गुरुवार, 10 मार्च 2016

इसे कहते हैं - निखालिस ‘बौद्धिक कमीनापन’ !

-अरुण माहेश्वरी




कोई यदि किसी के बारे में कहे कि वह है तो बहुत दुष्ट और पाजी भी। मुंह का खराब, शराबी, जुआड़ी और औरतबाज भी। यहां तक कि उसपर बलात्कार का आरोप भी लग चुका है। वह किसी की परवाह नहीं करता। ‘लेकिन’ फिर भी कहूंगा कि वह बहुत साहसी है। जो सोचता है, वह कहता ही नहीं, करता भी है। फिर, स्त्रियां ही कौन सी दूध की घुली हुई है ! ताली एक हाथ से तो नहीं बजती। जिसे बलात्कार कहते हैं उसे ही ‘पीड़क आनंद’ भी कहा जाता है ! उसके पास धन है। विरोधी का जबड़ा तोड़ देने की ताकत भी है। तमाम बुराइयों के बावजूद, इन अच्छाइयों के लिये ही भला उससे कौन प्रेम नहीं करेगा !

किसी की ऐसी बातों को सुन कर एक भले, विवेकवान आदमी को क्या लगेगा ? क्या ऐसा नहीं लगेगा कि जैसे वह आदमी अपने ही किसी सगोत्र संबंधी के बारे में बोल रहा हो ! वह उसके पाजीपन और बलात्कारी रूप को जानता है, ‘लेकिन’ फिर भी उससे अपने को अलग नहीं कर पा रहा है ! उसके अपराधी चरित्र को ही उसकी खूबी बता कर उसकी प्रशंसा करने से बाज नहीं आ रहा है !

आज के ‘टेलिग्राफ’ में संघी पत्रकार स्वपन दासगुप्त के डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में लेख ‘Look out for anger” पढ़ के हमें बिल्कुल ऐसी ही अनुभूति हुई। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की दौड़ में उतरे ट्रम्प के बारे में स्वपन दासगुप्त कहते हैं कि यह खरबपति अपनी गंदी जुबान के लिये सारी दुनिया में बदनाम हो चुका है। उसने डेमोक्रेटिक हिलैरी क्लिंटन के बारे में यहां तक ट्वीट किया है कि ‘‘ जो अपने पति को संतुष्ट नहीं कर सकती, वह अमेरिका को क्या संतुष्ट करेगी।’’ मेक्सिको के आप्रवासियों के बारे में कहता है कि मेक्सिको की सरकार ने अपने इन अवांछित अपराधियों, नशेडि़यों, बलात्कारियों... को अमेरिका में ढकेल दिया है। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को वह कोरी बकवास मानता है। मुसलमानों का तो अमेरिका में प्रवेश ही प्रतिबंधित कर देना चाहता है। इसीप्रकार, तमाम तरह की गंदी से गंदी बातों को वह दहाड़ते हुए कहता घूम रहा है।

स्वपन दासगुप्त ने अपने लेख में इन सब बातों को स्वीकारा है।

लेकिन ! इसी ‘लेकिन’ में छिपी हुई है ट्रम्प के प्रति उनकी सारी सगोत्रीय ‘सहानुभूतियां’! आगे, वे साफ कहते हैं कि अमेरिका का एक तबका अमेरिका को इतना ही असभ्य और जंगली देखना चाहता है। और इसके लिये वे लोग दोषी हैं जो उस समाज में अल्पसंख्यकों के विषयों पर कुछ ज्यादा ही चिंतित रहते हैं। ये लोग उनकी भावनाओं का अनादर करते हैं जिनकी राष्ट्रीयता के विचार उनकी परंपरा में निहित है और सच है। ‘‘ट्रम्प की परिघटना अमेरिका जैसा था, उसे वैसा ही बनाये रखने के ‘श्वेत’ आक्रोश का एक अपरिष्कृत विस्फोट है।’’(The Trump phenomenon is a crude explosion of ‘white’ anger to keep America what it was.)

अमेरिका की तरह की एक महाशक्ति में जिस ट्रम्प के उदय को सारी दुनिया मानवता के अस्तित्व के लिये हिटलर से भी बड़े खतरे के रूप में देख रही है, स्वपन दासगुप्त अपने इस लेख के अंत में उसके पीछे की ‘जनता’ को अर्थात ‘जन-भावनाओं’ को समझने की बात कह रहे हैं!

इसे ही कहते हैं - बौद्धिक कमीनापन! दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों की एक सबसे बड़ी विशेषता। इन्हें खींसे निपोड़ कर अपनी ‘दुष्टताओं’ को स्वीकारने से कभी कोई परहेज नहीं हुआ करता है।

भारतीय पत्रकारिता में स्वपन दासगुप्त ऐसे चरित्र का एक सबसे प्रकट उदाहरण है। अंबर्तो इको की शब्दावली में इसे एक प्रकार की कलात्मक ‘जघन्यता’ भी कह सकते हैं, जिसके बारे में लगभग सभी सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धांतों में, प्राचीन युनान से लेकर आधुनिक काल तक, माना गया है कि एक प्रकार के निष्ठापूर्ण और प्रभावशाली कलात्मक चित्रण से किसी भी प्रकार की जघन्यता का उन्मोचन किया जा सकता है।’’
(“And, talking of artistic ugliness, let us remember that in almost all aesthetic theories, atlest from ancient Greek to Modern times, it has been recognized that any form of uglinesscan be redeemed by a faithful and efficacious artistic portrayal.” - On Ugliness, edited by Umberto Eco, Page- 19)


http://www.telegraphindia.com/1160311/jsp/opinion/story_73812.jsp

हिटलर और व्यवसायी वर्ग



-अरुण माहेश्वरी


विलियम शिरेर की किताब The Rise and Fall of Third Reich में हिटलर और जर्मनी के पूँजीपतियों के बीच सम्बन्धों का बहुत सजीव चित्र मिलता है। हिटलर के पतन के बाद नाजी पार्टी के बचे हुए नेताओं पर युद्ध के जघन्य अपराधों के लिए न्यूरेमबर्ग में मुकदमा चलाया गया था। इतिहास में यह मुकदमा न्यूरेमबर्ग मुकदमे के नाम से प्रसिद्ध है जिसके अन्त में कुछ को मृत्युदण्ड और अनेक लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इन अपराधियों में एक व्यक्ति था बाल्थर फंक। वह जर्मनी के एक प्रमुख आर्थिक अखबार ‘बर्लिनर बोरसेन जेतुंग’ का एक समय सम्पादक था। सम्पादन के इस काम को छोड़कर वह नाजी पार्टी में शामिल हो गया तथा नाजी पार्टी और जर्मनी के महत्वपूर्ण व्यापारी घरानों के बीच वह सम्पर्क-सूत्र की तरह काम किया करता था।

न्यूरेमबर्ग मुकदमे की सुनवाई के दौरान उसने बताया था कि उसके कई उद्योगपति मित्रों ने, खासतौर पर राइनलैण्ड की बड़ी-बड़ी खदानों की कम्पनियों के मालिकों ने, उससे नाजी आन्दोलन में शामिल होने के लिए कहा था ’’ताकि उस पार्टी को निजी उद्योगों के पक्ष में लाया जा सके।’’ फंक ने यह बताया कि 1931 तक आते-आते ’’मेरे उद्योगपति मित्रों को तथा मुझे यह पूरा विश्वास हो गया था कि वह दिन दूर नहीं जब नाजी पार्टी सत्ता पर आनेवाली है।’’

हिटलर को उन दिनों ऐसे ही लोगों की तलाश थी जिनके पास धन हो। शिरेर लिखता है कि उस समय ’’पार्टी को चुनाव अभियान चलाने, व्यापक और सघन प्रचार के खर्च को चुकाने, सैकड़ों पूरा-वक्ती अधिकारियों को वेतन देने तथा अपने तुफानी दस्तों वाली निजी सेना को बनाए रखने के लिए भारी मात्रा में धन की जरूरत थी। उस समय तक उसके तूफानी दस्ते के सैनिकों की संख्या 1 लाख पर पहुँच गई थी। व्यवसायी और बैंकर ही हिटलर के कोष के सबसे बड़े स्रोत थे।’’ (शिरेर, पूर्वोक्त, पृ. 201-202)



युद्ध के बाद न्यूरेमबर्ग जेल में पूछताछ किए जाने पर फंक ने कुछ बड़े-बड़े उद्योगपतियों के नाम बताए थे जिनका हिटलर के साथ सम्बन था। कोयला खानों के शहंशाह इमिल किरदोर्फ ने सभी कोयला खान मालिकों से नियमित वसूली करके हिटलर के लिए ’’रुर ट्रेजरी’’ नाम का एक फंड ही तैयार किया था। उसके साथ हिटलर का सम्बन 1929 में कायम हुआ था। वह यूनियनों से बहुत नफरत करता था और हिटलर ने यूनियनों के विरुद्ध उसे अपने ’’तूफानी दस्ते’’ के जरिये सहायता पहुँचाई थी। किरदोर्फ के भी पहले से हिटलर को नियमित चन्दा देनेवाला व्यक्ति था फ्रिट्ज थाइसेन। ’’स्टील ट्रस्ट’’ के प्रमुख इस व्यक्ति ने बाद में एक पुस्तक लिखी : ’’आई पैड हिटलर’’, जिसमें उसने अपने इस कृत्य के लिए काफी दु:ख जाहिर किया। उसने 1923 में ही हिटलर को पहला तोहफा 1 लाख मार्क (25 हजार डालर) का दिया था। उसके साथ ही जर्मनी की यूनाइटेड स्टील वक्‍र्स का मालिक अलबर्ट वोग्लर भी नाजी पार्टी को नियमित रुपये दिया करता था। शिरेर ने बताया है : ’’1930 से 1933 के काल में सत्ता के मार्ग की अन्तिम बाधाओं को पार करने के लिए हिटलर को मुख्य रूप से उद्योगपतियों से जो कोष मिला उसका मुख्य हिस्सा कोयला और इस्पात उद्योग से आया था।’’ (शिरेर, पूर्वोक्त, पृ. 23)

फंक ने हिटलर को कोष देनेवाले और भी अनेक उद्योगपतियों और उनकी कम्पनियों के नाम बताए थे। कुल मिलाकर यह सूची काफी लम्बी है। इनमें जर्मनी के विशाल रसायन कार्टल आई. जी. फारबेन के प्रमुख डॉयरेक्टर जार्ज वान स्निजलर, पोटेशियम उद्योग के अगस्त रोस्टर्ग, अगस्त दिहन, हम्बर्ग-अमेरिका लाइन के कूनो, शक्तिशाली कोलोन उद्योग के ओटो वुल्फ, डच बैंक, कामर्स एंड प्राइवेट बैंक की तरह ही कई प्रमुख बीमा कम्पनियों और बैंकों के मालिक, जर्मनी की सबसे बड़ी बीमा कम्पनी एलियांज के मालिक शामिल थे जो हिटलर को नियमित कोष जुटाकर दिया करते थे। हिटलर के एक आर्थिक सलाहकार विल्हेल्म केपलर का दक्षिण जर्मनी के उद्योगपतियों से गहरा सम्बन था। उन्होंने व्यवसायियों का एक अलग से संगठन ही बनाया था जो हिटलर के ‘तूफानी दस्ते’ के प्रमुख हिमलर के प्रति समर्पित था। इस संगठन का उन्होंने नाम रखा था ‘सर्कल ऑफ फ्रेंड्स ऑफ इकोनोमी’।

’’कुछ उद्योगपतियों ने शुरू में हिटलर का साथ नहीं दिया था, किन्तु बाद में उन्होंने भी दबाव में आकर या बहती गंगा में हाथ धोने के इरादे से नाजी पार्टी के साथ खुद को कुछ हद तक जोड़ लिया था। ऐसी कम्पनियों में जर्मनी की सबसे बड़ी बिजली के उपकरण बनानेवाली कम्पनी सीमेंस भी थी।इस प्रकार जाहिर है कि सत्ता पर आने के हिटलर के अन्तिम अभियान में इसके पास उद्योगपतियों की विशाल धनराशि उपलब्ध थी। यद्यपि हिटलर का प्रचारमन्त्री गोयेबल्स तब भी रुपये की कमी की बात किया करता था, लेकिन सारे तथ्य बताते हैं कि हिटलर को उद्योगपतियों से ही करोड़ों मार्क प्रति महीने मिलते थे।

इन तमाम उद्योगपतियों ने हिटलर को इस प्रकार भारी धन देकर कौन सा महान काम किया था, इसे कुछ ने तो युद्ध के दौरान ही तथा कुछ ने युद्ध के बाद खुलेआम माफियाँ माँग कर स्वीकारा था। सन् 1930 में राइख बैंक के अयक्ष पद से इस्तीफा देकर 1931 में हिटलर से मिलने और अपनी पूरी शक्ति लगाकर हिटलर को बड़े-बड़े उद्योगपतियों, बैंकरों आदि के सम्पर्क में लानेवाले डॉ. स्काख्त, जिनके बारे में कहा जाता है कि हिटलर को सफलता की अन्तिम सीढि़याँ चढ़वानेवालों में वे एक सबसे प्रमुख व्यक्ति थे, ने हिटलर के चांसलर बनने के पहले ही उसे एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था : ’’मुझे कोई सन्देह नहीं है कि आज की परिस्थितियाँ आपको चांसलर बना देगी।...आपका आन्दोलन अपने अन्दर इतने बड़े सत्य और आवश्यकता को धारण किए हुए है कि विजय ज्यादा दिन तक आपसे दूर नहीं रह सकती...निकट भविष्य में मेरा कार्य मुझे कहाँ ले जाएगा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, यहाँ तक कि आप मुझे किले में बन्दी पड़ा हुआ देख सकते हैं, तब भी आप मुझे हमेशा अपना वफादार समर्थक मान सकते हैं।’’ (शिरेर द्वारा उद्धृत, पृ. 205)

स्काख्त के इस पत्र पर टिप्पणी करते हुए शिरर ने लिखा है कि नाजी आन्दोलन का ’’एक बड़ा सत्य’’ जिसे हिटलर ने कभी छिपाया नहीं, वह यह था कि यदि वह पार्टी कभी जर्मनी की सत्ता पर आ गई तो वह जर्मनी से व्यक्तिगत स्वतंत्रता को, जिसमें डॉ. स्काख्त और उनके व्यवसायी दोस्तों की स्वतंत्रता भी शामिल है, समाप्त कर देगी। इसे समझने में राइख बैंक के मिलनसार अयक्ष, जिस पद पर हिटलर के काल में वे फिर लौट आए थे, तथा उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्र में उनके सहयोगियों को थोड़ा समय लगा। डॉ. स्काख्त हिटलर के चांसलर बनने के बारे में ही एक सही भविष्यवक्ता साबित नहीं हुए, बल्कि फ्यूहरर (हिटलर का लोकप्रिय सम्बोान-अ.मा.) द्वारा उन्हें बन्दी बनाए जाने के बारे में भी उनकी भविष्यवाणी सच निकली। किले में नहीं, उन्हें बन्दी बनाकर यातना शिविर में रखा गया था, जो कहीं ज्यादा बदतर था, तथा हिटलर के ’’वफादार समर्थक’’ के रूप में नहीं (इस मामले में वे गलत साबित हुए) बल्कि उसके विरोधी के रूप में।’’ (शिरेर, पृ. 205)

सन् 1933 के जमाने से ही हिटलर ने यातना शिविरों का निर्माण शुरू कर दिया था। कँटीलें तारों से खुले स्थान को घेर कर बनाए गए ऐसे यातना शिविरों की संख्या एक वर्ष के अन्दर ही 50 हो गई थी। हिटलर के ’’तुफानी दस्ते’’ लोगों को डराने, उनसे ब्लैकमेल करने के लिए इन यातना शिविरों का खुलकर प्रयोग करते थे। इन शिविरों में सुनियोजित ढंग से हत्याएँ करायी जाती थी। बन्दियों को भूख और प्यास से तड़पाकर मार दिया जाता था। इनमें एक खासी संख्या व्यवसायी समाज के लोगों की भी थी जिनसे पैसे वसूलने के लिए हिटलर के लोग इन शिविरों का प्रयोग किया करते थे। ऐसे-ऐसे यातना शिविरों का भी गठन किया था जिनमें जिन्दा लोगों को पकड़-पकड़ कर उन पर विभिन्न प्रकार की जहरीली गैस आदि के प्रयोग किए जाते थे।


सन् 1936 तक आते-आते ही जर्मनी की अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त होने लगी थी। युद्ध की तैयारियों के लिए हिटलर ने वित्तमन्त्रालय से स्काख्त को हटाकर अपने विश्वासपात्रा गोरिंग को आर्थिक क्षेत्र का तानाशाह बना दिया था। स्काख्त को 1939 में राइख बैंक की अयक्षता से भी हटाकर उसकी जगह फंक को बैठा दिया गया। उद्योगों पर उद्योगपतियों का नियन्त्राण नहीं के बराबर रह गया। नाजी पार्टी ने उनका सिर्फ दुाधारू गाय की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जिन तमाम व्यवसायियों ने हिटलर के शासन का उत्साह के साथ स्वागत किया था और उसकी स्थापना में भरपूर योगदान किया था उनका मोहभंग होने में देर नहीं लगी। नाजी पार्टी की ओर से रोजाना उनके पास सिर्फ चन्दे की दरख्वास्तें आया करती थी। हिटलर के जरिए ट्रेड युनियनों को नष्ट करने तथा मजदूरों को सबक सिखाने की इच्छा रखनेवाले उद्योगपति अब स्वयं हिटलर की पार्टी के गुलाम बनकर रह गए थे। नाजी पार्टी को बिल्कुल शुरू से सबसे ज्यादा चन्दा देनेवाला फ्रिट्ज थाइसेन युद्ध शुरू होने के पहले ही जर्मनी छोड़कर भाग गया था। उसने उन्हीं दिनों लिखा कि ’’नाजी शासन ने जर्मन उद्योग का नाश कर दिया है।’’ वह जिनसे भी मिलता था, कहा करता था कि ’’मैं कितना बड़ा मूर्ख था।’’ (शिरेर, पूर्वोक्त, पृ. 360)

न्यूरेमबर्ग मुकदमे के बाद उद्योगपतियों से हिटलर के सम्पर्क स्थापित करनेवाले प्रमुख व्यक्ति फंक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।शिरेर ने हिटलर के काल में छोटे-छोटे व्यावसायियों की दुर्गति का भी एक चित्रा पेश किया है। ’’छोटे व्यवसायी, जो पार्टी के समर्थकों में प्रमुख थे तथा चांसलर हिटलर से बहुत कुछ की आशा रखते थे, उनमें से अनेक बहुत जल्द ही पूरी तरह नष्ट हो गए तथा उन्हें वेतन भोगी मजदूरों की श्रेणी में देखा जाने लगा।’’ (वही, पृ. 361)

जहाँ तक मजदूरों-कर्मचारियों का प्रश्न है, उन्हें तो हिटलर के काल में तमाम अधिकारों से शून्य हुक्म का गुलाम बनाकर छोड़ दिया गया था। उनकी जिन्दगी हमेशा ’’तूफानी दस्तों’’ के आतंककारी साये में बीतती थी।आर्थिक क्षेत्र में हिटलर की चरम तानाशाही से कुछ उद्योगों ने एक काल में अनाप-शनाप मुनाफा बटोरा, लेकिन हिटलर के शासन का अन्त जर्मनी के तमाम उद्योग-धंधों को विध्वस्त खंडहरों में बदलने के रूप में ही हुआ था।

हिटलर के काल में जर्मन उद्योगों की दुर्दशा के इस लम्बे बयान से हमारा तात्पर्य यही है कि आज भारत में फासिस्ट तानाशाही की शक्तियों में व्यवसायियों का जो तबका अपनी भलाई के स्वप्न देख रहा है, वह इतिहास-बोा से पूरी तरह शुन्य एक बहुत ही अदूरदर्शी और तात्कालिक स्वार्थों तक सीमित तबका है। राजनीतिक तानाशाही का अन्तिम परिणाम अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी चरम अराजकता के अलावा और कुछ नहीं होता क्योंकि आर्थिक क्षेत्र में यह तानाशाही शक्तिशाली और सत्ता के निकट रहनेवाले व्यवसायियों के हितों में पूरी अर्थव्यवस्था के अन्य तमाम संघटकों का बुरी तरह नुकसान पहुँचाती है। परिणामत: सिर्फ असंतुलन और अराजकता ही पैदा होते हैं।

भारत में आर एस एस ने अपनी तानाशाही को स्थापित करने के लिए साम्प्रदायिकता का जो ताण्डव शुरू किया है उसके घातक परिणाम अभी से सामने आने लगे हैं। अभी तो आर एस एस के लोग सिर्फ अपने राजनीतिक विरोधियों तथा स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवियों को ही धमकी भरे पत्रों आदि से डराया-ामकाया करते हैं। यदि इनकी कुछ और शक्ति बढ़ी तो वे ऐसे तमाम लोगों को भी डराया-धमकाया करेंगे जो उनके आदेश के अनुसार उनके अभियानों के लिए चन्दा देने से इन्कार करेंगे।

भारतीय उद्योग का हित भी अन्ततोगत्वा भारत की एकता और अखण्डता में ही है। आर एस एस का रास्ता इस एकता और अखण्डता के बिल्कुल विपरीत है। इसलिए अपने अन्तिम निष्कर्षों में यह रास्ता कभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी भी रूप में हितकारी नहीं हो सकता। हिटलर के काल के जर्मनी के अनुभवों से यही सबक मिलता है।


सोमवार, 7 मार्च 2016

हिटलर से उम्मीद बांधे कलाकारों की ट्रेजेडी की कहानी







-अरुण माहेश्वरी

यह टिप्पणी कला और संस्कृति के क्षेत्र के उन लोगों के लिये है, जिनके मन में अभी भी मोदी जी और उनकी सरकार के बारे में अनेक भ्रम बने हुए हैं। अनुपम खेर जैसे लोगों के लिये भी है जो इस शासन में अपने लिये कुछ हासिल करने की फिराक में मोदी के नाम-जाप के अलावा और न जाने कैसी-कैसी विदूषकों की तरह की हरकतें करते घूम रहे हैं।

