बुनियादी शर्त थी । वेदों पर इसकी निर्भरशीलता सिर्फ विधि-निषेधों के ज्ञान के लिये थी, और किसी वजह से नहीं । शत्रु की हत्या से एक व्यक्ति को तात्कालिक सुख मिलने पर भी वैदिक आदेशों से वर्जित होने के कारण उससे भविष्य में अनिवार्यत: दुख पैदा होगा, इसीलिये उसे उन्होंने धर्म के बाहर ही रखा था ।

कहने का मतलब यह है कि धर्म के इस रूप में किसी प्रकार के रहस्यवाद के लिये कोई जगह नहीं थी । मुझे लगता है, वेदों और धर्म के इस रूप के संबंधों की मोटे तौर पर एक तुलना आज के संविधान और उसके क़ानूनी प्राविधानों से की जा सकती है । परवर्ती स्मृतियों में धर्म के इस विचार का नाना प्रकार की नैतिकताओं और सद्गुणों के रूप में विकास होता चला गया । इस मामले में स्थिति यहाँ तक चली गई थी कि यदि कोई कार्य वांछित है, जिसकी बुद्धि और विवेक अनुमति देता है, तो उसकी पुष्टि वेदों अथवा स्मृति पुराणों में न होने पर भी इस बिनाह पर उसे धर्म माना जाने लगा कि उसका उल्लेख वेदों में हैं, लेकिन वह हमें दिखाई नहीं दे रहा है ।

इस प्रकार, भारतीय चिंतन में वैदिक आदेशों के पालन, सत्य और अहिंसा के नैतिक सद्गुणों और आत्म- ज्ञान की यौगिक क्रियाओं के रूप में धर्म संबंधी अवधारणाओं के विकास की अपनी यह एक अलग और लंबी कहानी है जिसे हम आज तक 'मानव धर्म' के रूप में दोहराते रहते हैं । लेकिन भारतीय पुराणों में भागवत पुराण इस विषय के एक और ही नये पहलू को सामने लाता है । इसमें ईश्वर भक्ति और उपासना के पहलू को धर्म के एक सर्वप्रमुख पहलू के रूप में रखा जाता है । भागवत में कहा गया है कि ईश्वर की 'अहैतुक' और 'अप्रतिहत' भक्ति ही धर्म है । यह भारतीय दर्शन के इतिहास में धर्म के बारे में विचार की एक बिल्कुल नई दिशा कही जा सकती है । ईश्वर भक्ति को न उत्पन्न करने वाले धर्म को इसमें 'निष्फल धर्म' बताया गया है । वैदिक आदेशों से चालित धर्म को तात्कालिक सुख का प्रदाता बताया गया । स्थायी और परम सुख तो सिर्फ ईश्वर भक्ति से हासिल किया जा सकता है । इसे वैदिक धर्म से उत्कृष्ट माना गया ।

भागवत के पहले श्लोक में ही 'परम सत्य' की आराधना की गई है , जो परमेश्वर ही है । इसे ही ब्रह्मन, परमात्मन् आदि कई नामों से पुकारा जाने लगा । इस अरूप ब्रह्मन में एक मायावी शक्ति को, तमाम प्रकार की सृष्टियों की शक्ति को देखा जाने लगा । भागवत में कई जगह परमेश्वर की चर्चा शुद्ध चैतन्य के रूप में की गई है । इस प्रकार, परमेश्वर का आंतरिक सत्य, उसका शुद्ध चैतन्य रूप, उसकी बाहरी सत्ता 'माया' और अन्य तमाम जीवों में अधिष्ठित उसकी सत्ता के एक त्रिगुणात्मक रूप में ब्रह्मन को देखा गया । इसके साथ ही दिक्-काल से मुक्त वैकुण्ठ की कल्पना की गई जहाँ इस परमेश्वर का वास है । और, परम सत्य, जिसे परम सत्ता कहा गया, उसके सगुण रूपों की कल्पनाओं से उस पूरे धर्म व्यवसाय की पैदाईश होती है जो मंदिरों, मठों, गिरजाघरों और मस्जिदों की तरह के नये वर्चस्वकारी सत्ता केंद्रों के विकास तक जाता है , जिसे हम धर्म के शुद्ध कर्मकांडी रूप में आज अपने जीवन में देखते हैं ।

जगदीश्वर जी, इस चर्चा का सिर्फ यही मतलब है कि आपने अपने लेख में जिस प्रकार से भारतीय चिंतन में धर्म के एक साधारण और सर्वकालिक रूप की चर्चा करते हुए उसे अपनाने की बात की है , वह यथार्थ में बिल्कुल भी वैसा सुनिश्चित नहीं है, न भारतीय चिंतन की परंपरा में और न ही हमारे जीवन की ठोस वास्तविकता में । यदि हम इसकी चर्चा 'मानव धर्म' की अवधारणा के रूप में करना चाहे तो आज के राष्ट्रीय  राज्य में इस धर्म का अकेला वैदिक ग्रंथ राज्य का संविधान होता है । मनुष्य के सामाजिक आचरण उसके आदेशों - निर्देशों से चालित होते हैं । चूँकि हम राष्ट्रीय जनतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे है, इसलिये हम अपने संविधान की बात करते है । इसे ही यदि आप वैश्विक संदर्भ में देखना चाहे तो इसमें एक ओर आज की पूँजीवादी वैश्विकता के क़ायदे- क़ानून है और दूसरी ओर मार्क्सवादी अन्तरराष्ट्रीयतावाद है, पूरे मानव जीवन और सोच- विचार को बिल्कुल नये रूप में ढालने की शक्ति का विचार - जीवन के क्रांतिकारी रूपांतरण का विचार, वास्तविक संक्रमणकारी विचार । हमारे अनुसार तो आज के समय में परम प्रत्यावर्तन किसी धर्म से नहीं, इस नये सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी प्रत्यय और इससे जुड़े लगातार प्रयोगों से ही मुमकिन है ।

जगदीश्वर जी, एक प्रवाह में, पहलगाम की परम शांत वादियों में, धर्म की तरह के विषय पर हमने यह एक काफी लंबी यात्रा कर ली है । मैं नहीं जानता इसमें कितना कह पाया हूँ, कितना नहीं । और प्रामाणिकता के पहलू तो अलग है ही । कोलकाता लौट कर अपने इस नोट पर ज्यादा प्रामाणिक तथ्यों के साथ काम करने की कोशिश करूँगा । फिर भी अपने इस नोट को तमाम मित्रों से उसी प्रकार साझा कर रहा हूँ, जिस प्रकार पिछले पाँच दिनों से इन वादियों की ख़ुशगवार तस्वीरों को साझा करता रहा हूँ । सचित्र यात्रा वृतांत के साथ इस प्रकार की विचार-यात्रा के सुख भी कम नहीं हैं । उम्मीद है मित्रों भी कुछ ऐसा ही लगेगा ।

इस प्रकार की वैचारिक उत्तेजना देने के लिये आपको बहुत धन्यवाद । 

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

गुलजार और रवीन्द्रनाथ की कविताओं का अनुवाद






अरुण माहेश्वरी


गुलजार मूलत: हिंदी फिल्म जगत की एक उपज है, अर्थात, कहा जा सकता है, शुद्ध व्यवसायिक जगत की उपज। बौलीवुड के बारे में कहा ही जाता है कि यहां जो बिकता है, वही चलता है। यह सिनेमा से जुड़े रचनाशीलता के तमाम पक्षों पर बाजार के नियमों पर अमल का क्षेत्र है।


एक ऐसे जगत से आने वाले गुलजार की शायरी अपनी खास रंगत के कारण अक्सर अचंभित कर देने वाली होती है। शोर-शराबे से भरे ग्लैमर की दुनिया के बीच कैसे किसी आदमी की इतनी महीन, जहीन, नाजुक सी आवाज अपने को सुरक्षित रख पाती है, यह किसी के लिये भी एक रहस्य का विषय हो सकता है। उनकी एक शायरी की पंक्तियां है -


‘‘देखना, सोच-संभल कर जरा पांव रखना

जोर से बज न उठे पैरों की आवाज कहीं

कांच के ख्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में’’


और


‘‘ख्वाब टूटे न कोई, जाग न जाए देखो

जाग जाएगा कोई ख्वाब तो मर जायेगा।’’


जागना ख्वाबों की मौत है और जाहिर है कि जगाना ख्वाबों की हत्या ! हेगेल ने लिखा है कि शब्द वस्तु की मृत्यु है और शब्द के साथ ही चेतना के, विचारों के संसार का प्रारंभ होता है। लेकिन चेतना (जागृति) ख्वाबों की हत्या करती है -उलट कर देखें तो बेहोशी के सुख का अवबोध - यह क्या कम महत्वपूर्ण है ! जब और कोई साधन नहीं होता तो जीने के लिये बेहोशी के फलसफे पर कम नहीं लिखा गया है !


बहरहाल, गुलजार हमारे सामने जो प्रश्न छोड़ते हैं वह यही है कि कैसे वे नीम बेहोशी के धुंधलके में लिपटे अपने नितांत निजीपन और ‘शो अभी भी जारी है’ के हंगामाखेज जीवन के बीच एक तालमेल बना कर चलते होंगे ? ‘‘आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता’’ की तरह की बिल्कुल खामोश सी अपनी कविता से व्यवसाय जगत की भागम-भाग का मेल कैसे बैठाते होंगे ?


गुलजार के फिल्मी गीतों के रेंज को देख कर कई मर्तबा तो घबड़ाहट सी होने लगती है।


‘‘जब भी यह दिल उदास होता है/जाने कौन आस-पास होता है/बेवजह जब करार मिल जाए/दिल बड़ा बेकरार होता है’’ की तरह की गालिब के अंदाज की शायरी से लेकर ‘‘बीड़ी जलइले जिगर से पीयां’’ की तरह का चवनिया लेखन। यह अनायास ही हमें ‘‘हम है मताए कूचए बाजार की तरह’’ से लेकर ‘‘रेशमी सलवार कुर्ता जाली का’’ तक के मकबूल शायर मजरूह साहब की याद दिला देती है।


इन्हीं उदाहरणों से हमारा ध्यान ‘उस्ताद की कलम’, उसके ‘अंदाज’ के विषय की ओर चला जाता है - ओरहन पामुक के उपन्यास ‘‘My Name is Red’’ का नक्काश उस्ताद कहता है कि ‘‘जिसे हम फनकार का अंदाज कहते हैं वह दरअसल उसका अधूरापन या ऐब होता है, जिससे मुजरिम का सुराग मिलता है।.. नुक्स से ही अंदाज पैदा होता है।’’


और, साथ ही उस्ताद का यह तंज भी है कि ‘‘अगर इंसान का ‘सरकंडा’ उसकी बीबी को खुश कर देता हो तो उसके फन का सरकंडा उतना असरदार नहीं होता।’’


बहरहाल, उस्ताद के अंदाज की ऐसी ही अनेक कौंध से भरी गुलजार की रचनाशीलता का हमें एक और नया परिचय मिला है, उनकी दो किताबों, ‘बागबान’ और ‘निदिया चोर’ से - रवीन्द्रनाथ की रचनाओं के संकलन ‘Gardner’ और ‘The Crescent Moon’ के गुलजार द्वारा किये गये उर्दू अनुवाद से। हार्पर पैरेनियल ने इनका इतना खूबसूरत प्रकाशन किया है कि किसी को भी इन्हें पाकर एक अलग सी खुशी का अहसास होगा।


हम सभी जानते हैं कि रवीन्द्रनाथ ने खुद ही अपनी इन बांग्ला कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद किया था। गुलजार ने इन संकलनों की कविताओं के बांग्ला और अंग्रेजी, दोनों रूपों की मदद लेकर देवनागरी लिपि में इनका उर्दू अनुवाद किया है।


अच्छे अनुवाद के बारे में कहा ही जाता है कि वह फूलदान की तरह की किसी भी जीवित कृति को तोड़ कर शुरू किया जाता है। रचना पहले टुकड़ों में बिखर कर अनुवादक के सामने आती है, और अनुवादक फिर इस फूलदान के टुकड़ों को जोड़ता है। फूलदान को तोड़ना ही अनुवाद के रूप में उसके नवनिर्माण की शर्त है। दुनिया की क्लासिकल कृतियां इसी तरह तमाम भाषाओं और कालों में पहले बिखर कर फिर पुनर्रचना के जरिये कालजयी बन कर सामने आया करती है।


इसमें शक नहीं है कि किसी भी क्लासिकल कृति में हस्तक्षेप करने के अपने तमाम जोखिम भी होते हैं। इनकी सफलता के कोई निश्चित नुस्खे नहीं होते। बल्कि अक्सर इसप्रकार के प्रयोगों की दुर्गतियां ही ज्यादा दिखाई देती हैं। लेकिन फिर भी हमेशा नहीं । इन सबके विपरीत सचाई यह है कि किसी भी क्लासिकल कृति के प्रति निष्ठापूर्ण रहने का मतलब ही है कि उसके साथ इसप्रकार का जोखिम उठाया जाना । कृति के पारंपरिक रूप और ढांचे से चिपके रहना क्लासिक की भावना के साथ विश्वासघात करने का सबसे सुरक्षित उपाय कहा जा सकता है।


रवीन्द्रनाथ की रचनाओं के हिंदी अनुवादों के मामले में इसप्रकार की लकीर की फकीरी के विध्वसंक परिणामों को हम लगातार देखते रहे हैं। खास तौर पर जिन लोगों ने रवीन्द्रनाथ के गीतों का रवीन्द्र संगीत की धुन को बनाये रखते हुए हिंदी में अनुवाद किया है, उन गीतों को सुन कर तो यह अनुमान लगाना भी कठिन होता है कि वे हिंदी में हैं या बांग्ला में या किसी और ही नयी, अबूझ सी भाषा में ! इस प्रकार के अनुवादों को हम ‘मच्छरमार अनुवाद’ कह सकते हैं, अर्थात ऐसा अनुवाद जिसमें मूल प्रति में किसी वजह से मरा हुआ मच्छर चिपका हो तो अनुवादक भी खोज कर वहां एक मच्छर को मार कर चिपका देता है।


ऐसे ‘मच्छरमार’ अनुवाद के बजाय, क्लासिकल कृति को जीवित रखने का एक मात्र तरीका उसे ‘खुला’ रखना है, भविष्य की ओर ले जाने वाला, काल को पार करने वाला खुलापन - एक ऐसी फिल्म बनाना जिसको विकसित करने का रसायन बाद में आता है !


