बुधवार, 14 सितंबर 2016

रवीन्द्रनाथ और जार्ज लुकाच की कोरी फतवेबाजी का सच

-अरुण माहेश्वरी








फेसबुक पर अनायास ही कुछ मित्रों अजायबघर से ढूंढ कर रवीन्द्रनाथ के उपन्यास ‘घोरे बाहिरे’ की समीक्षा को उछाला है कि यह न सिर्फ रवीन्द्रनाथ के उपन्यास लेखन की धज्जियां ही उड़ाता है बल्कि एक के शब्दों में तो यह रवीन्द्रनाथ के खिलाफ लुकाच का एक फौजदारी अभियोगपत्र है। फेसबुक पर मैंने जब इसपर आपत्ति की तो हमारे मित्र कृष्ण कल्पित ने अपने स्वाभाविक बेलौस अंदाज में फेसबुक की खास ट्रौलिंग (कीर्तिगान) की परंपरा में लिख मारा था - ’’कोई बंगाली या मारवाड़ी-बंगाली तभी तक मार्क्सवादी है जब तक रवीन्द्रनाथ का नाम न आये । रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर वे सैंकड़ों कार्ल मार्क्स और हज़ारों जॉर्ज लूकाच क़ुर्बान कर सकते हैं !”1

हम अभी शुरू में ही रवीन्द्रनाथ के इस उपन्यास की लुकाच की उस समीक्षा पर कोई अंतिम टिप्पणी के पहले उसमें क्या है, और उसकी अपनी भी एक क्या खास प्रकार की पृष्ठभूमि है, उसकी सचाई को रखना चाहते हैं। और जिन लोगों में इस समीक्षा से अचानक ही रवीन्द्रनाथ को किसी संगीन अपराध में पकड़ लिये जाने का रोमांच पैदा हुआ है, उन्हें इस विषय की पूरी सचाई की जमीन पर लाना चाहते हैं।

जार्ज लुकाच ने यह समीक्षा सन् 1922 में लिखी थी जिसका शीर्षक है - टैगोर का गांधी उपन्यास ( Tagore’s Gandhi Novel ) ।

गांधी यहां कोई संज्ञा नहीं, एक विशेषण है। अंग्रेजों और पश्चिम के अनेकों के बीच गांधी को एक चालाक लोमड़ी माना जाता था। भारत में कुछ लोग उन्हें अंग्रेजो का पिट्ठू तो मुसलमानों का दलाल समझते थे। कुछ खुद के बारे में उन्हीं के कहे को उद्धृत करते हुए उनको सनातनी हिंदू मानते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के कतिपय वामपंथी इतिहास में भी उन्हें पूंजीपतियों के प्रतिनिधि के रूप में विवेचित किया जाता रहा है। और खुद राष्ट्रीय कांग्रेस के अंदर उनके बारे में समय-समय पर यह शिकायत रहती थी कि अहिंसा और सत्य के प्रति अतिरिक्त आग्रह के कारण उन्होंने अनेक बार जनता के क्रांतिकारी उबाल पर पानी डालने का काम किया। उन्हें डिक्टेटर तो कहा ही जाता था।

लुकाच के ‘गांधी’ का क्या तात्पर्य है, यह तो हम आगे देखेंगे, लेकिन अभी की सचाई यह है कि गांधी के बारे में आज भारत में उस प्रकार की नफरत या दुर्भावना रखने वाले लोग आरएसएस के चंद हिंदू कट्टरवादी लोगों के अतिरिक्त कम ही बचे हैं। यहां गांधी एक विशेषण के तौर पर कोई अवमाननामूलक शब्द तो नहीं ही रह गया है !

बहरहाल, शुरू में ही हम  लुकाच से जुड़े कुछ दूसरे तथ्यों की ओर यहां ध्यान खींचना चाहते हैं।  लुकाच ने अपने लेखन के जिस काल में रवीन्द्रनाथ के इस प्रसिद्ध उपन्यास की समीक्षा लिख कर उसे एक सिरे से खारिज ही नहीं किया बल्कि उसकी बुरी तरह से निंदा करते हुए उसे भारी उपहास का विषय भी बनाया था, उसी काल में (सन् 1920-1930 के काल में )उपन्यास विधा के बारे में उनकी समग्र क्या समझ थी, इसे उन्होंने अपनी एक किताब ‘The Theory of the Novel’ में काफी विस्तार से लिखा था। और सबके जानने लायक दिलचस्प बात यह है कि लुकाच के विपुल लेखन में शायद उनकी यह अकेली किताब रही है, जिसे परवर्ती काल में, खास तौर पर स्तालिन के बाद की सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं कांग्रेस के बाद में, लुकाच ने ही उस किताब के अपने एक प्राक्कथान में उसे पूरी तरह से, from roots to branches, ठुकरा  दिये जाने की बात कही थी।2

लुकाच की मृत्यु 1971 में हुई थी और मरने के नौ साल पहले, 1962 में इस किताब में उपन्यासों के बारे में सन् ‘20-‘30 की अपनी समझ के बारे में खुद उन्होंने लिखा था कि ‘‘ The author of The Theory of the Novel… was looking for a general dialectic of literary genres that was based upon the essential nature of aesthetic categories and literary forms, and aspiring to a more intimate connection between category and history than he found in Hegel himself; he strove towards intellectual comprehension of permanence within change and of inner change within the enduring validity of the essence. But his method remains extremely abstract in many respects, including certain matters of great importance; it is cut off from concrete socio-historical realities. For that reason, as has already been pointed out, it leads only too often to arbitrary intellectual constructs….When M. A. Lifshitz and I, in opposition to the vulgar sociology of a variety of schools during the Stalin period, were trying to uncover Marx’s real aesthetic and to develop it further, we arrived at a genuine historico-systematic method. The Theory of the Novel remained at the level of an attempt which failed both in design and in execution… the novel form are here the mirror-image of a world gone out of joint. This is why the ‘prose’ of life is here only a symptom, among many others, of the fact that reality no longer constitutes a favourable soil for art”

(‘ द थ्योरी ऑफ द नावेल’ का लेखक साहित्यिक शैली के बारे में एक सामान्य तर्क की तलाश कर रहा था, जो सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिमानों और साहित्यिक रूपों के सार-तत्व पर आधारित हो, और हेगेल में उसने जो पाया उसकी तुलना में प्रतिमान और इतिहास के बीच और भी गहरे संबंध को पाना चाहता था ; उसने परिवर्तन के स्थायित्व और सार-तत्व की चिरस्थाई मान्यता के अंदर के परिवर्तने की एक बौद्धिक समझ कायम करने की कोशिश की थी। लेकिन अनेक दृष्टियों से उसका तरीका अत्यंत अबूझ सा रहा गया, यहां तक कि कुछ अत्यधिक महत्व के विषय भी अबूझ बने रहे ; वह सामाजिक-ऐतिहासिक यथार्थ से ही कट गया।...स्तालिन के काल के कुत्सित समाजशास्त्र के कुछ स्कूलों के खिलाफ जब मैं और एम. ए. लिफशित्ज मार्क्स के वास्तविक सौन्दर्यशास्त्र को खोल कर और विकसित करने की कोशिश कर रहे थे तब हम एक वास्तविक ऐतिहासिक-व्यवस्थित प्रणाली तक पहुंच पाए थे। ‘थ्योरी ऑफ नावेल’  वहीं पड़ा रह गया जो अपने सोच और प्रयोग, दोनों ही मामलों में विफल साबित हुआ था। ...उसमें उपन्यास का ढांचा एक बिगड़ चुके विश्व के प्रतिबिंब की तरह था। इसीलिये उसमें जीवन का ‘गद्य’ अन्य चीजों की तरह, यह मान कर  कि यथार्थ कला के लिये अब कोई उपयुक्त जगह नहीं बची है, इस तथ्य का सिर्फ एक लक्षण भर बन कर आया था ।)

लुकाच के इस काल के लेखन पर कौन से प्रभाव काम कर रहे थे, इसे उन्होंने खुद बताया था -

‘‘ Kierkegaard always played an important role for the author of The Theory of the Novel, who, long before Kierkegaard had become fashionable, wrote an essay on the relationship between his life and thought.’ And during his Heidelberg years immediately before the war he had been engaged in a study, never to be completed, of Kierkegaard’s critique of Hegel. These facts are mentioned here, not for biographical reasons, but to indicate a trend which was later to become important in German thought. It is true that Kierkegaard’s direct influence leads to Heidegger’s and Jaspers’ philosophy of existence and, therefore, to more or less open opposition to Hegel…. Kierkegaard’s direct influence cannot yet be proved here. But in the 1920s it was present everywhere, in a latent form but to an increasing degree, and even led to a Kierkegaardisation of the young Marx.

(किर्केगार्द ने थ्योरी ऑफ नावेल के लेखक के लिये हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। ...इन तथ्यों को यहां सिर्फ जीवन के तथ्यों को गिनाने के लिये नहीं बताया जा रहा है। ...किर्केगार्द के प्रत्यक्ष प्रभाव को अब भी साबित नहीं किया जा सकता है। लेकिन 1920 के जमाने में वह सर्वत्र मौजूद था, पोशीदा रूप में, लेकिन काफी ज्यादा मात्रा में , और यहां तक कि युवा मार्क्स का किर्केगार्दीकरण किया जा रहा था।)

सिर्फ इतना ही नहीं, अपनी तब की दृष्टि की तीव्र समीक्षा करते हुए लुकाच यहां तक चले जाते हैं कि -

‘‘ Thus, if anyone today reads The Theory of the Novel in order to become more intimately acquainted with the prehistory of the important ideologies of the 1920s and 1930s, he will derive profit from a critical reading of the book along the lines I have suggested. But if he picks up the book in the hope that it will serve him as a guide, the result will only be a still greater disorientation. As a young writer, Arnold Zweig read The Theory of the Novel hoping that it would help him to find his way; his healthy instinct led him, rightly, to reject it root and branch.”

(इसीलिये, आज यदि कोई ‘द थ्योरी ऑफ द नावेल’ को 1920 और 1930 के जमाने की प्रमुख विचारधाराओं के पूर्व इतिहास को गहराई से जानने के लिये पढ़ेगा तो वह मेरे सुझाए हुए ढंग से आलोचनात्मक नजरिये से पढ़ कर ही लाभान्वित हो पायेगा। लेकिन यदि वह इस उम्मीद में उस किताब को उठायेगा कि इससे उसे कोई दिशा-निर्देश मिल पायेगा तो इसका परिणाम उसके लिये और भी ज्यादा भटकाने वाला होगा। जैसा कि युवा लेखक आर्नोल्ड स्वाइक ने इससे कुछ सीखने के लिये इसे पढ़ा तो उसकी स्वस्थ इंद्रियों ने, बिल्कुल सही, इसे जड़ों से लेकर शाखा तक ठुकरा दिया।)
  

“संदीप निखिलेश्वर को समझाता है - ‘‘देखो निखिल, मनुष्यों का इतिहास दुनिया के सभी देशों और जातियों को लेकर तैयार हुआ है। इसीलिये धर्म को बेच कर की जाने वाली पोलिटिक्स से देश का निर्माण नहीं चल सकता है। मैं जानता हूं कि यूरोप इस बात को मन से नहीं मानता, लेकिन इसीलिये यूरोप हमारा गुरू हो जायेगा, यह मैं नहीं मानता।’’
इसके बाद ही संदीप का दूसरा वाक्य है - ‘‘सत्य के लिये आदमी मर कर अमर होता है, अगर कोई राष्ट्र भी मर जाए तो वह राष्ट्र अमर हो जायेगा। उस सत्य की भावना इस दुनिया में शैतान के गगनभेदी अट्टाहास के बीच सच साबित हो। लेकिन विदेश से आकर यह कौन सी पाप की महामारी हमारे देश में घुस आई है !’’(रवीन्द्र रचनावली, खंड - आठ, पश्चिमबंग सरकार, पृष्ठ -105-106)

(दैखो निखिल, मानुषेर इतिहास पृथ्वीर समस्त देश के समस्त जात के निये तैरी होये उठेछे, एई जन्ये पोलिटिक्सेउ धर्म के बिकिये देश के बाडि़ये तोला चोलबे ना। आमी जानि यूरोप एक कोथा मनेर संगे माने ना, किन्तु ताई बोलेई जे यूरोपई आमादेर गुरू ए आमी मानबो ना। सत्येर जन्ये मानुष मोरे अमर होय, कोनो जातिउ जदि मोरे ता होले मानुषेर इतिहासे सेउ अमर होबे। सेई सत्येर अनुभूति जगतेर मध्ये एई भारतवर्षेई खांटी होए उठूक शोयतानेर अभ्रभेदी अट्टहासीर माझखाने। किन्तु विदेश थेके ए की पापेर महामारी ऐसे आमादेर देशे प्रवेश करले !)

गौर करने की बात है कि संदीप ने अपनी मुस्लिम-विरोधी मानसिकता के अनुसार ही निखिलेश्वर को जो बात देश की लड़ाई के साथ ही धर्म की लड़ाई पर अटल रहने की सलाह देते हुए कही थी, लुकाच ने उसी बात को अपनी समीक्षा में  विकृत करके रवीन्द्रनाथ की बात के रूप में उद्धृत कर दिया था। उनके शब्दों में ‘‘He writes: “Men who die for the truth are immortal ; and if a whole people dies for the truth it will achieve immortality in the history of mankind” और इसके बाद ही लुकाच साहब रवीन्द्रनाथ के विचारों के बारे में अपना अंतिम सुना देते हैं  - ‘‘This stance represents nothing less than the ideology of the eternal subjection of India”।

’’यह मत भारत की सनातन गुलामी की विचारधारा से जरा भी कम नहीं है।’’

इसे लुकाच की बौद्धिक गैर-ईमानदारी नहीं तो और क्या कहा जा सकता है ?


यह थी लुकाच की उपन्यासों के बारे में अपनी ही तत्कालीन समझ पर राय, जिस समय उन्होंने रवीन्द्रनाथ की ‘घोरे बाहिरे’ की समीक्षा लिखी थी। खुद लुकाच कहते हैं कि उस समय की उनकी समझ का मार्क्सवाद से कोई संपर्क नहीं था ;  उससे उपन्यास पर कोई सही समझ हासिल नहीं की जा सकती थी ; और यहां तक कि किसी भी स्वस्थ मस्तिष्क को उसे पूरी तरह से, आद्योपांत ठुकरा देना चाहिए, जैसा कि आर्नोल्ड ज्वैग ने किया।

कहना न होगा, उसी काल में रवीन्द्रनाथ के ‘घोरे बाहिरे’ के बारे में लुकाच की समीक्षा की भी यही सचाई है - एक शुद्ध बकवास, जिससे हासिल कुछ भी नहीं किया जा सकता और किसी भी स्वस्थ इंसान के द्वारा उसके एक-एक शब्द को ठुकरा देना ही बिल्कुल स्वाभाविक है। यह हमारी राय नहीं, खुद लुकाच की उस काल विशेष मे उपन्यासों की उनकी आम समझ के बारे में राय रही है। और उनकी इस आत्म-स्वीकृति की  सचाई को हम आगे इस उपन्यास और उसपर लुकाच की समीक्षा पर विस्तृत चर्चा के संदर्भ में ज्यादा ठोस रूप में देखेंगे।

अपनी इस समीक्षा में लुकाच सिर्फ रवीन्द्रनाथ से नहीं, एक प्रकार से तत्कालीन जर्मन कुलीन समाज की साहित्य की समझ से भी अपने प्रकार का शायद कोई ‘वर्ग संघर्ष’ कर रहे थे। रवीन्द्रनाथ के प्रति जर्मनी के इन लोगों के आदर-भाव को वे इस समीक्षा में एक ‘सांस्कृतिक स्कैंडल’ (cultural scandal) और जर्मनी के संभ्रांतो का एक ऐसा ‘सांस्कृतिक स्खलन’ (total cultural dissolution) बताते हैं जो असली और नकली के बीच भेद करने की अपनी पुरानी शक्ति को भी गंवा चुका है।

लुकाच अपनी इस समीक्षा के पहले वाक्य में ही रवीन्द्रनाथ को एक ‘बेकार का आदमी’ (insignificant figure) घोषित करके फतवा देते हैं कि उनके चरित्र लुंजपुंज और घिसे-पिटे (pale sterotypes)होते हैं और कहानी ऊबाऊ (uninteresting)। उपनिषदों और भागवद गीता के कचरे से बिन कर (stirring the scraps) वे अपना काम चलाते हैं। जर्मन पाठकों को यह कह कर लताड़ते हैं कि उन्हें ‘पाठ’ और ‘उद्धरणों’ के बीच फर्क करने की तमीज न होने के कारण वे भारतीय दर्शन की झूठन (scanty leftovers) की तरह की त्याज्य चीज का स्वाद लेने लगते हैं। इन जर्मनों पर उनका आक्षेप है कि जो अपने देश के दार्शनिकों के बीच ही फर्क नहीं कर पाते हैं, तो सुदूर भारत के संसार के बारे में कैंसे जानेंगे ! और इसी रौ में लुकाच ने रवीन्द्रनाथ के लेखन की तुलना एक नितांत स्थानीय साधारण से लेखक फ्रेंसेन के सडि़यल ऊबाऊपन (unctuous tediousness) से भी कर डाली। अंग्रेजों द्वारा टैगोर के मान को तो उन्होंने ब्रिटिश शासकों द्वारा अपने एक ‘बौद्धिक दलाल’ (intellectual agent) को दिया जाने वाला पुरस्कार बता दिया और रवीन्द्रनाथ का इतना कीर्तिगान करने के बाद जब वे ‘घोर बाहिरे’ उपन्यास पर आते हैं तो शुरू में ही उसे उपन्यास की जगह महज एक प्रचारमूलक, भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के खिलाफ घटिया सा ‘पैंफलेट’ घोषित कर दिया, सड़े हुए ज्ञान में सना हुआ पैम्फलेट (steeped in unctuous ‘wisdom’)। और टैगोर की सफलता को टैगोर का कृतित्व नहीं, बल्कि जर्मन कुलीनों की मानसिकता का परिणाम परिणाम बताया । इसके अलावा इस उपन्यास में उन्हें भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति एक नपूंसक घृणा दिखाई दी, और टैगोर के ‘सत्य और अहिंसा’ के रास्ते को वे ‘भारत की सनातन गुलामी की विचारधारा’ (ideology of the eternal subjection of India) कहने से भी नहीं चूके।

उनकी इन बातों की तह में जाकर आगे हम देखेंगे कि  उपन्यासों के बारे में अपनी जिस समझ के जिस सडि़यलपन को खुद उन्होंने यह कह कर स्वीकारा था कि वे तब साहित्य के पूरे ढांचे में हमेशा एक ‘स्थायी तत्व’ की तलाश में जुटे रहते थे, उनका तरीका ‘सामाजिक-ऐतिहासिक यथार्थ से कटा हुआ तरीका था, उस पर फिख्ते के ‘पूर्ण शैतानियों के युग की छाया थी ( The Theory of the Novel is not defined in Hegelian terms but rather by Fichte’s formulation, as ‘the age of absolute sinfulness’),  ये सारी बातें  इस समीक्षा में पूरी तरह से मौजूद है। इससे भी दो कदम आगे बढ़ कर पायेंगे कि इस समीक्षा में लुकाच ने किसी भी बड़े चिंतक से की जाने वाली बौद्धिक ईमानदारी का भी परिचय नहीं दिया था। उन्होंने उपन्यास के उद्धरण को पूरी नासमझी के साथ गलत ढंग से पेश करके रवीन्द्रनाथ पर दुनिया भर की तोहमते जड़ दी थी।

फेसबुक की कल्बे कबीर की वाल पर उनके सबसे पहले के कथन पर, जिसमें उन्होंने लुकाच की इस समीक्षा को उछाला था, प्रतिक्रिया देते हुए मैंने यह लिखा था कि ‘‘यह सच है कि रवीन्द्रनाथ पर बांग्ला में आज तक हजारों किताबें आ चुकी है और उनके बाद भी आज तक वे बांग्ला के किसी भी साहित्य प्रेमी या साहित्य चिंतक के समान रूप से आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं। और यह भी सच है कि यह विषय कोरा जातीय अभिमान या गौरव का मामला नहीं है। बल्कि रवीन्द्रनाथ पर इतनी सारी पुस्तकों के निरंतर प्रकाशन के बावजूद उनके साहित्य और विचारों से परिचित हर व्यक्ति की यह एक सामान्य अनुभूति है कि वे दुनिया के एक ऐसे रचनाकार-चिंतक हुए हैं जिन्हें शायद सबसे कम समझा गया है। रवीन्द्रनाथ के साहित्य को जो जितना ज्यादा जानता है, उसकी यह अनुभूति उतनी ही ज्यादा प्रगाढ़ होती है।

हमने वहां यह भी कहा था कि ’’ रवीन्द्र साहित्य के अध्येताओं को ऐसा महसूस होना अकारण नहीं है। क्योंकि आज तक भारत के प्राचीन औपनिषदिक चिंतन की दीर्घ परंपरा को आधुनिक जीवन की अन्विति में दुनिया में कहीं भी विचार का विषय तक नहीं बनाया जा सका है। अरविंद और राधाकृष्णन आदि की तरह के लोग पौर्वात्य चिंतन के कोरे प्रचारक हुए। लेकिन यह पौर्वात्य चिंतन बदलते हुए आधुनिक जीवन के साथ संगति में कैसे क्रियाशील है, कैसे लोगों के व्यवहार को लगातार प्रभावित करता है, इसे यदि किसी एक लेखक-चिंतक की रचनाओं और विचारों के माध्यम से गहनता और समग्रता से जाना जा सकता है तो हम भारत में अकेले रवीन्द्रनाथ को पायेंगे। आधुनिक चिंतन के मानदंडों पर हम अपने जीवन और साहित्य की आलोचना तो कर सकते हैं, लेकिन उसकी एक समग्र व्याख्या और समझ कायम करने के लिये जरूरी है कि हम अपने अन्तर में घर किये बैठी तमाम पुरातन धारणाओं की सचाई को भी जानें। अक्सर हम अपने दैनन्दिन व्यवहार में अपने विचारों की तुलना में काफी आगे दिखाई पड़ते हैं। विज्ञान के दिये हुए अधुनातन उपकरणों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं, सारे विश्व के संपर्क में रहते हैं। लेकिन अधिकांशत:  हमारा मानस आधुनिक वैश्विक मनुष्य के मान-मूल्यों को अपनाने में असमर्थ होता है। उसके अपने अंतर की अनेक बाधाएं होती है, जिनका अतिक्रमण करना उसके लिये एक बेहद कष्ट-साध्य काम होता है।

“ऐसे में रवीन्द्रनाथ अकेले हैं जिनके साहित्य, और जीवन में भी प्राचीन औपनिषदिक चिंतन की सूक्ष्मतम और गहनतम जड़ों के साथ ही अधुनातन विश्व मानव की धड़कनों को सुना जा सकता है। इनके द्वंद्वों और उन द्वंद्वों के समाधानों को भी उनके साहित्य की व्याख्याओं में देखा जा सकता है।“