दुनिया के इतिहास में हिटलर के नाजी शासन का अपना एक ऐसा विरल अध्याय है, जिसमें हमारे इस मोदी-काल में बिल्कुल प्रारंभिक स्तर पर दिखाई दे रही अनेक  प्रवृत्तियों की प्रौढ़, वृद्ध और मृत्यु तक जाने वाली कहानियों को आसानी से पढ़ा जा सकता है। खास तौर पर, हिटलर के समय में वहां के सांस्कृतिक जगत की कैसी सूरत थी, हम यहां उसी इतिहास के कुछ पन्नों को पेश कर रहे है। इनसे अनुपम खेर जैसे हंसोड़ों की ही नहीं, इस शासन पर अब भी आशाभरी निगाहे टिका कर चुप बैठे तमाम ‘गंभीर’ बौद्धिकों की ट्रैजेडी को भी देखा जा सकता है।

अमेरिका के सदर्न कैलिफोर्निया के क्लेयरमोंट मैकेना कालेज में यूरोपीय इतिहास के एक प्रोफेसर है - जोनाथन पेट्रोपौलोस। अभी दो साल पहले ही, वर्षों के शोध के उपरांत उनकी एक बहुत महत्वपूर्ण किताब आई है - Artists Under Hitler : Collaboration and Survival in Nazi Germany।

हिटलर के जर्मनी के इतिहास के उन पन्नों को तो हम सभी जानते हैं कि कैसे उस काल में बहुत बड़ी संख्या में अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के लेखक और कलाकार जर्मनी छोड़ कर दूसरे देशों में शरण लेने के लिये मजबूर हुए थे। एक देश से इतनी बड़ी संख्या में प्रतिभाओं के पलायन का इसके पहले दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता था। हिटलर 30 जनवरी 1933 के दिन सत्ता पर आया और इसके बाद से ही अभिव्यक्ति की आजादी पर दबाव का एक सिलसिला शुरू हो गया था। 1939 तक तो हालत यह होगई कि लगभग 2500 जाने-माने लेखक जर्मनी छोड़ कर जा चुके थे। इसी बीच, 10 मई 1933 के दिन जर्मनी में बाकायदा अनेक महत्वपूर्ण लेखकों की पुस्तकों की होली जलायी गई थी।  तब गोयेबल्स ने कहा था कि ‘पुस्तकों से निकल रही इन लपटों में न सिर्फ पुराने युग का अंत हो रहा है, बल्कि इनके प्रकाश से एक नया युग प्रकाशित भी हो रहा है।‘

हिटलर के काल के जर्मनी के इन तथ्यों से हम परिचित है। लेकिन पेट्रोपौलोस की किताब का महत्व इस बात में है कि उन्होंने बहुत गहराई में जाकर जर्मनी के तत्कालीन (1933-1943) कला जगत के अपने एक खास इतिहास की खोज की है।

हिटलर जर्मनी में रातो-रात, एक सजे-सजाये पुतले की तरह अवतरित नहीं हुआ था। सत्ता पर आने के बाद भी हिटलर के हिटलर बनने की अपनी एक पूरी प्रक्रिया रही है जिसके तमाम राजनीतिक पक्षों पर थर्ड राइख के इतिहासकारों ने काफी विस्तार से लिखा है। हिटलर ने अपना चरम दमनकारी, सर्वाधिकारवादी और मानवद्रोही विध्वंसक रूप धीरे-धीरे ग्रहण किया था। 1933 के वक्त के जर्मनी और 1943 के वक्त के जर्मनी में जमीन आसमान का फर्क था। 1943 तक आते-आते जर्मनी का समाज एक सर्वाधिकारवादी अंधेरे से भरे समाज का रूप ले चुका था, यहूदियों की हत्याएं आम बात हो गई थी, विरोध की हर छोटी से छोटी आवाज को क्रूरतम हिंसा के साथ कुचला जाने लगा था और पूरे राष्ट्र को चरम युद्धोन्माद के जरिये एक सर्वव्यापी युद्ध में ढकेल दिया गया था।

पेट्रोपौलोस की किताब गहराई से बताती है कि हिटलर के जर्मनी में धीरे-धीरे बदलते हुए समय और उसमें जर्मनी के तत्कालीन आधुनिकतावादी कलाकारों का उस शासन के प्रति विचार और व्यवहार क्या था। उन्होंने जर्मनी के आधुनिकतावादी कला आंदोलन की दस बड़ी हस्तियों - वाइटर ग्रोपियस, पॉल हिंदेमिथ, गौटफ्रेड बेन, अन्स्र्ट बाइलाह, एमिल नोल्द, रिसर्ड स्ट्रास, गुस्ताफ ग्रुंडगेन्स, लेनी रिफेनस्थाल, आर्नो ब्रेकर, और अल्बर्त स्पीयर - के जीवन और विचारों को इसमें अपने गहन अध्ययन का विषय बनाया है।

अभिव्यंजनावादी, उत्तर-अभिव्यंजनावादी, क्यूबिज्म, नव-वस्तुवादी, प्रभाववादी आदि नाना आधुनिकतावादी धाराओं के कलाकारों का इस नये शासन के प्रति क्या दृष्टिकोण था, वे उसके बारे में कैसे-कैसे भ्रम पाले हुए थे उसका इसमें एक बहुत ही जीवंत चित्र मिलता है। अपनी अहम्मन्यता में डूबी हुई कला जगत की ये बड़ी-बड़ी हस्तियां अपने इर्द-गिर्द जो घट रहा है उसे देखने से इंकार कर रही थी। सोचती रहती थी कि परिस्थिति और नहीं बिगड़ेगी, सुधर जायेगी तथा नाजी शासन क्रमश: एक ‘सभ्य और मानवीय’ शासन का रूप ले लेगा। इसके साथ ही ये तमाम महोदय यह सपना भी देख रहे थे कि हिटलर के थर्ड राइख के पहले के वाइमर रिपब्लिक के समय वे जिन तमाम विशेषाधिकारों का भोग करते थे, वे सारे विशेषाधिकार उन्हें फिर से पहले की तरह ही हासिल हो जायेंगे।

लेकिन हाय ! इन सबके जीवन की ट्रेजेडी यह रही कि नाजियों के साथ निबाह करने की अपनी आंतरिक इच्छाओं के बावजूद ये तमाम लोग धीरे-धीरे अपनी जिंदगी के ऐसे कठिन मुकाम पर पहुंच गये कि युद्ध के काल तक आते-आते यहूदियों और कम्युनिस्टों के साथ ही इनकी जान पर भी बन आई,  और अंत में वे अपना सब कुछ छोड़ कर जर्मनी से पलायन करने के लिये मजबूर हुए। ये सभी जर्मनी के अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के आर्ट स्कूल, ‘बाउहाउस’ से जुड़े हुए थे। बाउहाउस के लोगों की 1919 से 1933 के काल में कला के सभी क्षेत्रों पर, पेंटिंग से लेकर स्थापत्य तक  ऐसी धाक थी कि वे इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनकी उपेक्षा करके कला और स्थापत्य का कोई भी आधुनिक आंदोलन एक कदम भी आगे जा सकता है!


बहरहाल, पाठकों की सुविधा के लिये बता दें, कि नाजी पार्टी हिटलर के शासन (1933-1945) को थर्ड राइख का शासन कहती थी। मध्ययुग के पवित्र रोमन साम्राज्य को फर्ट्  राइख और 1871 से 1918 के शासन को सेकंड राइख। लेकिन 1919 से 1933 तक के जर्मन साम्राज्य का एक और नाम था - वाइमर रिपब्लिक। वाइमर शहर में ही 1919 में जर्मनी की पहली संविधान सभा का गठन किया गया था।

जोनाथन पेट्रोपौलस ने बताया है कि 1933 के बाद अगस्त 1934 तक तो हिटलर की राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग से हमेशा अनबन लगी रहती थी। इससे भी बहुतों को यह उम्मीद बंधी थी कि हिटलर पर राष्ट्रपति की लगाम कसी रहेगी और वह अपनी मनमानी नहीं कर सकेगा। सेना की ओर से भी हिटलर के प्रति विरोध के समाचार आ रहे थे। इसके अलावा जर्मन समाज की सांस्कृतिक विविधता भी एक ऐसी सचाई थी जिसकी वजह से माना जा रहा था कि हिटलरी समरसता (Gleichschaltung)  का रोडरोलर वहां नहीं चल पायेगा।

पेट्रोपौलोस ने लिखा है कि उस काल के अधिकांश कलाकार किसी भी प्रकार के जन-संहार या नस्ली युद्ध के विरुद्ध थे, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे यहूदियों और कम्युनिस्टों के विरोधी नहीं थे, या उनमें अंधराष्ट्रवाद नहीं था। उनमें इस प्रकार की भावनाएं भी काफी थी। इसी वजह से वे हिटलर के थर्ड राइख में अपना भविष्य देख रहे थे। उन्होंने जब उस शासन में अपनी जगह बनाने की कोशिश की, तब किसी के पास भी जर्मनी के भविष्य की, युद्ध की कोई स्पष्ट धारणा नहीं थी। वे सोच भी नहीं सकते थे कि युद्ध में उतरने के साथ ही जर्मनी की क्या सूरत बनने वाली है!

इन्हीं कारणों से तमाम आधुनिकतावादी कलाकारों में शुरू में थर्ड राइख से कोई परहेज नहीं था। पेट्रोपौलोस ने उदाहरण दे देकर बताया है कि किस प्रकार यहूदी शिक्षा शास्त्री कुर्त हन को भी यह विश्वास था कि शासन की जिम्मेदारियां हिटलर और नाजियों को सुधार देगी। अंत में हन जब जर्मनी से भाग कर इंगलैंड में शरण लेने के लिये मजबूर हुए, उसके पहले तक जर्मनी के लेक कांस्टेंस के सालेम में वे कुलीन जनों के लिये एक विद्यालय के निर्माण के काम की देख-रेख कर रहे थे।

इतिहासकार गोलो मॉन ने कुर्त हन के बारे में ही कहा था कि कुर्त हन का हिटलर ‘‘असली हिटलर नहीं था, बल्कि हन की कल्पना का हिटलर था जो उसके राजनीतिक खयालों में वास करता था।’’

पेट्रोपौलोस ने इन सभी कलाकारों के उदाहरण दे देकर बताया है कि ये सब अपने अहम में इतने मुब्तिला थे कि अपने समय के प्रति अंधे हो चुके थे। कुछ तो अपनी भारी अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के कारण खुद को आधुनिक सोच का भगवान मान बैठे थे। 1938 में न्यूयार्क में बाउहाउस की एक शानदार रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी हुई थी जिसमें बाउहाउस के संस्थापक ग्रोपियस तो सितारे की तरह चमक रहे थे। ये सभी सांस्कृतिक व्यक्तित्व मानते थे कि उनके किये कामों का इतना अधिक महत्व है कि उनकी अवहेलना करके कोई कला प्रदर्शनी हो ही नहीं सकती है। वे अपने को एक नई धारा का प्रवत्र्तक मानते थे और उन्हें विश्वास था कि कोई भी शासन में क्यों न आ जाएं, उनकी अनदेखी नहीं कर सकता है। सन् ‘20 के जमाने में तो चारों दिशाओं में उनके घोड़े दौड़ा करते थे। प्रोफेसरशिप, डायरेक्टरशिप, वाणिज्यिक सफलताएं, नाम-दाम - सब उनके कदम चूमा करते थे। मजे की बात यह है कि उसी महान ‘बाउहाउस’ की कथित प्रतिष्ठा की जरा भी परवाह किये बिना नाजी सरकार ने 1933 में उसे रातो-रात बंद कर दिया। जो महोदय उस समय उसके निदेशक थे, उन्हें बाद में भाग कर अमेरिका में शरण लेनी पड़ीं।

कहना न होगा, ठीक उसी तर्ज पर मोदी सरकार भारत में साहित्य अकादमी की स्वायत्तता पर हमले कर रही है और जेएनयू को तो बंद ही कर देने की फिराक में है।


बहरहाल, पेट्रोपौलोस कहते हैं कि यह सच है कि नाजी जर्मनी के समय की सांस्कृतिक जिंदगी बेहद जटिल थी। फासीवाद आधुनिकतावाद को पराजित नहीं कर पाया था और हिटलर के पूरे बारह साल के शासन में भी वह एक प्रकार का अनसुलझा मुद्दा ही रह गया था। लेकिन उनका सवाल है कि अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के उन सांस्कृतिक व्यक्तित्वों का क्या किया जाएं, जिन्होंने नाजी शासन में अपनी जगह बनाने की हर संभव कोशिश की थी !

चार सौ पृष्ठों की इस पुस्तक के उपसंहार में पेट्रोपौलोस ने जर्मनी के पूर्व चांसलर हेल्मुट कोह्ल के पसंदीदा लेखक अन्स्र्ट जुंगर का उल्लेख किया है जो ‘फासीवादी सूरज के बहुत निकट तक उड़ कर चला गया था’। उसके बारे में इतिहासकार हांस-उलरिस व्हेला की राय थी कि ‘‘वह आधुनिक जर्मन सांस्कृतिक इतिहास का सबसे बड़ा अपराधी था।’’ पेट्रोपौलोस ने सवाल उठाया कि वह ‘अपराधी’ कैसे हुआ ? और इसके जवाब में लिखा कि उसने युद्ध की महिमा का बखान किया था, उसका सौन्दर्यीकरण किया था, जिसने एक पूरी पीढ़ी के अवबोध को प्रभावित किया।


गौर करने की बात यह है कि हमारे देश का भी 1975 के आंतरिक आपातकाल के वक्त का तानाशाही निजाम का एक छोटा सा अनुभव रहा है। उस समय इंदिरा गांधी की एक व्यक्ति की तानाशाही का रूझान उग्र रूप में सामने आया था और नाना कारणों से वामपंथी राजनीति विभाजित थी। इंदिरा गांधी की तानाशाही की अपनी खास पृष्ठभूमि थी। ऐसा नहीं था कि वे राजनीति की दुनिया की ऐसी किसी धारा के बीच से आई थी, जिसका सर्वाधिकारवाद की ओर बढ़ना ही उसकी नियति रही हो। वे उस राष्ट्रीय कांग्रेस दल की राजनीति के अंदर से पैदा हुई थी, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि देश में तब तक संसदीय जनतंत्र का जो भी ढांचा खड़ा हुआ था, उसका श्रेय बहुलांश में उसी दल को जाता था। एक ऐसे दल के अंदर, यदा-कदा पैदा होने वाली तानाशाही प्रवृत्तियों के बारे में नाना प्रकार के भ्रमों का होना एक हद तक स्वीकारा जा सकता है।

लेकिन आज के भारत की स्थिति वह नहीं है। आज संसदीय जनतंत्र की प्रक्रिया के अंदर से ही हमारे देश में एक ऐसे संगठन का शासन कायम हो गया है जो निर्विवाद तौर पर हिटलर और मुसोलिनी की परंपरा से जुड़ा हुआ संगठन है। जिसकी राजनीति की मुख्य धुरी ही समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके एक सर्वाधिकारवादी शासन को कायम करना रहा है। और इस सरकार के मुखिया के तौर पर जो व्यक्ति आया है उसका गुजरात का इतिहास इस बात की और भी ठोस रूप में पुष्टि करता है। हिटलर ने अपनी पुस्तक ‘मीन कैम्फ’ में जैसे पहले ही अपने तमाम लक्ष्यों को साफ कर दिया था, उसी प्रकार आरएसएस के उद्देश्य भी दुनिया से छिपे हुए नहीं हैं।

ऐसे समय में, हिटलर के जमाने के जर्मनी की सांस्कृतिक दुनिया की यह छोटी सी तस्वीर निश्चित तौर पर बहुत अर्थपूर्ण है। इसमें कई लोग अपनी सूरत देख सकते हैं ।


शुक्रवार, 4 मार्च 2016

जेएनयू संघर्ष के जरिये भारत में एक नये जनतांत्रिक वामपंथ का बीजारोपण हुआ


अरुण माहेश्वरी

जेल से रिहाई के बाद कल, 3 मार्च को जेएनयू परिसर में कन्हैया कुमार के भाषण को देश और दुनिया के करोड़ों लोग सुन चुके हैं, सुन रहे हैं और आने वाले काफी दिनों तक सुनते रहेंगे। अभी इस भाषण की गूंज-अनुगूंज ने भारतीय राजनीति की अनेक झूठी-सच्ची आवाजों को पीछे छोड़ दिया है और साफ तौर पर भारतीय राजनीति के एक नये चरण की पद-ध्वनि का संकेत दिया है।

सन् 2014 में भारत के समूचे मीडिया पर नरेन्द्र मोदी का कब्जा था। धन की अपार शक्ति के सामने सब भौचक थे। और इतने सुनियोजित ढंग से मोदी जी की आवाज के शोर को गुंजाया गया था कि उसमें बुद्धि और विवेक की बाकी सारी आवाजें डूब सी गयी थी। सन् 2002 के बदनाम मोदी को पी सी सरकार के जादू के सम्मोहन से जैसे किसी अलादीन के चिराग का रूप दे दिया गया था। पलक झपकते भारत एक स्वर्ग राज्य में तब्दील हो जायेगा। और इस पूरे ताम-झाम का फल हुआ कि 31 प्रतिशत मतदाता झांसे में आगये। चुनाव के अपने गणित से 31 प्रतिशत बाकी 69 प्रतिशत से इतना भारी होगया कि मोदी जी की पार्टी को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल गया।

अभी इस सरकार को बने दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं। लेकिन देश भर से मोहिनी जादू का असर पूरी तरह से छंट चुका है। व्यापक जनता को ठगे जाने, धोखा खा जाने के अवसाद ने घेरना शुरू कर दिया है। दिल्ली, बिहार से लेकर इधर के सभी छोटे-बड़े चुनावों से एक ही आवाज आ रही है - मोदी अब और नहीं! देश का सांप्रदायिक विभाजन नहीं चाहिए! भाई-भाई को लड़ा कर अपनी राजनीति की गोटियां लाल करने वाले नहीं चाहिए!
लेकिन असल में क्या चाहिए, इसे लेकर ऊहा-पोह की स्थिति आज भी बनी हुई है। चुनने के लिये तो लोग मोदी कंपनी की जगह किसी भी दूसरे को चुन देने के लिये तैयार है, लेकिन कोई ऐसा विकल्प जिसपर पूरा भरोसा किया जा सके, जो लोगों की आस्था और विश्वास को हासिल कर सके, इसकी साफ सूरत आज भी उभर कर सामने नहीं आ पाई है। राहुल गांधी, सीताराम येचुरी और अरविंद केजरीवाल के तर्क और तेवर पर लोगों की आशाभरी निगाहें होने के बावजूद एक नये, जनतांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के निर्माण के लिये व्यापक समाज के पैमाने पर जिस स्तर की गोलबंदी की जरूरत है, समाज के सभी दलित, उत्पीडि़त, वंचित, जनतंत्रप्रेमी और देशभक्त लोगों के जिस व्यापकतम दीर्धस्थायी मोर्चे की जरूरत है, उसके विश्वसनीय संकेत लोगों को नहीं मिल रहे हैं। आम लोगों में आज दिखाई दे रही बेचैनी के पीछे ऐसे नये विकल्प की उनकी तीव्र तलाश भी एक बहुत बड़ा पहलू है, जिसके अभाव में लोगों का आक्रोश अराजक आंदोलनों के रूप में भी अक्सर व्यक्त होने लगता है।

एक ऐसे माहौल में, रोहित वेमुला की कुर्बानी, जेएनयू का वर्तमान आंदोलन और उसमें कन्हैया की तरह के एक प्रतिभाशाली, तेज-तर्रार छात्र नेता का साफ तौर पर जन-नेता के रूप में उभार बहुत ही अर्थपूर्ण है। यह भारत में जारी व्यापक जन-आलोड़न से पैदा हुई तरल राजनीतिक स्थिति के अंदर जैसे नये सिरे से रवे तैयार करने, स्फटिक बनाने, crystalisation की प्रक्रिया का प्रारंभ है।

जो लोग कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी, उसपर देशद्रोह की तरह की बदनाम धारा के प्रयोग, अदालत के परिसर और अदालत के कमरे तक में उसकी पिटाई, उसकी पतलून को गीला कर देने के अश्लील ब्यौरों में अपने पाशविक उन्माद के साथ डूबे हुए थे, शायद वे भी कल कन्हैया कुमार के राष्ट्र के नाम संबोधन को अपने कमरों के किसी कोने में दुबक कर सुन रहे थे, देख रहे थे। यदि उनके अंदर मनुष्यता का जरा सा अंश भी शेष होगा, तो शायद न्याय की मांग के लिये लड़ रहे इस साहसी छात्र नेता के अद्दम्यता को सराह भी रहे होंगे। निश्चित तौर पर अपनी डंडा-छाप देशभक्ति पर उन्हें लज्जा भी आ रही होगी।

आइये, यहां हम कन्हैया कुमार के पूरे भाषण पर एक नजर डालते हैं। उनके इस भाषण का टेप तो हम पहले ही साझा कर चुके हैं।

कन्हैया कुमार ने अपने भाषण का प्रारंभ स्वाभाविक तौर पर जेएनयू के अपने सभी छात्र साथियों, अध्यापकों और कर्मचारियों के साथ ही उस परिसर और उसके आस-पास के दुकानदारों और उनके कर्मचारियों के प्रति और इन सबके साथ ही जेएनयू के साथ अपनी एकजुटता जाहिर करने वाले देश भर के मजदूरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों, मीडिया के चुनिंदा लोगों और नागरिक समाज के लोगों के प्रति आंतरिक आभार व्यक्त करते हुए किया । जेएनयू की लड़ाई रोहित वेमुला को न्याय दिलाने की लड़ाई के साथ एक और अभिन्न है, इसे भी उन्होंने अपने भाषण की शुरूआती पंक्तियों में ही कह दिया। लेकिन गौर करने की बात यह थी कि इस लड़ाई में कदम से कदम मिला कर चल रहे जनता के सभी तबकों का हार्दिक अभिनंदन करने के बावजूद कन्हैया कुमार ने ऐसी किसी ‘सर्वोदयी’ सदाशयता का ढोंग नहीं किया जो राजनीति के बड़े-बड़े अखाड़ेबाजों, पुलिस के पूर्वाग्रह-ग्रस्त अफसरों और मीडिया के बिकाऊ एंकरों और उनके चैनलों पर आने वाले दो-टकिया स्पीकरों की घिनौनी हरकतों को अनदेखा कर दे। कन्हैया ने जिस लहजे में इन सभी शक्तिवानों की हंसी उड़ाई, अनायास ही नागार्जुन की पंक्तियां याद आ गयी -

