रविवार, 6 सितंबर 2015

रवीन्द्रनाथ, छायावाद और हिंदी आलोचना

अरुण माहेश्वरी

3 नवंबर 2006। लगभग नौ साल पूरे हो रहे हैं। इसी तारीख को दर्ज करके कम्प्यूटर पर रवीन्द्रनाथ पर लिखने का बीड़ा उठाया था। मोटे तौर पर एक खाका तैयार था। हिंदी में उन पर अब तक जो भी देखा, इतना कम लगता था कि क्षोभ होता था। तय किया, इस कमी को पूरा किया जायेगा ; अधिकतम विस्तार के साथ उस जीवन और कृतित्व को समेटा जायेगा। अलग से एक रैक पर रवीन्द्र रचनावली के भारी-भरकम सोलह खंड, प्रभात कुमार मुखोपाध्याय के ‘रवीन्द्रजीवन’ के चार खंड, प्रशांतकुमार पाल के ‘रविजीवन’ के नौ खंड, नेपाल मजुमदार के ‘भारते जातीयता उ अन्तरजातीयता एवं रवीन्द्रनाथ’ के पांच खंड, साहित्य अकादमी द्वारा हिंदी में प्रकाशित रवीन्द्रनाथ की रचनाओं, अन्नदाशंकर राय, शंखो घोष आदि-आदि की लगभग एक सौ किताबों को सजा लिया। 

अपने प्रकल्प के मंगलाचरण के तौर पर मजरूह की गजल के एक बंद ‘‘ मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर/लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया’’ और खुद रवीन्द्रनाथ के एक गीत को लिखा - बाहर से न देखो ऐसे मुझे,/मत देखो मुझे बाहर/न मिलूंगा अपने दुख और सुख में,/न खोजो मेरी पीड़ा मेरे हृदय में,/नहीं देख पाओंगे मुझे मेरे चेहरे में,/हे कवि खोजते जहां वहां नहीं रे।/ जो-मैं मूरत सपनों की लुकछिप करता,/जो-मैं अपने को समझने में नहीं समझता, /अपने ही गीतों से खुद हारता,/मैं वह कवि, कौन पकड़ सकता मुझे।/मनुष्य आकार में जो बंधे चौखट में,/हर पल गिरते भू पर,/कांपते जो स्तुति-निंदा के ज्वर से,/हे कवि नहीं मिलेगा उनके जीवनचरित में।‘‘ 

अपने सिर्फ एक सवाल की नौका के साथ रवीन्द्र साहित्य के इस विशाल समंदर में उतर पड़ा कि आखिर ‘‘एक ऐसे अकुंठ, अखंड और संपूर्ण मानवता को समर्पित रवीन्द्रनाथ के समान विराट और वैभवशाली व्यक्तित्व का भारत की तरह के गरीब और गुलाम देश में निर्माण संभव कैसे हुआ ? 

भारी उत्साह से काम शुरू किया। कुल-गोत्र की कहानी कहने के साथ ही दो पीढ़ी पहले के पूर्वजों का किस्सा शुरू होगया। उनसे अभिन्न बांग्ला नवजागरण का विशाल इतिहास। राज राममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, यंग बंगाल, ब्रह्मो समाज और फैलता हुआ ठाकुर परिवार। परिवार क्या, खुद में एक इतिहास, कई पीढि़यों के अपने काल के दक्काक लोगों का एक भारी जमावड़ा। इन सारे महानों को पार करके रवीन्द्रनाथ तक पहुंचने के पहले ही सांसों को और दम की जरूरत महसूस होने लगी। आगे 12 साल की उम्र से लेकर 80 साल की उम्र तक तमाम प्रकार की विधाओं में उनके लगातार लेखन, एक संगीतकार, चित्रकार और नाटकों के अभिनेता-निदेशक के रूप में बिना किसी ओर-छोर वाला उनका अभावनीय सम्मोहक जीवन भी दिख रहा था। कहना न होगा, इस समंदर की यात्रा में उतरने के उत्साह के ज्वार में उतनी ही तेजी से भाटा आने में देर न लगी। देखते-देखते उसे निहारते हुए ही नौ साल बीत गये। जो दो-चार सौ पन्ने लिखे, उसमें अब तक उनके पूर्वजों की देहरी पार कर रवीन्द्रनाथ के अपने घर तक ही नहीं पहुंच पाया। पता चल गया कि क्यों बांग्ला में सैकड़ों ऐसे शोधकर्ता हैं जिन्होंने अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ रवीन्द्रनाथ पर ही काम किया और प्रशांतकुमार पाल की तरह अपनी लंबी जिन्दगी के अंत तक काम को पूरा न कर पाने की गहरी पीड़ा के साथ विदा होगये। 

जिस किसी ने रवीन्द्रनाथ की बौद्धिक संरचना के तंतुओं को समग्रता में पकड़ने की कोशिश की, प्राय: सबकी एक ही दशा रही। सत्यजीत राय ने उनपर एक डाक्यूमेंट्री बनाई, जो बनने का नाम ही नहीं ले रही थी। नियत समय से दुगुना समय बीत गया। अंत में हार कर, कमियों की बिना परवाह किये, उन्होंने उसे पूरा किया और उस काम से मुक्त हुए। अपनी इस डाक्यूमेंट्री के बारे में उन्होंने कहा कि तीन कथा चित्रों को बनाने में मुझे जितनी मेहनत लगती, उतनी इस एक वृत्त चित्र के निर्माण में लगी है। 

बिल्कुल ताजा प्रसंग है सुधीर कक्कड़ का। उन्होंने बीड़ा उठाया रवीन्द्रनाथ की मनोवैज्ञानिक जीवनी लिखने का। उनके जीवन के कुछ विशेष सूत्रों ने, खास तौर पर रवीन्द्रनाथ की भाभी कादम्बरी देवी के साथ उनके संबंधों की गूढ़ता ने इस मनोविश्लेषक को आकर्षित किया था। लेकिन शीघ्र ही अपने काम को ‘युवा रवीन्द्रनाथ’ तक सीमित रखते हुए उन्होंने रोडिन के लिये रिल्के के शब्दों को दोहराते हुए किसी प्रकार पूरा किया कि ‘‘यह किसी जलप्रपात में एक प्याले को लेकर खड़े होने के समान था।’’ अपनी मुश्किल का बयान करते हुए वे लिखते हैं कि ‘‘ 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध के ब्रिटिश शासन के बंगाल में एक ऐसे ऊंची जाति के ब्राह्मण परिवार में रवि का बचपन तैयार हुआ जो कहीं से पुरातनपंथी नहीं था, बल्कि हिंदू परंपरा और पश्चिम से प्रेरित आधुनिकता के बीच की दरार को जी रहा था। बाल मनोवैज्ञानिक रेले स्पिज के एक कथन में कहूंगा, बालक रवि बिना किसी इतिहास के पैदा हुआ था; बहुत जल्द ही उसके पूर्वज और कलकत्ता के जोड़ासांको का ठाकुर परिवार उसे अपना इतिहास देने वाला था।’’

और जिसकी बौद्धिक आकृति को पूरा नहीं जाना, तो उसकी रचनात्मकता की सही पहचान कैसे हो ! 

हिंदी में कथित रूप से आलोचना की एक ‘दूसरी परंपरा’ की धारा लाने वाले हजारीप्रसाद द्विवेदी शांतिनिकेतन में लगभग बीस साल तक रहे। खुद रवीन्द्रनाथ के साथ उन्होंने ग्यारह साल बिताये। उन्हें बहुत ही करीब से देखा। लेकिन ‘मृत्युंजय रवीन्द्रनाथ’ में उनके बारे में जो और जब भी लिखा, उस प्रगट ‘विराट’ की सिर्फ आरती ही उतारते रह गये। न उन्होंने बांग्ला नवजागरण को छुआ, न रवीन्द्रनाथ के परिवार को और न ही उनके कर्ममय विशाल जीवन को। कवि की बौद्धिक आकृति को जानने की कोई जरूरत ही नहीं महसूस की। गुरुदेव के न रहने पर उन्होंने क्या गंवाया उसका यह चित्र देखिये : 

‘‘गुरुदेव उत्सव स्थल पर पधारते थे। शंखध्वनि से वायुमंडल मुखरित हो उठता था। मैं वेद मंत्रों से गुरुदेव का स्वागत करता था। आचार्य नन्दलाल बोस और उनके शिष्यों द्वारा रचित मनोहर आलम्पिन से सजा हुआ सभा स्थल मांगल्यगान से गूंज उठता था और गुरुदेव स्मित हास्य के साथ आसन ग्रहण करते। उनकी उपस्थिति में अपूर्व परिपूर्णता थी। जहां वे उपस्थित होते वहां सब कुछ भरा-भरा लगता। जब ‘‘शतकाण्डो दुश्चयवनो’’ मंत्र के पाठ के बाद उनके दूर्वादल बांधता तो वे बड़े स्नेह से हाथ बढ़ा देते - मेरा यह परम सौभाग्य आज विलुप्त होगया है।’’

रवीन्द्रनाथ पर उनके विश्लेषणात्मक नजरिये की हद यही थी - ‘‘रवीन्द्रनाथ महामानव थे। दीर्घकालीन तपस्या के बाद मनुष्य ने जिन महनीय गुणों को पाया है, उनमें एकत्र सुलभ थे। उनका हृदय प्रेम से परिपूर्ण था। वे युग गुरू थे।’’

निस्संदेह, रवीन्द्रनाथ का युग महामानवों की उत्पत्ति का युग था। यह वह युग था जब वारेन हेस्टिंग्स और सर विलियम जोन्स के प्राच्यवाद के चलते कर्मकांडों में डूबे एक समाज के घरों में पड़ी पांडुलिपियों ने न सिर्फ पश्चिमी दुनिया को प्राचीन भारत के दर्शन से आश्चर्यचकित कर दिया था, बल्कि खुद भारतवासियों को उनके हत-भाग्य से निकाल कर एक नये गौरव का अहसास कराया। यह भारतीय साहित्य के एक नये युग का अवतरण था। अचानक ही पुरानी दरबारी दुनिया की सीमाएं टूट गई, नयी दुनिया की चमक के साथ दरबारी जमाने के प्रेत गायब होगये। यह एक नई दुनिया की खोज थी। नये व्यापार और वाणिज्य के जरिए भारत की एक नई आर्थिक अखंडता की जमीन तैयार हुई। बंगाल का नया साहित्य प्राचीन क्लासिकल युग का प्रतिबिंब बना। भारत का यह युग महामानवों की मांग करता था और इसने चिंतनशक्ति में, आवेग एवं चरित्र में, बहुज्ञता एवं विद्या में महामानवों को जन्म दिया। यह भारतीय पूंजीवाद के जन्म की कहानी का भी प्रारंभबिंदु था। राजा राममोहन राय, द्वारकानाथ ठाकुर की तरह इसके अग्रदूतों में पूंजीवाद की सीमाओं से परे अपने युग की साहसिकता कूट-कूट कर भरी हुई थी। देश-देश की यात्रा करने वाले, अनेक भाषाओं में पारंगत, अनेक क्षेत्रों में ख्यातिलब्ध। उस युग के नायक अभी तक ‘उत्तरवर्तियों’ की तरह श्रम-विभाजन की दासता से नहीं बंधे थे। उसके एकांगीपन और संकुचनकारी प्रभावों से अछूते थे। समकालीन आंदोलनों और व्यवहारिक संघर्षों के बीच ही प्राय: उन सभी का जीवन और दूसरे क्रियाकलाप चला करते थे। वे किसी न किसी पक्ष के लिए लड़ते थे। किताबी कीड़े बहुत कम पाये जाते थे। 

रवीन्द्रनाथ भी ऐसे ही एक युगीन महामानव थे। लेकिन कत्तई ऐसे महामानव नहीं जो आलोचना की किसी नई धारा के जनक के लिए सिर्फ निहारने और पूजा करने की वस्तु बनें, जैसा कि द्विवेदी जी के लेखन में दिखाई देता है। रवीन्द्रनाथ के शांतिनिकेतन में वे मुख्यत: मंत्रोच्चार के काम में लगे हुए एक पुजारी थे, और वहां से हिंदी आलोचना में वे साहित्य द्वारा संस्कारित श्रद्धा और सम्मान से भरे ‘स्तुति-भाव’ के साथ, परमेश के प्रति सर्वात्मना विसर्जन के भाव के साथ आएं। थकाने वाली दूसरी किसी भी कवायद से बचते हुए भक्ति की विश्रान्ति का मार्ग तलाशने वाले आलोचना शास्त्र के साथ। साहित्य और आलोचना में भगवान और भक्त के रिश्तों वाली, शिक्षा जगत में गुरु और शिष्य वाली, विधि-विधान वाली उत्सवमुखी आलोचना की ‘दूसरी परंपरा’ के साथ। संकुचित ‘उत्तरवर्तियों’ के एक ऐसे आलोचना-शास्त्र के साथ, जिससे ‘कवि ने यह कहा है’, ‘लेखक यह कहना चाहता है’ वाली गद्य-पद्य की व्याख्या वाली बिल्कुल खास शैली की, जिसे आज ‘अध्यापकीय शैली’ कहा जा सकता है, नींव पड़ी। साहित्य के बारे में काव्यशास्त्री आनंदवर्द्धन के मंत्र ‘सहृदयहृदयाह्लदिशब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम्’, अर्थात सहृदय के हृदय को आह्लाद का अनुभव कराने की ध्वजा लहराते हुए। 

द्विवेदी जी ने रवीन्द्रनाथ के जीवन को कभी भी अपने चिंतन का विषय नहीं बनाया। उनका भक्तिभाव गुरुदेव के जीवन के प्रति किसी यथार्थ चेतना से नहीं पैदा होता है। उनके इस भाव की अपनी खुद की एक द्वंद्वात्मकता है, एक सचाई है जो एक अलग प्रकार की साहित्य चेतना पैदा करती है। यह एक खास साहित्य-संस्कार है, जो ‘सहृदयों’ के बीच अपना सामाजिक चरित्र ग्रहण करता है। इसीलिये चेतन-अवचेतन, किसी भी रूप में क्यों न हो, यह कोई कोरी कल्पना नहीं है। आदमी इसकी ओर किसी आलोचना-भाव से नहीं, श्रद्धा, भय और कामना के भाव के चलते आकर्षित होता है और अपनाता है। इसके विपरीत, विषय के प्रति जैसे ही आपमें यथार्थ चेतना पैदा होती है, भक्ति के भाव की यह द्वंद्वात्मक शक्ति खत्म हो जाती है। और, रचना की यथार्थ चेतना ही आलोचना है, जिसका सहृदयों को आह्लादित करने वाले भाव से वैसा ही संबंध है जो बर्फ का आग से संबंध होता है। यह सिर्फ एक साहित्य-संस्कार नहीं है। 

दरअसल, उत्तरवर्तियों के, लकीर पीटने वालों के सारे शास्त्रों की कुछ ऐसी ही खास विडंबनाएं होती हैं। कार्ल मार्क्स ने जर्मनी में पूंजीवाद के विलंबित विकास की विडंबनाओं पर ‘पूंजी’ में एक बहुत सटीक टिप्पणी की है। वे लिखते हैं -‘‘जर्मनी में उत्पादन की पूंजीवादी प्रणाली उस वक्त सामने आई, जब उसका विरोधी स्वरूप इंगलैंड और फ्रांस में भीषण संघर्ष में अपने को पहले ही प्रकट कर चुका था। इसके अलावा इसी बीच जर्मन सर्वहारा वर्ग ने जर्मन बुर्जुआ वर्ग की अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्ट वर्ग-चेतना प्राप्त कर ली थी। इसप्रकार, जब आखिर वह घड़ी आई कि जर्मनी में राजनीतिक अर्थशास्त्र का बुर्जुआ विज्ञान संभव प्रतीत हुआ, ठीक उसी समय वह वास्तव में असंभव होगया।’’

बांग्ला नवजागरण के संदर्भ में हिंदी नवजागरण की और उससे जुड़े दूसरे सभी सामाजिक-सांस्कृतिक उपादानों की भी ऐसी ही प्रमुख विडंबना से नजर चुरा कर हम इसके बारे में शायद एक कदम भी आगे नहीं जा सकते हैं। 

जिस समय रवीन्द्रनाथ विश्व साहित्य पर छाये हुए थे, भारत की राष्ट्रीय सांस्कृतिक अस्मिता उनके कर्मोद्दम से मूर्तिमान हो रही थी और शांतिनिकेतन में उनकी एक-एक रचना के पीछे का इतिहास लिखा जा रहा था, उसी समय हिंदी आलोचना के प्रवर्त्तक आचार्य रामचंद्र शुक्ल रवीन्द्रनाथ की रचनाओं के बारे में फतवा दे रहे थे कि ‘‘वे अधिकतर ‘पाश्चात्य ढांचे का आध्यात्मिक रहस्यवाद लेकर चली थी।’’ वे ‘‘ईसाई संतों के छायाभास (फैंटासमाटा) तथा योरोपीय काव्यशास्त्र में प्रवर्त्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (सिंबालिज्म) के अनुकरण पर रची’’ गई छायावादी रचनाएं है और इस रास्ते पर चलने के लिये वे हिंदी के ‘कुछ नए’ कवियों को फटकार रहे थे कि ‘‘यह अपना क्रमश: बनाया हुआ रास्ता नहीं था। इनका दूसरे साहित्य क्षेत्र में प्रकट होना, कई कवियों का इसपर एक साथ चल पड़ना और कुछ दिनों तक इसके भीतर अंग्रेजी और बंगला की पदावली का जगह-जगह ज्यों का त्यों अनुवाद रखा जाना, ये बातें मार्ग की स्वतंत्र उद्भावना नहीं सूचित करती।’’

शुक्ल जी आगे और कहते हैं -‘‘रहस्यात्मकता, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्र्य, वस्तु विन्यास की विश्रृंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना को ही साध्य मान लिया गया। शैली की इन विशेषताओं की दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि के विस्तार की ओर उनकी दृष्टि न रही।’’

रवीन्द्रनाथ में ‘पाश्चात्य ढांचे का आध्यात्मिक रहस्यवाद’, ‘ईसाई संतों का छायाभास’ ! शुक्ल जी की ये ‘अभिनव खोज’ हिंदी आलोचना की एक ऐसी मूल्यवान विरासत है, जिसे छोड़ना उसे शायद कभी गंवारा नहीं हुआ। (अपवाद - डा. नामवर सिंह) क्योंकि बिना इसके वह रवीन्द्रनाथ के ‘रहस्यवाद’ से दो-दो हाथ कैसे करती, कैसे अपनी श्रेष्ठता का बखान करती। क्योंकि, जो डा.रामविलास शर्मा खुद वैदिक साहित्य, उपनिषदों से लेकर भक्ति साहित्य के रहस्यवाद के कट्टर झंडाबरदार रहे हैं, वे रवीन्द्रनाथ के रहस्यवाद में ‘पाश्चात्य आध्यात्मिकता’ और ‘ईसाईयत’ की इस चर्चा के बिना कैसे उन्हें अस्वीकारते !