इसी सिलसिले में हमने पश्चिम बंगाल की राजनीति का भी एक छोटा सा उदाहरण दिया था कि कैसे ’’जब बंगाल में सन् ‘67 में पहली संयुक्त मोर्चा सरकार बनी और इसके साथ ही भूमि आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया था, किसान सभा के नेतृत्व में जमींदारों की हदबंदी से अधिक जमीन पर कब्जा किया जाने लगा। लेकिन बाद के अनुभवों ने यह बताया कि नाना कारणों से ऐसी कब्जा की गई जमीन पर किसान अपने अधिकार को कायम नहीं रख सके। यहां तक कि किसान सभा और पार्टी के दस्तावेजों में भी इस बात को नोट किया गया कि कब्जा करके ली गई जमीन के प्रति खुद भूमिहीन किसान भी असहज था। इसीलिये 1977 में जब वाममोर्चा सरकार का गठन हुआ, यह निर्णय लिया गया कि किसान जमीन पर खुद कब्जा नहीं करेगा, किसान सभा की मदद से सरकार अतिरिक्त जमीन की सिनाख्त करके उसका अधिग्रहण करेगी और उस सरकारी जमीन को भूमिहीनों के बीच बाकायदा आवंटित किया जायेगा। दूसरे की जमीन पर कब्जा करने को किसानों का संस्कार सहजता से स्वीकार नहीं पा रहा था।

“कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि हमारे संस्कारों का हमारे जीवन के सभी निर्णयों पर गहरा असर रहता है। अगर इस बात को नहीं समझेंगे तो प्रेमचंद के होरी के गोदान के आग्रह को समझना भी असंभव होगा। और भारतीय मनुष्य के इस सच की गहनतम गहराइयों का सबसे बड़ा चितेरा और व्याख्याता अगर कोई है तो उसमें हम रवीन्द्रनाथ के साहित्य और चिंतन को हम पहले स्थान पर पाते हैं।“

इसी में हमने ‘घोरे बाहिरे’ के प्रसंग को अलग से उठाते हुए लिखा था कि  “लुकाच की वह समीक्षा ( Tagore’s Gandhi NovelReview of Rabindranath Tagore: The Home and the World) उनके जिस उपन्यास ‘घोरे बाहिरे’ पर केंद्रित है वह तीन चरित्रों, विमला, उसके पति निखिलेश्वर और आतंकवादी क्रांतिकारी संदीप के आत्मकथनों से निर्मित एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें इन तीनों चरित्रों को तीनों के आत्मकथन के जरिये अपने-अपने नजरिये से परस्पर को खोल कर देखने की एक अनोखी तकनीक का प्रयोग किया गया है। और उस उपक्रम में यह सच है कि क्रांतिकारी संदीप का चरित्र ही, अपने उग्र सांप्रदायिक विचारों और वासनाओं के कारण  सबसे अधिक कमजोर चरित्र के रूप में उभर कर सामने आता है। लुकाच की प्रविृत्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले टाइप चरित्रों के मानदंड में क्रांतिकारी को सर्वगुण संपन्न होना चाहिए था, क्योंकि वह अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई में उतरा हुआ था। लेकिन लुकाच को उसके भारतीय संदर्भ का, उसके अंदर गहरे तक बैठी धार्मिक संकीर्णताओं का और उसकी नारियों के प्रति कुंठाओं का कोई अनुमान नहीं था। रवीन्द्रनाथ ने उस उपन्यास में इस क्रांतिकारी की तमाम कमजोरियों को दिखाने के साथ ही निखिलेश्वर की तरह के एक गृहस्थ की उदारता और उदात्तता को] और विमला के नारी चरित्र की सचाई को जिस प्रकार उभारा है, वह साधारण नहीं है। एक क्रांतिकारी को इसप्रकार से पेश करने के लिये किसी समय वामपंथियों ने भी रवीन्द्रनाथ के इस उपन्यास की काफी आलोचना की थी। लेकिन कालक्रम में इस विषय में भी वामपंथी साहित्य चिंतकों ने रवीन्द्रनाथ के उस उपन्यास के कथ्य और पूरे ढांचे को अपनी स्वीकृति दी। सत्यजीत राय ने तो इस उपन्यास पर अनोखी फिल्म बनाई।“

1905 के बंगभंग आंदोलन की पृष्ठभूमि में लिखे गये इस उपन्यास में एक प्रवंचक और वासनाग्रस्त चरित्र संदीप के चरित्रांकन पर लुकाच उछल पड़ते हैं, लेकिन उस बंगभंग आंदोलन के वक्त के रवीन्द्रनाथ के बारे में लुकाच को यदि रत्ती भर भी ज्ञान होता तो वे शायद इस प्रकार की बातों को कहने की कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे !

लुकाच रवीन्द्रनाथ की औपनिषदिक पृष्ठभूमि का मजाक उड़ाते हैं। लेकिन यदि किसी को रवीन्द्रनाथ के जीवन में इस दृष्टि की भूमिका को समझना है तो उसे उनके जीवन के इतिहास को जानना होगा। रवीन्द्रनाथ की औपनिषदिक शिक्षा ने उन्हें कभी भी पुनरुत्थानवाद की ओर नहीं ढकेला। ये सब ऐतिहासिक तथ्य है कि काफी दबाव के बावजूद वे तिलक के गणपति उत्सव और वीर शिवाजी के मिथक की तर्ज पर किसी देवी-देवता की वंदना के सार्वजनिक उत्सव या बंगाली राजा की वीरगाथा का आख्यान खड़ा नहीं करते, बल्कि इस प्रकार की कोशिशों का मुखर विरोध करते हैं। न , ‘गोरक्षणी सभा’ के गोरक्षा की तरह के आंदोलनों के प्रति उनकी कोई सहानुभूति थी। इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ की सहानुभूति संथाल विद्रोह और सिपाही विद्रोह के प्रति थी। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को वे काफी पहले से ही समझने लगे थे। और यही वजह है कि वे हमेशा कविता के कल्पनालोक से निकल कर लड़ाई के मैदान में उतर पड़ने के लिये आकुल रहा करते थे। उनकी अमर कविता ‘एबार फेराओ मोरे’ के ये शब्द: “एबार फेराओ मोरे, लोये जाओ संसारेर तीरे/हे कल्पने रंगमयी। दोलाओ ना समीरे समीरे/तरंगे तरंगे आर, भुलाओ ना मोहिनी मायाय। /विजन विषादघन अन्तरेर निकुंज छायाय/रेखो ना बोसाये आर। ...”
(अब मुझे लौटा कर संसार के तट पर ले आओ/ हे कल्पना की रंगमयी / मत झुलाओ हवा हवा में/लहर लहर में, न मोहित करो मोहिनी मायासे। /निर्जन, घने विषाद भरे अंतर की लताओं की छाया में/ मत रखो और बैठा कर। ...”)

इसीप्रकार उनका असाधारण ‘आहृान गीत’: “चलो दिवालोक, चलो लोकालये, /चलो जन कोलाहले - /मिसाबो हृदय मानवहृदये/असीम आकाश तले।” (चलो दिवालोक में, लोकालय में/चलो जनकोलाहल में -/मिलाऊंगा हृदय मानव हृदय से/असीम आकाश के तले।) इसके सबसे बड़े प्रमाण है।

लुकाच ‘घरे बाहिरे’ के आधार पर जिस काल के रवीन्द्रनाथ को अंग्रेजों का ‘बौद्धिक दलाल’ बता रहे थे, वह रवीन्द्रनाथ की लेखनी का ‘साधना युग’ कहलाता है और  इसलिये काफी उल्लेखनीय माना जाता  है कि उस दौरान अपने लेखों के जरिये उन्होंने अपनी खुद की राजनीति की एक साफ रूपरेखा रखी थी। कांग्रेस के साथ उनका मतभेद मुख्यतः इस बात पर था कि उन्हें राजनीतिक विचारधारा के मामले में इंगलैंड और उसकी सौ नियमों से बंधी पार्लियामेंट्री राजनीति स्वीकार्य नहीं थी। योरप के बाहर, भारत सहित हर जगह उन्होंने अंग्रेजों को एक घृणित शोषक और उत्पीड़क के रूप में देखा था। कांग्रेस के लोगों की अंग्रेज भक्ति उन्हें सहन नहीं थी।

फिर भी, सच यही है कि रवीन्द्रनाथ को कांग्रेस-विरोधी कहना उचित नहीं होगा। इसीप्रकार, ब्रिटिश साम्राज्य के जघन्य रूप के प्रति गहरी नफरत के बावजूद, इंगलैंड के भी मुट्ठीभर विवेकवान लोगों के प्रति अपनी आंतरिक श्रद्धा व्यक्त करने में भी उन्होंने कभी किसी प्रकार की कृपणता का परिचय नहीं दिया था। सिडिशन एक्ट और 1897 में रानाडे हत्या मामले में तिलक की गिरफ्तारी, लार्ड कर्जन का यूनिवर्सिटी बिल (1902), बंगभंग का प्रस्ताव (1905), स्वदेशी आंदोलन, साम्राज्यवादियों का पहला विश्वयुद्ध - इन तमाम मामलों में रवीन्द्रनाथ जनता के जनतांत्रिक अधिकारों के एक प्रबल पक्षधर और भारत की राष्ट्रीय एकता के एक जागरूक प्रहरी के रूप में उभर कर सामने आये थे।

यही वह काल था जब 1901 के अंतिम दिनों में रवीन्द्रनाथ ने शांतिनिकेतन में ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना की। यह रवीन्द्रनाथ के व्यक्तित्च का एक महत्वपूर्ण रचनात्मक पहलू था जिसके केंद्र में भी उनके आध्यात्मिक संस्कारों की बड़ी भूमिका थी। शान्तिनिकेतन के पीछे प्राचीन भारत के तपोवन की पूरी अवधारणा काम कर रही थी। बाद के दिनों में शिक्षा संबंधी उनके विचारों में काफी परिवर्तन हुए। फिर भी अपने इस तपोवन से उनका क्या तात्पर्य था, इसे 1909 में ‘तपोवन’ शीर्षक लेख में वे बताते हैं :
“भारतवर्ष ने जिस सत्य को अपने निश्चित भाव से उपलब्ध किया है वह सत्य क्या है? वह सत्य प्रधानतः वणिक-वृत्ति नहीं है, स्वादेशिकता नहीं है, स्वराज्य नहीं है - वह है विश्व-बोध। इस सत्य की भारत के तपोवन में साधना हुई है। इसका उपनिषद् में उच्चारण हुआ है...भारत ने प्रबलता को नहीं, परिपूर्णता को चाहा था। इस परिपूर्णता का अर्थ है निखिल के साथ योग, और योग विनम्र होकर, अहंकार को दूर करके ही स्थापित हो सकता है।”

स्वदेशी आंदोलन का जो दबाव कवि को जनकोलाहल के बीच चले आने के लिये प्रेरित कर रहा था, राजनीतिक उथल-पुथल के इसी दौर में गिरडीह में बैठ कर रवीन्द्रनाथ ने देशभक्ति के जो चंद अमर गीत लिखे, उन्होंने बांग्ला जातीय चेतना के निर्माण में अकल्पनीय भूमिका अदा की थी। 1.जदि तोर डाक सुने केउ ना आसे तबे ऐकला चलो रे 2. बांग्लार माटी, बांग्लार जल, बांग्लार वायु, बांग्लार फल-/पूण्य होक, पूण्य होक, पूण्य होक हे भगवान 3. ओ आमार देशेर माटी, तोमार ’परे ठेकाई माथा 4.आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासि 5.सार्थक जनम आमार जन्मेछी ए देशे 6.एबार तोर मरा गंगे बान एसेछे, ‘जय मा’ बोले भासा तरि  - रवीन्द्रनाथ के ये सारे गीत भी इसी काल की देन थे।

और लुकाच इसी काल के संदर्भ में लिखे गये उनके उपन्यास के आधार पर उन्हें ‘भारत की सनातन गुलामी की विचारधारा का प्रवर्त्तक’ बता रहे थे !

इसीकाल में राष्ट्रीय शिक्षा और ग्राम्य समाज के संगठन के बारे में रवीन्द्रनाथ ने कई लेख लिखे। बंगभंग-विरोधी आंदोलन के साथ ही हिंदू-मुस्लिम समस्या ने भी एक विकट रूप लेना शुरू कर दिया था। रवीन्द्रनाथ इस समस्या से काफी विचलित थे। उन्होंने यह साफ देखा था कि अंग्रेज यदि हिंदू और मुसलमानों के बीच विद्वेष पैदा करने में सफल होरहे हैं तो इसका संबंध हमारे समाज की सचाई से है जिसे रवीन्द्रनाथ हमारा ‘पाप’ कहते हैं। “हम सैकड़ों वर्षों से साथ-साथ रहते है, एक खेत की उपज, एक नदी के जल, एक सूरज के प्रकाश का भोग करते आरहे हैं, हम एक भाषा में बात करते हैं, हम एक ही सुख-दुख के लोग है - फिर भी पड़ौसी के साथ पड़ौसी का जो मानवोचित संबंध है, जो धर्म से अलग है, वह हमारे बीच नहीं है।

“हम जानते हैं बांग्लादेश में बहुत सी जगहों में हिंदू-मुसलमान एक चटाई पर साथ-साथ नहीं बैठते हैं - घर में मुसलमान के आने पर जाजम का एक हिस्सा लपेट दिया जाता है, हुक्के के पानी को फेंक दिया जाता है।
‘... यदि शास्त्रों में ऐसा विधान है तो ऐसे शास्त्र को लेकर स्वदेश-स्वजाति-स्वराज की स्थापना कभी भी नहीं की जा सकती है।”

‘घरे बाहिरे’ उपन्यास की पृष्ठभूमि में बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ जुड़े हुए हिंदू सांप्रदायिक दृष्टिकोण का यह पहलू रवीन्द्रनाथ की रचनाशीलता में निश्चित रूप से बड़े रूप में काम कर रहा था । लुकाच यदि तत्कालीन भारतीय समाज की इस ऐतिहासिक सचाई से जरा भी परिचित होते तो रवीन्द्रनाथ के उपन्यास में उसे पाकर खुश होते और उसकी निंदा करने की जगह यह कहते कि उपन्यास किस प्रकार अपने समय का सबसे प्रामाणिक इतिहास हुआ करता है, इसका एक बड़ा उदाहरण है - ‘घोरे बाहिरे’।

इस उपन्यास से मैं बहुत सारे उद्धरण देकर इस समीक्षा को और बोझिल नहीं करना चाहता। लेकिन जिस क्रांतिकारी चरित्र संदीप की चारित्रिक कमजोरी का पर्दाफाश किये जाने पर लुकाच इस तरह से तब बेजा खफा होगये थे, उसकी बातों की एकाध बानगी देखियें -

“संदीप निखिलेश्वर को समझाता है - ‘‘देखों निखिल, मनुष्यों का इतिहास दुनिया के सभी देशों और जातियों को लेकर तैयार हुआ है। इसीलिये धर्म को बेच कर की जाने वाली पोलिटिक्स से देश का निर्माण नहीं चल सकता है। मैं जानता हूं कि यूरोप इस बात को मन से नहीं मानता, लेकिन इसीलिये यूरोप हमारा गुरू हो जायेगा, यह मैं नहीं मानता।’’
इसके बाद ही संदीप का दूसरा वाक्य है - ‘‘सत्य के लिये आदमी मर कर अमर होता है, अगर कोई राष्ट्र भी मर जाए तो वह राष्ट्र अमर हो जायेगा। उस सत्य की भावना इस दुनिया में शैतान के गगनभेदी अट्टाहास के बीच सच साबित हो। लेकिन विदेश से आकर यह कौन सी पाप की महामारी हमारे देश में घुस आई है !’’(रवीन्द्र रचनावली, खंड - आठ, पश्चिमबंग सरकार, पृष्ठ -105-106)

(दैखो निखिल, मानुषेर इतिहास पृथ्वीर समस्त देश के समस्त जात के निये तैरी होये उठेछे, एई जन्ये पोलिटिक्सेउ धर्म के बिकिये देश के बाडि़ये तोला चोलबे ना। आमी जानि यूरोप एक कोथा मनेर संगे माने ना, किन्तु ताई बोलेई जे यूरोपई आमादेर गुरू ए आमी मानबो ना। सत्येर जन्ये मानुष मोरे अमर होय, कोनो जातिउ जदि मोरे ता होले मानुषेर इतिहासे सेउ अमर होबे। सेई सत्येर अनुभूति जगतेर मध्ये एई भारतवर्षेई खांटी होए उठूक शोयतानेर अभ्रभेदी अट्टहासीर माझखाने। किन्तु विदेश थेके ए की पापेर महामारी ऐसे आमादेर देशे प्रवेश करले !)

गौर करने की बात है कि संदीप ने अपनी मुस्लिम-विरोधी मानसिकता के अनुसार ही निखिलेश्वर को जो बात देश की लड़ाई के साथ ही धर्म की लड़ाई पर अटल रहने की सलाह देते हुए कही थी, लुकाच ने उसी बात को अपनी समीक्षा में  विकृत करके रवीन्द्रनाथ की बात के रूप में उद्धृत कर दिया था। उनके शब्दों में ‘‘He writes: “Men who die for the truth are immortal ; and if a whole people dies for the truth it will achieve immortality in the history of mankind” और इसके बाद ही लुकाच साहब रवीन्द्रनाथ के विचारों के बारे में अपना अंतिम सुना देते हैं  - ‘‘This stance represents nothing less than the ideology of the eternal subjection of India”।

’’यह मत भारत की सनातन गुलामी की विचारधारा से जरा भी कम नहीं है।’’

इसे लुकाच की बौद्धिक गैर-ईमानदारी नहीं तो और क्या कहा जा सकता है ?

गौर करने लायक और भी मजे की बात है कि  लुकाच ने जिस संदीप के पक्ष में अपनी समीक्षा में ब्रीफ उठाई है, उसका क्या चरित्र था, जो निखिलेश्वर की पत्नी, और इस उपन्यास की प्रमुख चरित्र  विमला के सामने किसी भी सधे हुए झांसेबाज आशिक की तरह कहता है - ‘‘ ओ छोटीरानी, मेरी बात को यहां कोई नहीं समझ सकता है, संभव है तुम भी न समझो। मैं तुम्हारी पूजा करता हूं। मैं तुम्हारी ही पूजा करने जा रहा हूं। तुमको देखने के बाद मेरा मंत्र बदल गया है। बंदे मातरंग नहीं : बंदे प्रियांग, बंदे मोहिनिंग। मां हमारी रक्षा करती है, प्रिया हमारा विनाश करती है, बहुत सुंदर विनाश।... अब माता के दिन नहीं है। प्रिया, प्रिया, प्रिया ! देवता स्वर्ग धर्म सबको तुमने तुच्छ कर दिया है, धरती के बाकी सारे संबंध आज छाया है। नियम-संयम के सारे बंधन टूट चुके हैं। प्रिया, प्रिया, प्रिया। ’’

और संदीप के इस आचरण पर विमला सोचती है - ‘‘आज आधा घंटा पहले मैं मन ही मन सोच रही थी और लगा कि यह आदमी राजा है, लेकिन यह तो यात्रा दल (नाटक मंडली) का राजा है। नहीं, नहीं, यात्रा दल की पोशाक में भी कभी-कभी राजा छिपा होता है। इसके अंदर तो भारी लोभ है, यह बहुत स्थूल है, इसमें बहुत दरारें हैं; जो इसकी मज्जा के एक-एक स्तर में छिपी हुई है।’’

यह है घरों में घुस कर स्त्रियों पर डोरे डालने वाले ‘क्रांतिकारी’ का असली रूप ! स्त्री को फांसने के लिये वह बंदे मातरंग को बंदे प्रियांग, बंदे मोहिनिंग, बना देता है, प्रिया, प्रिया, प्रिया करने लगता है !

हिंदी में अज्ञेय, यशपाल और जैनेन्द्र के ऐसे क्रांतिकारी चरित्रों की इन्हीं हरकतों के संदर्भ में रामविलास जी ने एक समय इन लेखकों के ‘साड़ी-झंफरवाद’ की काफी खबर ली थी। लेकिन रामविलास जी ने अपनी खास आलोचकीय दृष्टि, पात्रों को हमेशा लेखक के हाथ की कठपुतली समझने वाली दृष्टि के नाते ही  इस विषय को लेखकीय विचलन का मामला बना दिया। यह एक प्रकार से उन पर लुकाच की प्रतिनिधि चरित्रों वाली पद्धति की ही छाया थी।  लेकिन रवीन्द्रनाथ ने अपने उपन्यास के ढांचे में ही संदीप के चरित्र के पूरे छद्म को खोला था। वह लेखक की विचलन नहीं, चरित्र का यथार्थ था।  इसीलिये उनके लेखन के आधार पर किसी ने भी उनके  लेखन में अलग से ‘साड़ी-झंपरवाद’ की तरह की प्रवृत्ति को खोज कर उन्हें कभी हमले का निशाना नहीं बनाया। अन्यथा एक जगह तो संदीप विमला को झांसा देने में सफल हुआ ही था !


और तो और, लुकाच अपनी समीक्षा में जिसे इस क्रांतिकारी द्वारा छेड़ा गया ‘युद्ध’ (battle that was sparked off by the... ‘patriots’ ) कहते हैं, वह तो असल में कुछ मुल्ला-मौलवियों और इन क्रांतिकारियों का भड़काया हुआ सांप्रदायिक दंगा था, जिसमें कुछ मासूम मारे जाते हैं । दंगा भड़कने के पहले संदीप तो सबको चकमा देकर भाग जाता है लेकिन  विमला का पति निखिलेश्वर उससे निपटने के लिये निहत्था ही उतर जाता है और उपन्यास के अंत में उसे बुरी तरह से जख्मी बताया जाता है।

‘‘डाक्टर ने कहा, कुछ कहा नहीं जा सकता। सिर पर भारी चोट लगी है।’’

इतनी तमाम बातों के बाद भी क्या, रवीन्द्रनाथ के ‘घोरे बाहिरे’ उपन्यास की जार्ज लुकाच की समीक्षा में एक वाक्य भी ऐसा पाया जा सकता है, जिसे गंभीरता से विचार के योग्य माना जाए ! वे खुद उपन्यास को देखने की अपनी उस मूल दृष्टि को अपने ही लेखन में पूरी तरह से दुत्कार चुके थे। और तथ्यों से पता चलता है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और रवीन्द्रनाथ तथा खास तौर पर इस उपन्यास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में उनका रत्ती भर भी ज्ञान नहीं था। और सबसे खराब, जिसे हम उनकी बौद्धिक गैर-ईमानदारी के उदाहरण के तौर पर रख रहे हैं, वह यह बात है कि उनके पास उपन्यास को पढ़ने का धीरज नहीं था और उसके उद्धरणों का अनैतिक ढंग से प्रयोग करने से परहेज भी नहीं था।

कहना न होगा, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रवीन्द्रनाथ और महात्मा गांधी के बीच जिस प्रकार का विमर्श चला, लुकाच की ऐसी दृष्टि के लिये तो उसके रंच मात्र को भी समझना असंभव होता !