जली ठूंठ पर बैठ कर, गई कोयलिया कूक
बाल न बांका कर सकी, शासन की बंदूक।

कन्हैया ने कहा, वे किसी से नफरत नहीं करते। एबीवीपी से भी नहीं। सच यह है कि जेएनयू का एबीवीपी परिसर के बाहर के एबीवीपी से ज्यादा रेशनल है। हम सच्चे लोकतांत्रिक है। वे हमारे दुश्मन नहीं, हम उन्हें अपना विपक्ष मानते हैं। हमारा आंदोलन सही को सही और गलत को गलत कहने का आंदोलन है।

कन्हैया ने  जेएनयू को आंदोलन एक स्वत:स्फूर्त आंदोलन बताते हुए कहा कि हमारे विरोधियों की सारी करतूते पूरी तरह से सुनियोजित थी। एफआईआर में हम पर जो अभियोग लगाये गये थे, उन्हें पहले ही एबीवीपी के पर्चें में लिख दिया गया था।

कन्हैया ने रोहित वेमुला की शहादत के साथ ही बाबा साहब अंबेडकर की विरासत और उनके दिये संविधान का उल्लेख किया। एक लोकतांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष और समाजवादी भारत के निर्माण के उद्देश्यों के प्रति अपनी अटूट निष्ठा को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि अभी जो चल रहा है, वह चल नहीं सकता है। बदलाव ही शाश्वत सच है।

जेल के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसके पहले तक हम व्यवस्था के बारे में पढ़ते थे, खूब पढ़ते थे, लेकिन इस बार उसे झेला है। कन्हैया ने मोदी जी की चुटकी ली। कहा कि उनसे तमाम मतभेदों के बावजूद हम भी उनके ट्वीट की बात को मानते हैं - सत्यमेव जयते। लेकिन उन्होंने सिडिशन एक्ट का छात्रों के खिलाफ प्रयोग एक पॉलिटिकल टूल की तरह किया है। सचाई यह है कि मोदी जी उनके गांव के स्टेशन पर जादू दिखा कर झूठी अंगूठियां बेचने वाले एक सेल्समैन की तरह है।

कन्हैया ने जोर देकर कहा कि वैसे तो भारत के लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर है, लेकिन इस बार का तमाशा बहुत बड़ा था। काला धन लायेंगे, महंगाई भगायेंगे। हर आदमी के खाते में पंद्रह लाख रुपये जायेंगे। सबका साथ, सबका विकास। इस बार लोग इनकी बातों को कभी नहीं भूल पायेंगे।

हमारे स्वत:स्फूर्त आंदोलन के खिलाफ डाक्टर्ड वीडियो बनाये जा रहे थे। अब जेएनयू के डस्टबिन में कंडोम गिने जा रहे हैं। सचाई यह है कि यह पूरे जेएनयू पर हमला है। आक्यूपाई यूजीसी, रोहित वेमुला की हत्या से ध्यान हटाने के लिये किया गया हमला। और इसमें प्राइम टाइम (टाइम्स नाउ) का एक्स आरएसएस एंकर शामिल था।

कन्हैया ने भारत की सीमाओं पर अपने प्राणों की बाजी लगा कर सीमा की हिफाजत करने वाले सेना के जवानों को सलाम किया। इसके साथ ही पार्लियामेंट में इन जवानों की बात करने वालों से पूछा कि वे क्या आपके भाई है ? ये जवान हमारे भाई, हमारे पिता है, भारत के उन गरीब किसानों के बेटे हैं जिन्हें आप भूख से दम तोड़ने या आत्म-हत्या करने के लिये मजबूर किया करते हैं। क्या प्राइम टाइम के दोटकिया स्पीकर इसे जानते हैं ?

कन्हैया ने जेल के सिपाहियों से अपनी बातों के हवाले से कहा कि ये वर्दीधारी सिपाही बड़े लोगों के बेटे नहीं है। ये गरीब किसानों, अनुसूचित जातियों और जन-जातियों के लोग हैं। हरियाणा में अभी के जाट आंदोलन पर वे कह रहे थे - जातिवाद बहुत बुरी चीज है। एक सिपाही ने उससे कहा कि पहले मैं सोच रहा था कि तुम आओगे तो तुम्हें खूब पीटूंगा, लेकिन तुमसे बात करने के बाद अब उन्हें पीटने की इच्छा होती हैै ।

कन्हैया ने बाबा साहब के हवाले से जनतंत्र के महत्व की बातें करते हुए कहा कि लेनिन जनतंत्र को समाजवाद का अविभाज्य हिस्सा मानते थे। इन लोगों को विज्ञान का यह नियम भी नहीं मालूम कि जितना दबाओगे, नीचे से उतना ही ज्यादा प्रेसर पैदा होगा। कमजोरों के उत्थान और उनकी आजादी की लड़ाई कभी नहीं रुकेगी।

कन्हैया ने अपने भाषण में आत्म-समीक्षा की बात भी की। वे जेएनयू के छात्रों को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि अक्सर हम अपनी बातों को इतनी भारी-भरकम पदावली में कहा करते हैं, जिसे भारत का साधारण आदमी समझ नहीं पाता है। बातें उसके सिर के ऊपर से निकल जाती है। जरूरत है हमें आम लोगों के स्तर पर उतर कर उनसे बात करने की।

उन्होंने जेल में दी गई ब्लू और लाल, दो कटोरियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उन दो कटोरियों में मुझे भावी भारत की तस्वीर दिखाई दे रही थी। आनेवाले दिनों में हम एक ऐसी सरकार बनायेंगे जो सचमुच सबके लिये न्याय और सबकी समानता को सुनिश्चित कर सके।

और, जहां तक सरकार के दमन का सवाल है, कन्हैया ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा कि ‘जब तक जेल में चना रहेगा, आना-जाना लगा रहेगा।’ आज ही प्रधानमंत्री संसद में स्तालिन और ख्रुश्चेव की बात कर रहे थे। मेरी इच्छा हुई कि टीवी के अंदर घुस कर उनके पास जाऊं और धीरे से उनके कोट को खींच कर कहूं कि जरा हिटलर की बात भी कह दीजिये। मुसोलिनी की भी, जिनसे आपके लोगों ने काली टोपी ली है। जिनसे आरएसएस के लोग जाकर मिले थे और जर्मनी की तर्ज पर लोगों को भारतीयता सिखा रहे थे।

कन्हैया ने प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ का भी उल्लेख किया । कहा कि आज लगभग तीन महीने बाद मैंने अपनी मां से बात की है। हम आपस में दर्द की बात कर रहे थे। जिन्हें समझ में यह बात आती है वे रोते हैं, और जिन्हें नहीं आती वे हम पर हंसते हैं। मैं कहता हूं, आप ‘मन की बात’ करते हैं, कभी मां की बात भी कर लीजिए। हम भी किसी मां के बेटे हैं।

कन्हैया ने देश की मौजूदा स्थिति को एक खतरनाक स्थिति बताया। कहा कि उस देश की कल्पना कीजिए जिस देश में लोग ही न हो। जेएनयू एक ऐसा विश्वविद्यालय है जहां के छात्रों में साठ प्रतिशत लड़कियां है। हम यहां हर स्तर पर रिजर्वेशन की पॉलिसी लागू करने की कोशिश करते हैं। आज हालत यह है कि सीताराम येचुरी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और डी. राजा को देशद्रोही करार दिया जा रहा है। रेशनलिटी खत्म हो रही है। गालियां और धमकियां दी जा रही है । वे भूल गये है कि 69 प्रतिशत लोगों ने उनके खिलाफ मतदान किया है। वे हमेशा के लिये जीत कर नहीं आए हैं। आप कभी भी सच को झूठ नहीं बना पायेंगे। सिर्फ झूठ को ही झूठ बनाया जा सकता है।

वर्तमान शासन की कड़ी आलोचना करते हुए कन्हैया ने कहा कि ये लोग जनता का ध्यान बंटाने की फिराक में हैं। अब आगे राम मंदिर का मसला उछाला जा सकता है। जेल में एक सिपाही मुझसे धर्म के बारे में बात कर रहा था। हमने कहा, आप जानते हैं कि भगवान ने सृष्टि की रचना की है। लेकिन कुछ लोग है जो भगवान के लिये कुछ रचने का गुमान रखते हैं।

कन्हैया ने सुब्रह्मण्यम स्वामी को चुनौती देते हुए कहा कि वे जेएनयू आएं और खुले में हमसे तर्कों के आधार पर विमर्श करें। वे तर्क से यह साबित करें कि जेएनयू को क्यों चार महीनों के लिये बंद कर दिया जाना चाहिए। अगर वे ऐसा कर पाते हैं तो हम उनकी बात मान लेंगे। अन्यथा वे इस प्रकार की बकवास को बंद करें। कन्हैया ने कहा कि ऐसे तमाम लोगों की लगाम नागपुर के हाथ में है। इनके वकील हो, छात्र हो, साधू हो - सबके प्रदर्शनों में एक ही झंडा, एक ही फेस्टून, एक ही बैनर को लहराया जाता है।

भाषण के अंत में उन्होंने अपनी लड़ाई को एक बहुत लंबी लड़ाई बताया। यह भारत के गरीबों की लड़ाई है। कोई इसे दबा नहीं सकता। जो भी हमें बांटना चाहता है, उसका डट कर मुकाबला करना होगा।

आवाज दो...हम एक हैंं। और अंत में उन्होंने आजादी का अपना प्रसिद्ध दीर्घ-नारा दिया।

और इसप्रकार, जेएनयू परिसर में एक नये, जनतांत्रिक वामपंथ की आधारशिला रखी गई। नये भारत की लड़ाई के एक नये और व्यापक अभियान का सूत्रपात हुआ। हम सभी टेलिविजन के चैनलों पर इस नये इतिहास के प्रारंभ-बिंदु के साक्षी बनें।

यहां हम आज एनडी टीवी पर कन्हैया के उस साक्षात्कार को साझा कर रहे हैं जिसे रवीश कुमार ने लिया है -

https://www.youtube.com/watch?v=uT5h_Ah7A2o

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

‘हमें न्यायालय में पूरी आस्था है !’


कन्हैया को बंदी बने पंद्रह दिन बीत गये हैं।

उसे जब गिरफ्तार करके दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में पेश किया गया और कुछ गुंडा वकीलों ने उस पर और पत्रकारों पर हमला किया तब सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करके पटियाला हाउस अदालत की सुनवाई को रुकवा दिया था। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से ऐसा लगा था कि जैसे वह कन्हैया, एक नागरिक के प्रति हो रहे प्रकट अन्याय के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय दे रहा है।

लेकिन दो दिन बाद, जब पूर्व एडवोकेट जैनरल सोली सोरबजी ने सुप्रीम कोर्ट में कन्हैया की जमानत की अर्जी पेश की तब सुप्रीम कोर्ट की पूर्व की संवेदनशीलता पर न्याय प्रक्रिया की परंपरा और शील का प्रश्न भारी साबित हुआ। कन्हैया की अर्जी को अस्वीकारते हुए निर्देश दिया गया कि वह इस प्रकार, अब तक के स्वीकृत कायदों का उल्लंघन करते हुए सीधे अपने हाथ में इस मामले को नहीं ले सकता। इससे एक गलत संदेश जायेगा कि नीचे की अदालतें नागरिक को न्यायिक सुरक्षा प्रदान करने में असमर्थ है। इसीलिये कन्हैया को दिल्ली हाईकोर्ट में अर्जी देने के लिये कहा गया।

इसप्रकार, न्याय से ज्यादा महत्वपूर्ण होगई न्याय की प्रक्रिया। शास्त्र की आत्मा ज्ञान से निकल कर कर्मकांड में प्रविष्ट हो गई !

बहरहाल, दिल्ली हाईकोर्ट में कन्हैया की अर्जी लगाई गई। इसीबीच, दिल्ली पुलिस का जो कमिश्नर खुले आम कह रहा था कि वह कन्हैया की जमानत का विरोध नहीं करेगा, अचानक उसने अपने चरित्र के अनुसार रंग बदल लिया। जेएनयू के और दो छात्रों ने आत्म-समर्पण किया और उनके साथ बैठा कर पूछ-ताछ करने के नाम पर कन्हैया को फिर जेल से उठा कर एक दिन के लिये पुलिस थाने में रखा गया। जहां तक जेल हिरासत का सवाल है, कहते हैं कि देशद्रोह का अभियुक्त होने के नाते उसे उसी सेल में रखा गया है जिसमें फांसी के पहले अफजल गुरू को रखा गया था।

अर्थात, कन्हैया न सिर्फ हिरासत में है, बल्कि वह बाकायदा सजा की तमाम यातनाओं को भी भोग रहा है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और कानून की प्रक्रिया के प्रति निष्ठा कन्हैया को इस अन्याय और यातना से बचाने के मामले में अब तक कुछ नहीं कर पाए हैं।

कल, सोमवार को, हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई होगी। इसके परिणाम के बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ भी कहना मुश्किल ही लगता है। कौन जाने, सरकार और पुलिस उसे देश का नम्बर एक दुश्मन बताने के लिये कौन सी नई कहानी तैयार कर लें ! उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा की ऐसी-ऐसी धाराएं जड़ दें कि उसे जमानत देना अदालत के बूते के बाहर की बात हो जाए। देश की बाकी जनता को आज्ञाकारी पशु बने रहने का संदेश देने के लिये एक साधारण नागरिक के खिलाफ राज्य की पूरी शक्ति को यदि झोंक दिया गया तो कोई क्या कर सकता है !
सचमुच, आज चिड़ियों और एक बहेलिये की कहानी याद आती है। चिडि़यों ने यह सीख लिया था कि बहेलिया आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, लेकिन हम फंसेंगे नहीं। इसके बावजूद, जब बहेलिये ने जाल बिछाया तो इसी सीख को रटते-रटते सारी चिड़ियाएं उस जाल में फंसती चली गई।

हमारे नागरिक समाज में भी लोग ‘हमें न्यायालय में पूर्ण आस्था है’ रटते-रटते ही न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं के जाल में फंस कर नाना प्रकार की सजाएं भुगतते रहते हैं। जैसे आज कन्हैया भुगत रहा है। यही हमारी नियति है ।

हम भी यही कहेंगे - हमें न्यायालय में पूरी आस्था है।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

संसद में बजट पेश किये जाने की पूर्व बेला में विचार का एक बिंदु :


हमारे मित्र अजय तिवारी ने लिखा - "यूरोप फिर भयानक मंदी से घिर रहा है। 2008 की मंदी पूरी तरह ख़त्म हुई नहीं थी और यह नया दौर आन पड़ा।उनके अब तक के प्रयोग अल्पकालिक सिद्ध हुए हैं। ... मेरी राय यह है कि संकट पूँजीवादी वितरण प्रणाली की देन है। वह सामाजिक पूँजी को समेटकर क्रमशः कुछ लोगों के हाथ में इकठ्ठा करती जाती है। इसीसे विषमता जन्म लेती है। जब तक कोई व्यवस्था इस विषमता को घटाने का रास्ता नहीं निकालती तब तक इन ऊपरी उपायों से कोई लाभ होनेवाला नहीं है।"

इस पर हमने लिखा -
"यह अति-उत्पादन और मुनाफ़े की आम दर में गिरावट का संकट है जिसका पूँजीवाद के पास इलाज नहीं है । सामाजिक विषमता वाली बात आपने बिल्कुल सही कही है, लेकिन इसे दूर करने की बात ग़ैर-पूँजीवादी बात होगी । पूँजीवाद की तो चालक शक्ति है यह वैषम्य । अमेरिका में 1930 से 1970 के काल में आयकर में वृद्धिमान (progressive) दर को लागू करके और न्यूनतम मजूरी को लगातार बढ़ा के इस विषमता पर अंकुश लगाया गया था । कैनेडी के काल में अधिकतम आय पर 92 प्रतिशत आयकर हो गया था । और यही चार दशक अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था का स्वर्णिम युग रहा जब बेरोज़गारी नहीं रही और आर्थिक विकास की दर सबसे ज्यादा हो गई ।

सत्तर के दशक में वियतनाम युद्ध में पराजय और जर्मनी तथा जापान की तरह की युद्ध में पराजित शक्तियों की अर्थ-व्यवस्था में आए नये उभार और उनके द्वारा अमेरिकी उत्पादों को दी गई भारी चुनौती ने अमेरिका में एक प्रकार की पस्त-हिम्मती पैदा की और चार दशकों के बाद रेगन का रिपब्लिकन शासन आगया । रेगन ने आयकर की वृद्धिमान दरों के सूत्र को उलट दिया और न्यूनतम वेतन में वृद्धि पर रोक लगाने की कोशिश की । आयकर की अधिकतम दर को सिर्फ 28 प्रतिशत पर बाँध दिया गया । अमेरिका फिर क्रमश: बढ़ती हुई सामाजिक ग़ैर-बराबरी के चलते अंत में आर्थिक गतिरोध में फँसता चला गया ।

क्लिंटन और ओबामा के काल में आयकर की अधिकतम दर बढ़ कर 40 प्रतिशत पर गई, न्यूनतम मजूरी बढ़ कर फिर दस डालर प्रति घंटा हो गई, लेकिन इन्होंने भी वृद्धिमान दर के फ़ार्मूले को लागू नहीं किया । ओबामा ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य की अपनी योजना पर अडिग रह कर आम लोगों को थोड़ी अतिरिक्त राहत देने का काम किया है । आज डेमोक्रेटिक पार्टी में बर्नी सैंडर्स इसी बात पर कि वह आयकर में वृद्धिमान दर को लागू करेगा और न्यूनतम मजूरी को पंद्रह डालर प्रति घंटा पर ले जायेगा, हिलैरी क्लिंटन को कड़ी टक्कर दे रहा है । सैंडर्स का कहना है कि अमेरिका इस ग़ैर-बराबरी से थक गया है । संभव है कि इस बार क्लिंटन किसी तरह सैंडर्स की चुनौती का मुक़ाबला कर ले, लेकिन उसकी बातों ने अमेरिका के पचास साल से नीचे के मतदाताओं पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है । और, इस बात को लंबे दिनों तक दबा कर रखा नहीं जा सकेगा ।
कहना न होगा, अगर अमेरिका में फिर से चार दशक पहले की भावना विजयी होती है तो यह सारी दुनिया के लिये एक सबसे बड़ी ख़बर होगी । यह उस मिथक को तोड़ती है कि पूँजीपतियों को तमाम छूट देकर ही अार्थिक विकास मुमकिन है । बल्कि आर्थिक विकास और ख़ुशहाली की रामवाण दवा सामाजिक ग़ैर-बराबरी को ख़त्म करना है ।

अगर ऐसा होता है तो फिर कभी किसी को मुकेश अंबानी की तरह सात हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करके पाँच लोगों के परिवार के लिये एक घर बनाने की अश्लीलता के प्रदर्शन का मौक़ा नहीं मिलेगा । "

सवाल है कि क्या मोदी सरकार भारत की तरह के सबसे भयंकर ग़ैर-बराबरी से ग्रस्त समाज में सुधार के लिये ऐसे किसी वृद्धिमान आयकर के सूत्र और न्यूनतम मजूरी में वृद्धि तथा अधिकतम वेतन की सीमा तय करने के किसी रास्ते पर विचार भी करने के लिये तैयार है ?