बहरहाल, रवीन्द्रनाथ और डा. रामविलास शर्मा पर हम बाद में आयेंगे। रवीन्द्रनाथ के प्रति उनके विकर्षण-आकर्षण की कुछ अलग ही कहानी है। अभी इतना ही कि हिंदी आलोचना की पहली परंपरा ने रवीन्द्रनाथ को अस्वीकारा क्योंकि उसे छायावादियों की ‘रहस्यात्मकता, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्र्य, वस्तु विन्यास की विश्रृंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना’ को ठुकराना था। और दूसरी परंपरा ने अपने इस ‘सावधान पंडित’ की बातों पर कान न देते हुए भी उन्हें अपनाया तो इसलिए क्योंकि वे भगवान-स्वरूप थे, परमेश, श्रद्धा, भय और कामना के विषय थे। चमत्कार को नमस्कार। 

जहां तक शुक्ल जी का संबंध है, उनकी इतिहास-दृष्टि के साथ कोई निश्चित विश्व-दृष्टि जुड़ी हुई थी, यह दावा तो उनके बड़े से बड़े प्रशंसक भी नहीं करते। डा. शर्मा की किताब ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना’ में शुक्ल जी के लेखन के साथ उनके व्यक्तित्व के संपर्क की शायद ही कोई कहानी हो, क्योंकि सामान्यत: ‘नवजागरण’ से जुड़े ‘महामानवीय व्यक्तित्व’ की धारणा की जरा भी झलक उनके व्यक्तित्व में दिखाई नहीं देती। 

फिर भी वे हिंदी ‘नवजागरण’ के अग्रदूत है ! इसके चलते इस पूरे विवेचन में सिद्धांत-चिंतन की ऐसी बड़ी-बड़ी खाइयां पैदा हो गयी है कि आसानी से उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। मसलन्, वीरभारत तलवार के ‘वामपंथी अवसरवाद’ को लताड़ने और शुक्ल जी को सामंती दृष्टि से मुक्त बताने के लिये डा. शर्मा सामंतवाद की भी ऐसी अलग-अलग श्रेणियां गढ़ लेते हैं, जो ‘गुणात्मक रूप में भिन्न है’। 1 ‘अंग्रेजों के पहले का सामंतवाद’ और ‘अंग्रेजों के बाद का सामंतवाद’। हमारा बुनियादी सवाल है कि जो चीजें ‘गुणात्मक रूप से भिन्न’ हो, तर्कशास्त्र का ऐसा कौन सा तकाजा है कि उन्हें एक श्रेणी में ही रखा जाए ? यह किसी ढांचे में दरार बताने वाली कोरी लाक्षणिकताओं की बात नहीं है। जब ढांचा उस दरार को पाट कर पूर्ववत टिका रहता है तो फिर ‘गुणात्मक रूप से भिन्नता’ पैदा नहीं हो सकती।  

शुक्ल जी के बारे में डा.शर्मा के लेखन की शैली देखिये : 

‘‘शुक्ल जी ने धार्मिक कर्मकांड, वर्ण-भेद आदि की आलोचना को अंशत: नहीं माना है, लेकिन सच्चे लोक-कल्याणकारी कार्यों का विरोध करने के कारण उस आलोचना को आदर्श नहीं माना।‘‘

‘यह सच है फिर भी...’ वाली शैली सच को झुठलाने की शैली होती है। नरेन्द्र मोदी ने 2002 का जन-संहार कराया, यह सच है फिर भी उसने गुजरात का विकास किया। यह प्रकारांतर से मोदी के 2002 के कुकृत्य का समर्थन है। ऐसे ही शुक्ल जी ने धार्मिक कर्मकांडों की आलोचना को नहीं माना, यह सच है फिर भी इसलिए नहीं माना क्योंकि वह ‘सच्चे लोक-कल्याण’ का विरोधी था। यह शुक्ल जी के कर्मकांडी और वर्णवादी नजरिये का समर्थन है। 

और, छायावाद ! बांग्ला में तो कविता की ऐसी धारा का किसी ने कोई जिक्र नहीं किया है। हिंदी में जिन चार कवियों, प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी के नाम से छायावाद जाना जाता है, वे रवीन्द्रनाथ की तरह महामानव नहीं थे। नवजागरण से जुड़े व्यक्तित्वों के चरित्र, चिंतनशक्ति, आवेग, बहुज्ञता और समकालीन आंदोलनों तथा व्यवहारिक संघर्षों में भागीदारी, किसी न किसी पक्ष को लेकर लड़ने वाले जुझारूपन का उनमें कोई उदाहरण नहीं मिलता। 

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, जो प्रसादजी को बहुत करीब से जानते थे, वे भी जब प्रसाद जी के व्यक्तित्व पर लिखते हैं तो उनके ‘बनारसी रंग’ की बात करते हैं। कहते हैं - ‘‘प्रसाद जी के पतले ओठों में सरल आत्मीय मुस्कान खूब फबती थी। पान का हल्का रंग उनके ओठों को ताजगी और चमक दिए रहता था। प्रसादजी घर पर प्राय: खद्दर के कुर्ते और धोती में रहा करते थे; परंतु बाहर निकलने पर रेशमी कुर्ता, रेशमी गांधी टोपी, महीन खद्दर की धोती, रेशमी चादर या दुपट्टा, फुल स्लीपर जूते और एक छड़ी हाथ में रहती थी।‘‘ और, जहां तक प्रसादजी के बारे में एक ‘नये साहित्य-युग के निर्माता’, ‘नव्य दर्शन के उद्भावक’, ‘भविष्यद्रष्टा’ ‘आगम के विधायक कलाकार’ वाली बातें हैं, ये सब एक साधक की अन्त:प्रज्ञा की उपज है, नवजागरण के व्यक्तित्वों से जुड़े किसी सामाजिक कर्मोद्दम की नहीं ! 

आचार्य वाजपेयी को यह कहने में जरा भी हिचक नहीं होती है कि ‘‘छायावाद के संबंध में लिखता हुआ मैं संभवत: एक भी आतंककारिणी बात न कह सकूंगा। संसार की परम प्रसिद्ध आध्यात्मिक जागृतियों के साथ हिंदी की नवीन काव्य-प्रगति की तुलना करने और साधारण-से-साधारण कवियों को उमर खैयाम अथवा रवीन्द्रनाथ सिद्ध करने के लिए एक दूसरे प्रकार की लेखनी, एक दूसरे प्रकार के उत्साह की आवश्यकता है। मुझसे ऐसी आशा करना व्यर्थ होगा।’’

आचार्य वाजपेयी को जिस ‘आतंककारी उत्साह’ से परहेज था, डा. रामविलास शर्मा में वही उत्साह कूट-कूट कर भरा हुआ था। उन्होंने मान लिया था कि नवजागरण तो चंद लेखकों की प्रयोगशाला से तैयार होने वाली वस्तु है। शिवनाथ शास्त्री, रमेशचंद्र दत्त, प्रभात कुमार मुखोपाध्याय आदि से लेकर सुशोभन सरकार, सुकुमार सेन, निहार रंजन रे आदि की तरह के कुछ बड़े शोधकर्ताओं और अन्य लेखकों की एक फौज ने तुमार बांधा और बांग्ला रिनेसांस तैयार होगया ! इसीलिए पूरे उत्साह से वे खुद भी ग्रंथों का पहाड़ तैयार करके हिंदी नवजागरण को पैदा करने के काम में जुट गये। लगभग पूरा जीवन खपा दिया। फिर भी, यह सच है कि ‘निराला की साहित्य साधना’ के तीन खंड भी निरालाजी को एक बड़े और महत्वपूर्ण कवि के अतिरिक्त सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़े किसी बहुज्ञ, चिंतनशील नवजागरणकालीन व्यक्तित्व का रूप नहीं दे पायें। न अपने साथ या अपने पीछे हिंदी नवजागरण का ढोल पीटने वालों की कोई फौज तैयार कर पाये। 

उनका यह कहना कि ‘‘राममोहन राय को विधवाओं की प्राणरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ा, इसी तरह विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती को संघर्ष करना पड़ा और साहित्यकारों में द्विज और शूद्र का भेद मिटाने के लिए सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को संघर्ष करना पड़ा’’ निराला की प्रशंसा नहीं बल्कि परिहास लगता है। जिस छायावाद को उन्होंने ‘साम्राज्य विरोधी चेतना के निखार का साहित्य’ कहा था, उसी सांस में यह भी लिखा कि ‘‘ ‘छायावादी’ साहित्य पढ़ते समय साम्राज्य विरोधी चेतना, सामंत विरोधी मूल्य जैसी चीजें अप्रासंगिक मालूम होती है।’’ इसके बाद ‘किंतु’ के साथ वे इतना और जोड़ देते हैं कि ‘‘जहां छायावादी कलाकार, पत्रकारिता वाले गद्य की ठोस धरती पर पांव रोपे हुए, साधारण पाठकों से बात करते हैं, वहां साम्राज्य विरोधी चेतना और सामन्त विरोधी मूल्य जैसी चीजें निहायत प्रासंगिक ही नहीं, इतनी प्रासंगिक मालूम होती है कि उनके बिना उस गद्य का विवेचन हो ही नहीं सकता।’’ 

निरालाजी कवियों के लिये ‘महाप्राण’ होगये, और सदा रहेंगे भी, लेकिन हिंदी समाज के लिये अब तक वे सिर्फ ‘वर दे वीणा वादिनी’ के रचयिता, पाठ्य पुस्तकों के कवि है। 

और जहां तक डा. शर्मा के ‘हिंदी नवजागरण’ प्रकल्प का सवाल है, मृत्यु के साल भर पहले उनके ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ शीर्षक से आए दो भारी-भरकम खंडों में अगर कुछ सबसे ज्यादा उपेक्षित, बल्कि कहा जाए अनाथ छोड़ दिया गया विषय है तो, वह ‘हिंदी नवजागरण’ का विषय ही है। भारतेंदु, निराला के साहित्य की चर्चा उसी प्रकार हुई है जिसप्रकार रवीन्द्रनाथ, सुब्रह्मण्यम भारती की - उनके साहित्य में जातीय (भारतीय) चेतना के संदर्भ में। 

इस पूरे उपक्रम का दुखद पक्ष यह रहा कि डा. शर्मा की साहित्य संबंधी चिंताएं बेठौर होगई। छायावादी कवियों के बड़े साहित्यिक अवदान को सही ढंग से रेखांकित करने में वे असमर्थ साबित हुए। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि बांग्ला भाषा के नये संस्कार का जो काम रवीन्द्रनाथ के साहित्य के जरिये संपन्न हुआ, हिंदी के चार छायावादी कवियों की सारी सीमाओं, ‘‘शैली की दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि के विस्तार की ओर उनकी दृष्टि न रहने के’’ शुक्ल जी के सारे कोप वचनों के बावजूद इन्हीं के जरिये हिंदी भाषा के नये संस्कार का काम पूरा हुआ और छायावाद हिंदी साहित्य की एक घटना बन गया। 

कोई भी बात तभी किसी घटना का रूप लेती है जब वह उसके कारण की, कर्ता की सीमाओं का अतिक्रमण करके उससे बहुत व्यापक प्रभाव उत्पन्न करती है। हिंदी साहित्य में छायावाद के साथ बिल्कुल ऐसा ही हुआ। 

साहित्य की एक सबसे प्रमुख भूमिका भाषा की सामूहिक विरासत को जीवंत बनाये रखने में है। भाषा न किसी राजनेता के और न ही किसी शिक्षाशास्त्री के आदेश-निर्देश की मुहताज होती है। वह संवेदनशील होती है साहित्य के इशारों के प्रति। छायावादियों की भाषा में बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जो आज भी आम बोलचाल की भाषा में दाखिल नहीं हो पाया है, लेकिन जो साहित्य पर विश्वास करते हैं वे भाषा के इस रूप के प्रति तब से लेकर आज तक, समान रूप से उत्साहित है। यह हिंदी भाषी जनता की आधुनिक जरूरतों को पूरा करती है, देश की दूसरी अधिकांश जातीय भाषाओं से उसका एक सहजात रिश्ता कायम करती है; भारत की राष्ट्रीय एकता का आधार तैयार करती है। नामवर सिंह ने बिल्कुल सही छायावादी काव्य-सौंदर्य को उसकी सामाजिक भूमिका संबंधी विवेचन के केंद्र में रखने पर जोर दिया था। 

और जहां तक डा. शर्मा के इतिहास लेखन का प्रश्न है, आज के काल में इतिहास लेखन जिसप्रकार इतिवृत्तात्मकता, पुरातत्व, भाषाशास्त्र और समाजशास्त्र, नृतत्वशास्त्र आदि का एक साझा उपक्रम है, डा. शर्मा उसे भी अपने ग्रंथों की प्रयोगशाला से उसी प्रकार गढ़ देना चाहते थे, जैसे वे हिन्दी नवजागरण को पैदा करना चाहते थे। इसमें महत्व किसी शोध की प्रामाणिकता का नहीं, अपने पूर्वाग्रह को प्रमाणित करने का होता है।  

याद आती है पंचतंत्र की कहानियों का मूल संस्कृत से अनुवाद करने वाले कृष्णदत्त शर्मा की लंबी भूमिका की जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक ‘पंचतंत्र : मानव जीवन का ज्ञानकोष’ के प्रारंभ में दिया है। इस भूमिका में वे इन कहानियों के पीछे के प्रयोजन की एक कहानी सुनाते हैं। लिखते हैं - 

‘‘दक्षिण देश में महिलारोप्य नामक एक नगर था। यहां अमर सिंह नामका एक राजा राज्य करता था। उसका यश दूर-दूर तक फैला हुआ था। वह स्वयं विभिन्न कलाओं में निपुण था और विद्वानों का आदर करता था। उसके तीन पुत्र थे - बहु शक्ति, उग्र शक्ति और अनंत शक्ति। ये तीनों के तीनों अत्यंत उद्दंड और विद्या-विमुख थे। अधिक संपत्ति से संतान बिगड़ जाती है। ...राजकार्य में व्यस्त रहने के कारण राजा पहले तो राजपुत्रों पर विशेष ध्यान नहीं दे पाया। फिर जब उसका ध्यान गया और उसे समस्या की गंभीरता का अहसास हुआ तब तक बहुत देरी हो चुकी थी। ...ऐसे पुत्रों को गद्दी का वारिस नहीं बनाया जा सकता था। ...तब एक दिन उसने अपने मंत्रियों और राज्याश्रित विद्वानों की एक सभा बुलाई और उनके सामने अपनी समस्या रखी। ...ऐसे पुत्र से क्या लाभ...अपने पुत्रों के बारे में यह टिप्पणी करने के बाद राजा ने आगे कहा, ‘‘जैसे भी इन राजकुमारों की बुद्धि का विकास हो वैसा उपाय आप लोग करें।’’

‘‘...राजा के इन शब्दों को सुन कर सभा में निस्तब्धता छा गई। अधिकांश मंत्री और विद्वान राजपुत्रों की उद्दण्डता और विद्या-विमुखता से परिचित थे। तब एक पंडित ने मौन तोड़ते हुए कहा, ‘‘राजन बारह वर्ष तो व्याकरणशास्त्र के अध्ययन में लगते हैं, चाणक्य आदि के अर्थशास्त्र और वात्स्यायन आदि के कामशास्त्र का अध्ययन करना होगा। इसप्रकार धर्म, अर्थ और कामशास्त्र के ज्ञान के बाद कहीं जाकर बुद्धि जागती है। ’’

‘‘उस सभा में सुमति नामका एक मंत्री बैठा था। उसने कहा, ‘‘मनुष्य का जीवन अनित्य है। इन राजकुमारों के लिए तो किसी संक्षिप्त शास्त्र पर विचार कीजिए। कहा भी गया है, व्याकरणशास्त्र का कोई वार-पार नहीं। अवस्था थोड़ी और विघ्न बहुत है। इसलिए हंस के नीर-क्षीर विवेक की तरह हमें असार को त्याग कर सार को ग्रहण करना चाहिए।’’

‘‘अपना सुझाव देते हुए सुमति ने आगे कहा : ‘‘इस सभा में समस्त शास्त्रों में निष्णात छात्रों के बीच यशस्वी विष्णु शर्मा नामक विद्वान है। आप इन पुत्रों को उन्हें सौंप दीजिए। वे उन्हें जल्द ही प्रबुद्ध बना देंगे। 

‘‘यह सुन कर राजा ने विष्णु शर्मा को बुला कर कहा : भगवन ! कृपा करके मेरे इन पुत्रों को जैसे भी संभव हो वैसे अनुपम विद्वान बना दीजिए। इसके बदले में आपको सौ ग्रामों का मालिक बना दूंगा।

‘‘यह सुन कर विष्णु शर्मा ने राजा से कहा : ‘देव ! आप तथ्य की बात सुने। सौ गांव लेकर भी मैं विद्या को बेचूंगा नहीं। फिर भी यदि मैंने आपके पुत्रों को छ: महीने के अन्दर-अन्दर नीति शास्त्र में पारंगत नहीं बना दिया तो मैं अपना नाम बदल दूंगा। ...यदि मैं छ: महीने के अंदर आपके पुत्रों को नीति शास्त्र का अप्रतिम ज्ञाता न बना दूं तो ईश्वर मुझे स्वर्ग की गति न दे।’’

इसी उपक्रम में विष्णु शर्मा ने नीति शास्त्र के पूरे विषय को पांच भागों में विभाजित किया और विषय के अनुरूप पांच केंद्रीय कहानियों की सृष्टि कर डाली। हर कहानी एक कहानी न होकर अनेक कहानियों का तंत्र है। तंत्र का अर्थ है एक प्रकार की संरचनात्मक व्यवस्था, जिसमें हर कहानी अलग-अलग भी हो और केंद्रीय कहानी का अंग भी। इसप्रकार कुल पांच कहानी-तंत्र हुए। इसीलिये पुस्तक को नाम दिया पंचतंत्र। ’’
इन सब कहानियों के पात्र तो पशु-पक्षी है, लेकिन उनके मारफत जिस नीति शास्त्र का बखान किया गया है वह मनुष्यों के लिये है। विष्णु शर्मा एक खास, सीमित प्रयोजन से राजा के बिगड़ैल बेटों को तुरत-फुरत शिक्षित करने के लिए अपने जाने शास्त्रों का निचोड़ पेश कर रहे थे। उनके लिये महत्व इन निचोड़ों का था, किन पात्रों से उन्हें पेश किया जा रहा है, वह महत्वहीन था। दरबार के दूसरे पंडित चिंतित थे कि इतने कम समय में कैसे किसी को सारे शास्त्रों का विद्वान बनाया जा सकता है, लेकिन विष्णु शर्मा बिल्कुल निश्चिंत थे। उन्हें तो कुछ रोचक कथाओं से नीति कथनों को राजकुमारों को रटाना था। उन्होंने पशु-पक्षियों के कथोपकथन से सारे शास्त्रों के ऐसे गुटके तैयार किये कि आज भी वे ज्ञान के शार्टकट की तलाश में लगे लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। कान में मंत्र फूंकने वाला ऐसा साहित्य आज भी हर रोज रचा जाता है। 

लेकिन गौर करने की बात यह है कि पंचतंत्र की ये कहानियां जो खास प्रयोजन के लिये रची गई, कभी भी पाणिनी के व्याकरण, चाणक्य के अर्थशास्त्र और वात्स्यायन के काम शास्त्र का स्थान नहीं ले पाई। 

इरफान हबीब, रोमिला थापर, रामशरण शर्मा आदि सभी गंभीर इतिहासकारों की दिक्कत यह है कि वे इतिहास के अनुशासन से बंधे हुए लोग रहे हैं, किसी इतर प्रयोजन से नहीं। इसीलिये जो बातें इतिवृत्तों, पुरातत्व, भाषाशास्त्र, नृतत्व, भूगोल, जनांतिकी और समाजविज्ञान की कठोर कसौटियों पर खरी नहीं उतरती, उन पर वे इतिहास की कपोल-कल्पनाओं का महल तैयार करने से कतराते रहे हैं। यहां तक कि अर्थशास्त्र के साथ भी इतिहास के गहरे संबंधों को वे समझते हैं। वे ऐतिहासिक साक्ष्यों के अध्ययन के बारे में विकसित हो रही नई तकनीकों के प्रति भी सचेत लोग है। इसीलिये नये तथ्यों के प्रति संवेदनशील भी है। लेकिन हमारे डा. शर्मा इतिहास का इस्तेमाल करते है अपने इतर उद्देश्यों को साधने के लिए। बांग्ला नवजागरण के मुकाबले हिंदी नवजागरण की श्रेष्ठता स्थापित करने, अंग्रेजों के मुकाबले भारतीयों की श्रेष्ठता, तुर्कों के मुकाबले हिंदुओं की और अंत में आते-आते आर्य नस्ली श्रेष्ठता का झंडा लहराने के लिये। अंग्रेज न आते तो भारत का ज्यादा भला होता, मुसलमान न आते तो और भी भला होता, और आर्य तो यहीं के थे, इसलिये आर्यों का शुद्ध रक्त सारी श्रेष्ठताओं का स्वत: सिद्ध खजाना है। जैसे इतिहास के किसी भी किस्से को सिर्फ यह कह कर खत्म कर दिया जाए कि यदि आदिम साम्यवाद की स्थिति बनी रहती तो फिर समानता की लड़ाई ही नहीं करनी पड़ती। इतिहास न हो, जैसे घर की खेती हो। 