भारत में आगे के इतिहास ने भी लुकाच की इस समझ को पूरी तरह से गलत साबित किया कि सत्य और अहिंसा का रास्ता भारत की गुलामी का रास्ता था। द्वितीय विश्वयुद्ध की अकल्पनीय हिंसा और उसके बाद के तमाम अनुभवों ने उन्हें इन विषयों पर जरूर बहुत कुछ सिखाया होगा। और इसीलिये 1962 तक आते-आते उन्होंने नि:संकोच सन् ‘20-‘30 के वक्त की उपन्यासों के बारे में अपनी समझ से घोषित तौर पर पिंड छुड़ाने का निर्णय लिया था।

उम्मीद है, हमारे यहां भी जो लोग लुकाच की उस सड़ी हुई समीक्षा में कोई सुगंध ढूंढ रहे हैं, वे भी इन तमाम सचाइयों को जान लेने के बाद इस कीचड़ में अब और अपनी नाक नहीं घुसेड़ेंगे।


1. कल्बे कबीर
September 12 at 8:37pm • 

कोई बंगाली या मारवाड़ी-बंगाली तभी तक मार्क्सवादी है जब तक रवीन्द्रनाथ का नाम न आये
रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर वे सैंकड़ों कार्ल मार्क्स और हज़ारों जॉर्ज लूकाच क़ुर्बान कर सकते हैं !
#आलोचना_की_राख_33.

2. यहां हम 1962 के लुकाच ‘The Theory of  the Novel’ के एक नये संस्करण के प्राक्कथन के उस लिंक को दे रहे हैं जिसमें उन्होंने इस पुस्तक की समझ से वस्तुत: अपने को अलग कर लिया था।
            https://www.marxists.org/archive/lukacs/works/theory-novel/preface.htm













शनिवार, 10 सितंबर 2016

बार बार देखो और 'वर्तमानता' ‘वर्तमानता’ में फर्क



-अरुण माहेश्वरी

आज एक फिल्म देखी - ‘बार बार देखो’।

जय (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और दिया (कैटरिना कैफ), एक प्रेमी युगल के सुखी जीवन की कहानी। जय एक प्रतिभाशाली गणितज्ञ होने के नाते अपनी तर्कशक्ति से जीवन के दूरगामी समीकरणों को देखता रहता है। इसी के चलते अपने वैवाहिक जीवन के एक-एक पड़ाव पर आने वाले संभावित गतिरोधों के दुष्परिणामों की आशंकाओं से घिरा हुआ, पसीना-पसीना होता रहता है। बिल्कुल किर्केगार्द के अस्तित्वीय संकट की तरह आगत साठ सालों को लेकर उसकी आशंकाएं मूर्त हो कर दर्शकों को पर्दे पर दिखाई देती हैं, और दूसरे ही पल वह फिर उसी तक लौट कर उसे एक नये समीकरण को तैयार करने में उतार देती है। दु:स्वप्नों की तरह न जाने कैसे-कैसे संदेह पैदा होते हैं और गुम हो जाते हैं। न उनके उत्स का पता होता है और न ही गंतव्य का।

अंत में नायक एक ही नतीजे पर पहुंचता है कि भविष्य की चिंता छोड़ों और वर्तमान में रहो। टाइम मशीन पर चढ़ कर भविष्य की ओर दौड़ने की गति बेहद हिंसक होती है; सोच कर चलना उबाऊ और थकान भरा होता है। यहां तक कि निश्चेष्ट बने रहने या उठ खड़े होने के बारे में भी वह सोचेगा नहीं। किर्केगार्द कहता है कि ‘‘सब जानते हैं कि ऐसे भी कीड़ें होते हैं जो जन्म के साथ ही मर जाते हैं। इसीलिये मृत्यु के साथ ही खुशी और आनंद का सबसे विलासितपूर्ण क्षण जुड़ा होता है।’’ इसीलिये जीवन को लेकर इतना क्यों सोचना ! जय को गणित के समीकरणों में हमेशा संतुलन बना कर चलने की तरह सिर्फ अपने वैवाहिक जीवन के सुख और शांति को हमेशा बनाये रखना है।

कुल मिला कर यही है इस फिल्म का मूल कथानक।

अभी चंद दिनों पहले ही हमने ‘मोदी जी की वर्तमानता’ की तीखी आलोचना की थी। सवाल है कि क्या इस फिल्म के नायक की सुख और शांति के संतुलन को बनाये रखने की वर्तमानता और मोदी जी की ‘वर्तमानता’ एक है ? मोदी जी की वर्तमानता तो उनके शासन की, गोरक्षकों और संघ के स्वयंसेवकों के दौरात्म्य की वर्तमानता है। फिल्म के नायक जय का लक्ष्य है अपने जीवन को बिखरने नहीं देना। और मोदी जी, जब अपनी बिना किसी लक्ष्य वाली ‘वर्तमानता’ की बात करते हैं, तब वे भारत को एक स्थायी सांप्रदायिक कलह में डाल देने के अपने लक्ष्य पर सिर्फ पर्दादारी कर रहे होते हैंं। इसीलिये वे अपने लक्ष्य को कभी साफ नहीं करते, बल्कि उसे छिपाते हैं।

इसीलिये ‘बार बार देखो’ के नायक के वर्तमान को जीने का दर्शन और मोदी जी की ‘वर्तमानता’ दो विपरीत ध्रुव है।  

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

यह वामपंथ को दिग्भ्रमित करके पंगु बनाने का उपक्रम है

-अरुण माहेश्वरी




प्रकाश करात के बारे में कन्हैया कुमार ने टेलिग्राफ में उनके 6 सितंबर के इंडियन एक्सप्रेस के लेख  'Know your Enemy की प्रतिक्रिया में कहा है कि - कामरेड अगर आप लड़ नहीं सकते तो सेवा निवृत्त होकर न्यूयार्क में जाकर बैठ जाइयें। अपने उक्त लेख में प्रकाश करात ने पूरे दम-खम के साथ  यह ऐलान किया था कि भाजपा फ़ासिस्ट नहीं है ।

कहना न होगा, प्रकाश करात की इस मुनादी ने सीपीआई(एम) के लोगों को एक नया कार्यभार सौंपा है कि वे अब लोगों को यह समझायें कि भाजपा फ़ासिस्ट नहीं है ! अब तक आरएसएस-भाजपा के बारे में तमाम अध्येताओं ने इनके जन्म से लेकर आज तक के इतिहास का अध्ययन करके इनमें जिन तमाम लक्षणों की पहचान की हैं, प्रकाश ने अपनी अन्त:प्रज्ञा से उन्हें फूँक मार कर उड़ा दिया है । हिटलर ने किस प्रकार की तमाम दगाबाजियों से जर्मनी की पूरी सत्ता हड़पी थी, इस इतिहास को जानने के बाद भी प्रकाश राजनीति में किसी भी बड़े शासक दल की बुनियादी विचारधारा और उसकी कार्यपद्धति से जाहिर होने वाले तमाम लक्षणों को कोई महत्व देने के लिये तैयार नहीं है । अर्थात जब तक आरएसएस हिटलर की तरह पूरे प्रतिपक्ष को मसल कर ख़त्म नहीं कर देता, गुजरात का जनसंहार काफी नहीं है, वह हिटलर जैसा कोई हॉलोकास्ट नहीं करता, वह फ़ासिस्ट कहलाने का हक़दार नहीं हो सकता है !

प्रकाश अपनी राजनीतिक विचक्षणता का परिचय देते हुए सबको यह उपदेश देना चाहते हैं कि शत्रु की पहचान में किसी प्रकार का अतिरेक उचित नहीं है । वह जैसा है, उसी रूप में उसे देखा जाना चाहिए ! अन्यथा हम अपनी रणनीति और कार्यनीति को सही रूप में तय नहीं कर पायेंगे  !

प्रकाश यह नहीं जानते कि कोई भी चीज एक समय जैसी होती है, दूसरे ही पल वैसी नहीं रहती है । हिटलर के ऊपर के उदाहरण की गहराई में जाने से ही साफ पता चल जायेगा कि 1923 में जेल से निकल कर नाजी पार्टी के पुनर्गठन के बाद ही हिटलर राष्ट्रपति पद के लिये हिंडनबर्ग के हाथों पराजित होकर फिर उन्हें ही झांसा देकर किस प्रकार जर्मन संसद में मात्र एक तिहाई सीटों के बल पर वहां का चांसलर बन गया और पूरी राजसत्ता को अपने हाथ में लेने में सफल हुआ था। उस एक क्षण पहले के हिटलर और बाद के हिटलर में जमीन आसमान का फर्क आ गया था। ऐसी नौबत आ जाने पर फिर  स्थिति सबके नियंत्रण के बाहर चली जाती है । इसीलिये हर प्रकार के अध्ययनों में वस्तु के लक्षणों का बेहद महत्व होता है । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन लक्षणों ने तब तक और विकसित होकर अपने किसी सर्वकालिक universal रूप को पूरी तरह से प्रकट किया है या नहीं।

प्रकाश की दलील है कि बीजेपी को फ़ासिस्ट कह देने पर अर्थनीति के मोर्चों पर वामपंथ की लड़ाई पटरी से उतर जायेगी।  यह एक धोखा और सोचने के ढंग में कोरी यांत्रिकता है । आपने भाजपा के फासीवाद की पहचान कर ली तो आप अपने एजेंडे से हट जायेंगे की तरह का तर्क हास्यास्पद  है ।

अर्थात, अपने एजेंडे पर बने रहने के लिये आरएसएस-भाजपा के मूल चरित्र के प्रति एक हद तक अंधता को अपना कर चलना चाहिए !  घोड़ागाड़ी में जुते घोड़े के चश्मों की तरह, इधर-उधर बिना देखे एक सीध में सरपट दौड़ना चाहिए !

दुश्मन को पहचानने का प्रकाश का यह तरीक़ा उसकी एक तात्कालिक  भ्रामक सच्चाई को तेज़ रोशनी के फ़ोकस में डाल कर उसके पूरे सच को लोगों की नजर से ओझल कर देने का तरीक़ा है ।

मूल बात यह है कि प्रकाश यह सारा तुमार सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ सभी धर्मनिरपेक्ष ताक़तों की एकता की नीति के रास्ते में बाधा डालने के लिये बांध रहे हैं, क्योंकि ऐसे व्यापकतम संयुक्त मोर्चे में स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस का भी एक स्थान होगा । भारतीय राजनीति की प्रकाश की पूरी समझ में कांग्रेस बैल के लिये किसी लाल कपड़े से कम नहीं जान पड़ती है । अगर उसे किसी प्रकार एक बार के लिये अलग कर दिया जाए, तो शायद उन्हें भाजपा को फासीवादी मान कर फासीवाद के खिलाफ तथाकथित तीसरे विकल्प की बात को मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होगी। कहना न होगा, यह प्रकारांतर से फासीवाद के खिलाफ व्यापकतम संयुक्त मोर्चा की लड़ाई को शुरू में ही पूरी तरह से ठुकरा देने जैसा है। तीसरे मोर्चे की जिन ताक़तों में न कोई आपसी संहति है, न अर्थनीति से लेकर अन्य अनेक मामलों में वामपंथ के साथ कोई संगति है, और जो बहुत ही सीमित क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाली नगण्य ताक़तें हैं, सिर्फ उनके भरोसे एक तेज़ी से उदीयमान फासीवादी ताक़त का प्रतिरोध करने की कल्पना भी करना , सचमुच फासीवाद का कोई प्रतिरोध न करने की लाईन को शुरू में ही अपना कर चलने की सिफारिश करने जैसा होगा ।

इस पूरे उपक्रम से लगता है कि सीपीएम का एक पूर्व सचिव अपनी पुरानी भूलों को सही बताने के बारे में ज्यादा चिंतित है, न कि जनतंत्र और मानव-अधिकारों पर हो रहे नग्न हमलों का कोई वास्तविक प्रतिरोध खड़ा करने में । यह पार्टी में अपनी स्थिति का एक प्रकार से दुरुपयोग है जो निजी एजेंडे के लिये सैद्धांतिकता की धोखे की टट्टी खड़ी कर रहा है । यह पूरी पार्टी को पंगु बनाने और दिग्भ्रमित करने का उपक्रम है । इस सैद्धांतिक व्यायाम का इसके अतिरिक्त दूसरा कोई मायने नहीं हो सकता है ।

जिन लोगों ने थर्ड राइख के इतिहास का अध्ययन किया है, उनका यह भी मानना रहा है कि हिटलर की उबाऊ आत्मजीवनी 'माइन काम्फ़ ' का पहले ही सही ढंग से अध्ययन किया गया होता तो दुनिया को उन अनेक भारी बर्बादियों से समय रहते बचा लिया गया होता़, जिन्हें मानवता को द्वितीय विश्व युद्ध में झेलना पड़ा था । जर्मन इतिहासकार वर्न मेसर अपनी पुस्तक ‘हिटलर्स माइन कैम्फ ऐन एनालिसिस’ के दूसरे अध्याय का प्रारम्भ इस कथन से करते हैं कि ’’इस अध्याय में यह बताया जाऐगा कि हिटलर के अ​धिकांश प्रमुख विचार तथा सत्ता पर आने के बाद उसके निर्णयों की पृष्ठभूमि, ये सब ’’माइन कैम्प’’ में मौजूद थे। इसका मतलब हिटलर के राज्य की भयावहता को ही दिखाना नहीं होगा, बल्कि यह साबित करना होगा कि 1933 के पहले ही हिटलर की पुस्तक का यदि गम्भीरता से अध्ययन किया जाता या सिर्फ अकादमिक उद्देश्य के लिए नहीं बल्कि अन्य उद्देश्यों से भी उनके सिद्धान्तों को नोट किया जाता तो वह कितना अ​धिक लाभदायी हो सकता था तथा ऐसा करना कितना जरूरी था...उसकी पुस्तक के प्रथम खण्ड के पहले संस्करण के अध्ययन से ही लोगों को ’’रूस’’ के साथ युद्ध की आवश्यकता, अन्य जातियों के लोगों का ’’अनिवार्य’’ खात्मा या ’’संधि’’ से हिटलर का तात्पर्य क्या था, इन्हें समझा जा सकता था। वास्तव में हिटलर ने जर्मनी और सारी दुनिया पर जो भयंकर कहर बरपा किया था, उसके बिल्कुल साफ और विस्तृत कार्यक्रम को ’’माइन कैम्फ’ में रख दिया गया था और हिटलर ने उसी पुस्तक की घोषणाओं और भविष्यवाणियों पर अपने राज में निष्ठा के साथ पालन किया था।’’ मेसर इसमें आगे बताते हैं कि हिटलर ने उस पुस्तक के दूसरे खण्ड के 15वें अध्याय में बिल्कुल साफ तौर पर लिखा था कि ’’यदि 1914 में 12 से 15 हजार यहूदियों को जहरीली गैस देकर मार दिया गया होता तो प्रथम विश्वयुद्ध में लाखों का बलिदान न देना पड़ता।’’ (पृ. 117) ’’जर्मनी के साथ रूस की संधि’’ पर चर्चा करते हुए दूसरे खण्ड के 14वें अध्याय में हिटलर का कथन है कि युद्ध के उद्देश्य के बिना अन्तर्राष्ट्रीय संधियों का न कोई अर्थ और न कोई मूल्य है।’’ (पृ. 118)

उनके विपरीत, प्रकाश तो कह रहे हैं कि भारत में अब तक आरएसएस के बारे में किये गये सारे अध्ययनों को रद्दी की टोकरी में फेंक दो ।


http://www.telegraphindia.com/1160909/jsp/frontpage/story_107178.jsp#.V9JDatgTsiI.email

बुधवार, 7 सितंबर 2016

आपका, 'कामरेड पूंजीवाद'

‘आपका कामरेड, पूंजीवाद’

‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के 20 अगस्त 2016 के अंक में एक दिलचस्प लेख है - Comradely Capitalism - अमेरिका ने कैसे अनायास ही अपने जमानती कर्जों के बाजार का राष्ट्रीयकरण कर लिया (How America accidently nationalised its mortgage market) ।
इस लेख की शुरूआत सन् 2008 के लेहमैन ब्रदर्स के पतन से की गई है। मकानों के लिये कर्ज को वित्तीय पण्य बना कर बैंकों के खेल में कर्ज की किश्तों के भुगतान में असमर्थ ग्राहकों के चलते जो सबप्राइम संकट पैदा हुआ, उसका भी जिक्र है। लेकिन इसमें सबसे दिलचस्प है वह कहानी कि 2007 से ही शुरू हुए वित्तीय संकट की आहटों के बाद 2008 के सबप्राइम भूचाल सहित पिछले लगभग दस सालों ने अमेरिका के हाउसिंग क्षेत्र पर क्या प्रभाव डाला है। और देखने लायक है उस पर ‘इकोनोमिस्ट’ की व्यंग्योक्ति जो उनकी इस कहानी के शीर्षक से ही जाहिर है।

आज अमेरिका में दुनिया की सबसे बड़ी आवासीय संपत्ति है जिसकी कीमत 26 ट्रिलियन डालर कूती जाती है। यह वहां के शेयर बाजार की कुल पूंजी से थोड़ी ज्यादा है। इसपर लोगों को तकरीबन 11 ट्रिलियन डालर का जमानती कर्ज दिया हुआ है, जिसे दुनिया के किसी भी दूसरे देश की तुलना में वित्तीय जोखिम का एक सबसे बड़ा जखीरा माना जाता है। इसके अतिरिक्त सारी दुनिया में ऐसे और भी एक ट्रिलियन डालर के जमानती कर्जों के साथ अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था गहराई से जुड़ी हुई है।

‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका की अमेरिकी प्रशासन से शिकायत है कि 2008 में इस क्षेत्र में इतना बड़ा विस्फोट होने के बाद भी वहां की वित्तीय व्यवस्था के इस क्षेत्र में पुराने दोष जस के तस पड़े हुए हैं।

इस बारे में ‘इकोनोमिस्ट’ की टिप्पणी है कि जमानती कर्ज देने की इस प्रणाली ने अमेरिका में एक अनोखा रास्ता पकड़ा हुआ है, जिनका आम लोगों और महाजनों, दोनों की ही मानसिकता पर असर दिखाई देता है। उसके शब्दों में -‘‘The supply of mortgages in America has an air of distinctly socialist command-and-control about it. Some 65-80% of all new home loans are repackaged by organs of the state. The structure of these loans, their volume and the risks the entail are controlled not by markets but by administrative fiat.”
(अमेरिका में दिये जाने वाले जमानती कर्ज में कमान और नियंत्रण वाली समाजवादी पद्धति की एक स्पष्ट झलक है। लगभग 65 से 80 प्रतिशत मकानों के लिये कर्जों की सरकारी संस्थाओं ने नये रूप में तैयार किया है। इन करों का ढांचा, इनकी मात्रा और इनके साथ जुड़े जोखिम भी बाजार के द्वारा नहीं, प्रशासनिक आदेशों के द्वारा तय किये जाते हैं।)

बाजारवाद का खुला पक्षधर ‘इकोनोमिस्ट’ इस बात को बहुत गलत मानता है। उसके अनुसार इसमें जीडीपी का लगभग एक प्रतिशत, प्रतिवर्ष 150 बिलियन डालर आवासीय कर्ज की क्षतिपूर्तियों में खर्च हो जाता है। वह इसे साफ शब्दों में करदाताओं के धन का दुरुपयोग मानता है।

‘इकोनोमिस्ट’ को अमेरिका की आवासीय व्यवस्था शुरू से ही कुछ अजीबोगरीब लगती है। उसके अनुसार जब अधिकांश देशों में बैंकें अपने जोखिम को कम करने के लिये अल्पावधि या व्याज की परिवर्तनीय दरों पर ऐसे कर्ज देती है तब अमेरिका में ये नियत दर पर 30 साल की दीर्घावधि और आसानी से चुकाई जा सके ऐसी शर्तों पर ये कर्ज दिये जाते हैं। उसका आरोप है कि यह बाजार के बल पर नहीं, सिर्फ सरकारी मशीनरी के बल पर किया जा रहा है।

‘इकोनोमिस्ट’ ने इस पूरे विश्लेषण के अंत में अमेरिका के इस क्षेत्र पर यह लांक्षण लगाया है कि उसने 2007-2008 के इतने बड़े संकट की शिक्षाओं को व्यर्थ कर दिया है। यदि उन्होंने उस संकट से शिक्षा ली होती तो वे आसानी से जमानती कर्ज देने वाली मशीनरी को वही रास्ता पकड़ने के लिये मजबूर कर सकते थे, जो बैंकों का सब जगह आजमाया हुआ रास्ता है। अमेरिका में इस व्यवस्था में सुधार करके इसमें सरकार की भूमिका को कम करने के बारे में कई प्रस्तावों पर काम चल रहा है, जिनमें ‘इकोनोमिस्ट’ के अनुसार कौर्कर-वार्नर का विधेयक सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन ‘इकोनोमिस्ट’ को अफसोस है कि आज वहां कोई ऐसे विधेयक को पारित करने की हड़बड़ी में नहीं दिखाई देता है।

‘इकोनोमिस्ट’ इस रिपोर्ट के अंत में कहता है कि हाल के संकट के चलते विश्व वित्तीय व्यवस्था में कुछ सुधार हुए हैं, लेकिन अमेरिकी जमानती कर्ज का क्षेत्र अभी भी सबसे बड़ी समस्या का क्षेत्र बना हुआ है। उसके अनुसार, इसके कारण वहां के आम लोगों में कर्ज लेने का नशा है, असमानता को दूर करने के लिये क्षतिपूर्तियों का इस्तेमाल किया जाता है और राजनीतिक बाधा बरकरार है। इस रिपोर्ट का अंतिम वाक्य है - ‘‘स्वतंत्र लोगों के देश में, जहां अपना मकान होना एक राष्ट्रीय स्वप्न है, मकान खरीदने के लिए कर्ज जुटा कर देने का काम सरकार कर रही है और इसके लिये करदाताओं को सताया जा रहा है।’’

कहना न होगा, ‘इकोनोमिस्ट’ का यह दुख और क्षोभ ही हमारा सुख और संतोष है। ‘इकोनोमिस्ट’ को महाजनों और करदाता वित्तवानों की चिंता है। लेकिन यह राजनीतिक परिस्थितियों का दबाव है, जो ‘इकोनोमिस्ट’ को फूटी आंखों नहीं सुहा रहा है, कि अमेरिका में दुनिया के सबसे बड़े महाजनों की सरकार भी आम लोगों की, उनके स्वप्नों की चिंता करनी पड़ रही है। और पूंजीवाद के संदर्भ में भी हम कहेंगे कि पूंजीवाद अपने इसी लचीलेपन के चलते अब तक कई प्रकार के संकटों के आवत्‍​र्तों से निकल पाया है। अगर ‘इकोनोमिस्ट’ की तरह की बाजारवादी अकड़ पर पूरी तरह से बना रहता तो अन्यत्र तो छोडि़यें, वह अपने सबसे मजबूत गढ़ में ही कब का दम तोड़ दिया होता।

-अरुण माहेश्वरी

The Economist | Housing in America: Comradely capitalism
http://www.economist.com/news/briefing/21705316-how-america-accidentally-nationalised-its-mortgage-market-comradely-capitalism?frsc=dg%7Ca

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

समीक्षा में उपदेश और फतवेबाजी


-अरुण माहेश्वरी

मेरी किताब ‘आलोचना के कब्रिस्तान से’ पर जगदीश्वर चतुर्वेदी की समीक्षा पढ़ी। उनकी समीक्षा की पहली ही पंक्ति है - ‘‘हिंदी आलोचना संकट में है, इसमें दो राय नहीं है।’’ इसके बाद ही वे लिखते हैं -‘‘इस किताब में सात लेख हैं। ये सातों लेख मूल्यवान हैं। लेकिन समस्या यह है कि क्या ‘खीझ’, या ‘गुस्सा’ या ‘धिक्कार’ से आलोचना का विकास संभव है।’’

उन्होंने इस खीझ, गुस्सा और धिक्कार को इन्वर्टेड कोमा में दिया है,  इसके बावजूद यह समझने में कोई भूल नहीं होती है कि इन ‘महत्वपूर्ण’ बताये गये लेखों के बारे में उनका कहना है कि इनमें कोरी खीझ, गुस्सा या धिक्कार है !