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

अंबर्तो इको नहीं रहे


आज की दुनिया के एक सर्वाधिक चर्चित विचारक, दार्शनिक, उपन्यासकार, भाषाशास्त्री, साहित्यकार और जीवन के सभी क्षेत्रों में चिरस्थायी से दिखाई देने वाले सभी मूल्यों पर प्रश्न उठाने वाले इटली के एक प्रमुख सार्वजनिक बुद्धिजीवी अंबर्तो इको हमारे बीच नहीं रहे। मृत्यु के समय उनकी उम्र चौरासी साल थी।

दुनिया के आधुनिक बौद्धिक जगत के बारे में अगर कोई कुछ भी खबर रखता है तो ऐसा माना जा सकता है कि वह इको के नाम से जरूर ही परिचित होगा। और, जो आज के जीवंत बौद्धिक विमर्शों में रुचि रखते हैं, वे तो इको के लेखन की कत्तई अवहेलना नहीं कर सकते हैं।

इको का नाम आज दुनिया के उन दो-चार गिने-चुने नामों में से एक है जिनके विचारों के आकर्षण ने घोषित तौर पर विचारधारा और इतिहास के अंत की बंद गली के आखिरी छोर तक पहुंचा दिये गये समय में भी विचार और विचारवानों की प्रतिष्ठा को बनाये रखने में एक अहम भूमिका अदा की हैं। इटली के इस अध्यापक-विचारक ने दुनिया भर में ठस और कल्पनाशून्य मान लिये जा रहे अध्यापकों की जमात को ताउम्र शोध और सभ्यता-विमर्श के नये से नये पहलू के साथ जुड़ कर एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी की सार्थक भूमिका अदा करने का रास्ता दिखाया था। उसने विश्वविद्यालयों में ज्ञान-चर्चा की कर्मकांडी जड़ता को तोड़ा था।

इटली - यूरोपीय रिनैसांस और ज्ञानप्रसार आंदोलन का हृदय-स्थल, ईसाई धर्म और उससे जुड़े तमाम धर्मशास्त्रीय विमर्शों का एक केन्द्रीय स्थान, कैथोलिक चर्च के मुख्यालय वैटिकन का देश, मुसोलिनी के फासीवाद की प्रयोगशाला, बेनडेट्टो क्रोचे की तरह के सौन्दर्यशास्त्रीय चिंतक की कर्मभूमि और अंतोनियो ग्राम्शी जैसे महान मार्क्सवादी विचारक का देश। अंबर्तो इको को आज के युग के एक ऐसे दार्शनिक-विचारक की प्रतिष्ठा मिली थी जिसमें इटैलियन ज्ञान-मीमांसा की जैसे अब तक की तमाम धाराएं एक साथ प्रवाहित हो रही हो, और सब एकमेक होकर चिंतन के किसी नये उत्कर्ष का उदाहरण पेश कर रही हो।

यह महज एक संयोग ही है कि वे लगभग पंद्रह साल पहले एक बार भारत आए थे और दिल्ली में हमें उन्हें देखने का मौका मिला था। तभी से हमारे निजी पुस्तकालय में एक-एक कर उनकी कई पुस्तके शामिल होती चली गई और किसी भी गंभीर लेखन की तैयारी के वक्त उनकी किताबों से गुजरना हमारे नियमित अभ्यास का हिस्सा बन गया। कहते हैं इको के दो निजी पुस्तकालयों में लगभग पचास हजार के करीब किताबें हैं।

इको का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास रहा है - द नेम ऑफ द रोज। एक मठ में मिली चौदहवीं सदी की पाण्डुलिपि पर आधारित किताब की रोमांचक कहानी। सात दिनों में विभाजित किताब की कहानी, जिसका हर दिन पूजा-अर्चना की वेलाओं में बंटा हुआ है।

कल हम रवीश कुमार के कार्यक्रम में दिखाये गये टीवी के जगत के अंधेरे की चर्चा कर रहे थे। इस उपन्यास के ‘अंतिम पृष्ठ’ के पहले का अध्याय है - NIGHT (रात)। इस अध्याय के शीर्ष पर लिखा हुआ है - NIGHT In which the ecprosis takes place, and because of excess of virtue the forces of hell prevail। (कयामत की रात जिसमें पूण्यों के अतिरेक के कारण नर्क की ताकतें छा जाती है।) हम अभी ऐसी ही ‘पूण्यात्माओं’ के अधीन रह रहे हैं।

इस उपन्यास के प्राक्कथन का पहला वाक्य है -In the beginning was the Word and the Word was with God, and the Word was god. (शुरू में शब्द था, शब्द ईश्वर के पास था, ईश्वर शब्द था।) ‘शब्द ब्रह्म’ के इस एक कथन के साथ ही हम इस उपन्यास की धारा में उतर पड़े थे।

हेगेल ने कहा था - शब्द वस्तु की हत्या है। जो भगवान अपने दैविक जगत के सारे ताम-जाम को छोड़ कर मनुष्य रूपों में अवतरित होते हैं, जब उनकी मृत्यु होती हैं, अर्थात जब वे अपनी जगह छोड़ने लगते हैं, प्रेरणादायी नहीं रह जाते, तब उनकी मृत्यु हमें विचारों की श्रृंखला से काटने के बजाय शब्द की चरम शक्ति से जोड़ती है। बौद्धिकता हमेशा प्रभु-सत्ताओं की मौत का जश्न मनाती है।

बहरहाल, इको की मृत्यु नि:संदेह दुनिया के बौद्धिक जगत की एक बड़ी क्षति है। हम उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

यहां हम वीकीपीडिया के उस लिंक को दे रहे हैं जिसमें इको के जीवन और कृतित्व के बारे में विस्तृत तथ्य दिये हुए हैं।

Umberto Eco - Wikipedia, the free encyclopedia
Umberto Eco OMRI (Italian: [umˈbɛrto ˈɛːko]; born 5 January 1932, died 19 February 2016) was an Italian semiotician, essayist, philosopher, literary critic, and novelist. He is best known for his groundbreaking 1980 historical mystery novel Il nome della rosa (The Name of the Rose), an intellectual…
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

‘‘यह अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर है’’



http://www.ndtv.com/video/player/prime-time/prime-time-that-we-can-hear-what-we-say/404451

क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाये जायेंगे ?
हां, जुल्मतों के दौर के ही गीत गाये जायेंगे!

बर्तोल्त ब्रेश्त की ये अमर पंक्तियां जैसे आज हमारे सामने मूर्त हो गई थी जब आज सुबह की शांति में हमने इंटरनेट के जरिये रवीश कुमार के कल (19 फरवरी) के प्राइम टाईम के एपिसोड को देखा। देखा नही - बल्कि उसके कतरे-कतरे को पूरी तल्लीनता से पीया ; ठहर-ठहर कर, लगातार सोचते हुए उस संयत-संतुलित आवाज की ध्वनि के नाद को अपनी धड़कनों पर जीया।

भारत में अमिताभ बच्चन की आवाज को एक जादूई प्रभाव पैदा करने वाली आवाज कहते हैं। लेकिन सच की आवाज का जादू क्या होता है, आज इसे रवीश की आवाज से जाना।

जी पी देशपांडे का एक प्रसिद्ध नाटक है - आंधार यात्रा। यह रवीश कुमार की अंधेरे की यात्रा है, जगमग रोशनी के अंधेरे के खिलाफ घुप अंधेरे की रोशनी की यात्रा। एक काले स्क्रीन पर उभरते कुछ शब्द और आदमी को अंदर तक हिला देने वाली एक पटकथा के वाचन की यात्रा। यह अंधेरा हमारे वर्तमान समय का अंधेरा है - खास कर टीवी के जगत का अंधेरा है। एक ऐसा अंधेरा जिसमें एंकरों के रूप में टीवी की दुनिया के सारे भूत, पिशाच, डायन, डाकिनों के साथ ही उल्लू और घुग्गु नाचा करते है - हॉ, हुआ करते-करते। जैसे सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया... और सबका सरदार - अर्नब गोस्वामी ! यह काला स्क्रीन ही टीवी जगत की सच्ची तस्वीर है।

रवीश कुमार के इस कार्यक्रम को मैं कोरी क्लासिक ऊंचाई का कार्यक्रम नहीं कहना चाहता। ‘क्लासिकल’ के साथ ढेर सारे भ्रमों और झूठों का बोझ जुड़ गया है। यह लगातार एक ही चीज को रटे जाने, दोहराये जाने का पर्याय बन गया है। प्राचीन काल से दोहराये जा रहे पाठों, रागों और धुनों का दोहराव - बस मामूली हेर-फेर के साथ। लेकिन रचनाशीलता इस दोहराव की पथरीली जमीन में पड़ने वाली दरारों से पैदा होती है। वह यथास्थिति के खिलाफ आदमी की संघर्षशीलता से पैदा होती है। रवीश की यह प्रस्तुति मनुष्य की इसी श्रेष्ठ रचनाशीलता का उदाहरण है।

हमें आज भी याद है सन् 1975 के आंतरिक आपातकाल की। निष्ठुर सेंसर अधिकारियों ने अखबार के पन्नों पर से रवीन्द्रनाथ तक को उड़ा दिया था। तब कई अखबार कई दिनों तक बिना किसी अक्षर या तस्वीर की सजावट वाले रिक्त स्थानों के साथ प्रकाशित हुए थे। उन दिनों हम माकपा के हिंदी साप्ताहिक ‘स्वाधीनता’ से जुड़े हुए थे। आपातकाल की घोषणा के ठीक बाद प्रकाशित हुए ‘स्वाधीनता’ के अंक के पहले पृष्ठ से लेकर अंदर के कई पृष्ठों पर खाली जगह छोड़ दी गई थी। ‘स्वाधीनता’ का वह अंक आज भी हमें उसके शब्दों-तस्वीरों से लदे हुए अंकों से कहीं ज्यादा प्रेरणादायी, और प्रिय भी लगता है।

कहना न होगा, सन् ‘75 के आंतरिक आपातकाल के दिनों में अखबारों के इसी रिक्त स्थान ने कल के रवीश कुमार के कार्यक्रम में अंधेरे का रूप ले लिया था। इसे हमारी स्मिृतियों से कभी कोई पोंछ नहीं सकेगा।

यह अंधेरा दौलतमंदों, ब्लैकमेलरों, बिकाऊ और अपराधी एंकरों की जकड़ में कसमसाते हमारे टेलिविजन के आभासी जगत में पसरे हुए अंधेरे की तस्वीर है।

अपने प्रत्येक मित्र से हमारा यह आंतरिक आग्रह है कि यदि आप आज भी एक बेहतरीन, स्वस्थ, संवेदनशील, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज के निर्माण के प्रति अपनी आस्था को बनाये हुए हैं तो रवीश कुमार के इस कार्यक्रम के वीडियो को जरूर शेयर करें। इसे देश के कोने-कोने तक गूंजाएं, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क, हमारी सोचने की ताकत पर छाये हुए टेलिविजन के जगत के अंधेरे को छांटा जा सके, इसके जघन्य एंकरों के सच को सब लोग जान सके, उन्हें धिक्कार सके, उनका परित्याग कर सके।

रवीश कुमार को इस शानदार स्क्रिप्ट और उसकी उतनी ही अर्थपूर्ण प्रस्तुति के लिये अशेष धन्यवाद। उनके इस कार्यक्रम को टीवी कार्यक्रमों के एक सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम के तौर पर हमेशा याद रखा जायेगा।  


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हार्पर ली नहीं रही


'To Kill a Mockingbird' उपन्यास की किंवदंती लेखिका हार्पर ली नहीं रही । पचपन साल पहले एक काले परिवार को नस्लवादियों की घृणा से बचाने की लड़ाई लड़ने वाले छोटे से क़स्बे के वक़ील ऐटिकस फ़िंच की लड़ाई की अमर कहानी कहानी कहने वाली हार्पर ली के इस उपन्यास की अब तक चार करोड़ से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी है । इस उपन्यास को पुलिजर पुरस्कार भी मिला था ।
आज जब हम भारत में काला कोट पहने वकीलों को देशभक्ति की आड़ में सांप्रदायिक नफ़रत के ज़हर को उगलते हुए देखते हैं, तब इस अमेरिकी लेखिका का जाना और भी दुखजनक लगता है । उन्होंने सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले एक वक़ील की कहानी कहके सारी दुनिया को न्याय और बराबरी का संदेश दिया था ।
ली नयासी साल की हो चुकी थी । आज ही अमेरिका के अलबामा के मोनरेविले में अपने घर के निकट के एक नर्सिंग होम में उनकी मृत्यु हुई ।
हम उन्हें आंतरिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।

अभूतपूर्व कृषि संकट

आज हम एक अभूतपूर्व कृषि संकट के मुहाने पर पहुंच चुके हैं। प्रतीकों और लफ्फाजियों में जीने वाली मोदी सरकार गांवों में अकाल और सूखे का भी नया नामकरण करके इसकी विकराल सचाई को छिपाने में लगी हुई है। इस सरकार के विशेषज्ञ अब अकाल को अकाल नहीं, डेफिसिट अर्थात घटती कह रहे हैं और इसकी भी कई श्रेणियां बना दी है - कम घटती, थोड़ी ज्यादा घटती, अधिक घटती। लेकिन इन्हें पता नहीं है कि आदमी के जीवन का वास्तविक संकट इन नये-नये नामों से नहीं टला करता।
हरियाणा में जाट आरक्षण के नाम पर जो हंगामा मचा हुआ है, उसकी पृष्ठभूमि में इस देशव्यापी कृषि संकट की आहटों को भी सुना जा सकता है। कहां का आक्रोश कहां निकले, कहना मुश्किल होता है।

हरियाणा को संभालने फौज

जल रहे हरियाणा को संभालने फौज जा रही है।
जेएनयू के प्रकरण में संघ परिवारियों की ओर से छात्रों के खिलाफ प्रचार के लिये कुछ फौजियों को उतारा गया था।
टेलिविजन चैनलों पर सरकारी प्रवक्ता के तौर पर पूर्व सैनिक अधिकारियों को अक्सर उतारा जाता है।
इन सब संदर्भ में याद आती है ‘लुई बोनापार्ट की अठारहवीं ब्रुमेर’ में कार्ल मार्क्स के इस विश्लेषण की, जब वे लिखते हैं - ‘‘ इस प्रकार समय-समय पर फौजी बारिक और पड़ाव का दबाव फ्रांसीसी समाज के मस्तिष्क पर डाल कर उसे ठंडा कर देना; इस प्रकार तलवार और बंदूक को समय-समय पर न्यायाधीश और प्रशासक, अभिभावक और सेंसर बनने देना, उन्हें पुलिसमैन और रात के संतरी का काम करने देना ; इस प्रकार फौजी मूंछ और फौजी वर्दी को समय-समय पर, ढिंढोरा पीट कर, समाज की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता एवं समाज का उपदेष्टा घोषित करना - यह सब करने के बाद क्या अंत में यह लाजिमी न था कि फौजी बारिक और पड़ाव, तलवार और बंदूक, मूंछ और वर्दी को एक दिन यह सूझ पैदा होती कि क्यों न अपने शासन को सर्वोच्च घोषित करके एक ही बार में समाज का उद्धार कर दिया जाये तथा नागरिक समाज को अपना शासन आप करने की चिंता से सब दिनों के लिए मुक्त कर दिया जाये ?’’
कितनी गहरी चेतावनी छिपी हुई है मार्क्स के इस कथन में हमारे लिये। हमारे शासक दल का सेना पर ज्यादा से ज्यादा आश्रित होना हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था के लिये कैसे-कैसे खतरे पैदा कर सकता है, सोच कर डर लगता है।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

जे एन यू परिघटना पर लेखकों का बयान


http://jantakapaksh.blogspot.in/2016/02/blog-post_17.html
बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

हम हिन्दी के लेखक देश के प्रमुख विश्वविद्यालय जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 9 फरवरी को हुई घटना के बाद से जारी पुलिसिया दमन पर पर गहरा क्षोभ प्रकट करते हैं। दुनिया भर के विश्वविद्यालय खुले डेमोक्रेटिक स्पेस रहे हैं जहाँ राष्ट्रीय सीमाओं के पार सहमतियाँ और असहमतियाँ खुल कर रखी जाती रही हैं और बहसें होती रही हैं। यहाँ हम औपनिवेशिक शासन के दिनों में ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में भारत की आज़ादी के लिए चलाये गए भारतीय और स्थानीय छात्रों के अभियानों को याद कर सकते हैं, वियतनाम युद्ध के समय अमेरिकी संस्थानों में अमेरिका के विरोध को याद कर सकते हैं और इराक युद्ध मे योरप और अमेरिका के नागरिकों और छात्रों के विरोधों को भी। सत्ता संस्थानों से असहमतियाँ देशद्रोह नहीं होतीं। हमारे देश का देशद्रोह क़ानून भी औपनिवेशिक शासन में अंग्रेज़ों द्वारा अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को दबाने के लिए बनाया गया था जिसकी एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक समाज में कोई आवश्यकता नहीं। असहमतियों का दमन लोकतन्त्र नहीं फ़ासीवाद का लक्षण है।
इस घटना में कथित रूप से लगाए गए कुछ नारे निश्चित रूप से आपत्तिजनक हैं। भारत के टुकड़े करने या बरबादी की कोई भी ख़्वाहिश स्वागतेय नहीं हो सकती। हम ऐसे नारों की निंदा करते हैं। साथ में यह भी मांग करते हैं कि इन विडियोज की प्रमाणिकता की निष्पक्ष जांच कराई जाए। लेकिन इनकी आड़ में जे एन यू को बंद करने की मांग, वहाँ पुलिसिया कार्यवाही और वहाँ के छात्रसंघ अध्यक्ष की गिरफ्तारी कतई उचित नहीं है। जैसा कि प्रख्यात न्यायविद सोली सोराबजी ने कहा है नारेबाजी को देशद्रोह नहीं कहा जा सकता। यह घटना जिस कैंपस में हुई उसके पास इससे निपटने और उचित कार्यवाही करने के लिए अपना मैकेनिज़्म है और उस पर भरोसा किया जाना चाहिए था।
हाल के दिनों में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में ख्यात कवि और विचारक बद्रीनारायण पर हमला, सीपीएम के कार्यालयों पर हमला, दिल्ली के पटियाला कोर्ट में कार्यवाही के दौरान एक भाजपा विधायक सहित कुछ वकीलों का छात्रों, शिक्षकों और पत्रकारों पर हमला बताता है कि देशभक्ति के नाम पर किस तरह देश के क़ानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इन सबकी पहचानें साफ होने के बावजूद पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न किया जाना इसे सरकारी संरक्षण मिलने की ओर स्पष्ट इशारा करता है। असल में यह लोकतन्त्र पर फासीवाद के हावी होते जाने का स्पष्ट संकेत है। गृहमंत्री का एक फर्जी ट्वीट के आधार पर दिया गया गंभीर बयान बताता है कि सत्ता तंत्र किस तरह पूरे मामले को अगंभीरता से ले रहा है। ऐसे में हम सरकार से मांग करते हैं कि देश में लोकतान्त्रिक स्पेसों को बचाने, अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार की रक्षा और गुंडा ताकतों के नियंत्रण के लिए गंभीर कदम उठाए। जे एन यू छात्रसंघ अध्यक्ष को फौरन रिहा करे, आयोजकों का विच हंट बंद करे, वहाँ से पुलिस हटाकर जांच जेएनयू के प्रशासन को सौंपें तथा पटियाला कोर्ट में गुंडागर्दी करने वालों को कड़ी से कड़ी सज़ा दें।
मंगलेश डबराल
राजेश जोशी
ज्ञान रंजन
पुरुषोत्तम अग्रवाल
असद ज़ैदी
उज्जवल भट्टाचार्य
मोहन श्रोत्रिय
ओम थानवी
सुभाष गाताडे
अरुण माहेश्वरी
नरेंद्र गौड़
बटरोही
कुलदीप कुमार
सुधा अरोड़ा
सुमन केशरी
नन्द भारद्वाज
ईश मिश्र
लाल्टू
कुमार अम्बुज
शमसुल इस्लाम
सुधीर सुमन
ऋषिकेष सुलभ
विनोद दास
राजकुमार राकेश
हरिओम राजोरिया
अनिल मिश्र
नंदकिशोर नीलम
अरुण कुमार श्रीवास्तव
मधु कांकरिया
सरला माहेश्वरी
वंदना राग
मुसाफिर बैठा
अरविन्द चतुर्वेद
प्रमोद रंजन
हिमांशु पांड्या
वैभव सिंह
मनोज पाण्डेय
शिरीष कुमार मौर्य
अशोक कुमार पाण्डेय
वर्षा सिंह
विशाल श्रीवास्तव
उमा शंकर चौधरी
चन्दन पाण्डेय
असंग घोष
विजय गौड़
अरुणाभ सौरभ
देवयानी भारद्वाज
पंकज श्रीवास्तव
कविता
हरप्रीत कौर
अनुप्रिया
राकेश पाठक
संजय जोठे
रामजी तिवारी
कृष्णकांत
मनोज पटेल
देश निर्मोही
प्रज्ञा रोहिणी
दीप सांखला
अमलेंदु उपाध्याय
प्रमोद धारीवाल
अनिल कार्की
देवेन्द्र कुमार आर्य
प्रमोद कुमार तिवारी
अरविंद सुरवाड़े (मराठी)
आलोक जोशी
रोहित कौशिक
मनोज छबड़ा
अमिताभ श्रीवात्सव
ऋतु मिश्रा
कनक तिवारी
ईश्वर चंद्र
नित्यानन्द गाएन
शशिकला राय
पंकज मिश्रा
कपिल शर्मा (सांगवारी)
विभास कुमार श्रीवास्तव
मेहरबान सिंह पटेल 

विचारशून्यता की खाई में कार्यकर्ता


अरुण माहेश्वरी


आरएसएस की हमेशा से एक मूलभूत अवधारणा है कि भारत में हिंदू ही राष्ट्र है, और हिंदू भी सिर्फ वे हैं जो आरएसएस के साथ हैं। आरएसएस के सिद्धांतकार और प्रमुख सरसंघचालक गोलवलकर कहा करते थे कि हिंदुस्थान में राष्ट्र का अर्थ ही हिंदू है। गैर-हिंदुओं के लिये यहां कोई स्थान नहीं है। इस मामले में वे पूरी तरह से हिटलर के इस फार्मूले को मान कर चलते थे कि ‘‘मूलगामी विभेद वाली संस्कृतियों के बीच कभी मेल हो ही नहीं सकता।’’ उनकी साफ राय थी कि गैर-हिंदू इस देश में रह सकते हैं लेकिन सीमित समय तक और बिना किसी नागरिक अधिकार के। उनके शब्दों में -‘‘विदेशी तत्वों के लिये सिर्फ दो रास्ते खुले हैं, या तो वे राष्ट्रीय जाति के साथ मिल जाएं और उसकी संस्कृति अपना लें या जब तक राष्ट्रीय जाति अनुमति दे तब तक उनकी दया पर रहें और जब राष्ट्रीय जाति कहे कि देश छोड़ दो तो छोड़ कर चले जाएं। यही अल्पसंच्यकों के बारे में आजमाया हुआ विचार है। यही एकमात्र तर्कसंगत और सही समाधान है।’’ (एम.एस.गोलवलकर, वी आर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड, प्रथम संस्करण, पृष्ठ 47.48)

यह है राष्ट्र और राष्ट्रवाद के बारे में आरएसएस की मूलभूत, हिटलर के विचारों से प्रेरित विचारधारा। कहा जा सकता है - आरएसएस का सत्व। बाद के इतिहास में हिटलर का जो जघन्य रूप दुनिया ने देखा और खुद उसकी जो दुर्गति हुई, इसीके चलते आरएसएस और उसका संघ परिवार अपने विचारों के इस ‘शुद्ध’ रूप पर नाना प्रकार के मुलम्मे चढ़ाते रहने के लिये मजबूर होता रहा है। लेकिन यह सच है कि इन्हें जब भी थोड़ी सी अनुकूल परिस्थितियां दिखाई देती है, ये अपने इस मूल रूप की झलक देने से बाज नहीं आते हैं। भारत में सांप्रदायिक दंगों के इतिहास से लेकर, बाबरी मस्जिद को ढहाने और 2002 के गुजरात दंगों, मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस के विस्फोटों की तरह की आधुनिक भारत की सबसे शर्मनाक घटनाओं में संघपरिवार के लोगों की भूमिका कोई छिपी हुई बात नहीं है।

बहरहाल, 2013 में जबसे मोदी जी की सरकार बनी है, संघ परिवार के लोग इस अनुकूल वातावरण में फिर एक बार अपने मूल, दिगंबर रूप में सामने आने के लिये मचलने लगे है। उनकी इधर की तमाम गतिविधियों से, लेखकों-कलाकारों की हत्याओं से लेकर उन्हें अपमानित करने और बीफ की तरह के मुद्दों को उछाल कर मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने,  हर विरोध करने वाले को पाकिस्तान चले जाने की धमकी देने से लेकर उनके नेता, मंत्री तक रोजाना ऐसी-ऐसी बाते कहते हैं जिनकी एक स्वतंत्र, जनतांत्रिक और धर्म-निरपेक्ष देश में आसानी से कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अब फिर एक बार ऐसी स्थिति बन गई है जब आरएसएस के विचार महज कोई विचार, आदमी के अंतर की चीज भर नहीं, बल्कि एक ठोस सचाई बन रहे हैं। सत्ताधारियों द्वारा क्रमश: संघ परिवारियों के अलावा बाकी पूरे देश को देशद्रोही, राष्ट्र-विरोधी करार दिया जा रहा है !

