गुरुवार, 12 मार्च 2015

वित्त आयोग की आड़ में केंद्र का स्वेच्छाचार


अरुण माहेश्वरी



इस 9 मार्च को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। उनकी मुलाकात के राजनीतिक उद्देश्यों को लेकर ढेर सारे कयास लगाये जा रहे हैं, लेकिन इसका घोषित उद्देश्य प्रधानमंत्री को पश्चिम बंगाल की संकटजनक वित्तीय स्थिति से परिचित कराना तथा उसके समाधान के लिये केंद्र से अतिरिक्त सहायता प्राप्त करना था।

इस मुलाकात के बाद ममता बनर्जी ने एक संवाददाता सम्मेलन में सिर्फ इतना कहा कि प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल सरकार की आर्थिक पहलकदमियों की प्रशंसा की है। उन्होंने पश्चिम बंगाल को किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा देने के बारे में कोई आश्वासन दिया है या नहीं, इसके बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया। दूसरे सूत्रों के हवाले से अखबारों के जरिये पता चला कि प्रधानमंत्री ने उनसे यह भी कहा कि 14वें वित्त आयोग ने पश्चिम बंगाल को 13वें वित्त आयोग की सिफारिश की तुलना में लगभग 20500 करोड़ रुपये की जो अतिरिक्त राशि के अंतरण की सिफारिश की है, उसके अलावा वे और कुछ नहीं कर सकते हैं। उनकी दलील थी कि और कुछ भी करने से दूसरे राज्य भी इसी प्रकार की मांगों को उठाने लगेंगे। केंद्र और राज्यों के बीच बांटने लायक कर राजस्व के 42 प्रतिशत हिस्से को सीधे राज्यों के सुपुर्द कर देने के बाद केंद्र के हाथ बंध चुके हैं।

बहरहाल, यह एक असमंजस की स्थिति है। वित्त आयोग की सिफारिशों से ऊपरी तौर पर तो लगेगा कि केंद्र ने पहले की तुलना में अपने कर राजस्व का बड़ा हिस्सा राज्यों को सौंप दिया है। लेकिन, वास्तव में इससे राज्यों की वित्तीय स्थिति पर क्या असर पड़ने वाला है, इसका किसी को कोई साफ अनुमान नहीं है। 14वें वित्त आयोग ने देश के दूसरे वित्तीय संकट में पड़े हुए पूर्वी राज्य बिहार को भी 13वें आयोग की सिफारिश की तुलना में लगभग 11500 करोड़ रुपये अतिरिक्त देने की सिफारिश की है। लेकिन पिछड़े हुए क्षेत्र को मिलने वाले अनुदान के खत्म होने और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा न दिये जाने की स्थिति में बिहार पर इसका कुल मिला कर क्या असर पड़ेगा, यह विचार का विषय है।

14वें वित्त आयोग की इस रिपोर्ट पर आयोग के एक सदस्य प्रोफेसर अभिजीत सेन ने अपनी असहमति दर्ज करायी है। असहमति के अपने नोट में उन्होंने बताया है कि इस आयोग ने अतीत की रिपोर्टों की तुलना में पांच मामलों में एक भिन्न रास्ता अपनाया है। पहला यह कि केंद्र के कर राजस्व के आबंटन की राशि में काफी वृद्धि की गयी है। दूसरा, राज्यों के घाटे के लिये दिये जाने वाले अनुदान को कूतने में योजनाबद्ध राजस्व खर्च को शामिल किया गया है। तीसरा, राज्यों के बीच ‘विशेष दर्जा प्राप्त’ और ‘अन्य’ के फर्क को खत्म कर दिया है। चौथा, राज्यों को दिये जाने वाले अनुदानों के साथ अक्सर जिस प्रकार की अनेक शर्तें जुड़ी होती थी उस परिपाटी को खत्म किया गया है। और पांचवा, एक प्रकार के ‘सहकारी संघवाद’ को हासिल करने और वित्तीय नियमों की बेहतर ढंग से निगरानी के लिये कुछ सांस्थानिक व्यवस्थाओं की सिफारिशें की गयी है। इससे राज्यों को पहले की तुलना में बिना किसी शर्त के ज्यादा कोष उपलब्ध हो पायेगा।

अभिजीत सेन को इन बातों से कोई आपत्ति नहीं है। उनका सिर्फ यह कहना है कि इन प्रस्तावों से केंद्र द्वारा राज्यों को योजना की मद में मिलने वाले अनुदान पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। केंद्र को अपनी कई कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करनी पड़ेगी। पिछड़े हुए क्षेत्रों को मिलने वाले अनुदान में भी कटौती हो सकती है, जिसका सीधा असर बिहार पर भी पड़ेगा।

अभिजीत सेन ने कहा है कि चूंकि राज्यों की यह धारणा होती है कि वित्त आयोग की सिफारिशों से केंद्रीय योजना की मद में आने वाले पैसों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, इसीलिये  इस बात की आशंका है कि आने वाले समय में सभी राज्यों को अचानक ही परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि केंद्र कभी भी बजट में योजना की मद में घोषित परिव्यय में कटौती कर सकता है। आज ममता बनर्जी द्वारा केंद्र से और सहायता की दरख्वास्त करने और केंद्र द्वारा यह कहने में कि उसने पहले ही काफी ज्यादा दे दिया है जो एक प्रकार की अस्पष्ट सी स्थिति दिखाई देती है, उसके पीछे मूल कारण यही है कि केंद्र के कर राजस्व के राज्यों के बीच बंटवारे के मामले में अभी भी कई ऐसे बिंदु है, जिनके बारे में स्थिति बहुत भ्रामक है।

दरअसल, भारत में केंद्रीय कर राजस्व को राज्यों के बीच वितरण की अब तक दो प्रमुख एजेंशियां काम करती रही है - योजना आयोग और वित्त आयोग। योजना आयोग एक स्थायी निकाय रहा है जो राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को निर्धारित करने के साथ ही उन लक्ष्यों की पृष्ठभूमि में केंद्रीय सहायता प्राप्त योजनाओं का खाका तैयार करके उन पर अमल के लिये राज्यों को वित्त मुहैय्या कराता था। इसीलिये इसकी सिफारिशें गतिशील और कुछ पूर्वधारणाओं पर आधारित हुआ करती थी। केंद्रीय कर राजस्व का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा योजना आयोग के जरिये ही राज्यों के पास पहुंचता था। अब मोदी सरकार के आने के बाद इस आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन किया गया है। यह नीति आयोग केंद्र के कर राजस्व के आबंटन में कोई भूमिका अदा करेगा या नहीं ; यदि करेगा तो किस प्रकार करेगा, ये सारी बातें अभी स्पष्ट नहीं है। ऊपर से, 14वें वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार राज्यों को गैर-योजना मद में 42 प्रतिशत तक की राशि दिये जाने के कारण योजना की मद में अनुदानों के मामले में केंद्र सरकार दिक्कत में है। 2015-16 के केंद्रीय बजट में भी इसका असर दिखाई दिया है, जिसमें कई ग्रामीण विकास योजनाओं की मद में लागत को कम किया गया है।

बहरहाल, सन् 1983 में जब केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिये न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में सरकारिया आयोग का गठन किया गया था, उसकी पृष्ठभूमि यह थी कि (1) राज्य सरकारें सिर्फ प्रशासनिक एजेंशिया बन कर रह गयी है। विधायी, प्रशासनिक, और वित्तीय क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक केंद्रीकरण से राज्यों को हानि हुई है। (2) अधिकांश समवर्ती विषयों पर केंद्र का अधिकार कायम होगया है, राज्यों के लिये कुछ नहीं रह गया है। एक प्रकार की निरर्थक एकरूपता को बनाने की कोेशिश हो रही है। (3) राज्यों के संसाधनों में उस दर से वृद्धि नहीं हुई है जिस दर से उनकी जिम्मेदारियों में वृद्धि हुई है। साधनों और दायित्वों के बीच अंतराल बढ़ता जा रहा है। (4) योजनाबद्ध विकास से केंद्र के हाथ मजबूत हुए है। (5) नियंत्रण, लाइसेंस-परमिट की प्रणाली के कारण ऐसे केंद्रीकरण का आविर्भाव हुआ जिसमें मुट्ठी भर लोगों को अनावश्यक शक्ति प्राप्त हो जाती है। इनके अलावा, इस पृष्ठभूमि में केंद्र द्वारा राज्यपालों का बेजा इस्तेमाल करने की तरह के शुद्ध राजनीतिक सवालों का भी एक पहलू था।

सरकारिया आयोग की इस रिपोर्ट में केंद्र और राज्यों के बीच के वित्तीय संबंधों पर भी एक अध्याय है। उसमें साफ कहा गया था कि ‘‘वित्तीय संसाधन जुटाना, उनकी भागीदारी एवं उपयोग सरकार की बहुस्तरीय व्यवस्था में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और यदि इसे आपसी समझदारी तथा मेल-मिलाप की भावना से न सुलझाया गया तो इससे अंत:सरकारी संबंधों की कठिन समस्या पैदा होजाती है।’’ सरकारिया आयोग ने इस बात को नोट किया था कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच करों, उधार लेने तथा परिव्यय के संबंध में समवर्ती शक्तियां हैं। इसी में प्राय: गंभीर आर्थिक और प्रशासनिक समस्याएं उत्पन्न होती है जिन्हें मुश्किल बातचीत, समझौतों के माध्यम से निपटाना होता है, अन्यथा न्यायपालिका का सहारा लेना पड़ता है।

सन् 1983 में गठित इस आयोग की रिपोर्ट 1988 में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद के इन 27 सालों में दुनिया काफी बदल गयी है। 1991 के बाद के उदारतावादी दौर में, जब क्रमश: यह साफ होने लगा कि विकास के कामों में सरकार प्रत्यक्ष रूप में ज्यादा शामिल नहीं होगी और निजी क्षेत्र के जरिये ही निवेश को हासिल करना होगा, देश के सभी राज्यों के बीच निजी निवेश को लुभाने के लिये करों में नाना प्रकार की छूट देने की होड़ शुरू होगयी। राज्यों के बीच इस कर-युद्ध के चलते राज्यों की आय में क्रमश: अपेक्षाकृत गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ और राज्य सरकारें अपने खर्च चलाने के लिये ज्यादा से ज्यादा उधार पर आश्रित होने लगी। निवेश को लुभाने के लिये न जाने कितना रुपया बर्बाद होगया, लेकिन अंत में देखा यह गया कि जिन राज्यों में पहले से ही इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित था, उन्हीं में ज्यादा से ज्यादा निजी निवेश भी हुआ और उन्हीं राज्यों को बहु-स्तरीय सरकारी सहायता भी सबसे ज्यादा मिली।

सरकारिया आयोग की रिपोर्ट के शुरू में ही भारत में संध और राज्य की द्वि-स्तरीय सरकार की व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा गया था कि वास्तविकता में हमारे यहां संविधान का स्थायी स्वरूप नहीं है। वह बदलते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश से प्रभावित होता है और उसीमें लगातार एकता और विविधता के बीच संतुलन को बनाये रखने के लिये प्रयत्नशील रहता है। यह शासनप्रणाली इतनी गतिशील है कि इसमें तमाम नियंत्रणों और संतुलनों के बावजूद केंद्र और राज्यों के बीच अनेक समस्याएं और मतभेद उत्पन्न होते हैं। राष्ट्र की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाती है। इसीलिये ‘‘यह जरूरी होता है कि केंद्र-राज्य संबंधों की समय-समय पर समीक्षा की जाए ताकि सहयोगी प्रयास की भावना से प्रेरित समाज कल्याण के लक्ष्य को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके।’’

इन तमाम कारणों से केंद्र और राज्यों के बीच पैदा होने वाले वित्तीय असंतुलनों को दूर करने में वित्त आयोग से भी कहीं ज्यादा योजना आयोग की भूमिका हुआ करती थी। वह अनुदानों  की राशि को तय करने में राज्यों की आबादी, क्षेत्रफल, प्रतिव्यक्ति आय की शक्ति और वित्तीय अनुशासन, इन सब पहलुओं को ध्यान में रखता था जबकि वित्त आयोग सिर्फ क्षेत्रफल का संज्ञान लेता है। आज हमारे राजनीतिक क्षेत्र में इस विषय पर जो धुंधलका दिखाई देरहा है, उसके मूल में यही है कि योजना की मद मंे होने वाले खर्च में कटौती का राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, इसका अभी कोई भी सही-सही अनुमान नहीं लगा पा रहा है।

इतिहास का व्यंग्य देखिये कि एक समय में सरकारिया आयोग ने यह नोट किया था कि योजनाबद्ध विकास की अवधारणा ने राज्यों की तुलना में केंद्र के पक्ष में संतुलन को बिगाड़ा है। और आज चिंता इस बात की की जारही है कि योजना की मद में कमी से भारत के संतुलित और समान विकास का मार्ग बाधित होगा। लोगों ने योजना के साथ जुड़े लाइसेंस-परमिट राज की बुराई को देखा था। अब लोग निजी निवेश को आकर्षित करने के लिये कर-युद्ध के दुष्परिणामों को भोग रहे हैं; संतुलित राष्ट्रीय विकास के लिये केंद्रीय योजना मद में खर्च में कमी घातक दिखाई दे रही है। यह स्थिति तब और भी चिंताजनक होजाती है जब नीति आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष अरविंद पानगढि़या वित्त आयोग की सिफारिशों को मान लेने के लिये प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, लेकिन योजना की मद में खर्च में कटौती को लेकर जरा भी विचलित नहीं है। इसी से पता चलता है कि नीति आयोग का गठन योजना आयोग की हत्या करके किया गया है। जिन्हें भ्रम है कि नीति आयोग कमोबेस वही काम करेगा जो योजना आयोग किया करता था, वह बहुत जल्द ही दूर हो जायेगा। और यदि ऐसा होता है तो यह राज्यों तक केंद्रीय राजस्व के अंतरण की एक महत्वपूर्ण एजेंशी की हत्या होगी, जो राज्यों के आर्थिक स्वास्थ्य के लिये एक बुरी खबर है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वित्त आयोग की सिफारिशों के पीछे के रहस्य को बिल्कुल सही पकड़ा है। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इसका कड़ा विरोध किया है और साफ कहा है कि केंद्रीय कर राजस्व के अंतरण में 10 प्रतिशत की वृद्धि दिखावटी है और इससे बिहार को लाभ नहीं, हानि होगी। बिहार के विभाजन के बाद  पिछड़े हुए क्षेत्र और गाडगिल-मुखर्जी सूत्र के अनुसार उसे जो अतिरिक्त लाभ मिल रहे थे, उन्हें इसकी आड़ में खत्म कर दिया गया है। सचाई यह है कि 13वें वित्त आयोग की तुलना में केंद्रीय कर राजस्व में बिहार का हिस्सा 1.3 प्रतिशत कम होगया है। इस मामले में पश्चिम बंगाल और झारखंड के हिस्से में बहुत मामूली क्रमश: .078 और .337 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन योजना की मद में होने वाली कटौती के नुकसान को देखते हुए यह नहीं के बराबर ही है।

नरेन्द्र मोदी अपने चुनाव अभियान के दौरान पूर्वांचल के सभी प्रदेशों में दहाड़ते हुए यह वादा कर रहे थे कि वे विकास के मामले में भारत के पूरबी और पश्चिमी हिस्से के बीच के फर्क को खत्म कर देंगे। लेकिन उनकी सरकार के कदमों में तो उनके इस वादे की कोई छाप नहीं दिखाई देती है। पूर्वांचल की वंचना के इतिहास को उलटने का कोई संकेत नहीं है। इस मामले में मोदी सरकार का रुख वैसा ही है जिसके बारे में सरकारिया आयोग की रिपोर्ट में यह कटुक्ति की गयी थी कि ‘‘‘‘राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग सत्ता में होते हैं उन्हें राज्य स्तर की शक्तियों पर अपना नियंत्रण बनाये रखने के लिए ऐसी विरोधी नीतियों और उक्तियों को विवश होकर अपनाना पड़ता है जो सदैव राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों के प्रतिकूल होती है।’’ जाहिरा तौर पर अगर केंद्र का यही रुख जारी रहा तो आने वाले समय में फिर एक बार राष्ट्र की एकता और अखंडता के हित में नये सिरे से केंद्र-राज्य संबंधों की गहराई से समीक्षा की जरूरत पड़ेगी।  








सोमवार, 9 मार्च 2015

अंग्रेज शासकों का जैविक व्यवहार

अरुण माहेश्वरी


(सालों पहले, उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ पर एक नोट लिखा था, जिसका बाद में कभी प्रयोग नहीं किया जा सका। आज अचानक हमारे कमप्यूटर पर वह नोट हमें मिल गया। आज ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रसंग में इच्छा हो गयी कि क्यों न इस नोट को साथियों के साथ साझा किया जाए। अंग्रेज व्यापारियों और शासकों के सामान्य जैविक व्यवहार को इस नोट में समझने की एक छोटी सी कोशिश की गयी है। बाद में कभी किसी लेख में इसका सही रूप में इस्तेमाल किया जायेगा। )


वारेन हेस्टिंग्स का सांड़। उदय प्रकाश की बहुचर्चित कहानी। चार साल पहले ‘इंडिया टुडे’ के साहित्य अंक में जब यह छपी थी, पूरा हिंदी जगत इसकी बुनावट पर अचंभित हुआ था। भारत में औपनिवेशिक शासन के शुरू के समय के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के कथित प्राच्य प्रेम की कहानी पर केंद्रित यह कहानी कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में लगी उस तस्वीर से जुड़ी कल्पनाओं से उपजी थी जिसमें हेस्टिंग्स अपनी युरोपीय बीबी के साथ अकड़ कर खड़े हैं और बीबी के बगल में खड़ी नेटिव लड़की चोखी अपनी सहजता से अनायास ही किसी का भी ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। लाट गवर्नर और उनकी बीबी के साथ चोखी की इस सहजता को देख कर लेखक चोखी को हेस्टिंग्स के ‘प्राच्य प्रेम’ और अंग्रेज अफसरानों की भारतीय मिस्ट्रेस की आम बात से जोड़ देता है और एक ऐसा किस्सा तैयार होता है जो पाठकों को प्राय: एक प्रकार के सम्मोहन में बांधने के साथ ही औपनिवेशिक शासन और उसके प्रतिरोध की समस्या के कई गहरे और बहसतलब विषयों को उठा देता है।