इसी क्रम में वे बताते हैं कि आलोचना ‘दुर्वासा की भाषा’ नहीं, ‘वकील का तर्कशास्त्र’ नहीं...आदि और फिर एक उपदेश देते हैं -’’ आलोचना के लिए पद्धति और परिप्रेक्ष्य का होना बेहद जरूरी है। निष्कर्ष निकालने,जजमेंट देने,मूल्य-निर्णय आदि से आलोचना में बचना चाहिए.आलोचना निष्कर्ष नहीं है।आलोचना तो नई समस्या का आरंभ है।आलोचना को ´गुस्सा´,´क्षोभ´,धिक्कार´ ,´तिरस्कार´ की भाषा से बचना चाहिए।’’

इसप्रकार के तीन सामान्य प्रकार के उपदेशमूलक और निर्णयमूलक पैराग्राफ लिखने के बाद वे एक ठोस मुद्दे पर आते हैं - ‘पंचतंत्र’ की कथाओं के मुद्दे पर। मेरे लेख ‘रवीन्द्रनाथ, छायावाद और हिंदी आलोचना’ में एक जगह रामविलास शर्मा के लेखन की शैली के संदर्भ में विस्तार के साथ पंचतंत्र की शैली का जिक्र आया है। मैं यहां पाठकों की सुविधा के लिये उस पूरे अंश को दे दे रहा हूं, जिसमें हमने लिखा हैं -

‘‘ और जहां तक डा. शर्मा के इतिहास लेखन का प्रश्न है, आज के काल में इतिहास लेखन जिसप्रकार इतिवृत्तात्मकता, पुरातत्व, भाषाशास्त्र और समाजशास्त्र, नृतत्वशास्त्र आदि का एक साझा उपक्रम है, डा. शर्मा उसे भी अपने ग्रंथों की प्रयोगशाला से उसी प्रकार गढ़ देना चाहते थे, जैसे वे हिन्दी नवजागरण को पैदा करना चाहते थे। इसमें महत्व किसी शोध की प्रामाणिकता का नहीं, अपने पूर्वाग्रह को प्रमाणित करने का होता है।

“याद आती है पंचतंत्र की कहानियों का मूल संस्कृत से अनुवाद करने वाले कृष्णदत्त शर्मा की लंबी भूमिका की जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक ‘पंचतंत्र : मानव जीवन का ज्ञानकोष’ के प्रारंभ में दिया है। इस भूमिका में वे इन कहानियों के पीछे के प्रयोजन की एक कहानी सुनाते हैं। लिखते हैं -

‘‘दक्षिण देश में महिलारोप्य नामक एक नगर था। यहां अमर सिंह नामका एक राजा राज्य करता था। उसका यश दूर-दूर तक फैला हुआ था। वह स्वयं विभिन्न कलाओं में निपुण था और विद्वानों का आदर करता था। उसके तीन पुत्र थे - बहु शक्ति, उग्र शक्ति और अनंत शक्ति। ये तीनों के तीनों अत्यंत उद्दंड और विद्या-विमुख थे। अधिक संपत्ति से संतान बिगड़ जाती है। ...राजकार्य में व्यस्त रहने के कारण राजा पहले तो राजपुत्रों पर विशेष ध्यान नहीं दे पाया। फिर जब उसका ध्यान गया और उसे समस्या की गंभीरता का अहसास हुआ तब तक बहुत देरी हो चुकी थी। ...ऐसे पुत्रों को गद्दी का वारिस नहीं बनाया जा सकता था। ...तब एक दिन उसने अपने मंत्रियों और राज्याश्रित विद्वानों की एक सभा बुलाई और उनके सामने अपनी समस्या रखी। ...ऐसे पुत्र से क्या लाभ...अपने पुत्रों के बारे में यह टिप्पणी करने के बाद राजा ने आगे कहा, ‘‘जैसे भी इन राजकुमारों की बुद्धि का विकास हो वैसा उपाय आप लोग करें।’’

‘‘...राजा के इन शब्दों को सुन कर सभा में निस्तब्धता छा गई। अधिकांश मंत्री और विद्वान राजपुत्रों की उद्दण्डता और विद्या-विमुखता से परिचित थे। तब एक पंडित ने मौन तोड़ते हुए कहा, ‘‘राजन बारह वर्ष तो व्याकरणशास्त्र के अध्ययन में लगते हैं, चाणक्य आदि के अर्थशास्त्र और वात्स्यायन आदि के कामशास्त्र का अध्ययन करना होगा। इसप्रकार धर्म, अर्थ और कामशास्त्र के ज्ञान के बाद कहीं जाकर बुद्धि जागती है। ’’

‘‘उस सभा में सुमति नामका एक मंत्री बैठा था। उसने कहा, ‘‘मनुष्य का जीवन अनित्य है। इन राजकुमारों के लिए तो किसी संक्षिप्त शास्त्र पर विचार कीजिए। कहा भी गया है, व्याकरणशास्त्र का कोई वार-पार नहीं। अवस्था थोड़ी और विघ्न बहुत है। इसलिए हंस के नीर-क्षीर विवेक की तरह हमें असार को त्याग कर सार को ग्रहण करना चाहिए।’’

‘‘अपना सुझाव देते हुए सुमति ने आगे कहा : ‘‘इस सभा में समस्त शास्त्रों में निष्णात छात्रों के बीच यशस्वी विष्णु शर्मा नामक विद्वान है। आप इन पुत्रों को उन्हें सौंप दीजिए। वे उन्हें जल्द ही प्रबुद्ध बना देंगे।

‘‘यह सुन कर राजा ने विष्णु शर्मा को बुला कर कहा : भगवन ! कृपा करके मेरे इन पुत्रों को जैसे भी संभव हो वैसे अनुपम विद्वान बना दीजिए। इसके बदले में आपको सौ ग्रामों का मालिक बना दूंगा।

‘‘यह सुन कर विष्णु शर्मा ने राजा से कहा : ‘देव ! आप तथ्य की बात सुने। सौ गांव लेकर भी मैं विद्या को बेचूंगा नहीं। फिर भी यदि मैंने आपके पुत्रों को छ: महीने के अन्दर-अन्दर नीति शास्त्र में पारंगत नहीं बना दिया तो मैं अपना नाम बदल दूंगा। ...यदि मैं छ: महीने के अंदर आपके पुत्रों को नीति शास्त्र का अप्रतिम ज्ञाता न बना दूं तो ईश्वर मुझे स्वर्ग की गति न दे।’’

“इसी उपक्रम में विष्णु शर्मा ने नीति शास्त्र के पूरे विषय को पांच भागों में विभाजित किया और विषय के अनुरूप पांच केंद्रीय कहानियों की सृष्टि कर डाली। हर कहानी एक कहानी न होकर अनेक कहानियों का तंत्र है। तंत्र का अर्थ है एक प्रकार की संरचनात्मक व्यवस्था, जिसमें हर कहानी अलग-अलग भी हो और केंद्रीय कहानी का अंग भी। इसप्रकार कुल पांच कहानी-तंत्र हुए। इसीलिये पुस्तक को नाम दिया पंचतंत्र। ’’
इन सब कहानियों के पात्र तो पशु-पक्षी है, लेकिन उनके मारफत जिस नीति शास्त्र का बखान किया गया है वह मनुष्यों के लिये है। विष्णु शर्मा एक खास, सीमित प्रयोजन से राजा के बिगड़ैल बेटों को तुरत-फुरत शिक्षित करने के लिए अपने जाने शास्त्रों का निचोड़ पेश कर रहे थे। उनके लिये महत्व इन निचोड़ों का था, किन पात्रों से उन्हें पेश किया जा रहा है, वह महत्वहीन था। दरबार के दूसरे पंडित चिंतित थे कि इतने कम समय में कैसे किसी को सारे शास्त्रों का विद्वान बनाया जा सकता है, लेकिन विष्णु शर्मा बिल्कुल निश्चिंत थे। उन्हें तो कुछ रोचक कथाओं से नीति कथनों को राजकुमारों को रटाना था। उन्होंने पशु-पक्षियों के कथोपकथन से सारे शास्त्रों के ऐसे गुटके तैयार किये कि आज भी वे ज्ञान के शार्टकट की तलाश में लगे लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। कान में मंत्र फूंकने वाला ऐसा साहित्य आज भी हर रोज रचा जाता है।

“लेकिन गौर करने की बात यह है कि पंचतंत्र की ये कहानियां जो खास प्रयोजन के लिये रची गई, कभी भी पाणिनी के व्याकरण, चाणक्य के अर्थशास्त्र और वात्स्यायन के काम शास्त्र का स्थान नहीं ले पाई। “

इसी प्रसंग में जगदीश्वर चतुर्वेदी ने अपने लेख में हमें ऐतिहासिकता का उपदेश देते  हुए हमारे यहां पशुकथाओं के इतिहास से हमें यह समझाने की कोशिश की है कि ‘‘ ये महज उपदेशात्मक कथाएं नहीं हैं।बल्कि इनमें जानवरों के कर्म को मनुष्यों को उपदेश देने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया है।उपदेश की पद्धति महज सरलता से ग्रहण कर लेने के लिहाज से इस्तेमाल की गयी है।“

‘महज उपदेशात्मक कथाएं नहीं हैं, बल्कि जानवरों के कर्म को मनुष्यों को उपदेश देने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया है’’ ! मेरे लिये यह एक अबूझ पहेली है। बहरहाल,  मेरा सवाल है कि ‘पशुकथाओं’ से उनका क्या तात्पर्य है ? क्या ये कहानियाँ पशु-पक्षियों के व्यवहार-विज्ञान (Behavioral science) से जुड़ी कहानियाँ है, जो आज की दुनिया में प्रभूत मात्रा में उपलब्ध है और चींटी से लेकर हाथी तक की गतिविधियों के गहरे अवलोकन के आधार पर लिखी गई इन किताबों को बहुत ही अधिक चाव के साथ पढ़ा जाता हैं । मनुष्य भी इसी जीव जगत का एक प्राणी होने के नाते उसके बहुत से व्यवहारों में अन्य जीवों की तरह की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती है । गैब्रियल गार्सिया मार्केस ने अपने प्रसिद्ध साक्षात्कार, Writer's Kitchen(लेखक की रसोई) में बताया है कि कैसे वे अपने एक चरित्र के बारे में आगे लिख नहीं पा रहे थे और काफी दिनों तक उनका उपन्यास अटक कर रह गया था, तब हाथियों के व्यवहार के बारे में एच जी वेल्स की एक किताब को पढ़ते हुए उन्हें अपने मानव चरित्र के व्यवहार की गुत्थी को सुलझाने में मदद मिली थी । प्रश्न है कि क्या पंचतंत्र की कथित पशुकथाओं का ऐसा कोई उपयोग संभव है । उनमें पशु निमित्त है, कुछ ख़ास उपदेशमूलक बातों को कहने भर के लिये । ऊपर मैंने अपने लेख में पंचतत्र के विषय में की गई टिप्पणी को पूरा उद्धृत किया है। उससे कम से कम इतना तो जाहिर हो ही जाता है कि पशुकथाओं की भारतीय परंपरा के बारे में जगदीश्वर जी की सूचनाओं का मेरे लेख के संदर्भ में कोई मायने नहीं है ।

उनकी समीक्षा में दूसरा ठोस प्रसंग है रवीन्द्रनाथ और हिंदी आलोचना पर। इसपर भी अपनी स्वभावसिद्ध भंगिमा में शुरू में ही उनका फतवा है कि ‘‘ अरूण माहेश्वरी ने ´संतुलन´ से काम नहीं लिया है।“
इसमें उनका कथन मूलत: हजारी प्रसाद द्विवेदी को लेकर हमारी टिप्पणी पर हैं। द्विवेदी जी  पर पहले भी मैंने कई बार टिप्पणियाँ की है । वे एक साहित्य चिंतक ही नहीं, एक रचनाकार, उपन्यासकार भी है । आलोचना साहित्य तो छोडि़यें, उनके उपन्यासों को भी मैंने बहुत चाव से पढ़ा है । उनके बारे में ‘सिरहाने ग्राम्शी’ में मेरी यह टिप्पणी द्रष्टव्य है :

‘‘शांतिनिकेतन उनके मन-प्राण में बस गया था। तपोवन के ढांचे में आधुनिक शिक्षा। रवीन्द्रनाथ का यह सोच उनके संपूर्ण कृतित्व का आधार था। वे प्राचीन पुराणों-उपनिषदों के ज्ञान से रत्ती भर भी दूर नहीं रहना चाहते थे, लेकिन आधुनिक मूल्यों को, जनतंत्र के मूल्यों को भी अपनाना चाहते थे। यही भारतीय राष्ट्रवाद था। इसमें भक्ति थी, पूजा-अर्चना थी, यज्ञ-याग और दूसरे कर्मकांड भी थे और साथ ही आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की चर्चा भी। द्विवेदी जी के साहित्य के पूरे ढांचे में शांतिनिकेतन के इस स्वरूप को साफ देखा जा सकता है। ‘विधाता की कृपा’ सारे जीवन का एक मूल सूत्र था। यही गरीबों के, एक गुलाम देश के उत्पीडि़त जनों का भी प्रमुख जीवन मंत्र हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। दुख, गरीबी और भयानक उत्पीड़न किसी भी असहाय को भाग्य के आसरे छोड़ देते हैं। यहां दैवी कृपा उसकी शक्ति और सहारा बनती है। अलौकिक का सम्बल उसे आशा देता है। द्विवेदी जी अपने पूरे लेखन में एक परम आस्थावादी, भगवान के भक्त, निष्ठावान पुजारी, कर्मकांडों पर विश्वासी और ईश्वर कृपा के अभिलाषी रूप को जरा भी नहीं तजते। ...मैं ये सारी बातें ‘चारु चन्द्रलेख’, ‘वाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘पुनर्नवा’ पढ़ कर लिख रहा हूं।

‘‘...स्तुति की जो भाषा द्विवेदी जी के पास है, अन्यत्र विरल है। यह पहुंचे हुए पुजारी की भाषा है। इसीलिए चरित्रों के गुणगान में यह अपनी पराकाष्ठा पर होती है। एक के बाद एक उपमाओं की लड़ी तैयार हो जाती है। और उपमाएं भी ऐसी-वैसी नहीं, निखिल विश्व, ब्रह्मांड और महाकाश के विराटत्व से उत्पन्न। गणिका मंजुला की प्रशंसा करते है तो उसे ‘नगर की शोभा, अनुराग की दीपशिखा, कला की प्रतिमा, छन्दों की रानी, तालों की नर्म संगिनी, श्रृंगार की रंगस्थली, सम्मोहन की सूत्रधारिणी बताते हैं।...दरअसल संस्कृत साहित्य, सिद्धो-नाथों का साहित्य, तांत्रिकों के चमत्कार और बौद्ध धर्म की विभिन्न धाराओं के बीच शास्त्रार्थ के अलावा उपनिषदों की तत्व चिन्ता के भरपूर खजाने को उलीच कर ही द्विवेदी जी ने अपना रचना संसार तैयार किया है। ...सिद्ध योगियों और तंत्र-मंत्र की अनोखी दुनिया में शरीर की संरचना संबंधी एक पूर्ण यौगिक ज्ञान उपलब्ध होने पर भी इसे साध कर निश्चित परिणामों को हासिल करने की कभी कोई वैज्ञानिक पद्धति विकसित नहीं होने पाई। यहीं वजह है कि बाबाओं, ओझाओं और आध्यात्मिक गुरुओं की दुनिया आज भी काफी बनी हुई है। द्विवेदी जी इस पूरे तंत्र के रहस्य का खूब आनंद लेते हैं। ...बांग्ला भाष की शक्ति में संस्कृत के superlatives की बड़ी भूमिका है। भक्ति का आवेग, मां देवी के प्रति व्याकुलता और ध्यान की आत्मलीनता बंगाली आस्थावादी समाज की संस्कृति है। द्विवेदी जी अपने उपन्यासों में इसी सांस्कृतिक पटल पर खड़े हैं। इसीलिए यह हिन्दी के छायावादी रचनाकारों की भाव-प्रवणता और विह्वलता से बिल्कुल अलग है। हिन्दी में द्विवेदी जी को इस भावभूमि का प्रवत्र्तक कहा जा सकता है।’’

अब हम आते हैं जगदीश्वर चतुर्वेदी द्वारा उल्लेखित अपने लेख में रवीन्द्रनाथ के बारे में की गई टिप्पणी पर। उस अंश को भी हम यहां हूबहू उद्धृत कर देना ही उचित समझते हैं जिसमें हमने हिंदी में आलोचना की ‘दूसरी परंपरा’ के अग्रदूत कहे गये द्विवेदी जी के बारे में कहा है -

‘‘ हिंदी में कथित रूप से आलोचना की एक ‘दूसरी परंपरा’ की धारा लाने वाले हजारीप्रसाद द्विवेदी शांतिनिकेतन में लगभग बीस साल तक रहे। खुद रवीन्द्रनाथ के साथ उन्होंने ग्यारह साल बिताये। उन्हें बहुत ही करीब से देखा। लेकिन ‘मृत्युंजय रवीन्द्रनाथ’ में उनके बारे में जो और जब भी लिखा, उस प्रगट ‘विराट’ की सिर्फ आरती ही उतारते रह गये। न उन्होंने बांग्ला नवजागरण को छुआ, न रवीन्द्रनाथ के परिवार को और न ही उनके कर्ममय विशाल जीवन को। कवि की बौद्धिक आकृति को जानने की कोई जरूरत ही नहीं महसूस की। गुरुदेव के न रहने पर उन्होंने क्या गंवाया उसका यह चित्र देखिये :

‘‘गुरुदेव उत्सव स्थल पर पधारते थे। शंखध्वनि से वायुमंडल मुखरित हो उठता था। मैं वेद मंत्रों से गुरुदेव का स्वागत करता था। आचार्य नन्दलाल बोस और उनके शिष्यों द्वारा रचित मनोहर आलम्पिन से सजा हुआ सभा स्थल मांगल्यगान से गूंज उठता था और गुरुदेव स्मित हास्य के साथ आसन ग्रहण करते। उनकी उपस्थिति में अपूर्व परिपूर्णता थी। जहां वे उपस्थित होते वहां सब कुछ भरा-भरा लगता। जब ‘‘शतकाण्डो दुश्चयवनो’’ मंत्र के पाठ के बाद उनके दूर्वादल बांधता तो वे बड़े स्नेह से हाथ बढ़ा देते - मेरा यह परम सौभाग्य आज विलुप्त होगया है।’’

रवीन्द्रनाथ पर उनके विश्लेषणात्मक नजरिये की हद यही थी - ‘‘रवीन्द्रनाथ महामानव थे। दीर्घकालीन तपस्या के बाद मनुष्य ने जिन महनीय गुणों को पाया है, उनमें एकत्र सुलभ थे। उनका हृदय प्रेम से परिपूर्ण था। वे युग गुरू थे।’’

यह उदाहरण यही बताता है कि रवीन्द्रनाथ की तरह के व्यक्तित्व से द्विवेदी जी ने अपनी मूल भक्त प्रकृति के अनुरूप, जिसका मैंने उनके उपन्यासों के संदर्भ में भी किंचित जिक्र किया है, जो ग्रहण करना था, वही ग्रहण किया। इसका निश्चित तौर पर उनके आलोचना साहित्य पर भी असर पड़ा है। इसके अलावा एक अध्यापक के नाते साहित्य के विद्वान की भूमिका में उन्होंने जो भी सार-संग्रहवादी प्रकार के काम किये है, वे बिल्कुल अलग है, जिनका वास्तव में उनके सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण से विशेष संबंध नहीं है ।

ऐसे अकादमिक लेखन की प्रकृति साहित्य की प्रकृति से काफी जुदा होती है, जिसे हेगेल ने भी अपने सौन्दर्यशास्त्र, Introductory lectures on Aesthetics में ‘कला की विद्वता’, (Art Scholarship ) की एक अलग श्रेणी बता कर अलग से विवेचित किया है।

दरअसल, जगदीश्वर चतुर्वेदी  को यही कहूँगा कि साहित्य समीक्षा कभी भी उपदेशमूलक नहीं हो सकती हे।  यह एक प्रकार का सह-सृजन भी होता है । जब भी किसी लेखन के बारे में बिना उद्धरणों के फ़तवे दिये जाते हैं, वह विश्लेषण नहीं कहलाता। इसीलिये मजबूरन मुझे पंचतंत्र और रवींद्रनाथ तथा हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के जिन दो ठोस प्रसंगों को उन्होंने उठाया है, उनके बारे अपने लिखे के लंबे उद्धरण देने पड़े हैं । बाकी ‘ग़ुस्सा, खीज या धिक्कार’ का जहाँ तक प्रश्न है, उनका कोई जवाब देना मुमकिन नहीं है । अक्सर देखा जाता है कि इतर कारणों से ही किसी भी पाठ पर नाराज होकर लेखक को तमाम प्रकार के लांक्षणों से लाद दिया जाता है। तब वह लेखक का नहीं, पाठक या समीक्षक का गुस्सा होता है। हम तो यह रोज देख रहे हैं कि इतिहास की तमाम विवेकसंगत व्याख्याओं से बहुत से लोग लाल-पीले होकर इतिहासकार को ईशनिंदा का दोषी बताने लगते हैं । जरूरत ‘दुर्वासाओं’ से ज्यादा तर्कशील होने की होती है। कोरे दुर्वचन तो दुर्वासा का जवाब नहीं, उनके सच्चे अनुयायी होने का प्रमाण है !