सवाल उठता है कि दूसरी संस्कृतियों से अन्तर्क्रिया के प्रति डा. शर्मा में इतनी विरक्ति क्यों थी ? क्या दुनिया में कोई भी संस्कृति पूरी तरह से पृथ्थकृत रह सकती है ? फिर क्यों हम, हम और सिर्फ हम ? हंटिंगटन के ‘सम्यता के संघर्ष’ की तरह, ‘अन्य’ के साथ हमेशा युद्धरत ! गौर करने की बात यह है कि ऐसे ‘हम बनाम अन्य’ के युद्ध में संस्कृतियों के खुद के अंतर्विरोधों, वैकल्पिक, जन-साधारण की संस्कृतियों के लिये कोई जगह नहीं होती। नामवर जी की शब्दावली में यह है - ‘इतिहास की शव साधना’। हम कहेंगे भेड़ और भेडि़ये की कहानी को चरितार्थ करने के लिये कोरे गड़े मुर्दे उखाड़ना। उपनिवेशवादियों के सभ्यता- अभियान का ही दूसरा जातीय सांस्कृतिक प्रतिरूप। डा. शर्मा का इतिहास संबंधी काम भारत के अतीत के बारे में जितना नहीं बताता उससे कहीं ज्यादा उनके खुद के बारे में बताता है।  

कहना न होगा, अगर गंभीरता से देखा जाए तो यह पूरी प्रक्रिया ही विचार की एक खास खोजी धारा है जिसका आप्त वाक्य है - प्रमाण का दूसरा मुख्य साध्य अनुमान है। यह विचार के विषय को विचार का उत्पाद बनाने, उसका निरूपण करने की प्रक्रिया है। यह वस्तु से सोच का निरूपण नहीं बल्कि खास सोच के अनुरूप वस्तु का निरूपण है। फिर वह कैसे भी क्यों न हो। इसके लिये मनुष्यों के बजाय ‘कौवी और काला सांप’, ‘बगुला और केंकड़ा’, ‘शेर और खरगोश’, ‘जू और खटमल’ आदि को ही पात्र क्यों न बनाना पड़े !  
डा. शर्मा अपनी अंतिम पुस्तक में श्रेष्ठताओं के अपने बाकी उपख्यानों के ताम-जाम को झाड़ कर, अपनी दूसरी सभी संपदाओं को छोड़ कर जब ‘आर्यामी’ की झंडाबरदारी के निपट तत्व-रूप में आते हैं, तब वे हिंदी नवजागरण को तो भूल जाते हैं, लेकिन जिन रवीन्द्रनाथ को याद करने से उन्होंने सारी उम्र परहेज बरता, उनपर लगभग चालीस पेज खर्च कर देते हैं। 
जिन रवीन्द्रनाथ ने लिखा -‘‘हे आर्य, हे अनार्य आओ, आओ हिन्दू-मुसलमान/आज आओ तुम अंग्रेज, ख्रीस्टान आओ/ मन को पवित्र कर आओ ब्राह्मण, सबके हाथ पकड़ो -/ हे पतित, आओ, अपमान का सब भार उतार दो।/मां के अभिषेक के लिए शीघ्र आओ/ सबके स्पर्श से पवित्र किये हुए तीर्थ-जल से/ मंगल-घट तो अभी भरा ही नहीं गया है-/इस भारत के महामानव के सागर-तट पर।’
उन रवीन्द्रनाथ का आर्य श्रेष्ठता के आख्यान के लिए, आज के पाकिस्तान में बहने वाली सिंधु नदी के बजाय सिर्फ भारत की सीमाओं में ही बहने वाली कपोल-कल्पित वैदिक सरस्वती नदी के तट पर वेद-मंत्रों को रचने वाली हड़प्पा-पूर्व की आर्यों की श्रेष्ठ और शुद्ध सारस्वत सभ्यता का आज के आधुनिक युग में भी झंडा गाड़ने के लिये इस्तेमाल करना उनकी स्मृति के प्रति एक प्रकार के अनादर सा प्रतीत होता है। इतिहासकार अभी तक हड़प्पा सभ्यता की लिपि ही नहीं पढ़ पाये हैं, और डा. शर्मा ने घर बैठे कोरे अनुमानों के बल पर हड़प्पा-पूर्व का पूरा इतिहास रच दिया। कहना न होगा, यह प्रकृति के सारे इंतजामों में व्याप्त प्रयोजन की तरह ही डा. शर्मा का प्रयोजनवाद है, जिसकी सेवा में भारतीय नवजागरण के सारे अग्रदूतों को उन्होंने इकट्ठा कर दिया है, बशर्ते वे ‘हिंदू’ हो।  

इति।    

1.‘अंग्रेजी राज से पहले का सामंत वर्ग अंग्रेजी राज के सामंत वर्ग से गुणात्मक रूप में भिन्न था।’ - (पृष्ठ- 215)




अब ख़बरदार ! ये सब नहीं चलेगा !

- सरला माहेश्वरी 

औरंगज़ेब मुस्लिम कट्टरपंथी था
वो हत्यारा था, अत्याचारी था,
समावेशी भारतीय संस्कृति को नहीं मानता था
लो, मिटा दिया राजपथ से उसका नाम
रख दिया उसकी जगह पर एक अच्छा नाम
एक अच्छे मुसलमान का नाम !

अब तो करोगे यक़ीन !
मानोगे कि हम हैं हिंदुस्तान के सच्चे वारिस !

और गाँधी !
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी !
"ईश्वर, अल्लाह तेरे नाम, सबको सम्मति दे भगवान "
उनकी हत्या ! और हत्या का उत्सव !
क्या इसलिये कि वो नहीं थे तुम्हारे जैसे !
तुम्हारे जैसे महान परम्परावादी, राष्ट्रप्रेमी !

और गोविंद पानसारे !
अरे वही शिवाजी पर लिखी थी ना किताब
बताया था कि शिवाजी नहीं थे कट्टर
वे तो समावेशी शासक थे
फिर क्यों मार डाला पानसारे को !

ओह ! वो शिवाजी की वीरता को ...
धर्मनिरपेक्ष बताकर कलंकित कर रहा था !

और ये कलबुर्गी !
पुरालेख और वचन साहित्य के विशेषज्ञ
कट्टरपंथ और अंधविश्वास के खिलाफ लड़ रहे थे
मूर्तिपूजा का विरोध कर रहे थे !

विवेकानंद भी तो कहते थे ...
तुम्हारे शास्त्रों को फेंक दो ...
गर नहीं दे सकते भूखे को रोटी ...
खुद सोचो, गर सही लगे तब विश्वास करो !

और वो दाभोलकर
वो भी तो यही कह रहे थे
पाखंडियों, झूठे तांन्त्रिकों पर मत करो विश्वास
मत मारो दुर्बल और असहाय को
वे तो चल रहे थे विकास के रास्ते पर
डिजिटल इंडिया के रास्ते पर !

ओह ! तुम्हारा डिजिटल इंडिया !
उनसे एकदम अलग है, कोई मेल नहीं है !

हमारा डिजिटल इंडिया समावेशी है
पंडे, पुजारी, तांत्रिक,ढोंगी, घनघोर आस्थावादी
सब को देता है पूरा सम्मान
उन जैसे अनास्थावादियों का यहाँ नहीं है कोई काम
ये हमारी समावेशी संस्कृति का अपमान है
ये तो सरासर देशद्रोह है

देखो ! हम देशभक्त
यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते
देखो ! इसीलिये कानून भी बना दिया है
अब ख़बरदार ! ये सब नहीं चलेगा !
भागो ! नहीं तो कर देंगें जेल के अंदर !
और नहीं माने तो, जानते ही हो !

इस दुनिया से ही उठा देंगे ।

शनिवार, 5 सितंबर 2015

करना चाहता हूँ तुमसे कुछ बातें

- सरला माहेश्वरी




(मैसूर विश्वविद्यालय के अध्यापक प्रोफ़ेसर के. एस. भगवान को बजरंग दल के लोगों ने मौत के घाट उतारने की धमकी दी है । प्रो. भगवान कर्नाटक में एक विवेकवादी, वैज्ञानिक मानसिकता के प्रचारक प्रखर बुद्धिजीवी माने जाते है । प्रो.कलबुर्गी की हत्या के बाद इन्हें कहा गया था कि अगला निशाना अब प्रो. भगवान को ही बनाया जायेगा । इस पर प्रो. भगवान की प्रतिक्रिया थी, तुम हमें मार सकते हो, हमारे विचारों को नहीं । इन्हीं प्रो. भगवान को समर्पित सरला माहेश्वरी की कविता :)

हाथों में बंदूक़ लेकर
बिना सोचे-समझे निर्दोषों की हत्या करने वालों !
एक बार, नहीं
गोली चलाने से पहले
बार -बार देखो !
अपने हाथों को गौर से देखो !
छू कर महसूस करो अपने हाथों को
माथे पर ज़ोर डालकर याद करो उन हाथों को
अपनी माँ के उन हाथों को ...
अनगिनत बार उन हाथों ने प्यार से चूमा था तुम्हें
तुम्हारी हर गल्ती के लिये खुद को ही कोसा था उसने
याद करो पिता के उन हाथों को
तुम्हारी हँसी के लिये प्यार से हवा में उछालते थे तुम्हें
और भर लेते थे सावधानी से अपने हाथों में
हाँ, हाँ, याद करो उस प्यार को...
उस विश्वास को ...
जीने के लिये,जिंदगी के लिये
बहुत, बहुत ज़रूरी होता है
किसी का प्यार, किसी का विश्वास
किसी का साथ ...
हर एक अदद इंसान के लिये
याद करो !
याद करो कि तुम एक इंसान हो
तुम नहीं हो एक मशीन !
कम्प्यूटर के पर्दे पर
नादान बच्चे की तरह नक़ली दुश्मन को मारकर
तुम नहीं कर सकते अपना मनोरंजन
सोचो क्या हो ...
गर गल्ती से उस बच्चे के हाथ में आ जाय तुम्हारी
असली बंदूक़ !
खेल-खेल में चलाने लगे वो अंधाधुँध गोलियाँ
लगा दे तुम पर ही निशाना
धाँय ! धाँय ! धाँय !
काँप रहे हैं ना तुम्हारे हाथ !
सोचो ! सोचो ! क्या होगा ...
गर हम सब बन जायें एक मशीन ...
एक हत्यारी मशीन !
चलाने लगें एक-दूसरे पर ऐसे ही गोलियाँ
बन जायें अपने-अपने
इलाक़ों के सरदार
फिर रात-दिन जाग-जागकर बनाएँ रणनीतियाँ
घात की, प्रतिघात की,विस्तार की
शक और भय के घेरों में बंद
आये नजर चारों ओर
बस दुश्मन और दुश्मन
जैसे राजमहलों के षड़यंत्र
बेटा कर दे बाप की हत्या !
भाई कर दे भाई की हत्या !
हम सब बन जायें
बस लोभ-लालच
नफ़रत और सत्ता के पुर्ज़े
बिना सोचे-समझे रणभूमि में सज जाएँ
मिलते ही आदेश, चला दें गोली
गर नहीं बनना चाहते
तुम सत्ता के पुर्ज़े
तो आओ मेरी हत्या से पहले
मैं तुमसे करना चाहता हूँ
अपने घर में शांति से कुछ बातें
मुझे पूरा यक़ीन है
मैं समझा सकता हूँ तुमको
इंसान को मशीन में तब्दील करने का राज
सभी तानाशाहों को चाहिये होती है
तुम जैसी मशीनें ! तबाही की मशीनें !
मशीनें नहीं जानती, फिर भी वे करती हैं !
वे बहुत
हाँ, हाँ बहुत डरते हैं इंसानों से
देखो ! तुम्हें भी तो डरा दिया था उन्होंने
पानसारे, डाभोलकर, कलबुर्गी और मुझ जैसे बुढ्ढे इंसानों से
अब बताओ तुम मेरे पास बैठे हो
लग रहा है कोई डर मुझसे !
नहीं ना !
इंसान नहीं डरा करते इंसानों से
सिर्फ हैवान ही डरा करते हैँ इंसानों से
ये धरती बहुत सुंदर है
आओ ! इसे ख़ुशहाल बनाएँ
आओ मिलकर इंसान बनाएँ।
मैं भगवान दास
मारे जाने से पहले करना चाहता हूँ
तुमसे कुछ बातें।

बुधवार, 2 सितंबर 2015

कल्पना देवी की दुआ

(कोलकाता के निकटवर्ती बाली नगरपालिका में एक सहायक-इंजीनियर प्रणव अधिकारी के घर पर जब राज्य के भ्रष्टाचार-निरोधी ब्यूरो के अधिकारियों ने 16 अगस्त को छापा मारा तो उसके घर के कोने-कोने, यहां तक कि बिस्तर, सोफे की गद्दियों और बाथरूम के कमोड तक से हजार और पांच सौ रुपये के इतने बंडल मिले कि छापा मारने वाले उन्हें गिनते-गिनते थक गये। जिसे रुपयों का पहाड़ कहते हैं, वही स्थिति थी। 20 करोड़ से ज्यादा नगद रुपये पाये गये।
दूसरे दिन सभी स्थानीय अखबारों के प्रथम पेज पर उन रुपयों के ढेर की फोटो छपी थी। इसके बाद ही आनंदबाजार पत्रिका में प्रणव अधिकारी की मां की भी एक तस्वीर छपी है जो एक बस्ती के अपने खपरैल वाले घर के सामने खड़ी अपने घूसखोर बेटे की खबर से अवाक थी। इस मां पर सरला माहेश्वरी की कविता :)



पाँच-पाँच बेटों की माँ
कल्पना देवी !
कबूतरों के दड़बे जैसे घर की मालकिन
कल्पना देवी !
कहाँ गये ...
तुम्हारे पाँचों कबूतर !
तुम्हारी आँखों के तारे
माँ-बाप के राज-दुलारे !
कमज़ोर बुढ़ापे के सहारे !
कल्पना देवी !
आज अख़बार में देखी
तस्वीर तुम्हारी !
खबर जानकर थी
तुम हैरान, परेशान !
बेटे के संग-मरमरी
घर में उग आये थे
रुपयों के बड़े-बड़े झाड़
कैसे करें गिनती
चकरा गये थे, जाँच-अधिकारी !
तुम्हारा
हिसाबी-किताबी कंजूस बेटा !
कैसे बन गया ऐसा करामाती !
तैर रहा था घूस के रुपयों के तालाब में !
पी रहा था पानी जैसे जल की मछली!
और तुम्हें भनक भी नहीं लगी !
कैसे भला लगती कोई भनक
तुम्हारी ईँटों की खाली दीवार
जमती रही उसपर बस काई
पर प्लास्टर और रंग की
कभी आई नहीं कोई महक
कल्पना देवी !
अरे तुम तो मूर्ति बन गयी हो
पत्थर की मूर्ति !
उभर आये हैं, अचानक ही चोट के गहरे निशान
आँखों में सूखा हुआ आँसू
देख रहा है वही पुराना
मुड़ा-तुड़ा एक सौ का नोट
रोज कमाके लाता था तुम्हारा मज़दूर पति !
वो एक सौ का नोट
जैसे अनगिनत अरमानों की जोट !
जोड़-जोड़कर, तोड़-तोड़कर
बड़े कर दिये पाँच-पांच कमाऊ पूत
तुम्हारे अरमानों के पंख
लेकर उड़ गये अपने-अपने आकाशों में
लौटकर कभी वापस आये नहीं
तुम्हारे कबूतरों के खाँचे में !
पचास वर्ष ! तुम आज भी
वहीं बैठी हो इंतज़ार में
आये कोई एक तो कबूतर वापस
चुनने, बचा कर रखा दाना-पानी !
कितना..लम्बा...इंतजार...
अब बड़े-बड़े घरों में
रहने लगे हैं तुम्हारे कमाऊ पूत
"चीफ़ की दावत" में जी-जान से जुटे हैं तुम्हारे पूत
तुम जैसे बूढ़े माँ-बाप
अब हैं उनके लिये शर्म और संताप !
सुनो ! कल्पना देवी !
क्या अब भी नहीं निकलती
कोई बद्-दुआ तुम्हारे मुँह से !
क्या अब भी माँगती नहीं कोई नयी दुआ !
बुदबुदा रहे हैं तुम्हारे होंठ !
सुन रही हूँ मैं कल्पना देवी !
कह रही हो शायद तुम ...
अगले जन्म मोहे बिटिया ही ...।

शानदार, ज़बर्जस्त, ज़िन्दाबाद !

-सरला माहेश्वरी

टीम इंडिया !
सवा सौ करोड़ की टीम इंडिया !
"शानदार ! जबरजस्त ! ज़िंदाबाद"
हटते नहीं दुखों के पहाड़ !
बरस दर बरस, पीढ़ी दर पीढ़ी !
जीना मरना एक समान !
दशरथ माँझी ज़िंदाबाद !
पहाड़ ! पत्थर के पहाड़ !
देवता पत्थर के ज़िंदाबाद !
बर्बाद जीवन रहा आबाद !
आदाब ! टीम इंडिया आदाब !
भूख ! ग़रीबी ! ज़िंदाबाद !
ज़ुल्म-ओ-शोषण ज़िंदाबाद !
छूआछूत ज़िंदाबाद !
जात-पात ज़िंदाबाद !
धर्म के झगड़े ज़िंदाबाद !
हत्या, आत्महत्या, ज़िंदाबाद !
टीम इंडिया ज़िंदाबाद !
ज़िंदाबाद ! जिंदाबाद !
टीम इंडिया का कप्तान ज़िंदाबाद !
दशरथ माँझी मुर्दाबाद !
छाया से ही दिन बर्बाद !
छूने से जीवन बर्बाद !
हे राम ! हे राम !
टीम इंडिया में नहीं
तुम्हारा कोई काम !
"शानदार ! जबरजस्त ! ज़िंदाबाद !
हिम्मत ही बलवान
कोशिश ही भगवान
पहाड़ खुद जायेगा हार !
दशरथ माँझी ज़िंदाबाद !
"शानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद" !