‘हंस’ के पृष्ठों पर राजेन्द्र यादव ने इस कहानी में गाय प्रजाति के सांड़ के रूपक से उपनिवेशवाद के प्रतिरोध में प्राच्यवाद की हिंदुत्ववादी अवधारणा को स्थापित करने का आरोप लगाते हुए जो बहस शुरू की थी, वह भी ऐसी ही एक बहस का मुद्दा था। दिल्ली में हाल के राष्ट्रीय नाट्य-उत्सव के अवसर पर इसी कहानी पर ‘अस्मिता’ नाट्यमंडली के नाटक को देख कर लगा कि इस नाटक ने इस प्रकार की बहस की संभावना को और भी ज्यादा मूर्त कर दिया है। खास तौर पर आज के राजनीतिक परिवेश में इस कहानी के वास्तविक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को पकड़ने में जरा सी चूक करने पर ही इसपर हिंदुत्व के विचारों की छाया का अभियोग आराम से लगाया जा सकता है। इसलिये यह जरूरी जान पड़ा कि इस कहानी और नाटक के बहाने ही इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का जायजा लिया जाये और देखा जाये कि इस कहानी में कितना कुछ ऐतिहासिक तथ्यों का दुहराव है और कितना उदय प्रकाश की कल्पना का योगदान है? तभी उदयप्रकाश के अपने आशय और विचारधारा पर भी कोई सही राय दी जा सकेगी।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि वारेन हेस्टिंग्स ने उन प्राच्यवादियों को काफी बढ़ावा दिया था जो उन दिनों भारत के इतिहास, यहां के आम लोगों के रीति-रिवाजों, और स्थानीय भाषाओं को सीखने के काम में लगे हुए थे। प्राच्य-विद्या के क्षेत्र में उसी समय से काफी महत्वपूर्ण काम शुरू हो गये थे। वारेन हेस्टिंग्स औपनिवेशिक प्रशासन का ‘भारतीयकरण’ करना चाहता था ताकि यहां के गुलाम लोगों की मानसिकता को समझा जा सके और औपनिवेशिक नीतियों के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं का सही अंदाजा लगाया जा सके, और अचानक किसी भी व्यापक अव्यवस्था के खतरे से औपनिवेशिक शासन को बचाया जा सके। इसे वह भारत में अंग्रेजों के शासन के स्थायित्व के लिये जरूरी मानता था। अंग्रेज इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि वे भारत की तरह के इतने बड़े देश पर शासन करने के लिये संख्या की दृष्टि से ही बेहद कमजोर स्थिति में हैं। कहते हैं कि लार्ड क्लाइव जब प्लाशी के युद्ध के ठीक बाद बंगाल की राजधानी मुर्शीदाबाद में घुसा था तो उसे सिर्फ मुर्शीदाबाद शहर का विशाल आकार और यहां के लोगों की समृद्धि ने ही आकर्षित नहीं किया था, बल्कि वह यहां की इतनी बड़ी आबादी को देख कर यह सोच कर  चिंतित था कि यदि यह विशाल जन-समुदाय ठान लें कि भारत से युरोपियनों का अंत करना हैं तो वे यह काम सिर्फ पत्थरों और डंडों के बल पर ही कर सकते हैं। लेकिन फिर भी यहां के लोगों ने ऐसा क्यों नहीं किया, यह एक ऐसा सवाल है जिस पर काफी बहस हो सकती है। लेकिन यह सच है कि भारत में अपने पैर जमाने की प्रक्रिया में अंग्रेजों को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। इस मामले में सिर्फ इतना कह देना काफी नहीं हो सकता कि सात समुंदर पार से एक विकसित सभ्यता और संस्कृति ने एक पिछड़ी हुई सभ्यता और संस्कृति पर वर्चस्व कायम कर लिया। सभ्यता पर सभ्यता की विजय इतनी इकतरफा और सरलरेखीय नहीं हो सकती है।

डेविड कॉफ ने अपनी किताब ‘ब्रिटिश ओरियंटलिज्म एंड द बेंगोल रिनैसांस - द डायनामिक्स ऑफ इंडियन मौडर्नाइजेशन’ में लिखा है कि भारत में अंग्रेजों के वाणिज्य के शुरूआती दिनों में अन्य व्यापारिक समुदायों की तरह ही अंग्रेज भी स्थानीय भाषाओं को सीखते थे, कुछ स्थानीय जीवन शैली को अपना लेते थे, मसलन हुक्का पीना या धोती और कुर्ता पहनना और कुछ मामलों में तो यहां की औरतों से शादी भी कर लेते थे।(पृ:15) कोलकाता के निर्माता के रूप में जाने जाने वाले जाब चार्नोक का एक चित्र कोलकाता के बारे में एचईए कॉटन की किताब में मिलता है जिसमें चार्नोक एक पीपल के पेड़ के नीचे हुक्का लिये हुए पायजामा पहने बैठकखाना बाजार के अपने व्यापारी दोस्तों के साथ बतिया रहे हैं। उन्होंने एक बंगाली विधवा से शादी की थी, जिसके बारे में कहते हैं कि चार्नोक उसे जलती हुई चिता से बचा कर लाये थे और उससे उन्होंने तंत्र विद्या सीखी थी। अन्य अनेक परिवारों की तरह ही घरेलू मामलों में उनकी पत्नी ही महत्वपूर्ण फैसले किया करती थी। चार्नोक कंपनी के कामों में व्यस्त रहता था।
कहने का तात्पर्य यह है कि मानवीय जीवन-व्यापारों से जुड़ा सारा मामला ऐसा नहीं होता कि ‘वे आये, देखा और जीत लिया’। व्यक्ति जीवन और शासन की नीतियां, दोनों की ही कईं तहें होती है। यह बात आर्थिक तत्व की नियामकता को स्वीकार कर भी कही जा सकती है और यही से वे सारे किस्से पैदा होते हैं जो ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ की तरह की कहानी के रूप में सामने आते हैं।
मसलन, एक मामले में अंग्रेजों के शासन और अफगान तुर्कों के शासन में अनोखा साम्य दिखाई पड़ता है। ये दोनों ही भारत की तरह के विशाल देश में अपनी नगण्य संख्या की सचाई से अच्छी तरह परिचित थे। भारत को जीत तो इन्होंने काफी आसानी से लिया, लेकिन असल समस्या यहां शासन करने की थी। यह चीज तब तक मुमकिन नहीं थी जब तक गुलाम बनायी गयी आबादी के प्रभावशाली तबकों के साथ उनका कोई गठजोड़ कायम नहीं होता। इसीलिये अफगान तुर्कों ने जिस तरह यहां की आबादी के धर्मांतरण को अपने शासन का प्रमुख मुद्दा नहीं बनाया उसी प्रकार अंग्रेजों ने भी ऐसा नहीं किया। शासन के अंदर  के कुछ लोगों का मत भले ही ऐसा रहा हो, लेकिन मोटे तौर पर इन साम्राज्यों ने स्थानीय धर्म और रीति-रिवाजों के साथ जोर-जबर्दस्ती करने से बचने का रास्ता ही चुना था। यद्यपि प्रकारांतर से वे हमेशा यह कोशिश जरूर करते रहे कि यहां की आबादी में शासकों की तुलना में एक प्रकार की हीन ग्रंथी को भरा जाए। इसके साथ ही स्थानीय लोगों से अपने संपर्क सूत्र के तौर पर यहां के समाज के ही एक वर्ग को तैयार भी करते रहे, और स्थानीय आबादी को धर्म, जाति आदि के नाम पर बांट कर रखते रहें, ताकि वह कभी भी औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ एकजुट न हो सके। इसलिये यदि मुगलों ने गोवध पर रोक को मान लिया था तो अंग्रेज भी उसी नीति पर चलते रहें। इसीलिये यदि किसी रचना या निबंध में इस तथ्य को बताया जाता है कि अंग्रेजों ने यहां गोवध पर रोक को मान लिया था या अन्य किसी प्रथा, मान्यता या रीति-रिवाज को छेड़ा नहीं था तो सिर्फ इसी बात से इन सारी मान्यताओं और विश्वासों का औचित्य प्रमाणित नहीं हो जाता। कुछ हद तक औचित्य तो तब प्रमाणित होता जब ऐसी मान्यताएं और विश्वास ब्रिटिश जीवन के अंग बन गये होते। अफगान तुर्कों और अंग्रेजों ने भारत के लोगों के परंपरागत जीवन को काफी हद तक अछूता छोड़ने का निर्णय लिया तो सिर्फ इसलिये कि वे इन मामलों में दखलंदाजी से पैदा होने वाली व्यापक अव्यवस्था से आतंकित थे और यहां की आबादी की तुलना में अपनी अतिअल्प संख्या पर विचार करके ही ऐसे किसी जोखिम को उठाने के लिये तैयार नहीं थे। यहां सती प्रथा और बाल विवाह के बारे में अंग्रेजों द्वारा कानूनी कदम उठाने के इतिहास पर भी गौर किया जा सकता है। जो लोग इन मामलों में राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारा हिंदू समाज के अंदर ही चलाये गये शास्त्रार्थ के इतिहास से परिचित है वे आसानी से इस निष्कर्ष पर पंहुच सकते है कि लार्ड बेंटिक ने सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाने का जोखिम तभी उठाया जब उसे इस बात का पूरा भान हो गया कि स्थानीय मान्यताओं और शास्त्रों के आधार पर भी उस कानून की पुष्टि होती है।

वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ के संदर्भ में इस पूरी चर्चा से तात्पर्य यही है कि जब इसमें गोवध पर रोक की बात को शासक की प्रशंसा के तौर पर कहा जाता है तो यह एक अल्पसंख्यक शासक तबके की नीतियों को पेश करने वाले सिर्फ एक ऐतिहासिक तथ्य का बयान होता है न कि गोवध या इसी तरह के विषयों पर पारंपरिक विश्वासों को दी गयी लेखक की स्वीकृति। इस बात को समझने में असमर्थ दर्शक या पाठक कथा के मर्म को पकड़ने में निश्चित तौर पर चूकेगा।
इसी प्रकार हेस्टिंग्स की कृष्ण भक्ति, गीतगोविंद के पदों से मस्त चोखी के साथ उसकी केलियों को मालिक के बेटे की किशोर वय की सहजताओं से जोड़ कर देखा जाना चाहिये, न कि भारत की धरती, यहां के हवा-पानी में समाये अनोखे विस्मयों की गाथाओं की स्वीकृति के रूप में। यदि ऐसा नहीं होगा तो कल्पनाओं के घोड़ों पर सवार जवान हसरतों की अनूठी बातों का कही भी कोई मायने नहीं रह जायेगा। जिस हेस्टिंग्स की मसे भी अभी नहीं फूटी थी, वह हमउम्र नेटिव लड़की के आकर्षण में कृष्ण सज कर बांसुरी बजाता फिरे तो क्या आश्चर्य है? यह दीगर है कि गोरे छोकड़े का ही यह व्यवहार दासों को इसलिये आह्लादित करता है क्योंकि वे मालिक के बेटे से ऐसे सहज मानवीय व्यवहार की उम्मीद जो नहीं करते थे। यही दासवृत्ति आज तक हमारे पाठकों और दर्शकों के मानस को विकृत किये हुए है। वर्ना जहां हेस्टिंग्स अथवा चोखी भी किशोर वय के दायरे के बाहर जाते हैं उनके व्यवहारों की उस निश्छलता को गायब होते जरा भी देर नहीं लगती है। दोनों अपनी सीमाओं और अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं। युवा से प्रौढ़ हो चुका गवर्नर जनरल हेस्टिंग्स तो किसी भी अन्य शासक जितना ही निष्ठुर, स्वार्थी और कपटी होता है। उसका ‘प्राच्य प्रेम’ चोखी या  उसकी संगत की देन नहीं था, जैसा कि हमने शुरू में ही कहा, वह एक अति-अल्पमत वाले शासकवर्ग की शुरू के दिनों की नैसर्गिक आवश्यकता थी।
जो भी हो, कहानी के इस किशोर-वय के प्रेम के अतिरिक्त दूसरे कई ऐसे पहलू है जो ब्रिटिश शासकों की खास मानसिकता के पक्षों को उजागर करती है। मसलन, अंग्रेज अधिकारियों का आम सेक्स व्यवहार। यह इतिहास है कि भारत में अंग्रेजों के काफी पहले ही पोर्तुगीज आकर बस गये थे। पोर्तुगीज लोगों के बारे में यह अनुभव था कि स्थानीय लोगों के साथ सेक्स संबंधों को बनाने के मामले में वे काफी बेपरवाह थे और इसी के चलते काल-क्रम में यह देखा गया कि वे अपने रूप-रंग और सामान्य आदतों के मामलों में भी स्थानीय लोगों से प्राय: एकाकार हो गये थे। उनकी अलग पहचान ही खत्म हो गयी थी। इसीलिये अंग्रेज अफसरों को यह खास हिदायत थी कि वे अपने सेक्स व्यवहार को नियंत्रण में रखे और स्थानीय औरतों के संसर्ग में न आये अन्यथा वे भी भारतीयों की भारी भीड़ में खो जायेंगे, उनका अपना कुछ नहीं रह जायेगा। यही वजह है कि शुरू के दिनों में अंग्रेजों के बीच भी भारतीय पत्नी या रखैल रखने की प्रथा काफी चल पड़ी थी, लेकिन बाद में वे बिलायत से अपनी पत्नियां लाने लगे। केनेथ बाल्हशेत ने अपनी किताब ‘रेस, सेक्स एंड क्लास अंडर राज’ में बताया है कि अंग्रेजों के लिये शासक नस्ल की प्रतिष्ठा का सवाल उनके लिये गंभीर चिंता का विषय बन गया। (पृ:2) बिलायत से लायी गयी बीबियों ने अंग्रेज अधिकारियों को स्थानीय लोगों से सामाजिक तौर और दूर रखने में एक अहम भूमिका अदा की। बाल्हशेत के अनुसार ही 1784 के बाद से यूरेशियनों को सभी महत्वपूर्ण स्थानों से हटाया जाने लगा, क्योंकि  वे (शासक और शासित के बीच) सामाजिक दूरी को खत्म करने का खतरा पैदा करते थे।
एचईए कॉटन की किताब से पता चलता है कि शुरू के लंबे काल तक अंग्रेजों के भारतीय पत्नियां और रखैल हुआ करती थी। अंग्रेज औरतों वाले काफी कम होते थे, और अधिकांश व्यापारियों के भारतीय पत्नियां होती थी और वे अधिकांशत: भारतीय जीवन शैली को अपना लेते थे। कारखाने से लौटने के उपरांत वे चटाई पर बैठ कर भोजन किया करते थे और भारतीय पोशाक पहनते थे।  (पृ:5) लेकिन राजनीतिक सत्ता हासिल करने के बाद बड़े पैमाने पर पत्नियां बिलायत से आने लगी। उनके आने के साथ ही भारतीय बीबियां घरों से हटायी जाने लगी, हुक्का बंद होने लगा और घर पर बिलायती बीबी का कब्जा होने लगा। इसके साथ ही अंग्रेजों की जीवन शैली पूरी तरह से अलग होने लगी जो शासकों की जीवन शैली थी न कि व्यापारियों की।
यदि इस समूची पृष्ठभूमि में वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ का पाठ किया जाये तो उन सभी प्रसंगों का अर्थ खुल जायेगा जो इस कहानी में हेस्टिंग्स और अन्य अंग्रेज अफसरों के व्यवहारों, हेस्टिंग्स की बीबी के रौब-दाब और नेटिव लड़की से प्रेम करने के जुर्म में तबादला कर दिये गये अफसर के प्रसंग साफ  हो जाते है। इसके साथ ही अंग्रेजों के भारतीय संपर्क सूत्र  की सचाई की भी ऐतिहासिकता जाहिर होती है।



   

शनिवार, 7 मार्च 2015

एक और ब्रह्मांड


विश्व महिला दिवस के मौके पर :