गुलजार की कविता की एक पंक्ति है - ‘‘मैंने काल को तोड़के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया।’’


रवीन्द्रनाथ के इन दो संकलनों का उनका अनुवाद भी ऐसा ही है, काल को तोड़ कर लम्हे-लम्हे को जीने के समान। रवीन्द्रनाथ के औपनिषदिक चिंतन के खोल को आसमान की तरह और खोल देने वाला, उसमें और भी रंगों को भरने की संभावनाएं पैदा करने वाला।


अपने इन अनुवादों में गुलजार ने अपनी सुविधा के अनुसार कहीं मूल बांग्ला की कविताओं को अपना अवलंब बनाया है तो कहीं रवीन्द्रनाथ के अंग्रेजी अनुवादों को। रवीन्द्र विशेषज्ञों की यह मान्यता रही है कि रवीन्द्रनाथ खुद अपनी कविताओं के अच्छे अनुवादक नहीं थे। गुलजार ने अच्छे-बुरे अनुवाद के इस पहलू की बिना कोई परवाह किये उनके ढांचे को तोड़ कर एक दूसरी भाषा के चौखटे में उतारने के लिये अपनी मर्जी से कविताओं के मूल बांग्ला या अंग्रेजी पाठों का अपनी सुविधा के अनुसार चयन किया है।


दरअसल, हिंदी की कथित साहित्य भाषा का रवीन्द्रनाथ की बांग्ला भाषा से काफी मेल है, क्योंकि कुछ ऐतिहासिक कारणों से ही यह भाषा मूलत: बांग्ला के प्रभाव के तहत ही विकसित हुई है। आलोक राय की पुस्तक ‘हिंदी नेशनलिज्म’ से हिंदी की 'साहित्यिक भाषा' के इस पहलू की सचाई को बखूबी जाना जा सकता है। उस किताब की भूमिका में निलाद्रि भट्टाचार्य ने इस भाषा को एक मृत भाषा भी कहा है - हिंदी भाषी जनता और कथित हिंदी साहित्य के बीच का एक बड़ा अवरोध। इस बात को रवीन्द्रनाथ की रचनाओं के हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय सहित साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित उनके रचना संचयन में शामिल किये गये हिंदी अनुवादों को देख कर और भी अच्छी तरह से जाना जा सकता है। ये अनुवाद कथित तौर पर प्रामाणिक होने पर भी रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का जितना व्याप और गहरा असर बांग्ला भाषी लोगों पर पड़ता है, उसका एक प्रतिशत भी इन अनुवादों को पढ़ कर हिंदी भाषी जनता पर नहीं पड़ता।


इस लिहाज से देखने पर गुलजार का यह उर्दू अनुवाद, जिसे एक प्रकार से ‘हिंदुस्तानी’ में किया गया अनुवाद कहा जा सकता है, अब तक के उपलब्ध अनुवाद की कमियों को दूर करने संभावनाओं की ओर संकेत करता है।


रवीन्द्रनाथ की रचनाशीलता का एक प्रमुख उपादान उनमें गहरे तक पैठा हुआ उनका औपनिषदिक चिंतन और स्मृति ग्रंथों के वृत्तांतों का संस्कार रहा है। कहना न होगा, अपनी ही कविताओं के उनके अंग्रेजी अनुवादों में इस औपनिषदिक चिंतन की ध्वन्यात्मकता व्याहत हुई हैं। जाहिर है कि गुलजार ने भी जब उनकी अंग्रेजी कविताओं को अपना अवलंब बनाया है, उन अनुवादों को मूल बांग्ला से मिला कर देखने पर, कुछ वैसी ही कमियां इन अनुवादों में भी दिखाई देती है।


उदाहरण के तौर पर, रवीन्द्रनाथ की कविता है - दु:समय। गुलजार के अनुवाद में इसका शीर्षक - ‘पंछी’। इस कविता में एक जगह जंगल की अपनी एक ध्वनि की चर्चा है - ‘‘ए नहे मुखर वनमर्मर गुंजित/ ए जे अजगरगरजे सागर फूलिछे’’ - यह मर्मर गुंजन द्वारा मुखरित वन नहीं है। यह अजगर की फुफकार की तरह समुद्र के उफान की गूंज है। मूल कविता में जो फुफकार की ध्वनि का पक्ष है, वह अनुवाद में रवीन्द्रनाथ के अंग्रेजी पाठ को अवलंब बनाने की वजह से ही गायब हो गया है। रवीन्द्रनाथ ने अंग्रेजी में लिखा है -


That is not the gloom

of leavesof the forest,

that is the sea swelling

like a dark black snake


गुलजार ने इसका अनुवाद किया है -


‘‘ये जंगल में दरख्तों की उदासी भी नहीं है

समंदर में जवार उठी है, काले नाग के जैसे’’


बहरहाल, ऐसी चंद मामूली कमियों की बातों के बावजूद, रवीन्द्रनाथ की कविताओं का एक प्रकार से हिंदी में किया गया यह अनुवाद लंबे अर्से की उस कमी को पूरा करने की संभावना की ओर संकेत करता है, जिस दिशा में बढ़ कर रवीन्द्रनाथ की कविताओं के मर्म से, उनकी रचनाओं की शक्ति के स्पर्श से हिंदी के सामान्य पाठकों तक को लाभान्वित किया जा सकता है । अपने किस्म के इस दिशा दिखाने वाले काम के लिये गुलजार हार्दिक बधाई के पात्र हैं। और इसके साथ ही यह सवाल भी उठ जाता है कि जैसे पत्रकारिता लेखक की भाषा का लोकोन्मुखी परिमार्जन करती है, क्या अनुवाद में क्लासिकल काव्य की पुनर्रचना कर उसे कालजयी, नया जन्म देने की सामर्थ्य लोकप्रिय गीतकार बन कर ही अर्जित की जा सकती है ?



मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

वामपंथी कांग्रेस = जनतांत्रिक वामपंथ !


अरुण माहेश्वरी

‘‘दर्शनशास्त्र विश्व के चिंतन के रूप में तब तक सामने नहीं आता है जब तक यथार्थ अपने बनने की प्रक्रिया को पूरा नहीं कर लेता, और खुद को तैयार नहीं कर लेता...जब दर्शनशास्त्र  विश्व की सचाई को हूबहू रखता है, जीवन का एक रूप वृद्ध हो चुका होता है, और इस वृद्धावस्था से उसे चंगा नहीं किया जा सकता है, बल्कि सिर्फ उसे जाना जा सकता है। स्वर्ग का उल्लू (Owl of Minerva) उसी समय उड़ान भरता है जब रात के रंग घने होने लगते हैं।’’
(Philosophy, as thought of the world, does not appear until reality has completed its formative process, and made itself ready...When philosophy paints its grey in grey, one form of life has become old and by means of grey it can not be rejuvenated, but only known. The owl of Minerva takes its flight only when the shades of night are gathering)
(Hegel, Philosophy of Right, Preface, marxist.org.)

हेगेल के इस कथन को हमने यहां सिर्फ इस सवाल को उठाने के लिये उद्धृत किया है कि विचारों, शोध और चिंतन की दुनिया में इस प्रकार की उक्तियों का क्या कोई महत्व है जब कहा जाए कि ‘‘Such a defence is open to the charge of being an after-the-event justification’’। ( इस प्रकार की दलील पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि यह घटना के बाद में उसे उचित ठहराने की दलील है।)

सन् 1985 की इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो. बिपन चन्द्रा ने स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीवादी नेतृत्व की संघर्ष की कार्यनीति को जब S-T-S (Struggle-Truce-Struggle), संघर्ष- समझौता - संघर्ष के सूत्र के रूप में व्याख्यायित करने की कोशिश की, उसका जिक्र करते हुए प्रो. इरफान हबीब ने बिपन चंद्रा के प्रति अपने श्रद्धांजलि लेख में लिखा है कि -
“It is clear he was here contesting the standard communist criticism of Gandhian leadership for its proneness to compromise. Bipan Chandra posited in defence of the latter, a hypothetical Gandhian strategy of S-T-S (Struggle-Truce-Struggle at higher level). Such a defence is open to the charge of being an after-the-event-justification”

इसके साथ ही अपने वाक्य को पूरा करते हुए उन्होंने यह भी लिखा कि “but as an actual listener to the address, I can testify that there was obvious sincerety in Bipan Chandra when he expounded it.”(Understanding India’s Freedom Struggle, obituaries to Bipan Chandra, Freedom Struggle Publication, page-3)

(यह साफ है कि वे गांधीवादी नेतृत्व की समझौता-परस्ती के बारे में कम्युनिस्टों की सर्वविदित आलोचना पर सवाल उठा रहे थे। बिपन चन्द्रा उसकी, संघर्ष-समझौता- संघर्ष की एक काल्पनिक गांधीवादी रणनीति की पैरवी कर रहे थे। इस प्रकार की दलील पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि यह घटना के बाद में उसे उचित ठहराने की दलील है, लेकिन एक श्रोता के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि बिपन चन्द्रा पूरी ईमानदारी के साथ यह दलील दे रहे थे)

हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि चिंतन की दुनिया के लिये इरफान हबीब की महत्वपूर्ण बात यह नहीं थी कि यह “after-the-event-justification” था, बल्कि महत्वपूर्ण बात बाद यह थी - “there was obvious sincerety in Bipan Chandra when he expounded it.”

खुद प्रो. हबीब ने अपने इसी श्रद्धांजलि लेख में माना था कि ‘‘1960 के पूरे दशक के दौरान बिपन चन्द्र ‘इंक्वारी’ पत्रिका की प्रमुख प्रेरणा थे, जिस पत्रिका ने मार्क्सवादियों के बीच तीव्र विभाजन के काल में कई विषयों को स्पष्ट करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।’’
(Throughout the 1960s Bipan Chandra remained the main spirit behind the journal Enquiry, which, during a period of acute division among Marxists, played an important role in clarifying issues.)

हेगेल का ही एक प्रसिद्ध कथन है - ‘‘मिस्रवासियों की गोपनीय बातें खुद मिस्रवासियों के लिये भी गोपनीय होती है।’’ (The secrets of the Egyptians are also secrets for the Egyptians themselves)

यह सचाई हर किसी पर लागू होती है। अपने जीवन के दायरे की वे तमाम बातें जो किसी के लिये अति सामान्य (quite normal) होती है, प्रो. हबीब के शब्दों में ‘standard’, वे सभी उसके किसी काल्पनिक सत्य की प्रतीति (appearance) भर होती है। कह सकते हैं, उसकी विचारधारा का एक शुद्ध रूप। लेकिन जब भी उसे ठोस रूप देने की कोशिश होती है, वह पूरी तरह से एक विरूपित और विध्वस्त रूप में प्रकट होता है।


चीन ने साम्यवाद में ‘लंबी छलांग’ के अपने उन्माद में ‘सबसे उसकी क्षमता के अनुसार और सबको उसकी योग्यता के अनुसार’ के सामान्य सूत्र को रूपायित करने का निर्णय लिया और इसका परिणाम यह हुआ कि सर्वत्र पार्टी का नेतृत्व हर किसी की योग्यता और जरूरतों का निर्णायक बन गया। वहां के कृषि सहकारों में पूरे जीवन का सैन्यीकरण होगया। साम्यवाद रूपायित हुआ बेइंतहा गरीबी से भरे एक फौजी जीवन में ! अर्थात, हर महान विचार के रूपायन में इसप्रकार के उसके महापतन के बीज भी कहीं न कहीं सुप्त पड़े होते हैं। पाब्लो नेरुदा ने अपनी चीन यात्रा के समय वहां तमाम लोगों को एक ही नीले रंग की पोशाक में देखने के आंखों को चुभने वाले अनुभव का जिक्र किया है।

यहां हमारा संकेत सिर्फ इस बात की ओर है कि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के गांधीवादी नेतृत्व के बारे में मार्क्सवादी विचारधारा में भी इसके चरम क्षुद्र ओर हास्यास्पद रूप में प्रकट होने की सारी संभावनाएं निश्चित तौर पर मौजूद थी। भारत की अलग-अलग मार्क्सवादी धाराओं ने लोहियावाद की तरह आजादी के बाद भी कभी अंध-कांग्रेस-विरोध की तरह की अंधता का भले ही परिचय न दिया हो, लेकिन उसके अंदर की अनेक ‘सामान्य’ (standard) धारणाओं में, ऐसे ही किसी क्षुद्र और विध्वंसक अंत की संभावनाएं न रही हो या आज भी नहीं है, यह नहीं माना जा सकता है।

अगर ऐसा न होता, तो इधर के ताजा उदाहरण ही लिये जाए, कभी भी ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव को ऐसी दलीलों से नहीं ठुकराया जाता कि उससे एक सर्वहारा की पार्टी पूंजीवादी दलों के हाथ का कठपुतला बन कर रह जायेगी। और, न ही कभी यूपीए-1 सरकार से इसलिये समर्थन वापस लिया गया होता कि अमेरिका के साथ परमाणविक संधि से भारत पर ऐसा अमेरिकी वर्चस्व कायम हो जायेगा कि आगे वामपंथी आंदोलन के लिये कोई संभावना ही शेष नहीं रह जायेगी। पार्टी के ‘सर्वहारा चरित्र’ की शुद्धता की रक्षा की और समाज को ‘अमेरिकी प्रभाव’ से बचाने की बातें विचारधारा की शुद्धता के रूपायन की ही ऐसी छुद्र और आत्म-विध्वंसक परिणतियां हैं जिनकी हमने ऊपर चर्चा की है। सामान्य (standard) समझा जाने वाला विचारधारा का शुद्ध रूप, जिसे जब भी कोई ठोस आकार देने की कोशिश होती है, वह अपने पूरी तरह से विरूपित और विध्वस्त रूप में प्रकट होता है।

बहरहाल, यहां असल मसला भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बारे में कम्युनिस्ट पार्टी के मूल्यांकन का है जिसके साथ प्रो. बिपन चन्द्रा एक मार्क्सवादी के नाते सारी जिंदगी किसी न किसी प्रकार से जूझते रहे थे। यह भारत के पूंजीपतियों के नेतृत्व में लड़ा गया भारत की आजादी का संघर्ष था, कम्युनिस्टों के बीच की इस ‘सामान्य’ बात के विपरीत, प्रो. बिपन चंद्रा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को रूस और चीन की समाजवादी क्रांतियों से कम अन्तरराष्ट्रीय महत्व की घटना और यहां के राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व को रूस और चीन के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों से कम क्रांतिकारी नहीं मानते थे। इसीलिये उन्होंने संघर्ष-समझौता-संघर्ष के सूत्र से गांधीवादी नेतृत्व के संघर्ष की रणनीति को एक ऐसी क्रांतिकारी रणनीति के रूप में रखा जिसमें समझौतों के धागे से संघर्ष की कडि़यों को पिरोया जाता था। वह नेतृत्व वास्तव अर्थ मंा कभी भी संघर्ष के पथ से अलग नहीं हुआ था और इसीलिये अंत में देश को स्वतंत्र कराने में सफल भी हुआ।

इरफान साहब का इशारा है कि यह कोई पूर्व-नियोजित रणनीति नहीं थी। यहां हम सिर्फ यही कहेंगे कि क्रांति की तो अवधारणा ही कुछ भी पूर्व-नियोजित न होने की चमत्कारपूर्ण सचाई में निहित होती है !

जो भी हो, प्रो. बिपन चन्द्रा और उनके सहयोगियों ने अपनी महत्वपूर्ण किताब ‘India’s Struggle for Independence’ में एक पूरा अध्याय इस विषय पर शामिल किया है - भारतीय पूंजीपति और राष्ट्रीय आंदोलन (Indian Capitalists and the national movement) । वे तमाम तथ्यों के साथ यह बताते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति का लक्ष्य पूंजीपतियों का हित-साधन नहीं था, यह बात दीगर है कि अनेक बार भारत के पूंजीपतियों के हितों और उनकी मानसिकता से राष्ट्रीय आंदोलन के नेतृत्व के निर्णयों का मेल बैठ जाता था। प्रो. बिपन चन्द्रा और उनके सहयोगियों ने हमारे सामने इस प्रकार के साझा हितों की सचाई के इतिहास की एक संगतिपूर्ण गाथा पेश की है। तथ्यों की आधी-अधूरी जानकारी पर कैसे इतिहास के मनगढ़ंत किस्से और उनके आधार पर कथित तौर पर एक अलग विचारधारा का महल तैयार किया जाता है, बिपन चंद्रा और उनके साथियों ने इसके भी कई उदाहरण पेश किये हैं।

मसलन्, कांग्रेस के संस्थापक ए. ओ. ह्यूम और उनके हाथ लगी गृह विभाग की सात खंडों वाली गोपनीय रिपोर्टों की कहानी। कहा जाता था कि इन गोपनीय फाइलों से देश के कोने-कोने में जमा हो रहे गहरे जन-आक्रोश की सचाई को जानकर ही ह्यूम ने कांग्रेस के गठन का निर्णय लिया था ताकि वह इस जन-आक्रोश के लिये एक सेफ्टी वाल्व की तरह काम कर सके। कांग्रेस के गठन को महज एक सेफ्टी वाल्व मान कर इस पर न जाने कितनी क्रांतिकारी विचारधाराओं के महल तैयार किये गये हैं, कांग्रेस और उसके गांधीवादी नेतृत्व की भी ऐतिहासिक भूमिका को समझने से इंकार किया गया है !