सुनो ! मैं कलबुर्गी बोल रहा हूँ

कट्टरपंथियों के हाथों मारे गये कन्नड़ के प्रगतिशील विचारक और शोधकर्ता डा. एम एम कलबुर्गी को सरला माहेश्वरी की काव्यांजलि :


सुनो ! कान खोलकर सुनो !
सुनो ! मैं कलबुर्गी बोल रहा हूँ !
अरे...रे...डरो मत !
मैं कोई भूत नहीं हूँ !
मैं जिंदा हूँ !
तुम्हारी गोलियाँ नहीं मार सकती मुझे !
अभी-अभी जारी किये हैं मैंने
अपने शोध के नतीजे !
विश्व मानव समुदाय ने लगा दी है उसपर
अपनी स्वीकृति की मुहर !
अरे...र...
तुम अभी भी डर रहे हो !
गोलियाँ चलाते नहीं काँपते तुम्हारे हाथ !
उस समय तुम्हें डर भी नहीं लगता !
पर देखो,अब मैं तुम्हारे काम ...
हाँ, हाँ, तुम्हारे काम की चीज़ बता रहा हूँ
सुनो ! मेरे शोध के नतीजे बता रहे हैं...
तुम्हारी जिंदगी के बहुत कम दिन बचे हैं ...
असल में तुम्हारे डीएनए में ही गड़बड़ है ...
उसमें जिंदगी की आवश्यक कोशिका ही नहीं है
अरे, वही विवेक की कोशिका ...
वही कोशिका तो जीवन के लिये ज़रूरी प्रोटीन बनाती है
इसीसे तो जीवन का रस बनता है
और वही कोशिका तुम्हारे अंदर नहीं है...
"सर जी मुझे बचा लीजिये !
आप तो बहुत ज्ञानी हैं, कुछ भी कीजिये !"
"मैं, मैं मरना नहीं चाहता ...
सर जी कोई उपाय कीजिये"
हाँ, हाँ एक उपाय है !
तुम्हारे डीएनए की उस लुप्त कोशिका को जिंदा करना होगा !
"सर जी कुछ भी करिये,पर मुझे बचाइये"
ठीक है ! पर फिर तुम वो नहीं रहोगे जो अभी हो ...
तुम्हारा कायान्तर करना होगा
जैसे प्लास्टिक सर्जरी के बाद होता है ...
तुम्हें एक नया शरीर मिलेगा
इसके लिये इस शरीर को छोड़ना होगा ...
तो, हो बदलने के लिये तैयार...
चलो ! शुरु करते हैं आपरेशन...।

क्या रखा है नाम में

-सरला माहेश्वरी


लो दे दिया !
हाँ ! हाँ ! दे दिया है
सरकार ने तुम्हें उपहार !
कृषि मंत्रालय का नाम बदलकर
कर दिया है
"कृषि विकास और किसान कल्याण "
अब तो ख़ुश हो ना !
दिला रहे हैं, मुझे विश्वास !
अब नहीं होगी मुझे कोई चिंता-फ़िकर !
नया नाम कर देगा मेरा कल्याण !
सोच रहा हूँ
मैं ग़रीब, गँवार किसान
मैंने भी तो रखे थे कई नाम
पर मुश्किलें नहीं हुई आसान
पहले बेटे को
नाम दिया था, धनपत
पर रहा ग़रीब का ग़रीब
बदला नहीं कभी उसका नसीब
दूजा बेटा, जीतेन्द्र
पर रहा हमेशा
हारा ही हारा
आख़िर जीवन से भी गया हार
मेरे मालिक !
कैसे करूँ विश्वास, आपके दिये इस नाम का !
नाम से कहाँ बदलती है क़िस्मत !
नहीं बरसती "अच्छे दिन" की रहमत !
आपने तो पहले भी कहा था "फ़ील गुड" !
पर मुझे तो ये चुभता रहा जैसे कोई कील !
किसान क्रेडिट कार्ड
शाइनिंग इंडिया
जन-धन योजना
कितने नाम, कितने फ़रमान !
सब लेते रहे मेरा ही बलिदान !
और अब आपने नाम भी दिया तो इतना बोदा नाम !
'कल्याण', यहाँ भी पिछड़ा ही रख दिया !
कहाँ डिजिटल इंडिया और कहाँ 'कल्याण'
निर्मल बाबा के दरबार की कृपा जैसा !
हँसता था पोता मेरा !
अब आप ही बताइये कैसे भरोसा करूँ ?
कम से कम नाम तो फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी में रख देते
आप तो इसमें उस्ताद हैं
जैसे स्किल इंडिया
स्टार्ट-अप इंडिया
स्टैंड-अप इंडिया
टीम इंडिया
चलिये कोई बात नहीं
मेरे लिये तो आप बस
इतना ही कर दो
कि ... ...
खड़ा रह सकूँ अपनी ज़मीन पर
कर के गर्व से ऊँचा सर
नहीं डरा पाये मुझे कोई शैतान
हरा-भरा रहे मेरा खेत-खलिहान
कर दो बस इतना ही उपकार ।
क्या रखा है नाम में !

हिन्दी में पुरस्कारों की बरसात और उसी अनुपात में लेखकों की गिरती साख !

-अरुण माहेश्वरी

आज टीवी के एक हिन्दी चैनल में नीचे की पट्टी पर हिन्दी के कुछ लेखकों को मिले पुरस्कारों की सूचना देख रहा था । फ़ेसबुक पर तो हर रोज़ कोई न कोई लेखक अपने पुरस्कृत होने का जश्न मनाता हुआ दिखाई देता हैं । आज अगर हिसाब लगाया जाए तो देश के गाँव, प्रखंड, जिलों, क़स्बों, महानगरों में हिन्दी के लेखकों को मिलने वाले पुरस्कारों की संख्या हज़ारों में होगी । 'वागर्थ' जैसी पत्रिकाओं में छपने वाले अधिकांश लेखकों को हम दो-चार पुरस्कारों से कम की कलंगियां लगाये नहीं देखते हैं ।

इतने सारे पुरस्कार लेकिन किताबों की बिक्री ! हिन्दी में साहित्यिक पुस्तकों की बिक्री आज नहीं के बराबर है । 99 प्रतिशत किताबें 500 से कम छापी जाती हैं । इनमें भी अधिकांश किसी इतर उद्देश्य की पूर्ति के लिये, सिर्फ़ 100-200 छापी जाती हैं । प्रकाशक पाठकों के लिये नहीं, सरकारी खरीदों के लिये किताबें छापते हैं और जितनी किताबों की ख़रीद का आदेश जुगाड़ करते हैं, उससे बमुश्किल दस किताबें ही अतिरिक्त छापने का जोखिम उठाते हैं ।

हिन्दी का साहित्य समाज में जितना अधिक अप्रासंगिक होता जा रहा है, उसी अनुपात में हिन्दी साहित्य पर पुरस्कारों की संख्या बढ़ती जा रही है । इसे उलट कर इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि हिन्दी में पुरस्कारों की संख्या जितनी बढ़ती जा रही है, समाज में साहित्य की प्रासंगिकता उतनी ही घटती जा रही है ।

सच यह है कि लेखकों ने आम लोगों और उनके जीवन के संघर्षों से अपना नाता तोड़ लिया हैं, तो आम लोगों ने भी लेखकों से अपना संबंध तोड़ लिया है । अभी के तमाम लेखक किसी न किसी प्रकार से सरकारी तंत्र के अंग हैं । वे इस तंत्र के सेवक हैं । जनता के सेवक होना तो दूर की बात, वे व्यापक जन-समाज के हिस्से भी नहीं हैं । सरकारी तंत्र में रहते हुए परस्पर एक-दूसरे को उपकृत करना, पुरस्कार लेने और देने की जोड़-तोड़ में ही इनकी ज़िंदगियाँ बीत रही हैं ।

तंत्र और जनता दो विपरीत ध्रुव हैं । तंत्र का अंग बन कर जनता का लेखक नहीं बना जा सकता । जीवन के संघर्षों में निहित रचनाशीलता के मूल स्रोत से कट जाने के कारण यह लेखक थोथा आलंकारिक लेखन करने के लिये अभिशप्त होता है ।

ऐसी स्थिति में आज पुरस्कार किसी की श्रेष्ठता के नहीं, लेन-देन के इस पूरे व्यापार में उसके लंबे हाथों और उसकी पहुँच का प्रमाण-पत्र बन कर रह गये हैं ।

यही वजह है कि आज हिन्दी का बड़े से बड़ा लेखक भी यह दावा नहीं कर सकता है कि हिन्दी भाषी समाज में उसकी कोई पूछ है, लोग उसे पहचानते हैं और किसी भी विषय पर उसकी राय का कोई महत्व है । किसी भी सामाजिक-राजनीतिक विषय पर आज हिन्दी के लेखकों से शायद ही कोई राय माँगता है । यह विचार का एक गंभीर विषय है । लेखकों-बुद्धिजीवियों की लगभग ख़त्म हो रही सामाजिक साख में पुरस्कारों के इस गोरख-धंधे की भूमिका पर भी विचार की ज़रूरत है ।

जन गणना और सांप्रदायिकता

-अरुण माहेश्वरी

कहाँ तो माँग की जा रही थी कि जन-गणना में जातियों के आधार पर तैयार आँकड़ों को प्रकाशित किया जाए, लेकिन केंद्र की सांप्रदायिक सरकार ने धार्मिक समुदायों की जनगणना रिपोर्ट जारी कर दी । और वह भी इस प्रकार की विकृत सुर्खियों के साथ कि देश में मुसलमानों की संख्या बढ़ी है, जबकि हिंदुओं की कम हुई है । तथ्य यह है कि मुसलमानों की संख्या में इस एक दशक में साढ़े तीन करोड़ की वृद्धि हुई है, जबकि हिंदुओं की संख्या चौदह करोड़ बढ़ी है ।
सिर्फ यही नहीं, पिछले तीन दशकों में इस दशक में मुसलमानों की आबादी में सबसे कम वृद्धि हुई है । इस दशक में मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसके पहले के दो दशकों में वृद्धि की यह दर क्रमश: 32.88 और 29.53 प्रतिशत थी । इसी प्रकार हिंदुओं की संख्या में वृद्धि की दर घट कर 16.76 प्रतिशत हो गई जो पिछले दो दशकों में क्रमश: 22.71 और 19.92 प्रतिशत थी ।
मूल बात यह है कि आबादी में वृद्धि की दर में कुल मिला कर गिरावट जारी है जो स्वागतयोग्य है और किसी भी विवेकवान व्यक्ति को इसी पर बल देने की ज़रूरत है । आबादी में घट-बढ़ का सीधा संबंध अलग-अलग समुदायों के अलग-अलग वर्गों की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति से है और इस मामले में सभी धार्मिक समुदायों में कोई फर्क नहीं पाया जाता है । इस विषय पर जातिगत आँकड़ों से कुछ रोशनी गिर सकती है । ज़रूरत इस बात की है कि अलग-अलग आर्थिक वर्गों से जुड़े आँकड़े पेश किये जाएं ताकि सामाजिक-आर्थिक ग़ैर-बराबरी को ख़त्म करने की सुसंगत नीतियों के आधार पर आबादी के बारे में ठोस कदम उठाये जा सके ।
अख़बारों में बिल्कुल सही कहा गया है कि अचानक इस प्रकार की सांप्रदायिक रंग से रंगी रिपोर्ट को जारी करके नरेन्द्र मोदी बिहार में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज़ कर वहाँ आगामी चुनाव में अपनी नैया को डूबने से बचाना चाहते हैं ।

यह कैसा राजनय !

-अरुण माहेश्वरी

हमारे मित्र चैतन्य नागर ने भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे एक-दूसरे के खिलाफ गर्जन-तर्जन को देखते हुए अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि ‘‘ पकिस्तान को जिंदा रहने के लिए भारत चाहिए; भारत को ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए चाहिए पाक. दोनों एक दूसरे के अस्तित्व के लिए बड़े जरुरी हैं.’’ इस मामले में हम कहना चाहेंगे कि यह जरूरत भारत और पाकिस्तान के अस्तित्व के लिये नहीं, बल्कि भारत की सांप्रदायिक ताकतों और पाकिस्तान के फौजी संस्थान के अस्तित्व के लिये है।
अमेरिकी शोधकर्ता जे.ए.कुर्रान, जूनियर ने पिछली सदी के पचास के दशक में ही आरएसएस पर अपने शोध में लिखा था कि भारत में आरएसएस की स्थिति भारत-पाकिस्तान संबंधों पर निर्भर है। जब ये संबंध बिगड़ेंगे, आरएसएस को अतिरिक्त बल मिलेगा, और इसमें सुधार से आरएसएस के लिए प्रतिकूलता बढ़ेगी। पाकिस्तान के फौजी सत्ता संस्थान के साथ भी यही स्थिति है।
लेकिन भारत में गांधी जी की राय थी कि पाकिस्तान में कुछ भी क्यों न हो, भारत हमेशा धर्म-निरपेक्ष रहेगा। इसी समझ ने भारतीय समाज को पिछले सत्तर साल में अंदर से मजबूत किया है। इसके विपरीत यदि पाकिस्तान के फौजियों की नकल की जाती है तो इसका परिणाम भी पाकिस्तान की सामाजिक समस्याओं जैसा ही होगा। आपस में लड़ता हुआ, अंदर से कमजोर। भारत के जिस शासन अपने अस्तित्व के लिये पाकिस्तान के शासन की नकल की जरूरत होगी, वह अंतत: इस समाज को भी उसी तर्ज पर तबाह करने का अपराधी साबित होगा।
पाकिस्तान में भी अच्छी-खासी तादाद ऐसे लोगों की है जो भारत के साथ अच्छे संबंधों पर बल देते हैं। वहां की आम जनता में यही भावना प्रबल है। इसीलिये चुनावों में जीतने के लिये वहां कट्टर भारत-विरोध की राजनीति उतनी कारगर नहीं होती है। लेकिन वहां फौज एक अलग और समानांतर सत्ता-केंद्र है। उसके दबाव से चुनी हुई सरकारें मुक्त नहीं हो पाती है। खास तौर पर तब तो और भी, जब भारत का शासन सीधे तौर पर उनके लिये खतरा पैदा करता दिखाई देने लगता है।
ऐसे में, इस भारतीय उपमहाद्वीप में शांति और स्थिरता के लिये भारत सरकार की जिम्मेदारी प्रमुख है। जो सरकार यह नहीं समझेगी और ईट का जवाब पत्थर से देने की भाषा में बात करेगी, वह इस पूरे क्षेत्र की तबाही का सबब बनेगी। भारत की भी।

रविवार, 16 अगस्त 2015

मस्जिद में प्रधानमंत्री

-अरुण माहेश्वरी



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यूएई के आबू धाबी की शेख ज़ायेद मस्जिद में गये। यह उनका एक स्वागतयोग्य, महत्वपूर्ण कदम है।

ये वही प्रधानमंत्री है जिन्होंने एक खास मौके पर मुसलमानी टोपी पहनने से सार्वजनिक तौर पर इंकार कर दिया था। ये वही प्रधानमंत्री है जो ईद के मौके पर कोई इफ्तार पार्टी नहीं देते। वे जिस संघ परिवार की संस्कृति में पले-बढ़े हैं उसमें भारत के लगभग 20 करोड़ मुसलमानों की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के किसी भी पहलू को तवज्जो देना तुष्टीकरण माना जाता है। गुजरात के 2002 के जनसंहार की बात को एक बार छोड़ देते है। उसके बाद से, जब इन्होंने अपनी छवि को एक कुशल प्रशासक के रूप तैयार करना शुरू किया, तब भी मुसलमानों के प्रति उनका नजरिया हमेशा कुछ ऐसा ही रहा कि हम आपके अस्तित्व से इंकार नहीं करते, भारतीय नागरिक के रूप में आपके अधिकारों को भी स्वीकारते हैं, लेकिन इससे अधिक आपके साथ हमारा कोई ज्यादा करीबी रिश्ता नहीं हो सकता। दूर से दुआ-सलाम बनी रहे, यही काफी है।

दरअसल, यही खास संघी संस्कृति है। पिछले दिनों इसका सबसे जघन्य रूप लव जेहाद वाले मसले में सामने आया था। जिसको आपने हमेशा के लिये अपना शत्रु मान लिया है, उससे हमेशा दूरी रख कर चलना ही आपकी मजबूरी है। जब भी आप किसी व्यक्ति को करीब से जानने लगेंगे तो उससे कभी नफरत नहीं कर पायेंगे। इसीलिये संघ की सांप्रदायिक घृणा की राजनीति का तकाजा है कि मुस्लिम समाज से लोगों को अधिक से अधिक दूर रखा जाए। वे उन्हें समाज की एक बुराई के तौर पर देखते हैं और समाज या सरकार में महत्व के किसी भी स्थान पर उनकी उपस्थिति को संदेहास्पद बनाने की भरसक कोशिश करते हैं। हमारे वर्तमान उपराष्ट्रपति को लेकर पिछले दिनों वे जिस प्रकार के झूठे विवाद पैदा करते रहे हैं, उसके पीछे भी मूलत: उनकी यही मंशा काम कर रही थी।

दरअसल, नफरत और हिंसा पर टिकी राजनीति के लिए जरूरी होता है कि आदमी के अंदर हमेशा एक ऐसा स्थायी भाव बना रहे कि वह शत्रु को मनुष्य ही न समझे। वह यह मान कर चले कि ‘जिसे हमने मारा वह मनुष्य नहीं, अपराधी कुत्ता था’। ऐसे आदमी या समुदाय के बारे में जानना नहीं, बल्कि न जानना इस राजनीति के लिए जरूरी होता है। अगर आप ‘शत्रु’ को मनुष्य के रूप में जान लेंगे तो उसकी हत्या करने पर खुद को मनुष्य की हत्या का दोषी मानने लगेंगे। यह मनुष्यत्व-बोध सांप्रदायिक-बोध के बिल्कुल विपरीत है।

गौर करने लायक बात यह है कि सभी समाजों के रूढि़वादी, पारंपरिक रीति-रिवाजों और आदमी की आदतों की समाज के विभिन्न समुदायों के बीच दूरियों को बनाये रखने में एक बड़ी भूमिका होती है। प्रगतिशील मनुष्य इसीलिये हमेशा इन पारंपरिक रीति-रिवाजों और कर्मकांडों से टकराता है, इन्हें चुनौती देता है।

कुछ लोगों का मानना है कि विकास एक ऐसा मंत्र है जिसके फूंक देने से इसप्रकार की सामाजिक-सामुदायिक दूरियां स्वत: खत्म होजाती है। लेकिन हम तो यह देख रहे हैं कि इस उपभोक्तावादी समाज में भी अच्छा उपभोक्ता बनाने के साथ ही हिंदुत्ववादी और मुस्लिम-विद्वेषी बनाने की प्रक्रिया भी साथ-साथ चलती रहती है।  सहनशीलता की हदों की दुहाई देते हुए, सहनशील न बनने का संदेश पहुंचाया जाता है।

इसीलिये हमारा तो मानना है कि अधिक से अधिक जरूरत समुदायों के बीच करीबियत, उनके आपसी मेल-जोल पर बल देने की है। प्रधानमंत्री ने मस्जिद में कदम रख कर अपने अंदर की एक बाधा को तोड़ा है, मुस्लिम समाज के धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति सम्मान का संकेत दिया है। इसीलिये हम उनके इस कदम का स्वागत करते हैं।

अरुण माहेश्वरी

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

असम में डायन के नाम पर हत्या के खिलाफ कड़ा कानून


सरला माहेश्वरी



कल (13 अगस्त को) असम विधान सभा ने डायन हत्या निवारक कानून (Prevention and Protection from Witch-Hunting Bill 2015) पारित किया है। इस कानून में प्राविधान है कि कोई भी यदि किसी स्त्री को डायन बताता है तो उसे तीन से पांच साल की सख्त सजा होगी और पचास हजार से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना देना होगा। डायन बता कर जुल्म करने वाले को 5 से 10 साल की सजा और एक से 5 लाख रुपये तक का जुर्माना भरना होगा। अगर इस प्रकार के किसी काम में किसी समूह को दोषी पाया जाता है तो उस समूह के हर व्यक्ति को 5 से 30 हजार रुपये तक का जुर्माना देना होगा। डायन बता कर किसी की हत्या करने पर धारा 302 के तहत मुकदमा चलेगा। डायन बता कर यदि किसी को आत्म-हत्या के लिए मजबूर किया जाता है तो उसे 7 साल से उम्रकैद तक की सजा और एक लाख से 5 लाख तक का जुर्माना देना होगा। इसप्रकार के मामलों की जांच में गफलत करने वाले जांच अधिकारी को भी दंडित किया जायेगा। उसे 10 हजार रुपये का जुर्माना भरना होगा।

असम का यह कानून बिहार, उड़ीसा, झारखंड और महाराष्ट्र के ऐसे ही कानून से ज्यादा सख्त कानून है। असम में पिछले पांच सालों में 70 औरतों को डायन बता कर उनकी हत्या कर दी गई थी। जांच करने पर पता चला है कि इनमें से अधिकांश मामलों के मूल में जमीन और संपत्ति का विवाद था।

हम सभी जानते है कि इसी 8 अगस्त को झारखंड में पाँच औरतों को डायन बताकर मार डाला गया था। पिछले  दस वर्षों में वहाँ इस तरह अब तक 1200 औरतों को डायन बताकर मारा जा चुका है ।

देश के अन्य भागों में भी इस तरह की घटनाएँ अक्सर घटती रहती हैं। जिनकी इस प्रकार हत्या की जाती हैं उनमें अधिकांश नहीं, बल्कि सर्वांश ग़रीब, कमज़ोर और विधवा औरतों का है । उन्हें कभी चुड़ैल, डायन या कुलटा बताया जाता है तो कभी सती बना कर चिता पर चढ़ा दिया जाता है । इस विषय में धर्म और परम्पराओं के ये खूनी रक्षक और सारे प्रतिगामी विचारों के लोग एक हैं ।

हिंदू कोड बिल का इतिहास हम भूले नहीं हैं। हम कैसे भूल सकते हैं कि 1987 में राजस्थान के दिवराला में 18 वर्ष की रूपकंवर को उसके मृत पति के साथ जिन्दा जला दिया गया था । इन सभी अवसरों पर परम्परा की रक्षा के नाम पर संघ परिवार वालों ने चरम प्रतिक्रियावादी भूमिका अदा की थी । संसद तक में सती प्रथा कानून में संशोधन का भाजपा ने विरोध किया था। आज वही भाजपा सत्ता में है । तमाम बाबाओं के, कर्मकांडियों के हौसले परवान चढ़े हुए हैं। कभी लव-जेहाद तो कभी खाप पंचायतें मानवाधिकारों का सरे आम मज़ाक़ उड़ा रही हैं ।