हम जानते हैं कि जब भी कोई विचार इस प्रकार से अति क्षुद्र अर्थों में ठोस रूप लेने लगता है, तब वह बेहद सिकुड़ कर अपने साथ विचारशून्यता की गहरी खाई भी पैदा करता है - एक ऐसी खाई जिसमें आदमी के अंतर की बाकी सारी चीजें गुम हो जाया करती है। उस क्षुद्र व्यवहार के अलावा जो कुछ बचा रहता है वह है - विचारशून्यता की एक गहरी, अंधेरी खाई - उस घनघोर अंधेरेपन का आतंक और संभवत: कुछ दुराग्रही लोगों के लिये ऐसी अंधेरी खाई का आकर्षण भी! ऐसी स्थिति से जुड़े आदमी के लिये वास्तव में यह एक ऐसी भंवर में फंसने की तरह है, जो उससे उसके विचारवान मनुष्वत्व के बोध को छीन कर, उसे खींच कर उसके अपने चरम पतन के तल तक ले जाती है।

इस बात को आरएसएस और संघ परिवार की विचारधारा के संदर्भ के बजाय दूसरे संदर्भों में भी अच्छी तरह से समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, कार्ल मार्क्स ने मानव इतिहास के विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि वर्ग-संघर्ष इतिहास की एक प्रमुख चालिका शक्ति है। इसीलिये, इतिहास की इस गति में सचेत भूमिका अदा करने के लिये कम्युनिस्ट पार्टियां वर्ग संघर्ष को तेज करने के उद्देश्य से उत्पीडि़त जनों को संगठित करने और उनकी अधिकार चेतना को बढ़ाने के कामों पर बल देती है। लेकिन दुनिया के कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में यह सचाई बार-बार दिखाई दी है कि अक्सर वर्ग संघर्ष के इस विचार पर अमल करते हुए ‘वर्ग शत्रु’ के सफाये के नाम पर उग्रवादी समूह हत्याओं और लूट-खसोट की राजनीति का रास्ता पकड़ लेते हैं। पार्टी के अंदर के विरोधियों के सफाये तक के लिये इसका प्रयोग किया जाने लगता है। इसे ही कहते हैं इतिहास के अंतर को चालित करने वाले एक विचार को क्षुद्र प्रकार की ठोस कार्रवाई में सिमटा देना। यह विचार पर अमल के नाम पर विचारशून्यता की गहरी अंधेरी खाई को पैदा करने के समान है। और जाहिर है कि इसकी भंवर में फंसा हुआ आदमी अपने विचारवान मनुष्यत्व को गंवा कर सबसे पतित, यहां तक कि हत्यारे, षड़यंत्रकारी का रूप ले सकता है।

इस बात को साहित्य के एक और उदाहरण से भी समझा जा सकता है। नोबेलजयी गैब्रियल गार्सिया मार्केस के जिस उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स आफ सालिच्यूड’ को नोबेल पुरस्कार दिया गया, मार्केस ने करोड़ों डालर के प्रस्तावों को भी ठुकरा कर भी उस उपन्यास पर कभी कोई फिल्म नहीं बनने दी। मार्केस का कहना था कि मैं अपने पात्रों को, खास तौर पर उसकी दादी उर्सुला को, जिसे उपन्यास की नायिका भी कहा जा सकता है, किसी सोफिया लॉरेन या अन्य नायिका की सूरत प्रदान नहीं कर सकता। उर्सुला इस उपन्यास में न जाने कितने-कितने सालों तक जी रही होती है और एक ऐसा चरित्र है जिसके साथ स्पेन के सुदूर गांवों से लेकर लातिन अमेरिका के गांवों तक के लोग अपने अनुभवों को जोड़ लेते हैं। ऐसे में, जैसे ही उसे कोई एक ठोस रूप दिया जायेगा, उसका यह सार्विक आकर्षण हमेशा के लिये खत्म हो जायेगा।

कहना न होगा, आज मोदी शासन में, एक के बाद एक, लगातार अल्पसंख्यकों, दलितों, छात्रों, बुद्धिजीविायों को हमले का निशाना बना कर और सभी भाजपा-विरोधियों को बार-बार राष्ट्र-विरोधी करार कर संघियों के लिये पतन की ऐसी ही एक भंवरनुमा खाई तैयार की जा रही है। इसमें फंसे हुए संघ परिवार के तमाम लोग अभी चरम नफरत के साथ सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर भी जिस गंदी जुबान में, भद्दी-भद्दी गालियों के साथ बातें कर रहे हैं, वह इसी सचाई को जाहिर करता है। परिस्थति ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के एक तबके की सूरत को गालियां उगलने वाले उन्मादित लोगों की सूरत में बदलना शुरू कर दिया है।

पता नहीं ये लोग कैसे फिर मनुष्य के अंतर के साथ, उन्माद की दशा से निकल कर अपने होशों-हवास में लौटेंगे!


सीपीआई(एम) में फिर एक बार गहरा आंतरिक संकट


सीपीआई(एम) के पोलिट ब्यूरो की अभी चल रही बैठक में विचार का सबसे महत्वपूर्ण विषय यह है कि पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस के साथ मोर्चा बना कर चुनाव में उतरेगी या नहीं । ख़बरों के अनुसार, कल तक की बैठक में इस पर कोई निर्णय नहीं हो पाया है । यह बैठक आज भी चलेगी । कहा जा रहा है इस विषय में अंतिम निर्णय आगामी कल से शुरू होने वाली केंद्रीय कमेटी की बैठक में ही लिया जा सकेगा ।

अख़बारों से यह भी पता चल रहा है कि सीपीआई(एम) का नेतृत्व इस विषय पर पूरी तरह से बँटा हुआ है । पार्टी के सर्वोच्च निकाय में कितने लोग पक्ष में है और कितने पक्ष में, इसकी भी गणना हो रही है ।

लगता है सीपीआई(एम) फिर एक संकट के मुहाने पर है । किसी भी राजनीतिक पार्टी में इस प्रकार के एक अत्यंत अहम राजनीतिक सवाल पर, जिस पर पार्टी का और देश की भावी राजनीति का भी भविष्य निर्भर करता हो, कोई निर्णय सर्व-सम्मति के बजाय यदि मतदान के ज़रिये लेने की नौबत आजाए तो यह उस पार्टी को निश्चित तौर पर दिशाहीनता के गहरे अंधेरे में धकेल देने की तरह होगा । सीपीआई (एम) इसके पहले भी अंदरूनी जनतंत्र के नाम पर, शुद्ध गुटबाज़ी और मतदान के ज़रिये ऐसे निर्णय लेती रही है जिन्हें ज्योति बसु तक ने ऐतिहासिक भूल कहा था और कम्युनिस्ट आंदोलन के तमाम पर्यवेक्षक जिन्हें भारतीय राजनीति में वामपंथ की बढ़ी हुई अप्रासंगिकता का एक प्रमुख कारण मानते हैं ।

अभी फिर एक बार, सीपीआई (एम) भारत की बहु-राष्ट्रीय सचाई की पूरी तरह से अवहेलना करते हुए पोथी की दासता (पहले पारित किये गये प्रस्ताव के बंधन) और तर्क तथा विवेक के बजाय शुद्ध पक्ष और विपक्ष के संख्या-तत्व के आधार पर निर्णय लेने की यांत्रिकता की चुनौती के सम्मुख है । देखते हैं, राजनीतिक विवेक जीतता है या वही पुरानी नौकरशाही कार्य-प्रणाली वाली यांत्रिकता ।

अंतरीक्ष में गुरुत्वाकर्षण तरंगें अब एक प्रत्यक्ष सचाई है


11 फरवरी 2016। अमेरिका की दो भीमकाय दुरबीनों ने आज गुरुत्वाकर्षण तरंगों को देख लिया और वैज्ञानिकों ने उस तूफान के तुमुल कोलाहल को सुन लिया जो सुदूर अंतरीक्ष के दो ब्लैक होल्स के टकराने और एक दूसरे में घुस जाने से पैदा हुआ और जिसने गुरुत्वाकर्षण तरंगों से बुने गये इस महाअंतरीक्ष के एक कोने के ताने-बाने को फाड़ डाला। सारी दुनिया के भौतिक-शास्त्री रोमांचित है। पिछली 14 सितंबर को ही अमेरिका की दो दुरबीनों को इन तरंगों का पता लग चुका था। आज वे प्रत्यक्ष हुई हैं ।
आज दुनिया को वे चित्र उपलब्ध है जो बताते हैं कि गुरुत्वाकर्षण तरंगों से कैसे काल की गति में फर्क आ जाता है और स्थान का रूप-रंग बदल जाता है। इस नई जानकारी ने न सिर्फ इस बारे में आइंस्टाइन की एक महत्वपूर्ण स्थापना को प्रयोगशाला में प्रमाणित कर दिया है, बल्कि भौतिकी के जगत में अनेक नये प्रयोगों और खोजों का रास्ता खोल दिया है।
आज याद आ रही है 1 जनवरी 2015 की अपनी ही एक पोस्ट की, जिसे हमने उदय प्रकाश को जन्मदिन की बधाई देते हुए लगायी थी। 2015 आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का शताब्दी वर्ष था और उस समय तक गुरुत्वाकर्षण तरंगों की उनकी बातों को प्रयोगशाला में प्रमाणित करने की संभावना की चर्चा शुरू हो गई थी। अपनी उस पोस्ट में हमने लिखा था - ‘‘आज हमारे प्रिय कथाकार उदय प्रकाश का जन्म दिन है।
“हम सन् 2015 में प्रवेश कर रहे हैं - अर्थात आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता (Theory of general relativity) के सिद्धांत के शताब्दी वर्ष में। सन् 1915 में आइंस्टाइन ने अपने इस सिद्धांत से देश-काल (Space and Time) संबंधी सहस्त्र सालों से चली आरही अटकलबाजियों को पूरी तरह से उलट-पुलट दिया था। ‘हमारा ब्रह्मांड काल की उपज है’, की तरह की कई महत्वपूर्ण बातों के अलावा उन्होंने एक बड़ी बात यह भी कही कि भौतिक पदार्थ की गुरुत्वाकर्षण तरंगों (gravitational waves) से देश-काल का रूप निरंतर बदलता है। पदार्थ के दबाव से देश-काल का रूप बदल जाता है । देश-काल इसके सामने लचीली जेली की तरह होता है । गुरुत्वाकर्षण की ये अदृश्य तरंगे देश-काल के किसी भी स्थिर रूप में दरारें पैदा कर सकती हैं ।
“आइंस्टाइन के अन्य सभी प्रमाणित हो चुके सिद्धांतों के उपरांत आज सारी दुनिया के भौतिकशास्त्री इस गुरुत्वाकर्षण तरंगों के सिद्धांत को भी प्रयोगशाला में प्रमाणित करने में लगे हुए हैं।
“कल्पना कीजिये, इस सापेक्षता सिद्धांत के सामाजिक महत्व की। कार्ल मार्क्स ने ब्रह्मांड की तरह ही पूंजी के ब्रह्मांड को काल की उपज बताया था। और, इतिहास में वर्ग-संघर्ष की भूमिका गुरुत्वाकर्षण की इन्हीं अदृश्य तरंगों की तरह है जो इस ब्रह्मांड में दरार डालती है, इसे बदल देती है।
“यही वजह है कि जो लेखन हाशियों पर पड़ी पराजितों की लड़ाई की तरंगों को अपने दायरे में नहीं लाता, वह जीवन के यथार्थ की गति को पकड़ने में नैसर्गिक रूप से असमर्थ है। कहा जाए तो एक अर्थ में अभिशप्त है। हमारे साथी नीलकांत की शब्दावली में वह मृत-सौंदर्य का पुजारी है।“
तीन साल नहीं हुए । पदार्थ के जिस कण को पहले देखा नहीं गया था, ईश्वर कण (god’s particle) के नाम से मशहूर हिग्सबोसोन को खोज लिया गया और तब भी सारी दुनिया के वैज्ञानिक और विज्ञान-मनस्क लोग इसीप्रकार झूम उठे थे। भौतिकी के क्षेत्र की हर उपलब्धि मनुष्यता की एक ऐसी थाती है जिसकी चमक समय के साथ कभी म्लान नहीं होती। हर बीतते दशक के साथ बड़ी से बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं का महत्व गिरता जाता है। मानव प्रगति की राह में हर राजनीतिक और वित्तीय संकट महज एक क्षणिक ठहराव से ज्यादा मायने नहीं रखते। यहां तक कि महायुद्धों की तरह के आतंक भी कालक्रम में किसी अयर्थाथ से प्रतीत होने लगते हैं। लेकिन भौतिकी के नियम सनातन और सार्विक होते हैं। उनकी खोज मानव मात्र की विजय होती है।
गुरुत्वाकार्षण तरंगों का यह नजारा देखना, महाअंतरीक्ष के अब तक के छिपे हुए एक और रहस्य को भेद पाने के सूत्रों का मनुष्य के हाथों में आना हम सबके लिये बेहद खुशी की एक घटना है। इस जानकारी से दुनिया के अन्य सभी उत्फुल्ल लोगों की भावनाओं के साथ ही हम भी अपने उल्लास की भावनाएं साझा करते हैं।
आज हमारी वसंत पंचमी के मौके पर हम दुनिया के वैज्ञानिकों की इस सौगात का भी जश्न मनाते हैं।
सभी साथियों को वसंत पंचमी की शुभकामनाएं।

रविवार, 31 जनवरी 2016

एक नये विमर्श का प्रस्ताव


-अरुण माहेश्वरी

उर्मिलेश उर्मिल ने अपनी फ़ेसबुक वाल पर लिखा - " हैदराबाद नगर महापालिका के लिये चुनाव प्रचार इन दिनों चरम पर है. २ फरवरी को मतदान होना है. भाजपा प्रत्याशियों के सामने एक बड़ी समस्या आ रही है. दलित आबादी वाले इलाकों में हर जगह वे खदेड़े जा रहे हैं. लोग सवाल करते हैं, 'हम सब जातिवादी और देशद्रोही हैं, तुम्हें हमारा वोट क्यों चाहिये.' संघ-भाजपा-एबीवीपी के सामने भविष्य में यह समस्या अन्य इलाकों में भी पैदा हो सकती है, जब लोग कहना शुरू कर दें कि (आजादी की लड़ाई से अलग रहने वाले) संघियों को छोड़कर इस देश में सारे लोग जातिवादी-राष्ट्रविरोधी हैं!"

इसपर हमने टिप्पणी की कि "हेगेल के तर्कशास्त्र में एक पद आता है - पूर्ण प्रत्यावर्तन । Absolute Recoil । जब मीमांसा में एक ख़ास संयोग पर अपने को पूरी तरह से गँवा कर फिर से स्व के सार रूप, तत्व रूप की प्राप्ति की जाती है । संघ परिवार का तत्व रूप इतना ही निकृष्ट है कि उसको फिर से प्राप्त करना उसके विनाश को प्राप्त करने के समान है । सत्ताधारी संघियों की यही नियति है । जिस प्रक्रिया से अन्य अपने भटकावों से मुक्त होकर अपना नवीनीकरण करते हैं, वही प्रक्रिया एक फ़ासिस्ट और सांप्रदायिक विचारों पर निर्मित संगठन को जनतांत्रिक परिवेश में पूरी तरह से बेमेल और अप्रासंगिक बना देती है । "

गीता के पाचंवें अध्याय में जहाँ 'कर्म और संन्यास' के बारे में श्री कृष्ण उपदेश देते हैं, उसके सोलहवें श्लोक में कहा गया हैं -
ज्ञानेन्द्रिय तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन: ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम् ।।

इसका अर्थ है कि जीव का ज्ञान अविद्या से आच्छादित है । भगवान के ज्ञान से जब यह अविद्या से आच्छादित ज्ञान विनष्ट हो जाता है, तब वही ज्ञान सूर्य की भाँति प्रकाशित होकर अप्रकाशित परम तत्व को प्रकाशित कर देता है ।

अब कल्पना कीजिये - जहाँ वस्तु का यह परम तत्व ही सांप्रदायिक और ब्राह्मणवादी चातुर्वर्ण्य वाला सोच होगा, वहाँ किसी भी वजह से आच्छादित सच के अंत से जो प्रकाश में आयेगा, उसका रूप कैसा होगा !
याद आती है 7 जुलाई 2015 के 'जनसत्ता' में छपी अपूर्वानंद की एक टिप्पणी की जिसकी प्रतिक्रिया में उसी दिन हमने अपनी फेसबुक वाल पर जो लिखा वह इस प्रकार था -

" मनोविज्ञान की यह कैसी समझ !

"आज के जनसत्ता में अपूर्वानंद का लेख छपा है - ‘हिंदू राष्ट्र गांव-दर-गांव।

"आरएसएस हिंदू सांप्रदायिकता का प्रचारक है, यह अब कोई सात पर्दो में छिपा रहस्य नहीं है। केंद्र में भाजपा की सत्ता है तो इससे उनके सांप्रदायिक एजेंडा को बल मिल रहा है, इस बात पर भी किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती। ऐसी अति-अनुकूल परिस्थितियों में कोई भी अपने अंदर-बाहर के सब कुछ को बिल्कुल नग्न रूप में प्रकट कर देता है, यह भी सही है।

"लेकिन इतना सब होने मात्र से, किसी के भी अपना सब कुछ प्रकट कर देने भर से ही दूसरों के मन में उसके प्रति स्वीकार्यता बढ़ जाती है, इसका कोई कारण नहीं है। यह कहा जाता है कि एक झूठ को सौ बार दोहराने से वह सच मान लिया जाने लगता है। लेकिन यह आदमी के चेतन पक्ष का पहलू है, शुद्ध धोखा-धड़ी में फंसने का। सच सामने आने से वही व्यक्ति खुद को बुरी तरह ठगा गया महसूस करता है। झूठ उसके अवचेतन में बसा नहीं रह जाता। इसीलिये किसी विचार या प्रचार से उत्तेजित होकर कोई काम कर गुजरना ही आदमी के मन का पूरा परिचायक नहीं होता।
"आदमी का मन उसके चेतन और अवचेतन दोनों को मिला कर बनता है। जिसे आदमी का अवचेतन कहते है, उसके मन का एक अंधेरा, सुप्त कोना, अपूर्वानंद ने अपने लेख में उसके गठन के विषय को उठाया है। हमारा कहना है कि अवचेतन भी यदि चेतन की तरह ही किसी के द्वारा निदेशित हो सके, उसे पूर्व-निर्धारित ढांचों में ढाला जा सके तो फिर चेतन और अवचेतन के बीच फर्क ही क्या रह जायेगा। अपूर्वानंद अपने लेख का अंत इस पंक्ति से करते हैं कि 'हिंदू मन से शायद ही किसी को ऐतराज हो लेकिन भारतीय समाज के लिये हिंदुत्ववादी अवचेतन के गठन के आशय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।’

‘अवचेतन के गठन के आशय’ ! गौर कीजिये। वे सुचिंतित ढंग से अवचेतन के गठन की प्रक्रिया की बात कह रहे हैं। आदमी का परिवेश उसकी नैसर्गिक जरूरतों से जुड़ कर ही उसके अवचेतन में कोई जगह बनाता है। हर प्रकट चीज अवचेतन में जगह नहीं बनाती। अवचेतन में प्रवेश के लिये उसे उसकी शारिरिक-मानसिक जरूरतों का स्वाभाविक हिस्सा बनना पड़ता है। भोजन और विष्ठा में यही फर्क है। दोनो प्रकट हैं, लेकिन दोनों के लिये आदमी में समान चाहत नहीं होती। एक को ग्रहण करता है और दूसरे को अपने से दूर रखता है। विष्ठा का भक्षण करने वाला या तो कोई विकृत मस्तिष्क का व्यक्ति होगा या फिर कोई चालाक, स्वार्थी तांत्रिक।
भारत की सचाई यह है कि आरएसएस का प्रकट रूप भारतीय मन के लिये ग्रहण-योग्य नहीं है। सन् 2002 के दंगे उसकी विष्ठा है और कोई लाख कोशिश कर ले, भारतीय मन में उसे ग्रहण करने की चाहत कभी पैदा नहीं कर सकता। हाल ही में दुलात ने अपनी किताब में वाजपेयी की 2004 की जिस बात का उल्लेख किया है कि हमने 2002 में भूल की थी, वह ऐसे ही नहीं है। मोदी ने चुनाव जीता 2002 को भुला कर और कांग्रेस के प्रति सामान्य असंतोष को भुना कर, न कि सांप्रदायिक विष्ठा के प्रति किसी प्रकार की प्रीति पैदा करके। कांग्रेस नेतृत्व ने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के लिये माफी अनायास ही नहीं मांगी थी।

"ऐसे में कोई भी बुद्धिजीवी यदि आज भारतीय मन के बदलने की बात करता है तो उसकी मनोविज्ञान की समझ और इतिहास बोध पर भी शंका होने लगती है।

"भारत में इसके पहले भी भाजपा नीत एनडीए शासन का एक दौर बीत चुका है। तब भी आरएसएस कम ताकतवर नहीं था। लेकिन जो आरएसएस राममंदिर आंदोलन के समय अपनी रहस्यमयता के चलते जितने लोगों को प्रेरित कर पाया, उसी ने एनडीए के दौर में अपने प्रकट भ्रष्ट रूप से उतने ही लोगों को विकर्षित भी किया। पेट्रोल पंप आदि की तरह के उस दौर के कई घोटालों में आरएसएस की सर्वोच्च कमेटियों के लोग शामिल पाये गये। उस एनडीए सरकार के पतन के बाद देश भर में आरएसएस की शाखाओं की संख्या में भारी गिरावट आगई थी। कई सालों से मध्यप्रदेश में संघ-संचालित सरकार के होने का परिणाम यह है कि अभी भारत के अपने प्रकार के सबसे जघन्य अपराधमूलक घोटाले व्यापमं में उस प्रदेश के आरएसएस के नेताओं के शामिल होने की बात आम है।
"अपूर्वानंद जब आरएसएस के लोगों की बढ़ी हुई हिंसक गतिविधियों के हवाले से यह कहते हैं कि यह भारतीय मन के किसी अवचेतन का गठन का मार्ग है तो सचमुच हंसी आती है। यह आरएसएस के रहस्य के प्रकट होने का समय है और प्रकट होने का एक मतलब होता है - नंगा होना ! आज जो साधू-साध्वियां गाहे बगाहे हिंसक और अनर्गल बातें करते हैं, उनकी शर्म को छिपाने में इन सबके पसीने छूट रहे हैं।

"जहां तक भारतीय सामाजिक-मन का सवाल है, इसकी जरूरतें विविधताओं के ठोस यथार्थ को मान कर चलने की जरूरतें हैं । इसी से उसका अवचेतन बना है और आगे भी बनेगा। यह उपनिवेशवादी यूरोप का एकांगी ‘राष्ट्रवादी’ मन नहीं है कि जिसमें साम्राज्य-विस्तार की ललक पैदा करके हिटलर-मुसोलिनी तैयार किये जा सके ! यूरोप के ऐसे ‘सामाजिक मन’ को भी अपने ठगे जाने का अब भारी पछतावा है। उन्होंने अपने ‘राष्ट्रवाद’ की दुर्गंधपूर्ण विष्ठा को बड़ी भारी कीमत देकर पहचाना है। उनके शासक-वर्गों की जरूरतों से जुड़ा युद्धोन्मादी मन और आम लोगों की जरूरतों से जुड़े युद्ध-विरोधी मन में अब क्रमश: बड़ा फर्क आ चुका है। इसके अलावा अब वह समय भी नहीं रहा है कि पहले की तरह के उपनिवेश कायम किये जा सके। किसी चीज के हासिल होने की असंभवता का बोध ही धीरे-धीरे अवचेतन से भी उसकी कामना को मिटाता है, लेकिन लंबे, काफी लंबे अर्से बाद क्योंकि इतिहास की बही में उसकी एक लकीर जो पड़ी हुई है। लेकिन भारतीय इतिहास कम से कम ऐसे विस्तारवादी ‘राष्ट्रवाद’ से पूरी तरह मुक्त है जिसके बूते आज के आम तौर पर ‘राष्ट्रवाद’ के पतन के युग में भारतीय मन के अवचेतन में उसके लिये कोई जगह बनाई जा सके !