बिपन चंद्रा और उनके साथियों ने इन गोपनीय रिपोर्टों के सात खंडों के रहस्य पर से पर्दा उठाया और गहरे शोध के आधार पर बताया कि जिन फाइलों की तलाश में सन् ‘50 के दशक तक ढेर सारे इतिहासकार जुटे हुए थे, उनका वास्तव में कभी कोई अस्तित्व ही नहीं था। लाला लाजपत राय ने विलियम वेड्डरबर्न की किताब ‘ऐलेन ओक्टावियन ह्यूम’ में से ह्यूम के एक ज्ञापन का लंबा उद्धरण देते हुए यह लिखा था कि ह्यूम ‘‘स्वतंत्रता प्रेमी थे और ब्रिटिश राज के तहत भारत की राजनीतिक आजादी चाहते थे’’, इसके बावजूद, सर्वोपरि वे ‘‘ एक अंग्रेज देशभक्त थे।’’ जब उन्होंने जान लिया कि ब्रिटिश शासन पर खतरा है, उन्होंने असंतोष के लिये एक सेफ्टी वाल्व तैयार करने का निर्णय लिया। लाला जी के इस उद्धरण को बाद में तमाम लोग बिना आगे-पीछे देखे दोहराते रहें। रजनी पाम दत्त ने तो उसमें अपने मन से और जोड़ दिया कि ‘‘अपनी सरकारी हैसियत की बदौलत ह्यूम की इन भारी-भरकम पुलिस रिपोर्टों तक पहुंच थी।’’

और, कहना न होगा, इसप्रकार, जन्म से ही कांग्रेस पर समझौता-परस्ती का लेबल लगा कर राष्ट्रीय नेतृत्व को गैर-क्रांतिकारी या क्रांति-विरोधी बताने का एक रिवाज चल पड़ा। रजनी पाम दत्त ने बाद में अपनी भूल को समझा था, लेकिन तब तक इस चलन ने एक प्रकार के ‘विश्वास’ का रूप लेना शुरू कर दिया था।

बिपन चंद्र और उनके साथियों ने वेड्डरबर्न के हवाले की पूरी जांच करके यह बताया कि वेड्डरबर्न जिन कागजातों का जिक्र कर रहे थे, वे कोई सरकारी फाइलें नहीं बल्कि किसी ‘त्रिकालदर्शी’ गुरू द्वारा ह्यूम को दिखाए गये उसके हजारों चेलों की गुप्त रिपोर्टों के सात खंड थे। यह भी बताया कि ह्यूम इस मामले में थोड़े अंधविश्वासी भी थे। (देखें, वही, ISI, पृष्ठ - 63-69)

और जहां तक आजादी के बाद के कांग्रेस शासन और उसके अंतर्गत तैयार हुए भारतीय पूंजीवाद के अनुभव के आधार पर राष्ट्रीय नेतृत्व के वर्गीय चरित्र के मूल्यांकन का सवाल है, आज तो यह बात और भी निरर्थक प्रतीत होती है। इस बिनाह पर तो अभी के एकध्रुवीय विश्व में चीन, वियतनाम और एक हद तक क्यूबा के कम्युनिस्ट नेतृत्व के वर्गीय चरित्र का मूल्यांकन भी राष्ट्रीय कांग्रेस के वर्गीय चरित्र से भिन्न नहीं होगा। और, जहां तक साम्राज्यवाद-विरोध का सवाल है, आज दुनिया को बहु-ध्रुवीय बनाने की कोई भी कोशिश सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों और कथित समाजवादी देशों की बदौलत नहीं हो रही है। यहां तक कि हमारे यहां धर्म-निरपेक्षता की लड़ाई भी सिर्फ वामपंथियों और उसके यदा-कदा सामने आने वाले ‘तीसरे मोर्चे’ के वश में नहीं है। इस लड़ाई की आज भी सबसे प्रमुख शक्ति कांग्रेस ही है।

पिछली 28 मार्च 2016 को जेएनयू में हम जब बिपन चंद्रा की याद में मनाये जा रहे ‘जश्ने आजादी’ कार्यक्रम में प्रो. इरफान हबीब और अन्य वक्ताओं को सुन रहे थे, तभी ये सारे प्रसंग रह-रह कर हमारे जेहन में उठ रहे थे। अपनी फेसबुक वाल पर उसी दिन हमने लिखा - ‘‘आज जेएनयू के कन्वेंशन सेंटर पर प्रो. बिपन चन्द्रा की स्मृति में आयोजित 'जश्ने आजादी' कार्यक्रम में प्रो. इरफ़ान हबीब को सुनने का मौका मिला । उनके अलावा आदित्य मुखर्जी, मृदुला मुखर्जी और प्रभात पटनायक को भी सुना । इरफ़ान साहब भारत के राष्ट्रीय आंदोलन और उसके नेतृत्व के बारे में वामपंथियों के नज़रिये के प्रति बिपन चंद्रा से अपनी सहमति और किंचित विषयों पर मामूली असहमतियों का निस्पृह भाव के साथ ब्यौरा पेश कर रहे थे । इसमें जो सबसे उल्लेखनीय बात उभर कर सामने आई वह यह कि बिपन चंद्रा भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को किसी  भी  मायने  में  रूस और चीन की समाजवादी क्रांतियों से कम अन्तरराष्ट्रीय महत्व की घटना नहीं मानते थे । वे महात्मा गांधी और नेहरू की तरह के राष्ट्रीय नेताओं की रणनीति और कार्यनीति को अधिक संजीदगी से समझने की ज़रूरत बल देते थे । इसे सिर्फ बुर्जुआ का नेतृत्व कह कर निपटाया नहीं जा सकता है । प्रो. मृदुला मुखर्जी ने आजादी की लड़ाई के मौखिक इतिहास के संदर्भ में देश के कोने-कोने से इकट्ठा किये गये उन लोगों के साक्ष्य का उल्लेख किया जिन्होंने बिना किसी बात की परवाह किये आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था । इन साक्ष्यों से भी संघर्ष-समझौता-संघर्ष की श्रृंखलाओं से निर्मित उस पूरी लड़ाई की जो तस्वीर बनती है उसे कोरे स्वार्थ के किसी सिद्धांत से परिभाषित नहीं किया जा सकता है ।“

इसके दूसरे दिन हमने और एक पोस्ट लिखी - ‘बिपन चन्द्रा और इरफ़ान साहब’ ।

“जेएनयू में 'जश्ने-आजादी' कार्यक्रम में इरफ़ान साहब के भाषण का मैंने कल ही अपनी वाल पर उल्लेख किया था । वे आजादी की लड़ाई के बारे में बिपन चन्द्रा के विचारों का पूरी तरह से समर्थन करते हुए भी कुछ नुक़्तों पर अपनी असहमतियों को दर्ज तो करा रहे थे, लेकिन उन पर ऐसा कोई ज़ोर नहीं दे रहे थे कि जिनसे समझा जाए कि वे अपनी कुछ अलग बात कहना चाहते थे । इसीलिये हमने इरफ़ान साहब के पूरे भाव के साथ निस्पृहता का विशेषण जोड़ा था । सवाल है कि वह कौन सा बिंदु था, जिस पर इरफ़ान साहब बिपन चन्द्रा से असहमत होते हुए भी जैसे असहमत नहीं थे ? यह बिंदु था आजादी की लड़ाई के नेतृत्व के वर्ग चरित्र के मूल्याँकन से जुड़ा बिंदु । इरफ़ान साहब के अनुसार बिपन चन्द्रा उसकी चर्चा में जिस प्रकार कथित 'स्तालिनवादी' सोच का जिक्र करते थे, वे उसे उस प्रकार मान नहीं पाते हैं ।
“यह सच है कि 'स्तालिनवाद' क्या चीज़ है, इसे समझना कठिन है । इसीलिये इरफ़ान साहब की हिचकिचाहट को हम समझ पाते हैं । लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि सन् '50 के काल तक, जब तक सोवियत संघ और चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच के मतभेद खुल कर सामने नहीं आए थे, सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने को कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की सेना की एक अविभाज्य टुकड़ी ही मानती थीं । इंटरनेशनल के बाहर किसी कम्युनिस्ट पार्टी को कोई स्वीकृति नहीं थी । उसके बाहर की किसी भी समाजवाद पर आस्थावान पार्टी का कम्युनिस्ट जगत के लिये कोई अस्तित्व नहीं था । वे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की नेतृत्वकारी पार्टियाँ हो सकती थी, नहीं भी हो सकती थी, लेकिन ग़ैर-कम्युनिस्ट पार्टियां, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से निर्देशित न होने के नाते क्रांतिकारी नहीं कहला सकती थी । इस श्रेणी में हमारे देश की कांग्रेस और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ही नहीं, भगत सिंह की नौजवान भारत सभा आदि भी आ जाती थी - किसी न किसी रूप में बुर्जुआ के हितों से जुड़ी हुई पार्टियाँ !
“लेनिन की मृत्यु रूसी क्रांति के छ: साल बाद ही सन् 1924 के प्रारंभ में हो गई थी । उसके बाद लगभग तीन दशकों तक, 1953 में स्तालिन की मृत्यु तक सोवियत संघ और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल पर स्तालिन के नेतृत्व का लगभग निर्विवाद वर्चस्व बना हुआ था । ऐसे में सन् '50 तक के आजादी की लड़ाई के बारे में कम्युनिस्टों के विश्लेषणों में अगर कोई स्तालिन की उपस्थिति को देखता है तो क्या उससे पूरी तरह से इंकार किया जा सकता है ? कम्युनिस्ट पार्टियों को आज भी अपने उन प्रारंभिक तीन दशकों की कुछ भ्रांतियों और इंटरनेशनल-प्रदत्त सांगठनिक ढाँचे की कमज़ोरियों के अवशेषों से अंतिम लड़ाई लड़ना बाक़ी है । इरफ़ान साहब की हकलाहट में हमें इसी सचाई की ध्वनियाँ सुनाई दे रही थी ।“

आज की दुनिया की परिस्थिति, भारत की सचाई और इसमें वामपंथी आंदोलन का हाल - इस पूरे परिप्रेक्ष्य में बिपनचंद्रा से होते हुए इरफान हबीब में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में एक नये प्रकार के अवबोध के संकेतों ने अनायास ही हमारे सामने एक समझ के ढहते हुए इतिहास के बीच से एक नई समझ के बनते हुए नये इतिहास की घटना की जैसे एक झलक उपस्थित कर दी।

राष्ट्रीय कांग्रेस की विफलताओं ने धुर दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक फासीवादी आरएसएस को केंद्र की सत्ता पर ला दिया है; कांग्रेस की विफलताओं से वामपंथ की जमीन तैयार नहीं हुई, बल्कि और भी ज्यादा संकुचित हो गई है। लगता है जैसे यह वामपंथ की जितनी अपनी विफलता है, उतनी ही आजादी की लड़ाई की उस विरासत की भी विफलता है जिसे किसी न किसी रूप में कांग्रेस के साथ ही भारतीय वामपंथ भी साझा करता रहा है। एक साझा विरासत की रक्षा करने और उसे आगे ले जाने वाली शक्तियों की कतार की कमजोरियों और उसमें पड़ी दरार ने ही सांप्रदायिक फासीवाद के लिये जमीन तैयार की है। बिपन चंद्र का राष्ट्रीय आंदोलन के बारे में सोच, और उससे मतभेद रखने वाले इरफान हबीब की आज की हकलाहट निश्चित तौर पर जैसे एक नये प्रकार के रसायन, एक नई सचाई के उदय की संभावना के संकेत दे रहे थे।

इसी जेएनयू में पिछले दिनों कन्हैया कुमार के जेल से आने के ठीक बाद दिये गये भाषण पर हमने अपने ब्लाग ‘चतुर्दिक’ में कुछ इसीप्रकार की एक टिप्पणी की थी - ‘‘जेएनयू के संघर्ष के जरिये भारत में एक नये जनतांत्रिक वामपंथ का बीजारोपण हुआ’’।

 
जीवन में जिसे हम घटना कहते हैं, वह अक्सर किसी चमत्कार की तरह ही, अचानक कुछ इस प्रकार प्रकट होती है, जिसका कोई एक कारण नहीं होता और न ही जिसका आसानी से कोई पूर्वानुमान किया जा सकता है। स्लावोय जिजेक लिखते हैं, ‘‘एक घटना में उसकी परिभाषा के अनुसार ही कुछ ‘चमत्कार’ होता है, हमारे दैनन्दिन जीवन से लेकर बिल्कुल सूक्ष्म चिंतन के स्तर तक में होने वाला चमत्कार, जिसमें ईश्वर से जुड़े विषय भी शामिल हैं। ईसाइयत की घटनामूलक प्रकृति इस तथ्य से पैदा होती है कि ईसाई होने के नाते आपको ईसामसीह की मृत्यु और उनके पुनर्जन्म की एक अकेली घटना पर विश्वास करना होगा। संभवत: विश्वास और विवेक के बीच का यह घुमावदार संबंध कहीं ज्यादा तात्विक है : हम यह नहीं कह सकते कि हम ईसामसीह पर आस्था रखते हैं, क्योंकि तर्क के जरिये हमने इस आस्था को अर्जित किया है। यही घुमावदार संबंध प्रेम पर लागू होता है : हम किसी खास कारण से (उसके होठ, उसकी मुस्कान ...के कारण से) किसी से प्रेम नहीं करते - हम चूंकि उससे पहले से प्रेम करते हैं, इसीलिये उसके होठ आदि हमें आकर्षित करते हैं। इसी कारण से प्रेम भी घटनामूलक होता है। यह एक प्रकार के घुमावदार ढांचे का रूप है जिसमें घटनामूलक प्रभाव पीछे घूम कर उसके कारणों अथवा तर्कों की खोज करता है। यही बात काहिरा में तहरीर स्क्वायर पर लंबे समय तक चले प्रतिवाद की तरह की राजनीतिक घटना पर भी लागू होती है, जिसमें मुबारक के शासन का अंत होगया : कोई भी आसानी से इस प्रतिवाद को मिस्र के समाज में चले आ रहे खास गतिरोधों ( भविष्यहीन बेरोजगार शिक्षित नौजवान, आदि) के जरिये व्याख्यायित कर सकता है, लेकिन, उनमें से किसी भी एक कारण को उस जबर्दस्त यौगिक शक्ति का वास्तविक कारण नहीं बताया जा सकता है, जिससे ऐसा घटित हुआ ।’’
[There is, by definition, something ‘miraculous’ in an event, from the miracles of our daily lives to those of the most sublime spheres, including that of the divine. The evental nature of Christianity arises from the fact that to be a Christian requires a belief in a singular event - the death and resurrection of Christ. Perhaps even more fundamental is the circular relationship between belief and its reasons : I can not say that I believe in Christ because I was convinced by the reasons for belief; it is only when I believe that I can understand the reasons for belief. The same circular relation holds for love: I do not fall in love for precise reasons (her lips, her smile…) - it is because I already love her that her lips, etc. attract me. This is why love, too, is evental. It is a manifestation of circular structure in which the evental effect retroactively determine its causes or reasons. And the same holds for a political event like the prolonged protests on Tahrir Squarein Cairo which toppled the Mubarak : one can easily explain the protests as the result of specific deadlocks in Egyptian society (unemployed, educated youth with no clear prospects, etc.), but, somehow, none of them can really account for the synergetic energy that gave birth to what went on.] (Slavoj Zizek, Event : Philosophy in Transit, Penguin Books, paperback, 2014, page - 2-3)

आज जब हम इन सब बातों को, आजादी की लड़ाई, कांग्रेस, वामपंथ, दोनों के परस्पर-संबंध, सांप्रदायिक फासीवाद और कांग्रेस और वामपंथ की साझा विरासत से जुड़ी इन सारी बातों को, एक जगह इकट्ठा कर रहे हैं और भविष्य के लिये जन-संघर्ष के किसी नये यौगिक विकल्प की शक्ति के उदय की कल्पना कर रहे हैं, तब इसी समय पश्चिम बंगाल में अपने प्रकार का एक अनोखा चुनाव चल रहा है। 34 सालों के वाममोर्चा के शासन के अंत और तृणमूल कांग्रेस के पांच साल के शासन में वामपंथियों तथा कांग्रेस सहित राज्य में पूरे विपक्ष की लगातार दुर्गति की पृष्ठभूमि में वहां विपक्ष के दलों का एक ऐसा मोर्चा तैयार हुआ है, जिसकी पहले कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मुख्यत: वाममोर्चा और कांग्रेस के इस यौगिक गठबंधन से वहां जमीनी स्तर पर किस प्रकार की एक अनोखी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हुई है, उसे जानने के लिये पिछले दो दिनों (10 और 11 अप्रैल 2016) के ‘टेलिग्राफ’ में प्रकाशित इन दो रिपोर्टों को देखना ही हमारे लिये काफी होगा।



10 अप्रैल की रिपोर्ट देवदीप पुरोहित और अर्नब गांगुली की है, जिसका शीर्षक है - Doctor Gulps Doctor’s Pill । (डाक्टर ने डाक्टर की दवा खाई)। ये बंगाल की राजनीति के दो डाक्टरों के बारे में हैं - डा. सूर्यकांत मिश्र (सचिव, माकपा, पश्चिम बंगाल) और डा. मानस भुइयां ( पूर्व अध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस)। दोनों एक ही जिले, पश्चिमी मेदिनीपुर से चुनाव लड़ते रहे हैं और इस बार भी लड़ रहे हैं।
इस रिपोर्ट की शुरूआत इस प्रकार होती है - ‘‘पुराने कांग्रेसी नेता मानस भुइयां ने सीपीएम के राज्य सचिव सूर्यकांत मिश्र का हाथ पकड़ कर ऊंचा उठा कर फोटो खिंचवाया, एक ऐसा फोटो जिसमें विधानसभा के चुनाव प्रचार का एक निर्णायक क्षण बन जाने की शक्ति निहित है।’’