याद आती है वह कविता जो रूपकंवर को सती के नाम पर जला कर मार डालने की घटना पर लिखी गई थी :

यकीन नहीं होता

यकीन नहीं होता कैसे बरदाश्त किया होगा तुमने
आग की उन लपटों को
कैसे बरदाश्त किया होगा तुमने
सती मां की जय-जयकार करती
उस उन्मादित भीड़ को
जिसने सुनकर भी अनसुना कर दिया
तुम्हारी चीखों-चिल्लाहटों को

यकीन नहीं होता रूपकंवर
कि तुम्हारे रुकते, सहमते
फिर-फिर लौट आते कदमों को
जबरन मौत के मुंह में धकेलती
इस भीड़ को तुमने जल्लादों के रूप में नहीं देखा होगा

यकीन नहीं होता रूपकंवर
कि तुम्हारे रोएं रोएं ने
अपनी सम्पूर्ण शक्ति से इन्हें धिक्कारा नहीं होगा
यकीन नहीं होता रूपकंवर
कि इस बर्बर मौत की तरफ बढ़ते तुम्हारे कदमों ने
आगे बढ़ने से इंकार नहीं किया होगा।

यकीन नहीं होता रूपकंवर
कि तुम्हें मारकर तुम्हारा परलोक
और अपना इहलोक सुधारने वाली
कूट स्वार्थों से भरी उन निगाहों को तुमने पढ़ा नहीं होगा

यकीन नहीं होता रूपकंवर
कि तुमने अपने होशो-हवाश में
चुनी होगी ऐसी मौत

सच बतलाना रूपकंवर
किसने किसने किसने
तुम्हारे इस सुंदर तन-मन को आग के सुपुर्द कर दिया
क्या तुम्हें डर था
कि देवी न बनी तो डायन बना दी जाओगी
क्या तुम्हे डर था
अपने उस समाज का
जहां विधवा की जिंदगी
काले पानी की सजा से कम कठोर नहीं होती
लेकिन फिर भी
यकीन नहीं होता रूपकंवर
कि हिरणी की तरह चमकती तुम्हारी आंखों ने
यौवन से हुलसते तुम्हारे बदन ने
आग की लपटों में झुलसने से इंकार नहीं किया होगा।

यकीन नहीं होता रूपकंवर
कि मौत की लपटों से जूझते हुए
तुम्हारी आंखों ने
इंतजार नहीं किया होगा किसी और राममोहन का
जो बुझा देता उन दहकते अंगारों को
खींच कर बाहर ले आता तुम्हें इस अग्नि ज्वाला से
यकीन नहीं होता रूपकंवर
अविरामवार्य एधि!
हे प्रकाश हमारे बीच तुम्हारा आविर्भाव परिपूर्ण हो।




मंगलवार, 4 अगस्त 2015

सुमित्रा महाजन और हिटलर का संसदीय इतिहास

अरुण माहेश्वरी


हिटलर, गोरिंग, गोयेबल्स और हेस

लोक सभा से कांग्रेस के 25 सांसदों को निष्काषित करके जिस प्रकार लोक सभा को चलाने की कोशिश की जा रही है, वह अनायास ही हिटलर के पार्लियामेंट (राइखस्टाग) की यादों को ताजा कर देती है। आइये, यहां हम संक्षेप में राइखस्टाग के उस काले अध्याय के पृष्ठों पर सरसरी तौर पर नजर डालते हैं।

हिटलर ने जर्मनी के चांसलर के रूप में सबसे पहले 30 जनवरी 1933 के दिन शपथ ली थी। चुनाव में जर्मन पार्लियामेंट की 583 सीटों में नाजी पार्टी और उसकी सहयोगी संरक्षणवादी नेशनलिस्ट पार्टी के पास कुल मिला कर 247 सीटें थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद न्यूरेमबर्ग में हिटलर और उसके सहयोगी नाजियों के अपराधों पर जो मुकदमा चला था, उसमें रखे गये दस्तावेजों से पता चलता है कि शाम के पांच बजे हिटलर के चांसलर बनने के पांच घंटे बाद ही उसके कैबिनेट की एक बैठक हुई थी। इस बैठक में विचार का मुख्य विषय यह था कि कैसे पार्लियामेंट में उनके गठबंधन के अल्पमत को बहुमत में बदला जाए। तब सेंटर पार्टी के पास 70 सीटें थी और यह तय किया गया कि उस पार्टी के नेताओं के साथ संपर्क किया जाए। हिटलर ने अपने सहयोगी गोरिंग को इस काम का जिम्मा दिया।

सेंटर पार्टी के नेताओं से बातचीत करके गोरिंग ने कैबिनेट को बताया कि उनकी शर्तें ऐसी है कि जिनके कारण उनका समर्थन नहीं मिल सकता है, इसलिये फिर से चुनाव कराने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हिटलर गोरिंग के इस प्रस्ताव से तत्काल सहमत होगया था, लेकिन नेशनलिस्ट पार्टी के नेता हगेनबर्ग तैयार नहीं थे। उन्हें लगता था कि अगर अभी फिर से चुनाव होता है तो हिटलर राज्य की पूरी ताकत झोंक कर चुनाव जीत लेगा और तब उसे किसी सहयोगी पार्टी के समर्थन की जरूरत नहीं होगी। उल्टे, हगेनबर्ग ने कैबिनेट में राजसत्ता के प्रयोग से कम्युनिस्टों को कुचल देने का प्रस्ताव रखा, जिनके पास तब 100 सीटें थी।

हिटलर इसके लिये तैयार नहीं हुआ और उसने खुद सेंटर पार्टी के नेताओं से बात करने का जिम्मा ले लिया। बिल्कुल सोचे-समझे ढंग से इस बातचीत को विफल करने के उद्देश्य से ही हिटलर ने सेंटर पार्टी के नेता मोनसेनियर कास से बात शुरू की। कास ने हिटलर के सामने कई शर्ते रखी, उनमें एक शर्त यह भी थी कि वह संविधान के अनुसार काम करें। लेकिन हिटलर ने दुनिया को बताया कि कास ने उनके सामने बिल्कुल असंभव शर्ते रखी है, इसलिये उनसे समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है। और, राष्ट्रपति से पार्लियामेंट को भंग करके फिर से चुनाव कराने की सिफारिश कर दी गई। 5 मार्च 1933, नये चुनाव की तारीख मुकर्रर हुई।

30 जनवरी 1933 के दिन हिटलर चांसलर बना और 31 जनवरी को गोयेबल्स ने अपनी डायरी में लिखा कि ‘‘हमने फ्युहरर के साथ बैठक करके लाल आतंक से लड़ने का पूरा खाका तैयार कर लिया है। हम उनसे सीधे नहीं टकरायेंगे, बल्कि पहले बोल्शेविक क्रांति का विस्फोट होने देंगे। तभी मौका देख कर वार करेंगे।’’

चुनाव की घोषणा के बाद ही हिटलर ने सबसे पहले पूंजीपतियों की एक बड़ी सभा बुलाई जहां लगभग डेढ़ घंटे का लंबा भाषण दे कर उन्हें तमाम प्रकार की सुविधाएं देने और कम्युनिस्टों से हमेशा के लिये बचाने का वादा करके हिटलर के प्रचार अभियान को पूरा समर्थन देने का आह्वान किया। उधर सरकार में गोरिंग ने सभी महत्वपूर्ण पदों पर नाजी पार्टी के ‘तूफानी दस्तों’ के लोगों को बैठाने का काम शुरू कर दिया। हिटलर ने पुलिस को यह साफ निर्देश दे दिया कि वह नाजी पार्टी के ‘तूफानी दस्तों’ के लोगों से कभी न उलझे और साथ ही हिटलर के विरोधियों के खिलाफ बंदूक का प्रयोग करने से कभी न हिचके। गोरिंग ने अलग से पचास हजार लोगों का एक सहयोगी पुलिस बल तैयार किया। और इसप्रकार पुलिस का काम नाजी गुंडे करने लगे। हिटलर के चुनाव-प्रचार में राज्य की पूरी मशीनरी को झोंक दिया गया।

इसके साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय पर छापे मारे गये। उकसावे की और भी कई कार्रवाइयां हुई। लेकिन इन उकसावों के बावजूद, कहीं से कम्युनिस्ट क्रांति की ऐसी कोई ‘लपट’ नहीं उठी जिसकी प्रतीक्षा में हिटलर का पूरा कुनबा बैठा हुआ था। तभी, 27 फरवरी 1933 का दिन आया। हिटलर गोयेबल्स के घर पर एक डिनर में गया था। गोयेबल्स के अनुसार, जिस समय वे ग्रामोफोन पर गाने सुन रहे थे, उसी समय एक फोन आया कि राइखस्टाग में आग लग गयी है। हिटलर और गोयेबल्स तत्काल आग की जगह पहुंच गये और वहां जाते ही बिना किसी जांच के हिटलर ने चिल्लाते हुए यह घोषणा कर दी - ‘यह कम्युनिस्टों का अपराध है’।

राइखस्टाग में लगी इस आग की सचाई अब तक भी पूरी तरह से सामने नहीं आई है, लेकिन तत्कालीन चीफ आफ जर्मन जैनरल स्टाफ, जैनरल फ्रैंज हाल्डर ने न्युरेमबर्ग में यह गवाही दी थी कि ‘‘1942 में हिटलर के जन्मदिन पर हुए भोज में जब राइखस्टाग की इमारत की कलात्मकता पर गप चल रही थी तब मैंने अपने कानों से गोरिंग को उस बातचीत में हस्तक्षेप करके ऊंची आवाज में यह कहते सुना था कि ‘सिर्फ एक आदमी राइखस्टाग के बारे में सच को जानता है और वह मैं हूं, क्योंकि मैंने ही उसमें आग लगाई थी।’’

बहरहाल, राइखस्टाग की आग और कम्युनिस्ट क्रांति का भूत खड़ा करके ही हिटलर ने राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग को मजबूर किया और संविधान के उन सातों प्राविधानों को खारिज करवाने का अध्यादेश जारी करवा लिया जिनमें व्यक्ति और नागरिक के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान की गई थी। कहा गया कि यह कदम राज्य को कम्युनिस्टों की हिंसक कार्रवाइयों से बचाने लिये उठाये गये आत्म-रक्षा के कदम हैं।

इस प्रकार, भारी उत्तेजना की परिस्थतियों में जर्मनी में 5 मार्च 1933 का चुनाव हुआ जिसे हिटलर के काल का अंतिम चुनाव कहा जा सकता है। तमाम सरकारी, गैर-सरकारी संसाधनों का पूरी नग्नता से इस्तेमाल करके और दमन और आतंक की खुली कार्रवाइयों के बावजूद, इस चुनाव में भी नाजियों को अकेले पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया। नेशनलिस्ट पार्टी का समर्थन जोड़ लेने पर उसे बहुमत से सिर्फ 16 सीटें ज्यादा मिली थी। दो तिहाई बहुमत तो बहुत दूर की बात थी।

15 मार्च 1933 के दिन हिटलर के कैबिनेट की एक बैठक हुई। इस बैठक में विचार का एक प्रमुख विषय था, कैसे इस पूर्ण बहुमत को दो तिहाई बहुमत में बदला जाए। उसीमें यह तय किया गया कि कम्युनिस्ट पार्टी के जो 81 सदस्य है, उन्हें पार्लियामेंट में घुसने से रोक कर समस्या का थोड़ा सा समाधान हासिल किया जा सकता है। इसके अलावा, गोरिंग ने यह प्रस्ताव भी रखा था कि सोशल डैमोक्रेटिक पार्टी के भी कुछ सदस्यों को पार्लियामेंट में घुसने से रोका जा सकता है। और इसप्रकार, साधारण बहुमत को आसानी से दो-तिहाई बहुमत में बदल देने की रणनीति तैयार कर ली गई।

इतिहासकारों ने इस तथ्य पर गौर किया है कि उस काल में हिटलर तो पूरे जोश में था। 28 फरवरी के राष्ट्रपति के अध्यादेश से उसे यह अधिकार मिला हुआ था कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना कोई कारण बताए गिरफ्तार कर सकता है। कैबिनेट की इसी बैठक में कैथोलिक सेंटर पार्टी का भी प्रश्न उठा था और हिटलर ने साफ कहा था, उनकी परवाह न करें। वे हमारे खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पायेंगे। नेशनलिस्ट पार्टी के हगेनबर्ग को हिटलर के हाथ में सारी सत्ता के संकेंद्रण से चिंता थी, लेकिन उसे भी डरा-धमका कर दबा दिया गया।

और इसप्रकार, हिटलर ने जर्मन पार्लियामेंट में अपनी अल्पमत की पार्टी को दो-तिहाई बहुमत की पार्टी में बदल कर खुद को जर्मनी का एकछत्र शासक बना लिया। इसके बाद के उसके जुल्मों और दरींदगी की कहानी सारी दुनिया जानती है।

लोकसभा में कांग्रेस के 25 सदस्यों को एकमुश्त सदन से निकाल कर सुमित्रा महाजन ने सदन को चलाने की जो पेशकश की है, उसमें संसद पर एकक्षत्र अधिकार कायम करने की हिटलरी जोर-जबर्दस्ती की झलक मिलती है।

बुधवार, 29 जुलाई 2015

‘साहित्य नगर’ के स्वघोषित महापौर की विडंबनाएं

अरुण माहेश्वरी



आज (16 अप्रैल 2015) ‘इंडिया टीवी’ पर हिटलर के यातना शिविर औस्वित्श पर एक रिपोर्ट दिखाई जा रही थी। औस्वित्श अर्थात हिटलर के हौलोकास्ट का एक विशाल वध-स्थल। नर्क की अकल्पनीय यातनाएं देकर 60 लाख से अधिक यहूदियों की हत्या के रूह को कंपा देने वाले पैशाचिक कर्म की अकल्पनीय कहानी। जो भी इस हौलोकास्ट के इतिहास से और उसके औस्वित्श की तरह के यातना शिविरों के भूगोल से परिचित है, उनके रौंगटों को खड़ा कर देने के लिये इस शब्द का उच्चारण ही काफी होता है। सभ्यता के इतिहास का यह एक ऐसा भयावह पृष्ठ है, जिसे अपनी स्मृति का हिस्सा बना कर चैन का एक पल भी नहीं बिताया जा सकता है। यह आदमी के जीवन के उन क्षणों की तरह है, जिन्हें विस्मृत करके ही शायद आदमी आगे की सुध ले सकता है।

लेकिन इंडिया टीवी पर औस्वित्श की रिपोर्ट को देखते वक्त हमारे दिमाग में कुछ दूसरी ही बातें घूमने लगी थी। अभी कुछ दिन पहले ही हम हिंदी के स्वनामधन्य कवि अशोक वाजपेयी की कविताओं के संकलन ‘विवक्षा’ को उलट-पलट रहे थे। सब जानते हैं, भारत के एक सांस्कृतिक दूत के रूप में अशोक जी ने दुनिया के अनेक देशों की यात्रा की है। वे औस्वित्श भी गये थे। एक कवि का औस्वित्श जाना उसके लिये कितना भारी हो सकता है, इसे हम सहज ही समझ सकते हैं। इन यातना शिविरों से चरम नृशंसताओं के आतंक की स्मृतियां ताउम्र उसका पीछा नहीं छोड़ सकती। निस्संदेह, अशोक जी भी कांप उठे होंगे। औस्वित्श ने उनकी रचनाशीलता को हमेशा के लिये कितना और किस प्रकार बदला, इसका तो कोई सही  अंदाज नहीं लगा सकता, लेकिन उनके संकलन से पता चलता है कि उन्होंने औस्वित्श पर तीन कविताएं लिखी।

इंडिया टीवी की रिपोर्ट के वक्त अनायास ही हमें अशोक जी की उन कविताओं की याद आगयी। ‘बचे हुए को बीते हुए की तरह (आश्विट्ज़-1)’, ‘अगर हो सके (आश्विट्ज़-2)’, और ‘उनके पास (आश्विट्ज़-3)’।

हम अभी तक औस्वित्श नहीं गये हैं, लेकिन उसके इतिहास से जरूर परिचित है। और इतने परिचय भर से ही इस शब्द की ध्वनि मात्र हमारी रीढ़ की हड्डी में आतंक की एक लहर बन कर दौड़ जाती है। लेकिन औस्वित्श की धरती पर खड़े  हमारे कवि अशोक वाजपेयी में इस अनुभूति की रचनात्मक परिणति कैसे-कैसे बिंबों में होती है, देख कर आश्चर्य होता है। उन पर भय, आतंक, क्रोध, दुख या लाचारी के बजाय एक अजीबोगरीब ग्लानि और पाप का निजी बोध छाया हुआ दिखाई देता है। उनकी पहली कविता ‘बचे हुए को बीते हुए की तरह’ की शुरू की पंक्तियां हैं –

‘‘मैं बचे हुए को बीते हुए की तरह देखना चाहता हूं
हरे के विवर में उभरती पीले की दरार की तरह’’


और वर्तमान के अतीत वाले विवर की पीली दरार से वे अपने अंदर बने जिस बिंब में प्रवेश करते है, वह इस प्रकार है -


‘‘मैं नहीं था उस अधरात की गहमागहमी में
जब वे उन सबको मवेशियों की तरह ठेले में भरकर
वधस्थल की ओर ऐसी फुरती और जतन से ले गए थे
जैसे भोलेभाले लोगों को सुबह किसी जरूरी अनुष्ठान के लिए
पूजाघर ले जाया जा रहा हो।’’

और आगे पैदा होता है उनका पाप-बोध :

‘‘...मैं नहीं खड़ा था निर्विकार सिगरेट के कश लेते हुए
...मैंने शब्दों को जली हुई हड्डियों की राख के ढेर से
कभी नहीं उठाया
...मैंने भव्य संगीत नहीं सुना
...फिर भी
क्यों लगता है मुझे कि मैं जिम्मेदार हूं;
...मैं नहीं था
पर होता तो चुप होता। ’’


जिन्होंने भी रेल की बोगियों में ठूस-ठूस कर मृत्यु शिविरों में भेजे जाने वाले यहूदी कैदियों की दर्दनाक कहानियों के दृश्यों को सिनेमा के पर्दे पर ही देखा है, वे जानते है कि कैसे ‘जतन’ से उन कैदियों को इन मृत्यु शिविरों तक पहुंचाया जाता था कि उनमें से कितनों का तो रास्ते में ही दम घुट जाता था। इसके अलावा अशोक जी को इसमें जो ‘जतन’ दिखाई दिया वह भी ऐसा-वैसा नहीं, धार्मिक कर्म-कांडों से जुड़ी ‘पवित्र आस्था और निष्ठा’ का जतन ! बलि के बकरे का वध और हजारों मनुष्यों का सामूहिक वध - क्या सादृश्य है !


और उनका यह पाप-बोध ! ‘‘...मैं नहीं खड़ा था निर्विकार सिगरेट के कश लेते हुए/...मैंने शब्दों को जली हुई हड्डियों की राख के ढेर से कभी नहीं उठाया/...मैंने भव्य संगीत नहीं सुना/...फिर भी/क्यों लगता है मुझे कि मैं जिम्मेदार हूं;/...मैं नहीं था/पर होता तो चुप होता।’’ क्या कहेंगे इसे ?