रूढि़वादी विचारों से मुक्ति जरूरी है
सरला माहेश्वरी
क्लारा जेटकिन


क्लारा जेटकिन, जर्मनी की विश्व प्रसिद्ध माक्र्सवादी सिद्धांतकार और महिलाओं के हितों की लड़ाई की एक अथक योद्धा। सन् 1911 में उन्होंने ही आठ मार्च के दिन पहले अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का पालन किया था। 8 मार्च 1908 में न्यूयार्क की पंद्रह हजार से भी ज्यादा महिलाओं ने काम की दयनीय परिस्थितियों और पुरुषों की तुलना में कम वेतन के खिलाफ और मताधिकार की मांग पर एक हड़ताल का पालन किया था। प्रथम विश्वयुद्ध की पूर्व संध्या पर सन् 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में समाजवादी महिलाओं के द्वितीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में युद्ध और सैन्यवाद, भूख और गरीबी के खिलाफ कई प्रस्ताव पारित किये गये थे। उसी सम्मेलन के मंच से क्लारा जेटकिन ने ट्रेडयूनियन आंदोलन की दूसरी महिलाओं के साथ मिल कर यह आह्वान किया था कि महिलाओं के खिलाफ जुल्मों के प्रतिरोध के लिये सारी दुनिया में उसी प्रकार अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का पालन किया जाना चाहिए जिस प्रकार 1 मई के दिन अन्तरराष्ट्रीय श्रम दिवस का पालन किया जाता है। उस सम्मेलन ने जेटकिन के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार लिया था, लेकिन तब भी कोई दिन निश्चित नहीं किया गया था।
इसके बाद ही क्लारा जेटकिन ने ही अपनी पहल पर 8 मार्च के दिन के न्यूयार्क की महिलाओं के संघर्ष को याद करते हुए 8 मार्च 1911 को जर्मनी मेंं पहले अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का पालन किया और तभी से दुनिया की इस सबसे अधिक प्रताडि़त आधी आबादी को न्याय दिलाने के लिये संघर्ष के दिन के तौर पर इसे विश्व भर में मनाया जाता है।
सन् 1908 के बाद से अब तक 107 साल पूरे हो चुके हैं। 1908 में न्यूयार्क की महिलाओं ने जिन मांगों के लिये हड़ताल का पालन किया था उनमें समान वेतन की मांग के साथ ही एक प्रमुख मांग थी काम की परिस्थितियों में सुधार की मांग।
इन 107 सालों में गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका है। पहले विश्व युद्ध और दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक दुनिया वह नहीं रही है, जो तब हुआ करती थी। हाल में थामस पिकेटी के दुनिया में सामाजिक गैर-बराबरी के बारे में आए ऐतिहासिक अध्ययन से भी पता चलता है कि तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी अन्य गैर-बराबरियों की तरह ही लैंगिक गैर-बराबरी का ग्राफ भी हमेशा एक सा नहीं रहा है। दुनिया की  राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार इसमें उतार-चढ़ाव दिखाई देता है। जिस दौर में भी दुनिया व्यापक राजनीतिक उथल-पुथल के बीच से गुजरी है, सामाजिक गैर-बराबरी में कमी आई है और जब भी पूंजी का प्रभुत्व बिना किसी बाधा के बढ़ता चला गया है, सामाजिक गैर-बराबरी भी उसी अनुपात में बढ़ती चली गयी है। दोनों विश्व युद्धों और समाजवादी शिविर के उदय और यहां तक कि शीत युद्ध के काल में भी गैर-बराबरी का ग्राफ अबाध रूप से बढ़ा नहीं बल्कि उसमें कुछ कमी या ठहराव आया था। लेकिन इन्हीं अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि आज, 1990 के बाद के एकध्रुवीय विश्व की इस चौथाई सदी में आधुनिकता की सारी लंबी-चौड़ी बातों के बावजूद फिर एक बार सामाजिक गैर-बराबरी में तेजी से वृद्धि के खतरनाक संकेत मिलने लगे हैं। जाहिर है कि इसमें लैंगिक गैर-बराबरी के भी तेजी से बढ़ने का खतरा शामिल है।
आज जब हम अपने देश को देखते है तो 107 साल पहले काम की परिस्थितियों की जिस समस्या को न्यूयार्क की महिलाओं ने उठाया था, वह आज भी हमारे देश की कामकाजी महिलाओं के लिये एक सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। काम का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसमें महिलाओं के साथ दुराचार आम बात न हो। अखबारों में रोजाना न्यायपालिका से लेकर पत्रकारिता की तरह के अपेक्षाकृत जागरूक और पवित्र माने जाने वाले क्षेत्रों में भी महिला कर्मचारियों के साथ बदसलूकी की खबरें आती रहती है। कारपोरेट क्षेत्र की तो यह एक सामान्य बीमारी है।
अभी निर्भया कांड और उसके एक फांसी की सजा पाए अपराधी के जिस साक्षात्कार को लेकर संसद और पूरे देश में हंगामा हो रहा है, उसमें भी एक बात खुल कर सामने आरही है कि उस अपराधी ने जो जघन्य बातें कही है, वे कोई नई बातें नहीं हैं। राजनीति से लेकर समाज के दूसरे सभी क्षेत्रों के प्रभावशाली लोग तक स्त्रियों के प्रति उन्हीं प्रकार की बातों को दोहराते हुए पाये जाते हैं। स्त्रियों को एक समय के बाद घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, उन्हें अपनी पोशाक के मामले में सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि इन सबसे पुरुषों को बलात्कार करने की उत्तेजना मिलती है आदि, आदि।  और, इसप्रकार, प्रकारांतर से स्त्रियों को ही उनके बलात्कार के लिये दोषी बताने की दलीलें संसद के अंदर और बाहर, लगभग हमेशा सुनाई देती रही हैं। तमाम प्रकार के धार्मिक संगठनों के नेता तो इस मामले में सबसे अधिक आगे दिखाई देते हैं।
दुनिया के धर्मशास्त्रों में ऐसी अनेक बातें पाई जाती है जो स्त्रियों की स्वतंत्र मानवीय अस्मिता के विपरीत दिखाई देती है। भारत की प्राचीन संहिताओं में तो ऐसे असंख्य उदाहरण भरे हुए हैं। इसीलिये सारी दुनिया में जनतंत्र के विकास के स्तर के एक मानदंड के रूप में स्त्रियों के विकास को माना जाता है। तदनुरूप दुनिया में स्त्रियों की समानता के अधिकारों को लेकर आधुनिक कानूनी प्राविधानों का भी अपना एक पूरा इतिहास है। उस इतिहास के पूरे ब्यौरे में जाने के बजाय यहां हम सिर्फ यही कहना चाहेंगे कि भारत में भी, स्त्रियों की समानता की कानूनी व्यवस्थाओं का समान रूप से एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें भारतीय नवजागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय से लेकर ईश्वरचंद विद्यासागर और नवजागरण के दूसरे सभी पुरोधाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही वजह थी कि भारत स्त्रियों को समान मताधिकार देने वाले दुनिया के देशों की अग्रिम कतार में शामिल दिखाई देता है। गांधीजी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को स्त्रियों के मानवाधिकार के आंदोलन से अभिन्न रूप में जोड़ दिया था।
भारत की स्वतंत्रता और समाज-सुधार के इस गौरवशाली इतिहास के बावजूद आज भी सचाई यही है कि हमारा समाज पुरातन स्त्री-विरोधी रूढि़वादी विचारों से मुक्त नहीं हुआ है। इसी के चलते उस मानसिकता का जन्म होता है, जो निर्भया के बलात्कारी की मानसिकता है। अभी बीबीसी के लिये लेसली उडविन की फिल्म ‘भारत की बेटी’ (इंडियाज डाटर) के संदर्भ में भारत सरकार का जो अविवेकपूर्ण रवैया देखने को मिला, वह भी हमारे समाज पर चरम रूढि़वादी शक्तियों की जकड़ का ही उदाहरण है।
भारत का अनुभव यह है कि पंजाब, हरयाणा की तरह के जो प्रदेश प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से सबसे आगे है, उन्हीं प्रदेशों में स्त्री-पुरुष अनुपात सबसे बुरा है। हाल में ‘वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम’ द्वारा जारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार 2014 की स्त्री-पुरुष अंतर सूचकांक में भारत का स्थान दुनिया के 142 देशों में 114वां है जबकि बांग्लादेश का स्थान 65वां है। सिर्फ एक दशक पहले तक 2006 में भारत का स्थान 96वां था, जो 2010 में गिरकर 112 पर पहुंच गया। वही गिरावट आज तक जारी है।
इकोनोमिक फोरम की इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘आम लोग और उनकी योग्यताएं ही दीर्घकालीन टिकाऊ विकास के प्रमुख चालक होते हैं। यदि उनकी प्रतिभाओं का आधा हिस्सा अविकसित रह जाता है या उसे पूरा काम में नहीं लगाया जाता है तो अर्थ-व्यवस्था कभी भी वांछित रूप में विकसित नहीं हो सकती है।’’
इस बार के आठ मार्च के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सारी दुनिया से यह आान किया है कि इस दिन को इस रूप में पेश किया जाना चाहिए जिससे सबको यह संदेश मिले कि महिला सशक्तीकरण का अर्थ है मानवता का सशक्तीकरण। इस वर्ष के अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर संयुक्त राष्ट्र का यही मुख्य नारा भी है। गौर करने की बात यह है कि जिस समय इस बात का आान किया जा रहा है कि महिला सशक्तीकरण को मानव सशक्तीकरण का पर्याय बताते हुए उसे सबके सामने प्रदर्शित किया जाए, उसी समय हमारे देश में एक ऐसी फिल्म पर सरकार ने पाबंदी लगादी है जिसमें एक महिला पर बलात्कार और उसकी हत्या के बाद उसके प्रतिवाद में गूंज उठी भारत की सड़कों का एक जीवंत चित्र पेश किया गया है।
संयुक्त राष्ट्र की महिला कार्यकारी निदेशक फ्लुमजिलो मिलाम्बो नूको ने दुनिया के सामने यह लक्ष्य रखा है कि सन् 2030 तक स्त्री-पुरुष अनुपात को बराबर के स्तर तक लाकर लैगिंक समानता के लक्ष्य को हासिल किया जाना चाहिए। यह काम उस समय तक संभव नहीं है जब तक हम अपने समाज को स्त्री-विरोधी सभी रूढि़वादी विचारों से मुक्त करके स्त्री-पुरूष समानता के आधार पर एक स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं करते। आज का दिन इसी की शपथ लेने का दिन है।








गुरुवार, 5 मार्च 2015

अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र


प्रिय अरविंद जी,

आज (4 मार्च 2016) आम आदमी पार्टी (आप) की राजनीतिक परामर्श समिति(पीएसी) में जो कुछ हुआ उससे हम ज्यादा हतप्रभ नहीं है। जो भी हमारे देश में और सारी दुनिया में राजनीतिक पार्टियों के काम करने के तौर-तरीकों के इतिहास को जानता है, उसे इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं लगेगा। किसी भी विषय में लंबी बहस के बाद भी जब किसी फैसले पर पहुंचना मुमकिन नहीं दिखाई देता है तब संगठन के संचालन की यह एक साधारण रीति है कि मतदान का रास्ता अपनाया जाए और जो भी बहुमत में हो उसकी बातों को मान्य माना जाए। संगठन जितना भी जनतांत्रिक क्यों न हो, बहुमत के सामाने अल्पमत की अधीनता को ‘आंतरिक जनतंत्र’ वाले संगठनों का एक अटल सिद्धांत माना जाता है। ‘आप’ की पीएसी में भी संगठनों की इस सर्वमान्य परिपाटी को ही दोहराया गया। इसीलिये एक नजर में किसी का इससे विस्मित या दुखी होना गैर-लाजिमी ही माना जायेगा।

संगठन संबंधी इस सर्वकालिक और सर्वमान्य सिद्धांत की सचाई के बावजूद यह बात भी समान रूप से सच है कि ‘आप’ के इस घटनाक्रम ने बहुत सारे लोगों को काफी आहत किया है। हमीं ने इसपर फेसबुक में अपनी पोस्ट में लिखा कि ‘‘कहा जा रहा है कि योगेंद्र यादव को 'आप' की पीएसी से हटा दिया गया है । अगर यह सच है तो यह दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात और 'आप' के क्रमश: एक गिरोह में तब्दील होने की प्रक्रिया की ओर संकेत करता है ।**

राजनीतिक पार्टियों के सांगठनिक सिद्धांतों के बारे में इतिहासबोध पर टिके अपने सारे विवेक के बावजूद जब हम आज के इस घटनाक्रम को आसानी से नहीं स्वीकार पा रहे हैं तब हमें खुद की आहत-भावनाओं पर ही सोचने की जरूरत पड़ रही है। जो बात राजनीतिक संगठनों के मामले में आम दिखाई देती है, वही ‘आप’ के बारे में हमें उतनी साधारण क्यों नहीं नजर आती?

इस सवाल के साथ विचार करने पर हमें लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अभी तक ‘आप’ को सामान्य अर्थों में एक राजनीतिक पार्टी नहीं मानते हैं और इसीलिये उस पर उन सांगठनिक सूत्रों और सिद्धांतों का लागू होना उतना अनिवार्य या वांछित नहीं मानते जिन्हें अन्य पार्टियों के मामले में हम नितांत सामान्य बात के तौर पर देखते रहे हैं?

दरअसल, हम समझ रहे थे कि ‘आप’ का उदय भारतीय राजनीति की नयी परिघटना है जो हिंदुत्व की एक फासीवादी पार्टी की चुनौतियों के सामने कांग्रेस और पारंपरिक वामपंथी दलों की प्रकट विफलता की पृष्ठभूमि में एक नये स्वस्थ जनतांत्रिक आंदोलन का प्रतिनिधित्व करती है और जिसका रूझान भ्रष्टाचार-विरोधी तथा गरीबों के पक्ष में होने के कारण वामपंथ की ओर थोड़ा झुका हुआ है। इसके अलावा, यह भी सच है कि हमें ‘आप’ की यह परिघटना भारत की अपनी कोई अनोखी परिघटना भी नहीं लगती थी। इसप्रकार के वामपंथी रूझान वाले नये प्रकार के जन-आंदोलन के प्रमाण हाल के सालों में दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिले हैं। पूरा लातिन अमेरिका ऐसे नये वाम-जनतांत्रिक विकल्प की राजनीति का पिछले एक दशक से बहुत बड़ा प्रयोगस्थल बना हुआ है। कमोबेस भारत की तरह की परिस्थितियों में ही इन देशों में 21वीं सदी के आगमन के साथ वामपंथी रूझान की पार्टियों के उभार का सिलसिला शुरू हुआ और देखते-देखते वेनेजुएला में हुगो सावेज, चिले में रिकार्डो लागोस और मिशैल बाशलेत, ब्राजील में लुला द सिल्वा और दुल्मा रूसेफ, अर्जेन्तिना में नेस्तर किर्शने और उनकी पत्नी क्रिस्तिना फर्नान्दिज, उरुग्वे में होशे मुखीका, बोलीविया में एवो मोरालेस, निकारागुआ में दनियल ओर्तेगा, इक्वाडोर में रफायल कोरिआ, पैरागुआ में फर्नांदो लुगो, होंडुरस में मैनुअल खेलाया, अल सल्वाडोर में मोरिशिओ फ्यूनस की सरकारें बन गयी। ये सभी अपने को वामपंथी, समाजवादी, लातिन अमेरिकापंथी अथवा साम्राज्यवाद-विरोधी कहते हैं। आज सिर्फ होंडुरस, कोलंबिया और पनामा में दक्षिणपंथी सरकारें है। इनमें होंडुरस और पनामा बहुत छोटे देश है। हाल में ग्रीस में बनी सिर्जिया की सरकार को भी इसीका एक नया विस्तार माना जा सकता है।

जब हम दुनिया की 1990 के बाद की इन 25 सालों की राजनीतिक स्थिति पर गौर करते है तो एक ओर अमेरिकी वाशिंगटन कंसेंशस वाली नव-उदारवादी नीतियों की मुहिम है तो इसके विपरीत छोर पर उन नीतियों को एक सिरे से ठुकराने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां है, जिनके समाजवादी विकल्प को सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में ठुकराया गया था और जो आज भी चीन की सारी उपलब्धियों के बावजूद किसी जनतांत्रिक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर पा रही है। नाना कारणों से अब तक दुनिया भर में नव-उदारवादी नीतियों के प्रतिकार में कम्युनिस्ट पार्टियों का विकल्प लोगों के गले नहीं उतर रहा है। इसी परिस्थिति में लातिन अमेरिका में जो नया जनतांत्रिक उभार देखने को मिला, उसी से संगति रखते हुए दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उभार ने भी सभी जनतंत्रप्रिय लोगों की अन्याय के खिलाफ एक नये जन-आंदोलन की कल्पनाओं को छुआ है। भारत में फासीवाद के खतरे के सामने इसमें जनतंत्र की रक्षा के एक व्यापक मंच की संभावनाओं ने भी सबको इसके प्रति उत्साहित किया है। दिल्ली में ‘आप’ की इतनी बड़ी ऐतिहासिक जीत सिर्फ उसके संगठन की बदौलत नहीं, बल्कि जनता की कल्पनाओं को छूने वाली उसकी इसी आंदोलनात्मक छवि की वजह से संभव हुई है।

अरविंद जी, जब कोई पार्टी उदीयमान जन-आंदोलन के रूप में सामने आती है तब उसपर आम तौर पर राजनीतिक पार्टी के सामान्य सांगठनिक सिद्धांत लागू नहीं होते हैं। आजादी की लड़ाई के पूरे काल में राष्ट्रीय कांग्रेस का पूरा इतिहास देख लीजिये। उसके संचालन के लिये विरले ही कभी अनुशासन के सख्त डंडे की कोई जरूरत पड़ी होगी। वह आजादी की लड़ाई का एक व्यापक मंच था जिसमें लोगों का अपनी मर्जी से आना-जाना अबाध रूप से चलता रहता था। तमाम विचारों के लोगों ने उस आंदोलन के मंच को विकसित करने में अपनी भूमिका अदा की थी।

‘आप’ को भी आज के इस दौर में राष्ट्रीय जीवन की भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता की तरह की कुछ खास समस्याओं से निपटने के मंच के रूप में लोग देखते हैं। पिछले अक्तूबर महीने में जब दिल्ली में ‘आप’ की विजय हुई थी, तब बहुत से लोगों ने उसे स्वाभाविक तौर पर एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में भी देखना शुरू कर दिया था। लेकिन लोक सभा चुनाव में इजारेदार घरानों की खुली मदद से मोदी के तूफानी अभियान के कारण दूसरी कई पार्टियों की तरह ही ‘आप’ भी उसमें कोई विशेष उपलब्धि नहीं कर पाई। फिर भी, ‘आप’ की ओर से देश के विभिन्न हिस्सों में रातो-रात एक सांगठनिक ढांचा खड़ा करने के जो दुस्साहसी कदम उठाये गये थे, उसने सबको चौका दिया था। ‘आप’ द्वारा चंदा उगाहने और पार्टी के आय-व्यय के हिसाब के मामले में जिसप्रकार की पारदर्शिता का परिचय दिया गया था उससे पार्टी संगठन के निर्माण को लेकर भी कुछ नयी प्रकार की उद्भावनाओं के संकेत लोगों को दिखाई दिये थे।

ऐसी परिस्थति में, दिल्ली के आज के घटनाक्रम ने हम जैसों को हताश किया है क्योंकि इससे कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ‘आप’ ने जिस नयी सांगठनिक पहलकदमी का परिचय देकर अपने को अन्य बंद संगठनों से एक भिन्न स्थान पर रखा था और जनतांत्रिक राजनीति की नयी संभावनाओं की ओर संकेत किया था, वह क्रम इस घटना से यकबयक जैसे थम ही नहीं गया बल्कि पूरी तरह उलट सा गया है। यह एक व्यापक जन-आंदोलन के संभावनापूर्ण विस्तार के पहले ही उसे सख्त अनुशासन की जंजीरों से बांध देने की तरह का उपक्रम लगता है। निश्चित तौर पर किसी भी संगठन को अपने नियमों के आधार पर चलाने से ही उसे व्यक्तियों के स्वेच्छाचार से बचाया जा सकता है। लेकिन किसी को यह समझ में नहीं आरहा है कि ऐसी कौन सी आपदा आ गयी थी कि जिसके कारण अभी-अभी जनता के इतने व्यापक समर्थन को पाने के बाद इतनी हड़बड़ी में पार्टी के दो वरिष्ठ और लोकप्रिय नेताओं के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई करने की जरूरत आगयी ?

योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण, दोनों की ईमानदारी को लेकर कोई किसी प्रकार का सवाल नहीं उठा रहा है और इस बात को भी कोई झुठला नहीं सकता कि ये दोनों ही आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय ऐसे व्यक्ति रहे है जिन्होंने जनता के दिलों में ‘आप’ की इस पूरी परिघटना का एक खाका तैयार करने में अहम भूमिका अदा की है। ऐसे महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी लोगों को संगठन में तत्काल उनकी औकात बताने वाली कार्रवाई की क्या जरूरत थी ?