इन बातों का एक ही जवाब हो सकता है, उपदेश या फ़तवों से नहीं, वाद-विवाद-संवाद चलता है ठोस पाठ के आधार पर शुद्ध तर्कों से ।

अंत में मैं जगदीश्वर जी के लिये उन्हीं के गुरुदेव नामवर सिंह जी की ‘इतिहास और आलोचना’ पुस्तक के अंतिम, इसी शीर्षक के लेख से कुछ बातें उद्धृत करना चाहूंगा। नामवर जी के इस लेख का पहला वाक्य ही है - ‘‘ आम शिकायत है कि आलोचना के क्षेत्र में बेहद अराजकता है। रचनाकार अलग असंतुष्ट है तो पाठक अलग।’’

इसी में वे आगे लिखते हैं - ‘‘ऐसे वातावरण में साहित्यिक मूल्यों को लेकर मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन केवल ‘मतभेद’ अराजकता नहीं है।
‘‘हिन्दी आलोचना की अराजकता यही है कि उसने इस जीवन्त समसामयिक बोध को परिभाषित और संगठित करने का प्रयत्न नहीं किया।’’

आगे वे साहित्य के इतिहास संबंधी पक्ष पर भी, जिस पर जगदीश्वर बहुत बल देने की बात कहते दिखते हैं,  बहुत मार्के की बात कही है। नामवर जी लिखते हैं -

‘‘यदि इतिहास किसी साहित्य का कुछ भी पता देते हैं तो हिंन्दी के ये इतिहास हिन्दी आलोचना की अराजकता के दर्पण है। बल्कि कहा जा सकता है कि हिन्दी आलोचना को अराजकता की स्थिति तक ले जाने में इन इतिहासों का भी बड़ा हाथ है। ...हर साहित्यिक और हर कृति को जिस प्रकार समान भाव से श्रेष्ठ बतलाया है, उससे अराजकता उत्पन्न न होगी तो क्या होगा ?’’

दरअसल साहित्य और कला का इतिहास साहित्य और कला की अपनी शर्तों के जरिये निर्मित होता है। साहित्य विज्ञान की अवधारणाओं की तरह विकसित नहीं होता है। सौन्दर्यशास्त्र और सत्य का संबंध जीवन के यथार्थ और समाज-विज्ञान के बीच के संबंध की तरह नहीं होता है। यह महज विश्व-दृष्टि का मामला भी नहीं है। कोई मार्क्सवाद की तरह की एक विकसित विश्वदृष्टि रखने वाला होने के नाते ही बड़ा साहित्यकार नहीं बन सकता है। सौन्दर्यशास्त्र एक अलग क्षेत्र है  जिसकी दर्शनशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान, कुछ-कुछ अर्थशास्त्र भी, आदि की तरह के मनुष्यों के मानसिक जगत से जुड़े विषयों के साथ एक सामान्य अन्तरक्रिया देखी जा सकती है। लेकिन इन सबकी अपनी अलग-अलग पहचान से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है।

सौन्दर्यशास्त्र में भी एक ओर जहाँ रचनाशीलता के जगत के अपने तर्क होते है, वहीं  साहित्य और कला के क्षेत्र के बारे में विद्वता का क्षेत्र अलग है जिसे art scholarship कहा जाता है । कई लोग आलोचना को ऐसी कथित विद्वता का क्षेत्र मानते हैं, जबकि सौन्दर्यशास्त्रीय साहित्य चिंतन से वास्तव में इस विद्वता का कोई खास संपर्क नहीं होता ।

दरअसल, हमने यह ग़ौर किया है कि जगदीश्वर जी के ढेर सारे प्रयोजनमूलक लेखन में समीक्षा एक ऐसी विधा है, जिसके लिये शायद कोई विशेष स्थान नहीं है । समीक्षा से हमारा तात्पर्य अखबारी स्तंभों के लिये आम तौर किताब के ब्लर्ब की सामग्री से निकाल कर की जाने वाली सूचनात्मक टिप्पणियों से नहीं है । वास्तव में समीक्षा एक प्रकार से रचनाकार या विचारक  के साथ लेखक की सहयात्रा होती है , जिसमें रचना अथवा विचारों की संरचना में प्रवेश करके समीक्षक उनकी सीमाओं और संभावनाओं को खोलने की कोशिश करता है । साहित्य कोई प्रयोजनमूलक लेखन नहीं होता है । इसके बारे में इको ने बिल्कुल सही कहा है कि व्यक्ति अपने किसी स्वार्थ की सिद्धि या किसी निर्देश का पालन करते हुए साहित्य नहीं पढ़ता है। वह सिर्फ अपनी खुशी के लिये, अपनी मर्जी से इसे पढ़ता है। और इसीलिये सच्ची साहित्य समीक्षा के कर्म में उपदेशों या फ़तवों के लिये कोई जगह नहीं होती है । समीक्षक को लेखन की पंक्तियों के बीच सायास या अनायास  छोड़ दिये मौन को सुनना पड़ता है और खाइयों को पाटना पड़ता है । इसमें उसकी अपनी तैयारियों और मानसिकता की भी बड़ी भूमिका होती है ।

नामवर जी ने अपने लेख में साहित्य के इतिहास के बारे में कई सकारात्मक बातें भी कही है। इस विषय में मैं अंत में ‘कला विद्वता’ पर हेगल ने जो कहा, उसे बहुत ही प्रासंगिक समझते हुए उसके उद्धरण से अपनी बात खत्म करूंगा और उम्मीद करूंगा कि आज की हिंदी आलोचना के बारे में हमारे कथित गुस्से, खीझ या दुर्वासाई नजरिये के फतवों की सचाई को बताने के लिये इतना ही काफी होगा।

‘‘And thus, we should expect’ men have abandoned the tendency to consider works of art solely with an eye to the education of taste, and with the purpose merely displaying taste. The connoisseur, or scholar of art, has replaced the art judge, or man of taste...Yet though such scholarship is entitled to rank as something essential, still it not to be taken for the sole or supreme element in the relation which the mind adopts towards a work of art, and towards art in general. For art scholarship(and this is a defective side) is capable of resting in an acquaintance with purely external aspects, such as technical or historical details etc., and of guessing but little, or even knowing absolutely nothing, of the true and real nature of a work of art.”

(और इसप्रकार, हमें मानना होगा कि लोगों ने कला को पूरी तरह से सुरुचि संपन्न होने और सुरुचि का प्रदर्शन करने की दृष्टि से देखना छोड़ दिया है। कला के विचारक या सुरुचिसंपन्न लोगों का स्थान कला के अधिकारी या विद्वानों ने ले लिया है। ...यह विद्वता एक जरूरी स्थान की अधिकारी होने पर भी खास कला कृति को और सामान्य तौर पर कला मात्र को मस्तिष्क कैसे ग्रहण करता है, उसके बारे में वही सबकुछ या सर्वोच्च चीज नहीं है। कला विद्वता के लिये (जो उसका दुर्गुण है) संभव है कि वह शुद्ध रूप से बाहरी पक्षों, मसलन तकनीकी या ऐतिहासिक ब्यौरों आदि की अपनी जानकारी के अनुसार कृति को देखने लगे, और कला कृति की सच्ची और वास्तविक प्रकृति के बारे में कुछ भी न जाने।)

अंत में मैं ‘इतिहास और आलोचना’ लेख में नामवर जी की ही अंतिम बात से इस लेख का अंत करूंगा कि ‘‘यदि आप हिन्दी आलोचना की अराजकता को दूर करना चाहते हैं तो हमें इतिहास और आलोचना - दोनों दिशाओं से एक साथ परस्पर संबद्ध चिंतन पद्धति द्वारा लक्ष्यैकोन्मुख भाव से कार्य करना होगा। ...व्यापक सामाजिक आवश्यकता के परिवेश में ही इस पर विचार करना सार्थक हो सकता है। और इतना महत्वपूर्ण कार्य व्यापक रूप से सामूहिक तथा सहयोगी चिन्तन की अपेक्षा रखता है।’’

यहां मैं जगदीश्वर के लेख का लिंक दे रहा हूं –

http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.in/2016/09/blog-post_86.html






रविवार, 4 सितंबर 2016

कोलकाता में 'आलोचना के कब्रिस्तान से' का लोकार्पण और 'लहक' संगोष्ठी









कोलकाता के भाषा परिषद के सभागार में 4 सितंबर को 'लहक' पत्रिका की ओर से हमारी पुस्तक 'आलोचना के क़ब्रिस्तान से' पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया । गोष्ठी की अध्यक्षता की वरिष्ठ कवि श्री ध्रुवदेव मिश्र 'पाषाण' ने ।
काफी दिनों बाद कोलकाता की एक संगोष्ठी में महानगर के हिंदी के इतने सारे वरिष्ठ लेखक इकट्ठा हुए थे । सब पुराने मित्रों से मिलना हमारे लिये एक बहुत सुखद अनुभव रहा । एक सौ से भी ज़्यादा लेखकों का उपस्थित होना आज के समय में एक बड़ी बात थी । लगभग साढ़े तीन घंटे तक चली इस गोष्ठी में बोलने वालों में सर्वश्री गीतेश शर्मा, विमलेश्वर, श्री निवास शर्मा, हितेन्द्र पटेल, आशुतोष, विमल वर्मा, मृत्युंजय श्री वास्तव, जगदीश्वर चतुर्वेदी और 'लहक' के संपादक निर्भय देवयांश शामिल थे ।
कार्यक्रम का संचालन किया श्री ब्रजमोहन सिंह ने ।
इस कार्यक्रम में रखे गये अपने वक्तव्य को हम मित्रों से साझा कर रहे हैं :


मित्रो,
पुस्तकों का लोकार्पण या उन पर गोष्ठियां आज किसी भी नगर, महानगर के सांस्कृतिक जीवन की इतनी साधारण सी बात है कि मैं नहीं जानता इसको लेकर किसी में भी कोई खास आकर्षण या उत्तेजना शेष है। साहित्य और पुस्तकों की दुनिया में यह सब इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि किसी के लिये भी इसके कोई खास मायने नहीं रह गये हैं।

लेकिन आदमी है कि जो सामान्य, गतानुगतिक जीवन को भी, कुछ कर्मकांडी कामों के जरिये ही क्यों न हो, घटना-बहुल बनाने के रोमांच को जीता रहता है। कर्मकांडों के रोमांच से बड़ा जीवन में शायद दूसरा कोई रोमांच नहीं होता। और समझ लीजिए कि एक लेखक या एक लेखक-समाज होने के नाते, हम भी अपने लिये कुछ ऐसे आयोजन करके, कराके या उनमें हिस्सा लेकर अपनी लेखकीय सत्ता के प्रति खुद को आश्वस्त करते रहते हैं और एक सीमा तक आनंदित भी होते हैं। संभव है, आज का यह आयोजन भी, वैसा ही, महज एक आयोजन भर हो, हमारी अपनी खुशी के लिये रचा गया, लेकिन व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य के हिसाब से प्राय: महत्वहीन, एक कोरा कर्मकांड।

इस एक प्रकार के एक निराशा भरे नोट से शुरू करने के बावजूद कुछ बातें हैं, जिनकी ओर मैं मित्रों का ध्यान खींचना चाहूंगा। हम यहां जिस किताब का लोकार्पण कर रहे हैं, वह मेरी एक बहुत ही पतली सी किताब है। एक पत्रिका में छपे सिर्फ सात लेखों का संकलन। दुनिया की तमाम पत्रिकाओं के अपने कुछ खास लेखक हुआ करते हैं, जिनसे उन पत्रिकाओं की पहचान बनती है, और लेखक की भी पत्रिका के माध्यम से अपनी एक अलग पहचान बनती है। इसीलिये, हमारे इस संकलन के साथ, सिर्फ हमारी नहीं, कोलकाता से निकलने वाली इस ‘लहक’ पत्रिका की भी एक पहचान या कह सकते हैं, शक्ति जुड़ी हुई है। और यही इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता है और आज के इस आयोजन की भी।

आज हिंदी में, मेरी समझ के अनुसार, ‘लहक’ एक ऐसी पत्रिका है, जिसने अपने चंद अंकों से ही सामान्य तौर पर गहरी नींद में सोये हुए हिंदी साहित्य के जगत में अपनी एक ऐसी चुभने वाली जगह बना ली है, जिसकी मौजूदगी की कोई भी आसानी से अवहेलना नहीं कर पा रहा है। सवाल है कि आखिर इसकी क्या वजह है ?

मित्रो, यह एक सवाल ही हमसे अपने इर्द-गिर्द की बहुत से चीजों को देखने की अपेक्षा रखता है। कोलकाता से जिस काल में इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ, उस समय एक बार के लिये पश्चिम बंगाल में वामपंथ का लाल सूरज अस्त हो चुका था। विगत कई दशकों से जिस सूरज के तेज से देश भर में जनवादी और प्रगतिशील साहित्य और विचारों का दुर्दमनीय प्रताप बना हुआ था, वह 2011 तक आते-आते गोधुली के अपने रहस्यमय उजाले की छटा के अंत के साथ क्रमश: अंधेरे की खाई में उतर चुका था।

मित्रों, वामपंथ के इस अस्त ने, देश भर में आधुनिकता के बाकी सभी रूपों, धर्म-निरपेक्षता, जनतंत्र और सामाजिक न्याय के आंदोलनों को भी क्षति पहुंचाई और हमारे देखते ही देखते, एक चरम दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक और फासिस्ट शक्ति का देश भर में डंका बजने लगा। विचारों के साथ जीने वाले पूरे बौद्धिक समाज के लिये इसे एक असहनीय परिस्थिति का सूत्रपात कहा जा सकता है। इस परिस्थिति का एक दानवीय रूप इसी बीच, तब हमारे सामने सबसे प्रकट हो कर आया, जब डाभोलकर, पानसारे और कलबुर्गी जैसे कन्नड़ और मराठी भाषा के जाने-माने लेखकों की  सुनियोजित ढंग से हत्याएं की गई। लेकिन इसके दबाव के ताप को वास्तव में उसी समय से महसूस किया जाने लगा था जब गुजरात के जनसंहार के नायक को जनमत को झूठ-सच के मायावी खेलों से अपने साथ टेर लेने के लिये अभावनीय ताम-झाम के साथ उतारा गया था।

और मित्रों, जाहिर है कि संकट के ऐसे अशनि संकेतों के बीच, किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति का पहला दायित्व अपने अंदर झांक कर अपनी कमजोरियों की निर्ममता से जांच करने और तर्क तथा विचार की अपनी शक्ति को नये रूप में संयोजित करने की दिशा में होता है। जिसे कहते हैं, नदी का प्रवाह, लाख बाधाओं के बाद भी कहीं न कहीं से अपने लिये आगे का रास्ता खोज ही लेता है, यह आत्मानुसंधान, या आत्मालोचन, तर्क और विवेक की नई शानित शक्ति को अर्जित करने की यह कोशिश भी वैसी ही होती है। यह लगभग अस्थि का रूप ले चुके विचारों की जड़ता को झाड़ कर नई शक्ति अर्जित करने का ऐसा उपक्रम होता है जो एकबारगी किसी को भी भारी विध्वंसक जान पड़ता है, लेकिन सचाई यही है कि विचारों के विकास की धारा ही कुछ ऐसी है जिसमें कोई भी एक वृत्त अपने अंदर के ताप से जब किसी दूसरे नये और उच्चतर वृत्त को जन्म देता है तब वह अपने में ही लौट कर अपनी पूर्ण गति को प्राप्त करता है और नये वृत्त के पौर्वापर्य की भूमिका तक से भी वंचित होगया दिखाई देने लगता है।

सच कहा जाए तो, मित्रों आज हम समय के एक ऐसे ही संयोग-स्थल पर है, जब अपने आगे के रास्ते के लिये ही हमें अपने पीछे की गहरी तहों तक जाकर पूरे अब तक के खोल को ही पलट देना होगा। इस किताब की भूमिका में भी मैंने इसी संदर्भ में हमारे अभिनवगुप्त और उनके प्रत्यभिज्ञान विमर्श को याद किया है जिसमें वे एक संयोग-स्थल से चिंतन की गहरी गुहा में प्रवेश करके बिल्कुल नई शक्ति प्राप्त करने की प्रक्रिया के बारे में कहते हैं। इस किताब के लेखों में मैंने इसीलिये अतीत के वैचारिक महलों के ढहने का उत्सव मनाने वाले मार्क्स के वैचारिक रूझान की मूलभूत भावनाओं के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश की है।

मुझे यह कहने में जरा भी हिचक नहीं है कि इस मामले में हमारे लिये सबसे बड़ा संबल बनी है निर्भय देवयांश जी की यह ‘लहक’ पत्रिका। मुझे लगता है कि साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में देवयांश जी जैसे खाली स्लेट की तरह की मानसिकता के साथ आए थे। उनकी संपादकीय दृष्टि पहले से किसी भी खास आग्रह से दूषित नहीं थी। वे सिर्फ एक बात समझ रहे थे कि अभी जो स्थिति है वह सही नहीं है; और इस स्थिति के लिये हिंदी के साहित्य जगत में आज तक जो चलता रहा है, वह भी कम जिम्मेदार नहीं है ; यह ऐसे ही चल नहीं सकता है। और, इस मामले में उनकी एक बहुत साफ हेगेलियन दृष्टि भी रही कि जो चल नहीं सकता, उसे अपनी जगह को छोड़ना होगा। नहीं छोड़ता तो उसे हटाना होगा। मोटे तौर पर ऐसे ही एक, नकारात्मक प्रकार के नजरिये से उन्होंने अपनी पत्रिका को जो दिशा दी है, उसकी गूंज-अनुगूंज आज हमें क्रमश: पूरे हिंदी जगत में सुनाई देने लगी है। ‘लहक’ की नकारात्मकता हिंदी आलोचना में सचमुच एक सृजनात्मक विध्वंस के सूत्रपात की भूमिका अदा कर रही है। आलोचना को कोरे स्तवन और कर्मकांडी क्रियाओं से मुक्त करके यह उसे नये रूप में अपनी प्राणी सत्ता को अर्जित करने के लिये प्रेरित कर रही है।

इसीलिये, लहक के अंकों में प्रकाशित हमारे लेखन का भी हमें थोड़ा विशेष महत्व जान पड़ता है। इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि अगर ‘लहक’ की जैसी पत्रिका का मंच न होता तो इस प्रकार शालीनता-अशालीनता की बिना परवाह किये हम अपनी घोड़ागाड़ी के कोच से कूद कर बाहर नहीं आ सकते थे, जिसके बारे में किर्केगार्द अपनी The Seducer’s Diary में सावधान करते हुए कहते हैं –

“Caution, my beautiful unknown ! Caution ! Stepping out of a coach is not so simple a matter. Sometimes it is a decisive step. …steps in coaches are so badly placed that one has almost to forget about being graceful and risk a desperate lunge into the arms of coachman and footman.”

‘‘सावधान, मेरी अज्ञात सुन्दरी ! सावधान! कोच से निकलना उतना सीधा मामला नहीं है। कभी-कभी यह एक निर्णायक कदम होता है।...कोच की सीढि़यां इतनी बेढब रखी होती है कि कोई भी उनसे शालीनता से नहीं उतर सकता है। उसे कूद जाना पड़ता है, जिसमें हमेशा कोचवान या अर्दली की बाहों में गिर जाने का खतरा होता है।’’

किताब आप लोगों के पास है। मुझे उम्मीद है, और कुछ भी क्यों न हो, इसके विचारों की उष्मा को कहीं न कहीं से आप सभी जरूर महसूस करेंगे। मुझे 19वीं सदी के फ्रांसीसी प्रयोगधर्मी कवि स्टीफन मलार्मे की यह बात मालूम है कि ‘सभी विचार एक पासे को फेंकने की तरह ही हुआ करते हैं’। पासा फेंकने से कभी संभावनाओं का अंत नहीं होता। विचारों की सचाई की स्वीकृति में अंतत: परिस्थितियों के संयोग की एक प्रमुख भूमिका होती है। इसीलिये वे जोखिम भी होते हैं, और अपने में एक दाव भी। हेगेल की राय थी कि विचार और ज्ञान को जब तक व्यक्त नहीं किया जाता, वे पूरी तरह से निर्मित नहीं होते हैं। इसीलिये, यह जोखिम उठाना, यह दाव खेलना दरअसल किसी भी विचार की निर्मिति की बुनियादी शर्त है।  आज के वैचारिक गतिरोध के समय में यदि हमें किसी बड़े विचार के साथ जीना हैं तो उसे इसीप्रकार के जोखिम भरे रास्तों से निर्मित करना, प्राप्त करना होगा। इसका दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

जहां तक इन लेखों की अपनी एक खास प्रकार की शैली का प्रश्न है, मैं उसकी प्रकृति को बहुत अच्छी तरह से देख पा रहा हूं। जब किन्हीं विषयों पर काफी लंबे अर्से की आपकी तैयारी को समग्रता के साथ किसी पत्रिका के सीमित पृष्ठों में उतारना हो, तो लेखन की जिसप्रकार की एक सान्द्र शैली विकसित होती है, उसे इन लेखों में भी देखा जा सकता है। यदि इसका हमें किसी ठोस रूप में वर्णन करना हो तो मैं आस्ट्रेलिया के कंगारू की याद करूंगा जिसके पीछे के पैर काफी लंबे होते हैं, कह सकते हैं दूर तक धसे हुए, लेकिन आगे के पैर उतने ही छोटे, एक पत्रिका के सीमित पन्नों की तरह। कंगारू जब बैठता तो बहुत ही जम कर ऐसे बैठता है जैसे किसी सिंहासन पर बिल्कुल स्थिर होकर शान से बैठा हो। लेकिन जब वह अपने विषय के तमाम आयामों तक जाता है तो इसप्रकार की छलांग लगाते हुए जाता है कि उसे देख कर अच्छे-अच्छे लोग भी सकते में आ जाते हैं। लेखन में ऐसी छलांगों से पैदा होने वाली खाइयों में ही दरअसल उसका सौन्दर्य छिपा होता है। जो between the lines कहलाने वाली इन खाइयों को पढ़ पाता है, उसे अपने अंदर किसी सत्य के उद्घाटित होने की तरह का रोमांचपूर्ण आनंद महसूस हो सकता है। लेकिन जो इन्हें पढ़ने मे असमर्थ होते हैं, उनके लिये यह लेखन महज एक पहेली भर बन कर भी रह जाता है।

लहक के पृष्ठों पर जब ये लेख छप रहे थे, उस समय हमें जिस प्रकार की तमाम प्रतिक्रियाएं मिलीं, उनमें यदि एक अनोखे रोमांच की अनुभूति की गूंज सुनाई देती थी, तो कुछ ऐसी भी थी जो अंदर के सारे मानदंडों के ढह जाने की चिंता और क्रोध से भी भरी हुई थीं। और कुछ लोग तो  स्वाभाविक तौर पर, ठिठक कर शब्दों के इस खेल को देख भर रहे थे, इनमें प्रवेश की उनकी कोई गति नहीं थी।

बहरहाल, आज ‘लहक’ के इस आयोजन में काफी सालों बाद सभी मित्रों से इस मुलाकात ने हमारे अंदर एक प्रकार की नोस्टालजिक अनुभूतियां भी पैदा की है। इसके लिये मैं आप सबका, और खास तौर पर ‘लहक’ के संपादक का शुक्रगुजार हूं।

धन्यवाद।
04.09.2016



आज के ‘राजस्थान पत्रिका’ और ‘प्रभात खबर’ के कोलकाता संस्करण में ‘लहक’ की प्रथम संगोष्ठी की खबर :


<http://epaper.patrika.com/c/12989597>

<http://epaper.prabhatkhabar.com/c/12992675>



शनिवार, 3 सितंबर 2016

मोदी जी सिर्फ वर्तमान में क्यों जीते हैं ?