हौलोकास्ट के एक प्रसिद्ध शोधकर्ता माइकेल बेरेनबॉम ने हिटलर के पूरे राज्य तंत्र को एक ‘जनसंहारकारी राज्य’ कहा था। उन्होंने लिखा हैं कि ‘‘देश की आधुनिक नौकरशाही का हर हिस्सा हत्या के इस काम में शामिल था। चर्च और गृह मंत्रालय ने यह सिनाख्त की थी कि कौन-कौन यहूदी है; डाकघरों ने उन तक निष्काषन और अलग रहने के आदेशों को पहुंचाया था; वित्त मंत्रालय ने यहूदियों की संपत्ति को जब्त कर लिया; जर्मन कंपनियों ने यहूदी मजदूरों को निकाल बाहर किया और यहूदी शेयरधारकों के शेयरों को निरस्त कर दिया।’’


नौकरशाही संवेदनहीन होती है। राज्य के आदेशों पर अमल का एक पूरी तरह से बोधशून्य औजार; मानव के सहज बोध तक को गंवा चुकी नि:स्व और विरेचित प्राणीसत्ताओं का समूह। संस्कृति और सभ्यता के बाने में जन्म लेकर यही जीवात्मा अपने ‘शुद्ध चित्त’ और ‘मुक्त मन’ के साथ राज्य के भयावह अपराधों के सामने सिर्फ बिसूर सकती है, अधिक से अधिक आत्म-ग्लानि और पाप-बोध से भर जाती है। यह तब है जब हम इस प्रकार के पाप बोध को एक पारदर्शी ईमानदारी मान लेते हैं। अन्यथा, सामान्य तौर पर तो शक्तिवानों का कला-प्रेम कला की सामाजिक प्रतिष्ठा का लाभ उठाने की चालाक कोशिश भर होती है।

फिर भी, कहते हैं ना कि आदमी के अपने चित्त में ही भ्रान्त-अभ्रान्त सारे बोधों का उदय होता है और इन बोधों का प्रकट होना ही उसके वर्तमान के प्रत्यक्ष का आधार होता है। कविता में कवि अपने भीतर-बाहर को, असली-नकलीपन को भी जाहिर कर ही देता है। उसे आप निपट नंगा देख सकते हैं। दुनिया के एक जघन्यतम जन-संहार से पशुबलि के वध की स्मृति और हत्यारों की उस कतार में कहीं खुद को खड़ा देखने का पाप बोध - हमें लगता है अशोक वाजपेयी के साहित्य के नगर में प्रवेश की दो महत्वपूर्ण कुंजी है, कविता में व्यक्त नकली संवेदना, कृत्रिमता और उसकी अपरिणत रचनात्मकता और उनकी निजी प्राणी-सत्ता का वस्तु सच, जिनसे उनकी रचना और विचार के तहखानों में कुछ गहरे तक जाया जा सकता है।


सालों पुरानी बात है, 1970 के दशक के उत्तराद्र्ध की। सन ्‘75 के आपातकालीन अनुभवों के बाद के बेहद उत्तेजनाओं से भरे संक्रमण के काल की। चंद्रभूषण तिवारी आरा से ‘वाम’ पत्रिका निकालते थे। उसके एक संपादकीय का शीर्षक था - पहचान के दो और मुहावरे : ‘गोली दागो पोस्टर’ और ‘जबरजोत’।


भाववादी चिंतन की एक सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह किसी भी वस्तु को उसके वस्तु रूप में देखने के बजाय पहले उसे विचार की एक अमूर्त सामान्य श्रेणी में तब्दील करता है और फिर उस अमूर्त विचार से वस्तु के निरूपण की ओर उतने ही रहस्यमय ढंग से बढ़ता है जैसे कोई एक ही विचार-तत्व मात्र से आलू, टमाटर जैसी नाना ठोस वस्तुओं को पैदा करने की कोशिश करें। भेद को अभेद में तब्दील करके फिर  अभेद से भेद की ओर उल्टी दिशा में बढ़ना, ताकि वस्तु को अतिन्द्रिय रहस्यमयता प्रदान की जा सके, वस्तु का मूल्य उसके स्वाभाविक गुण से नहीं, एक काल्पनिक चिंतन में निहित किया जा सके।


जो लोग भी साहित्य मात्र या कविता मात्र का झंडा उठाये घूमते हैं, साहित्य के स्वतंत्र-स्वायत्त संसार का एक रहस्यमय जगत रचते हैं, उनकी मूल प्रवृत्ति साहित्य के वस्तु रूप पर ऐसी रहस्यमयता का आवरण डालने की ही होती है। चंद्रभूषण जी ने अपने संपादकीय में साहित्य या कविता की इसी काल्पनिक एकतानता के रहस्य को भेदने के लिये आलोक धन्वा की कविता ‘गोली दागो पोस्टर’ और अशोक वाजपेयी की कविता ‘जबरजोत’ को नमूने के तौर पर लिया था। उनका संपादकीय इसप्रकार शुरू होता है - ‘‘इधर की कविता के बारे में इस तरह का सामान्यीकरण अक्सर किया जाता है जिससे एक समग्र रचनात्मक स्थिति सूचित हो - गोया वे तमाम रचनाएं जो इधर अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से या काव्य संग्रहों के द्वारा आई हैं, किसी सदृश प्रेरणा के तहत अथवा समान आवश्यकता या उद्देश्य से परिचालित होकर लिखी गई हों। ऐसा करते समय इधर के रचनाकारों की परस्पर भिन्न सामाजिक स्थिति तथा रचना में व्यक्त उनके भिन्न सामाजिक दृष्टिकोण को नजरंदाज कर दिया जाता है और महज कुछ स्थूल समानताओं- जैसे विषय की एकरूपता और अभिव्यक्ति के बाहरी लक्षणों आदि के चलते यह मान लिया जाता है कि ये किसी संगठित चेतना या सामूहिक उपक्रम के परिणाम है।’’


चंद्रभूषण जी कहते है कि समान सामाजिक अभिप्रायों से जुड़ी रचनाओं को एक अन्विति में समझना जरूरी होने पर भी, ‘‘उससे कम जरूरी उस छद्म सादृश्य का अनावरण भी नहीं है जो विषय की एकरूपता अथवा अभिव्यक्ति की सपाटता आदि की आड़ में आज की कविता की वास्तविक पहचान को तथा उसके विभाजक बिंदुओं को आवृत्त कर रहा है।’’


इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘मिलते-जुलते प्रसंगों पर आधारित’ आलोक धन्वा और अशोक वाजपेयी की दो कविताओं को अपने विश्लेषण के लिये चुना था जो दोनों ही उनकी नजर में ‘अपर्याप्त रचनात्मक परिणति के चलते औसत स्तर’ की कविताएं थी। यहां हम चंद्रभूषण जी के उस पूरे संपादकीय के विषय को नहीं लाना चाहता। आलोक धन्वा की कविता का विस्तृत विश्लेषण करते हुए अंत में वे लू शुन को उद्धृत करते है कि ‘गाली गलौज करने और धमकियां देने को संघर्ष करना हरगिज नहीं कहा जा सकता।’


और, अशोक वाजपेयी की ‘जबरजोत’ के बारे में, वे शुरूआत इस प्रकार करते हैं - ‘‘आलोक के विपरीत, अशोक वाजपेयी ने इसे तमाम भावात्मक प्रतिक्रियाओं से बचाते हुए बड़ी ही सतर्कता के साथ लघुकथा की सुशीतल शैली में प्रस्तुत किया है, बिल्कुल नपे-तुले शब्दों में संक्षिप्त, सरलीकृत और रचनाकार तथा उसके एक समीक्षक की निगाह में प्रिसाइज भी। एक मुश्किल और उलझे हुए प्रसंग को (और अवश्य ही इस नाते उसके यत्किंचित् विस्तृत होने की अपेक्षा थी) यहां इस तरह आसान बनाते हुए पेश किया गया है जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो...इस तरह पूरी समस्या को बेहद मकेनिकल अंदाज में, महज कार्यकारण शैली के सहारे सिर्फ आंतरिक स्तर पर हल होते दिखाया गया है। ...आलोक की कविता में जो समस्या उन्हें इतना विकल करती प्रतीत होती है, उसे भी महज एक आंतरिक कोशिश में चुटकी बजाकर हल कर दिया गया है -‘जमीन के एक जरा से टुकड़े को अपना मानकर उसने नाधा हल और पहली बार अपने को बैलों से अलग कर लिया।’


अर्थात समस्या सिर्फ ‘‘निर्णय लेने की, चुनाव करने की अथवा पहचानने की’’ थी। ‘अपनी आंतरिक छलांग में ही अब तक की बंधी हुई नियति का वह अतिक्रमण कर जाता है, इसके बाद कहीं कोई अवरोध नहीं रह जाता-यहां तक कि जमीन दखल कर लेने की प्रक्रिया भी बड़े निर्विरोध ढंग से संपन्न होती दिखाई देती है’’। इसके बाद अशोक वाजपेयी फिर एक बार साभिप्राय इस कविता में प्रवेश करते है ‘अस्तित्व-बोध के बाद व्यर्थता-बोध’ के आधुनिकता-बोध की श्रृंखला को पूरा करने।


टिप्पणी के अंत में चंद्रभूषण जी कहते हैं - ‘‘आलोक की कविता की मुख्य सीमा वस्तुत: यही है कि उनकी संवेदनात्मक तीव्रता कविता के भीतर की सामग्री से निष्पन्न नहीं होती’’ और ‘‘अशोक वाजपेयी की मुख्य समस्या जो कुछ घटित हो रहा है (सामाजिक जीवन में ही नहीं, कविता में भी) उसे ढंकने की है...उसे रूपांतरित करने की...मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक संदर्भ में एक निश्चित और महत्वपूर्ण प्रसंग को कविता में जगह देकर एक सर्वथा भ्रामक निष्कर्ष के साथ कविता में ओझल करने की। क्या इस अंत से उस छद्म पर कोई रोशनी नहीं पड़ती? जहां तक रचनाओं के भीतर उन्हें जगह देने की बात है यह भी आकस्मिक नहीं है-इससे उस बढ़ते हुए दबाव की स्पष्ट सूचना मिलती है जो उनके रचना-वृत्त को, उनके आभिजात्य को तोड़ते हुए उसके भीतर प्रवेश कर रहा है, वहां दूसरी ओर इस बात की भी सूचना मिलती है कि रचनाकार का व्यक्तित्व स्वयं उसके समक्ष कई तरह के अवरोध प्रस्तुत करता है...। यह जानकारी के अभाव की, उसके घटने-बढ़ने की अथवा अनुभवों की कमी आदि की समस्या नहीं है, बल्कि जानकारी के बदलने की है।’’


औस्वित्श की कविताएं 2001 की है और ‘जबरजोत’ 1970 की । पूरे तीन दशकों का अंतराल, लेकिन आदमी में जैसे रंच मात्र का भी कोई फर्क नहीं। जग-जाहिर विकट सचाइयों के बीच आदमी के अपने ‘स्वायत्त संसार’ का इतना सख्त खोल ! उनका खास निजी रहस्य - एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैली हुई कोरी कृत्रिमता और बनावटीपन और मानव त्रासदियों तथा मुक्ति के सभी मानवीय प्रयत्नों के प्रति आधुनिकतावादी अभिजन की कुटिल शीतलता और निर्दयता का वास-स्थान। यही तो है उनके ‘विवक्षा’ की अविवक्षित विवक्षा, अर्थात निष्प्राण, ऊसर काव्य-चित्रों का प्रमुख स्रोत। आनंदवद्र्धन ने भी प्रतीयमानता को, अर्थात जीवन के यथार्थ को ही काव्य चारुता या सौन्दर्य का नियत स्रोत माना था। राममूर्ति त्रिपाठी जी की शब्दावली में -‘‘जहां-जहां चारुता प्रतीत होती है, वहां-वहां प्रतीयमानता के अस्तित्ववश ही।’’ लेकिन अविवक्षित प्रतीयमानता काव्य नहीं, स्पंदनहीन, मृत शब्दचित्रों का कारण बनती है - अनुभूति से लेकर अभिव्यक्ति तक, रचना की कृत्रिमता का एक निरवध पाखंड, अपर्याप्त रचनात्मक परिणतियों वाले औसत कवि का रचना-संसार !


अशोक वाजपेयी की एक पंक्ति है ‘समय के बाहर कदम रखना भाषा से बाहर जाना है’। वे हमेशा समय को लाते जरूर हैं, लेकिन उसे झुठलाने के लिये। काव्यशास्त्र में जिसे अविवक्षित प्रतीयमानता कहते हैं। कपोलकल्पनाओं में यथार्थ का संपुट सिर्फ इसलिये ताकि उलझन में फंसा पाठक बुद्धि के बाजीगरों के काल्पनिक विचारों को यथार्थ मान लें और यथार्थ को कोरी कपोलकल्पना। अशोक जी की उपरोक्त पंक्ति के पहले की पंक्ति है -‘‘न होना भाषा या कविता में सम्भव ही नहीं है’’। बिल्कुल सच है। कविता में बैठी यही प्राणी-सत्ता, ‘प्रतिभा’, ‘सरस्वती’ नामक परवाग्देवता ही अभिमत अर्थ का प्रकाशन करती है। मुश्किल यह है कि इस मामले में तो तोते की जान माइकेल बेरेनबॉम द्वारा पूर्व-वर्णित तंत्र के पिंजरे में फंसी हुई है। सप्राण काव्यचारुता की सृष्टि के लिये जरूरी है उस पिंजरे से इस प्राणी-सत्ता की मुक्ति की, इसके विसर्जन की। तभी विवक्षित यथार्थ का संस्पर्श रचना में प्राणों का संचार कर सकता है।

दरअसल, रचनाशीलता का पहला पाठ है, अपनी सीमाओं से चिपकी चेतना से मुक्ति का प्रयास। यह एक गहरे आत्म-संघर्ष का विषय है। निराला, मुक्तिबोध की तरह का आत्म-संघर्ष, जिसकी परिणति विक्षिप्तावस्था तक जा सकती है! यहां सवाल निराला, मुक्तिबोध का किसी डंडे की तरह प्रयोग करने का नहीं है। हिंदी के सभी छोटे-बड़े श्रेष्ठ रचनाकारों, प्रेमचंद, निराला, प्रसाद, राहुल, मुक्तिबोध, यशपाल, नागार्जुन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, हरीश भादानी, मार्कण्डेय, भैरवप्रसाद गुप्त, अमृतलाल नागर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, मोहन राकेश, भवानी प्रसाद मिश्र, शलभ श्रीराम सिंह, ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’ से लेकर आज के सबसे सक्रिय उदय प्रकाश आदि तक - सबका यही सच है। यहां तक कि अज्ञेय का भी। हमारा सवाल सिर्फ इतना है कि सत्ता-तंत्र के सहारे दिन-रात अपने मठों की साहित्य-कला-संगीत की महफिलों को सजाने में मुब्तिला, और अपनी ‘पीठ’ की सुरक्षा के लिये हमेशा गोटियां बैठाने में फंसे ‘कवि’ से क्या रचनात्मक उद्रेक के ऐसे किसी खतरे के आस-पास जाने की भी कल्पना की जा सकती है!

इसी की नियति है एक लीकबद्ध जीवन की अपरिणत कवि-कांक्षा। ‘भाषा में ही होने’ की ऊपर जो चर्चा है, जिसे ‘समय में होना’ भी कहा गया है, दरअसल उपलब्ध भाषा के बंद ढांचे की कैद को स्वीकारना है। अशोक वाजपेयी का ‘समय’ जीवन का गतिशील यथार्थ नहीं है। एक कोरी परिपाटी है। आदमी के हर परिवर्तनकामी प्रयत्न के विरुद्ध निश्चेष्ट, ‘निरवध काल-तत्व’ से उत्पन्न व्यर्थताबोध का घटाटोप है। उपलब्ध भाषा तो व्याकरण, प्रचलित प्रयोगों और मुहावरों की बंदिशों भरी दमनमूलक व्यवस्था होती है। यह भले ही सत्ता की उपज न हो, लेकिन परंपरागत ज्ञान के घटक के नाते सत्ता का एक रूप जरूर है। उपलब्ध भाषा, उसके मुहावरों, उसके बद्धमूल प्रयोगों को अस्वीकार कर या उससे छल करके ही साहित्य पाठक को ताजगी का, एक प्रकार की मुक्ति का अनुभव कराता है। रचनात्मक साहित्य नये विचारों और भावों के वाहक के रूप में भाषा की बंदिशों से विद्रोह का साधन होता है। लेकिन अशोक जी !

 ‘विवक्षा’ की पहली कविता है -

‘‘घाटी में जाकर गुम होगई एक पगडंडी
वह जो चलते चलते पगडंडी पर
उसी में समा गया
घाटी तक पहुंचा वह’’

सन् ‘64 की एक कविता है - निश्शब्द

‘‘एक ऊंची इमारत की पांचवी मंजिल की
एक खिड़की से
एक आदमी ने अपने को बाहर फेंक दिया है
मेरे शब्द उछलकर
उसे बीच में ही झेल लेना चाहते हैं
पर मैं हूं
कि दौड़ कर लिफ्ट में चढ़
दफ्तर जाता हूं
पता लगाने
कि नई जगह नियुक्ति कब होगी!
...निश्शब्द
घर जाता हूं!’’

एक शोर से भरे जीवन की यह निश्शब्दता किसी रचनात्मक विस्फोट में व्यक्त होती, तो भला कैसे? उल्टे, शोर ही अपने होने का सगल बन गया - शिक्षा, साहित्य और संस्कृति विभाग का शोर ! कहते है न, आदमी बनता है महाबली जीवन की परिस्थितियों से ही ! सन् ‘80 में प्रेमचंद शताब्दी के समय कोलकाता में साहित्य अकादमी के सेमिनार में अमृत राय अपनी सफाई दे रहे थे कि वे तो किसी डाकमुंशी के बेटे नहीं थे ! डा. महादेव साहा कह रहे थे कि प्रेमचंद ने तो गांव में घर बना दिया था, अम्मा (शिवरानी देवी) झींकती रह गयी, लेकिन किसी भाई में उस घर में जाकर एक रात बिताने की भी इच्छा नहीं हुई! एक लीक पकड़ कर मोक्ष प्राप्ति की चाहत की, अर्थात लिफ्ट को लपकते-लपकते हांफ उठे जीवन की ही परिणति है - औस्वित्श में खड़े होने पर हत्यारों की कतार में शामिल होने का आभास सताने लगता है ! इसी कारण उनकी कविता ईश्वर के टोटके से भी कभी मुक्त नहीं हुई।


यह मामला सिर्फ कविता तक ही सीमित नहीं है। ‘कविता का गल्प’ उनके साहित्य और कविता संबंधी लेखों का संकलन है। इन लेखों में कविता की चर्चा बिल्कुल उसी प्रकार से की गयी है जिसके बारे में हम भाववादी चिंतन के सिलसिले में पहले ही कह चुके हैं, जिसकी एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी भी वस्तु को उसके वस्तु रूप में देखने के बजाय पहले उसे विचार की एक अमूर्त सामान्य श्रेणी में तब्दील करता है और फिर उस अमूर्त विचार से वस्तु के निरूपण की ओर उतने ही रहस्यमय ढंग से बढ़ता है। भेद को अभेद में तब्दील करके फिर अभेद से भेद की ओर उल्टी दिशा में यात्रा ताकि वस्तु को अतिन्द्रिय रहस्यमयता प्रदान की जा सके, वस्तु का मूल्य उसके स्वाभाविक गुण से नहीं, एक काल्पनिक चिंतन में निहित किया जा सके। इसे कहते है किसी विचार-तत्व मात्र से आलू, टमाटर जैसी नाना ठोस वस्तुओं को पैदा करने का चमत्कार। अनोखे ढंग से कविता लुप्त हो जाती है और वे उसे फिर किसी नये रूप में खोज लाते हैं। अभेद का आत्म-विभेदीकरण, वैसे ही जैसे सारे द्रव्यों में होता है ईश्वर का प्रगटीकरण !