अरविंद जी, जनतंत्र एक लगातार विकासमान अवधारणा है। यह एक ऐसी बहुमतवादी सामूहिकता है जिसमें व्यक्ति और समूह के अधिकारों के बीच द्वंद्व जितने कम होंगे, जनतंत्र के लिये उतना ही अच्छा होगा । समूह की संगति में व्यक्ति की शक्ति का बढ़ना ही जनतंत्र की सफलता है । दार्शनिक लहजे में कहें तो जनतंत्र नामक 'परम चित्त' का आरोहण व्यक्ति स्वातंत्र्य को अधिक से अधिक साध कर ही संभव है।  लक्ष्य हमेशा समूह और व्यक्ति के बीच के फासलों को कम करना होता है। समूह के बरक्स व्यक्ति का सशक्तीकरण जनतंत्र के विकास के स्तर की कसौटी है। इसीलिये एक ऐतिहासिक विजय के तीन हफ़्तों के अंदर ही उस विजय के दो प्रमुख कर्णधारों पर लगभग अकारण ही गाज का गिरना अनुचित सा जान पड़ता है ।

अरविंद जी, शास्त्रीय ढंग से सोचा जाए तो राजनीतिक पार्टी व्यक्ति नहीं, व्यक्तियों का समूह है। उन लोगों का समूह जो एक मान्य विचारधारा के अनुसार पूरे समाज को ढालने के लिये एकत्रित हुए हैं। उनका लक्ष्य होता है कि यह पार्टी क्रमश: फैलते-फैलते पूरे समाज या पूरी जनता का रूप ले लें। पार्टी का जनता में पूरी तरह से लोप ही पार्टी का अंतिम गंतव्य है। जनहित और पार्टी-हित अभिन्न, और हमेशा के लिये एकाकार हो जाते हैं। कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक तौर पर पार्टी का कोई अंतिम रूप नहीं होता, बल्कि जनता में उसका विलोपन होता है। इस अंत तक पहुंचने की दीर्घ प्रक्रिया में संक्रमण के कई पड़ाव आते हैं, ऐतिहासिक तौर पर संभव नये-नये तत्वों, व्यक्तियों और व्यक्तियों के समूहों को यह अपने में आत्मसात करती है।

लेकिन जब तक कोई पार्टी अपने इस अंत तक नहीं पहुंचती, वह पार्टी ही रहती है, समाज या जन नहीं हो पाती, उसे संपूर्ण समाज या जनता नहीं माना जा सकता।  इसीलिये यह जरूरी नहीं होता कि पार्टी-हित और जन-हित हमेशा एक और अभिन्न हो। यद्यपि, कुछ ऐतिहासिक संधि-क्षणों में जब जन-हित और पार्टी-हित एक समान हो जाते हैं, तब पार्टी वास्तव अर्थों में जन-आंदोलन का रूप लेकर सामने आती है।
इसके अलावा, जो समस्या पार्टियों और उनके पार्टी-हितों की है, वे किसी भी जनतांत्रिक व्यक्ति और नागरिक की नहीं होती है। शायद यही कारण है कि कोई स्वतंत्र व्यक्ति या नागरिक जितनी आसानी से अपने समय के जन-हित के विषयों के साथ खुद को एकात्म कर लेता है, पार्टियां नहीं कर पाती है - इस प्रकार की तमाम उदात्त घोषणाओं के बावजूद कि जनहित के अलग पार्टी-हित कुछ भी नहीं होता है। इस वजह से भी पार्टी में व्यक्ति की भूमिका को जितना बना कर रखा जा सके, व्यापक अर्थों में वह उतना ही श्रेयस्कर होता है।

जिन दो व्यक्तियों को ‘आप’ की इस बैठक में निशाना बनाया गया है वे दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के जाने-माने बुद्धिजीवी है। और इसी वजह से उनकी भूमिका को अक्षुण्ण रखने में हमें ‘आप’ के जनतांत्रिक स्वरूप के हित दिखाई पड़ते हैं। इस मामले में सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियां एक गहरे संकट से गुजर रही है। समाजवाद के श्रेष्ठ दिन वे थे जब दुनिया के तमाम बौद्धिक विमर्शों में भी समाजवाद की श्रेष्ठता बनी हुई थी।

ऐसे में ‘आप’ का यह संकट हमें गहराई से आशंकित करता है। यदि इस मामले को विवेक और उदारता के साथ नहीं सुलझाया जाता है और उनकी भूमिका को सुरक्षित नहीं रखा जाता है तो यह ‘आप’ की विश्वसनियता के लिये भी खतरा पैदा कर देगा।

सादर
अरुण माहेश्वरी

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

‘स्वरागिनी’ की झगड़ालू औरतें !


‘कलर्स’ चैनल पर एक नये सीरियल ‘स्वरागिनी’ के विज्ञापन ने हमारा ध्यान खींचा है। विज्ञापन में दो पड़ौसी महिलाओं की नोक-झोक का दृश्य है। एक बोरिया और बंधेज की साड़ी पहनी राजस्थानी महिला हाथ में सरौता उठाये हुए है और दूसरी बंगाली तांत की साड़ी पहनी महिला रसोई की खुरपी लिये है।
राजस्थानी महिला चिल्लाती है - ‘ऐऽ बंगालन ! सुबह-सुबह मास-मच्छी !
बंगाली स्त्री के हाथ में एक मछली आ जाती है। उसे लहराते हुए उतनी ही ऊंची आवाज में पलट कर जवाब देती है - ‘ऐऽ मारवाड़न! अगर मच्छी खाई होती तो वर्षों पहले ही बुद्धि खुल जाती।’
‘ऐऽ, पुरानी बात मत कर वरना यहीं पर सारी इज्जत उतर जायेगी।’ मारवाड़ी स्त्री जवाब देती है।
अचानक ही दिमाग में कोलकाता में बंगाली और मारवाड़ी समुदाय के लगभग 200 सालों के सह-अस्तित्व की बात कौंध जाती है। 1813 के चार्टर्ड एक्ट ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रतिद्वंद्वी दूसरी अंग्रेज कंपनियों के आने का रास्ता साफ किया, तो कोलकाता में बंगाली जमींदार बाबुओं के प्रतिद्वंद्वी राजपुताना के महाजनी साहूकारों की भी बाढ़ ला दी। भारत में व्यापार के इस स्वर्ण युग में अंग्रेज कंपनियों के मालों को बेचने और उनके लिये कच्चा माल जुटाने में ये दोनों तबके समान रूप से लगे हुए थे। 1860 में दिल्ली-कोलकाता रेलमार्ग से तो बड़ाबाजार की गद्दियों के इर्द-गिर्द एक मिनि राजस्थान ही आ बसा।
दो समुदायों का इतना लंबा सह-अस्तित्व, लेकिन आज भी देखने पर लगता है जैसे शहर के अंदर दो अलग-अलग स्वायत्त द्वीप। खान-पान से लेकर आचार-आचरण तक - सब मामलों में काफी भिन्न।
ऐसा क्यों हुआ? गांधीजी ने आजाद भारत में बंगाल के पहले मुख्यमंत्री प्रफुल्लचंद्र घोष को पत्र लिख कर कहा था कि देखना, तुम्हारे काबिना में एक मारवाड़ी मंत्री जरूर हो। उनका यह पत्र आज भी कोलकाता म्यूजियम में सुरक्षित है। 1947 से 1967 तक, जब तक राज्य में कांग्रेस की सरकारें रही, यह परंपरा कायम रही। ईश्वर दास जालान बंगाल विधान सभा के अध्यक्ष हुए, तो एक समय विजय सिंह नाहर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे। लेकिन फिर भी, इन दो समाजों के बीच आज भी जैसी सांस्कृतिक दूरी दिखाई देती है, वह आश्चर्यजनक है।
ऐसे में, ‘स्वरागिनी’ जैसा यह सीरियल, जिसमें इन दो समुदायों के बीच पड़ौसियों वाली स्वाभाविक नोक-झोंक की झलक मिलती है, हमारे मन में गहरी उत्सुकता पैदा कर रही है। प्रश्न उठ रहा है कि क्या इधर के दिनों में, वैश्वीकरण की सबको एकमेक कर देने की आंधी से, समाज की तहों में अलगाव की दीवारें तेजी से दरकने लगी है?
इसी जिज्ञासावश ‘स्वरागिनी’ का यह विज्ञापन आकर्षक लग रहा हैं। आगे सीरियल में क्या होगा, हम नहीं जानते। निश्चित तौर पर इस सीरियल की कहानी से हमारे प्रश्न का शायद ही कोई जवाब मिल सके क्योंकि अंत में तो इसे दूसरे सभी सीरियलों की तरह ही सस्ते बाजारूपन की भेंट ही चढ़ना है। फिर भी, इन दो समुदायों में पड़ौसियों वाली अन्तरक्रिया का यह मामूली संकेत ही काफी अर्थपूर्ण नजर आता है।

भूमि अधिग्रहण कानून अध्यादेश को बदलने के संकेत

सरकारी सूत्र भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के अध्यादेश को बदलने के संकेत देने लगे हैं।
पिछले साल के अंतिम दिन जैसी हड़बड़ी में इसे जारी किया गया था तब ऐसा लगा था मानो मोदी जी ने भारत के ‘विकास’ की ऐसी कुंजी पा ली है जिसे पकड़ कर तत्काल कार्रवाई न की गयी तो वह फिर हाथ नहीं आने वाली। दरअसल, तब ओबामा जी आने वाले थे।
ओबामा जी घूम गये, बता गये कि भूमि अधिग्रहण नहीं, विकास की कुंजी है संविधान की धारा 25 की अक्षुण्णता! फिर दिल्ली का परिणाम आगया। जाहिर हुआ कि यदि भूमि अधिग्रहण संबंधी इस अध्यादेश से चिपके रहा गया तो जो दिल्ली में जो हुआ उसे सारे देश में दोहराये जाने से कोई रोक नहीं पायेगा।
इसी बीच किसानों के जत्थे कूच कर पड़े हैं संसद की ईंट से ईंट बजाने। देश के सभी किसान संगठनों ने प्रतिरोध की साझा रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। अन्ना हजारे हुंकारे भरने लगे हैं।
हां, वामपंथी अभी अपने सांगठनिक यज्ञ में लगे हुए हैं - भारतीय कर्मवाद पर पक्की आस्था के साथ कि यदि सारे विधि-विधानों के साथ यज्ञ के कर्मकांड त्रुटिविहीन संपन्न हो जाए तो सफल यज्ञ से फल की प्राप्ति निश्चित और अटल है। यज्ञ की रहस्यमय शक्ति के चमत्कारों से ही तो मनुष्यों को देवत्व प्राप्त होता है !
बहरहाल, भारतीय राजनीति की अनंत संभावनाएं साफ नजर आ रही है। मोदी-शाह अभी से पिटे-पिटे तथा स्वच्छ भारत, जन धन, काला धन की मोदी जी की बातें और भी धिसी-पिटी दिखाई देने लगी है।

तत्वत: कमजोर ; कोरा प्रचारमूलक


ग्रीस में सिर्जिया की एलेक्सिस सिप्रस की सरकार ने यूरोपियन यूनियन से अपने कर्ज के भुगतान के लिये और ज्यादा मोहलत की मांग की है। यूरोपियन यूनियन की ओर से जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल इसके लिये तैयार नहीं है। मर्केल के हठपूर्ण रवैये से नाराज ग्रीस के प्रधानमंत्री ने पलट कर जर्मनी से द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर द्वारा ग्रीस को पहुंचाये गये भारी नुकसान की भरपाई का दावा ठोका दिया है। उन्होंने इस बाबत जर्मनी से इतनी बड़ी राशि की मांग की है, जो यूरोपियन यूनियन के ग्रीस पर कर्ज से कहीं अधिक है। और इसप्रकार, अभी ग्रीस और जर्मनी के बीच एक तीखा वाक् युद्ध जारी है।
कर्ज देना, उसके भुगतान के लिये मोहलत बढ़ाना और कर्ज की शर्तों में कभी-कभी थोड़ा रद्दो-बदल कर देना, और कभी-कभी इसे लेकर गहरा तनाव और झगड़ा तक हो जाना अर्थजगत की साधारण बाते हैं। इसका पूंजी के नैसर्गिक चरित्र से किसी ने कभी कोई सीधा संबंध नहीं देखा है। पूंजी की नैसर्गिकता उसके मुनाफे से जुड़ी होती है। जब तक पूंजी मुनाफा लाती है, तभी तक पूंजी है, अन्यथा अस्थि।
लेकिन आज (24 फरवरी 2015) के ‘टेलिग्राफ’ में प्रभात पटनायक ने ग्रीस और जर्मनी से जुड़े इसी घटनाक्रम के संदर्भ में पूंजी के नैसर्गिक चरित्र के बारे में जिस एक नयी खोज का दावा किया है, वह सचमुच चौकाने वाला है। उनका कहना है कि जरूरतमंदों की सहायता के लिये आगे न आने के पूंजी के हठी निष्ठुर चरित्र की ओर मार्क्स ने भी यथेष्ट ध्यान नहीं दिया था। इसीलिये, पूंजी के चरित्र की इस अब तक की अनखोजी ‘विशेषता’ की ओर ध्यान खींचने के लिये ही प्रभात ने अपनी इस टिप्पणी का शीर्षक दिया है - Das Capital।
आज की दुनिया के अर्थशास्त्रीय चिंतन में मार्क्स की पुनर्वापसी के साथ ही प्रबल रूप से एक रूझान यह भी दिखाई देता है कि अर्थशास्त्र के उन बिन्दुओं की तलाश की जाए जिनपर किन्हीं कारणों से भी क्यों न हो, मार्क्स ने पर्याप्त रूप से विवेचन नहीं किया या जो मार्क्स की नजरों से ओझल रह गये, और जिनकी वजह से ‘पूंजीवाद चल नहीं सकता’ की मार्क्स की भविष्यवाणी के बावजूद मार्क्स को झुठलाते हुए पूंजीवाद बदस्तूर कायम है। इसमें एक बड़ा योगदान किया है फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने। उन्होंने अपनी बहुचर्चित किताब - ‘21वीं सदी में पूंजी’ में बताया है कि चूंकि मार्क्स के समय में व्यक्तियों की आय संबंधी सरकारी तथ्य उपलब्ध नहीं थे, इसीलिये वे सामाजिक गैर-बराबरी के ग्राफ का कोई ठोस और यथार्थ चित्र नहीं देख पाये थे। उन्हें पूंजी के चरित्र के अनुसार गैर-बराबरी में लगातार वृद्धि का ग्राफ ही दिखाई दे रहा था, जबकि तथ्य बताते हैं कि अन्य राजनीतिक-सामाजिक कारणों से वास्तविक जीवन में इसमें उतार-चढ़ाव भी आया करते हैं। और यही उतार-चढ़ाव एक बुनियादी कारण है जो पूंजीवाद को आज तक किसी न किसी रूप में टिकाये हुए है, इसका खोल फट नहीं पाया है।
आर्थिक चिंतन के एक ऐसे दौर में, अक्सर केन्स के पूंजीवाद के संकट-मोचक विचारों की पैरोकारी करने वाले हमारे प्रभात पटनायक ने भी इस छोटी सी टिप्पणी के जरिये ग्रीस के वर्तमान घटनाचक्र के संदर्भ में मार्क्स की एक कमी को खोज लेने का दावा पेश किया है। वे कहते हैं - मार्क्स ने पूंजीवाद के अराजक, और शोषणकारी चरित्र को तो देखा था लेकिन इसप्रकार के हठी चरित्र को नहीं देखा। उनके शब्दों में ‘‘इसप्रकार पूंजीवाद न सिर्फ एक अराजक या शोषणकारी व्यवस्था है; यह एक हठी निर्दयी व्यवस्था है। केन्स ने उसके चरित्र की पहली बात को पहचाना था, मार्क्स ने पहली और दूसरी को देखा। लेकिन मार्क्स ने भी तीसरी पर कोई चर्चा नहीं की।’’ (Capitalism, thus, is not just an anarchic, or exploitative system; it is also a bloodyminded one, in this sense. Keynes recognised the first of these traits, and Marx recognised the first two traits. But even Marx did not discuss this third trait)
इस टिप्पणी का अंत प्रभात ने पूंजीवाद के इस निष्ठुर हठी चरित्र के भारतीय उदाहरण, मनरेगा पर पड़ रहे सरकारी कोप से किया है।
क्या कहेंगे इस तात्विक चिंतन को ! अनुमान लगाया जा रहा है कि ग्रीस और यूरोपियन यूनियन की तनातनी का कोई न कोई समाधान जल्द ही निकल जायेगा। मनरेगा भी किसी समाजवादी व्यवस्था की उपज तो नहीं है। और, इसे जारी रखा जाए या बंद कर दिया जाए, क्या इसीसे पूंजीवाद के चरित्र के बारे में कोई निर्णायक तात्विक निर्णय संभव है?
समाजवादी व्यवस्थाओं में आई तमाम विकृतियों को दिखा कर ही क्या समाजवाद के बारे में कोई तात्विक निर्णय लिया जा सकता है?
इसीलिये प्रभात की यह खोजी टिप्पणी हमें तात्विक दृष्टि से कमजोर और कोरी प्रचारमूलक लगती है। इससे पूंजीवाद के बारे में किसी की भी समझ में रत्ती भर का भी इजाफा नहीं होता। उल्टे कुछ नयी भ्रांतियों की गुंजाइश और बन जाती है। अन्यथा सच्चाई तो यह है कि लाभ पाने के लिये पूंजी की निष्ठुरता के जो चित्र मार्क्स ने दिये है, वे अन्यत्र शायद ही कहीं मिलेंगे।
http://www.telegraphindia.com/115…/…/opinion/story_5064.jsp…

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

भारत, आरएसएस और ओबामा

अरुण माहेश्वरी


राष्ट्रपति ओबामा ने भारत में अपने अंतिम भाषण में भारत के नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने वाली संविधान की उस धारा 25 की याद दिलाई जिस धारा को बदलना आज आरएसएस के प्रमुख घोषित उद्देश्यों में एक हैं। सऊदी अरब से अपने देश लौट कर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रार्थना सभा में उन्होंने फिर से कहा कि भारत एक खूबसूरत देश है लेकिन पिछले कुछ सालों से वहां तमाम लोगों के धार्मिक विश्वासों के प्रति जो असहिष्णुता बढ़ी है, अगर महात्मा गांधी होते तो इससे उन्हें गहरा सदमा लगता।  

एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की, वह भी अमेरिका जैसे महाशक्तिशाली देश के राष्ट्राध्यक्ष की ऐसी बेबाक टिप्पणी से एकबारगी किसी को भी लग सकता है कि यह मर्यादा का उल्लंघन और भारत के अंदुरूनी मामले में अवांछित हस्तक्षेप है। लेकिन शील-अश्लील की थोथी बातों से परे जाकर जरूरत इस बात को समझने की है कि आखिर ओबामा क्यों इतने उतावलेपन के साथ ऐसी बातों को दोहरा रहे हैं? 

मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी इतना तो जानता है कि वे कोई हवाई बातें नहीं कर रहे हैं। भारत में वे जिस धार्मिक असहिष्णुता में वृद्धि की ओर इशारा कर रहे हैं, वह कोई अमूर्त प्रकार की चीज नहीं है। उनका साफ संकेत उस धार्मिक असहिष्णुता की ओर है, जिसे फैलाने के काम में भारत में आरएसएस अपने जन्मकाल से ही लगा हुआ है। ओबामा और अमेरिकी प्रशासन में इसके बारे में रत्ती भर भी संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विकास तथा दूसरे प्रकार की तमाम आडंबरपूर्ण बातें जितनी भी क्यों न करें, अंततोगत्वा वे इसी संघ परिवार के एक अभिन्न अंग है; भारतीय न्यायालय कुछ भी क्यों न कहे, 2002 के गुजरात जन-संहार में उनकी (नरेंद्र मोदी की) रजामंदी थी।

अमेरिका दुनिया के उन पहले देशों में एक है जिसने ‘50 के जमाने में ही आरएसएस के संगठन और उसकी विचारधारा के बारे में सुव्यवस्थित ढंग से अध्ययन करना शुरू कर दिया था। सीआईए द्वारा पोषित अमेरिकी संस्था ‘इंस्टीट्यूट ऑफ पैशिफिक रिलेशन्स’ के तत्वावधान में जे.ए.कुर्रान जूनियर द्वारा किया गया शोध, ‘मिलिटेंट हिन्दुइज्म इन इंडियन पॉलिटिक्स : ए स्टडी ऑफ द आर. एस. एस.’ को आरएसएस के बारे में किया गया शायद अपने प्रकार का पहला विस्तृत अध्ययन कहा जा सकता है। सन् 1951 में ही कुर्रान के इस शोध का प्रकाशन हो गया था और तब से लेकर अब तक अमेरिकी सत्ता संस्थान इसी के आधार पर आरएसएस की प्रत्येक गतिविधियों का अद्यतन लेखा-जोखा अपने पास रखता आ रहा हैं।

वर्तमान संदर्भ में थोड़ा अप्रासंगिक होने पर भी यहां यह बताना उचित होगा कि ‘50 का वह समय दुनिया में शीत युद्ध का समय था। उस समय किये गये इस शोध में भारत को ’स्तालिन एंड कंपनी’ के हाथ से बचाने के एक कट्टर कम्युनिस्ट-विरोधी औजार के तौरपर भी आरएसएस को चिन्हित किया गया था। इसके बावजूद, इसमें एक सांस्कृतिक संगठन के आरएसएस के नकाब को तार-तार करते हुए उसके सांप्रदायिक राजनीतिक उद्देश्यों और उसके संगठन के गोपनीय, षड़यंत्रकारी चरित्र को बहुत ही वस्तुनिष्ठ ढंग से पेश किया गया था। इसके साथ ही, इस शोध के अंत में इस निष्कर्ष पर भी पहुंचा गया था कि ‘‘ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं जिसमें फिलहाल छोटी सी शक्ति का यह संगठन भारत के सर्वोच्च आसन को पा लें।’’

कुर्रान के उस शोध के प्राक्कथन की पहली पंक्ति ही थी: ’’यह एक उग्रवादी हिन्दू संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अध्ययन है जो भारतीय गणतन्त्र में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए प्रयत्नशील हैं।’’ उन्होंने आगे लिखा : ‘‘चूँकि (केंद्रीय) सरकार धर्मनिरपेक्ष नीति से प्रतिबद्ध है, इसीलिए आर एस एस के आदर्शों की खुली घोषणा से उसकी गतिविधियों पर पाबन्दी लग सकती है। आर एस एस उस वक्त तक सरकार से वैर मोल लेना नहीं चाहता जब तक वह इस बात से आश्वस्त न हो जाए कि उसमें सरकार से निपट लेने की यथेष्ट शक्ति आ गई है।’’

कुर्रान के उस शोध का तीसरा अध्याय था - आर एस एस का कार्यक्रम। इसमें आरएस एस के संविधान की धारा 3 और 4 के उद्धरण के जरिए उसके घोषित लक्ष्यों का उल्लेख करने के बाद ही कुर्रान ने साफ शब्दों में लिखा था कि ’’ इस संविधान से संघ को हिंदू समाज के जिस प्रकार के सुदृढ़ीकरण और पुनर्जीवीकरण को समर्पित बताया गया है, उसकी कोई साफ तस्वीर सामने नहीं आती। इसमें एक हिन्दू राष्ट्र की उग्र तथा असहिष्णु पैरवी का कोई संकेत नहीं है। दरअसल, संघ के संविधान में औपचारिक तौर पर घोषित उद्देश्यों तथा संघ की वास्तविक योजनाओं में बुनियादी तौर पर फर्कहै। संघ साधन और साध्य की गोपनीयता की भत्‍​र्सना करता है, फिर भी उसके संविधान में उल्लेखित सहिष्णु हिन्दू दर्शन तथा उसके सदस्यों में कूट-कूटकर भरे गए उन्मादपूर्ण हिन्दू-परस्त और अहिन्दू-विरोधी लक्ष्यों के बीच कोई संगति नहीं है। संविधान तथा उनका घोषित दर्शन संघ के वास्तविक उद्देश्यों का धुंधला और छल भरा प्रतिबिम्ब ही है।’’ आर एस एस का राजनीति से कोई सम्बन्ध न होने की बात को भी इसमें सरासर झूठ और हास्यास्पद कहा गया है। वह अपने को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन संस्कृति से उसका तात्पर्य कभी भी वह नहीं रहा है जो आम तौर पर समझा जाता है। संस्कृति उसके लिये सिवाय राजनीतिक वर्चस्व कायम करने के और कुछ नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि आरएसएस अपने आप में एक बहुत ही गुप्त ढंग से काम करने वाला राजनीतिक संगठन होने के बावजूद सारी दुनिया इस संगठन के विचारधारात्मक स्रोत, इसके काम करने के षड़यंत्रकारी तौर-तरीकों से भलीभांति परिचित है। अमेरिकी प्रशासन तो खास तौर पर काफी लंबे अर्से से उसपर गहराई से नजरें टिकाये हुए है। यही वह प्रमुख कारण था कि अमेरिकी प्रशासन ने नरेन्द्र मोदी को उस समय तक अमेरिका का वीसा नहीं दिया था जब तक वे चुनाव में जीत नहीं गये। और यही वजह है कि सरकार बना लेने के बाद भी, सिर्फ विकास-विकास का रागअलापने भर से आरएसएस स्वत:स्फूर्त ढंग से दुनिया की नजरों के संदेह के घेरे से बाहर नहीं आ गया है। ऊपर से, संघ परिवारियों के ‘घर-वापसी’, अल्पसंख्यकों के उपासना-स्थलों पर हमलों और दूसरी सभी बेहुदी उग्र बातों से यह संदेह का घेरा और भी ज्यादा विस्तृत और गहरा ही हुआ है।

इसके अलावा, समझने की बात है कि ‘50 से लेकर ‘90 तक की दुनिया कीपरिस्थिति और आज की दुनिया की परिस्थिति में जमीन-आसमान का फर्क आ चुकाहै। ‘90 में समाजवाद के पराभव के साथ ही शीतयुद्ध का वह काल समाप्त होचुका है, जब सोवियत प्रभाव को रोकने के लिये अमेरिका ने जिन ताकतों का खुल कर प्रयोगकिया उनमें बड़ी मात्रा में धार्मिक तत्ववादी और जेहादी ताकतें शामिल थी। इस मायनेमें भारत में भी आरएसएस को निश्चित तौर पर अमेरिकी समर्थन मिलता रहा था। ‘90 के राम जन्मभूमि आंदोलन के समय सारी दुनिया में विश्व हिन्दू परिषद की शाखाओं केफैलाव में अमेरिकी प्रशासन की कितनी भूमिका रही, इसपर  शोध करने की जरूरतहै। फिर भी, इतना तो सर्वविदित है कि राम मंदिर आंदोलन में अमेरिका से भारी मात्रामें रुपया आया करता था।

लेकिन, ‘90 के बाद का अमेरिकी अनुभव इस बात का गवाह है कि जिन धार्मिक तत्ववादी ताकतों को उसने कम्युनिस्टों को रोकने के लिये पैदा किया था, वे ही परवर्ती दिनों में भस्मासुर की तरह अमेरिका के लिये ही खतरा बन गयी। इस नयी सदी के प्रारंभ में ही, उन ताकतों ने 9 सितंबर 2001 के दिन वल्‍​र्ड ट्रेड सेंटर को ढहा कर अमेरिका को ही अपने हमले का निशाना बना लिया। सारी दुनिया के राजनीतिक टिप्पणीकारों ने तब एक स्वर में कहा था कि 9/11 के बाद, अब दुनिया वह नहीं रही, जैसी अब तक थी। ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ की तरह की नयी विचारधारात्मक दलीलें सामने आने लगी और धार्मिक उग्रवाद अमेरिका के एक प्रमुख शत्रु के रूप में माना जाने लगा। अफगानिस्तान, इराक, पूरा मध्य एशिया और पाकिस्तान का भी उत्तर-पश्चिमी सीमांत इलाका तब से लगातार धधक रहा है।

आज नरेन्द्र मोदी, भारत और ओबामा के संदर्भ में इन चर्चाओं का तात्पर्य सिर्फ यही है कि जो धार्मिक तत्ववाद किसी समय अमेरिकी विदेशनीति का एक प्रमुख औजार हुआ करता था, वही आज उसका शत्रु माना जाता है। और, नरेन्द्र मोदी की विडंबना यही है कि वे जिस आरएसएस का प्रतिनिधित्व करते हैं, अमेरिकी दृष्टिकोण में आज के समय में वह कमोबेस वैसे ही तत्वों की श्रेणी में पड़ता है जिन्हें अमेरिका अपना प्रमुख शत्रु मान रहा है। यही कारण है कि ओबामा प्रधानमंत्री श्रीमान मोदी के सारे आडंबरों से परे, उनके राजनीतिक उत्स, भारत की मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों को लेकर कहीं ज्यादा सशंकित है। भारत की अंदुरूनी राजनीति के और भी दूसरे तमाम पहलुओं पर उनकी गहरी निगाहें लगी हुई हैं।

जहां तक भारत को एक विशाल बाजार के रूप में पाने का सवाल है, अमेरिका जानता है कि इस मामले में मनमोहन सिंह भी उसके कम सहयोगी नहीं थे। भारत में आर्थिक उदारतावाद के अग्रदूत वे ही थे। और आज भी कांग्रेस दल अपनी उन नीतियों से जरा भी पीछे नहीं हटा है। इसके विपरीत, भारत जैसे एक परमाणविक शक्ति के विशाल देश में आरएसएस की तरह की उग्र धार्मिक तत्ववादी ताकत के उभार के दूरगामी घातक परिणामों से वह और भी शंकित हो उठता है। भारत में मोदी जिस प्रकार सारी सत्ता को अपने हाथों में केंद्रीभूत करके पड़ौसी देशों, पाकिस्तान, नेपाल आदि पर धौंस जमाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे भी एक जंगखोर विस्तारवादी शक्ति के उभार की अतिरिक्त आशंका पैदा होती है जो सिर्फ इस पूरे क्षेत्र में अकल्पनीय विध्वंस और अस्थिरता का कारण ही नहीं बन सकता है, बल्कि सारी दुनिया को अस्त-व्यस्त कर सकता है।

यह सच है कि अमेरिका भारत को अपनी सामरिक विश्व रणनीति का हिस्सा बनाना चाहता है, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि वह यह काम पाकिस्तान की कीमत पर नहीं करना चाहता। उसका यही रुख इस बात का संकेत हैं कि एक विशाल उग्र तत्ववादी उन्मादित शक्ति के भरोसे वह इस क्षेत्र में अपनी कोई रणनीति तैयार करना नहीं चाहता। आरएसएस की विचारधारा से परिचित होने के नाते कोई भी इसमें एक और हिटलर के जन्म की संभावनाओं को देख सकता है, जिसने सारी मानवता के भविष्य पर प्रश्न लगा दिया था।

इन्हीं तमाम कारणों से, ओबामा द्वारा भारत के संदर्भ में बार-बार धार्मिक असहिष्णुता का उल्लेख और महात्मा गांधी का स्मरण अकारण नहीं है।         

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

‘आप’ की प्रत्याशित जीत पर सोचते हुए


सन्‘77 के बाद हम सब भारतीय जनतंत्र के एक और ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनेंगे। कांग्रेस इस जनतंत्र की सभी अच्छाइयों और साथ ही इसमें आई विकृतियों का भी गोमुख है, सिवाय सांप्रदायिकता के। भाजपा सांप्रदायिकता और कांग्रेस शासन की तमाम विकृतियों की प्रतिनिधि है। इसमें स्वस्थ कहा जाए, ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता। वह हमारे जनतंत्र में आई सारी विकृतियों का एक चरम रूप है। इसकी तुलना में ‘आप’ भारतीय जनतंत्र के तमाम विकासशील स्वस्थ पक्षों और संभावनाओं को अपने में समेटे हुए हैं।
हम जानते हैं, शीघ्र ही ‘प्रभात पटनायक’ ‘आप’ के वर्ग चरित्र का एक आख्यान लेकर, ‘नव-उदारवाद’ के प्रति उसके रूझान के 'यक्ष प्रश्न' के साथ हाजिर होने वाले हैं - ‘नव-उदारवाद’ को पूंजीवाद से अलग एक इतिहासशून्य विविक्ति (abstraction) के रूप में पेश करते हुए। मानो मजदूर वर्ग की घोषित पार्टियां संसदीय राजनीति का इस्तेमाल सचमुच पूंजीवाद के अंत की किसी फैसलाकुन लड़ाई के लिये कर रही हो!
वास्तविक इतिहास से काट कर देखने पर न वर्गीय चरित्र का, न नव-उदारवाद का और न वर्ग-संघर्ष जैसी विविक्तियों का कोई मूल्य होता है। खुद कम्युनिस्ट पार्टी भी इतिहास में अपनी ठोस भूमिका से कोई अर्थवत्ता ग्रहण करती है, सिर्फ अपने साइनबोर्ड से नहीं।
‘77 के समय एकदलीय और एक व्यक्ति की तानाशाही का मुकाबला मजदूर वर्ग के घोषित दावेदारों के नेतृत्व में नहीं किया गया था। लाभ उन्हें जरूर मिला। उसीप्रकार, जनतंत्र में आई विकृतियों के एक चरम रूप और उसपर सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ लड़ाई के इस नये मोड पर भी भारतीय वामपंथ नेतृत्व देने में असमर्थ है। फिर भी वह लाभान्वित जरूर होगा, अपने प्रभाव के क्षेत्रों में। हम देखना चाहते हैं उसकी पहलकदमी को, ‘आप’ की तरह के नये स्वस्थ जनतांत्रिक उभार के साथ उसके जैविक संबंधों को।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

दिल्ली से आ रहे संकेत


अरुण माहेश्वरी

क्या दिल्ली चुनाव नरेंद्र मोदी का वाटरलू साबित होने जा रहा है ? केंद्र सरकार को आईबी की रिपोर्ट भी कुछ ऐसा ही संकेत देती है। इस बात के कुछ ठोस कारण और लक्षण भी दिखाई देने लगे हैं ।

पहला, भाजपा के लिये दिल्ली के ग्रामीण इलाक़ों में कोई भविष्य नहीं बचा है । केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण के बारे में जो अध्यादेश जारी किया है, वह शहरी क्षेत्रों के निकट की ग्रामीण जनता के खिलाफ सीधे तौर पर युद्ध की घोषणा से कम नहीं है ।

दूसरा, दिल्ली के बस्ती इलाक़ों में भाजपा की स्थिति पहले से ही कमज़ोर रही है और अभी तक उसमें कोई सुधार नहीं आया है । कॉलोनियों को रेगुलराईज करने की दिशा में सिर्फ एक घोषणा भर की गयी है, जिसकी कोई क़ानूनी वैधता नहीं है । इस मामले में भाजपा के इरादे आज भी हमेशा की तरह संदेह के घेरे में हैं ।

तीसरा,  दिल्ली के अल्प-संख्यकों में अब कोई दुविधा नहीं है । भाजपा और संघ परिवार के नेताओं की धर्म-परिवर्तन और नफ़रत फैलाने की हरकतों तथा गिरजाघरों में आगज़नी की घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के सभी समुदायों को भाजपा के खिलाफ दूसरे किसी भी समय की तुलना में कहीं ज्यादा एकजुट कर दिया है । संघ परिवार के लोगों की दंगा भड़काने की साज़िशों का आम आदमी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जिस बहादुरी से मुक़ाबला किया, उसने इन समुदायों को और भी जागृत किया है ।


चौथा, पेट्रोलियम पदार्थों की अन्तरराष्ट्रीय दरों में भारी गिरावट के बावजूद रोजमर्रे की ज़रूरी चीज़ों के दामों को कम करने में भाजपा सरकार की पूर्ण विफलता ने मध्यवर्ग के तबक़ों का भाजपा के प्रति मोहभंग किया है ।


पांचवा, भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर पहले भी किसी को कोई भरोसा नहीं था । अब भाजपा के परंपरागत नेताओं को हटा कर किरण बेदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फ़ैसला करके खुद भाजपा के सर्वोच्च नेतृत्व ने भी खुले आम दिल्ली की भाजपा के प्रति अविश्वास जाहिर कर दिया है ।


छठा, किरण बेदी एक अक्षम पुलिस अधिकारी रही हैं । उन्हें पुलिस सेवा में भी अराजक व्यवहार और निकम्मेपन की वजह से किसी भी उच्च पदस्थ अधिकारी को स्वाभाविक तौर पर मिलने वाले पदक भी नहीं मिल पाए । इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के पूरे आंदोलन में उनकी भूमिका एक तोड़क की भूमिका रही । ऐसे विफल व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करके चुनाव में उतरना भाजपा के परंपरागत मतदाताओं के विश्वास को भी हिला देने के लिये काफी है ।

और सातवां, नरेन्द्र मोदी की सभा में उम्मीद से बेहद कम लोगों का आना और अरविंद केजरीवाल की सभाओं में भारी भीड़ का उमड़ना ही वह प्रमुख कारण रहा है, जिसकी वजह से मोदी जी ने दिल्ली में खुद को दाव पर लगाना मुनासिब नहीं समझा । किरण बेदी की खोज भी इसीलिये की गई है ।

इसके अलावा,  प्रधानमंत्री और उनके पूरे मंत्रिमंडल, पूरी केंद्रीय सरकार का दिल्ली के चुनाव में इस प्रकार भारी आडंबर के साथ कूद पड़ना जनता की नजरों में भाजपा की जीत को संदिग्ध बनाने और उसकी धार को कुंद कर देने का करतब साबित होगा। हम देख चुके हैं कि जब अरविंद केजरीवाल ने जन-लोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस की मोलभाव न स्वीकारते हुए मुख्यमंत्री पद को त्याग दिया था, उस समय भगोड़ा-भगोड़ा का शोर मचा कर भाजपा वालों ने दिल्ली के लोगों को एक नकली लड़ाई में उलझाने की कोशिश की थी। आज जब चुनाव आ चुका है तब वे उन्हें जनतंत्र के असली मुद्दों की लड़ाई में उतरने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। वे असली बहस से कन्नी काट रहे हैं। अपने को विचारों से ऊपर बता कर जनमत पर आरोपित करना चाहते हैं। राज्य के शीर्ष पर बैठ कर बीन बजाकर शुद्ध रूप से लोगों को नचाना चाहते हैं। आज तक शायद किसी ने भी आम लोगों की मूढ़ता पर विश्वास करके इससे अधिक मूढ़पन के साथ जुए में दाव नहीं लगाया है।

मोदी सरकार को अभी आठ महीने पूरे हुए हैं। इसी बीच उनकी कूटनीति विफलताओं का जैसे एक संपूर्ण वृत्त पूरा करने जा रही है।

सबसे पहले, अपनी ताजपोशी के समय ही उन्होंने पड़ौसी देशों और सार्क को छुआ था। छ: महीने बीतते न बीतते, उनका उत्साह इतने चरम पर चला गया कि नवंबर 2014 में सार्क के 18वें सम्मेलन में उन्होंने उसका दम ही निकाल दिया। अब यह कहना मुश्किल है कि सार्क का अगला सम्मेलन होगा भी या नहीं। पाकिस्तान के साथ तो बातचीत के रिश्ते भी नहीं बचे।

पड़ौसी देशों के बाद 15-16 जुलाई 2014 में ब्राजील के फोर्टालेज़ा और ब्रासीलिया में भारी जोशो-खरोश के साथ वे ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के) सम्मेलन में गये। चारो देश के नेताओं से गलबहियों में वैसा ही उत्साह था जैसा अभी ओबामा के मामले में दिखाई दे रहा है। ब्रिक्स देशों के सुर में सुर मिलाते हुए 100 बिलियन डालर के कोष के साथ न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनबीडी) के गठन की घोषणा से आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक को चुनौती दी। उसका सदर दफ्तर शंघाई में होगा और पहला अध्यक्ष भारत का। सभी क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की औपचारिकता के साथ बात खत्म होगयी।