-अरुण माहेश्वरी

कोई भी राजनेता जब अतिरिक्त बल के साथ यह कहता है कि वह तो सिर्फ वर्तमान में जीता है तो सबसे पहला सवाल उठता है कि आखिर क्यों ? क्या उनका अपना कोई अतीत नहीं है ? या क्या उनकी कोई भविष्य-दृष्टि नहीं है ?

सच यह है कि मोदी जी का अतीत आरएसएस का, गुजरात में आरएसएस की प्रयोगशाला के मुखिया का, गोरक्षकों वाला, भारत में गायों के व्यापारियों की सबसे संगठित शक्ति वाला अतीत है। बीच-बीच में ऐसे मौके आते हैं जब वे बड़े गर्व के साथ आरएसएस के प्रचारक के रूप में अपने अतीत का स्मरण भी किया करते हैं।

लेकिन, अब जैसे-जैसे एक राष्ट्र-प्रमुख के रूप में उनके दिन बीत रहे हैं, यह संभव है कि उन्हें अपने उस अतीत और उससे जुड़ी भविष्य-दृष्टि की सारहीनता क्रमश: नजर आने लगी है। गांधी-नेहरू के प्रति घृणा फैलाने के अपने अतीत की यादें संभवत: कुछ-कुछ सताने भी लगी हैं।

प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश-विदेश की काफी यात्राएं की हैं। सारी दुनिया के राजनेताओं से मिलने का उन्हें मौका मिला है। हमारे पुराणों में भी यात्राओं के महात्म्य का काफी बखान किया गया है। अपने घर की सीमाओं में बंधे परिवार के मुखिया की कूपमंडुकता, मोहन भागवत की तरह के परिवार के कर्ता का स्वरूप, जो आज की दुनिया में अपने लोगों को आबादी बढ़ाने की सलाह देने से भी बाज नहीं आता, निश्चित रूप से उनके सामने कुछ तो खुलने ही लगा होगा। दुनिया भारत को किस नजर से देखती है और वे खुद अपने परिवार के प्रचारक के तौर पर  इसे क्या बनाने की कल्पनाएं पाले हुए थे, उनके बीच के जमीन-आसमान के फर्क को भी वे कुछ तो जरूर महसूस करने लगे होंगे !

ऊपर से, वे यह भी देख रहे होंगे कि सभ्य समाजों में धार्मिक उन्माद के प्रति लोगों में  कितने गहरे तिरस्कार के भाव हैं। आज पाकिस्तान से लेकर पूरा मध्यपूर्व जिस प्रकार इस उन्माद की भेंट चढ़ा हुआ है, उसके विध्वंसक चेहरे को न चाहते हुए भी दूसरे लोग ही उन्हें दिखा रहे होंगे। इसीलिये अपने खुद के अतीत का तिरस्कार करते हुए जब पिछले दिनों उन्होंने बहुत हल्के से गोगुंडों की निंदा की तो वे निश्चित तौर पर अपने अतीत और भविष्य-दृष्टि, दोनों से ही भाग कर वर्तमान में ही जी रहे थे।

जाहिर है कि यदि मोदी जी मात्र आरएसएस के इतिहास का ही एक पुर्जा बन कर रह जाना चाहते हैं, तो अभी तो सिर्फ पड़ौसी मुल्कों से ही भारत के रिश्तों में तनातनी चल रही है, कल समूचे विश्व-समुदाय को भारत खटकने लगेगा। लोग इसे टेढ़ी और उपेक्षा की नजरों से देखने लगेंगे !

हम समझ सकते हैं कि हमारे टिप-टॉप प्रधानमंत्री को मोहन भागवत वाली मुखिया की सूरत जरा भी पसंद नहीं है। वे अपने ऐसे पूर्वजों को अब दूर से ही प्रणाम करते हुए जीना चाहते हैं ; अपने वर्तमान का पूर्ण उपभोग करना चाहते हैं। वर्तमान कितना ही विकट और समस्या-ग्रसित क्यों न हो, प्रधानमंत्री निवास के आरामदेह परिवेश में इसकी विकटता का ताप उसमें बैठे आदमी की फितरत के अनुसार ही प्रवेश कर सकता है। इसीलिये ऐसा मोहक वर्तमान किसी भी अन्यथा बेचैन आत्मा के लिये सबसे अधिक काम्य शरण-स्थली हो तो वही स्वाभाविक है।

हम यह समझ पा रहे हैं कि मोदी जी अपने वर्तमान में महज इसलिये जीना चाहते हैं क्योंकि वे आज हमारे राष्ट्र की सर्वोच्च सत्ता के अधिकारी है। उनके राज में पूरे राष्ट्र को क्लेश हो सकता है, लेकिन प्रजा के क्लेश से राजा की नींद भी हराम हो, यह जरूरी नहीं होता। इसीलिये शायद मोदी जी को अपनी इसी नीम बेहोशी वाला वर्तमान बेहद प्रिय है।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

मोदी जी का ‘वर्तमानवाद’

-अरुण माहेश्वरी

आज सीएनएन न्यूज 18 के अपने साक्षात्कार के अंत में प्रधानमंत्री मोदी से जब साक्षात्कारकर्ता ने उनकी कार्यपद्धति के बारे में सवाल किया तो उन्होंने बड़ी संजीदगी से कहा कि वे हमेशा वर्तमान में जीते हैं। उनका कहना था कि मैं जब जिस काम में लगा रहता हूं, उसके प्रति पूरा न्याय करने की कोशिश करता हूं। जब साक्षात्कार दे रहा हूं तो मेरा ध्यान और किसी चीज पर नहीं रहता। जब फाइलों को देखता हूं तो उन्हीं में डूब जाता हूं। इससे सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि मुझसे जो भी मिलता है, संतुष्ट हो कर जाता हैं क्योंकि उसे लगता है उसे क्वालिटी समय दिया गया। उसकी बात को सुना गया।

मोदी जी ने इस बात को कुछ इस प्रकार से कहा जैसे यही उनका जीवन दर्शन हो, क्योंकि इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर मैं अपनी कई पुरानी बातों को छोड़ने की हिम्मत रखता हूं।

किसी भी व्यक्ति को एक बार के लिये मोदी जी की इस बात से लग सकता है कि इन बातों से वे अपने काम के प्रति निष्ठा की बात कह रहे हैं। लेकिन यदि हम थोड़ी सी भी गहराई में जाकर देखें तो हमें यह समझने में जरा भी देर नहीं लगेगी कि उनकी ‘पूरी तरह से वर्तमान में जीने’ की यह बात कैसे किसी भी राजनेता के लिये बहुत उथली और प्रत्येक प्रवंचक नेता के लिये एक प्रकार की अति-साधारण बात है।

यही तो है जहां से मोदी जी की ‘जुमलेबाजी’ की पूरी समस्या पैदा होती है। सोचने का यह ढंग ही तो किसी भी राजनीतिज्ञ को मौका देख कर बोलने के गुर सिखाता है। ‘वर्तमान में जीने’ का सीधा मतलब होता है सोच-विचार और मनन की परंपरा से कट कर जीना। इसमें आदमी यह मान कर चलता है कि बात ही तो है, उसका क्या मोल है कि उसके प्रति सतर्कता बरती जाए ! जब जैसा समय हो वैसी बात बोल कर, एक बार के लिये लोगों को सम्मोहित करके चलते बनो। बड़े मजे से कह दिया जाता है कि हमने बात ही तो कही है, किसी का नुकसान तो नहीं किया !  कोरी, खास तौर पर चिकनी चुपड़ी बातों की खूबी यही होती है कि उन्हें बहुत मासूम मान लिया जाता है, जिनसे किसी को कोई नुकसान नहीं होता। और कहना न होगा, यही किसी के लिये भी ‘वर्तमान में जीने’ का सबसे आसान उपाय भी होता है !

आम लोगों की बात छोड़ दीजिये। मोदी जी से हमारा सिर्फ एक सवाल है कि क्या वे यह नहीं जानते कि राजनेताओं के जनता के बीच संबोधन, राष्ट्र और संसद में किये गये संबोधन किसी भी राष्ट्र के इतिहास के अभिन्न अंग हुआ करते हैं ? वे कितने ही लच्छेदार या घुमावदार लहजे में क्यों न किये गये हो, उनके साथ बोलने वाले का चरित्र, उसकी निजी नैतिकता और आत्मिक प्रकृति समान रूप से जुड़े होते हैं। वे क्या और कैसे काम करते हैं, उसकी सैद्धांतिकी का भी ‘वर्तमान’ के दबाव में की जाने वाली इन जुमलेबाजियों से अंदाज मिलता है। और इतिहास में दर्ज इन जुमलों के पीछे की आत्मा में प्रवेश करके ही यह पता चलता है कि किस व्यक्ति का बौद्धिक और नैतिक जीवन क्या और कैसा था।

हम नहीं जानते कि राजनीति के तात्कालिक खेल में मोदी जी को इस या इस प्रकार की सारी बातों से क्या हासिल हो रहा है, लेकिन यदि वे कोरी बातों की ‘मासूमियत’ के भरोसे राजनीति का अपना सारा कारोबार चलाना चाहते हैं तो कहना न होगा, उनकी दौड़ बहुत ही छोटी साबित होगी। राजनेता की जरूरत अपने वर्तमान में जीने की या अपने विषय में डूबने की नहीं होती। ऐसे लोग वास्तव में मनन की प्रक्रिया से कोसों दूर रहते हैं। जरूरत वर्तमान से ऊपर उठ कर चलने की होती है। हेगेल अपने इतिहास के दर्शन में सीजर के बारे में कहते हैं कि वह राजनेताओं में भी ऊंचा इसलिये था क्योंकि उसने अपने उद्देश्यों के अनुसरण से इतिहास बनाया था।  

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

रिलायंस की जियो की पहल पर एक विचार



आज रिलायंस की जियो की अनोखी पेशकश ने भारत के टेलीकॉम सेक्टर में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया है ।  इससे इस क्षेत्र में एक ऐसा भूचाल आयेगा, जिसके परिणामों के ओर-छोर का कोई अंदाज नहीं लगा सकता है । यदि हम आज के समय को जीवन और संस्कृति के माध्यमीकरण का समय मानते हैं, अगर हम यह समझते है कि आज के आर्थिक जगत का सबसे बड़ा पण्य संस्कृति और मनोरंजन हैं, तो जाहिर है कि रिलायंस की इस पहल का असर सिर्फ टेलीकॉम के उद्योग जगत तक ही सीमित नहीं रहेगा । यह हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को, यहाँ तक कि सभी उत्पादन संबंधों को भी अभावनीय गति के साथ प्रभावित करेगा ।

रिलायंस के इस क़दम से आज के आर्थिक जगत का सबसे बड़ा सूत्र कि अब प्रतिद्वंद्विता को मान कर चलने का समय नहीं रहा है, जो सर्वश्रेष्ठ है, वही एक और अकेला टिकेगा, अब भारत में और ज्यादा प्रत्यक्ष दिखाई देने लगेगा । रिलायंस ने अपनी पूरी ताक़त झोंक कर इस क्षेत्र के बाक़ी सभी खिलाड़ियों के अस्तित्व को खुली चुनौती दी है ।

रिलायंस के इस क़दम से हम अपने खुद के अनुभव से आज के समय के इस सबसे बड़े सत्य को और भी साफ़ रूप में प्रत्यक्ष करेंगे कि जीवन की परिस्थितियों में आगे ऐसे-ऐसे भारी परिवर्तनों  की स्थितियाँ और संभावनाएँ बन रही हैं जिनकी हम पहले बिना किसी सामाजिक क्रांति के कल्पना भी नहीं कर सकते थे ।

इस परिस्थिति ने आज के दार्शनिकों-विचारकों के सामने जैसे मार्क्स के कथन के विपरीत यथार्थ को बदलने के बजाय यथार्थ की व्याख्या करने की एक बड़ी चुनौती और ज़रूरत पेश कर दी है । यह ज़िम्मेदारी क्रांतिकारी राजनीतिक दलों की भी उतनी ही है । अन्यथा, जीवन का यथार्थ संभवत: उनकी सोच से कोसों आगे रहेगा, और वे पुरातनपंथी संरक्षणवादियों जैसे किसी और ही लकीर को पीटते प्रतीत होने लगेंगे ।

आज का आदमी अपने दैनंदिन व्यवहारिक जीवन में अपनी सोच से बहुत ज्यादा आगे बढ़ा हुआ होता है । जीवन में वह वैश्विक होता है लेकिन विचारों में नितांत स्थानिक, जातिवादी, संप्रदायवादी । हेगेल कहते थे कि जब तक किसी विचार या ज्ञान को व्यक्त नहीं किया जाता है, वह निर्मित नहीं होता है । नये विचार और आज के समय के बारे में ज्ञान की निर्मिति की यह ज़िम्मेदारी लेखकों और विचारकों को उठानी है । मनुष्यों को उनकी अपनी मुक्त मानवीय प्राणीसत्ता की चेतना प्रदान करने का इससे भिन्न कोई दूसरा रास्ता नहीं है ।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सिंगुर मामले पर सुप्रीम कोर्ट की राय कल



-अरुण माहेश्वरी

कल सुबह साढ़े दस बजे सुप्रीम कोर्ट सिंगुर मामले में अपनी राय सुनाने वाला है। कुछ लोगों का, खास तौर पर बुद्धिजीवियों के एक हलके का यह मानना रहा है कि पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा की पराजय में सिंगुर मामले की एक प्रमुख भूमिका थी। गौर करने की बात है कि वाम मोर्चा की पराजय के बाद, पांच साल बीत गये, इसी साल विधानसभा का एक और चुनाव होगया, लेकिन सिंगुर का विषय शुद्ध रूप से एक कानूनी विषय बन कर ठंडे बस्ते में पड़ा रह गया। इन पांच सालों में, और पिछले विधानसभा चुनाव में भी इस विषय पर किसी प्रकार की कोई राजनीतिक चर्चा या उत्तेजना देखने को नहीं मिली।

यह अकेला तथ्य क्या यह बताने के लिये काफी नहीं है कि वाममोर्चा के पराजय की राजनीतिक प्रक्रिया में सिंगुर कोई प्रमुख विषय नहीं था। बल्कि इसके दूसरे ही तमाम कारण थे जिन्हें काफी हद तक वाममोर्चा सरकार के अंदर ही खोजना होगा। यदि वाममोर्चा सरकार के पतन की राजनीतिक प्रक्रिया में सिंगुर कोई केंद्रीय मसला होता तो वह इस प्रकार सिर्फ एक कानूनी लड़ाई का विषय बन कर न रह गया होता, उसकी राजनीतिक गूंज-अनुगूंज बाद में भी निश्चित तौर पर सुनाई देती।

सिंगुर तथा देश मे जमीन के अधिग्रहण की दूसरी कई घटनाओं की पृष्ठभूमि में भूमि अधिग्रहण के विषय ने एक समय बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक विषय का रूप ले लिया था। आनन-फानन में केंद्रीय स्तर पर जमीन अधिग्रहण के बाबा आदम के जमाने के कानून की जगह एक नया विधेयक तैयार कराया गया। उस पर तमाम स्तरों पर भारी बहसें हुईं। लेकिन आज वही विधेयक केंद्रीय सरकार के पास लंबे काल से लंबित ट्रैफिकिंग कानून, महिला आरक्षण कानून की तरह ही दूसरे कई महत्वपूर्ण कानूनों की तरह अधर में लटक गया है। संसद के एक के बाद एक सत्र बीत जाते हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण विधेयक लगता है जैसे विस्मृति के किसी अतल अंधेरे में डुबो दिया गया है।

यह इस बात का एक और प्रमाण है कि हमारी संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की देश की शोषण पर टिकी उत्पादन-व्यवस्था के साथ किसी प्रकार का कोई टकराहट नहीं है। सामयिक तौर पर समाज में उठने वाले तूफानों की कुछ थपेड़े इस पर पड़ती दिखाई देती है, लेकिन उतने समय तक ही जब तक यह तूफान जारी रहता है। व्यवस्था का सारा ताम-झाम किसी तरह उस तूफान के गुजर जाने तक का इंतजार करने के लिये हैं। और किसी भी वजह से ऐसा कोई कानून पारित भी हो जाता है तो जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार के दूसरे कानूनों की तरह ही बाद में भी उन्हें निरस्त करने की कानूनी, गैर-कानूनी सामाजिक प्रक्रियाएं बाकायदा जारी रहती है।

बहरहाल, जहां तक सिंगुर के मामले में सुप्रीम कोर्ट की राय का सवाल है, उससे सबसे पहले तो यह पता चलेगा कि 2006 में जब वाममोर्चा सरकार ने सिंगुर में जमीन का अधिग्रहण किया, वह अधिग्रहण कानून-सम्मत था या नहीं। इसके अलावा, 2011 में ममता बनर्जी की सरकार ने सिंगुर के मामले में जो एक विशेष कानून बनाया था, जिसे कोलकाता हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने गैर-कानूनी करार दिया, उसकी भी कानूनन क्या स्थिति है।

सुप्रीम कोर्ट की राय देश के वर्तमान कानून पर ही टिकी रहेगी। इस राय से वह काम नहीं हो सकता जिसके लिये संसद के जरिये संविधान संशोधन विधेयक तैयार किया गया है। इसीलिये, हमारी नजर में, इस राय में किसी प्रकार की नई संभावना को देखना मुमकिन नहीं है। वाममोर्चा सरकार ने भले ही इसके राजनीतिक पक्षों पर ज्यादा ध्यान न दिया हो, लेकिन इसके कानूनी पहलू के बारे में वह काफी साफ थी। कल की राय से संभव है, इस पूरे प्रसंग का अब क्रियाकर्म हो जायेगा, बशर्ते सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की यह बेंच इस विषय को और ज्यादा दिनों तक लंबित रखने के उद्देश्य से बड़ी बेंच के सुपुर्द नहीं करती है।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

'आलोचना के कब्रिस्तान से' पुस्तक की भूमिका



भूमिका 

कोलकाता की ‘लहक’ पत्रिका में प्रकाशित हुए इन सभी लेखों को लिखने के पीछे कभी कोई पूर्व योजना नहीं रही। अथवा, जिसे a priori, अर्थात अनुभव-निरेपक्ष विषय कहते हैं, मसलन्, ‘साहित्य क्या है’, ‘साहित्य और आलोचना’, ‘साहित्य और समाज’, ‘साहित्य की भूमिका’, ‘साहित्य के प्रतिमान’ आदि की तरह के सामान्य प्रकार के विषय, इस प्रकार के लेखन का भी कोई मकसद नहीं रहा। लेकिन इसके बावजूद, इन सभी लेखों को समग्रता में देखने से ऐसा लगता है, जैसे दृश्य-अदृश्य, कोई भी एक योजना जरूर इनके पीछे काम करती रही है। कुछ मित्रों के अनुसार, इनके पीछे एक बहुत ही घातक, पूरी तरह से ‘विध्वंसक’ योजना काम कर रही है !

बहरहाल, यह तो तय है कि यदि यह शुद्ध रूप से अनुभव-निरपेक्ष किस्म का लेखन होता, तो शायद यह मुमकिन नहीं होता कि कभी भी साहित्य चर्चा के वर्तमान कई प्रकार के ढांचों को समेटे हुए चौखटे से बाहर जा पाता। तब या तो इनमें आत्ममुग्ध लेखकों की कलावादिता का आनंद लिया गया होता, भले ब्रह्मानंद या सच्चिदानंद वाले अन्तत: मनुष्योचित मान लिये गये आनन्दस्वरूप में ही क्यों न हो, या फिर यथार्थवादी क्रोध, रुच्छता और कटु वचनों की बड़बड़ाहट होती। इनसे भी ज्यादा मुमकिन था कि आज के सामंजस्य धर्म का पालन करते हुए सब जनों की जय-जयकार का बीतरागी सुख का रास्ता अपना लिया जाता।

गौर करने पर इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकेगा कि हिंदी की आज की तमाम साहित्यिक पत्रिकाएं आलोचना के नाम पर कमोबेस इसीप्रकार के, वह भी काफी हद तक मूलत: अभ्यासमूलक लेखन से अटी हुई है। इनकी प्रकृति भले इंद्रियातीत, असीम-संधानी चिंतन की दिशा में हो या बचकानी यथार्थवादी आस्था की दिशा में। इनमें निहित सैद्धांतिक कलाबाजियां, अगर वे कहीं हैं, तो पानी में उठते बुलबुलों से भी ज्यादा क्षण-भंगुर होती हैं जो पैदा होने के साथ ही इतनी जल्द फूट जाते है कि किसी को उनके अस्तित्व का कोई भान तक नहीं हो पाता। इनसे साहित्य विमर्श में कोई योगदान तो बहुत दूर की बात, साहित्य जगत के न्यूनतम लक्षणों तक का अनुमान मिलना मुश्किल हो चुका है।

मार्क्स की ‘पूंजी’ में बार-बार यह कथन आता है -‘वे इसे नहीं जानते, लेकिन यही करते हैं’। स्लावोय जिजेक ने आगे इसकी और, वेदांती किस्म की व्याख्या की है। वे कहते हैं कि समस्या जानने में नहीं है, बल्कि उस मूल सचाई में ही हैं, जिसमें लोग काम करते हैं। वे जिस चीज को देख नहीं रहे हैं या गलत समझ रहे हैं, वह खुद भी कोरी भ्रांति है, जीवन और सामाजिक गतिविधियों के बारे में भ्रांति। इस न देखी जा रही अचेतनता की भ्रांति को ही विचारधारात्मक फैंटेसी कह सकते हैं। कहना न होगा, हिंदी का साहित्य जगत भी लगता है जैसे वह अपने ही रचे मायावी संसार, और उससे अपने संबंधों के बारे में दोहरी भ्रांति का शिकार है। इसके व्यवहार से लगता है जैसे सत्य को जानने पर भी कुछ नहीं जानता है बल्कि द्विध-ग्रस्त होकर सत्य से ही विमुख हो गया है।

नि:संदेह, इस संकलन के लेखों को विध्वंसक कहा जा सकता है - बल्कि बहुत अधिक विध्वंसक ! नकारात्मकता का उन्माद। ऐसी नकारात्मकता जिसमें ‘सारी ठोस चीजें हवा हो जाती है’। ईंट-ईंट जोड़ कर तैयार की गई हिंदी साहित्य की ‘भव्य’ इमारत के ‘प्रत्यक्ष’ को ही जैसे झुठला दिया जा रहा है ! यह आलोचना का निरूपण नहीं, निरूपण तो जाने दीजिये, शायद आलोचना की न्यूनतम समझ भी नहीं देता।

इन लेखों की ऐसी आलोचनाओं के बारे में हम पहले से ही यह कहना चाहेंगे कि जो कभी इन लेखों का उद्देश्य ही नहीं रहा, उसीके लिये इन्हें अपराधी के कठघरे में न खड़ा किया जाएं ! साथ ही, यह भी कहेंगे कि द्वंद्वात्मक विवेचन का पहला बुनियादी उसूल ही है कि हम विषय से अपनी पूर्वाग्रहों से भरी आत्मगतता को अलग रख कर चलें।

इसीप्रकार, हिंदी साहित्य के वर्तमान और अतीत पर कुछ कठिन सवाल उठाने वाले इन लेखों को इस बिनाह पर भी एक सिरे से झूठा करार दिया जा सकता है कि इनसे इस साहित्य जगत का नकार तो मिलता है, लेकिन इसकी कोई व्याख्या नहीं, क्योंकि वह तो विशेषज्ञों का, ज्ञानी-मुनि, हिंदी के अध्यापकों के एकाधिकार का क्षेत्र है ! इन लेखों को लिखने के दौरान हमारे सामने आई ऐसी कुछ उत्तेजक प्रतिक्रियाएं हमें याद हैं। एक लेख में डा. रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना’ का नाम गलत छप गया था। उसे देखते ही हिंदी आलोचना के एक मठाधीश महोदय ने फौरन फोन करके ऊंची आवाज में हमारी अल्पज्ञता की परीक्षा लेनी शुरू कर दी थी। हम जानते हैं, ऐसे और भी कई छोटे-बड़े मठाधीश होंगे, जो कुछ इसी प्रकार के अहम्मन्यता-बोध के साथ इन लेखों को देख रहे होंगे।

सचमुच, यह दावा करने का कोई कारण नहीं है कि इन चंद लेखों से हिंदी साहित्य जगत की हर चीज की व्याख्या कर दी गई है या उन पर निर्णय सुना दिया गया है। लेकिन, इन थोड़े से लेखों से इतना तो जाहिर हो ही जाता है कि हिंदी साहित्य के वर्तमान पर यदि तीक्ष्णता से दृष्टि डाली जाएं तो वह बड़ी आसानी से उसके अतीत की गहरी गुहाओं तक जाकर इसके पूरे खोल को ही पलट देने की जरूरत पैदा कर सकती है। अर्थात, अभी परिस्थितियों का संयोग कुछ इसप्रकार के एक संक्रमणकारी बिंदु की दिशा में घटित हो रहा है जब सिर्फ वर्तमान ही नहीं बदलेगा, इसका सुदूर अतीत तक अटूट नहीं रह सकेगा। कहा जा सकता है यह अभिनवगुप्त के ‘प्रत्याभिज्ञान’ का बिंदु है - संपूर्ण प्रत्यावर्तन का बिंदु। एक बिंदु से गहरे अंधेरे के तल तक धस कर वर्तमान में एक नई त्रिक-शक्ति को प्राप्त करने के उपक्रम का बिंदु !