इस संकलन के लेखों में कविता के बारे में की गयी इनकी कपोलकल्पनाओं की झांकियां देखिये - ‘‘कविता अपने को फिर से जान रही है...कविता एक अशुद्ध कला है क्योंकि भाषा एक अशुद्ध व्यापार है...कविता की चिन्ता अधिक से अधिक सचाई है, सत्य नहीं...कविता की नैतिकता ही यह है कि वह जो ब्यौंरे अपनी सचाई गढ़ने के लिये चुनती है...कविता सत्यकथा या संशोधन नहीं करती : वह सचाई से अपने गल्प गढ़ती है...यह आकस्मिक नहीं कि कविता का सच दूसरे किसी सच में अंतर्भूत होने का लगातार प्रतिरोध करता है...कविता ने यह समझना शुरू कर दिया है कि वह गल्प है...जिसे हम छायावाद के नाम से जानते हैं और जिसे आधुनिक हिंदी कविता का स्वर्णयुग माना जाता है वह बुनियादी तौर पर कविता का आंदोलन था...नयी कविता कविता के पुनराविष्कार का आंदोलन था...नयी कविता का श्रेष्ठ सोचती-विचारती कविता है...कविता का संसार इधर बहुत व्यापक हुआ है...प्रतीक्षा करना कविता की आदत है - आखिर प्रतीक्षारत शब्द कविता की एक परिभाषा भी है... आज कविता का समय है...कविता अपनी समावेशिता में स्वतंत्रता को चरितार्थ करती है जबकि राजनीति हमेशा ही अपवर्जन और बहिष्कार से काम बनाती है...कविता मनुष्य की एकमात्र ऐसी संसद है जहां से कोई वापस नहीं भेजा जाता...कविता अंतत: और बुनियादी तौर से स्वतंत्रता है...कविता चुनाव नहीं करती...कविता अन्तत: मनुष्य की परम मुक्ति की स्थायी राजनीति है...जब सारे दरवाजे मनुष्य पर भेड़ दिये जाते हैं तो कविता, सारे खतरों के बावजूद, एक दरवाजा खुला-अधखुला रखती है...कविता मनुष्य की अदम्य उत्तरजीविता, उसकी असमाप्य जिजीविषा का सबसे प्रबल साक्ष्य है, आदि-आदि। कहना न होगा, कविता के बारे में विचार के नाम पर तमाम प्रकार की कपोलकल्पनाओं का खजाना है यह संकलन।


क्या इन और इतनी सारी बातों से कोई जान सकता है कि कविता क्या है और क्या नहीं ! यह आपको कफ, वात, पित्त सबके एक साथ बिगड़ जाने पर सन्निपात की दशा लग सकती है। दरअसल यह कविता मात्र के प्रति एक ऐसे सांस्कृतिक सम्मोहक इंद्रजाल की सृष्टि की कोशिश है ताकि मौलिक और नकल का भेद दिखाई न दे और कविता को सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बना कर उसके प्रति पूजा भाव पैदा किया जा सके। अंध आस्था का ऐसा कोई ज्वर जब तक पूरे साहित्य जगत को ग्रस नहीं लेता, इस बात की संभावना नहीं बन सकती जिसमें एक ही कतार में निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, हरीश भादानी, केदारनाथ अग्रवाल, उदयप्रकाश आदि आदि के साथ ही अशोक वाजपेयी से लेकर अन्तरराष्ट्रीय कवि कुमार विश्वास और ‘लालू चालिसा’ के चारण महापुरुष को कैसे खड़ा किया जा सके। (हिंदी आलोचना की कमोबेस ऐसी ही स्थिति पर ‘लहक’ के पिछले अंक में इसी लेखक ने एक लेख लिखा था।) सात पसेरी एक भाव। कविता के एक ही खाते में सारा संसार! और ऐसी अमूर्त और अद्भुत सर्वसमावेशी कपोलकल्पनाओं के जादूई पिटारे से जब कोई भक्तों को एक-एक कर ठोस कविताओं की सूरत दिखाता है तो वह कितना रहस्यमय, करिश्माई और जादूई होता है, इसे हम आसानी से समझ सकते हैं। देश-काल का नामो-निशान मिटा दिया जाता है, चौतरफा, ईश्वरीय रहस्य का बोलबाला होता है, ‘सरस्वती’ बोलने लगती है ! भक्त के लिये आराध्य के निभ्र्रान्त, और अविवादित सत्य का उद्घाटन होता है!

अशोक वाजपेयी के साहित्य के स्वायत्त, बल्कि जादूई संसार की नागरिकता का यही है पूरा सच! इसकी नागरिकता किसी नकली विश्वविद्यालय की फर्जी डिग्री की तरह है कि किसी भी तिकड़म से साहित्यकार का एक तमगा हासिल करके समाज के ‘पूजनीय देवताओं’ की कतार में खड़े हो जाने का गौरव प्राप्त कर लो। गंगा’ में एक डुबकी से सारे पापों से मुक्ति की आध्यात्मिक बाजीगरी ! काव्यानुभूति मात्र को सात्विक मनोदशा मानने का ‘शुक्लवाद’। निर्मला जैन ने अपनी किताब ‘दिल्ली शहर दर शहर’ में बड़े विस्तार से अकादमी अवार्ड, फलाना अवार्ड, ढीमका अवार्ड के रहस्य को खोला है। बताया है कि कैसे डा. नगेन्द्र ने भारत भूषण अग्रवाल को घेर कर चालाकी से अपने लिये साहित्य अकादमी अवार्ड झटका था और कैसे भारत भूषण अग्रवाल ने डा. नगेन्द्र से खायी मात की खीज को नामवर सिंह को अवार्ड दिला कर उतारा था। सेलिब्रिटीज बनने-बनाने के भद्दे खेलों पर ‘ साहित्यिक-सत्कर्म’ की पर्दादारी का कर्मकांड!


बहरहाल, अशोक जी की 74वीं सालगिरह के मौके पर उनकी ‘साहित्य की नागरिकता पर’ टिप्पणी करते हुए फेसबुक पर इस लेखक ने लिखा था -

“एक ओर है वैश्वीकरण। दुनिया को एक ही ढांचे में ढालने की जिद। एक से शहर, एक से गांव, खान-पान-पहनावा, जीवन का ऊपरी रूप सर्वत्र एक सा। और अंदर - एक सी विषमता, एक सी लाचारी, एक सा ही आतंक। सारी दुनिया पर एक सर्वशक्तिमान ईश्वर का राज्य। ‘विश्व ग्राम’ और सर्वमान्य, सर्वपूज्य, गांव का सामंत अमेरिका - अकेला पंच। संयुक्त परिवार का एक कर्ता और बाकी सब भर्ता। सारे संसाधनों पर उसकी मिल्कियत, सारी खोजों पर उसका कॉपीराइट। हरीश भादानी के एक संकलन का शीर्षक है - ‘एक अकेला सूरज खेले’। सबको रोशनी और अंधेरा बांटने वाला। फुकुयामा जैसे कुछ की नजरों में - ‘सबका राजा राम’। अर्थात ‘रामराज्य’। सभ्यता का अंतिम पायदान। अब सबको और कुछ नहीं करना है सिवाय इसके कि - ‘राम का गुनगान करिये, सभ्यता का मान करिये’।

“और दूसरी ओर है, आदमी-आदमी की असंख्य स्वायत्त-स्वतंत्र नागरिकताओं का गान। राष्ट्र की नागरिकता, धर्म की नागरिकता, जाति की नागरिकता, राजनीति की नागरिकता, अर्थशास्त्र की नागरिकता, साहित्य की नागरिकता, संस्कृति की नागरिकता, पर्यावरण की नागरिकता, नारीवाद की नागरिकता, दलितवाद की नागरिकता, बस्ती, मोहल्ला और कुटुंब से लेकर अकेले आदमी तक की नागरिकता। कुल मिला कर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’, कहीं भी धूनी रमा कर, आसन बिछा कर बैठ जाओ। नागरिकता न हो जैसे आत्मलीनता (ऑटिज्म) का ही एक और नया नाम हो! आधा-अधूरा, लुंज-पुंज जीवन - चमकदार पैकेजिंग में!

“अमेरिकी प्रभुत्व का विश्वग्राम और ‘आत्मलीन’ नागरिक। एक की मुट्ठी में सब कुछ और बाकी अपनी धुनों में लीन, जिनके पास समग्र बोल कर कुछ भी नहीं। कितने पूरक लगते हैं ये एक दूसरे के !

“समानता, न्याय, स्वतंत्रता और भाईचारे पर टिका विश्व-समाज अगर कोरे वागाडम्बरों और लफ्फाजियों से तैयार नहीं होगा तो अपनी-अपनी नागरिकताओं से बंधे आत्मलीनों से भी कत्तई नहीं बनेगा। समकालीन सार्वजनिक जीवन के प्रश्नों और राजनीतिक संघर्षों के प्रति तटस्थता खुद को हेय बनाने के उपक्रम जैसा है। जीवन के तमाम पक्षों पर यथार्थमूलक और पैनी नजर की जरूरत है, अध्ययन और सजगता की जरूरत है, समग्रता की, एक समग्र विश्वदृष्टिकोण की जरूरत है। यह सब मनुष्यता की जरूरत है।

“आज भी यह सोच कर रोमांच होता है कि सारी दुनिया को सोचने-विचारने का एक नया ढंग देने वाला कार्ल मार्क्स ‘पूंजी’ जैसी अमरकृति की रचना करने के बाद भी अपने जीवन के अंतिम दिनों में एक असंतुष्ट प्राणी ही था। वह इस अभिलाषा के साथ ही इस संसार से विदा हुआ था कि काश बाल्जाक के उपन्यासों पर वह अच्छी तरह से काम कर पाता!

“कहने का तात्पर्य यही है कि बहुविध अध्ययन और सोच मनुष्य की एक प्रमुख जरूरत है। लेकिन विचार का यह संस्कार जहां विश्वविद्यालयों के आत्मलीन विभागों की कक्षाओं से पाना बिल्कुल असंभव है। वैसे ही, छोटी-छोटी नागरिकताओं के स्वायत्त संसारों के मुखियाओं के विचारों से भी मुमकिन नहीं है।“

इसमें और जोड़ते हुए कहना उचित होगा कि कविता या साहित्य की स्वायत्तता का यह सोच जीवन की सार्वभौमिकता के विरोध पर टिका हुआ सोच है। यह चुनिंदा लोगों की खामखयाली का सोच है। शुक्ल जी ने लिखा था - ‘‘साहित्य क्या है ? ... साहित्य उन श्रेष्ठ मनुष्यों की शिक्षा और वार्ता है जिन्हें अपनी जाति के प्रतिनिधि के रूप में बोलने का अधिकार प्राप्त है और जिनके शब्दों में उनके स्वदेशीय बंधुगण अपने-अपने भावों का प्रतिबिम्ब देखते हैं और अपने अनुभव के सारांश का पता लगाते हैं।’’(रामचंद्र शुक्ल, चिंतामणि, भाग-3, सं. नामवर सिंह, पृ : 32, जोर हमारा)

जहां आपने जीवन के ठोस संदर्भों में इन ‘श्रेष्ठ मनुष्यों’ की गोल-मोल बातों को टटोलना शुरू किया, उनके भीतर से बोलती आदमी की क्षुद्रता सातों सुरों में अपना आलाप शुरू कर देती है। खास तौर, 1988 के बाद, जब से सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवाद का पराभव शुरू हुआ, शुद्ध व्यर्थता बोध पर टिकी इन निरर्थक प्रगल्भित बातों की तो जैसे बांबी ही खुल गयी।


1990 में लिखे गये ‘कविता का गल्प’ लेख में वे कहते हैं -‘‘कविता अपने को फिर से जान रही है और अपने पर अविश्वास कर रही है - आपको याद होगा कि इतालो कालविनो ने राजनीति को भी ऐसा ही करने की सलाह दी है। बल्कि पिछले दो वर्षों से संसार की राजनीति में यही हो रहा है : राजनीति इतनी तेजी से इसलिए बदल रही है कि वह अपने को जानकर अपने पर अविश्वास कर रही है।’’ (कविता का गल्प, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृ : 15, जोर हमारा)


उनका ‘साहित्य का प्रजातंत्र’ समाजवाद के पराभव की राजनीति से किसप्रकार जुड़ा हुआ है, इसे वे साफ शब्दों में स्वीकारते हैं। उनके शब्दों में, ‘‘साहित्य का प्रजातंत्र अपने विरोधियों या प्रतिलोम का दमन या बहिष्कार करके नहीं चलता है : इसीलिए सर्वसत्तावादी व्यवस्थाएं सबसे अधिक साहित्य से घबड़ाती हैं। क्योंकि अंत:सलिल या भूमिगत रहकर भी साहित्य मनुष्य के प्रजातांत्रिक अस्तित्व और सबके समानाधिकार की धारणाएं और सपने जीवित रखता है। हम याद करें कि इधर यूरोप में जो हो रहा है और जिसे यूरोप का प्रजातांत्रिकीकरण कहा जा रहा है उसके नेतृत्व की अगली पंक्ति में लेखक और कलाकार है।’’ (वही, पृ : 16, जोर हमारा)


1990 में जब यह लेख लिखा गया था, उस समय तक ब्रिटेन में थैचरिज्म का बोलबाला था। अमेरिका में रोनाल्ड रेगन और जार्ज एच.डब्लू. बुश का लंबा 15 सालों से (1981-1993) रिपब्लिकन शासन चल रहा था। यही था - ‘यूरोप के प्रजातंत्रीकरण’ का दौर ! सचाई यह है कि ऐसे ‘प्रजातंत्रीकरण’ से लोग इतने अतिष्ठ हो गये थे कि साल-दो साल बाद ही वहां के लोगों ने ही बड़ी शिद्दत से उन्हें विदा कर दिया। थैचर का टिना (There is no alternative) एक भारी मजाक का विषय बन गया।

इसे ही कहते है, किसी घटना के बाद उसकी लकीर पीटने का तत्वविदों का पुश्तैनी धंधा। दर्शन की भाषा में कहे तो इतिहास को घटित करने वाले अचेतन ‘परम चित्त’ को घटना के बाद में आत्म-चेतस बनाने का तात्विक खेल !


कहना न होगा, जैसे ‘कविता’ वैसे ही ’राजनीति’ और जैसी राजनीति वैसी ही कविता और कविता-साहित्य के बारे में सोच भी। अशोक जी की तमाम बातों के  रहस्य का जैसे ही आप पीछा करेंगे, वे ऐसे साहित्य के नगर की ओर आपको खींच ले जायेंगे जिसके नागरिक उन महान गुणों की खान हैं जिनकी अन्यथा कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। यह एक रहस्य है जिसकी अपनी कोई सचाई नहीं है और यही रहस्य साहित्य का स्वायत्त संसार है। बिना किसी गुणावगुण का संसार, इसीलिये जांच-परख की हर कसौटी से परे। इसके छल की खोल में लेखक की सारी कमियां, उसकी अपरिणत रचनाशीलता, उसके राजनीतिक पूर्वाग्रह, उसकी क्षुद्रता और कपट भी - सब छिप जाते हैं। बस मूल्य रह जाता है इस स्वायत्त नगर के महापौर द्वारा नागरिकता के सर्टिफिकेट का। पिछले दिनों अशोक जी ने जनसत्ता के अपने स्तंभ में अनायास ही अपने नगर के ऐसे प्रमाणपत्र प्राप्त नागरिकों की सूची भी जारी की थी - बहुत छोटी सी चार-पांच जनों की सूची थी। अशोक जी ने आज जिस ‘बूढ़े गिद्ध’ की गद्दी को जबर्दस्ती झटक रखा है, उस पीठ के सबसे वरिष्ठ और स्वाभाविक हकदार को भी उस सूची में रखा गया हैं। पता नहीं आडवाणीजी की तरह नरेन्द्र मोदी की बगल में मुंह पर पट्टी बांधे बैठ कर उन्हें कैसा लगता होगा !

बहरहाल, अशोक वाजपेयी के इस स्वायत्त संसार के राजनीतिक सूत्र कैसे और किससे जुड़े हुए हैं, इसकी अब और ज्यादा चर्चा करने की जरूरत नहीं है।

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

ग्रीस का संकट या यूरोपीय पूंजीवाद का संकट !

अरुण माहेश्वरी

ग्रीस के लोगों ने भारी बहुमत के साथ अपनी सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार लिया है कि वे आर्थिक मामलों में किसी भी महाजन देश या संघ की मनमानी शर्तों को नहीं मानेंगे। 5 जुलाई के जनमत-संग्रह में उनसे पूछा गया था कि यूरोपीय संघ के ऋणदाता देश कथित ‘मितव्ययिता’ को जारी रखते हुए अर्थ-व्यवस्था के समायोजन की जो शर्तें रख रहे हैं, उन्हें माना जाएं या ठुकरा दिया जाए।

पूरे ग्रीस में भारी प्रचार था कि यदि इन शर्तों को नहीं माना जाता है तो दूसरे दिन से ही ग्रीस में दवाएं नहीं मिलेगी, ईंधन मिलना बंद हो जायेगा ; ग्रीस यूरो क्षेत्र में नहीं रह पायेगा और अंत में यूरोपीय संघ से भी वह निष्काषित होगा। लेकिन, अंतत: ग्रीस की जनता के लिये ‘मितव्ययिता और संयम’ के पिछले पांच साल से भी ज्यादा समय के अनुभव भविष्य की इन आशंकाओं से कहीं ज्यादा भारी साबित हुए। कर्जदारों के ‘मितव्ययिता’ के नुस्खों ने वहां की अर्थ-व्यवस्था को मृत्यु के कगार तक पहुंचा दिया था। वह सूख कर कांटा हो रही थी। लोगों के पास न रोजगार था और न बैंकों में जमा राशि की सुरक्षा की गारंटी। यूरो मुद्रा के तमगे की झूठी शान से उनका घर नहीं चल पा रहा था। मामला अमीरों की यूरो-प्रीति बनाम गरीबों की जीवन रक्षा की लड़ाई में तब्दील हो चुका था। यूरो हो या ड्राक्मास, लोगों को जीवन में वास्तविक सुख-चैन चाहिए, न कि लालाजी की कभी फाख्ता उड़ाने वाली थोथी शान।

बहरहाल, इस जनमत-संग्रह का कुछ भी परिणाम क्यों न आया हो, इसने अपने पीछे कई ऐसे अनसुलझे सवाल जरूर छोड़ दिये हैं जिनसे बिना टकराए हमारी दृष्टि में आज के यूरोप और विश्वपूंजीवाद की वास्तविकता को समझना असंभव होगा।

इसमें सबसे पहला सवाल तो यही है कि आखिर यह 28 देशों का यूरोपीय संघ और इनमें 19 देशों का यूरो क्षेत्र किस गरज से बना था ?