"इसीलिये अपूर्वानंद जो भारतीय समाज के नये अवचेतन के ‘सचेत गठन’ का हौवा खड़ा कर रहे हैं, वह शुद्ध रूप में उनकी अपनी आत्मगत कमजोरी है। इसका न जीवन के ठोस यथार्थ से और न उस यथार्थ से जुड़े भारतीय समाज की जरूरतों से कोई संबंध है। यह उनकी अपनी एक सन्निपात की स्थिति है, जिसमें वे एक अर्से से फंसे हुए हैं। ‘आलोचना’ पत्रिका के इधर के भारतीय जनतंत्र पर केंद्रित दोनों अंकों के संपादकीयों में भी इसके लक्षणों को देखा जा सकता है। किसी के एक बार सत्ता में आने मात्र से वह मनुष्यों के मन के रथ का सारथी नहीं बन जाता है। ऐसा सोच उस मार्क्सवादी कथन की एक कच्ची समझ है कि किसी भी युग की विचारधारा उसके शासक वर्गों की विचारधारा होती है।"

उर्मिलेश जी की पोस्ट से क्या ऐसा कोई नया विमर्श तैयार नहीं होता है ?

शनिवार, 30 जनवरी 2016

कृत्रिम बुद्धि के युग में अर्थशास्त्र

- अरुण माहेश्वरी
( चतुर्दिक श्रृंखला - 3, प्रतिद्वंद्विता से इजारेदारी तक की भूमिका )


जब यथार्थ एक प्रकार के स्थायी अवशेष सा दिखाई देने लगता है, जब सामाजिक संबंधों में परिवर्तन की प्रक्रिया लगभग अचल जान पड़ती है, तब तकनीक ही वह पथ है जिससे आधुनिक समय में गतिशील यथार्थ ख़ुद को हमारे सामने व्यक्त करता है । आज भले ही पूँजीवाद का कोई ठोस विकल्प क्षितिज पर  न दिखाई दे रहा हो, लेकिन कोई यह भी नहीं कह सकता कि जीवन पूरी तरह से ठहर गया है । उल्टे, आज जीवन की परिस्थितियां इतनी तेज़ी से बदलती दिखाई दे रही है कि बिना किसी सामाजिक क्रांति के ही जैसे चौतरफा कोई भूचाल आया हुआ है । चीज़ें जिस गति से बदल रही है, इसका आसानी से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है । सिलिकन वैली का एक बादशाह विनोद खोसला कहता है  कि आगे विचारशील मशीन, कृत्रिम बुद्धि की तकनीकी क्रांति का सबसे गहरा असर सीधे आदमी की विचार करने की, निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ेगा ।

वह यहाँ तक कहता है कि मनुष्य की श्रम-शक्ति और मानवीय विचारशीलता की जरूरत जितनी कम होगी, पूंजी की तुलना में श्रम शक्ति की और विचारशील मशीन की तुलना में मनुष्य के विचारों की कीमत उतनी ही कम होती जायेगी। ऐसे में उसका मानना है कि "प्रचुरता और आमदनी में बढ़ती हुई विषमता के युग में हमें पूंजीवाद के एक ऐसे नये संस्करण की जरूरत पड़ सकती है जो सिर्फ अधिक से अधिक दक्षता के साथ उत्पादन पर केन्द्रित न रह कर पूंजीवाद के अन्य अवांछित सामाजिक परिणामों से समाज को बचाने के काम पर केंद्रित होगा।"

'पूँजीवाद का नया संस्करण' जो 'पूँजीवाद के अवांछित सामाजिक परिणामों से बचाने पर केंद्रित होगा' ! सुनने में कैसा लगता है ! ऐसा पूँजीवाद जो पूँजीवाद का प्रतिकार हो ! अर्थात पूँजीवाद न हो !


उसकी राय में कोई भी आर्थिक सिद्धांत बेकार साबित होगा यदि उसमें अतीत की तकनीकी क्रांतियों और इन नयी विचारशील मशीनी तकनीक के बीच के फर्क की समझ नहीं होगी। वे इसे एक ऐसा घुमावदार मोड़ बता रहे है जब मार्क्स की शब्दावली में, इतिहास की गाड़ी पर सवार बुद्धिजीवी झटका खाकर औंधे मुँह गिर जाते हैं । अब तक जिन ऐतिहासिक अनुभव को अवलंब बना कर सिद्धांतों की रचना की जाती रही है, वे अनुभव और सिद्धांत भविष्य के लिये वैध साबित नहीं होंगे । एक नये कार्य-कारण संबंध से पुराने, ऐतिहासिक परस्पर-संबंध टूट सकते हैं। जो लोग कमप्यूटरीकरण से रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का हिसाब-किताब किया करते हैं, और अब भी कर रहे हैं, वे इस बात को समझ ही नहीं रहे हैं कि आगे तकनीक क्या रूप लेने वाली है और उनके सारे अनुमान अतीत के अनेक 'सत्यों' की तरह झूठे साबित हो सकते है ।


आज अर्थ जगत में 'स्टार्टअप्स' का बोलबाला है । कहा जा सकता है - विश्व पूँजीवाद की अभी की एक सबसे रोमांचक उत्पत्ति । यह अर्थ-व्यवस्था में एक प्रकार की नयी जेनेटिक इंजीनियरिंग अथवा जेनेटिक रिपेयरिंग के तत्वों की स्थापना है । असंख्य छोटी-छोटी आर्थिक प्रयोगशालाएँ । इंटरनेट के साथ आई संपर्क और संचार की नई तकनीक के प्रयोग की संभावनाओं की प्रयोगशालाएँ ! हाथ में स्मार्ट फोन लिये एक नये प्रकार के मनुष्य को केंद्र में रख कर विकसित की जा रही नई अर्थ-व्यवस्था की प्रयोगशालाएं । सचमुच, इन पर उद्योगों और वाणिज्य के सामान्य नियमों को लागू करके देखने पर इन्हें पूरी तरह से समझना मुश्किल होगा ।

एंगेल्स ने कहा था कि भौतिकवाद को प्रत्येक वैज्ञानिक आविष्कार के साथ अपने रूप को बदलना होगा । भौतिकवाद के सामाजिक रूप में यह परिवर्तन स्वत:स्फूर्त होकर भी किसी न किसी रूप में निदेशित भी होता है । वैज्ञानिक खोजों के साथ ही उनके सामाजिक प्रभावों को अंजाम देने वाली इसकी अपनी अन्तर्निहित चालक शक्तियाँ भी पैदा हो जाती है । खोज जितनी बड़ी होगी, रूप में परिवर्तन की प्रक्रिया का आयतन और संभवतः गति भी उतनी व्यापक और तेज़ होगी । अमेरिका में सिलिकन वैली और गराज वर्कर्स के ज़रिये पूरे मानव जीवन के डिजिटलाइजेशन का जो काम प्रारंभ हुआ, उसी की शाखाओं, उप-शाखाओं का संजाल दुनिया के कोने-कोने में फैल चुका है । यही स्टार्ट्सअप का संसार है । इसकी गति को दुनिया के अर्थशास्त्री विस्फारित ऑंखों से देख रहे हैं । व्यापार के विस्तार में ऐसी गति ! यह चल नहीं सकता । हाल के 'इकोनॉमिस्ट' की तरह की रंगीन और पीली आर्थिक पत्र-पत्रिकाओं के अंकों को देख लीजिये । ये सब डाटकाम बबूले से लेकर इन नयी-नयी कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव के क़िस्सों के साथ ही ऐसी तमाम कूपित क़िस्म की प्रतिक्रियाओं से भरी हुई दिखाई देती है ।


लेकिन हमें तो इन प्रतिक्रियाओं से लगता है जैसे कोई सिरफिरा हर दिन टूट कर गिरते सितारों के नज़ारें देख कर यह कहने लगे कि सारे सितारें इसी प्रकार एक दिन टूट कर महाशून्य में विलीन हो जायेंगे और आसमान बिना सितारों का होगा ! दरअसल, यह मूलत: यथास्थितिवादियों की गुहारें भर हैं । वे इस नये विस्फोटक विस्तार में विद्रोह की गंध पाते हैं । वे इसे बेड़ियों में जकड़ कर अनुशासित करना चाहते हैं । इसमें उन्हें वर्तमान व्यवस्था के अंतिम मान लिये गये चौखटे के बाहर चले जाने का ख़तरा नज़र आने लगता है । यह शुद्ध पूँजी से पूँजी बनाने के पूँजीवादी जादू के लिये चुनौती जैसा है ।


इकोनॉमिस्ट' पत्रिका के 5-11 दिसंबर 2015 के अंक में इन स्टार्टअप्स के बूते ही तो पूँजीवाद को 'अति सक्रिय, फिर भी शांत' (Hyperactive, yet passive') कहा गया है । सक्रियता स्टार्टअप्स की और शांति पूँजीवाद में गहरे तक बैठ चुकी मंदी और गतिरोध के संकट की । अन्यथा, पूँजीवाद में 'शांति' का क्या काम !

हम यह इसलिये कह रहे है क्योंकि स्टार्टअप्स सिर्फ व्यवसाय नहीं है । इसके मूल में स्मार्ट फोन वाला एक नया आदमी है, उसकी उद्यमशीलता है । इससे व्यापार के साम्राज्य पैदा हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं । लेकिन ये मानव जीवन में एक बड़ा परिवर्तन ज़रूर ला रहे हैं । ग़ौर करने की बात यह है कि इनके साथ पूँजीवाद का भविष्य जुड़ गया है, जिसके संदर्भ में मार्क्स-एंगेल्स का कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र कहता है कि पूँजीपति उत्पादन के साधनों के निरंतर क्रांतिकरण के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता है । इसीलिये हम इन्हें संकटग्रस्त पूँजीवाद की जेनेटिक रिपेयरिंग के तत्व के रूप में देखते हैं । गौर करने की बात यह होगी कि इन नये जीन्स के प्रवेश से पूंजीवाद का रूप क्या और कैसा हो जायेगा, यह सवाल अब तक भविष्य के गर्भ में ही है, जिसका संकेत विनोद खोसला की उलझनों में दिखाई देता है ।


बहरहाल, स्टार्टअप्स में निमज्जित नौजवानों का एक अत्यंत विकसित और सफल रूप स्टीव ज़ाब्स या जुकरबर्ग है । ज़ाब्स कहता था कि हम नहीं जानते, दुनिया क्या चाहती है । हम क्या चाहते हैं, उसे हम जानते हैं । यह स्टीव ज़ाब्स नहीं, उसकी ज़ुबान से कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन और इंटरनेट की सम्मिलित शक्ति बोल रही थी । ऐसी ज़ुबान में एक कोरा व्यवसायी नहीं बोल सकता, जो अक्सर बाज़ार की माँग/ ज़रूरत का हवाला देता है । ऐसी बातें कि हम यह चाहते हैं, और लोगों को मंज़ूर हो तो अपनायें अन्यथा अस्वीकार कर दें, अग्रदूत बोला करते हैं । सिलिकन वैली का बादशाह, विनोद खोसला जब कृत्रिम ज्ञान के क्षेत्र में चल रहे अभावनीय प्रयोगों के आधार पर भविष्य में राज्य और पूँजीपतियों की भूमिका की समाप्ति की बात कहता है तभी स्टार्टअप्स की चौतरफ़ा फैली टुकड़ियों में पनप रही विद्रोही वैकल्पिक अर्थनीति के तत्वों की पहचान भी की जा सकती है ।


स्टार्टअप्स के उठने-गिरने की हर रोज़ की कहानियों के बावजूद यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि मानव श्रम की इन प्रयोगशालाओं का शायद ही कभी कोई अंत होगा ।  ऐसे तमाम तथ्यों की रोशनी में खोसला कहते है कि वे पूंजीवाद के कट्टर समर्थक है और इसी नाते वे साफ शब्दों में कहते हैं कि आज जो कुछ चल रहा है, उसे अबाध गति से और भी तेजी के साथ चलने दिया जाना चाहिए। खोसला की ‘फ़ोर्ब्स’ पत्रिका के ब्लाग पर जारी की गई इस पोस्ट पर अपने ब्लाग 'चतुर्दिक' में हमने एक टिप्पणी की थी। उसमें हमने श्रम का कोई मूल्य न रह जाने वाले उनके कथन के पहलू पर यह बुनियादी सवाल उठाया था कि यदि किसी समाज में श्रम शक्ति का मूल्य नहीं रहता है, तो फिर पूँजी का भी क्या मूल्य रह जायेगा ? श्रमिक और पूँजीपति का अस्तित्व परस्पर निर्भर है । यदि पूँजीपति की भूमिका उत्पादन के काम में ख़त्म हो जाती है तो श्रमिक की तरह ही उसके अस्तित्व का भी कोई कारण बचा नहीं रह जाता है। अगर कुछ बचा रह जाता है, तो वह है, राज्य की भूमिका । और समाज में वर्गीय अन्तर्विरोधों के अंत का अर्थ है राज्य के वर्गीय चरित्र का भी लोप, वस्तुतः राज्य का लोप । तब हमने पूछा था, क्या सचमुच, एक शोषण-विहीन, राज्य-विहीन समाज के निर्माण का मार्क्स का यूटोपिया आदमी की जद के इतना क़रीब है ?


जीवन के दूसरे विषयों की तरह ही अर्थ-व्यवस्था के विषयों को भी हमेशा पूरी तरह से स्याह-सफेद रंगों में नहीं समझा जा सकता है । हम समझते हैं कि अर्थ-व्यवस्था में भी हमेशा एक प्रकार की तरलता बनी रहती है । कितने प्रकार के स्वार्थ एक साथ काम करते हैं, उनकी पूरी गणना भी नहीं की जा सकती । इसीलिये जो लोग राजनीति और संस्कृति के तमाम विषयों को अर्थ-व्यवस्था की हलचलों से जोड़ कर व्याख्यायित करने का उतावलापन दिखाते हैं, हमें लगता हैं, वें कोरी लफ़्फ़ाज़ी, कुछ जड़सूत्रों की तोता-रटंत के सिवाय और कुछ नहीं कर रहे होते हैं । उनकी राजनीति और अर्थनीति, दोनों की समझ छिछली होती है ।


अर्थनीति से जुड़ी ऐसी ही तमाम आशंकाओं और संभावनाओं के विषय पर समय-समय पर किये गये हमारे लेखन को 'चतुर्दिक श्रृंखला' के इस तीसरे खंड में संकलित किया गया है । हम नहीं जानते, आज के समय में अर्थनीति संबंधी विमर्श में इस लेखन को कितना अपनाया जायेगा । अर्थनीति विषयक हमारे लेखन का एक ऐसा संकलन तैयार करने के लिये अनामिका प्रकाशन के पंकज शर्मा आंतरिक आभार के पात्र है ।



दिसंबर 2015            

बुधवार, 27 जनवरी 2016

‘मां सरस्वती’ के वरद् पुत्र अज्ञेय

-अरुण माहेश्वरी





आलोचना जब अपने विषय में पूरी तरह डूब कर रह जाती है, कहा जाए, प्रेयस् में खो जाती है, वह आलोचना नहीं रहती, अनालोचना हो जाती है। इस धुन में वह अपने अंदर के उन निहायत औपचारिक से सवालों को भी खो बैठती है कि उसके लिये आखिर विषय की प्रासंगिकता ही क्या है ? कहते हैं कि मनुष्य अपने को ईश्वर में जितना खपाता है, उसका अपना अपने पास उतना ही कम रह जाता है। मजदूर के श्रम का उत्पाद जितना ज्यादा होता है, उसके स्वयं का मूल्य उतना ही कम हो जाता है ।

पिछले दिनों हम जब केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी आदि के साथ ही रवीन्द्रनाथ और रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, निराला, प्रसाद, नंददुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा आदि के जरिये हिंदी साहित्य के वर्तमान विरूपित से दिखाई दे रहे परिदृश्य पर लिख रहे थे, तभी यह साफ था कि इस परिदृश्य को कभी भी सिर्फ दृश्य में उपस्थित जनों की चर्चा से मूर्त नहीं किया जा सकता है। बल्कि, इसे रूपायित करने के लिये उन तमाम विगत हस्तियों की चर्चा करना भी समान रूप से जरूरी है, जो अपने जीवित काल से लेकर आज तक भी, इस परिदृश्य पर अपनी प्रेतछाया के प्रभाव को बनाये हुए हैं ।

कहना न होगा, हिंदी साहित्य जगत पर ऐसी एक सबसे प्रमुख प्रेतछाया का नाम है - अज्ञेय। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'।

चार साल पहले उनका जन्म शताब्दी वर्ष था। उस मौके पर कई आयोजन हुए। उन आयोजनों को देख कर इस लेखक ने एक छोटी सी टिप्पणी लिखी थी -

“सात मार्च 1911 को जन्मे अज्ञेय जी का शताब्दी वर्ष पूरा होगया। हिंदी जगत में उनके लिये श्रद्धा-सुमनों की कोई कमी नहीं रही। अलग-अलग शहरों में कई आयोजन हुए। अखबारों, पत्रिकाओं में कुछ छोटी-मोटी टिप्पणियां आयीं। उनके निकट के मित्रों, संबंधियों ने एक-दो किताबें भी निकाली। कुछ स्वघोषित ‘सांस्कृतिक दूतों’ के शहर-शहर फेरे लगे। लेकिन गौर करने की बात यह है कि कुल मिला कर यह पूरा वर्ष बिना किसी वैचारिक उत्तेजना और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यग्रता के, एक स्निग्ध और शान्त, तनाव-रहित वातावरण में बीत गया।

“रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद, और मुक्तिबोध तो जाने दीजिये, यहां तक कि तुलसी जयंती भी आज तक सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों पर कुछ वैचारिक उत्तेजना पैदा करती है। लेकिन हाल के वर्षों तक हिन्दी में सबसे विवादास्पद समझे जाने वाले अज्ञेय की शताब्दी कोई मामूली वैचारिक आलोड़न भी पैदा नहीं कर पाये, यह स्थिति किस बात का संकेत है?

“क्या यह अज्ञेय पर, या आज के समय पर, या दोनों पर ही कोई विशेष टिप्पणी है ।

“जिन नामवरजी की अज्ञेय के साथ एक मंच पर उपस्थिति से वैचारिक रक्तपात का कयास लगाया जाता था, उन्होंने भी इस शताब्दी वर्ष में दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थनाएं भर करके अपना काम चला लिया। और जो ‘अज्ञेयपंथ’ का झोला लिये घूमते रहे हैं, उनके पास पहले भी कहने के लिये सिर्फ श्रद्धा और भक्ति ही थी, शताब्दी वर्ष के समारोहों में भी उसीका प्रदर्शन किया गया। वैसे भी, आज के ‘समाजवाद-विहीन’ वैश्वीकरण के युग में अज्ञेय के विचारों के दो प्रमुख फलक, कम्युनिस्ट-विरोध और पूरब-पश्चिम द्वैत वाली पंडिताई के खरीदार कहां बचे हैं! कुल मिला कर इस पूरे साल ‘अज्ञेयपंथ’ और ‘नामवरपंथ’ की खूब छनी। सब कुछ भले-भले निपट गया।

“इस ‘भले-भले’ ने ही आज हमारे लिये यह प्रश्न छोड़ दिया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ ? किसी जमाने में हिंदी में प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के बरक्स अज्ञेय का प्रयोगवाद (परिमल) विचारधारा के एक दूसरे धुर का मंच हुआ करता था। पचास के दशक के शीत युद्ध के जमाने में एक ओर जहां सोवियत-प्रेरित समाजवाद, जनतंत्र और शांति का आंदोलन था तो दूसरी ओर अमेरिका के तत्वावधान में ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ का ‘समाजवादी निरंकुशता’ के खिलाफ ‘विचारधारा की समाप्ति’ के नारे के आधार पर तैयार किया गया पश्चिमी बुद्धिजीवियों का विरोधी मंच था। अज्ञेय जी ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के मंच से जुड़े हुए थे, इसके अनेक साक्ष्य हिंदी में चर्चित हो चुके हैं। किसी भी वजह से प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के साथ निर्वाह करने में असमर्थ लेखकों के लिये परिमल एक अलग मोर्चे की भूमिका अदा कर रहा था। इसीलिये स्वाभाविक तौर पर हिंदी में उस काल की सारी साहित्यिक-वैचारिक बहसों के केंद्र में अज्ञेय हुआ करते थे। लेकिन आज वह सारा विवाद कहां रफ्फू-चक्कर होगया ?