इसीमें आगे कहा गया है कि सबंग केंद्र से लगातार छ: बार चुनाव जीत रहे मानस भुइयां सीपीएम के बहुत ज्यादा खिलाफ रहे हैं और गठजोड़ संबंधी चर्चा में वाम, कांग्रेस के हाथ मिलाने का उन्होंने जोरदार विरोध किया था। इसीप्रकार मिश्रा के बारे में इसमें बताया गया है कि कैसे सीपीएम के अंदर भारी विरोध के बावजूद नारायणगढ़ के इस विधायक ने इस गठजोड़ को संभव बनाया।
‘‘आप देखिये, यह बक्श कांग्रेस का आदमी है, लेकिन ‘लाल सलाम’ बोल रहा है। इसीप्रकार, सीपीएम का नेता चन्दन पात्रा ‘वंदेमातरम्’ कह रहा है। कामरेड का मतलब होता है एक मित्र, एक सहयोगी’’, भुइयां ने कहा। ...
‘‘राजनीति समाज के लिये, जनता के लिये, देश के लिये है। 1952 के बाद जनता के हित में संविधान को 127 बार बदला गया है। राजनीतिक पार्टियों ने भी जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिये अपने मत को बदला है,’’ भुइयां ने 5000 लोगों की जनसभा में कहा।’’
दूसरी ओर, नारायणगढ़ में हाल की एक सभा में मिश्रा ने भी ‘जनता की मर्जी’ पर बल दिया। ‘‘हम राजनीति में जनता के लिये हैं। हमें वह करना होगा, जो जनता चाहती है,’’ उन्होंने कहा।
नारायणगढ़ की एक सभा के शुरू होने के समय के कुछ पहले ही सूर्यकांत मिश्र सभा-स्थल पर पहुंच गये थे। बाद में लोगों के आने पर उन्होंने कहा, ‘‘ मैं थोड़ा जल्दी आगया और आप लोगों की प्रतीक्षा कर रहा था। जनता के बिना हम राजनीतिज्ञों का कोई अस्तित्व नहीं है। हमने कांग्रेस से हाथ मिलाया है क्योंकि आप चाहते थे।’’
इस रिपोर्ट का अंत इसप्रकार किया गया है, ‘‘ एक स्थानीय सीपीएम नेता की ओर इशारा करते हुए, जो पहले अकेले लड़ने के पक्ष में था, भुइयां ने कहा: ’’उस आदमी को देखों, वह पक्का सीपीएम का है। वह यहां हमारी सभाओं का कार्यक्रम तैयार कर रहा है। मैं आज का काम खत्म कर देना चाहता था, क्योंकि लगभग 18-20 किलोमिटर घूम चुका हूं। लेकिन वह नहीं छोड़ेगा क्योंकि लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसा अनुशासन मेरे लिए वरदान है।’’

दूसरी रिपोर्ट है 11 अप्रैल के ‘टेलिग्राफ’ में अनिंद्य सेनगुप्त की - Burdwan CPM joins alliance stride । इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दो महीना पहले तक जिस वर्दवान की सीपीएम की मजबूत इकाई ने कांग्रेस के साथ गठबंधन का पार्टी में विरोध किया था और जो कल तक कांग्रेसजनों के साथ अपने को देखे जाने से परहेज करते थे, वे ही अभी अपनी सभाओं में कांग्रेस के लोगों को शामिल होने के लिये उत्साहित कर रहे हैं।

‘‘सीपीएम की लोकल कमेटी के सदस्यों को कांग्रेस की ब्लाक कमेटियों से, खास तौर पर रानीगंज, कुलटी और बारबनी में, समन्वय करके औद्योगिक इलाकों में सभाएं करने के लिए कहा गया है।’’
‘‘वर्दवान के कांग्रेस अध्यक्ष आभास भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘सीपीएम हमारे साथ गठजोड़ को आगे ले जाने के लिये जिस प्रकार लगी हुई है वह आश्चर्यजनक है। वे हमें सभा-स्थलों के बारे में जानकारी देते रहते हैं। इन सभाओं में वे कांग्रेस के कितने लोगों के आने की उम्मीद करते हैं, इसके बारे में कहते रहते हैं। हमें किन इलाकों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, इसके बारे में भी बताते रहते हैं।’’

6 अप्रैल को वर्दवान शहर में सूर्यकांत मिश्र की एक सभा में बहुत से वामपंथी कार्यकर्ता कांग्रेस का झंडा लिए हुए थे। ‘‘सीपीएम के एक कार्यकर्ता ने कहा,‘‘हमारे नेताओं ने हमें सूर्यबाबू की सभा के लिये कांग्रेस के 100 झंडें खरीदने के लिये कहा हैं। उस सभा में लगभग 7000 लोग उपस्थित थे। अच्छी संख्या में कांग्रेस के कार्यकर्ता आए थे। उनमें से बहुतों ने हमसे कांग्रेस के झंडें लिये।’’
इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चुनाव में आपसी लड़ाई से बचने के लिये दुर्गापुर पश्चिम से सीपीएम के उम्मीदवार ने जानबूझ कर अपना नामांकन पत्र तब दाखिल किया जब उसके दाखिल करने की समय-सीमा खत्म हो गयी थी, ताकि उसका नामांकन पत्र खारिज हो जाए। और इसप्रकार, तृणमूल तथा कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर को सुनिश्चित किया गया।
‘‘सीपीएम के जिला सचिव अचिंत मल्लिक ने कहा : ‘‘वर्दवान के हर कोने में हमारा गठजोड़ बन चुका है और कांग्रेस की उससे पूरी सम्मति है। अगर चुनाव के दिन चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी रहती है, तो गठजोड़ की जीत को कोई नहीं रोक सकता है। ’’

इन दो रिपोर्टों से राज्य के दो जिलों की जमीनी सचाई के चित्र निकल कर आए हैं। यही कहानियां अभी पूरे राज्य में हर जगह लिखी जा रही है। कोई सूक्ष्म वैचारिक कार्यनीति या रणनीति नहीं, ‘भगवत-इच्छा’ की तरह ‘जनता की मर्जी’ का जाप चल रहा है। और इस जाप के साथ चल रहे कर्मयज्ञ के बीच से राजनीतिक शक्तियों का जो नया योग तैयार हुआ है, उसमें इसी बीच एक प्रकार की ऐसी चमत्कारी शक्ति के दर्शन होने लगे हैं, जो संभवत: भारतीय राजनीति की खुद में एक नई घटना का रूप लेने वाली है।

जहां तक इसके सैद्धांतिक पक्षों का सवाल है, यह खास-खास परिस्थिति में संयुक्त मोर्चा की एक सुविचारित, आजमाई हुई रणनीति के मानिंद नजर आती है, और इसीलिये किसी को इसमें आश्चर्यचकित होने जैसी कोई बात नहीं भी दिखाई दे सकती है। लेकिन पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथ के बीच के संबंधों का जो इतिहास रहा है, (पिछले विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस तृणमूल की सहयोगी पार्टी रही है) उसे देखते हुए इन दोनों दलों का एक समंजित गठजोड़ के रूप में चुनाव में उतर पाना बहुतों को असंभव जान पड़ता था। सीपीएम के सर्वोच्च नेतृत्व तक का एक हिस्सा भी संभवत: आज तक इसे स्वीकार नहीं पा रहा है। उसको इसमें बची-खुची पार्टी के भी अंत की आशंका दिखाई देती है।

इस पूरे प्रसंग में ‘जनता की मर्जी’ वस्तुत: आस्था का एक नया बिंदु है जिसे पूरी तरह से किसी सैद्धांतिक तर्क प्रणाली से अर्जित किया गया है, यह नहीं कहा जा सकता है। इसमें विश्वास और विवेक के बीच वही घुमावदार संबंध काम कर रहा है जिसकी हम पहले, जिजेक के हवाले से, ईसाई धर्म, प्रेम और तहरीर स्क्वायर के प्रतिवाद के संदर्भ में चर्चा कर चुके हैं। यह एक घुमावदार ढांचा है जिसमें चमत्कारी घटनामूलक परिणाम पीछे घूम कर उसके कारणों और तर्कों की खोज किया करता है। इसके एक नहीं, अनेक संशलिष्ट कारण होते हैं।

और, हम कहना चाहेंगे कि आस्था का यह नया बिंदु आज के जनतांत्रिक युग की आस्था का बिंदु है, पार्टी की नहीं, जनता की इच्छा के प्रति आस्था का बिंदु, जिसने कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस दोनों के एक ऐसे नये योग को संभव बनाया है जिसमें किसी चमत्कार की तरह की यौगिक शक्ति की संभावना दिखाई दे रही है। पश्चिम बंगाल की परिघटना के इस नये योग के सच को  किसी सरलीकृत समझ से कभी नहीं समझा जा सकता है । जैसे विज्ञान का एक प्रमुख सूत्र है कि किसी भी वस्तु के गुण-धर्म से उसके संघटक तत्वों के गुण धर्म को नहीं पहचाना जा सकता है, वैसे ही संघटक तत्वों के गुणधर्म से वस्तु की भी पहचान नहीं की जा सकती है ।

सीपीएम और कांग्रेस दोनों की ही पश्चिम बंगाल में अलग-अलग न कोई साख बची है और न ही कोई शक्ति । लेकिन इन दोनों के योग से बन रहे ‘जन मोर्चे’ का विकल्प ऐसा है जिसकी अपनी खुद की भारी साख और शक्ति पैदा हो गयी है और जो किसी बवंडर का रूप ले लेने की संभावनाओं का संकेत दे रहा है । इसके बारे में सीपीएम और कांग्रेस की स्वतंत्र स्थिति के आधार पर कोई सही राय नहीं बनाई जा सकती है ।

आज वामपंथ केरल में कांग्रेस के खिलाफ लड़ रहा है । वह शुद्ध रूप से एक राजनीतिक व्यावहारिकता का मसला है । वहाँ पक्ष और प्रतिपक्ष में इन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं है । इसलिये इसके कोई अन्य सैद्धांतिक आयाम नहीं है । यह संसदीय जनतंत्र का अपना, प्रतिद्वंद्वितामूलकता का तर्क है । यहीं पर राजनीति मात्र की तात्विकता का भी एक पहलू सामने आता है। राजनीति का अर्थ कभी भी सिद्धांत बघारना नहीं होता है । यह एक व्यवहारिक कार्रवाई होती है जिसके ज़रिये जीवन की सचाई अपने को जाहिर करती है । विचार और व्यवहार में यह एक बुनियादी फर्क है। किसी भी नये चरण में प्रवेश करते वक्त विचार व्यवहार का पदानुसरण करते हैं, न कि व्यवहार विचार का।  जब सिद्धांत-चर्चा जीवन के यथार्थ से मेल नहीं खाती तो उसका राजनीति के लिये दो कौड़ी का दाम नहीं रह जाता - न तात्कालिक लिहाज़ से और न दूरगामी दृष्टि से । राजनीतिक दर्शन भी कोरी कल्पना को अपना अवलंब नहीं बना सकता है । वह भी हमेशा अपने समय के मुख्य अंतर्विरोधों पर ध्यान केंद्रित करने पर बल देता है ।

जिस वक़्त जनतंत्र  और खुद आपका भी अस्तित्व मात्र ख़तरे में हो, तब इनकी रक्षा भर करने के लिये व्यापकतम संयुक्त मोर्चा बनाने और उसकी सफलता को सुनिश्चित करने से अधिक सिद्धांतनिष्ठ दूसरा कोई फ़ैसला नहीं हो सकता है । ऐसा न करना कथित सिद्धांतवादिता की ओट में राजनीति के मूलभूत सिद्धांतों की ही तिलांजलि देना कहलाता है। फिर भले वह आस्था और विश्वास के किसी बिंदु से लिया गया निर्णय हो या किसी राजनीतिक विचारधारा की अपनी तर्क-परंपरा के अंदर से - इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

वैसे, हमें तो यही लगता है कि पश्चिम बंगाल में न सिर्फ वामपंथी, बल्कि पूरी भारतीय राजनीति के एक ऐसे नये अध्याय का सूत्रपात हो रहा है, जो वामपंथ को उसकी अपनी अनेक पुरानी ग्रंथियों से मुक्ति का कारक बनेगा और स्वतंत्रता आंदोलन की मूलभूमि पर आगे की राजनीति का नया महल तैयार करेगा । इसीलिये बिपन चन्द्रा को केंद्र में रख कर हो रहे आधुनिक भारत के विमर्श की चर्चा के बीच हमें सीधे तौर पर आज पश्चिम बंगाल की राजनीति की नई परिघटना का तर्क और विवेक दिखाई देता है जो परवर्ती दिनों के घटनाक्रम को एक सैद्धांतिक ढंाचा प्रदान करेगा। इसीलिये लगता है जैसे उपरोक्त पूरा इतिहास-विमर्श और राजनीति का यह नया पश्चिम बंगाल अध्याय अपने अंदर भारत में एक नये जनतांत्रिक वामपंथ और जनोन्मुखी कांग्रेस दल के गठजोड़ की चमत्कारी शक्ति की संभावनाओं को छिपाये हुए हैं। इसी में संभवत: भारत का भविष्य है।









शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

इंद्रनाथ बंदोपाध्याय नहीं रहे



इंद्रनाथ बंदोपाध्याय नहीं रहे। 21 मार्च 2016 की बात है। तब हम इलाहाबाद और दिल्ली की यात्रा पर थे। खबर मिलने का कोई जरिया नहीं था। दो दिन बाद, फेसबुक पर मित्र ओम पारीक ने अपनी वाल पर उनकी मृत्यु की खबर लगाई थी। हमने तत्काल उनसे कुछ और विस्तृत जानकारी लेने की कोशिश की। फिर ‘गणशक्ति’ के वेबसाइट से इसकी पक्की जानकारी मिली। अच्छे-भले इन्द्रो दा को एक दिन पहले ही शाम को दिल का दौरा पड़ा और दूसरे दिन सुबह अस्पताल में ही वे चल बसे।

इसी 17 मार्च को इलाहाबाद के लिये ट्रेन पकड़ने के एक दिन पहले ही हमारी उनसे फोन पर बात हुई थी। चंद रोज पहले उनके चित्रों की एक एकल प्रदर्शनी लगी थी। इस प्रदर्शनी के लिये वे हमारे घर से अपने उन चित्रों को भी ले गये थे जिन्हें हमने सालों पहले उनसे प्राप्त किया था। प्रदर्शनी के खत्म होने के बाद, 16 मार्च को उन्होंने एक नये फ्रेम में जड़ कर उन चित्रों को हमें लौटाया था।

बहरहाल, इन्द्रो दा को सिर्फ निजी प्रसंगों में याद करना किसी भी मायने में उचित नहीं है। वे, एक पूरे काल के शानदार सांस्कृतिक आंदोलन के प्रतीक, पूरी तरह से सार्वजनिक व्यक्तित्व थे। सन् ‘71 और ‘72 के बाद, पश्चिम बंगाल में सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व में एक भयानक अद्‍​र्ध-फासिस्ट शासन की स्थापना हुई थी। ‘72 से ‘77 तक के इस दमनकारी शासन के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध का जो आंदोलन तैयार हुआ था, इन्द्रो दा उसके एक केंद्रीय नेतृत्वकारी व्यक्ति थे। वामपंथी पार्टियों के दूसरे सांस्कृतिक जन-संगठन पहले से ही काम कर रहे थे। लेकिन अद्‍​र्ध-फासिस्ट शासन की उन खास परिस्थितियों ने जिस एक नये सांस्कृतिक संगठन को जन्म दिया, उसका नाम था ‘पश्चिमबंग गणतांत्रिक लेखक शिल्पी कलाकुशल संघ’- जनतंत्र की रक्षा के एकमात्र विषय पर केंद्रित पश्चिम बंगाल के संस्कृतिकर्मियों के एकजुट प्रतिरोध का व्यापक संगठन। और इस संगठन के सर्वप्रमुख व्यक्ति के रूप में पूरे पश्चिम बंगाल में जिस एक व्यक्ति की पहचान बनी थी, वे थे इन्द्रनाथ बंदोपाध्याय।

भले ही इस संगठन की नींव 1971 में ही डाल दी गयी थी। लेकिन 1975 में जब इंद्रनाथ बंदोपाध्याय ने महासचिव के रूप में इसकी कमान सम्हाली, तब से लेकर सन् 2014 तक, जब तक वे इस पद पर बने रहे, इन्द्रो दा और यह संगठन लगभग एक दूसरे के पर्याय के रूप में देखे जाते रहे। संगठन के नाम से जाहिर सांस्कृतिक जगत के बहुमुखी स्वरूप के अनुरूप ही इन्द्रो दा भी एक प्रभावशाली लेखक, चित्रकार, कलाकार, नाट्यकार, मंच सज्जाकार, स्तंभकार, गीतकार और संस्कृतिकर्मी के अलावा बेहद प्रभावशाली वक्ता के रूप में बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। और इसी वजह से इस क्षेत्र के हर कोने तक उनकी अपने व्यक्तित्व के बदौलत ही गहरी पैठ थी।

पश्चिम बंगाल के वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन की एक प्रमुख हस्ती के नाते इन्द्रो दा का देश भर के वामपंथी जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के साथ काफी निकट का संबंध था। सन् 1981 में जनवादी लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन से लेकर उसके कोलकाता राष्ट्रीय सम्मेलन तक, हर सम्मेलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी। इन सभी सम्मेलनों के प्रतिनिधि उनके अनुभव-सिद्ध प्रेरणादायी भाषणों से प्रभावित होते थे।
एक सुदर्शन व्यक्तित्व और अच्छे स्वास्थ्य के धनी इन्द्रो दा इस प्रकार अचानक ही चले जायेंगे, यह विश्वास करना आज भी कठिन लगता है। वैसे यह सच है कि पश्चिम बंगाल के सांस्कृतिक आंदोलन में अपने लिये उन्होंने जिस भूमिका को अपनाया था, और जिसपर वे पूरी निष्ठा से हमेशा लगे रहे, उनका वह मिशन पहले ही पूरा हो चुका था। सन् 2014 में जब उन्होंने गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ के महासचिव पद को छोड़ा, पश्चिम बंगाल में वामपंथी आंदोलन के उस दौर का पटाक्षेप हो चुका था, जिसमें उन्होंने एक खास भूमिका अदा की थी। उनके देहावसान से उस दौर के अवसान का एक प्रतीकात्मक संबंध भी जोड़ा जा सकता है।