‘लहक’ पत्रिका का जब प्रकाशन शुरू हुआ, वह भारतीय राजनीति का एक तूफानी समय था। इस दौर पर हमारी टिप्पणियों का एक संकलन ‘तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक डायरी’ अनामिका प्रकाशन से ही आ चुका है। ‘लहक’ में हमने इसी नये राजनीतिक-आर्थिक घटनाक्रम पर लिखना शुरू किया था। तब राजनीति और समाज की ऐसी कई नई लाक्षणिकताएं प्रकट हो रही थी जो इन विषयों पर लिखने वाले किसी भी लेखक के लिये खासी चुनौती भरी थी। नयी परिस्थिति के नये लक्षणों पर विचार से स्वाभाविक तौर पर पहले के स्थापित सर्वकालिक सिद्धांतों के ढांचे दरकने लगते हैं। खास तौर पर नरेन्द्र मोदी की जीत ने सत्ता-विमर्श के पूरे पारंपरिक ढांचे को झकझोर दिया है। यह जहां पूर्व के खास प्रकार के उपेक्षितों के समाजशास्त्र की ओर ध्यान खींचता है, वहीं उस परंपरा को भी प्रश्नों के दायरे में ले आता है जो भले ही अब तक चली आ रही हो, लेकिन आगे और नहीं चल पा रही है। इसमें एक नये प्रकार के सांस्कृतिक संकट के वे सारे लक्षण मौजूद हैं जो साहित्य और संस्कृति के विषयों पर भी नये सिरे से अन्वीक्षा और अन्वेषण की मांग करते हैं। माना जा सकता है कि ‘लहक’ के इन लेखों में संभवत: ऐसे ही कुछ अगोचर दबाव किसी न किसी रूप में काम करते रहे हो !

इस संकलन के लेखों से जुड़ा एक और पहलू भी है। हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं का एक बंद, ‘सवर्ण’ सामाजिक ढांचे वाला पहलू - अध्यापकों, यथास्थितिवादियों और समझौता-परस्तों की किलेबंदी का पहलू। यह अनायास ही अपने बाहर ‘अवर्णों’ की एक प्रवंचित और उच्छिष्ट जनों की जमात पैदा करता है। माओ ने जब सांस्कृतिक क्रांति के वक्त नौजवानों के ‘विद्रोह के अधिकार’ की बात कही थी, वह ऐसे ही प्रक्षिप्त जनों के जीने के अधिकार की बात भी थी। खुद इस लेखक का अनुभव था कि हिंदी की पत्रिकाओं में अज्ञेय के बारे में कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की जा सकती थी ; साहित्य अकादमी की पत्रिका के संपादक की मान्यता थी कि साहित्य सिर्फ ‘असीम -संधानी’ होता है, जीवन के अन्य ‘तुच्छ’ व्यापारों का इससे कोई लेना-देना नहीं है ; सरकारी संस्थाओं से जुड़े बलवान लेखकों ने नये शासन में गोटियां बैठाने की कोशिशों में देर नहीं की थी। ऊपर से, मोदी भक्तों की आक्रामकता ! सिर्फ गाली-गलौज नहीं, लेखकों की हत्याएं तक की जाने लगी। दाभोलकर, पानसारे और कुलबर्गी की हत्याओं के बाद तो विद्रोह के अतिरिक्त जैसे जीने का कोई उपाय नहीं रह गया था। इसी भाव की एक छाया इन सभी लेखों पर निश्चित तौर से पड़ी है।

और, कहना न होगा, नया विचार भी कभी अनुशासन या आनुगत्य के भाव से पैदा नहीं होता।  

इस मामले में ‘लहक’ पत्रिका के संपादक निर्भय देवयांश ने हमारे लेखों को प्रकाशित करने में लगातार जिस प्रकार के उत्साह का परिचय दिया, इसके लिये मैं उनका तहे-दिल से आभारी हूं। इसीप्रकार हमारे प्रकाशक मित्र पंकज शर्मा के प्रति भी आभारी हूं जो सिर्फ एक प्रकाशक नहीं, बल्कि साहित्य और राजनीति के विषयों के एक जागरूक पाठक भी है। ‘लहक’ में प्रकाशन के समय से ही इन खास लेखों पर उनकी नजर रही और महावीरप्रसाद द्विवेदी पर लिखे गये अंतिम लेख के बाद ही उन्होंने यह निर्णय सुना दिया कि अब इन लेखों को मिला कर अलग से एक किताब आ जाने की जरूरत है। इसके लिये ‘चतुर्दिक - 4’ के बारे में पहले की योजना में थोड़ा बदलाव भी किया गया और तय किया गया कि बाकी सामग्रियों को ‘चतुर्दिक - 5’ में प्रकाशित किया जायेगा। इस मामले में सरला के सहयोग और दिशा-निर्देश की भी चर्चा करना जरूरी लगता है, जिसने इस किताब को इन थोड़े से लेखों तक ही सीमित रखने पर बल दिया।


14 जून 2016                                                                                                  अरुण माहेश्वरी  


शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

मोदी की बिगड़ी सूरत पर स्वपन दासगुप्त का टच अप


मोदी जी के स्तवक पत्रकार स्वपन दासगुप्त का आज के ‘टेलिग्राफ’ में एक लेख छपा है - भारत चल पड़ा है (India is moving) ।

पुराने ‘शाइनिंग इंडिया’ का एक नया संस्करण, मूविंग इंडिया।

गौर करने की बात है कि उनके इसी लेख के साथ टेलिग्राफ ने एक तस्वीर भी छापी है जिसमें लंदन के मादम तुसाद म्यूजियम में मोदी जी के मोम के पुतले पर एक कलाकार टच-अप कर रही है, अर्थात उसे थोड़ा संवार रही है।

लव जेहाद से गोमांस और गोरक्षा के भारी उत्पातों, पड़ौसी देशों से संबंधों और कश्मीर के मामलों तथा तेल के अन्तरराष्ट्रीय बाजार में अकल्पनीय गिरावट के बावजूद आम लोगों की रोजमर्रे की सामग्रियों की महंगाई के मामले में भारी विफलताओं से बिगड़ चुकी इस सरकार की तस्वीर को स्वपन दासगुप्त इस लेख से संवार रहे हैं।

दासगुप्त गोमांस-गोरक्षा की तरह के मुद्दों को एक बुराई मानते हैं। इस शासन की और भी ऐसी अनेक बातें हैं जिन्हें वे इसी प्रकार सिर्फ बुरा बता कर दरकिनार कर देना चाहते हैं। लेकिन मोदी साहब की अर्थनीति ! वे कहते हैं - वाह, क्या बात है। उनके शब्दों में इस मामले में ‘‘मोदी की ईमानदारी, पूर्ण एकाग्रता और नेतृत्वकारी क्षमता’’ अद्वितीय है।

मोदी शासन की सारी बुराइयों को तराजू के एक पलड़े पर और दूसरे पलड़े पर उसकी अर्थनीति को रख कर बराबर कर देने, बल्कि पलड़े को मोदी के पक्ष में ही थोड़ा झुका देने का दासगुप्त का यह सारा व्यायाम किस बात का संकेत है ? उनकी बुराइयों और कथित अच्छाई का यह कैसा तालमेल हैं ? क्या यह कोई ऐसा अगोचर ईश्वरीय विधान है जिसे दासगुप्त ने पैगंबर की तरह प्रकाश में लाने का जिम्मा अपने सिर पर ले लिया है ?

दासगुप्त नहीं जानते कि जीवन की ठोस समस्याओं का समाधान उनके दिमाग के चक्कर-घिन्नी वाले तर्कों से नहीं निकलने वाला है। लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं। इस शासन का असली इलाज वे खुद ढूंढ लायेंगे।

वैसे दासगुप्त की इस पैगंबरी की सचाई तो टेलिग्राफ की यह तस्वीर ही खोल देती है जिसमें एक मेक-अप कलाकार मोदी जी की बिगड़ी सूरत पर टच-अप कर रहा है !

-अरुण माहेश्वरी

बुधवार, 24 अगस्त 2016

उन्मादित भीड़ को टेरने के काम में लगे गो-रक्षकों के मानस का सच


आज ( 25 अगस्त 2016) के ‘टेलिग्राफ’ मे उड्डलक मुखर्जी की एक रिपोर्ट है, गोरक्षकों के मनोविज्ञान के बारे में। एक गोरक्षक से लिये गये साक्षात्कार पर आधारित रिपोर्ट। गोगुंडा गोरक्षक नहीं, अर्थात गाय के नाम पर जबरिया वसूली करने वाले गोशाला से लेकर थानों तक फैले हुए धंधेबाज गोरक्षक से नहीं। एक आरएसएस टाइप, निष्ठावान स्वयंसेवक टाइप गो रक्षक शास्त्री जी से लिया गया साक्षात्कार। इसके आधार पर उड्डलक बताते हैं कि कैसे गाय इनके लिये सिर्फ गाय नहीं, और बहुत कुछ है। वह गो रक्षक अपनी बात तो शुरू करता है गाय के गुणों की रटी हुई विरुदावली बांच कर कि इसकी महिमा अपरंपार है, इसका पेशाब कैंसर को दूर कर देता है, इसके गोबर के उपलों के धुएं से धरती पर ओजोन परत कावह गो रक्षक अपनी बात तो शुरू करता है गाय के गुणों की रटी हुई विरुदावली बांच कर कि इसकी महिमा अपरंपार है, इसका पेशाब कैंसर को दूर कर देता है, इसके गोबर के उपलों के धुएं से धरती पर ओजोन परत का छेद दूर हो जाता है़, आदि।

शास्त्री जी ने पढ़ाई के नाम पर कुछ योगियों, कथित वकीलों और वैज्ञानिकों की चीजों को पढ़ा है, जिनसे हर चीज के बारे में उनकी एकदम पुख्ता राय तैयार हो चुकी है। इसी के बल पर वे भारत में विज्ञान की शिक्षा का ही मजाक नहीं उड़ाते बल्कि भारतीय संविधान में गोरक्षा के बारे में प्राविधानों की अपनी आधी-अधूरी, बल्कि गलत जानकारी को भी पूरे अधिकार के साथ गिनाते हैं। अंबेडकर की बातों से नफरत करते हैं और गांधी की बातों को तुष्टीकरण बताते हैं। और भारत की संघीय व्यवस्था के तो घनघोर शत्रु है। उनका साफ कहना है कि उनके हिंदू राष्ट्र में सारे अधिकार केंद्र के पास होंगे, राज्यों के पास कोई अधिकार नहीं होगा। यहां तक कि वे इन शुद्ध आंकड़ों को भी मानने से एक झटके में इंकार करते हैं कि 2012 की पशुओे की गणना के अनुसार भारत में गायों की आबादी में 6.52 प्रतिशत वृद्धि हुई है। उनकी एक ही रट थी कि भारत में हिंदुओं की तरह ही गायों की संख्या में गिरावट आई है। वे नहीं मानते कि गाय के सवाल से कोई सांप्रदायिक तनाव पैदा होता है। उनकी साफ राय है कि भारत को सिर्फ बहुसंख्यकों की राय के अनुसार चलना होगा। वे कहते हैं कि भारत के संविधान को फाड़ कर फेंक देना चाहिए क्योंकि उसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है।

गोरक्षक शास्त्री उड्डलक मुखर्जी को कहता है कि वह हिंसा पर विश्वास नहीं करता। लेकिन उसकी कुल बातों से मुखर्जी को लगा कि उसे ही हिंसा की अपनी समझ के बारे में ही सोचना पड़ेगा। शास्त्री धर्म-आधारित राज्य, संकीर्णतावाद और छूआछूत का पक्का समर्थक था। वह संविधान के मूल्यों पर आघात करने वाली बातों के प्रचार में पूरी ताकत से लगा हुआ है। उड्डलक अपनी रिपोर्ट में यह सवाल उठाते हैं कि क्या उसकी ये सारी गतिविधियां आक्रामक नहीं कहलायेगी ? क्या हिंसा का अर्थ सिर्फ शारीरिक ही होता है ?

शास्त्री एक ‘समाज’ नामक संगठन से जुड़ा हुआ है जो उसके अनुसार जातिवाद और निरक्षरता के खिलाफ लड़ाई में लगा हुआ है। उड्डलक के अंदर यह सवाल पैदा होता है कि क्या कारण है कि उसका यह ‘समाज’ ज्ञान और जागरण की पूरी परंपरा’ से अछूता रह जाता है ?

अपनी रिपोर्ट का अंत उड्डलक इस बात से करते हैं कि ‘‘शास्त्री से मिल कर यह भी पता चल गया कि राजनीतिक सत्ता भीड़ को टेरने वालों के लिये कोई ईनाम नहीं है। शास्त्री और उसका समाज भारत के बौद्धिक और नैतिक स्थान पर नजर लगाये हुए हैं - उसकी शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं और नीतियों पर। उनके इस लक्ष्य के साथ गाय को इसलिये जोड़ा गया है क्योंकि गाय की रक्षा करने का दावा करने वालों के लिये इसके एक नहीं अनेक लाभ हैं। इस बात पर मैं शास्त्री से सहमत था।’’

यह है हमारे सामने उपस्थित उस पूरी विचारधारा का ठोस, जमीनी सच जो आज भारत को तेजी से विकास के पथ पर ले जाने के दावे के साथ देश की सर्वोच्च सत्ता पर पहुंच चुकी है। ‘आधुनिक भारत’ के निर्माण में लगाई जा रही आदिम सोच रखने वाली सामाजिक शक्तियों की एक भीड़ का सच। आज दिल्ली में इनके सर्वाधुनिक मुख्य कार्यालय की नींव रखी गई है। इनकी सारी आधुनिकता एक ऐसे राष्ट्रवाद के दैत्य की निर्मिति के प्रयोजन के लिये है जो हर प्रकार के विवेक और बुद्धि की आवाज को राष्ट्रद्रोही करार कर उन्हें अपने भीमकाय पैरो तले रौंद सके।

मोदी जी की निजी साज-सज्जा, साफ-सुथरे कपड़े, सधी हुई चाल, बात-बात पर उनकी आंसू तक बहाने की भावुक मुद्राएं और हाथ लहरा-लहरा कर भाषणबाजी की अदाएं, इन सबके पीछे के सच का असली रूप है उड्डलक मुखर्जी का यह पात्र शास्त्री, जिसकी आरएसएस के मोहन भागवत भी बीच-बीच में झलक देते रहते हैं। आज सचमुच हमें मोदी जी मुद्राओं पर हंसी आने लगी है। इसकी वजह है कि वे अपने लंबे अभ्यास के चलते मिथ्याचारी की भूमिका में अक्सर डूब जाते हैं, उसका ईमानदारी से पालन करने लगते हैं और इसीलिये कभी गोरक्षकों को फटकार देते हैं तो कभी दलितों के लिये आंसू बहा देते हैं। अन्यथा, वास्तविकता यह है कि यदि वे यह सब नाटक न करें तो उनका समूचा पाखंड शास्त्री पंडित की बातों की तरह कोरी वितृष्णा के अलावा और कुछ भी पैदा नहीं करेगा।

हम यहां उड्डलक मुखर्जी की इस रिपोर्ट को अपने मित्रों से साझा कर रहे हैं -

http://www.telegraphindia.com/1160825/jsp/opinion/story_104209.jsp#.V76VYqbyAgo.email



गुरुवार, 11 अगस्त 2016

हिन्दी साहित्य में विद्रोह-विमर्श : कतिपय टिप्पणियाँ

अरुण माहेश्वरी


Sushila Puri ji, आपने मुझे आशीष मिश्रा के 'मठों के ढहने' वाली टिप्पणी मार्क की हैं। आप जानती ही हैं कि मैं इस चाय की प्याली में उठे तूफ़ान पर कुछ कहना नहीं चाहता था । इसकी अकेली वजह यही है कि इस विषय में निश्चयात्मक तौर पर कुछ कहने में मैं अपने को असमर्थ पाता हूँ । इस प्रसंग की पृष्ठभूमि में मैंने रचना में विद्रोह के बारे में अपने प्रकार की एक सामान्य सी टिप्पणी की थी । ठोस रूप में कुछ न कह पाने की वजह से ही वह मेरे लिये ही संतोषप्रद नहीं थी । लेकिन इसकी मूल वजह यही थी कि अब तक भी मैं इस पूरे विषय के महत्व को समझ नहीं पाया हूँ । एक नई कवियत्री को पुरस्कार मिला, जैसा कि हिंदी में असंख्य लोगों को मिलता ही रहता है । इस पुरस्कार का कुछ भी नाम या इतिहास क्यों न हो, साहित्य के वृहद परिप्रेक्ष्य में खुद में इसका मुझे कोई बहुत ज़्यादा अर्थ नहीं दिखाई दिया कि इस पर उठी बहस में हस्तक्षेप की ज़रूरत महसूस करूँ ।

फिर भी, नितांत अप्रासंगिक ही क्यों न माना जाए, इतना जरूर कहूँगा कि स्त्री-पुरुष से जुड़े विषयों के सिर्फ समाज-शास्त्रीय पहलू ही नहीं हुआ करते हैं, जिन पर अभी सबसे अधिक चर्चा हो रही हैं । स्त्री मनोविज्ञान तो फ्रायड के अध्ययन का एक बहुत महत्वपूर्ण विषय रहा है । यह बात मैं इसलिये कहना चाहता हूँ क्योंकि हाल ही में मैंने और भी कुछ कवयित्रियों की कविताओं को डिजिटल माध्यम से ही पढ़ा है । शुभम श्री तो अभी कविता की दुनिया में पदार्पण ही कर रही है । मैंने 'समालोचन वेब मैगज़ीन ' ब्लाग पर लवली गोस्वामी और मोनिका कुमार की कुछेक कविताओं को भी पढ़ा है । वहीं पर लवली गोस्वामी पर अपने ढंग की एक टिप्पणी भी की थी । मोनिका कुमार की कविताओं के साथ अविनाश मिश्र की एक विस्तृत टिप्पणी भी देखी, जिसमें अविनाश ने उनकी कविताओं की शीर्षक-विहीनता को ही अपने विचार का एक बड़ा विषय बना कर पेश किया है । कविताओं के साथ अविनाश की टिप्पणी को पढ़ कर मेरे मन में पहला सवाल उठा था कि सिर्फ 'शीर्षक-विहीनता' को ही क्यों, क्यों नहीं उन्होंने इन कविताओं की कथ्य-विहीनता पर विचार किया !