“यही एक प्रश्न किसी को भी आज की साहित्यिक दुनिया के सच पर गहराई से नजर डालने के लिये प्रेरित कर सकता है।

“आजादी के पहले की और शीत युद्ध के पूरे जमाने की बात छोड़ दीजिये। तब वास्तव में दुनिया दो शिविरों में बंटी हुई थी- साम्राज्यवादी और समाजवादी। 80 के दशक तक समाजवादी शिविर की अनेक बुनियादी कमजोरियों और बिखराव के उजागर होने पर भी धरती पर सोवियत संघ की मौजूदगी मात्र से विचारों की दुनिया में शीतयुद्ध का तनाव बना हुआ था। इसीलिये, तब तक भी भारत सहित बहुत से नवस्वाधीन विकासशील देशों में साम्राज्यवाद-विरोधी गुट-निरपेक्षता, गैर-पूंजीवादी विकास की संभावनाओं के आधार पर जनतंत्र और उसके विस्तार की लड़ाई की एक खास ‘समाजवादी’ दिशा थी। चीन का ‘नया जनवाद’ ढेरों नयी वैचारिक उद्भावनाओं का स्रोत था। हिंदी में तभी प्रेमचंद शताब्दी के दौरान प्रेमचंद को केंद्र में रख कर चंद्रबली सिंह ने ‘आलोचनात्मक’ और ‘समाजवादी’ यथार्थवाद के साथ ही यथार्थ की एक और, तीसरी श्रेणी ‘जनवादी क्रांतिकारी यथार्थवाद’ की अवधारणा रखी। प्रगतिशील लेखक संघ वस्तुत: बिखर गया, लेकिन हिंदी-उर्दू के लेखकों के एक नये संगठन, जनवादी लेखक संघ (1982) का उदय हुआ। जनतंत्र का सवाल केंद्रीय सवाल बना और भारत की जनता की जनतंत्र की लड़ाई के मोर्चे की जो इंद्रधनुषी तस्वीर पेश की गयी उसमें डा. रामविलास शर्मा से लेकर अज्ञेय तक, सबके लिये समान स्थान का आश्वासन था। यह एक अलग विचार का प्रश्न है कि व्यवहार में ऐसा मोर्चा कभी भी संभव हुआ या नहीं हुआ ?  जाहिर है कि इस पूरे घटनाचक्र की पृष्ठभूमि में 1975 का आंतरिक आपातकाल और 1977 में जनता पार्टी तथा तीन राज्यों में वामपंथियों की भारी जीतों के अनुभव की भी बड़ी भूमिका थी।

“ आंतरिक आपातकाल के पहले और बाद के इस दौर में अज्ञेय जीवित ही नहीं, खासे सक्रिय थे। 1965 में वे बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लौट कर तीन सालों तक टाइम्स आफ इंडिया के हिंदी साप्ताहिक ‘दिनमान’ के संस्थापक संपादक की भूमिका निभाने के बाद 1973-74 के दौरान जयप्रकाश नारायण के साप्ताहिक ‘एवरीमैन्स वीकली’ के संपादक (1973-74) रहे और 1977-80 तक नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक का काम संभाला। वह पूरा दौर भारत में जनतंत्र की रक्षा के लिये सबसे तीव्र संघर्ष का दौर था और जयप्रकाश के साथ जुड़ कर अपने अखबारों के जरिये अज्ञेय ने उस पूरी लड़ाई में अपनी एक भूमिका अदा की थी।

“फिर भी आज तक कोई यह प्रश्न क्यों नहीं उठाता है कि जनवादी लेखक संघ के वैचारिक परिप्रेक्ष्य के इंद्रधनुषी दायरे में अज्ञेय को उनके जीवित काल में कभी क्यों नहीं शामिल किया जा सका ?

"इस एक सवाल के जवाब से जहां प्रलेस-जलेस की विचारधारात्मक प्रतिश्रुतियों और निष्ठाओं की सचाई की परख हो सकती है, वहीं अज्ञेय की भी ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ की वास्तविकता को समझा जा सकता है। कहना न होगा कि आज जहां जलेस-प्रलेस प्रकार के संगठन पार्टी की जकड़नों से बेदम होकर अस्तित्वीय संकट के गह्वर में हांफ रहे हैं, और लेखक क्रमश: जयपुर उत्सव की तरह की साहित्य-मंडियों में अपनी कीमत लगवाने को व्याकुल हो रहे हैं, वहीं अज्ञेय की ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ का भी आज कोई दो-कौड़ी का दाम लगाने के लिये तैयार नहीं है। अज्ञेय शताब्दी वर्ष के आयोजनों की रपटों से तो कम से कम यही जाहिर होता है।

“सचमुच यह एक अनोखी विडंबना है। नामवर का लोप ही अज्ञेय का भी लोप है। ऐसे ही ‘विचारधारा का अंत’ विचार मात्र के अंत का भी सबब बनता है। “





गौर करने की बात यह रही कि तब कोलकाता से नियमित निकलने वाली पत्रिका ‘वागर्थ’ ने अपनी समझ से, अज्ञेय जी की अर्चना-आरती के पवित्र मौके पर ऐसी किसी संशयपरक टिप्पणी के प्रकाशन को अनुचित माना। जिस अखबार में हम अक्सर लिखते थे, उसकी अज्ञेय जी के प्रति प्रतिबद्धताएं इतनी उत्कट थी कि आम तौर पर साहित्यिक अखाड़ेबाजी के आकर्षण के प्रति आग्रही होने के बावजूद प्रात:स्मरणीय अज्ञेय जी पर इतने हलके से उठाये गये सवाल भी उसके लिये ईश-निंदा से कम अपराध नहीं था। अशोक वाजपेयी की तरह के सत्ताधारियों ने अपने में भावी ‘अज्ञेय’ को देखना शुरू कर दिया था और इसीलिये किसी न किसी रूप में सरकारी सहयोग से सांसें लेने वाली बाकी पत्रिकाओं के दरवाजों पर दस्तक देने का साहस नहीं किया जा सकता था। यूपीए टू का जमाना था, वामपंथियों की कतारों में वैसे ही पस्ती थी। पहले से ही साहित्य में विचारधारात्मक संघर्ष के सूत्र छूट जाने से संगठनों की पत्रिकाओं में भी धारा के विरुद्ध चलने का कोई उत्साह नहीं था। फेसबुक की तरह के वैकल्पिक मंच का तो कोई अस्तित्व ही नहीं था। जुकरबर्ग ने 2004 में फेसबुक के सोशलसाइट को अमेरिका में शुरू तो कर दिया था, लेकिन उसका अन्तरराष्ट्रीय विस्तार 2012 के आईपीओ के बाद ही संभव हो पाया था। हमारा ब्लाग ‘चतुर्दिक’ भी दो साल बाद, 2013 में शुरू हुआ।

इसप्रकार, कुल मिला कर, अज्ञेय, और साथ ही नामवर जी के प्रति भी आलोचनात्मक दृष्टि से लिखी गई एक छोटी सी टिप्पणी के लिये हिंदी जगत के सारे दरवाजे बंद थे। गनीमत थी कि ‘विध्वंसक’ राजेन्द्र यादव जी मौजूद थे। उनके ‘हंस’ में उसे जगह मिली। लेकिन बाकी हिंदी जगत की स्थिति तो यही थी - जैसा  कांट के बारे में कहते है - उन्हें सम्राट के खिलाफ मुकदमा चला कर उसे फांसी पर चढ़ाना मंजूर नहीं था, उसे वे खूनी विद्रोहियों द्वारा सीधे सर कलम करने से कहीं ज्यादा अश्लील मानते थे। हिंदी प्रतिष्ठानों के लिये अज्ञेय को गाली दिया जाना मंजूर हो सकता है, लेकिन उन्हें बाकायदा तर्कों से खारिज करने की प्रस्तावना तक को नहीं स्वीकारा जा सकता है। शुद्ध आभिजात्यों के न्यायशास्त्र का शासन था !

शताब्दी वर्ष में अज्ञेय जी के नाम पर साहित्य में असीम-अनंत के संधानियों के ढोल-नगाड़े बजते रहे। हिंदी के सारस्वत पुरुष के लिये मां सरस्वती की आर्तपुकार का व्यापार मजे से चलता रहा। साहित्य अकादमी ने 2012 में अज्ञेय के पत्रों का एक संकलन ‘अज्ञेय पत्रावली’ (सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी) प्रकाशित कर और ‘रचना संचयनों’ की अपनी श्रृंखला में ‘अज्ञेय गद्य रचना संचयन’ पर काम को शुरू कर, जो अभी 2015 में सवा नौ सौ पन्ने के संकलन के रूप में प्रकाशित हुआ है, शताब्दी के पालन की अपनी औपचारिकताएं पूरी की।

इन सबके बावजूद, समग्रत:, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अज्ञेय शताब्दी वर्ष के बीच से न लेखक अज्ञेय का वैसा कोई पुनर्जन्म हुआ जैसा रवीन्द्रनाथ या प्रेमचंद के शताब्दी वर्षों में उनका हुआ था, और, न ही आधुनिक युग के सवालों पर अज्ञेय के विचार कोई नई दृष्टि देते हुए प्रतीत हुए। अपने जीवित काल में हिंदी साहित्य जगत की वैचारिक टकराहटों के केंद्र में रहने वाला लेखक-विचारक, तीन दशक से भी कम समय में, अपने जन्म-शताब्दी वर्ष के दौरान सिर्फ श्रद्धासुमनों का पात्र रह गया, लेशमात्र रचनात्मक और वैचारिक उत्तेजना का विषय नहीं बन पाया।

हमारा सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ ? क्यों एक समर्थ गद्यकार, कथाकार, उपन्यासकार, कवि, विचारक और यात्रा-वृत्तांतों का प्रभावशाली लेखक अपने किसी भी पात्र, काव्यबिंब, विचार या शैली की विशिष्टता के साथ साहित्य के प्रतिमानों की किसी गंभीर चर्चा के केंद्र में नहीं दिखाई दिया ? उनको लेकर यदि कुछ चीजों पर चर्चा हुई तो वे थी उनका कथित ‘अति-व्यस्त’ जीवन , उनकी संपादन योजनाएं, स्वदेश-विदेश यात्रा की योजनाएं, संगोष्ठी, साहित्यिक आयोजनों, जानकी यात्रा, भागवत भूमि यात्रा, वत्सल निधि और लेखक शिविरों की। खुद अज्ञेय ने 1943 में ही ‘तारसप्तक’ की भूमिका में अपने को ‘योजना-विश्वासी’ के रूप में बदनाम बताया था।‘अज्ञेय पत्रावली’ की भूमिका में विश्वनाथ तिवारी भी बताते हैं, ‘‘अज्ञेय के पत्रों से जाहिर है कि उनका जीवन एक अति व्यस्त लेखक का जीवन था।’’ अज्ञेय की कविताओं में बार-बार आने वाला एक लगातार, अनथक रूप से दौड़ती, छटपटाती, तड़पती ‘सोन मछली’ का आत्म-बिंब ही इस शताब्दी वर्ष के आयोजनों के प्रमुख प्रतीक के रूप में सामने आया। छ: पंक्तियों की उनकी कविता ‘सोन मछली’ को खूब सुना गया - ‘‘हम निहारते रूप,/ कांच के पीछे/ हांप रही है मछली।...’’

अज्ञेय ने अपने साहित्यिक जीवन में ‘समाजवादी निरंकुशता’ के खिलाफ ‘आधुनिकता’ का, व्यक्ति-स्वतंत्रता का झंडा उठाया था। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि शेखर और भुवन जैसे पात्रों से मुखरित अज्ञेय का जीवन-दर्शन पश्चिम की आधुनिकतावादी काफ्कानुभूति या किसी अस्तित्वीय संकट की छटपटाहट या पीड़ा का दर्शन नहीं था। अज्ञेय कहीं से भी आधुनिक जीवन के तनावों को नहीं जीते थे। शुरू से उन्हें अपने आत्म में झांकने से परहेज था, क्योंकि उनका विश्वास था कि ‘‘अपने को बहुत अधिक जानने से कोई लाभ नहीं होता, केवल क्लेश-ही-क्लेश होता है।’’(‘चिन्ता’ की ‘छाया-कथा’ से) वे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की भाव-भूमि पर अपने को हमेशा ‘असीम’ की देहरी पर, तृप्त श्रद्धालीन, श्रद्धासीन भाव के साथ जीते थे। एक आततायी दुनिया में विखंडित अकेले आदमी के यथार्थ और तनावपूर्ण आधुनिक भाव बोध से वे कोसों दूर थे। वैसे भी किसी ‘योजना-विश्वासी’, उत्सवधर्मी, तीर्थ यात्री, आयोजन-प्रिय लेखक का उस आधुनिकता बोध से कोई जैविक संपर्क हो भी नहीं सकता था, जिसने ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के मंच को एक वैचारिक संगति का आधारप्रदान किया था और दुनिया के कई बड़े-बड़े लेखकों को भी अपनी ओर खींचने में सफल हुआ था। कहना न होगा, अज्ञेय का इस मंच से संपर्क जितना उनका नैसर्गिक चयन नहीं था, उससे कहीं ज्यादा नितांत स्थानीय, स्वार्थपूर्ण और प्रगतिशील लेखक संघ के विरोध में अपना एक मंच तैयार करने के निजी आग्रह का परिणाम था।

अन्यथा, उत्सवधर्मिता को रचनाधर्मिता के विरुद्ध तो मुक्तिबोध मानते थे, अज्ञेय नहीं ! आधुनिकतावादी व्यक्तिवाद और उत्सव-आयोजन - ये दो पूरी तरह से अलग-अलग धाराएं है, किसी सरल रेखा के दो छोर नहीं। इनमें क्या काम्य है और क्या त्याज्य, इसप्रकार का मूल्य-निर्णय एक दीगर सवाल है। लेकिन यह साफ है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास के एक क्रूरतम अनुभव के बाद व्यर्थता के यथार्थबोध की बेचैनी से अज्ञेय का कोई संबंध नहीं था। उनका हिंदी आलोचना में बार-बार दोहरायी जाने वाली इस निराधार, बल्कि कोरी वितंडावादी धारणा से कोई संपर्क नहीं था कि ‘आधुनिकतावाद’ का अंत अंतत: पोंगापंथी परंपरावाद के गर्त में ही होता है। उल्टे, अंत तक जाते-जाते तो उनका प्रत्यावर्तन सन् 1912-13 के ‘मैथलीशरण गुप्त’ की ‘भारत-भारती’ की संवेदना में होता है। यह एक प्रकार से भारत के ‘युगांतरवादी’ क्रांतिकारियों के पुनरुत्थानवाद का भी प्रत्यावर्तन था। इस अर्थ में अज्ञेय छायावादी युग की संवेदना और भाषाई संस्कार में शायद कुछ भी नया नहीं जोड़ पाये थे।  

बहरहाल, प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपनी पुस्तक ‘संवाद’ के लेखों में अज्ञेय के बारे में लिखते हुए यही केंद्रीय सवाल उठाया था कि ‘‘अज्ञेय अन्तर्मुखी रचनाकार है। तब वे सप्तकों का संयोजन और पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन वगैरह कैसे कर सके ? ’’

उन्हीं दिनों हमने श्रोत्रिय जी के सामने एक प्रतिप्रश्न रखा था कि ‘‘क्या अज्ञेय और पीडि़त जनता की अन्तर्मुखता एक है ? क्या एक शोषित-पीडि़त इंसान द्वारा अपने भौतिक जीवन में पराजयों से निपटने के लिये अपने अन्तर में नैतिक विजयों के रचे जाने वाले समर-आयोजनों का अज्ञेय के किसी भी ‘भीतरी संघर्ष’ से कोई मेल है ? और क्या चंद ‘सुशिक्षित’, ‘संस्कृतिवान’, शक्तिशालियों के साथ मिल कर किये जाने वाले वैभवपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का उनकी कथित अन्तर्मुखता से कोई मूलभूत विरोध है ? (साहित्य में यथार्थ : सिद्धांत और व्यवहार, अरुण माहेश्वरी़, पृष्ठ - 122)

अज्ञेय सोलह साल की उम्र में क्रांतिकारियों के संपर्क में आगये थे। 1930 में जब उन्नीस के थे, पहली बार गिरफ्तार हुए, फिर 1931-33 तक जेल की कालकोठरी में बंद रहे। जेल में लिखी गई उनकी छ: कहानियों का जो पहला संकलन ‘कोठरी की बात’ प्रकाशित हुआ, उसकीपहली कहानी है - ‘छाया’। जेल के वार्डन के मुंह से कही गयी क्रांतिकारी अरुण की साथी सुषमा की फांसी की कहानी। अरुण खुद उस फांसी का साक्षी बनता है - मृत सुषमा के मुंह की ओर देर तक देखते हुए ‘बहुत धीमी, कांपती आवाज में बोला, शारदा तुम्हारी जीत हुई’। जेल का डाक्टर सुषमा के शव को दफ्तर ले जाकर ‘पब्लिक’ को सौंप देने की बात कहता है, तो अरुण बोलता है -‘पब्लिक !’
‘वह फिर बोला, ‘पब्लिक’!’
‘‘फिर एक डरावनी हँसी हँसा... और बोला ‘चलो।’ (कोठरी की बात, प्रथम संस्करण, पृष्ठ - 29)
‘छाया’ के बाद ही इस संकलन की दूसरी कहानी है - ‘द्रोही’। इसमें कथा नायक कहता है - ‘‘जबसे मैं बंदी हुआ हूं मेरा आत्म-संयम टूट-सा गया है। मैं क्षण भर भी अपने मनोवेग को थाम नहीं सकता! बेलगाम घोड़े की तरह वह मुझे जिधर चाहता है, लेकर भाग जाता है। और मैं डर कर उससे चिपट कर बैठा रहता हूँ कि कहीं गिर न पड़ूँ उसे रोकने का प्रयत्न करने के लिए मेरे हाथों को अवकाश ही नहीं मिलता।
‘‘मैं द्रोही हूँ ? कौन कहता है ?
‘‘मैंने एक बार, एक अस्थायी जोश में आकर, राजद्रोह करने का और करवाने का बीड़ा उठाया था। पर यह तो यौवन की एक उमंग थी, हृदय का एक उद्गार था। उमंग आई और चली गई, उद्गार उठा और मिट गया। उस एक बात के लिए क्या मै सदा के लिए द्रोही होजाऊंगा ? और फिर उसका समुचित प्रायश्चित भी तो कर रहा हूँ। जो आग मैंने सुलगाई थी, क्या उसे बुझाने में सरकार की भरसक सहायता नहीं कर रहा हूँ ?
‘‘देशद्रोह !
‘‘नहीं, यह देशद्रोह नहीं है। जो बीज मैंने बोया था, उससे अगर पौधा अच्छा नहीं लगा, तो क्यों न मैं उसकी जड़ काटूँ, क्यों न उसे उन्मूल उखाड़ फेकूँ और नये वृक्ष के लिए स्थान बनाऊँ।’’ (वही, पृष्ठ 37-38)

जेल से निकलने के बाद सन् 1935 की अज्ञेय जी की कविता है - ‘‘क्या मेरे कर्मों का संचय मुझको चिंता छूट गई है-/ मैं बस जानूँ, मैं धनु हूँ, जिसकी प्रत्यंचा टूट गई है !’’

जेल में ही अज्ञेय जी की ‘कोठरी की बात’ की कहानियों, ‘भग्नदूत’ और ‘चिंता’ की कविताओं की रचना के अलावा ‘शेखर : एक जीवनी’ का भी पहला मसौदा तैयार हो गया था। जीवन से ‘द्रोह’ नामक चीज हमेशा के लिये विदा हुई। द्रोह के दाग से पूरी तरह मुक्त नये अज्ञेय, शेखर की तरह की तमाम उलझनों को भी परे रख कर ‘नदी के द्वीप’ के भुवन में स्वछंद जीवन के उच्छवास को भरपूर जी लेने की अनंत कामना के साथ अवतरित हुए। कहना न होगा, मछली की छटपटाहट  और हांफनी के मूल में उसकी ‘रूप तृषा’ है, किसी अस्तित्विीय संकट का भाव बोध नहीं !