इन्द्रो दा का न रहना हमारी निजी तौर पर एक भारी क्षति है। वे उन थोड़े से लोगों में एक थे, जिनसे हम मन खोल कर राजनीति और संस्कृति के दुनिया के नाना विषयों पर चर्चा किया करते थे, और हमारे सोच के तार भी अक्सर मिला करते थे। आज जब भारत का वामपंथी और जनतांत्रिक आंदोलन एक नई करवट लेने की तैयारी कर रहा है, ऐसे समय में इन्द्रो दा की तरह के निष्ठावान नेतृत्वकारी व्यक्तित्व की कमी हर किसी को खलेगी।
हम उनकी स्मृतियों को अपनी आंतरिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी पत्नी और बेटे के प्रति अपनी समवेदना प्रेषित करते हैं।

शनिवार, 26 मार्च 2016

आधुनिकता, लोकतंत्र और राष्ट्र का निर्माण : एक वामपंथी परिप्रेक्ष्य


अरुण माहेश्वरी ने यह लेख इसी 18 मार्च को इलाहाबाद में सुप्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार और संपादक मार्कण्डेय की पुण्य तिथि पर उनकी स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में पेश किया था। लेख की प्रस्तुति के पहले उन्होंने कहा कि – 

सबसे पहले तो मैं इस कार्यक्रम के आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने मार्कण्डेय जी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने का हमें मौका प्रदान किया। जब दुर्गा सिंह जी ने इस कार्यक्रम में शामिल होने का निवेदन किया था, तब बिना यह जाने कि इसमें चर्चा का विषय क्या होगा, मैंने तत्काल अपनी सहमति दे दी थी। क्योंकि मुझे लगा था कि हमारे लिये चर्चा के विषय से भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है इस कार्यक्रम में शामिल होना। 


दरअसल, यह हमारी कुछ व्यक्तिगत अनुभूति का मामला है, जिसे मैं आप सबके साथ भी साझा करना चाहूंगा। पिछले दिनों, बनारस की एक पत्रिका का चंद्रबली सिंह पर विशेषांक निकला था। संपादक महोदय ने मुझे उस अंक में लिखने को कहा। मैंने एक लेख लिखा - हमारे महासचिव चंद्रबली सिंह। अपने उस लेख की शुरूआत कुछ इस प्रकार की  - “चंद्रबलीजी पर लिखना है।कलमके संपादक-मंडल के एक वरिष्ठ सदस्य पर। वरिष्ठ तो हमारे लिये सभी थे। इतने वरिष्ठ कि आज उनमें से कोई भी साथ देने के लिये इस धरती पर नहीं है।सचमुच पीछे के इतने बड़े शून्य को देख कर बहुत बार घबड़ाहट होती है। दोस्ती मूर्ख से की जा सकती है, ज्ञानी से की जासकती है। एक-समान सोचने-समझने वाले से की जा सकती है, हमेशा मतभेद रखने वाले से भी की जासकती है। समवयस्कों के अलावा अपने से कम और बड़ी उम्र के लोगों से भी की जासकती है। पूरी मित्र-मंडली का इन्द्रधनुषी रूप हो सकता है। लेकिन ऐसी इकरंगी विलक्षणजनों की मित्र-मंडली जिसमें आपकी तुलना में सिर्फ उम्रदराज और वयोवृद्ध जनों का ही शुमार हो, एक समय कितनी त्रासद हो सकती है, आपको कितना अकेला और अनेक सम-वयस्कों के लिये लगभग असंप्रेष्य बना कर छोड़ सकती है, आज चंद्रबलीजी पर लिखते वक्त कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है। एक-एक कर अब तक अपने इन सभी वरिष्ठ मित्रों की श्रद्धांजलियां लिख चुका हूं। भैरवप्रसाद गुप्त, चन्द्रभूषण तिवारी, इसराइल, हरीश भादानी, मार्कण्डेय और अब चंद्रबलीजी पर लिखना पड़ रहा है।कलमके इस संपादक-मंडल के रथ का जो अविस्मरणीय सारथी था - कामरेड बी. टी. रणदिवे - उनको गुजरे भी 22 साल बीत गये हैं।

कहना होगा, यह हमारा सौभाग्य या दुर्भाग्य, कुछ भी क्यों रहा हो, बहुत कम उम्र में ही हमें सिर्फ और सिर्फ, अपने से उम्र में बहुत बड़े और परिपक्व मित्रों का ही साथ मिला। और इसीलिये, शुरू से साहित्य और विचारधारा के मसलों पर हमारे मानदंड कुछ इतने ऊंचे बनें कि समवयस्क लेखकों के साथ सही अर्थों में कोई संवाद ही कायम नहीं हो पाया। और, हमारे इन वयोवृद्ध मित्रों में मार्कण्डेय जी का स्थान तो और भी ज्यादा विशेष था। इसराइल साहब और हरीश भादानी हमारे परिवार के सदस्य थे, लेकिन मार्कण्डेय भाई तो बहुत कम, कभी-कभीकलमके संपादक-मंडल की बैठक के लिये कोलकाता आया करते थे। इसके बावजूद, यह सच है कि हमारे इन उम्रदराज मित्रों में मार्कण्डेय भाई ही शायद अकेले थे, जिनकी हमारे परिवार के हर सदस्य, यहां तक कि हमारे तब छोटे-छोटे बच्चों के मन में भी आज तक उनकी एक विशेष छवि बनी हुई है। मार्कण्डेय भाई उनके पिता के एक श्रद्धेय मित्र के नाते भी उनके संस्कारों का एक अभिन्न हिस्सा है।

जब भी मैं सोचता हूं कि आखिर मार्कण्डेय भाई में ऐसा क्या था, जो दूसरों की तुलना में उनके व्यक्तित्व को कुछ विशेष और आकर्षक बना देता था, तब मित्रों, अनायास ही मुझे आज का विषय उनके संदर्भ में भी बहुत प्रासंगिक दिखाई देने लगता है - आधुनिकता, लोकतंत्र और राष्ट्र (व्यक्तित्व) निर्माण।

एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए हुए मार्कण्डेय भाई में सामंती मिजाज की कभी कितनी भी ठसक क्यों रही हो, शिक्षा और साहित्य के संस्कारों से उनका पूरी तरह आधुनिक कायांतर हो गया था। हर प्रकार के पिछड़ेपन के बोझ से कोसों दूर, ज्ञान, बुद्धि और विवेक के प्रति गहरा आग्रह रखने वाला उनका एक ऐसा संवेदनशील व्यक्तित्व था, जिसके प्रभाव से उनके अपने आस-पास का परिवेश अप्रभावित नहीं रह सकता था। इस सचाई को उनकी एक-एक कहानी, उनके उपन्यास, उनकी वैचारिक टिप्पणियों और उनके संपादकीय कौशल के साथ ही उनकी भाषा और तर्क की पूरी संरचना से देखा जा सकता है।

मैं तो कहूंगा कि एक मसीजीवी लेखक से जुड़ी हुई तमाम प्रकार की प्रतिकूलताओं के बीच भी उन्होंने अपने खुद के परिवार को, अपने बच्चों को जिस प्रकार शिक्षित, जागरूक और संवेदनशील नागरिक के संस्कारों के साथ तैयार किया, उसमें भी इस सचाई को देखा जा सकता है।

मार्कण्डेय भाई ने वर्षों तककथापत्रिका का संपादन किया। उनकी संपादन-योजनाएं उनके व्यक्तित्व में गहरे तक बैठी लोकतांत्रिक चेतना के सबसे बड़े उदाहरण हैं। अपने उपन्यासअग्निबीजमें आजादी के ठीक बाद भारत के गांवों में तैयार हो रही नई पीढ़ी के चार चरित्रों के माध्यम से उन्होंने हमारी सामाजिक संरचना में हो रहे परिवर्तनों का जो खाका खींचा है, उससे हमारे देश के आगे के कई दशकों के सामाजिक विकास की कहानी के तमाम सूत्रों को पकड़ा जा सकता है। उन्होंने बिल्कुल सही, उस उपन्यास की परिकल्पना एक बृहद-त्रयी के रूप में की थी। उसमें इसकी संभावना के सारे संकेत साफ दिखाई देते हैं। वे इस काम को नहीं कर पायें, इसके पीछे जरूर उनकी अपनी कुछ विवशताएं रही होगी। वह एक भिन्न पहलू है।

मार्कण्डेय भाई ही है जोगुलरा के बाबासे शुरू करकेमहुए का पेड़’, ‘हंसा जाई अकेला’, ‘माई’, ‘मिस शांता’, ‘सूर्यासे होते हुएबीच के लोग’, ‘गनेसीऔरप्रिया सैनीतक की कहानियों की हमें यात्रा करा सकते थे। यह अनुभवों का एक विशाल क्षितिज था और आदमी के मनोविज्ञान के जाने कितने शेड्स। हर कहानी में एक आधुनिक संवेदनशील कथाकार के रूप में उनकी मौजूदगी साफ दिखाई देती है।

कथामें उन्होंने विभिन्न विषयों पर जो परिचर्चाएं आयोजित की वह एक तर्कशील संपादक की गहरी सूझ-बूझ का परिचय देती है। उन परिचर्चाओं में ईएमएस नंबुदिरिपाद से लेकर गुरू गोलवलकर तक को शामिल करके साहित्य और विचारों की दुनिया में जिस प्रकार के एक जनतांत्रिक विमर्श की जरूरत की जमीन तैयार की गई थी, वह शायद आज भी विरल है। युवा लेखन का विषय हो, या उच्च शिक्षा का, धर्म या कोई और विषय, ‘कथाकी परिचर्चाओं से ही उस पत्रिका का एक अलग और विशेष चरित्र निर्मित हुआ था। साहित्य की अन्य पॉलिमिक्स दूसरी बात है।

मैं इन प्रसंगों पर अभी बहुत विस्तार से जाना नहीं चाहता क्योंकि आज के विषय पर मैंने विशेष तौर पर जो आलेख तैयार किया है, वह सीधे साहित्य के विषयों से संबंध नहीं रखता है। फिर भी, मार्कण्डेय भाई के लेखन के प्रसंग में अपने एक नितांत व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करके इस चर्चा को मैं विराम दूंगा और अपने आलेख पर आजाऊंगा।

यह प्रसंग है उनके उपन्यासअग्निबीजका। उस उपन्यास की हमने कई प्रतियां मंगाई थी और उनके मिलते ही हमारे परिवार में सबलोगों ने उसे बड़े मन से एक-दो रात में ही पढ़ डाला था। मेरे अलावा मेरे पिता, इसराइल साहब, सरला और मेरी बहन दुर्गा, सबने पढ़ा और शायद सबने उपन्यास के अंत के प्रसंग तक आते-आते, जहां श्यामा की बेमेल शादी और उसकी विदाई का चित्र आता है, अपने अकेलेपन में खूब आंसू भी बहाये थे। इसके बाद ही, हम लोगों ने पारिवारिक तौर पर तय किया कि क्यों इस उपन्यास पर एक घरेलू गोष्ठी की जाए। एक दिन तय करके हम सब बैठ गयें, और उपन्यास के बारे में अपने-अपने विचार पेश करने लगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस घरेलू गोष्ठी में, जब मेरे बोलने का समय आया, मैंने, उपन्यास के भावनात्मक प्रभाव को दरकिनार करते हुए, उसकी तीखी आलोचना की थी। आलोचकीय जोम में मैंने जोर देकर कहा कि आज के काल में भारत की ग्रामीण पृष्ठभूमि में कोई उपन्यास आए और उसमें भूमि-संघर्ष का जिक्र तक हो - यह साफ तौर पर लेखक की चेतना के अभाव का सूचक है। आप जानते ही है कि वह ऐसा समय था जब कृषि क्रांति के सवाल भारतीय राजनीति के केंद्र में थे। बाकी दूसरों ने मेरी राय का विरोध भी किया। आज भी याद है, सरला ने खास तौर पर विरोध किया था। लेकिन इस बहस-मुबाहसे के बाद ही मुझे इस उपन्यास परनया पथपत्रिका के लिये लिखना था। मित्रों, मैं कहना चाहूंगा कि जब मैं उस उपन्यास पर लिखने बैठा, मेरे जीवन का वह पहला अनुभव था, जब उपन्यास के एक-एक पात्र मेरे सामने जीवित खड़े होगये। आजादी के ठीक बाद का गांव का वह पूरा परिवेश, गांधी आश्रम के इर्द-गिर्द तैयार हो रही नयी जिन्दगियां - सबके सब साक्षात हो उठे और एक-एक कर सब अपने होने का, अपने जीवन और परिवेश की सचाई का प्रमाण पेश करने लगे। जिस उपन्यास को, विषय और परिवेश की वजह से ही मैं अपनी आलोचकीय बुद्धि से गलत मान रहा था, उसके पात्र उपन्यास के एक-एक ब्यौरे के पक्ष में ऐसी दलीलें देने लगे कि पहले से सोची-समझी मेरी सारी बातें मुझे ही पूरी तरह से तंतहीन, सारहीन दिखाई देने लगी। पूरे चार दिन तक मैं सो नहीं पाया, बीमार होगया। और अपनी पहले की धारणा के बिल्कुल विपरीत मैंने उस उपन्यास की एक ऐसी लंबी समीक्षा लिखी, जिस पर मार्कण्डेय भाई ने मुझे पत्र लिखा कि इस उपन्यास को लिखते वक्त मैं खुद जिस मनोदशा में था, तुम्हारी समीक्षा ने उसे जैसे मेरे सामने फिर से एक बार जीवित कर दिया है। और, पहली बार मुझे पता चला कि जीवन का यथार्थ किस प्रकार सोच के तमाम बने-बनाये ढांचों को तोड़ डालता है, बशर्ते आप उस यथार्थ से सामने आने वाली आवाजों को सुनने के लिये तैयार हो। एक यथार्थवादी लेखक हमेशा अपनी वैचारिक सीमाओं का अतिक्रमण करता है, ‘अग्निबीजकी समीक्षा लिखते वक्त मैंने इस सचाई को अपनी धड़कनों पर महसूस किया था।

कहना होगा, मार्कण्डेय भाई का यही गहरा यथार्थ बोध, उन्हें अपने समकालीन अन्य कइयों से विशिष्ट बनाता था।

आज हम जिस विषय में चर्चा कर रहे हैं, वह भी हमारे यथार्थ जीवन की ही एक बड़ी चुनौती के तौर पर हमारे सामने आया है। अपने आलेख में विचार के क्रम में मैंने इस विषय से जुड़े अब तक के वामपंथी सोच के कई ढांचों को ढहते हुए देखा है। यह भीजीवन जैसा है’, Life as it exists से पैदा होने वाली चुनौती का ही एक परिणाम है। उम्मीद है, यहां उपस्थित हमारे मित्र इसे समझेंगे।आलेख पेश करने के पहले की इस भूमिका के अंत में मैं मार्कण्डेय भाई की कहानियों के एक संकलन ‘सहज और शुभ’ की भूमिका में कही गई उस बात को दोहराना चाहूंगा जो उन्होंने एक लेखक के नाते खुद के बारे में लिखी थी - ‘‘अपनी दृष्टि, गति और समय के बीच कोई ऐसा संतुलन खोज रहा हूं, जहां स्थितियों के परिवर्तित होने का बोध हो सके - ऐसा बोध, जिसे इंद्रियां तक महसूस करने लगें। ...मेरे लिए रचनात्मक प्रक्रिया का सत्य इसी आत्म-संघर्ष का परिणाम है, अन्यथा मैं लेखक न होकर एजिटेटर बन गया होता; क्योंकि जो दिखाई देता है, उसे स्वीकार करते हुए भी, उसी को पूर्ण सत्य मान लेने का अर्थ है, अपनी दृष्टि को सर्वथा मौलिक, परिशुद्ध तथा स्थिर मान लेना, साथ ही यह भी स्वीकार कर लेना कि जीवन वैसा ही रहेगा, जैसा दिखाई पड़ रहा है। ’’)




अरुण माहेश्वरी

मित्रों, 
इसी इलाहाबाद नगर में दो साल पहले जनवादी लेखक संघ का अंतिम राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन का उद्धाटन किया था प्रभात पटनायक ने। उनके इस उद्घाटन भाषण का सार-संक्षेप सम्मेलन के कुछ दिनों बाद ही एक लेख की शक्ल में जनसत्ता के 22 फरवरी 2014 के अंक में प्रकाशित हुआ - ‘नव उदारवाद से उपजी चुनौतियां। इस लेख की प्रतिक्रिया में हमने अपने ब्लाग ‘चतुर्दिक’ पर एक लेख लिखा - ‘हम भी इक अपनी हवा बांधते हैं : प्रसंग वर्गीय राजनीति’। 