एक साइप्रस और माल्टा की तरह के भूमध्यसागर के द्वीप देशों को छोड़ दिया जाए तो यूरोपीय संघ में शामिल यूरोप के ये तमाम ऐसे देश है जिनका अतीत उपनिवेशवाद का अतीत रहा है। दुनिया की आबादी के दसवे हिस्से से भी कम आबादी के इन देशों के पृथ्वी के क्षेत्रफल के आधे हिस्से पर उपनिवेश थे। इनमें चीन, तुर्की और फारस की तरह के अद्र्ध-उपनिवेशों को जोड़ दे तो तकरीबन 60 प्रतिशत धरती इनकी थी। 15वीं शताब्दी से शुरू हुए इनके औपनिवेशिक अभियानों का अंत 20वीं सदी के सबसे विध्वंसक द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ हुआ।  यूरोप के इन पांच सौ सालों का इतिहास यह है कि ये देश हमेशा आपस में युद्धों में लगे रहे, क्योंकि इनकी युद्ध की ताकत ही इनकी औपनिवेशिक शक्ति का आधार होती थी।

दूसरे देशों की लूट-मार करने, उनका उत्पीड़न करने के लिये किये जाने वाले युद्धों की ताकत को ही पूंजीवाद के इतिहास में राष्ट्रवाद कहा जाता है। इस राष्ट्रवाद का सबसे उग्र और क्रूर रूप द्वितीय विश्व-युद्ध में सामने आया था, जब दुनिया के भाग-बंटवारे में पिछड़ चुकी जर्मनी, इटली और स्पेन की सरकारों ने आपस में मिल कर सारी दुनिया पर अपना अधिकार कायम करने का महा-विनाशकारी युद्ध छेड़ा, करोड़ों-करोड़ों लोगों को कीड़े-मकोड़ों की तरह मसल डाला और मनुष्यता के खिलाफ अपराधों के सबसे घृणित पृष्ठों की रचना की। उस युद्ध में उनके साथ पूरब का जापान भी इसी उद्देश्य से उतर पड़ा था क्योंकि उसे भी अपनी सैनिक शक्ति के अनुपात में अपने प्रभुत्व के क्षेत्र चाहिए थे।

यूरोप का युद्धों से भरा इतिहास इस बात का गवाह है कि जब तक इन देशों के सामने उपनिवेश बनाने की संभावनाएं बची हुई थी, ये आपस में लडते़ रहे। दुनिया में संयुक्त राज्य अमेरिका और उसकी बढ़ती हुई आर्थिक-सामरिक शक्ति की तरह के उदाहरण मौजूद होने पर भी यूरोप के संयुक्त राज्य की तरह के प्रस्तावों को इन देशों की सरकारों ने कभी भी गंभीरता से नहीं लिया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब सारी दुनिया के देश एक-एक कर आजाद होने लगे, तब भी, यह सच है कि इन प्रभु देशों की आर्थिक स्थिति पर कोई खराब असर नहीं पड़ा था। पूरी दुनिया में इनकी पूंजी लगी हुई थी और गुलाम देशों को छोड़ कर जाते-जाते भी वे नव-स्वाधीन देशों के पूंजीपति वर्गों के प्रतिनिधियों से ऐसी तमाम संधियां करने में सफल हुए थे, जिनसे उनकी पूंजी पर कोई आंच न आने पायें, उनकी पूंजी सुरक्षित रहे और उस पर मुनाफा, पूरे बोनस के साथ उनके घर नियमित पहुंचता रहे। केनेथ गॉलब्रेथ के शब्दों में - उपनिवेशों को आजाद करके इन देशों ने उल्टे अपने नुकसान वाले खर्चों से मुक्ति पा ली और अपने लाभ के प्रमुख स्रोतों को सुरक्षित बनाये रखा। द्वितीय विश्व युद्ध में यूरोप की जो तबाही हुई, उसे अमेरिकी ब्रेटनवुड संस्थाओं और मार्शल प्लान के बूते, बहुस्तरीय अन्तरराष्ट्रीय मंचों के जरिये संभाल लिया गया।

फलत:, आज भी स्थिति यह है कि जिन 28 देशों को मिला कर यूरोपीय संघ का गठन हुआ, उनमें से 26 देश ऐसे हैं जो मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर अभी सर्वोच्च स्थानों पर आते हैं। यूरोप के इस हिस्से में दुनिया की आबादी का सिर्फ साढ़े सात प्रतिशत वास करता है, उसमें भी अच्छा खासा हिस्सा बूढ़े लोगों का है, फिर भी दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में इन देशों का हिस्सा अभी भी लगभग 24 प्रतिशत के बराबर है।

इसके अलावा मामला सिर्फ आर्थिक संपन्नता या विपन्नता का भी नहीं है। उपनिवेशों के हाथ से चले जाने के बाद भी कमोबेस यूरोप के इन देशों की आर्थिक संपन्नता के बने रहने के बावजूद कुछ दूसरे और भी महत्वपूर्ण प्रसंग है जो इधर के तमाम सालों में यूरोप को बुरी तरह से सताते रहे हैं। इनमें एक बड़ा सवाल विश्व-सभ्यता पर यूरोप के वर्चस्व को कायम रखने का भी है, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के काल तक निर्विवाद रूप से अक्षुण्ण बना हुआ था।

आज की सचाई यह है कि पिछले 70 सालों के घटना-क्रम में यूरोपीय राष्ट्रवाद की जड़ें हिल चुकी है। पूंजीवादी दुनिया का केंद्र यूरोप से खिसक कर हमेशा के लिये अमेरिका में चला गया है। उसकी विशाल सामरिक शक्ति के सामने यूरोप बौना है। पूंजीवादी दुनिया में वर्चस्व के मूल में आज भी सामरिक शक्ति की प्रधानता बनी हुई है, लेकिन इस मामले में यूरोप अमेरिका के सामने कहीं नहीं टिकता। इसका यूरोप के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर जो गहरा असर पड़ा है, इसके दबाव को वहां के शासक वर्ग हर क्षण अपनी धड़कनों तक पर महसूस करते हैं। यह अमेरिका का ही प्रताप है कि जो अंग्रेजी भाषा यूरोप के सिर्फ 12 प्रतिशत लोगों की भाषा है, अभी यूरोप में उसका अपने दैनंदिन जीवन में प्रयोग करने वालों की संख्या 49 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

यह एक प्रकार से संयुक्त रूप से पूरे यूरोप की अस्मिता के संकट का प्रश्न है। आज भी किसी न किसी प्रकार से अपने राजतंत्र के दिनों के अतीत से चिपका हुआ यूरोप बुढ़ापे के कारण कमजोर पड़ने लगा है। ऊपर से उसका पैशाचिक, युद्धोन्मादी अतीत उसपर प्रेत की छाया की तरह मंडराता रहता है। पोलैंड में रैनेसांस के सबसे पुराने शहर क्रैकोव से सिर्फ 70 किलोमीटर की दूरी पर आश्विट्स का वह कसाई खाना है जहां हिटलर ने लाखों यहूदियों को काटा था और आदमी को असंभव यातनाएं देने की तरकीबें इजाद की थी। जितने लोग रैनेसांस के इस सबसे बड़े केंद्र क्रैकोव को देखने नहीं जाते, उससे काफी ज्यादा लोग मानवता के इस वध-स्थल, क्रूरता के ‘कीर्तिमान’ को देखने जाते हैं। यूरोप के चप्पे-चप्पे में इतिहास की इन क्रूरताओं के निशान देखे जा सकते हैं।  

यूरोप के पूंजीवादी शासकों को चुनौती देने वाला रूस का समाजवाद भले ही आज अस्तित्व में न हो, लेकिन अमेरिका के राजतंत्र-विहीन पूंजीवाद के सामने उसकी चमक पूरी तरह से म्लान हो चुकी है। इधर पूरब में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है। भारत सहित और भी विकासशील देशों का दुनिया के जीडीपी में योगदान दिनों-दिन बढ़ रहा है। दीपक नैय्यर की किताब ‘कैच अप’ में पूर्व-औपनिवेशिक देशों के उठ खड़े होने का जो दिलचस्प आख्यान है, उसमें बताया गया है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से आर्थिक शक्ति का पेंडुलम जीडीपी में योगदान और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के मानदंड पर खास तौर पर एशिया के विकासशील देशों की ओर बढ़ रहा है।

यूरोप की जो सरकारें सैनिक शक्ति के बल पर एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका की जातियों को लूटने-मारने, उनका उत्पीड़न करने और अपनी वित्तीय पूंजी के इंतजाम की अरबपतियों की राष्ट्रीय समितियों की तरह मुस्तैदी से काम किया करती थी, अब वे क्रमश: अपने हितों की रक्षा के लिये अमेरिकी सैनिक शक्ति का मूंह जोहती दिखाई देती है। वे नैटो पर आश्रित है जिसका नेतृत्व अमेरिका के हाथ में है। युगोस्लाव संकट, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, कोसोवो के मामलों में भी नाटो के बल पर ही इनके लिये कुछ करना संभव हो पाया था।
दुनिया की इस बदल चुकी परिस्थिति में, जब सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवाद के पतन के बाद अमेरिका के एकध्रुवीय विश्व का नक्शा पूरी तरह साफ हो चुका था, बड़ी मुश्किल से यूरोप के इन बुढ़ाते देशों को होश आया। उन्होंने हिसाब लगाया कि यदि यूरोप के सारे देश किसी एक संघ में इकट्ठा होते हैं, तो उनकी संयुक्त आर्थिक शक्ति किसी भी देश अथवा संघ के मुकाबला काफी ज्यादा होगी। यह सच भी है कि आज यूरोपीय संघ का संयुक्त रूप में दुनिया के जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान है। 1993 की मैस्त्रीक संधि हुई, अमेरिका के वर्चस्व का मुकाबला करने और दुनिया पर प्रभुत्व के अपने पुराने दिनों की वापसी के स्वप्नों के आधार पर ही ईईसी का विस्तार करते हुए यूरोपीय संघ और फिर यूरोपीय पार्लियामेंट, एक मुद्रा, एक न्याय-व्यवस्था आदि के विशाल तंत्र की नींव रखी गई।

यूरोपीय संघ के गठन की इस पूरी अवधारणा में इसके संघटक देशों की जनता के कल्याण की कोई भावना नहीं थी। यूरोपीय संघ के तत्वावधान में ही स्लोवाकिया के देशों, ग्रीस और स्पेन के लोगों का लगातार गिरता हुआ जीवन-स्तर, संघ के बड़े महाजन देशों का अपने मुनाफे की रक्षा के प्रति उग्र दृष्टिकोण इसे बताने के लिये काफी है। 1999 में कोसोवो संकट में नाटो द्वारा सैनिक बल के प्रयोग से यूूरोपीय संघ के सामरिक मंसूबों की भी एक झलक मिली थी।

इससे एक बात साफ है कि यूरोपीय संघ का गठन शुद्ध रूप से प्रतिक्रियावादी उद्देश्यों से किया गया था। अपनी वित्तीय पूंजी के हितों की रक्षा के लिये गठित एक बहुराष्ट्रीय समिति के तौर पर। लेकिन फिर भी, जिस एक बात को इन बूढ़े चालाक देशों की सरकारें भूल गयी, वह यह थी कि पूंजी के अन्तरराष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिये हमेशा भारी सैनिक सरंजामों का होना अनिवार्य है। और इस मामले में वे अमेरिका से इतना पीछे है कि अब कभी भी पूंजीवादी विश्व के सरगना का स्थान नहीं ले सकते।



यूरोपीय संघ में ग्रीस के मौजूदा संकट का यह एक अहम पहलू है। ग्रीस ने यूरोपीय संघ की कर्ज को लौटाने की शर्तों को मानने से इंकार कर दिया है। यूरोपीय संघ की मुसीबत यह है कि उसके पास अब वह ताकत नहीं है कि उसके बल पर वह ग्रीस के खिलाफ कोई युद्ध छेड़ दे। इसके लिये उसे अमेरिका की शरण में जाना होगा। और अमेरिका, जो अभी भूमध्यसागर के दक्षिणी तट, मध्यपूर्व में अपने प्रभुत्व विस्तार के इतने बड़े अभियान में उतरा हुआ है, उसे अकारण ही इस उत्तरी तट के देश में उतरना गंवारा नहीं होगा।

ग्रीस के संकट से विश्व राजनीति का यह एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू उभर कर सामने आया है। ग्रीस की सिर्जिया सरकार ने यूरोपीय संघ की शर्तों को ठुकरा कर युरोपीय वित्तीय पूंजी के हितों में काम करने के लिये तैयार किये गये संघ को ठुकराने की दिशा में कदम बढ़ाया है। यह यूरोप की धरती पर पूंजी के शासन से इंकार की एक नई शुरूआत होगी।

इस जनमत-संग्रह में ग्रीस की कम्युनिस्ट पार्टी ने लोगों से यह अपील की थी कि वे न सिर्फ यूरोपीय महाजन देशों के प्रस्ताव को ही ठुकराये, बल्कि इसके साथ ही ग्रीस की वर्तमान सिर्जिया सरकार को भी ठुकरा दें। वहां की कम्युनिस्ट पार्टी का मानना है कि ग्रीस की समस्या का समाधान यूरो की जगह पुरानी मुद्रा ड्राक्मास को अपनाने मात्र में नहीं है। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के इस वामपंथी बचकानेपन को इस जनमत-संग्रह में जरा सा भी समर्थन नहीं मिला।

हमें तो आज ऐसा लगता है कि जिस यूरोप में कभी साम्राज्यवाद की सबसे कमजोर कड़ी रूस में पूंजीवाद का अंत हुआ था, अभी की स्थिति में पूरा यूरोप ही क्रमश: साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी बनता जा रहा है। यूरोपीय संघ का पतन यूरोप में मानवता के एक नये युग के प्रारंभ के लिये जरूरी है।      

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

मनोविज्ञान की यह कैसी समझ !


अरुण माहेश्वरी

आज (7 जुलाई 2015) के जनसत्ता में अपूर्वानंद का लेख छपा है - ‘हिंदू राष्ट्र गांव-दर-गांव।

आरएसएस हिंदू सांप्रदायिकता का प्रचारक है, यह अब कोई सात पर्दो में छिपा रहस्य नहीं है। केंद्र में भाजपा की सत्ता है तो इससे उनके सांप्रदायिक एजेंडा को बल मिल रहा है, इस बात पर भी किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती। ऐसी अति-अनुकूल परिस्थितियों में कोई भी अपने अंदर-बाहर के सब कुछ को बिल्कुल नग्न रूप में प्रकट कर देता है, यह भी सही है।

लेकिन इतना सब होने मात्र से, किसी के भी अपना सब कुछ प्रकट कर देने भर से ही दूसरों के मन में उसके प्रति स्वीकार्यता बढ़ जाती है, इसका कोई कारण नहीं है। यह कहा जाता है कि एक झूठ को सौ बार दोहराने से वह सच मान लिया जाने लगता है। लेकिन यह आदमी के चेतन पक्ष का पहलू है, शुद्ध धोखा-धड़ी में फंसने का। सच सामने आने से वही व्यक्ति खुद को बुरी तरह ठगा गया महसूस करता है। झूठ उसके अवचेतन में बसा नहीं रह जाता। इसीलिये किसी विचार या प्रचार से उत्तेजित होकर कोई काम कर गुजरना ही आदमी के मन का पूरा परिचायक नहीं होता।

आदमी का मन उसके चेतन और अवचेतन दोनों को मिला कर बनता है। जिसे आदमी का अवचेतन कहते है, उसके मन का एक अंधेरा, सुप्त कोना, अपूर्वानंद ने अपने लेख में उसके गठन के विषय को उठाया है। हमारा कहना है कि अवचेतन भी यदि चेतन की तरह ही किसी के द्वारा निदेशित हो सके, उसे पूर्व-निर्धारित ढांचों में ढाला जा सके तो फिर चेतन और अवचेतन के बीच फर्क ही क्या रह जायेगा। अपूर्वानंद अपने लेख का अंत इस पंक्ति से करते हैं कि ‘‘हिंदू मन से शायद ही किसी को ऐतराज हो लेकिन भारतीय समाज के लिये हिंदुत्ववादी अवचेतन के गठन के आशय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।’’

‘अवचेतन के गठन के आशय’ ! गौर कीजिये। वे सुचिंतित ढंग से अवचेतन के गठन की प्रक्रिया की बात कह रहे हैं। आदमी का परिवेश उसकी नैसर्गिक जरूरतों से जुड़ कर ही उसके अवचेतन में कोई जगह बनाता है। हर प्रकट चीज अवचेतन में जगह नहीं बनाती। अवचेतन में प्रवेश के लिये उसे उसकी शारिरिक-मानसिक जरूरतों का स्वाभाविक हिस्सा बनना पड़ता है। भोजन और विष्ठा में यही फर्क है। दोनो प्रकट हैं, लेकिन दोनों के लिये आदमी में समान चाहत नहीं होती। एक को ग्रहण करता है और दूसरे को अपने से दूर रखता है। विष्ठा का भक्षण करने वाला या तो कोई विकृत मस्तिष्क का व्यक्ति होगा या फिर कोई चालाक, स्वार्थी तांत्रिक।

भारत की सचाई यह है कि आरएसएस का प्रकट रूप भारतीय मन के लिये ग्रहण-योग्य नहीं है। सन् 2002 के दंगे उसकी विष्ठा है और कोई लाख कोशिश कर ले, भारतीय मन में उसे ग्रहण करने की चाहत कभी पैदा नहीं कर सकता। हाल ही में दुलात ने अपनी किताब में वाजपेयी की 2004 की जिस बात का उल्लेख किया है कि हमने 2002 में भूल की थी, वह ऐसे ही नहीं है। मोदी ने चुनाव जीता 2002 को भुला कर और कांग्रेस के प्रति सामान्य असंतोष को भुना कर, न कि सांप्रदायिक विष्ठा के प्रति किसी प्रकार की प्रीति पैदा करके। कांग्रेस नेतृत्व ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के लिये माफी अनायास ही नहीं मांगी थी।

ऐसे में कोई भी बुद्धिजीवी यदि आज भारतीय मन के बदलने की बात करता है तो उसकी मनोविज्ञान की समझ और इतिहास बोध पर भी शंका होने लगती है।

भारत में इसके पहले भी भाजपा नीत एनडीए शासन का एक दौर बीत चुका है। तब भी आरएसएस कम ताकतवर नहीं था। लेकिन जो आरएसएस राममंदिर आंदोलन के समय अपनी रहस्यमयता के चलते जितने लोगों को प्रेरित कर पाया, उसी ने एनडीए के दौर में अपने प्रकट भ्रष्ट रूप से उतने ही लोगों को विकर्षित भी किया। पेट्रोल पंप आदि की तरह के उस दौर के कई घोटालों में आरएसएस की सर्वोच्च कमेटियों के लोग शामिल पाये गये। उस एनडीए सरकार के पतन के बाद देश भर में आरएसएस की शाखाओं की संख्या में भारी गिरावट आगई थी। कई सालों से मध्यप्रदेश में संघ-संचालित सरकार के होने का परिणाम यह है कि अभी भारत के अपने प्रकार के सबसे जघन्य अपराधमूलक घोटाले व्यापमं में उस प्रदेश के आरएसएस के नेताओं के शामिल होने की बात आम है।

अपूर्वानंद जब आरएसएस के लोगों की बढ़ी हुई हिंसक गतिविधियों के हवाले से यह कहते हैं कि यह भारतीय मन के किसी अवचेतन का गठन का मार्ग है तो सचमुच हंसी आती है। यह आरएसएस के रहस्य के प्रकट होने का समय है और प्रकट होने का एक मतलब होता है - नंगा होना ! आज जो साधू-साध्वियां गाहे बगाहे हिंसक और अनर्गल बातें करते हैं, उनकी शर्म को छिपाने में इन सबके पसीने छूट रहे हैं।

जहां तक भारतीय सामाजिक-मन का सवाल है, इसकी जरूरतें विविधताओं के ठोस यथार्थ को मान कर चलने की जरूरतें हैंं। इसी से उसका अवचेतन बना है और आगे भी बनेगा। यह उपनिवेशवादी यूरोप का एकांगी ‘राष्ट्रवादी’ मन नहीं है कि जिसमें साम्राज्य-विस्तार की ललक पैदा करके हिटलर-मुसोलिनी तैयार किये जा सके ! यूरोप के ऐसे ‘सामाजिक मन’ को भी अपने ठगे जाने का अब भारी पछतावा है। उन्होंने अपने ‘राष्ट्रवाद’ की दुर्गंधपूर्ण विष्ठा को बड़ी भारी कीमत देकर पहचाना है। उनके शासक-वर्गों की जरूरतों से जुड़ा युद्धोन्मादी मन और आम लोगों की जरूरतों से जुड़े युद्ध-विरोधी मन में अब क्रमश: बड़ा फर्क आ चुका है। इसके अलावा अब वह समय भी नहीं रहा है कि पहले की तरह के उपनिवेश कायम किये जा सके। किसी चीज के हासिल होने की असंभवता का बोध ही धीरे-धीरे अवचेतन से भी उसकी कामना को मिटाता है, लेकिन लंबे़, काफी लंबे अर्से बाद क्योंकि इतिहास की बही में उसकी एक लकीर जो पड़ी हुई है। लेकिन भारतीय इतिहास कम से कम ऐसे विस्तारवादी ‘राष्ट्रवाद’ से पूरी तरह मुक्त है जिसके बूते आज के आम तौर पर ‘राष्ट्रवाद’ के पतन के युग में भारतीय मन के अवचेतन में उसके लिये कोई जगह बनाई जा सके !

इसीलिये अपूर्वानंद जो भारतीय समाज के नये अवचेतन के ‘सचेत गठन’ का हौवा खड़ा कर रहे हैं, वह शुद्ध रूप में उनकी अपनी आत्मगत कमजोरी है। इसका न जीवन के ठोस यथार्थ से और न उस यथार्थ से जुड़े भारतीय समाज की जरूरतों से कोई संबंध है। यह उनकी अपनी एक सन्निपात की स्थिति है, जिसमें वे एक अर्से से फंसे हुए हैं। ‘आलोचना’ पत्रिका के इधर के भारतीय जनतंत्र पर केंद्रित दोनों अंकों के संपादकीयों में भी इसके लक्षणों को देखा जा सकता है। किसी के एक बार सत्ता में आने मात्र से वह मनुष्यों के मन के रथ का सारथी नहीं बन जाता है। ऐसा सोच उस मार्क्सवादी कथन की एक कच्ची समझ है कि किसी भी युग की विचारधारा उसके शासक वर्गों की विचारधारा होती है।