ब्रिक्स सम्मेलन के दो महीने बाद ही सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आएं। बंगलौर गये, गुजरात गये, कुछ वाणिज्यिक संधियां की। लेकिन जब वे भारत में थे, उसी समय लद्दाख की सीमा पर भारतीय और चीनी फौज के बीच तनातनी चल रही थी। आज अब स्थिति यह है कि चीन साफ कह रहा है कि वह पाकिस्तान का दामन नहीं छोड़ सकता है। ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री के साथ शी जिनपिंग की गलबहियों से जुड़े विशेष तार टूट गये। चीन ने ओबामा की भारत यात्रा पर छींटाकशी में कोई कोताही नहीं बरती है।

अबतक की इन सारी कूटनीतिक कसरतों के शीर्ष पर आई है ओबामा की यह भारत यात्रा। इसके पहले नवंबर 2014 में ही मोदी जी अमेरिका घूम आये थे और न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर पर जो तमाशा किया, उसे याद करते हुए आज भी ओबामा अपने भाषण में हॉलिवुड के नायकों की चर्चा कर रहे थे। ओबामा की भारत यात्रा ही तो वह अंतिम मुकाम था, जहां मोदी जी के अब तक के सारे कूटनीतिक कर्मों को फलीभूत होना था। मोदी जी की कूटनीति के लिये यह कुछ ऐसी ही है, जिसे कहते हैं, अंत भला तो सब भला। अब तक अच्छा-बुरा जो भी क्यों न हुआ हो, अमेरिका अगर मान गया तो फिर भवसागर पार ही समझो। इसीलिये हर प्रोटोकोल और औपचारिकता को बालाएं ताक रख कर उन्होंने खुद अपने हाथों से ओबामा को चाय पिलाई, उन्हें नाम से पुकारा और उनसे अपनी पक्की दोस्ती की बाकायदा घोषणा भी कर दी। तथाकथित परमाणविक संधि, जिसे भूलवश भारतवासियों ने भारत-अमेरिका संबंधों की कुंजी मान लिया है, उसपर अमल की सारी बाधाएं दूर कर दी गयी।

इन सबके बाद भी, अचरज की बात है कि यह सवाल रह गया है - आगे क्या? एक बात साफ हो चुकी है कि परमाणु ऊर्जा संयत्रों की स्थापना तो एक शुद्ध मृग-मरीचिका है। आज के पूरी तरह से बदल चुके ऊर्जा के विश्व-परिदृश्य में भला भारत की ऐसी कौन सी निजी कंपनी होगी, जो अपनी बलि चढ़ाके ऐसे भारी नुकसानदायी प्रकल्पों में अपना हाथ जलायेगी ? रही बात, भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों को सुधारने की, तो यह सिलसिला अपने खुद के तर्कों पर ही सारी दुनिया के देशों के बीच चल रहा है और चलता रहेगा। इसके लिये शायद राष्ट्राध्यक्षों की आपस में गहरी दोस्ती की जरूरत नहीं है।

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में भी, हथियारों के उत्पादन और व्यापार को लेकर जो बातें हुई है, उनमें ऐसा नया कुछ नहीं है जो खास तौर पर भारत का ही हित साधता हो। उल्टे, भारत आने के पहले, पाकिस्तान को ओबामा ने जिस प्रकार आश्वस्त सा किया था, उस मनोभाव में किसी प्रकार के परिवर्तन के कोई आसार नहीं दिखाई दिये हैं।

इसमें ग़ौर करने लायक एक बात यह भी है कि ओबामा की भारत यात्रा की ख़बर मिलते ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत का एक तूफ़ानी दौरा (13-14 दिसंबर को) कर गये और एक झटके में रक्षा तथा ऊर्जा को लेकर वे सारे समझौते करा ले गये कि आगे ओबामा के साथ करने के लिये बहुत कुछ शेष नहीं रह गया । भारत की धरती से ओबामा का पुतिन के खिलाफ विष वमन, उन्हें दादागिरी न करने की सलाह देना अकारण नहीं था ।


कुल मिला कर, आसानी से इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि इन आठ महीनों की मोदी की सारी कूटनीतिक पहलकदमियां उनकी राष्ट्रीय नीतियों की तरह ही थोथे दिखावे की ज्यादा रही है। राष्ट्रीय क्षेत्र में ऐसा दिखावा भी प्रचार माध्यमों की कृपा से कुछ दिनों तक चल जाता है, भ्रम बना रहता है, लेकिन कूटनीति के क्षेत्र में विफलताओं की गूंज तत्काल और बड़ी तेजी से सुनाई देने लगती है। इसीलिये, नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय नीतियों की अवहेलना करते हुए कूटनीतिक सफलताओं के बल पर राष्ट्रीय राजनीति में अपने महत्व को बनाये रखने की जो उल्टी चाल चली है, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को बैठा कर अकेले ही बाजी मार लेने की जो हड़बड़ी दिखाई है, उसके दुष्परिणामों को उन्हें जल्द ही भुगतना पड़ेगा। दिल्ली के चुनाव में ओबामा उनकी रक्षा नहीं करेंगे।

हाल में, विदेश सचिव पद से जिस भद्दे ढंग से सुजाता सिंह को एक झटके में विदा किया गया है, यह बताने के लिये काफी है कि अब तक की सारी कूटनीतिक कसरतों के बाद मोदी जी पर विफलता का अवसाद हावी होना शुरू हो गया है। ठीकरा फोड़ा गया है नौकरशाही पर।

सुजाता सिंह का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ था। वे अभी जाने को इच्छुक भी नहीं थी। और तो और, खबरों के अनुसार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से उनकी संगति बैठ गयी थी। उनके काल में विश्व देवता ओबामा का मोदी जी को पांच बार दर्शन का मौका मिला। चीन, रूस और सारी दुनिया के न जाने कितने देशों के राष्ट्रप्रधानों से मोदी जी की सीधी दोस्ती हुई। लेकिन जिस ओबामा यात्रा का झंडा उठा कर मोदी जी दिल्ली का चुनाव जीतने उतरे हुए हैं, उसी के पूरा होते न होते, इस यज्ञ के प्रमुख होता का ही पत्ता साफ कर दिया गया। ओबामा गये और उसके दो दिन बाद ही विदेश सचिव भी गयी। उनकी जगह अमेरिका में वर्तमान राजदूत एस. जयशंकर को ले आया गया है।

सुजाता सिंह ने जाते-जाते एक छोटा सा नोट लिखा है, जिसके बारे में कहते हैं - देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर। अपने इस नोट में उन्होंने लिखा है कि विदेश मंत्रालय एक संस्थान है जिसमें व्यक्ति की नहीं, संस्थान की भूमिका प्रमुख होती है। पिछले दिनों इस संस्थान को जो भी काम सुपुर्द किये गये, उनका पूरी मुस्तैदी के साथ पालन किया गया।

सुजाता सिंह के इस कथन से ही साफ है कि नौकरशाही की जिम्मेदारी नीतियों पर अमल की होती है, नीतियां बनाने की नहीं। नीतियों की सफलता-विफलता का दायित्व राजनीतिक नेतृत्व का है। उन्हें जो करने के लिये कहा गया, उन कामों को उन्होंने सफलता से किया। जाहिर है कि मोदी जी ने विदेश नीति के जरिये स्वदेश को साधने का जो उल्टा रास्ता पकड़ा है, उसके औंधे मूंह गिरने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय क्यों लेगा। सुजाता सिंह का नोट यही कहता है। भारतीय राजनीति का यह एक बड़ा सबक है कि जिसने भी विदेश नीति को केंद्र में रख कर राष्ट्रीय राजनीति पर निर्णय लिये है, उसके पास सिवाय मूंह के बल गिरने के कोई दूसरा चारा नहीं रहता। खास तौर पर अमेरिका के साथ संबंधों के मसले पर तो और भी नहीं।

सचमुच, जो चीज आसानी से हाथ में आती है, उतनी ही आसानी से चली भी जाती है। दिल्ली से अब उस तूफान के खत्म होने का सिलसिला शुरू हुआ है, जिसने आठ महीने पहले बेखबरी की स्थिति में इस देश को पकड़ लिया था। अब घृणित मध्ययुगीन सांप्रदायिक राजनीति, भूमि अधिग्रहण संबंधी सबसे निकृष्ट अध्यादेश और कॉरपोरेट को सब कुछ सौंप देने की इनकी बदहवासी ने मात्र आठ महीनों में ही इनके सारे उल्लास को अवसाद में बदलना शुरू कर दिया है। दिल्ली चुनाव में इनकी भाव-भंगिमाओं से ऐसा ही प्रतीत होता है।

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

कूटनीतिक विफलताओं की सार्वजनिक स्वीकृति


विदेश सचिव पद से जिस भद्दे ढंग से सुजाता सिंह को एक झटके में विदा किया गया है, यह बताने के लिये काफी है कि अब तक की सारी कूटनीतिक कसरतों के बाद मोदी जी पर विफलता का अवसाद हावी होना शुरू हो गया है। ठीकरा फोड़ा गया है नौकरशाही पर।
सुजाता सिंह का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ था। वे अभी जाने को इच्छुक भी नहीं थी। और तो और, खबरों के अनुसार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से उनकी संगति बैठ गयी थी। उनके काल में विश्व देवता ओबामा का मोदी जी का पांच बार दर्शन का मौका मिला। चीन, रूस और सारी दुनिया के न जाने कितने देशों के राष्ट्रप्रधानों से मोदी जी की सीधी दोस्ती हुई। लेकिन जिस ओबामा यात्रा का झंडा उठा कर मोदी जी दिल्ली का चुनाव जीतने उतरे हुए हैं, उसी के पूरा होते न होते, इस यज्ञ के प्रमुख होता का ही पत्ता साफ कर दिया गया। ओबामा गये और उसके दो दिन बाद ही विदेश सचिव भी गयी। उनकी जगह अमेरिका में वर्तमान राजदूत एस. जयशंकर को ले आया गया है।
सुजाता सिंह ने जाते-जाते एक छोटा सा नोट लिखा है, जिसके बारे में कहते हैं - देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर। अपने इस नोट में उन्होंने लिखा है कि विदेश मंत्रालय एक संस्थान है जिसमें व्यक्ति की नहीं, संस्थान की भूमिका प्रमुख होती है। पिछले दिनों इस संस्थान को जो भी काम सुपुर्द किये गये, उनका पूरी मुस्तैदी के साथ पालन किया गया।
सुजाता सिंह के इस कथन से ही साफ है कि नौकरशाही की जिम्मेदारी नीतियों पर अमल की होती है, नीतियां बनाने की नहीं। नीतियों की सफलता-विफलता का दायित्व राजनीतिक नेतृत्व का है। उन्हें जो करने के लिये कहा गया, उन कामों को उन्होंने सफलता से किया।
जाहिर है कि मोदी जी ने विदेश नीति के जरिये स्वदेश को साधने का जो उल्टा रास्ता पकड़ा है, उसके औंधे मूंह गिरने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय क्यों लेगा। सुजाता सिंह का नोट यही कहता है।
भारतीय राजनीति का यह एक बड़ा सबक है कि जिसने भी विदेश नीति को केंद्र में रख कर राष्ट्रीय राजनीति पर निर्णय लिये है, उसके पास सिवाय मूंह के बल गिरने के कोई दूसरा चारा नहीं रहता। खास तौर पर अमेरिका के साथ संबंधों के मसले पर तो और भी नहीं।

एक जेहादी सिद्धांतकार स्वपन दासगुप्त


आज (30 जनवरी 2015) के टेलिग्राफ में स्वपन दासगुप्त का लेख Obama’s parting speech will not harm Modi politically : Meeting the foreigner, एक जनूनी सिद्धांतकार की मध्ययुगीन अंधता का जीवंत उदाहरण है। इस्लामिक जेहादी यदि दुनिया की हर चीज को मजहबी राजनीति की नजर से देखते हैं तो हिंदुत्व के उग्रपंथी उनसे जरा भी भिन्न नहीं है। जेहादियों के लिये पश्चिमी जनतंत्र इस्लाम के खिलाफ क्रिश्चियनिटी के सदियों पुराने धर्मयुद्ध का ही एक रूप है; हर आधुनिक जनतांत्रिक विचार इस्लाम के खिलाफ खुली साजिश। इसी आधार पर वे अपने सारे कुकृत्यों के लिये वैधता प्राप्त करते हैं। हूबहू उसी मनोविकृति का दूसरा उदाहरण है स्वपन दासगुप्त का यह लेख।
ओबामा ने सिरिफोर्ट के अपने अंतिम भाषण में भारत के संविधान की धारा 25 का जिक्र किया था। भारतीय संविधान में नागरिकों के जनतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी इस जरूरी धारा का उल्लेख मात्र तमाम संघ परिवारियों को नागवार गुजरा और स्वपन दासगुप्त को भी। इसी उन्माद में उन्होंने अपने इस लेख में पश्चिमी प्रभुत्व का एक नया धार्मिक आख्यान रच डाला। विश्व प्रभुत्व की साम्राज्यवादी रणनीति को तुच्छ करके जेहादियों की तरह ही उसे धर्मयुद्ध के मध्ययुगीन प्रतीक में सिमटा दिया। उनके अनुसार बिना ऐसा किये ओबामा की अपने देश की राजनीति में दाल नहीं गल सकती थी। अमेरिकी नेता हमेशा अपने साथ इसाई धर्म का झंडा भी उठाये चलते हैं। उनकी बातों से आपको ऐसा लगेगा मानो भारत के संविधान निर्माताओं ने धारा 25 का निर्माण भारत के नागरिकों के लिये नहीं बल्कि किन्हीं विदेशी हितों को साधने के लिये विशेष तौर पर किया था।
पूरा संघ परिवार गैर-हिंदुओं को भारत में अराष्ट्रीय मानता है। स्वपन दासगुप्त ने इस लेख से साबित कर दिया कि वे भी ऐसा ही मानते हैं। इसीलिये ओबामा द्वारा धारा 25 के उल्लेख मात्र ने उन्हें उत्तेजित कर दिया। ‘धर्मान्तरण और घर वापसी’ वालों के पक्ष में आवाज उठाते हुए वे लिखते हैं उनके कामों ने निश्चित तौर पर political christianity को झकझोरा है। ओबामा के भाषण में उसीकी गूंज सुनाई दे रही है। उनके विरुद्ध स्वपन दासगुप्त ने राजनीतिक हिंदुत्व का झंडा उठाते हुए भी ओबामा की इस यात्रा को मोदी की कूटनीतिक सफलता का उदाहरण बताया है ! स्वपन दासगुप्त को साम्राज्यवाद के आर्थिक प्रभुत्व के किसी भी पहलू से कोई ऐतराज नहीं है, बशर्ते वह राजनीतिक हिंदुत्व को बढ़ावा देता रहे, जैसा कि अमेरिका अक्सर करता भी रहा है। सारी दुनिया के जेहादी समूह अमेरिकी रणनीति की ही उपज रहे हैं। स्वपन दासगुप्त अपने इस लेख में प्रकारांतर से भारत के हिंदू उग्रपंथियों के लिये भी अमेरिका से उसीप्रकार के स्वीकृतिमूलक और उत्साहवद्‍र्धक दृष्टिकोण की मांग भर कर रहे हैं।

थॉमस पिकेटी, मार्क्स और गैर-क्रांतिकारी परिस्थिति में अर्थनीति के संकेतक


अरुण माहेश्वरी

थॉमस पिकेटी, आज अर्थशास्त्र की दुनिया का एक सबसे अधिक चमकता हुआ सितारा है। पिछले साल प्रकाशित हुई उनकी किताब ‘Capital in the Twenty First Century’ ने अर्थनीति संबंधी चिंतन की दुनिया में ऐसी धूम मचा रखी है कि फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलोंद ने 2014 में अपने देश की दो प्रमुख नोबेल-जयी प्रतिभाओं (अर्थशास्त्री ज्यां तिरोले और साहित्यकार पैट्रिक मोदियानो) के साथ ही अपने इस नौजवान, सिर्फ 43 साल की उम्र के अर्थशास्त्री को भी फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान Legion d’Honneur (लीजों डिोरा) से नवाजने का निर्णय लिया। लेकिन पिकेटी ने तत्काल यह कह कर इस सम्मान को स्वीकारने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी कि ‘‘यह तय करना सरकार का काम नहीं है कि कौन सम्माननीय है और कौन नहीं। बल्कि सरकार फ्रांस और पूरे यूरोप को अभी के आर्थिक गतिरोध से निकालने पर ध्यान केंद्रित करें।’’

पिकेटी खुद किसी समय फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी के करीबी थे। लेकिन राष्ट्रपति ओलोंद की आर्थिक नीतियों की वजह से ही उन्होंने खुद को सोशलिस्ट पार्टी से दूर कर लिया क्योंकि उनका मानना है कि इन नीतियों के कारण ही फ्रांसीसी अर्थ-व्यवस्था आज गतिरोध का शिकार है और फ्रांस पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। कहना न होगा, पिकेटी ने फ्रांसीसी सरकार के सर्वोच्च सम्मान को ठुकरा कर अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता को हर हाल में कायम रखने के लिये जरूरी सरकारी संरक्षण और संसाधनों के प्रति बौद्धिकों के अपेक्षित नजरिये का एक आदर्श उदाहरण पेश किया है। फ्रांस के इस सर्वोच्च सम्मान को पिछले साल वहां के कार्टूनिस्ट जॉक तार्डी ने ठुकराया था। उसके पहले वामपंथी दार्शनिक ज्यां पाल सात्र्र और रेडियोलॉजी की दुनिया के दो रहनुमा पियेर और मरी क्यूरी भी इसे लेने से इंकार कर चुके हैंं।
पिकेटी की यह किताब, 21वीं सदी में पूंजी,  आय और संपत्ति में गैर-बराबरी के बारे में एक ऐसा राजनीतिक अर्थशास्त्रीय अध्ययन है जो पूरी तरह से ठोस आर्थिक आंकड़ों की गहराई से की गयी जांच-पड़ताल पर आधारित है। पिकेटी और सारी दुनिया में फैले उनके बीसियों विद्वान शोधकर्ता सहयोगियों ने दुनिया के बीस से ज्यादा विकसित और विकासशील देशों की राष्ट्रीय आय, उनके नागरिकों की आय और संपत्ति के बारे में तमाम आंकड़ों को इकट्ठा करके आय और संपत्ति के मामले में दुनिया के विभिन्न देशों में और साथ ही औसतन सारी दुनिया में गैर-बराबरी के जिस इतिहास की रचना की है, उसे अर्थशास्त्र की दुनिया में एक अनूठी उपलब्धि माना जा रहा है। पिकेटी ने इन तथ्यों के आधार पर माल्थुस और युंग से लेकर रेकार्डो तथा मार्क्स के राजनीतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा की है, उनकी विशेषताओं और कमजोरियों की ओर संकेत किया है और आगे आने वाले समय में एक गैर-बराबरी से मुक्त समृद्ध समाज के निर्माण के लिये कौन से ठोस उपाय हो सकते हैं, उनके बारे में विचार का एक व्यवहारिक आधार प्रदान किया है। इस किताब की अब तक पचास लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी है। पिकेटी के इस अध्ययन के लिये उन्हें अमेरिका के व्हाइट हाउस में भी विचार के लिये बुलाया गया था।