प्रभात ने अपने इस लेख में कहा था कि नाना कारणों से संगठित क्षेत्र में रोजगार में कटौती, पूर्ण रोजगार के बजाय ठेका प्रणाली, आउटसोर्सिंग, निजीकरण आदि से श्रमबाजार के लचीलेपन के कारण काम पर लगे मजदूरों और बेरोजगारों की रिजर्व फौज के बीच के फर्क का मिट जाने और फलत: मजदूरों की हड़ताल करने, सौदेबाजी करने की ताकत का कम होने से मजदूर वर्ग की संरचना में हो रहे बदलावों ने वर्गीय राजनीति को, दूसरे शब्दों में वामपंथी या कम्युनिस्ट राजनीति को कमजोर किया है। लेख के अंत में उन्होंने आह्वान था कि मजदूरों को संगठित करके ‘‘ लोकतंत्र पर नव उदारवाद के हमले को रोकना और लोकतंत्र की हिफाजत से आगे समाजवाद के संघर्ष तक जाने के लिये नव उदारवादी वर्चस्व को नकारना और नव उदारवादी विचारों के खिलाफ प्रति-वर्चस्व गढ़ने का प्रयास करना एक शर्त है। विचारों के इस संघर्ष में लेखकों की केंद्रीय भूमिका है।’’ 

प्रभात के इस लेख पर प्रतिक्रिया में हमने जो लिखा, मित्रो, मैं उसे यहां विस्तार के साथ दोहराना चाहूंगा, क्योंकि हम जो देखते हैं वह, हम क्या जानते हैं और क्या मानते हैं, उससे प्रभावित होता है। इसीलिये  हम आज जिस आधुनिकता और लोकतंत्र को अपने विचार का विषय बनाये हुए हैं, उसके बारे में, मेरे अनुसार, प्रभात पटनायक के लेख पर चर्चा से कुछ बहुत बुनियादी चीजें साफ होगी, ताकि इन विषयों और इनसे जुड़ी अवधारणाओं पर हम आगे कभी अमूर्त ढंग से, जीवन और विचारधारा के ठोस प्रश्नों को दरकिनार रखते हुए चर्चा नहीं कर रहे होंगे।

हमने प्रभात के लेख पर लिखा था कि -
प्रभात पटनायक के इस ‘प्रति-वर्चस्व’ को तैयार करने की बात में गौर करने की चीज यह है कि  ये सारी बातें वे एक ऐसे देश के संदर्भ में कह रहे थे, जिस देश में आज भी 65 प्रतिशत से ज्यादा आबादी कृषि-निर्भर है। भारत में जिस ‘वर्गीय राजनीति’(वामपंथी या कम्युनिस्ट राजनीति) को वे मजदूर वर्ग की संरचना में बदलाव या उसकी हड़ताल करने अथवा सौदेबाजी की ताकत के कम होने की वजह से कमजोर होता हुआ बता रहे हैं, उसने भारत के राजनीतिक इतिहास में शायद ही कभी सिर्फ मजदूर वर्ग की शक्ति के बूते अपनी स्थिति को मजबूत किया होगा, क्योंकि शुद्ध संख्या की दृष्टि से ही भारत में संगठित मजदूरों की संख्या कुल आबादी में इतनी नगण्य रही है कि सिर्फ उसके बल पर यहां कभी किसी राजनीतिक शक्ति का विकसित होना संभव नहीं रहा है। भारत में वामपंथी राजनीति का अब तक जो भी विस्तार हुआ है, कहना न होगा, उसका सीधा संबंध कृषि क्रांति के मुद्दों से, अथवा नागरिक के संवैधानिक और जनतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई से रहा है। यह हमारे देश की ठोस सचाई है और जब भी हम अपने वर्तमान को सही रूप में जान लेते हैं तभी हम अतीत से जुड़े सभी विषयों पर सही प्रश्न उठा सकते हैं।

लेकिन चूंकि, वामपंथी सामान्य बुद्धि (common sense) में ‘वर्गीय राजनीति’ अर्थात कम्युनिस्ट राजनीति का मतलब माना जाता है - मजदूर वर्ग की राजनीति, इसीलिये  प्रभात पटनायक ने अन्य पक्षों को नजरंदाज करते हुए और साथ ही भारत सहित सारी दुनिया में उपलब्ध मजदूर वर्ग और समाजवाद संबंधी विपुल ऐतिहासिक तथ्यों की आलोचनात्मक दृष्टि से बिना कोई जांच-पड़ताल किये इसी ‘सामान्य बुद्धि’ की बातों को लगभग आस्था की बात की तरह दोहरा कर कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी के अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।  

मार्क्सवाद, कम्युनिज्म, समाजवाद, पूंजीवाद, मजदूर वर्ग, वर्गीय चेतना और वर्गीय राजनीति आदि से क्या तात्पर्य है और इनका परस्पर क्या संबंध है - आज के जमाने में किसी भी प्रकृत बुद्धिजीवी के लिये यह विषय कोरे विश्वास या आस्था की तरह की चीज नहीं हो सकते हैं कि जिनके बारे में कुछ ‘आप्त वचनों’ की तरह की उक्तियों को दोहरा भर देने से काम चल सकता है। दरअसल, हमारे जेहन में बैठी बहुत सी ऐसी अवधारणाएं होती हैं, उनका ‘दुनिया जैसी है’, अर्थात वास्तविकता से मेल नहीं बैठता है। अक्सर अपने आज के हित में तमाम अवधारणाओं के साथ जुड़े हुए अतीत को धुंधला किया जाता है, उन पर रहस्य के आवरण डाले जाते हैं। सवाल है कि कौन है जो अतीत पर रहस्य का पर्दा डालता है ? वही जो अपने वर्तमान से डरता है। ऐसे रहस्यीकरण का लाभ सिर्फ थोड़े से विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को होता है जो उस इतिहास की खोज में रहते हैं, जिसके सहारे वर्तमान शासकों की भूमिका को सही बताया जा सके। लेकिन एक बुद्धिजीवी के नाते ऐसे किसी रहस्य की बुनावट में हमारा कोई स्वार्थ नहीं हो सकता है। 

1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के बाद के इन लगभग 165 सालों में सारी दुनिया की नदियों से बेहिसाब पानी बह चुका है। मार्क्सवाद तो एक दार्शनिक पद्धति है, लेकिन वर्गीय चेतना, वर्गीय राजनीति, कम्युनिस्ट राजनीति और समाजवाद का खुद का अपना एक अच्छा-खासा इतिहास तैयार हो चुका है। उन देशों में भी जहां की 90 फीसदी से ज्यादा आबादी मजदूर वर्ग की है लेकिन जहां समाजवाद का कोई स्थान नहीं बन पाया है, और उन देशों में भी जहां ‘समाजवादी शासन’ के अंतर्गत ही वास्तव अर्थों में संगठित मजदूर वर्ग का समाज में पदार्पण हुआ है।

मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट राजनीति के अप्रतिम इतिहासकार एरिक हाब्सवाम (1917-2012) की अंतिम पुस्तक है - How to change the world : Marx and Marxism 1840-2011। इस पुस्तक का आखिरी अध्याय है - Marx and Labour (मार्क्स और श्रमिक)। 

यह सच है कि जब भी हम किसी भी व्यक्ति, वर्ग या समुदाय को भी अपना ईश्वर बना लेते हैं, तो जाहिर है कि हम उसे उसके ठोस रूप से अलग, शब्द के मृत रूप में बदल देते हैं। हेगेल लिखते हैं कि शब्द वस्तु की मृत्यु है। तब हमारे सामने प्रश्न रह जाता है कि हम कैसे शब्द में मृत ईश्वर से वास्तव के जीवित ईश्वर तक जाएं। इसका एकमात्र तरीका यह है कि हम ईश्वर के बारे में अपनी सोच में आए इस ऐतिहासिक विवर्तन को ही अपनी यात्रा का प्रस्थान बिंदु बनाने के बजाय खुद ईश्वर के इतिहास के लेखन की दिशा में बढ़ जाएं। देखेंगे कि हम शब्द में मृत ईश्वर से एक जीवित ईश्वर तक पहुंच जायेंगे। 

एरिक हाब्सवाम ने अपनी पुस्तक के इस अध्याय में इतिहास की चालिका शक्ति के रूप में ईश्वर की शक्ल दे दिये गये मजदूर वर्ग को असल में जानने के लिये मजदूर वर्ग और उसके आंदोलन के इतिहास का ब्यौरा देना शुरू कर दिया। उन्होंने  मजदूर वर्ग और कम्युनिस्ट राजनीति तथा समाजवाद से जुड़ी तमाम बातों को उनकी ऐतिहासिकता में समझने और विश्लेषित करने की कोशिश की , जिनसे इन विषयों पर कोरी अमूर्त बातों के बजाय एक यथार्थपरक दृष्टि और आलोचनात्मक विवेक हासिल किया जा सके। 

हाब्सवाम ने लिखा कि ‘‘मार्क्सवाद के इतिहास के अध्ययन का समापन मजदूर वर्ग के संगठित आंदोलन के बारे में एक निबंध से करना ही उचित है। मार्क्स की दृष्टि में सर्वहारा ‘पूंजीवाद की कब्र खोदने वाला सामाजिक रूपांतरण का अनिवार्य तत्व था।’’

मार्क्सवाद और मजदूर वर्ग के संबंधों के इतिहास का आख्यान पेश करते हुए आगे वे कहते हैं कि बीसवीं सदी में मजदूर वर्ग के अधिकांश आंदोलन और पार्टियों ने अपने को मार्क्स के सपनों से जोड़ा था और मार्क्सवादियों ने भी इन मजदूर आंदोलनों और पार्टियों को अपनी राजनीतिक गतिविधियों के क्षेत्र के रूप में चुन लिया था। इस तथ्य के बावजूद, हाब्सवाम का साफ मत था कि मार्क्सवाद और मजदूर आंदोलन के बीच के ‘जटिल और परिवर्तनशील संबंधों’ को समझने के लिये जरूरी है कि इन्हें परस्पर स्वतंत्र रूप में देखा जाएं। 

‘‘ये कत्तई एक और अभिन्न नहीं है।’’

इस कथन के साथ हाब्सवाम दुनिया में मजदूर आंदोलन के इतिहास के यथार्थपरक विवेचन की ओर बढ़ते हैं। उदाहरण दे-देकर बताते हैं कि कैसे 19वीं सदी के अंत के समय से ही यूरोपीय सरकारों ने संगठित और मजबूत मजदूर आंदोलन के अस्तित्व को स्वीकृति देना शुरू किया। मजदूरों की काम की परिस्थितियों, और मजदूरों के  साथ विवादों को सुलझाने के कानूनी प्राविधान तैयार होने लगे थे। यहां तक कि मजदूर वर्ग के प्रतिनिधि यूरोपीय सरकारों में भी शामिल होने लगे। 

उन्होंने बताया कि सन् 1899 में फ्रांस की सरकार में जब जाने-माने समाजवादी एलेग्जेंडर मित्तरां को वाणिज्य मंत्री बनाया गया, मजदूरों की राजनीतिक पार्टियों में, खास तौर पर समाजवादी पार्टियों में एक संकटजनक खलबली मच गयी थी। हाब्सवाम के अनुसार, उस समय तक, और उसके बाद भी लंबे अर्से तक समाजवादी यह विश्वास ही नहीं कर पाते थे कि बिना क्रांति के अथवा ‘आम हड़ताल के जरिये पूंजीवाद को बिना परास्त किये’ किसी समाजवादी पार्टी के लिये किसी सरकार में शामिल होना संभव होगा। (भारत में तो आज, सवा सौ साल बाद भी कतिपय वामपंथी इस संशय से मुक्त नहीं होपाये हैं।) 

हाब्सवाम लिखते हैं कि ‘‘विचारधारात्मक स्तर पर इसी संकट के बीच से बीसवीं सदी में मजदूरों के राजनीतिक इतिहास का श्रीगणेश हुआ।’’ 

हाब्सवाम का सवाल था कि आखिर क्यों यूरोपीय सरकारों ने श्रमिकों को गंभीरता से लेना शुरू किया? उस समय तक तो यूरोप में मजदूरों की स्थिति बेहद कमजोर थी। ‘‘ब्रिटेन और फ्रांस में 15 से 20 प्रतिशत, जर्मनी में उससे भी कम। दूसरी जगह भी मजदूर बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं थे।’’ इसका जवाब देते हुए हाब्सवाम इन देशों में संसदीय जनतंत्र के उदय की ओर इशारा करते हैं और कहते हैं कि मजदूरों के  कमजोर होने पर भी यह नजर आने लगा था कि मजदूरों की पार्टियां बड़ी चुनावी ताकतें बन सकती हैं। 1914 के पहले ही स्कैंडिनेविया के देशों तथा और भी कई जगहों पर यह बात साफ हो चुकी थी।

इसके अतिरिक्त यूरोपीय सरकारों के लिये चिंता की एक और बात मजदूरों की बढ़ती हुई ‘वर्गीय चेतना’ भी थी। हाब्सवाम विंस्टन चर्चिल को उद्धृत करते हैं : ‘‘यदि कंजरवेटिव और लिबरलों की दो दलीय प्रणाली टूटती है तो ब्रिटिश राजनीति खुली वर्गीय राजनीति बन जायेगी अर्थात वर्ग हित के संघर्षों से आच्छादित राजनीति।‘‘ हाब्सवाम के शब्दों में, ‘‘ वर्ग संघर्ष की राजनीति से बचना एक सामान्य समस्या बन गया था।’’

फ्रांस में जब मित्तरां को सरकार में शामिल किया गया तभी पहली बार मजदूर वर्ग की पार्टी के सामने यह सवाल उठा था कि शासन के साथ उसका क्या संबंध होना चाहिए। उन्हीं दिनों मार्क्स-एंगेल्स के अत्यंत करीबी, खास तौर पर एंगेल्स के प्रिय एडुअर्ड बन्र्सटीन का प्रसिद्ध घोषणापत्र Des Sozialismus und Die Aufgaben Der Soziakldemorkratie (Evolutionary Socialim : a criticism and affirmation) प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने माक्र्स के कम्युनिस्ट घोषणापत्र तक के लेखन को अपरिपक्व और उनके परवर्ती लेखन को परिपक्व बताते हुए यह स्थापना दी थी कि ‘‘जनतांत्रिक समाजों में वैद्यानिक सुधारों के जरिये समाजवाद लाया जा सकता है।’’

इसके साथ ही समाजवादी आंदोलन में यह बुनियादी सवाल उठ खड़ा हुआ - क्रांति या सुधार? जब पूंजीवाद के पतन की उम्मीद न हो, तब मजदूर वर्ग का ऐतिहासिक कत्र्तव्य क्या होगा?