दरअसल, फ्रायड ने जिस स्त्री-ग्रंथी को, सटीक शब्दों में कहें तो स्त्री के उन्माद को, अपना विषय बनाया, 50 shades of grey की तरह उसके भी पचास से कम नही, बल्कि ज़्यादा ही शेड्स हैं । इसका सबसे ज़्यादा डराने वाला पहलू यह है कि इस ग्रंथी के राज में वास्तव में कोई राज ही नहीं है । न इसे कोई आदिम उन्माद कहा जा सकता है और न ही पितृसत्ता के किसी दबाव की सच्ची प्रतिक्रिया । इन कथ्य- विहीन कविताओं में बैठी स्त्री की आर्त-वेदना महज़ एक अबूझ सी पहेली है । कुछ न चाहने वाली चाहतों के संसार की मानिंद, उपेक्षित रहने की लालसाओं से की जाने वाली इशारेबाजियों की तरह । ये पुरुष को चुनौती देने के पहले ही अपनी इच्छाओं का गला घोंट कर सामने आती हैं । पुरुष के प्रति इनका डर अपनी ही असंगतियाँ के प्रति डर की तरह होता है । वह अपने को असंख्य पर्दों के पीछे से व्यक्त करना चाहती है, कभी बदहवास होकर चौंकाती है तो कभी अत्यंत क्रूर और कुत्सित उपहास की मुद्रा भी अपनाती है । लेकिन इस ग्रंथी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसके हज़ार पर्दों के पीछे, जिसे 'वास्तव' कहा जा सके, वैसा कुछ भी नहीं होता है ।

सुशीला जी, फ्रायड के ऐसे अध्ययनों की रोशनी में ही, कहना चाहूँगा कि अक्सर हम अवचेतन को विवेक और बुद्धि का विलोम मान लेते है, जो अवचेतन के बारे में एक शुद्ध रूमानी नजरिया है । फ्रायड द्वारा विवेच्य अवचेतन से इसका कोई संपर्क नहीं है । फ्रायड के अवचेतन का भी अपना एक व्याकरण है, उसका अपना तर्क है । वह सोचता है और बोलता भी है । वह न आदिम होता है और न नैसर्गिक । सच कहा जाए तो अवचेतन का सच विचारों के सच से भी ताक़तवर होता है । फ्रायडीय कामुकता की बौद्धिक शक्ति को कोई भी देख सकता है । यह सारे सामाजिक क़ायदे-क़ानूनों को धत्ता बता देने वाले आतंकियों के हाथ के सबसे कारगर हथियार की तरह है । ऐसे आतंक मचा देने वाले 'बौद्धिक' अवचेतन की विशेषता यह है कि इसका अपना कोई संगतिपूर्ण ढाँचा नहीं होता है । इसमें हर प्रकार की चालाकियों, मौक़े का लाभ उठाने वाली करतूतों, अवसरवादी समझौतों का सम्मिश्रण होता है । यह एक प्रकार से विकृतियों और भटकावों का पागलपन है जो अतार्किक होने पर भी निश्चित रूप से नाना प्रकार के सूक्ष्म तारों के जोड़-तोड़ के नेटवर्क पर टिका होता है ।

सुशीला जी, दरअसल, सूक्ष्म और हास्यास्पद बातों के बीच कोई लंबा-चौड़ा फ़ासला नहीं हुआ करता है । किसी भी बड़े क़दम और थोथी भाव-भंगिमाओं में भेद करना अक्सर मुश्किल होता है । इसे आप एक नुक़्ते का फेर कह सकते हैं कि जिससे 'लाला जी अजमेर गये' बदल कर 'लाला जी आज मर गये' हो जाता है । कहने की मूल बात यह है कि अवचेतन का भी ऐसा ही एक अति-सूक्ष्म सा विन्यास होता है ।

साहित्य में बहुत से पात्र इस प्रकार से गढ़े जाते हैं ताकि वे कुछ ख़ास बातों को ख़ास भंगिमाओं में कह सके । यह भी एक प्रकार का रूपवाद ही है । पात्र का सच नहीं, लेखक के वैचारिक ढाँचे का सच प्रमुख हो जाता है । इसीलिये अभी शुभमश्री आदि के नाम पर जो बातें की जा रही है, विचार की बात यह है कि वे चरित्रों का सच है या लेखक की बातों के लिये निर्मित सच । कहीं यह सब अपने एक प्रकार के एक उन्माद की अभिव्यक्ति के लिये निर्मित कविताओं का ढाँचा तो नहीं है !

हिंदी में हमारे लिये कृष्ण बलदेव वैद की शैली इसका एक क्लासिक उदाहरण बन सकती है । बिना किसी विराम-चिन्हों वाले गद्य के स्फीत ढाँचे में जब उनका पिद्दी सा क्षीणकाय कथ्य ढूँढे से नहीं मिलता, तो यह समझ में आ जाता है कि कथ्य नहीं, लेखक के लिये उसकी शैली का रूप ज़्यादा महत्वपूर्ण है ।

हमें तो लगता है कि जब भी किसी तान में संगति बैठती नहीं दिखती, तब पीछे के तानपुरे के सुर को बेसुरेपन की समस्या के समाधान की कोशिश के तौर पर आना पड़ता है । बेसुरापन अगर उन्माद है तो यह सुर स्थिरता की आस्था है । हमें बेसुरेपन में नहीं, बल्कि बेसुरेपन से मुक्ति में ज़बर्दस्त राजनीतिक ताक़त दिखाई देती है । वही एक उत्पीड़क शासन से मुक्ति का भाव पैदा करता है । बेसुरेपन को स्वीकारना हताशा को और समाज के अंदर के शत्रुतापूर्ण अन्तर्विरोधों को स्वीकारने की तरह होता है । दरअसल यह किसी विध्वस्त भाव की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि खोए हुए सुर को फिर से पाने की जद्दो-जहद में होने वाला एक प्रकार का अनावश्यक सा, collateral damage कहलाने वाला नुक़सान है । यह आकस्मिक नहीं है कि सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन की फ़िल्मों से लेकर हाल में मराठी जीवन पर गहरा असर डालने वाली नागराज की 'सैराट' की तरह की फ़िल्मों की चुस्त और संगीतमय प्रस्तुति उनके विद्रोही कथन को प्रगाढ़ करने में अहम भूमिका अदा करती है ।

हमने हिंदी में अकविता या बांग्ला में भूखी पीढ़ी के आंदोलनों को देखा है । शक्ति चटर्जी और सुनील गंगोपाध्याय को अंत में रवीन्द्रनाथ के चरणों पर दंडवत होते भी देखा है । उनका भूखी पीढ़ी वाला बेसुरापन सामाजिक विसंगतियों के सामने आत्म-समर्पण से उत्पन्न हुआ था । वह एक व्यापक मोहभंग के काल में नये विकल्पों की तलाश की लड़ाई का collateral-damage था । वह नये स्वरों की ऊँचाइयों के रास्ते में बाधा भी बना था । जबकि साहित्य का वैकल्पिक स्वर अपने विस्तार और अपने शिखर, दोनों ही स्तर पर किसी न किसी एक सूत्र से बँधा होता है ।

सुशीला जी, अंत में यही कहूँगा कि आज जब बहुत कुछ बेसुरा सा चल रहा है, तब पुरानी लीक से भले ही हमें अपने वांछित फल हासिल न हो, लेकिन कुछ संतोषप्रद जगह तो पाई ही जा सकती है । पुरानी लीक में कुछ मामूली कल्पनाशील परिवर्तनों से ही ऐसी चीज़ों को तीव्र प्रकाश के वृत्त में लाया जा सकता है, जिनकी हमें तलाश है, लेकिन दिखाई नहीं देती है । अभी जो चल रहा है, उसके बारे में फिर एक बार फ्रायड का इस्तेमाल करते हुए यही कहूँगा, सपने का रहस्य उसके विषय में नहीं, उसके ढाँचे में ही निहित होता है ।

एक रौ में यहाँ कुछ बातें कह गया हूँ । इन्हें मेरी पहले वाली मनोज कुमार झा की पोस्ट पर की गई टिप्पणी और समालोचन ब्लाग में लवली गोस्वामी की कविताओं के संदर्भ में कही गई बातों के साथ पढ़ने पर शायद इस बहक का आशय कुछ और साफ़ होगा । यहाँ मैं नीचे उन दोनों को भी अलग से जोड़ दे रहा हूँ -


Manoj Kumar Jha

Arun Maheshwari सर की

एक ज़रूरी टिप्पणी रचना और रचनात्मक विद्रोह पर...

मज़े की बात यह है कि यह सब एक रचनात्मक विद्रोह के नाम पर चल रहा है । गंभीरता से सोचे तो किसी भी रचना में विद्रोह के विस्फोट की गूँज को सुन कर पहला सवाल पैदा होता है यह विस्फोट क्यों ? इसके मूल में क्या है? रचनाकार का विद्रोह किस जरूरतवश फूटा है । विस्फोट तो रचना की ज़रूरत के मर्म में ही निहित होता है । सिर्फ विस्फोट की ज़रूरत नहीं , बल्कि उसमें खुद ज़रूरत का विस्फोट भी होता है । किसी भी क्षुद्र सी बात से महा-विध्वंसक युद्ध शुरू हो सकता है, लेकिन युद्ध महज़ वह छोटी सी बात नहीं होता है ।

आपके किसी भी क़दम का असली अर्थ तो आपके क़दम के सामाजिक प्रभाव से सामने आता है । आपका आशय कुछ भी क्यों न रहा हो । हम मानते है कि कोई भी सच्चा स्वतंत्र क़दम पुराने ढर्रे पर चल कर, माप-तौल कर नहीं उठाया जाता है । वह इस उपक्रम में खुद अपना ढर्रा बनाता है । लेकिन उसमें रचनाकार जरूर खुद मौजूद रहता है । जैसे प्रेमिका की अदाओं और उसके नाक-नक़्शे को आदमी इसलिये पसंद करता है, क्योंकि वे उसकी प्रेमिका की अदाएँ हैं, प्रेमिका के नाक-नक़्शे हैं । इसीलिये किसी भी चीज को आदमी बेवजह पसंद नहीं करता । उसमें वह खुद को किसी न किसी रूप में देख रहा होता है । क्या हमारे विद्रोही रचनाकारों की सूरत ऐसी ही है !

दरअसल, यह हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है कि अक्सर हम जितना स्वतंत्र चलते हैं, उतना ही ज्यादा व्यवस्था के ग़ुलाम होते जाते हैं । ज़रूरत है कि हम बाहर के दबावों से मिथ्या स्वतंत्रता की 'तंद्रा' से जागे और सामाजिक स्वतंत्रता से अपने को जोड़े । इसमें विचारधारा की एक बड़ी भूमिका होती है । स्वतंत्रता अकेले की नहीं, सामूहिक होती है और यह लड़ कर अर्जित की जाती है । इसे भूला नहीं जा सकता है । थोथी गालियों का रचनात्मक संसार कुंठाओं से भरा संसार ही हो सकता है ।

लवली गोस्वामी जी की कविताओं पर एक टिप्पणी -

लवली गोस्वामी की इन दार्शनिक कविताओं को पढ़ कर एकबारगी हमारे मन में कवि को जानने की इच्छा पैदा हो गई। मेरी कमी थी कि उनके बारे में मेरी कोई जानकारी नहीं थी। इसीलिये तत्काल एक धारणा बनाने के लिये ही मैंने उनके फेसबुक पेज को टटोला। उसमें संकलित कुछ ‘आप्त-सुक्तियों’ के साथ ही खास तौर पर ‘पहल’ पत्रिका में छपे उनके लेख ‘अभयारण्य में यथार्थ की दुर्दशा’ को पढ़ गया, जिससे मुझे मोटे तौर पर कवि की जमीन का एक अंदाजा मिला। 

लवली जी की इन प्रेम कविताओं से अनायास ही हरीश भादानी पर लिखी अपनी किताब की ही कुछ पंक्तियां याद आ गई - ‘‘प्रेम एक झंझा है। जीवन के सारे आंकड़ों को तहस-नहस कर देने, हर संतुलन को बिगाड़ देने वाली एक खतरनाक स्थिति। आदमी प्रेम में पड़ता है। Fall in love । स्खलन की खाई। फिसलन की काई। ऐसा जबर्दस्त तूफान जिसमें आदमी के पैर जमीन पर टिके नहीं रह सकते।’’
कहने का मतलब कि आदमी के जीवन में प्रेम एक सामान्य स्थिति कत्तई नहीं होता। इस बवंडर को काबू में करने के लिये ही तो वे सारी सामाजिक-नैतिक संहिताएं हैं जिनके बारे में खुद लवली जी ने अपने ‘अभयारण्य’ वाले लेख में एक संकेत दिया है कि कैसे विवाह संस्था के जरिये मातृसत्ता को खंडित किया गया था और महाविद्या, योगिनी समूह, पंचकन्या समूह आदि में जहां भी स्वतंत्र यौन क्रिया जारी रही, उन्हें नाना उपायों से अलग-थलग करके तमाम प्रकार से उत्पीड़ित और वंचित किया गया। वे व्याधियों, महामारियों की देवियां बना दी गई ।


कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में उद्दाम प्रेम जब स्वाभाविक वैवाहिक किस्म की परिणति नहीं पाता तो उसके विध्वंसक परिणाम प्रेम की स्मृतियों को डरावनी सी ऐसी सूरत भी दे सकते हैं, जिन्हें आदमी सीधे तौर पर स्वीकारने से कतराता है। यह उनकी प्रेत की तरह की एक सताने वाली सूरत होती है, क्योंकि इसमें एक अतिरेकों से भरा, एक प्रकार का असहनीय सच निहित होता है। आज के संसार में इससे जुड़े तमाम स्वछंद नैतिक-विमर्शों के बाद भी यह एक ऐसा लोमहर्षक अनुभव बना रहता है, जिसके सच से वाकिफ होने पर भी उसका पूरा लेखा-जोखा देना मुमकिन नहीं होता है। यहीं से आदमी के अस्तित्व से जुड़ी वे खास तात्विक समस्याएं उत्पन्न होती है जिन्हें लवली जी की इन कविताओं का विषय बनाया गया है। ये ‘पितृ-हत्या’ वाली कोई काल्पनिक फ्रायडीय ग्रंथी नहीं है, बल्कि जीवन में घटित सच का दंश है। ऐसा तूफानी या विध्वंसक सच जिसे आदमी महज अतीत की स्मृतियों के खाते में नहीं डाल पाता है। वह कभी इसके प्रति तटस्थ या इसका निरपेक्ष वस्तु-द्रष्टा नहीं हो पाता है। इस अनुभव की विडंबना यह है कि यह उसका अतीत होने पर भी मनुष्य इसे अपना अतीत नहीं मान पाता है। इसमें कुछ ऐसा है जो इसे सत्य-कथा के बजाय एक प्रेत-कथा की तरह का बना देता है। मन के किसी कोने में पड़ी अपराध-बोध की सिहरा देने वाली असमाप्त कहानी। स्मृति से भी यह एक फिसलन बन कर ही रचना का रूप लेती है, किसी आदिम झूठ की तरह, पाठक को एक भुतहा संसार में ले जाकर उससे छल करने वाले झूठ की तरह। 

लवली जी ने मिथकों पर काम किया है। ईश्वर संबंधी मिथकीय कथाओं का रहस्य भी कुछ ऐसा ही है। ये आद्य-ब्रह्मांडीय अराजकता की कोख से शब्द-ब्रह्म के एक संपूर्ण सत्य की व्युत्पत्ति का दावा करने वाली कथाएं होती है। लेकिन, इनमें जिस बात को छिपाया जाता है, वह यह है कि आदमी का यह दमित, उझक कर सामने आने वाला अतीत सबका जाना हुआ सत्य नहीं होता। अंतत: यह एक कपोल-कल्पना ही होता है जो वास्तव में रचनाकार के जीवन में घटित कृत्य से उत्पन्न शून्य को भरता है। यही है जीवित मनुष्यों पर राज करने वाले तथाकथित मिथ्या-स्मृति रोग के रहस्य की रचनात्मक बुनावट। एक अवचेतन का खेल जिसमें वास्तव में यदि कुछ अवचेतन में है तो वह अतीत की कोई सहेजी हुई अनुभूति नहीं, मनुष्य का कोई कृत्य ही है, अर्थात अवचेतन नहीं, संपूर्ण चेतन। मनुष्य का कृत्य ही उसका सनातन सत्य होता है। 

थोड़ा सा इस चर्चा की पृष्ठभूमि में इन कविताओं को पढ़ें, शायद इनके आगे और भी अर्थ खुलेंगे; इनके रहस्य का संधान मिलेगा।

6/8/16, 6:42 am

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

'माईंड स्पेश' आरएसएस और वामपंथ

Virendra Yadav ने कल (3 अगस्त को) अपनी एक पोस्ट में लिखा है कि " राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब  वैचारिक जगत( माईंड स्पेस)  पर कब्ज़ा ज़माने के  लिए लिटररी फेस्टिवल और अन्य 'सांस्कृतिक'  गतिविधियों   के आयोजन की सार्वजनिक  घोषणा  कर  दी  है. ...  'माईंड स्पेस'  पर कब्ज़ा फासीवाद की आजमाई हुयी व्यूहरचना है ,इसे  निष्प्रभावी   करने के  लिए निगहबानी  जरूरी है."

विरेंद्र जी की बात से सहमति के बावजूद हम कहना चाहेंगे कि क्या वे 'माईंड स्पेश' पर क़ब्ज़ा जमायेंगे लेखकों को बैल समझने वाले महेश शर्मा जैसों के बल पर ? सचाई यह है कि ये हिटलर के अनुयायी हैं और किसी भी दूसरे उपाय से ज्यादा हमेशा अपने 'घूँसे के बोलने' पर विश्वास करते हैं । वह जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न रहने । इस मामले में साहित्य और संस्कृति का क्षेत्र कोई अपवाद नहीं है ।

इनके 'तूफ़ानी दस्तों' में अभी कौन सबसे ज्यादा सक्रिय है ? गोरक्षक । इन गोरक्षकों की कार्य-पद्धति देखियें । ये शुद्ध रूप से माफ़िया गिरोहों की तरह काम करते हैं । खुले आम वसूलियाँ करते हैं और मारते, डराते-धमकाते भी हैं । सरकारी संरक्षण में इन्होंने गो-शालाओं का भी एक बड़ा सा ताना-बाना तैयार कर लिया है जो ऐसी तमाम आपराधिक गतिविधियों के केंद्रों के रूप में काम कर रहा है । इनके आतंक का फल है कि इसने आम लोगों को अन्याय और आतंक का तमाशबीन बनाना शुरू कर दिया है । और तो और, कई जगहों पर डरे हुए आम लोग इनके कुकर्मों में शामिल भी होने लगे हैं ।

नामवर जी के जन्मदिन समारोह के मंच पर राजनाथ सिंह की बातों में भी 'सीमा का अतिक्रमण न करने' की प्रच्छन्न धमकी छिपी हुई थी । साहित्य में वे इसी प्रकार अपना स्पेश तैयार करेंगे ।

इन ताक़तों का वास्तविक प्रत्युत्तर सिर्फ बुद्धिजीवियों के पास नहीं हो सकता है । इनका मुक़ाबला व्यापक प्रचार के साथ ही व्यापकतम जन-लामबंदी से ही किया जा सकता है । इस मामले में अभी तो कुछ दलित संगठन एक भूमिका अदा करते दिखाई दे रहे हैं । कांग्रेस दल में भी कुछ सकारात्मक हरकतें दिखाई देने लगी हैं । ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश में इनकी बुरी तरह पराजय अभी सुनिश्चित लग रही है । लेकिन इन चंद सकारात्मक संकेतों के बीच भी सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि हमारे देश की वामपंथी ताक़तों को जैसे लकवा मार गया है ।

ऐसे एक कठिन, चुनौती भरे समय में कुछ वामपंथी नेता अपने संगठनों में एक प्रकार का छद्म सैद्धांतिक संघर्ष चला रहे हैं, अर्थात सिद्धांतवादिता का स्वांग भर रहे हैं । 'वर्ग-शत्रु' और 'वर्ग-मित्र'  की तरह की बातों में उलझा कर इन फासिस्टों के खिलाफ व्यापकतम मोर्चे के गठन को व्याहत कर रहे हैं । सांप्रदायिकता को वैश्वीकरण से जोड़ कर सांप्रदायिकता और वैश्वीकरण, दोनों के बारे में हमारी समझ को धुँधला कर रहे हैं । ऊल-ज़लूल दलीलों से जनतंत्र और फासीवाद के बीच के फर्क के बारे उलझनें पैदा कर रहे हैं । वैश्वीकरण की तरह की एक पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक परिघटना को महज़ एक प्रकार का सांस्कृतिक और विचारधारात्मक अघटन (catastrophe) बना कर पेश कर रहे हैं ।

इन्होंने मज़दूर वर्ग को सत्ता की लड़ाई से विरत करने का काम पहले भी किया हैं और अभी भी करते दिखाई दे रहे हैं । भारतीय वामपंथ में नेतृत्व के एक तबक़े की इस मामले में अपनी एक मुकम्मल तस्वीर बन चुकी है, जिसे हम बार-बार ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने और यूपीए-1 सरकार से अकारण ही समर्थन वापस लेने की तरह की प्रमुख घटनाओं के हवाले से कहते आ रहे हैं । यही तबक़ा आज भी वामपंथ में एक पंगुता पैदा करने वाली सैद्धांतिक क़वायदों में लगा हुआ दिखाई देता हैं ।

वामपंथ के ऐसे नेतृत्व का रुख़ हमें जर्मनी में बर्नस्टीन और रोज़ा लुक्सेमबर्ग के बीच की बहस की याद दिलाता है । बर्नस्टीन सत्ता पर आने की सर्वहारा की हर कोशिश को बहुत जल्दबाज़ी और असामयिक बताते थे और लुक्सेमबर्ग का कहना था कि समाजवाद की तरह की बड़ी चीज को कभी भी एक झटके में हासिल नहीं किया जा सकता है । सर्वहारा की सत्ता पाने की कोशिशों को इस प्रकार बार-बार 'असामयिक' और 'जल्दबाजी' बताना अंतत: राजसत्ता पर क़ाबिज़ होने की सर्वहारा की आकांक्षा मात्र का विरोध करने के समान होता है ।

हमें लगता है कि वामपंथी बुद्धिजीवियों का आज एक प्रमुख दायित्व वामपंथ को उसकी पंगुता से मुक्त कराने का भी है । झूठी लड़ाइयों और बातों को उठा कर फासीवाद-विरोधी व्यापक एकता में समस्याएँ पैदा करने वालों की ग़लत समझ को दूर करने की ज़रूरत है । अन्यथा, वही कहावत चरितार्थ होगी कि 'मरेंगे तो जरूर लेकिन चालाकियाँ करते हुए मरेंगे' ।

यह कार्यनीतिगत चालाकियों का समय नहीं है । इस बात को वामपंथी नेताओं को समझाने की ज़रूरत है । अभी वे सिकुड़ कर कुछ निजी स्वार्थों की, संगठनों के बचे-खुचे ढाँचों पर क़ब्ज़े की लड़ाइयों में लगे हुए दिखाई देने लगे हैं । इस दलदल से उन्हें बाहर के दबाव से ही निकाला जा सकता है । पार्टियों के अंदर तर्क का नहीं, बहुमत-अल्पमत का खेल चलता हुआ दिख रहा है । वामपंथी नेतृत्व का प्रभावी तबक़ा अपने में सिमट जाने वाली उस उग्र भंगिमा को अपनाये हुए हैं जो अपने से बाहर की हर चीज को देखने से इंकार करती है । प्रो. इरफ़ान हबीब के प्रश्नों के प्रति प्रकाश करात का रुख़ इसी बात का प्रमाण है । उन्हें अपने से बाहर झाँकने के लिये मजबूर करना होगा ।

हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि ज़ख़्म को वही चाक़ू भर सकता है जो उसे चीर देता है । वामपंथ को उसके अपने इतिहास और स्थान-समय से काट कर किसी मिथक या रहस्य का रूप नहीं दिया जाना चाहिए । रहस्यमय दैविक रूप के प्रति सिर्फ उनका आग्रह होता हैं, जो अपने पर किसी भी प्रकार के सवाल के औचित्य से इंकार करना चाहते हैं । हमें लगता है कि वामपंथी बुद्धिजीवियों की वामपंथ को 'सिद्धांतों' की झूठी मीनार से उतार कर आज की राजनीति की ठोस ज़मीन पर लाने में एक बड़ी भूमिका हो सकती है । यह भी खुद में सांप्रदायिक फासीवाद के विरुद्ध व्यापक जन-लामबंदी को संभव बनाने की दिशा में बुद्धिजीवियों का बहुत सकारात्मक योगदान होगा ।

जहाँ तक सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ लगातार प्रचार अभियान चलाना, उसे अलग-थलग करने के दूसरे तमाम उपायों का सवाल हैं, वे तो सर्वोपरि हैं । इसमें किसी भी प्रकार की कमी या समझौता-परस्ती सीधे-सीधे आत्म-घात होगा ।