नोबेल जयी वरिष्ठ अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने इस किताब के बारे में न्यूयार्क टाइम्स में लिखा है कि ‘‘

‘‘यह कहना सही लगता है कि फ्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी का सबसे प्रमुख ग्रंथ Capital in the Twenty-First Century इस साल की, बल्कि, इस पूरे दशक की, अर्थशास्त्र पर सबसे महत्वपूर्ण किताब मानी जायेगी। आय और संपत्ति के बारे में दुनिया के सबसे प्रमुख विशेषज्ञ पिकेटी ने चंद आर्थिक कुलीनों के हाथ में बढ़ती हुई आय के संकेन्द्रण का दस्तावेज तैयार करने से भी कहीं ज्यादा बड़ा काम किया है। उन्होंने जोरदार दलीलें देकर यह बताया है कि हम ‘पैतृक पूंजीवाद’ के रास्ते पर फिर से लौट रहे हैं, जिसमें अर्थ-व्यवस्था की कमान सिर्फ संपत्तिधारियों के पास नहीं, बल्कि विरासत में मिली संपत्ति के मालिकों के हाथ में होगी, जिसमें आपका जन्म आपकी मेहनत और प्रतिभा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।’’

इसके पहले कि हम पिकेटी के इस अध्ययन के दूसरे सभी उल्लेखनीय पक्षों पर गंभीरता से गौर करें, यहां यह बता देना उचित होगा कि पिकेटी ने अपने इस अध्ययन में जिन आंकड़ों और तथ्यों को अपने लिये सबसे अधिक उपयोगी पाया हैं और जिनका अपने ग्रंथ में उन्होंने सबसे अधिक कारगर ढंग से इस्तेमाल किया है वे सभी दुनिया के तमाम देशों की सरकारों के पास जमा होने वाले आयकर और संपत्ति कर संबंधी नागरिकों के ब्यौरों (रिटर्न) से निकल कर आने वाले सरकारी तथ्य और आंकड़ें हैं। इनके जरिये उन्होंने बाकायदा नागरिकों की निजी आय और संपत्तियों के रूप में होने वाले परिवर्तनों, उतार-चढ़ावों का एक ब्यौरेवर चित्र प्रस्तुत किया है और उस पर उन देशों तथा सारी दुनिया की सामान्य ठोस राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में विवेचन किया है। इस पूरे विवेचन में अटकलबाजी अथवा वैचारिक पूर्वाग्रहों की भूमिका बिल्कुल नहीं के बराबर है और इसी अर्थ में यह पहले के तमाम महान राजनीतिक अर्थशास्त्रियों से अलग भी है। आयकर और संपत्ति कर संबंधी इन आंकड़ों की उपलब्धता के बिना आय और संपत्ति में गैर-बराबरी के रहस्य को शायद ही कभी माकूल ढंग से भेदा जा सकता था।

इस बात का उल्लेख हम पहले इसलिये कर देना चाहते हैं, क्योंकि हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं, जहां पिछले चुनाव के पहले बाबा रामदेव नामक शख्स ने आयकर मात्र को ही खत्म कर देने का प्रस्ताव रखा था और उस दौरान उनके इस ‘क्रांतिकारी’ सुझाव को वर्तमान वित्तमंत्री अरुण जेटली और पूरे संघ परिवार का परोक्ष रूप से समर्थन भी मिला था। आज थॉमस पिकेटी के अध्ययन को देखकर ऐसा लगता है कि अगर रामदेव जैसों के सुझाव को मान लिया जाए तो यह भारत की अर्थनीति को किसी आदिम युग, बल्कि जंगल युग में ले जाने जैसा कुकृत्य होगा। शिक्षा और संस्कृति के सभी विषयों पर आज संघ परिवार जिसप्रकार दीनानाथ बतरा और सुदर्शन राव जैसे लोगों के जरिये वैज्ञानिक शोध के बजाय अंधविश्वासों से भरे आदिम सोच को प्रोत्साहित करने में लगा हुआ है, ठीक वैसे ही  रामदेव कंपनी का प्रस्ताव अर्थनीति के क्षेत्र में एक आदिम और जंगल युग की वापसी का विचार था। यह हमारे नीतिकारों को एक घनघोर अंधेरे युग में धकेल देने का प्रस्ताव था।

बहरहाल, पिकेटी की इस किताब का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इसमें सम्पत्ति के आबंटन के मुद्दे को विचार का विषय बनाया है जिसे अर्थनीतिशास्त्र का सबसे चर्चित और विवादास्पद किन्तु एक मूलभूत विषय कहा जा सकता है। संपत्ति के उत्पादन के साथ ही संपत्ति के वितरण का इतिहास सामाजिक विकास की दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। मार्क्स का मानना था कि निजी पूंजी का अपना अंतर्निहित चरित्र और गठन ही कुछ ऐसा है कि उसके चलते अनिवार्य तौर पर संपत्ति का मुट्ठी भर लोगों के पास संकेंद्रण होता चला जाता है। पिकेटी ने अपनी किताब में यह सवाल उठाया है कि क्या यह बात पूरी तरह सच है ? उन्नीसवीं सदी में माक्र्स के इस सोच के विपरीत बीसवीं सदी में अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन कुजनर्स ने कहा कि आर्थिक अभिवृद्धि (growth), प्रतिद्वंद्विता तथा तकनीकी प्रगति की तरह की दूसरी संतुलनकारी शक्तियां विकास के परवर्ती चरणों में गैर-बराबरी को स्वत:स्फूर्त ढंग से कम करती हैं तथा समाज में विभिन्न वर्गों के बीच ज्यादा सामंजस्य पैदा करती है। पिकेटी पूछते हैं कि इन दो प्रकार के बिल्कुल विपरीत निष्कर्षों का आधार क्या है ? और फिर कहते हैं कि अठारहवीं सदी से लेकर अब तक की संपत्ति और आय के विकास की यथार्थ कहानी को हम जानते ही कितना है। इस बारे में ठोस तथ्यों की जानकारी के आधार पर ही हम आज की सदी और आगे के बारे में कोई सही निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं और सही शिक्षा ले सकते हैं।

पिकेटी ने अपनी किताब में इन्हीं चंद सवालों के उत्तर तलाशने की एक कोशिश की है। वे मानते हैं कि इन सवालों का उन्होंने कोई पक्का और अकाट्य उत्तर पा लिया है, इसका तो वे दावा नहीं कर सकते। लेकिन इन सवालों के जो भी जवाब उन्होंने हासिल किये हैं, वे किसी अटकलबाजी पर नहीं, बल्कि उन व्यापक ऐतिहासिक और तुलनात्मक आंकड़ों पर आधारित है, जो आंकड़ें इतनी प्रभूत मात्रा में पहले के शोधकर्ताओं को उपलब्ध ही नहीं थे। बीस से ज्यादा देशों के संबंध में संग्रहीत व्यापक आंकड़ों और उनकी गणना के नये सैद्धांतिक ढांचों और तकनीकी विधियों के प्रयोग से उनके अंदर से जाहिर होने वाली सामाजिक क्रियाशीलता की जो गहरी समझ हासिल की जा सकती है, वह शायद पहले संभव नहीं थी। यहां उल्लेखनीय है कि पिकेटी ने अपने इस काम में सारी दुनिया के कई प्रमुख शोधकर्ताओं की सेवाओं का उपयोग किया है जिनमें भारतीय मूल के शोधकर्ता अभिजीत बनर्जी भी शामिल हैं, जिनकी एस्थर डुफ्लो के साथ मिल कर लिखी गयी पुस्तक ‘Poor Economics & rethinking poverty & the ways to end it’ (2011) ने भी सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था।

पिकेटी कहते हैं कि मार्क्स ने पूंजीवाद के चलते समाज में पैदा होने वाले आर्थिक गतिरोध, और सामाजिक अन्तर्विरोधों की तीव्रता के कारण जिस प्रकार के सामाजिक विस्फोट की भविष्यवाणी की थी, उससे तो आर्थिक अभिवृद्धि के बल पर दुनिया अभी बच गयी है, लेकिन इस बचाव से पूंजी के आंतरिक ढांचों में, structures में कोई बदलाव नहीं आया है और न ही उनसे पैदा होने वाली गैर-बराबरी की सचाई बदली है, जिसकी उम्मीद द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियों में इधर के सालों में अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन कुजनेत्स वगैरह के द्वारा की जारही थी। इसके विपरीत, वे कहते हैं कि जब भी पूंजी से होने वाले मुनाफे की दर उत्पादन और आय में अभिवृद्धि की दर से ज्यादा होती है, तभी पूंजीवाद जैसे स्वत:स्फूर्त ढंग से निरंकुश (arbitrary) और न चलने लायक (unsustainable) गैर-बराबरियों को पैदा करने लगता है, जैसा कि 19वीं सदी में हुआ था, और वही स्थिति उन्हें आज 21वीं सदी में दिखाई दे रही है। ऐसे काल में प्रतिभाओं की कोई कीमत नहीं रह जाती जिस पर कोई भी जनतांत्रिक समाज टिका होता है।

गौर करने लायक बात है कि पिकेटी ने तथ्यों पर आधारित अपने अध्ययन के बल पर ‘न चलने लायक’ और ‘निरंकुश’ गैर-बराबरियों के मामले में 19वीं सदी, अर्थात मार्क्स के काल की तुलना 21वीं सदी के वर्तमान काल से की है। इसीलिये यह बेवजह नहीं है कि आज सारी दुनिया के आर्थिक और दार्शनिक चिंतन के केंद्र में फिर एक बार माक्र्स छाये हुए हैं। कम्युनिस्ट घोषणापत्र की पहली पंक्ति में ही माक्र्स ने जो कहा था कि ‘आज पूरे यूरोप को एक भूत आतंकित कर रहा है - कम्युनिज्म का भूत’, उसीप्रकार आज के, अर्थात 21वीं सदी के समूचे आर्थिक-बौद्धिक विमर्श पर, जिसमें पेशेवर अर्थशास्त्री से लेकर आज की दुनिया के उदीयमान, बौद्धिक तौर पर प्रखर उद्योगपति भी शामिल है, मार्क्स के विचारों का भूत छाया हुआ है और उनके उल्लेख के बिना कोई भी आज की दुनिया की गुत्थियों के बारे में कायदे की कोई बात कहने में अपने को असमर्थ पाता हैं।

बहरहाल, इसी परिप्रेक्ष्य में पिकेटी ने अपने इस ग्रंथ में उन तमाम उपायों की भी चर्चा की है जिनसे जनतंत्र पूंजीवाद के इस आंतरिक, संपत्ति और आय की गैर-बराबरी पैदा करने वाले स्वरूप को नियंत्रित कर सके और यह सुनिश्चित कर सके कि राज्य की नीतियों को निर्धारित करते समय सामान्य नागरिक हितों को निजी हितों की तुलना में प्राथमिकता दी जायेगी। और, इसके साथ ही अर्थ-व्यवस्था का खुलापन भी जारी रखा जा सके, संरक्षणवादी (protectionist) और राष्ट्रवादी (nationalist) प्रतिक्रियाओं से बचा जा सके। इसीलिये पिकेटी के इस ग्रंथ को सारी दुनिया में आर्थिक चिंतन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।

यहीं पर यह भी उल्लेखनीय है कि पिकेटी उन अर्थशास्त्रियों में हैं जिनकी 1989 में जब एक ओर फ्रांसीसी क्रांति की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी और दूसरी ओर बर्लिन की दीवार को ढहाया जा रहा था अर्थात समाजवादी शिविर के अंत की घोषणा की जा रही थी, उनकी उम्र सिर्फ 18 साल की थी। इसीलिये खुद उनके कहे अनुसार, उनमें सोवियत संघ और समाजवादी व्यवस्था को लेकर कभी किसी प्रकार का मोह नहीं रहा। न उनमें पूंजीवाद-विरोध की बैठे-ठाले की जाने वाली बातों के प्रति कोई आकर्षण है। वे अहद लेकर गैर-बराबरी की निंदा में भी नहीं उतरे हुए है। उन्हें गैर-बराबरी भी एक हद तक स्वीकार्य है जहां तक वह 1789 की मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा के अनुसार जनहित पर आधारित हो, यद्यपि ‘जनहित’ के बारे में उस घोषणा में की गयी परिभाषा बहुत स्पष्ट नहीं है। वे साफ कहते हैं कि मेरी दिलचस्पी सिर्फ सुचारु और स्वस्थ ढंग से समाज के संचालन में है। उन्होंने अमेरिका में अपना शोध करके डाक्टरेट किया था लेकिन अस्सी के दशक में ही फ्रांसीसी विश्वविद्यालयों में अर्थशास्त्र को उसकी आत्मलीनता से मुक्त करने, गणितीय अथवा सैद्धांतिक मतिग्रस्तता से निकालने का जो आंदोलन चला था, उसका निश्चित प्रभाव उनके निर्माण में दिखाई देता है।  

बहरहाल, पिकेटी ने अपने अध्ययन की पृष्ठभूमि के रूप में सरसरी तौर पर राजनीतिक अर्थशास्त्र के अब तक के इतिहास पर एक नजर डाली है। वे प्रारंभ करते हैं माल्थस, युंग और फ्रांसीसी क्रांति से, अर्थात 18वीं सदी के अंतिम काल और 19वीं सदी के प्रारंभिक सालों से, जब पहली बार इंगलैंड और फ्रांस में आय और संपत्ति के आबंटन का सवाल राजनीतिक अर्थशास्त्र के विमर्श के केंद्र में आगया था। औद्योगिक क्रांति के चलते देहातों के गरीब शहरों में आकर जमा होने लगे थे। यह एक प्रकार का सामाजिक भूचाल था। उन्हीं दिनों युंग की फ्रांस के सुदूर इलाकों की एक यात्रा डायरी प्रकाशित हुई, जिसमें वहां के देहातों में भयावह गरीबी के चित्र खींचे गये थे। तब फ्रांस ही यूरोप में सबसे अधिक आबादी का देश था। फ्रांस की आबादी दो करोड़ थी जबकि इंगलैंड की आबादी सिर्फ अस्सी लाख। और, इसी सबसे बड़ी आबादी वाले फ्रांस में 1789 की फ्रांसीसी क्रांति हुई जिसके चलते वहां की विधायी सभा में कुलीनों के साथ-साथ साधारण जनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। युंग इस घटना को समाज के लिये एक भारी तबाही का संकेत मानते थे। वे फ्रांस की क्रांति से आतंकित थे।

कुलीनों के इसी आतंक की गूंज इंगलैंड में राजनीतिक अर्थशास्त्र के विमर्श में सुनाई देने लगी और यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि आबादी के विस्फोट से पूरे सामाजिक ढांचे, यूरोप के राजनीतिक संतुलन पर क्या असर पड़ेगा ? फ्रांस की क्रांति को वहां की आबादी के अनुपात से जोड़ कर देखा जा रहा था। इसी पृष्ठभूमि में माल्थस का प्रसिद्ध 1798 का निबंध आया - Essay on the principle of population।  वे युंग से भी कहीं ज्यादा इस पूरे घटनाक्रम से डरे हुए थे। इंगलैंड में इसकी पुनरावृत्ति न होने पाए, इसके लिये उन्होंने गरीबों को दी जाने वाली हर मदद को तत्काल रोक देने, उनके प्रजनन को ही नियंत्रित करने की बात की ताकि अति-आबादी से पैदा होने वाली अराजकता और दुर्दशा से बचा जा सके।

पिकेटी ने इस बात का उल्लेख करते हुए कहा है कि माल्थस और युंग के सोच के केंद्र में संपत्ति के आबंटन से जुड़े सवाल ही काम कर रहे थे जिसमें वे भारी तबाही की आशंका कर रहे थे। इसके बाद ही पिकेटी रेकार्डो और कार्ल मार्क्स की चर्चा करते हैं। इन दोनों की निगाहें भी उत्पादन और आमदनी के साधनों की मिल्कियत के सवाल पर टिकी हुई थी। रेकार्डो जमीन के संकेन्द्रण के जरिये संपत्ति को सामंती तबकों के पास सिमटते हुए देखते हैं और मार्क्स औद्योगिक क्रांति के कारण पूंजीपतियों के पास।
सन् 1817 में रेकार्डो की किताब आई - Principles of Political Economy and Taxation। एक यहूदी महाजन के घर में जन्मे रेकार्डो के सामने अपने समय के पूंजीवाद की प्रव्त्तियों की एक साफ तस्वीर थी। उन्हें लगता था कि जैसे-जैसे उत्पादन और संपत्ति बढ़ेंगे, भूमि अन्य चीजों की तुलना में एक अनमोल चीज होती चली जायेगी। इससे अंतत: सामंतों के हाथ में राष्ट्रीय आमदनी का अधिकांश हिस्सा सिमटता जायेगा। ऐसा न होने पायें, इसीलिये उन्होंने जमींदारों पर उनकी संपत्ति के अनुसार ज्यादा से ज्यादा कर लगाने की बात कही। वे मानते थे कि समाज में किसी भी वस्तु की कीमत की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन मूल्य को आंकने की न कोई सीमा होती है और न ही कोई नैतिकता। इसीके चलते संपत्ति चंद हाथों में सिमटती जाती है, सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है और फ्रांसीसी क्रांति की तरह की भारी सामाजिक तबाही मचती है।

पिकेटी कहते हैं ‘‘लेकिन हमेशा की तरह ही सबसे बुरी स्थिति का आना भी सुनिश्चित नहीं होता है।’’
रेकार्डो के विपरीत, मार्क्स  ने पूंजीवाद के अन्तर्गत पूंजीपतियों के हाथ में एक प्रकार के अनंत संचय (infinite accumulation) के अंतर्निहित सच को देखा था। और इसीके अनिवार्य परिणाम के तौर पर उन्होंने सामाजिक क्रांति की भविष्यवाणी की थी।

मार्क्स के इस प्रसंग में पिकेटी का कहना हैं कि मार्क्स के जमाने तक जिस दर से सामाजिक गैर-बराबरी बढ़ रही थी, जिसका एक चित्र इंगलैंड के मजदूर वर्ग की दशा के बारे में एंगेल्स की किताब में देखने को मिलता है, वह 1870 से 1914 (प्रथम विश्वयुद्ध के समय) तक जैसे एक जगह आकर थम सी गयी थी। 1840 के जमाने में जब कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखा गया था उस समय तक औद्योगिक मुनाफा तो लगातार बढ़ रहा था लेकिन श्रम की आमदनी जस की तस पड़ी थी। इसी पृष्ठभूमि में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्म हुआ। पूंजी का मुनाफा बढ़ता है लेकिन मजदूर वर्ग की दशा में कोई सुधार नहीं होता। और, इसीलिये मार्क्स ने सामाजिक क्रांति के जरिये बुर्जुआ की पराजय और सर्वहारा की विजय की अनिवार्यता की भविष्यवाणी की थी। यह पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था के आंतरिक अंतर्विरोंधों की एक तार्किक परिणति थी। माक्र्स की यह भविष्यवाणी पूंजी के संकेंद्रण और मुफलिसी के विस्तार के संदर्भ में सच के सबसे ज्यादा करीब थी।