बर्नस्टीन को तो तब कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने एक सिरे से खारिज कर दिया क्योंकि उसने ‘इंटरनेशनल’ के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया था। इसीप्रकार, मित्तरां प्रसंग को भी ‘एक व्यक्ति की विचलन’ बता कर संभाल लिया गया। लेकिन हाब्सवाम कहते हैं कि उस समय की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टियों ने बर्न्सटीन की एक बात को जरूर मान लिया कि पूंजीवाद के अंतर्गत ही उन्हें मजदूर वर्ग की स्थिति में सुधार के लिये काम करना होगा। 

हाब्सवाम के शब्दों में, ‘‘सन् 1900 के बाद से प्रमुख पूंजीवादी देशों में मार्क्सवादी मजदूर आंदोलन पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग के रास्ते पर काम करते रहे।’’

इसी बिंदु पर हाब्सवाम एक बहुत गहरी बात कहते हैं कि श्रमिक और समाजवाद जितने भी एक और अविभाज्य क्यों न दिखाई दें, आंदोलन के स्तर पर वे कत्तई एक नहीं है। 

‘‘मित्तरां और बन्र्सटीन समाजवाद के लिये संकट थे, मजदूर आंदोलन के लिये नहीं।’’ 

याद कीजियें लेनिन के जमाने की रूसी संसद, डूमा में कम्युनिस्टों को भाग लेना चाहिये या नहीं की बहस की । हाब्सवाम इसी बहस के दूसरे पहलू, पश्चिमी पहलू को रख रहे थे, जिसका आधुनिकता और जनतंत्र के हमारे विषय से एक सीधा संबंध बनता है। उस पहलू की जो पूंजीवाद के पतन की उम्मीद न होने की परिस्थिति में पैदा होता है। हाब्सवाम जोर देकर कहते हैं कि समाजवाद पूंजीवाद को स्थानापन्न करने वाली एक भिन्न आर्थिक प्रणाली की परियोजना है, लेकिन मजदूर आंदोलन या वर्ग चेतना ऐसी कोई परियोजना नहीं, बल्कि ‘‘सामाजिक उत्पादन के एक निश्चित चरण में मजूरी के बदले काम पर लगे लोगों की नैसर्गिकता है।’’

हाब्सवाम बताते हैं कि अमेरिकी इतिहास में मजदूर आंदोलन की एक अहम भूमिका रही है। आज भी डेमोक्रेटिक पार्टी में उसे देखा जा सकता है। लेकिन सवाल है कि ‘‘अमेरिका में समाजवाद क्यों नहीं है? ...एक विचारधारा अथवा राजनीतिक आंदोलन के रूप में वहां समाजवाद अनुपस्थित और गैर-महत्वपूर्ण है। ब्रिटेन में लिब लैब श्रमिक आंदोलन राजनीतिक समर्थन के लिये लिबरल पार्टी का मूंह जोहता था, महायुद्ध के काल तक उसके साथ उसने अपने संबंध नहीं तोड़े। अर्जेंटिना में काफी समय से कुंठित समाजवादियों और कम्युनिस्टों के लिये यह समझना मुश्किल रहा कि आखिर क्यों 1940 के दशक में विकसित हुआ उस देश का स्वतंत्र और रेडिकल मजदूर आंदोलन उस विचार (पेरोनवाद) से जुड़ गया जिसकी निष्ठा एक लोकप्रिय सैनिक जैनरल में थी।’’

इसी सिलसिले में हाब्सवाम ने पोलैंड में ‘सोलिडरिटी’ के समाजवाद-विरोधी मजदूर आंदोलन, विभिन्न राष्ट्रवादों, धर्मों और दूसरी विचारधाराओं से जुड़े श्रमिक आंदोलनों का विस्तार से उल्लेख किया है। भारत में हम इसे आसानी से कम्युनिस्ट पार्टियों से लेकर कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना और यहां तक कि दत्ता सामंत आदि की तरह के कई व्यक्तियों के साथ जुड़े श्रमिक संगठनों और आंदोलनों के इतिहास से भी जोड़ कर देख सकते हैं। 

हाब्सवाम कहते हैं कि कम्युनिस्ट धोषणापत्र के प्रकाशन से लेकर 1970 के काल तक मजदूर आंदोलन के साथ समाजवाद का एक गहरा रिश्ता दिखाई देता है। इससे मजदूर आंदोलन और समाजवादी आंदोलन, दोनों ही लाभान्वित भी हुए हैं। लेकिन, हाब्सवाम का अभियोग है कि, समाजवादी व्यवस्था के सच, Socialism as it exists ने ही इस रिश्ते को तोड़ने में सबसे बड़ी भूमिका अदा की। 

‘‘रूस में बोल्शेविक सर्वहारा के नाम पर सत्ता में आए और उनकी पंचवर्षीय योजनाओं ने बड़ा औद्योगिक मजदूर वर्ग पैदा किया। लेकिन जैसा कि हम सब जानते हैं, उन्होंने मजदूर आंदोलन को खत्म कर दिया।...कम्युनिस्ट दुनिया में मजदूर वर्ग का इतिहास लिखना संभव है... मजदूर आंदोलनों का इतिहास नहीं। 1980 के दशक में पोलैंड में सोलिडेरिटी इसका सबसे बड़ा अपवाद है।’’

‘‘सोवियत संघ की तरह ही चीन और वियतनाम में भारी औद्योगीकरण की परिणति स्वतंत्र मजदूर संगठनों के रूप में नहीं हुई है।’’

और गहराई से देखें, तो पता चलेगा कि किसी भी मार्क्सवादी सिद्धांतकार ने वास्तव अर्थ में मजदूर वर्ग और मार्क्सवाद को कभी भी नैसर्गिक तौर पर एक और अविभाज्य नहीं माना हैं। वे मानते  हैं कि मजदूर खुद से समाजवाद का निर्माण नहीं करते बल्कि समाजवाद के विचार को उनमें बाहर से ले जाना पड़ता है। हाब्सवाम कहते हैं कि अमेरिकी, फ्रांसीसी और औद्योगिक क्रांतियों ने पश्चिम के बौद्धिक परिदृश्य में इस बोध को स्थापित किया था कि एक अलग और बेहतर समाज बनाना संभव है - प्रतिद्वंद्विता के बजाय सामुदायिक सहयोग पर टिका न्यायपूर्ण समाज। इस बौद्धिक परिदृश्य में समाजवाद को स्थापित करने के लिये समाजवादी राजनीतिक पार्टी ने बाहर से प्रवेश किया था। 

‘‘श्रमिकों के संघ उनके जीवन के अनुभवों से स्वत: पैदा हो जाते हैं, लेकिन पार्टियां स्वत: पैदा नहीं होती।’’

इस बिंदु पर पहुंच कर ही हाब्सवाम कुछ ऐसी बातें कहते है जो आधुनिकता और लोकतंत्र से जुड़े हमारे आज के विषय की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में मार्क्स -एंगेल्स ने एक ऐसी पार्टी के निर्माण की पेशकश की थी जो केवल मजदूर वर्ग को संबोधित पार्टी नहीं थी। ‘‘वह सामान्य रूप से समाज की आधुनिक संरचना को तैयार करने के लिये बनाई गयी पार्टी थी।’’ (जोर हमारा)  हाब्सवाम कहते हैं कि उनके बाद यूरोप में सर्वत्र ऐसी पार्टियां बनी, सत्ता पर आयीं और समाजों की आधुनिक संरचना के विकास में उन्होंने अपनी भूमिका अदा की। 

‘‘लेकिन यह बात निराधार साबित हुई कि सर्वहारा ऐतिहासिक तौर पर अनिवार्यत: सच्चा क्रांतिकारी है।’’ 

‘‘इतिहास ने हमें यह भी सिखाया कि क्रांतियां घटनाओं का इतना जटिल समुच्चय है कि उन्हें किसी खास वर्गीय संरचना का प्रतिरूप नहीं माना जा सकता है।’’

हाब्सवाम के अनुसार, “ इतिहास की इस सीख को यदि ग्रहण कर लिया गया होता तो वामपंथी सिद्धांतकार और इतिहासकार उस बेहिसाब मेहनत और समय को जाया करने से बच जाते जो उन्होंने यह साबित करने में खर्च की है कि अधिकांश श्रमिक पार्टियां क्यों अपनी क्रांतिकारी भूमिका अदा करने से चूक गयीं?’’ जब उन पिछड़े हुए देशों में, जहां क्रांति कोरा शब्दाडंबर नहीं, बल्कि एक वास्तविक संभावना जान पड़ती है, मार्क्सवादियों को बुर्जुआ पूंजीवादी विकास ही आगे का एकमात्र पथ दिखाई देता है, तब विकसित पूंजीवादी देशों में तो मजदूरों और फलती-फूलती अर्थ-व्यवस्था का सहजीवन नितांत स्वाभाविक है।

‘‘पेत्रोग्राद की सोवियत क्रांति ने अपने को बर्लिन में स्थापित नहीं किया, और अब तो साफ है कि उसकी उम्मीद भी करना गैर-यथार्थवादी होता।’’

पूंजीवाद और मजदूर वर्ग के सहजीवन के इस लंबे आख्यान में हाब्सवाम बीसवीं सदी में ‘70 के दशक को एक नये मोड़ का सूचक बताते हैं। इसके बाद की वैश्विक परिघटना में कायिक मजदूरों की संख्या कम होती गयी और मजदूरों की ‘वर्गीय चेतना’ भी कमजोर हुई है। ‘‘समृद्ध उपभोक्ता समाजों में धन की जबरदस्त वृद्धि से मजदूर वर्ग भी लाभान्वित हुए और साथ ही उस स्वयं-सिद्ध विश्वास की हानि हुई कि मजदूर वर्ग के जीवन में वास्तविक सुधार आपसी भाईचारे और सामूहिक कार्रवाई के जरिये ही मुमकिन है।’’

प्रभात पटनायक ने अपने लेख में ‘श्रम बाजार के लचीलेपन’ की जिस पदावली का प्रयोग किया था, हाब्सवाम इसे ‘70 के बाद की परिस्थितियों का परिणाम बताते हैं जब ‘‘पूर्ण रोजगार का स्थान श्रम बाजार के लचीलेपन और ‘बेरोजगारी की प्राकृतिक दर’1 के सिद्धांत ने ले लिया।’’

यह रेगन-थैचर के ‘बाजार की पूर्ण-स्वायत्तता’ का दौर था। किसी समय कम्युनिज्म के भय ने पूर्ण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के प्रति अमेरिका सहित सभी पश्चिमी सरकारों को जिसप्रकार वचनबद्ध किया था, बर्लिन की दीवार के गिरने के बाद उसमें कमजोरी दिखाई देने लगी। इसके अलावा कुछ और चीजें भी कारण बनी जिन पर हम आगे चर्चा करेंगे। 

मूल बात यह है कि ‘80 के बाद का यह दौर सन् 2008 के भयावह आर्थिक संकट तक जारी रहा । 1981 से 2008 के बीच के काल में बर्नस्टीन का सुधारवाद परित्यक्त हुआ और नरम-गरम, सभी प्रकार के कम्युनिस्टों की साख इस हद तक गिर गयी कि पश्चिम में कम्युनिज्म कोई राजनीतिक शक्ति ही नहीं रह गया। सन् 2008 में परिस्थिति में फिर एक बदलाव आया। जिन सरकारों ने बाकायदा निजीकरण और अविनियमीकरण (de-regularisation) के जरिये बाजार का डंका पिटवाया था और नव उदारवाद की आधारशिला रखवाई थी, उन्हीं सरकारों को मुसीबत में फंस चुकी अर्थ-व्यवस्था के उद्धारकर्ता की भूमिका अदा करनी पड़ी।  बाजार नहीं, एक बार फिर राज्य की भूमिका प्रमुख रूप से दिखाई दी। 

सन् 2008 के बाद सब-प्राइम संकट से उत्पन्न महा-संकट की परिस्थितियों में सिद्धांतत: मजदूर आंदोलन के पुनरोदय की संभावना होने पर भी, हाब्सवाम को व्यवहार में यह मुमकिन नहीं लगा था। उन्होंने याद दिलाया कि 1929-33 की महामंदी का एक राजनीतिक परिणाम यह हुआ था कि सर्वत्र मजदूर आंदोलन और वामपंथ का संबंध-विच्छेद होगया। यह तब, जब सोवियत संघ की संकट-मुक्त अर्थ-व्यवस्था का उदाहरण मौजूद था। आज स्थिति यह है कि समाजवाद के परंपरागत रूप में विश्वास रखने वाले बुद्धिजीवी आज के संकट से निजात के बारे में दूसरे लोगों की तुलना में न कोई बेहतर समझ रखते हैं और न ही उनके पास सोवियत संघ जैसा दिखाने लायक कोई उदाहरण है। पर्यावरण, शांति की तरह के रेडिकल विषय मजदूरों के लिये प्रासंगिक नहीं है, ये मूलत: मध्यवर्ग की चिंता के विषय  है। जैसे सन् 2008 में भारत में ‘न्यूक्लियर संधि’ का मुद्दा था। मजदूर आंदोलन पूंजीवाद का विरोधी है, लेकिन पूंजीवाद के बारे में, और पूंजीवाद के स्थान पर वे कौन सी व्यवस्था लाना चाहते हैं, उसके बारे में भी उनकी धारणा स्पष्ट नहीं है। “विकल्प-विहीन तीव्र असंतोष सिर्फ मीडिया के लिये महत्वपूर्ण हो सकता है।“ 

जो भूमंडलीकरण बिना कोई विकल्प प्रदान किये जीवन और मानव संबंधों के पुराने तरीकों को नष्ट कर रहा है, हाब्सवाम कहते हैं, उससे कुछ देशों में रेडिकल दक्षिणपंथ का, सांप्रदायिकता और आतंकवाद का, पूर्व-आधुनिक प्रवृत्तियों का खतरा बढ़ जाता है। आज हम पूरे मध्य एशिया से लेकर भारत तक में इसी परिघटना के साक्षी है। यह सीधे तौर पर उस ‘आधुनिकता के प्रकल्प’ की विफलता है जिसे ऊपर की पूरी चर्चा में पूंजीवादी संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली से लेकर एक प्रकार से कथित समाजवादी व्यवस्था तक का सार तत्व बताया गया है। 

मित्रों, आज का हमारा वास्तविक संदर्भ ‘आधुनिकता के इसी प्रकल्प’ की विफलता का संदर्भ है जो लोकतंत्र के लिये एक बड़े संकट के तौर पर उपस्थित हो गया है, उग्र दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों की जमीन तैयार कर रहा है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। जो बात पश्चिम एशिया और अरब दुनिया के ‘अरब वसंत’ में दिखाई देती है, जो भारत में नरेन्द्र मोदी और आरएसएस के सत्ता पर आने में दिखाई देती है, वही बात दक्षिण अमेरिका, अर्थात लातिन अमेरिका में नहीं दिखाई देती। अर्थात आधुनिकता के प्रकल्प की विफलताओं से वहां अभी पूर्व-पूंजीवादी परिस्थितियों का खतरा दिखाई नहीं देता। 

अगर हम लातिन अमेरिका को देखे, तो पायेंगे कि वहां भी ‘90 के दशक में वही आर्थिक संकट की परिस्थितियां थी जो भारत की थी। वहां भी लड़खड़ाती हुई अर्थ-व्यवस्था को संभालने के लिये उदारवादी नई अर्थनीति का, ढांचागत समायोजन और वाशिंगटन कंसेंसस के अनुसार चलने का रास्ता अपनाया गया था। और, परिणाम में भीषण सामाजिक गैर-बराबरी, भ्रष्टाचार अपराध व हिंसा से भरा समाज तैयार होने लगा। लातिन अमेरिका ही था आईएमएफ और विश्व बैंक की ढांचागत समायोजन की नीतियों पर अमल का प्रमुख प्रयोग स्थल। और उनके चलते इन समाजों में जो जन-असंतोष पैदा हुआ, जोसेफ स्टिगलिट्ज ने अपनी किताब ‘ग्लोबलाइजेशन एंड इट्स डिसकंटेंट’ में उसीका आख्यान तैयार किया था । 

‘90 के दशक के शुरू से भारत भी उसी रास्ते पर बढ़ा था। हम यहां उसके पहले की आर्थिक दुरावस्था की कहानी पर नहीं जायेंगे। सन् ‘91 की नरसिम्हा राव सरकार और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ वाशिंगटन कंसेंसस की सिफारिशों के अंधानुकरण का दौर शुरू हुआ । विदेशी निवेश आया, विदेशी मुद्रा की स्थिति सुधरी, लेकिन पांच साल बीतते न बीतते, सामाजिक गैर-बराबरी और घोटालों का ऐसा विस्फोट हुआ कि विकास के सारे दावे धरे के धरे रह गये। 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की निर्णायक पराजय हुई।  

हमारा दुर्भाग्य कि कांग्रेस का विकल्प - भाजपा नीत एनडीए सरकार - और भी जघन्य था। हालत यहां तक पहुंच गयी कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष ही हथियारों के सौदे के नाम पर सरे आम घूस लेता हुआ पकड़ा गया। एनडीए का काल प्रमोद महाजनों और रंजन भट्टाचार्यों के उदय का दौर था। इसके साथ ही वह आडवाणी की शह पर नरेंद्र मोदी सरीखे सांप्रदायिक अपराधी के भी उदय का दौर था। छ: साल के अंदर ही अमेरिकी नुस्खों पर चमकाये गये ‘शाइनिंग इंडिया’ की कलई खुल गयी। और, 2004 के आमचुनाव में एनडीए की जगह यूपीए की सरकार बनी। सीधे वामपंथी रूझान की सरकार। लातिन अमेरिका में हो रहे परिवर्तनों की ही वह एक भारतीय सूरत थी। फर्क सिर्फ यह था कि सरकार के नेतृत्व में कांग्रेस थी और वामपंथी, सरकार के अंदर थे भी और नहीं भी थे। यूपीए के घटक के नाते अंदर, और कोई मंत्री पद न लेने के नाते बाहर। 

जो भी हो, पहली यूपीए सरकार के कदम जमीन पर टिके रहे। हजार दबावों के बावजूद अनेक क्षेत्रों में वाशिंगटन कंसेंसस के निर्देश नहीं चलें। लेकिन उस सरकार के अंतिम काल में, ऐन चुनाव के साल भर पहले परमाणविक ऊर्जा के विषय में अमेरिका के साथ समझौते का मसला कुछ इस कदर उठा कि कांग्रेस और वामपंथ का वह सफल ताल-मेल बिखर गया। अमेरिकी मंशा पूरी हुई। आगे के चुनाव में यूपीए सरकार की उपलब्धियां कांग्रेस के हाथ लगी और वामपंथी अपने मत को किसे समझाएं, कैसे समझाएं की उहा-पोह में, जैसे अपना सबकुछ लुटा बैठे। 

2008 के चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता पर लौट आयी। यूपीए - 2 की सरकार बनी। वामपंथियों को लोकसभा के इतिहास में सबसे कम सीटें मिली। और इसके साथ ही, आर्थिक नीतियों के क्षेत्र में शुरू हुआ - नव-उदारवाद का नंगा खेल। विदेशी पूंजी की बाढ़ और गठबंधन धर्म के नाम पर भ्रष्टाचार और अपराधीकरण को केंद्र सरकार का खुला संरक्षण। यूपीए-2 के भ्रष्ट शासन ने राज्यों में भाजपा को बल पंहुचाया, श्रेय मिला नरेन्द्र मोदी को सुशासन का। क्रमश: फिर वैसी ही, सन् ‘96 से भी बदतर स्थिति तैयार होगयी। अकेले भ्रष्टाचार ने पूरे राष्ट्र में ऐसी त्राहि-त्राहि मचायी है कि अब इसकी चपेट से कोई भी नहीं बच पा रहा है। भ्रष्ट नौकरशाह राजनीतिज्ञों को दबोचे रहते हैं, राजनीतिज्ञ आम जनता की छाती पर चढे़ हुए हैं और सरकारी बाबू जोंक बनकर पूरे राष्ट्र का खून चूस रहे हैं। यूपीए-2 के ये अंतिम दिन तो भ्रष्टाचार-निरोध का जाप करते हुए ही गुजर गये। 

गौर करने की बात यह है कि इन्हीं परिस्थितियों में, भारत के विपरीत लातिन अमेरिका के तमाम देशों में 21वीं सदी के आगमन के साथ ही वामपंथी रूझान की पार्टियों के उभार का सिलसिला शुरू हुआ और देखते-देखते वेनेजुएला में हुगो सावेज, चिले में रिकार्डो लागोस और मिशैल बाशलेत, ब्राजील में लुला द सिल्वा और दुल्मा रूसेफ, अर्जेन्तिना में नेस्तर किर्शने और उनकी पत्नी क्रिस्तिना फर्नान्दिज, उरुग्वे में होशे मुखीका, बोलीविया में एवो मोरालेस, निकारागुआ में दनियल ओर्तेगा, इक्वाडोर में रफायल कोरिआ, पैरागुआ में फर्नांदो लुगो, होंडुरस में मैनुअल खेलाया, अल सल्वाडोर में मोरिशिओ फ्यूनस की सरकारें बन गयी। ये सभी अपने को वामपंथी, समाजवादी, लातिन अमेरिकापंथी अथवा साम्राज्यवाद-विरोधी कहते थे। तब शायद सिर्फ होंडुरस, कोलंबिया और पनामा में दक्षिणपंथी सरकारें थी। इनमें होंडुरस और पनामा बहुत छोटे देश है। हाल में वेनेजुएला के चुनाव में सावेज की पार्टी पराजित हो गई है। 

इस बात को हाब्सवाम ने भी नोट किया था कि आधुनिकता के जिस प्रकल्प की विफलता दुनिया के अनेक स्थानों पर दक्षिणपंथी रेडिकलिज्म के उभार का कारण बन रही है, लातिन अमेरिका में वैसा नहीं हो रहा है। वहां वामपंथ का एक नया जनतांत्रिक स्वरूप उभर कर सामने आ रहा है। 

हाब्सवाम ने 2008 के बाद, सिर्फ विकासशील पूंजीवादी देशों में नहीं, बल्कि खुद अमेरिका में भी एक नए प्रकार के परिवर्तन को लक्षित किया था। उन्होंने यह भविष्यवाणी की थी कि अमेरिका में 2008 का संकट नये सिरे से किसी रेगनवाद के उदय का कारण नहीं, बल्कि सन् ‘29 की महामंदी के बाद के एफ डी रूजवेल्ट की तरह के ‘न्यू डील’ वाले वामपंथ की दिशा में बढ़ने का कारण बन सकता है। सन् 2008 के बाद ही रिपब्लिकन राष्ट्रपति जार्ज बुश (2001-2009) को हरा कर अमेरिका के इतिहास में पहली बार एक अश्वेत, डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा सत्ता पर आए और पिछले आठ सालों से सत्ता पर बने हुए हैं। 

इसी प्रसंग को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए हम आज के अमेरिका की राजनीति को यहां लाना चाहेंगे। नोम चोमस्की कहते हैं कि अमेरिकी नीतियों में होने वाले हर परिवर्तन का खुद अमेरिका के लिये जितना मायने है, उससे कहीं ज्यादा बाकी दुनिया के लिये है। 

यह साल अमेरिका में चुनाव का साल है। 22 नवंबर के दिन अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है। इन चुनावों की स्थिति क्या है ? एक ओर रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के रूप में डोनाल्ड ट्रम्प नामक एक चरम दक्षिणपंथी, उग्र सांप्रदायिक व्यक्ति का नाम सामने आ रहा है, तो दूसरी ओर डेमोक्रेटिक पार्टी में हिलैरी क्लिंटन का नाम सामने आने पर भी बर्नी सैन्डर्स नाम के वरमोंट के एक सिनेटर से उनको कड़ी चुनौती मिल रही है। 

अमेरिकी चुनाव के विश्लेषक हिलैरी को मिल रही सैन्डर्स की इस चुनौती को कोई साधारण चुनौती के रूप में नहीं देख रहे हैं। सैन्डर्स जिन बातों को उठा कर हिलैरी को चुनौती दे रहा है वह बहुत महत्वपूर्ण है। सैन्डर्स का कहना है कि अमेरिका सामाजिक गैर-बराबरी से बुरी तरह थक गया है। जो चलता रहा है, वह चल नहीं सकता। सैन्डर्स रेगन के समय से शुरू हुई आयकर प्रणाली को फिर से उलट कर वृद्धिमान कर प्रणाली को लागू करने और न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि पर लगी रोक को हटा कर उसमें भारी वृद्धि करने की बातों के साथ सामने आया है। 

अमेरिकी इतिहास इस बात का गवाह है कि वहां 1930 से 1981 तक के काल में आयकर में वृद्धिमान (progressive) दर को लागू करके और न्यूनतम मजूरी को लगातार बढ़ा के सामाजिक विषमता पर अंकुश लगाया गया था । जॉन एफ कैनेडी के काल में तो अधिकतम आय पर 92 प्रतिशत तक आयकर हो गया था । और सबसे अधिक गौर करने लायक यह है कि इन्हीं पांच दशकों के इतिहास को अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था का स्वर्णिम युग कहा जाता है, जब वहां बेरोजगारी नहीं के बराबर थी और आर्थिक विकास की दर सबसे ज्यादा थी। 

सत्तर के दशक में वियतनाम युद्ध में पराजय और बाद में जर्मनी तथा जापान की तरह की युद्ध में पराजित शक्तियों की अर्थ-व्यवस्था में आए नये उभार और उनके द्वारा अमेरिकी उत्पादों को दी गई भारी चुनौती ने अमेरिका में एक प्रकार की पस्त-हिम्मती की स्थिति पैदा की और लगभग पांच दशकों के बाद 1981 में रेगन ने पूंजीवाद की आत्मा को पुनर्जीवित करने के नाम पर आयकर की वृद्धिमान दरों के सूत्र को उलट दिया और न्यूनतम वेतन में वृद्धि पर रोक लगाने की कोशिश की । आयकर की अधिकतम दर को सिर्फ 28 प्रतिशत पर बाँध दिया गया । और परिणाम यह हुआ कि अमेरिका फिर क्रमश: बढ़ती हुई सामाजिक ग़ैर-बराबरी के चलते अंत में आर्थिक गतिरोध में फँसता चला गया ।

बिल क्लिंटन और ओबामा के काल में आयकर की अधिकतम दर बढ़ कर 40 प्रतिशत तक गई, न्यूनतम मजूरी बढ़ कर फिर दस डालर प्रति घंटा हो गई, लेकिन वृद्धिमान आयकर की दर के फ़ार्मूले को लागू नहीं किया जा सका। ओबामा ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य की अपनी योजना पर अडिग रह कर आम लोगों को थोड़ी अतिरिक्त राहत देने का काम जरूर किया । आज डेमोक्रेटिक पार्टी में बर्नी सैंडर्स इसी बात पर कि वह आयकर में वृद्धिमान दर को लागू करेगा और न्यूनतम मजूरी को पंद्रह डालर प्रति घंटा पर ले जायेगा, और अधिकतम वेतन की सीमा को भी तय करेगा, हिलैरी क्लिंटन को कड़ी टक्कर दे रहा है । 

कहना न होगा, अगर अमेरिका में फिर से आठ दशक पहले की, 1929 के बाद की भावना विजयी होती है तो यह सारी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों के लिये एक सबसे बड़ी ख़बर होगी । यह उस मिथक को तोड़ेगी  कि पूँजीपतियों को तमाम छूट देकर ही आर्थिक विकास मुमकिन है । बल्कि, आर्थिक विकास और ख़ुशहाली की रामवाण दवा सामाजिक ग़ैर-बराबरी को ख़त्म करना है । सैंडर्स की इस चुनौती के बारे में कहा जा रहा है कि उसे डेमोक्रेटिक पार्टी के पचास साल से नीचे के मतदाताओं का भारी समर्थन प्राप्त है। हो सकता है कि इस बार हिलैरी क्लिंटन की डेमोक्रेटिक पार्टी में गहरी पैठ और उसके पास उपलब्ध अपार संसाधनों की वजह से सैंडर्स उनका मुकाबला करने में विफल रह जाए, लेकिन यह तय है कि आगे के दिनों में सैंडर्स नहीं तो कोई दूसरा, श्वेत-अश्वेत, नया व्यक्ति सैंडर्स के नये अवतार के रूप में निश्चित तौर पर सामने आयेगा। 

हम जानते हैं कि अमेरिकी नीतियों का दुनिया पर क्या असर पड़ता है। ‘80 के दशक के बाद सारी दुनिया पर चलाये गये वाशिंगटन कंसेंसस के रोडरोलर की बात हम पहले ही कर चुके हैं। अगर अब वृद्धिमान आयकर की दर, न्यूनतम मजूरी में वृद्धि और अधिकतम वेतन की सीमा बांधने की तरह के उपायों से वहां सामाजिक गैर-बराबरी को काबू में रखा जा सका, तो इसके वैश्विक परिणामों को भी समझा जा सकता है। भारत में तब किसी को मुकेश अंबानी की तरह सात हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करके पाँच लोगों के परिवार के लिये एक घर बनाने की अश्लीलता के प्रदर्शन का मौक़ा नहीं मिलेगा ।

मित्रो, इन तमाम प्रसंगों को हम आधुनिकता और लोकतंत्र के दायरे में संभावित परिवर्तनों के ठोस रूप कह सकते हैं जो हमें किसी भी अर्थ में असंभव प्रतीत नहीं होते हैं। इस मामले में लातिन अमेरिका के वामपंथी दलों के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। सोवियत संघ और समाजवादी शिविर के पतन के बाद उन देशों में वामपंथ एक नये लोकतांत्रिक रूप में सामने आया है। 

हमारे देश में,  2008 के पंद्रहवीं लोक सभा चुनाव में, जब आजाद भारत के इतिहास में वामपंथी दलों को सबसे कम सीटें मिली थी, हमने एक लंबा नोट तैयार किया था - भारतीय वामपंथ के पुनर्गठन की एक प्रस्तावना : विचार के कुछ बुनियादी नुक्तें । अपने इस लेख का अंत अपने उसी नोट की कुछ बातों के उल्लेख से करना चाहेंगे। 

उस नोट में सोवियत संघ के अनुभव और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में किये गये भूमि सुधार और पंचायती राज के अनुभवों की पृष्ठभूमि में कहा गया था कि ‘‘ ग्रामीण सत्ता-संरचना में परिवर्तन जनतंत्र के बाकी कार्यभारों को तेजी से उभार कर सामने लाता है। इनमें शहरीकरण और औद्योगीकरण के प्रश्न भी शामिल है। इन प्रश्नों के आर्थिक पहलू के अलावा व्यापक सांस्कृतिक पहलू भी है, जिन्हें आधुनिक जीवन की नैतिकता की समस्याएं कहा जा सकता है। इन समस्याओं का समाधान ग्रामीण ‘मौन क्रांति’ की प्रभुत्व शैली (hegemony) से हासिल नहीं किया जा सकता है। यह जनता के व्यापक समर्थन पर टिकी हुई पूंजीवादी जनतांत्रिक व्यवस्था में रहते हुए एक जन-क्रांतिकारी रणनीति को तैयार करने की समस्या है। राजसत्ता के दमनकारी उपायों से इस व्यवस्था के लिये जनता के व्यापक हिस्सों का समर्थन हासिल नहीं किया गया है। बनिस्बत घुमा कर कहे तो कहा जा सकता है कि लोगों का बड़ा हिस्सा चीजों को चलाने की उस प्रणाली से खुश है, जिस प्रणाली पर पूंजीपति वर्ग उन्हें चलाना चाहता हैं। 

“इसीलिये वामपंथियों के सामने इस खास जनतांत्रिक नैतिकता के निर्वाह के साथ क्रांतिकारी विकल्प तैयार करने की समस्या है। और, गौर करने लायक बात यह है कि आधुनिक जीवन की जनतांत्रिक नैतिकता के ऐसे ही तमाम प्रश्न हैं जिनके सही समाधान में असमर्थ विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन आज तक पूंजीवादी जनतंत्र की चुनौतियों के सामने लचर दिखाई पड़ता है। इटली के कम्युनिस्ट विचारक ग्राम्शी ने अपने प्रभुत्व सिद्धांत के तहत योरोपीय परिस्थितियों में कम्युनिस्टों के प्रमुख कार्यभारों में विचारधारात्मक और नैतिक स्तर पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने की जिस चुनौती की बात कही थी, यूरोकम्युनिज्म से लेकर फ्रांस के ‘60 के दशक के कैम्पस विद्रोह तक की सारी कोशिशों का मूल सार किसी न किसी रूप में इन्हीं प्रश्नों का उत्तर हासिल करना था। ये जनतंत्र की नैतिक चुनौतियां है। सभ्य समाज के इन नैतिक प्रश्नों को ऐसे ही दरकिनार नहीं किया जा सकता है।“ 

“खुद मार्क्स ने सारा जीवन जनतंत्र और स्वतंत्रता के इन्हीं मूल्यों के लिये संघर्ष किया। मसलन, अखबारों की स्वतंत्रता की बात को ही लिया जाए। मार्क्स ने लिखा था, अखबारों की स्वतंत्रता की अनुपस्थिति अन्य सभी स्वतंत्रताओं को कोरा भ्रम बना देती है। स्वतंत्रता का एक रूप ठीक वैसे ही दूसरे को शासित करता है जैसे शरीर का एक अंग दूसरे को करता है। जब भी किसी एक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाया जाता है तो स्वतंत्रता के सामान्य रूप पर प्रश्न उठा दिया जाता है। जब स्वतंत्रता के एक रूप को खारिज किया जाता है तो सामान्य तौर पर स्वतंत्रता को ही खारिज कर दिया जाता है। मार्क्स के लेखन में जनतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा के ऐसे असंख्य उदाहरण मौजूद है।“ 

इस प्रकार, कम्युनिस्ट आंदोलन, मजदूर वर्ग, समाजवाद के ‘आधुनिकता के प्रकल्प’ और लोकतांत्रिक ढांचे में गैर-बराबरी को दूर करने की लड़ाई की इस लंबी चर्चा के उपरांत,  हम नहीं समझते कि ‘आधुनिकता, लोकतंत्र और राष्ट्र निर्माण’ के विषय में वामपंथी परिप्रेक्ष्य से और ज्यादा कुछ कहने के लिये शेष रह जाता है। आधुनिकता के प्रकल्प की विफलताओं ने हमारे देश में दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा दिया है। इसका मुकाबला सभी प्रगतिशील और जनतांत्रिक ताकतों को एकजुट होकर करना होगा और आधुनिकता के प्रकल्प को सामाजिक गैर-बराबरी को दूर करने के लक्ष्यों से अभिन्न रूप में जोड़ना होगा। राष्ट्र के निर्माण का दूसरा कोई रास्ता नहीं हो सकता। संघ परिवार का रास्ता राष्ट्र की संपूर्ण तबाही का रास्ता है, जिसे हम पूरे मध्यपूर्व में आज साक्षात रूप में देख सकते हैं। 

इसके अतिरिक्त, क्रांतिकारिता की सारी बातें महज बातें हैं। इनके बारे में बस यही कह सकते हैं - 

आह का किसने असर देखा है
हम भी इक अपनी हवा बांधते हैं।










1-‘बेरोजगारी की प्राकृतिक दर’ - अमेरिका के नोबेलजयी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रेडमैन और एडमंड फेल्फ्स की सैद्धांतिक समझ कि यदि बेरोजगारी एक सीमा से कम होती है तो इससे कीमतों और मजदूरी में वृद्धि होती है जो भविष्य की उम्मीदों को  अस्थिर करती है। आज उपभोग को कम करके भौतिक और मानवीय पूंजी में यदि निवेश करते हैं तो इससे भावी पीढ़ी को लाभान्वित किया जा सकता है।