लेकिन पिकेटी ने संग्रहीत आंकड़ों से पाया कि 19वीं सदी के अंतिम सालों में, कोई भी कारण क्यों न हो, इस लगातार बढ़ रही गैर-बराबरी में एक ठहराव आगया। मजदूरों की क्रयशक्ति में वृद्धि ने पूरे परिदृश्य को बदलना शुरू कर दिया। कम्युनिस्ट क्रांति हुई लेकिन वह यूरोप के सबसे पिछड़े हुए देश में। इसके बारे में पिकेटी कहते हैं कि मार्क्स ने तकनीकी क्रांति को देखा था लेकिन तकनीक की प्रगति के टिकाऊ रूप को वे पकड़ नहीं पाये थे, जिसका संचय की प्रक्रिया और निजी पूंजी के संकेंद्रण के प्रभाव के विपरीत एक प्रकार का निराकरणकारी प्रभाव पड़ रहा था। पिकेटी का कहना है कि इस बात को पकड़ने के लिये मार्क्स के पास जरूरी आंकड़ें उपलब्ध नहीं थे। इसके अलावा, कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के साथ उन्होंने अपने को एक राजनीतिक लक्ष्य से भी जोड़ लिया था जिसके चलते उन्होंने अपने समय के सभी दूसरे संकेतों की और गहराई से जांच करना जरूरी नहीं समझा। पिकेटी की एक राय यह भी है कि मार्क्स ने इस बात पर ज्यादा गहराई से गौर करने की कोशिश नहीं की कि जिस समाज में निजी पूंजी का पूरी तरह से खात्मा हो जायेगा, उस समाज का वास्तविक आर्थिक और राजनीतिक स्वरूप क्या होगा ? उनके अनुसार, यह एक बहुत ही जटिल सवाल है क्योंकि अब तक का अनुभव यही बताता है कि जिस समाज में भी निजी पूंजी खत्म हुई है वहीं पर सर्वाधिकारवादी राज्य के दुखांतकारी प्रयोग हुए हैं।

मार्क्स के निष्कर्षों की इन सीमाओं के बावजूद, पिकेटी पूंजी के बारे में उनके विश्लेषण को पूरी तरह से वैध मानते हैं। मार्क्स ने पूंजीवाद के तहत पूंजी के अनंत संचय के बारे में जो अन्तरदृष्टि प्रदान की, उससे 21वीं सदी के पूंजीवाद का उसी प्रकार अध्ययन हो सकता है जैसा कि उन्होंने खुद 19वीं सदी तक के पूंजीवाद का किया था। आबादी और उत्पादन में अभिवृद्धि (growth) की दर यदि कम होगी और संपत्ति के बेहिसाब संचय का अबाध सिलसिला जारी रहेगा तो वह समाज को अस्थिर कर देने के लिये काफी होगा। कहने का तात्पर्य यह कि कम दर से अभिवृद्धि होने पर मार्क्स ने जिस तबाही की भविष्यवाणी की थी, उसे झुठलाया नहीं जा सकता।

पिकेटी बताते हैं कि 19वीं सदी के अनुभवों के आधार पर रेकार्डो और मार्क्स जो भविष्यवाणी कर रहे थे, ठीक उसके विपरीत 20वीं सदी में अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन कुजनेत्स बिल्कुल परियों के देश की कहानी सुनाने लगे थे। वे कह रहे थे कि पूंजीवादी विकास के आगे बढ़े हुए चरणों में आय की गैर-बराबरी स्वत:स्फूर्त ढंग से कम होती जायेगी। वह सन् 1955 का जमाना था, युद्ध के बाद का जादूई समय, ब्रेटनवुड्स संस्थाओं और यूरोप के पुनर्गठन की मार्शल योजना का समय था। 1945 से 1975 के बीच के इस काल को फ्रांस में तीस शानदार वर्षों (Trente Glorieuses’) के रूप में याद किया जाता है। इन चंद सालों के अनुभव के आधार पर कुजनेत्स दुनिया को बता रहे थे कि ‘‘अभिवृद्धि एक ऊपर उठती हुई लहर है जो अपने साथ सभी नौकाओं को ऊपर उठायेगी’’। सिर्फ धीरज रखने की जरूरत है, सबके दिन फिरेंगे। अभिवृद्धि की इस यात्रा में उत्पादन, मुनाफा, आमदनी, मजदूरी, पूंजी, संपत्ति की कीमतें आदि सब समान गति से बढ़ेंगे जिनसे समाज के सभी तबकों को समान रूप से लाभ मिलेगा।

इसप्रकार, रेकार्डों और मार्क्स ने जिस विषमता के उध्र्वगति से बढ़ते चक्र के आधार पर 19वीं सदी में सामाजिक विप्लव की बात कही थी, कुजनेत्स अपने विश्लेषण से उनके बिल्कुल विपरीत छोर पर खड़े थे।
पिकेटी बताते हैं कि कुजनेत्स का यह अभिवृद्धि से आय और संपत्ति की गैर-बराबरी में कमी का सिद्धांत ऐसा पहला सिद्धांत था जो कुछ हद तक प्रामाणिक सांख्यिकी पर आधारित था। पहली बार उन्होंने अमेरिका में लोगों की आय संबंधी आंकड़ों को आधार बना कर अपनी बात रखी थी। अमेरिका में 1913 में ही आयकर लागू किया गया था। उसके पहले तो किसी के पास भी नागरिकों की आमदनी को जानने का कोई प्रामाणिक स्रोत ही नहीं था। आयकर और संपत्तिकर के आंकड़ों के बिना आय और संपत्ति के मामले में गैर-बराबरी में वृद्धि अथवा गिरावट को कूतने का कोई प्रामाणिक तरीका उपलब्ध नहीं था। राष्ट्रीय आय में ऊंची आय वाले तबकों का कितना हिस्सा है, इसकी जानकारी आयकर रिटर्न के तथ्यों से ही मिल सकती थी।

कुजनेत्स ने इन आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पाया कि 1913 से 1948 के बीच अमेरिका में आय के मामले में गैर-बराबरी काफी कम हुई है।

माल्थस, रेकार्डो, मार्क्स कह रहे थे कि गैर-बराबरी भयावह रूप से बढ़ रही है लेकिन उनके पास इसके ठोस आंकड़ें मौजूद नहीं थे। इसके विपरीत कुजनेत्स के पास कुछ आंकड़ें उपलब्ध थे और वे यह सुखदायी समाचार दे रहे थे कि गैर-बराबरी कम हो रही है। वे अर्थ-व्यवस्था में विकास और आर्थिक गैर-बराबरी के आंकड़ों से जो ग्राफ पेश कर रहे थे, उसका आकार एक घंटी की तरह था, कुजनेत्स कर्व। इसमें बताया जारहा था कि आर्थिक अभिवृद्धि में पहले गैर-बराबरी बढ़ेगी और फिर औद्योगीकरण और आर्थिक विकास के साथ-साथ, धीरे-धीरे एक समय के अंतराल पर कम होगी। वे इसे माक्र्स के पूंजी के अन्तर्निहित तर्क की तुलना में आर्थिक विकास का अन्तर्निहित तर्क बता रहे थे। सन् 1953 में कुजनेत्स की किताब आई - Shares of upper incoms and savings। इसमें उन्होंने आंकड़ों को जिस प्रकार पेश किया उनका आगे सारी दुनिया में एक बड़े राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया, जबकि खुद कुजनेत्स ऐसे निष्कर्ष तक पहुंचने का एक प्रकार की अटकलबाजी ही मानते थे। पिकेटी बताते हैं कि काफी अंश तक कुजनेत्स कर्व का सिद्धांत शीत युद्ध की राजनीति की एक उपज था।

1914 से लेकर 1945 के बीच धनी देशों में गैर-बराबरी में कमी को कुजनेत्स आर्थिक विकास का एक अन्तर्निहित तर्क कह रहे थे, उसे ही पिकेटी दो विश्व युद्धों  और उनसे पैदा होने वाले आर्थिक और राजनीतिक झटकों का परिणाम बताते हैं। वे कहते हैं कि इस दौरान समाज के बड़े भाग्यवानों के हितों को खासा झटका लगा था। कुजनेत्स इसके कारण के तौर पर पूंजी की एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में गतिशीलता (inter-sectoral mobility) की जिस स्वत:स्फूर्त शांत प्रक्रिया की चर्चा करते हैं, उसका गैर-बराबरी में इस कमी से कोई संबंध नहीं है।

बहरहाल, राजनीतिक अर्थशास्त्र के इस समूचे ऐतिहासिक विमर्श को पिकेटी इसलिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि इसने आय और संपत्ति के वितरण (distribution) के सवाल को अर्थनीतिशास्त्र का एक केंद्रीय सवाल बना दिया। इसी प्रश्न की रोशनी में अपनी किताब में उन्होंने 21वीं सदी में पूंजी के यथार्थ के बारे में छान-बीन करके कुछ नतीजों का अनुमान लगाने की कोशिश की है। वे अपने संग्रहीत आंकड़ों के आधार पर बताते हैं कि 1970 के बाद से दुनिया के धनी देशों में, खासकर अमेरिका में आय की गैर-बराबरी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। 21वीं सदी के प्रारंभ के सालों में यह संकेंद्रण और भी ज्यादा गति से बढ़ते हुए 20वीं सदी के दूसरे दशक के स्तर तक चला गया है। इसी तथ्य के आधार पर वे कहते हैं कि बीच के कुछ सालों तक गैर-बराबरी बढ़ने के बजाय कम क्यों हुई इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। इसके कारण पूंजीवादी विकास के किसी अन्तर्निहित नियम में नहीं, बल्कि उसके बाहर की राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं में छिपे हुए हैं।

वे बताते हैं कि चीन की तरह के एक गरीब और विकासशील देश के विकास ने विश्व-स्तर पर गैर-बराबरी को कम करने में एक भूमिका अदा की है। लेकिन इसकी वजह भी वही रही है जो 1945 से 1975 के बीच यूरोपीय धनी देशों में गैर-बराबरी में वृद्धि के रुकने की वजह रही है। लेकिन सभी धनी देशों में वित्तीय बाजार, तेल के बाजार और रीयल इस्टेट में मनमानी कीमतें वसूले जाने की वजह से जो असंतुलन पैदा हुआ है और जिसने फिर से गैर-बराबरी में वृद्धि की गति को तेज कर दिया है, वह कुजनेत्स जैसे ‘संतुलित विकासपथ’ के सिद्धांतकारों की पूरी समझ को संदेह के दायरे में ले आती है। आज सबको यह सवाल सताने लगा है कि क्या 2050 से 2100 के बीच की दुनिया पर बड़े व्यापारियों, वित्तीय प्रबंधकों, अति-धनाढ्यों (super rich), तेल उत्पादक देशों और बैंक आफ चायना का कब्जा होगा ? या फिर कर-स्वर्गों (tax heavens) में पनाह लिये बैठै वित्तशालियों का कब्जा होगा ?

पिकेटी की साफ राय है कि बिना इस सवाल से दो-चार हुए कि आगे कौन किस पर कब्जा करने वाला है, सिर्फ यह मान लेना कि विकास (growth) अन्तत: ‘संतुलन’ पैदा कर देगा, एक मूर्खतापूर्ण सोच है। ऐसा मानने का कोई भी ठोस आधार नहीं है। खास तौर पर आज, जब सारे तथ्य यह बता रहे हैं कि घूम-फिर कर हम फिर उसी जगह आ खड़े हुए हैं जहां 19वीं सदी में हमारे पूर्वज खड़े थे। धन में वृद्धि जितनी बेतहाशा हो रही है, उतनी ही गति से आय और संपत्ति का संकेंद्रण बढ़ रहा है और व्यापक जनता का जीवन अपरिवर्तित रह रहा है।

इसीलिये पिकेटी मानते हैं कि रेकार्डों, मार्क्स आदि ने भले ही अपने प्रश्नों के पूरी तरह से संतोषप्रद जवाब न दिये हो, लेकिन उन्होंने सवाल बिल्कुल सही उठाये थे। उन्होंने राजनीतिक अर्थशास्त्र के केंद्रीय विषय के रूप में वितरण के प्रश्न को रखा था और वे इसके दीर्घकालीन सामाजिक दुष्परिणाम साफ तौर पर देख रहे थे। खास तौर पर माक्र्स ने पूंजीवाद की अपनी गति के नियम को, धन के अनंत संकेंद्रण की प्रक्रिया को ठोस रूप में पहचान लिया था जो आज भी उतना ही वैध है जितना 19वीं सदी के उत्तराद्र्ध में था। कुजनेत्स की तरह के झूठे आशावादी निष्कर्षों से खुशफहमी जरूर पैदा हो सकती है, अर्थनीति के अन्तर्निहित नियमों का कोई अंदाज नहीं मिलता। कुजनेत्स ने अर्थनीति का भला सिर्फ एक मायने में किया कि उन्होंने आय और संपत्ति के उपलब्ध आंकड़ों के जरिये समाज में गैर-बराबरी को मापने के ठोस औजारों को अर्थनीतिशास्त्र का विषय बनाया।

पिकेटी ने अपने इस अध्ययन में कुजनेत्स के काम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया है। आयकर और संपत्तिकर संबंधी आंकड़ों से गैर-बराबरी के क्रम को दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में समझने की एक प्रविधि का विकास किया है। अपने अध्ययन में पिकेटी बताते हैं कि इस दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में देखने पर ही यह बात साफ जाहिर होती है कि आय का एक स्रोत यदि मानव श्रमशक्ति है तो दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण स्रोत संपत्ति भी है। वेतन, मजूरी, बोनस तथा ऐसी ही दूसरी आमदनियां श्रम से पैदा होती है और किराया, लाभांश, ब्याज, मुनाफा, पूंजीगत लाभ का स्रोत अमूमन संपत्ति होती है।

इसप्रकार, पिकेटी स्थापित करते हैं कि आर्थिक नियतिवादी नजरिये से गैर-बराबरी को कम करने की दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ा जा सकता है। 1910 से 1950 के बीच के सालों में इसपर मामूली अंकुश लगने के पीछे आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक कारण ही प्रमुख थे। इसीलिये राजनेताओं की प्रतिबद्धताएं, उनके सोच और रुझानों का गैर-बराबरी में वृद्धि को रोकने तथा उसे कम करने में भारी महत्व है। यही स्थिति संपत्ति के मामले में गैर-बराबरी को लेकर भी है। इस दिशा में सिर्फ व्यापार के लिये सीमाओं को खोलने के बजाय ज्ञान के अधिक से अधिक विस्तार से, एक प्रकार के तकनीकी विवेक के प्रसार से कुछ अग्रगति हासिल की जा सकती है।

पिकेटी वर्गयुद्ध बनाम कम विभाजनकारी पीढि़यों के संघर्ष की तरह की असंगत बहसों को खड़ा करने वालों के आशावाद को भी भ्रामक बताते है। ‘जवानी में कमाते हैं सुरक्षित बुढ़ापे के लिये’ की तरह के जीवनदर्शन के चलते सूदखोरों के वंशधरों और मजदूरों के वंशधरों के बीच संपत्ति और आय की गैर-बराबरी का विषय गौण हो जायेगा। कहा जा रहा है कि इससे पूंजी का मूल सामाजिक चरित्र ही बदल जायेगा।

पिकेटी तथ्यों के आधार पर यह बताते हैं कि राष्ट्रीय आय में श्रम का हिस्सा लंबी कालावधि में बढ़ता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। 18वीं, 19वीं सदी की तरह ही 21वीं सदी में भी ‘गैर-मानवीय’ (non-human) पूंजी से कोई मुक्ति नहीं है और इसका कोई कारण नहीं दिखाई देता कि आगे भी यही जारी नहीं रहेगा। अतीत की तरह ही अब भी संपत्ति की गैर-बराबरी का आयुवर्ग से कोई संबंध नहीं है। विरासत में मिली संपत्ति 21वीं सदी के प्रारंभ में भी उतनी ही निर्णायक है जितनी बाल्जक के Pere Goriot के समय में थी। हां, इस पूरे काल में अगर किसी चीज में थोड़ी समानता आई है तो वह है ज्ञान और दक्षता के क्षेत्र में समानता। पिकेटी इसे ही, ज्ञान और दक्षता के विस्तार को आगे गैर-बराबरी पर काबू पाने के औजार के रूप में कुछ अंश तक जरूर देखते हैं। इसी आधार पर वे साफ देखते हैं कि शिक्षा और प्रशिक्षण पर निवेश को रोक कर किसी भी समुदाय को आर्थिक विकास के लाभों की हिस्सेदारी से वंचित किया जा सकता है। इसीलिये दुनिया में समरसता कभी भी स्वाभाविक या स्वत:स्फूर्त ढंग से नहीं आ सकती है। इसका एक गहरा संबंध राज्य की शिक्षा नीति से है।

‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के ताजा 24 जनवरी के अंक में  अमेरिका के नये आभिजात्यों (America’s new aristocracy) पर जो सामग्री आई है, वह भी यह बताती है कि शिक्षा के मामले में भेद-भाव से अमेरिका में एक नये आभिजात्य वर्ग को पैदा किया जा रहा है। ‘‘Middle-class students have to rack up huge debts to attend college, especially if they want a post-graduate degree, which many desirable jobs now require. The link between parental income and a child’s academic success has grown stronger, as clever people become richer and splash out on their daughter’s Mandarin tutor, and education matters more than it used to, because the demand for brainpower has soured.”

पिकेटी का निष्कर्ष है कि जब भी पूंजी पर होने वाला मुनाफा अर्थ-व्यवस्था में विकास की दर से ज्यादा होने लगता है (जैसा कि 19वीं सदी के पहले तक और अब 21वीं सदी में हो रहा है), तब स्वाभाविक तौर पर पैतृक संपत्ति उत्पादन और आमदनी की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ती है, वह जीवन में अर्जित संपत्ति पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेती है। आभिजात्य वर्ग तभी पैदा होता है।

इन सबके बावजूद, अपने अध्ययन के आधार पर पिकेटी का यह दृढ़ विश्वास है कि वे इन सबमें पूर्ण तबाही को अनिवार्य तौर पर नहीं देखते है। उनका मानना है कि समरसता की तरह ही विभाजन भी स्थायी नहीं है और संपत्ति के वितरण की संभावनाएं बेहद कम होने पर भी बनी रहती है। जाहिर है, इसमें राज्य की आर्थिक नीतियों, उसके रूझानों की भूमिका प्रमुख है। इसीलिये, सारी दुनिया में पिकेटी के अध्ययन और उनके निष्कर्षों के बारे में भारी आकर्षण है। वह किसी भी जन-कल्याणकारी राज्य की नीतियों के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है और राज्य की अब तक की नीतियों में कमियों को उजागर भी करती है। उन्होंने पूंजी के मार्क्स के बताये गये अन्दुरूनी ढांचे को नये ऐतिहासिक संदर्भों में भी वैध मानते हुए भी गैर-क्रांतिकारी परिस्थितियों में अर्थनीतिक बदलावों के जरिये गैर-बराबरी पर अंकुश लगाने के उपायों की ओर संकेत किया है। यह गैर-क्रांतिकारी परिस्थितियों में वामपंथियों के राजनीतिक कार्यक्रमों के लिये एक बेहद उपयोगी अध्ययन साबित हो सकता है।