अज्ञेय ने स्वतंत्रता आंदोलन से नाता तोड़ा,  द्वितीय विश्वयुद्ध में ‘पिपुल्स वार’ की सैद्धांतिकता ने ब्रिटिश शासकों के कोप से दूर रखा और वे प्रगतिशील लेखक संघ के भी संपर्क में आएं। रेडिकल ह्यूमेनिस्ट एम. एन. राय ने उन्हें गांधी से अलग रहने के तर्क दिये, आजादी के ठीक बाद, जब कम्युनिस्टों ने ‘यह आजादी झूठी है’ का नारा दिया और भारत सरकार के क्रूर दमन को निमंत्रित किया, तब तक अपने ‘तारसप्तक’(1943) में मार्क्सवादियों के साथ निबाह करने में सक्षम अज्ञेय प्रलेस के विरुद्ध ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के भारत-दूत बन चुके थे। सन् ‘75 के आंतरिक आपातकाल के पहले तक ‘दिनमान’ के यशस्वी संपादक जयप्रकाश नारायण के ‘एवरीमैन्स’ से शुरू के सिर्फ पांच महीने जुड़े रहे और  बिहार आंदोलन के पहले ही दिसंबर 1973 में उससे त्यागपत्र दे दिया। सन् ‘75 में आंतरिक आपातकालकी घोषणा के बाद तो एक लंबे अर्से के लिये जर्मनी के हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में जा बसे।

कहने का मतलब यह है कि जिस धनु की प्रत्यंचा तीस के दशक में ही टूट गई थी, वह फिर किसी युद्ध के मैदान में नहीं चढ़ी। ‘‘मेघाच्छन्न आकाश, प्रकाशहीन सांयकाल, पवन अचंचल, चंचला की अदृश्य और उड़ते-उड़ते सहसा पंख टूट जाने से विवश गिरता हुआ अकेला-ही-अकेला, एक पक्षी जो गिरता है और फिर अपनी उड़ान, अपना स्थान पाने के लिये छटपटा रहा है, छटपटा रहा है‘‘। ‘शेखर एक जीवनी’ में युयुत्सु भाव को ‘वय:संधि’ की छटपटाहटों के तौर पर तिरोहित कर अज्ञेय का तनावों से विरेचित, अनंत कामनाओं से भरे आभिजात्य मनुष्य के रूप में नया जन्म हो चुका था। जहां तक वैचारिकता का सवाल है, वह तो उनकी बची-खुची पहचान के भी लोप का कारण बनी। वह अपने मनोविज्ञान पर अन्यों के जैसा दिखने के लिये चढ़ाया गया नकाब था। जैसे हम देखते हैं, मोदी के प्रचार में सबकों मोदी के चेहरे का नकाब पहना कर व्यक्तित्व-शून्य, यकसां बना दिया जाता है। आदमी की क्षुद्रता और उदात्तता की सारी विशिष्टताएं इस सामूहिक-पहचान में छिपाई जाती है।

‘शेखर’ के बारे में अज्ञेय जी कहते हैं कि यह एक घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए (vision) को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है। प्रसाद जी की घनीभूत पीड़ा दुर्दिन में आंसू बन कर आती है। और अज्ञेय जी की घनीभूत वेदना जीवन के थोथे दार्शनिक विलास, स्व-विरोधी बातों के उन्मादित-विमर्श के एक ऐसे दुखांत की विडंबना के साथ आती है जिसका अंत बेहद नीरस, कोरी ढर्रेवरता की वापसी में होता है - भारतीय दर्शन के नीरस दुखांत की विडंबना की तरह जिसकी तमाम धाराएं शंकर में समाहित होकर कोरे कर्मकांडों में पर्यवसित हो जाती है। जिसमें आगे भक्ति और तत्व मीमांसा एकमेक हो जाते हैं।

स्लावोय जिजेक ऐसे ही एक प्रसंग में शेक्सपियर के नाटक Troilus and Cressida के पांचवे अंक के दूसरे दृश्य के इस अंश को उद्धृत करते है:
O madness of discourse,
That cause sets up with and against itself !
Bi-fold authority ! where reason can revolt
without perdition, and loss assume all reason
Without revolt
(आह, विमर्श का पागलपन,/ कर्ता खुद के साथ और खुद के खिलाफ सामने आता है/ दोहरी हैसियत ! जहां विवेक विद्रोह कर सकता है/ बिना विनाश के, और विनाश सारे विवेक को धारण कर लेता है/ बिना विद्रोह के)

इस नाटक के संदर्भ में ये पंक्तियां ट्रौयलस की उन स्व-विरोधी दलीलों के बारे में है जब ट्रौयलस को क्रेसीडा की बेवफाई का पता चलता है ; वह जो कहना चाहता है एक ही सुर में उसके पक्ष और विपक्ष की सारी दलीलें देने लगता है; उसके तर्क उसकी खुद की दलीलों के खिलाफ होते हैं लेकिन उन्हें खारिज नहीं करते, उसकी अतार्किकता तर्क को बिना खारिज किये तर्क का रूप लेने लगती है। एक कर्ता जो खुद अपने खिलाफ काम करता है, एक तर्क जो खुद के अस्वीकार से जुड़ जाता है।

दरअसल, आदमी की आत्म-स्वीकृतियां जितनी अधिक बेलाग और बेलौस होती है, अपनी विसंगतियों पर वह जितना अधिक आत्म-विश्वास के साथ मुखर होता है, वह उतना ही अधिक मिथ्याचार भी कर रहा होता है। उनसे व्यक्ति के अंतरजगत की कोई जानकारी नहीं मिलती। वस्तुत: उसके पास कहने जैसा कुछ होता ही नहीं है। आदमी का आत्मोत्थान तो आत्म-विवर्तन है, उसकी अन्तर्निहित विसंगतियों की देन। वह स्व के दो बाह्य, अजैविक विलोमों के कृत्रिम द्वंद्वों से रूपायित नहीं होता। आखिरकार, शून्य में शून्य का जोड़, घटाव, गुणा, भाग - सब शून्य ही होता है।

अज्ञेय की समग्र बौद्धिक बुनावट में उनके जीवन और मानस के इस पहलू की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। जीवन का यही दंश है जिसकी वजह से ‘हांफती हुई इस सोन मछली’ को फिर कभी कोई ऐसा संगतिपूर्ण वैचारिक ठौर नहीं मिल सका, जिसके संदर्भ में एक आधुनिक विचारक के रूप में उनकी कोई अपनी स्वतंत्र पहचान बनें, अर्थात जो उन्हें व्यग्र करें, कुछ नया कहने के लिये प्रेरित करें।

अज्ञेय परिभाषित होते रहे कम्युनिस्ट-विरोध की नकारात्मकता से। यदि उनके अवचेतन को टटोले, खोजे कि उनकी सोच में दमित क्या है, तो वह कोई ‘स्वतंत्रता’ का तत्व नहीं है। यह तो उनका घोषित नारा था, बिल्कुल प्रकट, एक बार-बार दोहरायी गयी बात। और इसीलिये शायद सबसे अधिक खोखली बात भी। महज एक नियम, एक औपचारिकता! अज्ञेय में जो सर्वत्र है, लेकिन दमित है - वह है प्रगतिशीलता का विरोध, साहित्य के केंद्र में साधारण आदमी की स्थापना पर टिके यथार्थवाद का विरोध, ‘प्रेमचंद’ का विरोध, जनता के हितों के प्रति प्रतिबद्धता का विरोध - जो छिपे-ढके ढंग से आता है, डंके की चोट पर नहीं। प्रेमचंद शताब्दी पर अज्ञेय अपने लेख ‘उपन्यास सम्राट’ में संकेतों से इस ‘सम्राट’ की कोरी ‘किस्सागोई’, उसके लेखन में ‘सघन संरचना का अभाव’ की तरह की बातों से उनकी अनाधुनिकता और लघुता को जिस प्रकार उठाते हैं, वह है उनके सोच का दमित पहलू, अवचेतन में बैठी उनके विचारों की एक प्रमुख संचालक शक्ति।

इसीलिये, जैसा कि शुरू में ही कहा गया है - ‘नामवर का लोप अज्ञेय का भी लोप है’। आदमी की कामनाओं की अमूर्तता अक्सर किसी नकारात्मकता के जरिये ही मूर्त होती है, उसके किसी अभाव की पूर्ति के लिये नहीं। कामना अभाव का पर्याय नहीं है। अभाव का बोध व्यग्रता और संघर्ष की चेतना पैदा करता है, कामना सिर्फ विलास की लालसा। अज्ञेय का लेखन इसी लालसा की फैंटेसी है।

तथापि, अंतिम दिनों में जब वे अपनी कुछ ग्रंथियों से मुक्त हुए, कामनाओं की ज्वाला शांत हुई तो ‘विद्रोह‘ और ‘क्रांति’ की तरह के विषयों पर इतना जरूर कह पाये कि ‘‘इनके बारे में जरूर कुछ सोचने को है। सोचने को है तो कहने को भी होगा। लेकिन ...इनकी जो परिकल्पना ‘शेखर : एक जीवनी’ के चरित-नायक की थी वह आज मेरी नहीं है, इतना तो जरूर कह सकता हूं। रोमानी भावना का मुलम्मा काफी-कुछ उतर चुका है।‘‘ और मार्क्स की कही इस बात को कि ‘‘ स्वतंत्रता का एक रूप ठीक वैसे ही दूसरे को शासित करता है जैसे शरीर का एक अंग दूसरे को करता है। जब भी किसी एक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाया जाता है तो स्वतंत्रता के सामान्य रूप पर प्रश्न उठा दिया जाता है। जब स्वतंत्रता के एक रूप को खारिज किया जाता है तो सामान्य तौर पर स्वतंत्रता को ही खारिज कर दिया जाता है", वे अपने ढंग से कहते हैं कि ‘‘मानव की स्वाधीनता मानव मात्र की होने के कारण अविभाज्य है: किसी एक की स्वाधीनता को विक्षत या सीमित कर के दूसरे की स्वाधीनता नहीं बढ़ायी जायेगी।’’(‘जोग लिखी’ में संकलित विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, परमानंद श्रीवास्तव तथा केदारनाथ सिंह से 1975 में की गई बातचीत से)

हिंदी में अज्ञेय जी की चर्चा अक्सर एक मनीषी विचारक के रूप में ज्यादा की जाती है। वे खुद भी, इसको लेकर काफी सतर्क रहने की कोशिश करते थे। विश्वनाथ तिवारी ने बताया है कि कैसे अपने व्याख्यानों को लेकर वे सजग रहते थे। फिर भी उनका रूझान किसी शोधकर्ता या प्रवर्त् क का नहीं था। प्रवर्त्1क जीवन में परिवर्तनों को निश्चित भविष्य-दृष्टि से अर्थ प्रदान करता है। उसके सोच में तर्क की एकसूत्रता दिखाई देती है। अज्ञेय तो युगीन विचारधारा के एक ऐसे कनस्तर थे जिसमें समय की असंतुलित, अलौकिक, रहस्यमय विचित्र संरचनाएं छिपाई जाती है। असंगतियों का सम्मिश्रण ही इसका आकर्षण होता है, जो कोई प्रभावी सामाजिक भूमिका अदा करने के लिये हमेशा तमाम विसंगतियों से मेल बैठाता है। यही उनके प्रति सांस्थानिक साहित्य जगत के स्वीकार का एक रहस्य भी है। इसकी सही पड़ताल उस समय तक नहीं हो सकती, जब तक अज्ञेय को उन्हीं के मानदंडों पर मापने का काम जारी रहेगा। लेखक को उसके मापदंड पर मापने की तरह ही एक जरूरी काम उसके मापदंडों को दुरुस्त करने का भी होता है। अगर हेगेल को हेगेल के मानदंडों पर ही मापा जाता रहता तो फिर उस द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की कोई संभावना ही नहीं बनती जिसने हेगेल को, जो सिर के बल खड़ा था, पैर के बल खड़ा किया।

‘अज्ञेय’ की पुस्तक ‘आधुनिक हिंदी साहित्य’ के लेखों को थोड़ी सजगता से देख लीजिये, असंगतियों का पिटारा होने का हमारा आरोप प्रमाण की अपेक्षा नहीं रखेगा। 1976 में प्रकाशित यह किताब उनकी कुछ वर्ष पहले की किताब ‘‘हिन्दी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य’’का नया संस्करण है। पहले की किताब के लेखों के अलावा इसमें एक ही नया लेख जोड़ा गया था - ‘भाषा और अस्मिता’। इस लेख के योग से उन्होंने अपनी पुस्तक की उपयोगिता को नवीनता प्रदान की है, ऐसा उनका मानना था। आईये, हम इस एक, पंद्रह पेज के नये लेख को ही लेते हैं।

इस लेख की शुरूआत वे जापानी भाषा में ‘मानव’ शब्द के न होने की उस बात से करते हैं जिसे उन्होंने बाद में ‘जोग लिखी’ के अपने लेख ‘आंखों देखी और कागद लेखी’ में भी दोहराया है। बताते हैं कि जापान में मानव शब्द जिन दो धातुओं से बना है उनका अर्थ होता है ‘मानवीय मध्यवर्ती’। और इसके साथ ही फिर उनकी कोरी अटकलपच्चियों का जो दौर शुरू होता है कि अंत तक आते-आते यह लेख बेसिर-पैर की बातों की बेस्वाद खिचड़ी का एक क्लासिक उदाहरण बन जाता है। जिस लेख से वे अपने पूर्व-संकलन को एक नया रूप दिये जाने का दावा कर रहे थे, वही शायद हिंदी में उनका सबसे कम समझा गया लेख होगा !

इसमें एक जगह ‘अमेरिकी बृहत्पूजा’ के सिलसिले में अनायास ही पण्य के मूल्य के निर्धारण में काम करने वाली कोरी अतार्किकता की मार्क्स की बात भी आ जाती है। ‘‘दाम के बारे में तो स्थिति और भी विचित्र है। आप कोई चीज उसके दाम पर नहीं खरीदते...आपको जो कुछ दिया जाता है एक ऐसे परिमाण या आधार की अपेक्षा में दिया जाता है जिससे आपका कोई साक्षात्कार नहीं होता - और न हो सकता है क्यों कि उस परिमाण या प्रतिमान का अस्तित्व ही नहीं है। आप जिस संसार में रहते हैं उसी को सापेक्ष कर दिया गया है।’’

भाषा और अस्मिता के प्रसंग में पूरे पंद्रह पेज तक बिना किसी संगति की ऐसी तमाम बातों को कहते हुए अंत में आते-आते अज्ञेय लिखते हैं - ‘‘भाषा की बात को शायद अधिक तूल दे दिया गया है। लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही स्पष्ट है कि पूरी बात नहीं कही गयी है।’’ ‘मानव मध्यवर्ती’ की जिस रोमांचक बात से लेख शुरू होता है, अंत में उसे ही यह कह कर बेकार करार देते हैं कि ‘‘शायद इस नाम के उत्तरार्ध से तत्काल उलझना उतना आवश्यक नहीं है’’, और लेख का समापन इस आप्त वाक्य से होता हैं कि ‘‘भाषा के आविष्कार में मानवीय अस्मिता का आविष्कार होता है : उसकी सृष्टि होती है।’’

यह है हमारे चिंतक मनीषी का चिंतन ! भाषा जिसकी तुलना नदी के प्रवाह से की जाती है, जो अपने क्रिया पद, सर्वनाम, अव्यय और प्रत्यय-विभक्तियों से अपनी विशिष्टता बनाये रखती है, संज्ञा पदों, विशेषणों और प्रत्ययों से नहीं। वह राष्ट्रीय अस्मिता का एक प्रमुख तत्व होने पर भी, आज बहु-भाषी राष्ट्रीयता भी उतना ही बड़ा सच है। इसीलिये इस विषय में कोरी अंधश्रद्धा वाली बातों का कोई औचित्य नहीं है।

मजे की बात यह है कि बारीकी से देखने पर जिन अज्ञेय की चिंतन प्रणाली में किसी भी प्रकार की संगति और तर्क का सर्वथा अभाव दिखाई देता है, उनके बारे में ही हिंदी में धारणा यह है कि ‘‘उनके चिंतनपरक निबंधों में एक दार्शनिक - बल्कि वैज्ञानिक की तर्कपद्धति का पूरा इस्तेमाल है’’। (संचयिता, अज्ञेय, राजकमल प्रकाशन, संपादक नंदकिशोर आचार्य की भूमिका, पृ: xxxi)

दरअसल, तर्क तो चिंतन की महज कोई यांत्रिक पद्धति नहीं है। विचार में उसकी अपनी एक तात्विक महत्ता भी होती है। वह व्यक्ति के विचार के सार-तत्व तक को प्रभावित करता है। हेगेल अपने Science of Logic में बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं कि तर्क को शुद्धविवेक की प्रणाली समझना होगा, शुद्ध विचार का क्षेत्र । यह सच का क्षेत्र है, क्योंकि इसपर कोई आवरण नहीं है, यह दिगंबर है। इससे जुड़ी चिंतन प्रणाली में विषय का प्रारंभ ही उचित-अनुचित के अवबोध पर टिका होता है।

हमारे यहां तो तर्क की तात्विक-सत्ता का सबसे बड़ा और चिरंतन उदाहरण है रवीन्द्रनाथ, जो रचना और विचार के हर कदम पर अपने गहन औपनिषदिक चिंतन की रहस्यवादिता की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। उनके औपनिषदिक संस्कार किसी अंध आत्म-गौरव  के नहीं, चिंतन की गहराई और जड़सूत्रों से मुक्ति के हेतु बनते हैं तो इसके मूल में तर्क की यही तात्विकता है। यह तर्क ही है जो किसी यथार्थवादी लेखक को अपने विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों की सीमाओं से परे जाकर देखने की दृष्टि देता हैं।

दरअसल, अगर हम थोड़ी गहराई से, इधर-उधर देखते हुए सोचे तो अज्ञेय की कथित ‘तार्किकता’ (वस्तुत: अतार्किकता) के रहस्य के सूत्र कहीं और ही दिखाई देंगे। यह एक प्रकार की सापेक्ष तार्किकता है। हिंदी साहित्य में दक्षिणपंथी अध्यापकीय दुरात्माओं की उस दुनिया की सापेक्षता, जिन्होंने आनंदवर्ध्यन और उनके रस-सिद्धांत का चर्वण करते हुए भी जिस चीज को सबसे अधिक गंवाया था वह वही सहृदयता है, जिसे रस सिद्धांत में ही न सिर्फ रचनाकार के लिये, बल्कि ग्राहक पाठक और विवेचक के लिये भी जरूरी माना गया है। शुक्ल जी के जमाने से ही वह दुनिया डंके की चोट पर नये साहित्य की प्रत्येक उद्भावना को दुत्कारती रही है। उसके लिये जो चला आ रहा है, उसकी सनातनता ही उसका आकट्य तर्क है। हर नया, रचनात्मक प्रयत्न शुद्ध विध्वंस है। इसीलिये प्रगतिशील रचनाकार तो उसे कभी फूटी आंखों नहीं सुहाते थे। दूसरी ओर, साहित्य की तमाम प्रवृत्तियों को अपनी सेवा में लगाने का ‘अध्यापकीय प्रगतिशीलों’ के विचारधारात्मक उन्माद का भी अपना एक पहलू था। उसमें भी हर व्यक्ति किसी अभियान के एक यंत्र के पुर्जे से अधिक कोई महत्व नहीं रखता था। इसने मुक्तिबोध सहित रचनाकारों के एक अच्छे खासे तबके का सांस लेना दुष्कर कर रखा था। विचारधारा की जड़सूत्रता कम अतार्किक नहीं होती !

इनके बीच, अज्ञेय का किंचित खुलापन यदा-कदा कई सच्चे लेखकों को आकर्षित करता था। तारसप्तकों से लेकर ‘प्रतीक’ और ‘नया प्रतीक’ की योजनाओं से कई नये प्रतिभाशाली रचनाकार जुड़े। लेकिन, अज्ञेय में वे सारे तत्व मौजूद थे, जो डा. नगेन्द्र से लेकर विद्यानिवास मिश्र तक के दक्षिणपंथी अध्यापकीय सनातनपंथियों को आश्वस्त करते थे। उन्होंने जैसे-जैसे अज्ञेय को अपनाया, अज्ञेय यायावर से तीर्थयात्री में बदलते चले गये।




इसी सिलसिले में हम, अज्ञेय की सर्वोत्कृष्ट मानी गयी रचना ‘असाध्य वीणा’ को ही लेते हैं। वीणा-वंदना की लंबी कविता, संवेदना के स्तर पर निराला की  ‘वर दे वीणा वादिनी’ के धरातल पर ही टिकी हुई।

इसकी कहानी कुछ इस प्रकार है कि वज्रकीर्ति द्वारा अति प्राचीन किरीट तरु से गढ़ी गई एक ‘मंत्रपूत वीणा’ को साधक प्रियंवद को बजाना है। कविता शुरू होती है इस विकट वीणा के गढ़न की रहस्यमयता के बयान से। वीणा देख विह्वल साधक तमाम संशयों से भरा इसे गोद में उठाता है।

अज्ञेय लिखते हैं - ‘‘मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा-/ नहीं, स्वयं अपने को शोध रहा था। / सघन निविड़ में वह अपने को / सौंप रहा था उस किरीट तरु को।’’

यहीं से शुरू होता है अज्ञेय का अपना जीवन-दर्शन। साधक प्रियंवद स्वयं के शोधन के लिये अपने अन्तर में झांक कर अपने अंत:सार के विवर्तन की ओर, अपनी सीमाओं, अपनी विसंगतियों से मुक्ति के आत्म-संघर्ष की ओर बढ़ने के बजाय, वह बाहर के, अन्य के अन्त:सार की, वीणा ही नहीं, उसके मूल तत्व, किरीट तरु की वंदना करने लगता है। और इस प्रकार वीणा के साथ भक्त और भगवान वाला एक गहन रिश्ता कायम करता है।

व्यक्ति के चिंतन में हर चीज का स्वरूप उसके विलोम के जरिये उत्पन्न होता है। अभेद भेद के जरिये, प्रत्यक्ष परोक्ष के जरिये, रूप सारतत्व के जरिये। कहां जा सकता है, किसी अन्य के जरिये। लेकिन जब प्रश्न आत्म-उत्थान के स्वरूप का हो, तो वह कभी सीधे किसी अन्य के जरिये, यहां तक कि परिवेश के जरिये भी प्रकट नहीं होता है। इसमें आदमी खुद को ही प्रकट करता है, अपनी विसंगतियों से जूझते हुए अपना ही पूर्ण विवर्तन करता है। अर्थात यह पूरी तरह से व्यक्ति का अन्तर्निहित उपक्रम होता है। अपने अन्तर के असाध्य को साधने की प्रक्रिया बाहरी अन्य की वंदना नहीं हो सकती। यह तो धर्म की तरह की कोरी आत्म-प्रवंचना है।

इसीलिये प्रियंवद स्वयं के शोधन की बात के दूसरे क्षण ही जब वीणा के मूल ‘किरीट तरु’ की ओर उन्मुख हो जाता है, यह जानते देर नहीं लगती कि प्रियंवद अपने अंतर में झांकने से सख्त परहेज करने वाले अज्ञेय का ही एक प्रतिरूप है। मुक्तिबोध होते तो इस असंभव चुनौती में उत्तीर्ण होने के लिये गहरे आत्म-संघर्ष की, अपनी सामथ्र्य  के विकास के घनघोर उद्यम के जंजाल में फंस जाने की कहानी कहते। लेकिन अज्ञेय इस प्रकार के आत्म विकास के किसी उत्कट आत्म-संघर्ष के बजाय घंटा-घडि़यालों के साथ भगवान की पूजा-अर्चना का पवित्र वातावरण रचते हैं।

आगे की कविता किरीट तरु की अर्चना और भगवान के दर्शन, अर्थात वीणा के बज उठने की आर्त-पुकार की कविता है।

‘‘मैं तुझे सुनूँ/ देखूँ ध्याऊँ/ अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक् :/ कहाँ साहस पाऊँ/ छू सकूँ तुझे !’’

एक ही लालसा है कि साधक के बिना किसी उद्यम के, वीणा पर बिना किसी आघात के ही वह बज उठे।

‘‘किस स्पर्घा से/ हाथ का आघात/ छीनने को तारो से/ एक चोट में वह संचित संगीत जिसे रचने में/ स्वयं न जाने कितनों के स्पंदित प्राण रच गए।’’

रचना के प्रयत्नों से दूसरों के प्राण रच गए, लेकिन प्रियंवद को बिना प्रयत्न के वीणा का वरदान चाहिए! इसी से जाहिर है कि प्रियंवद के ‘स्वयं के शोधन’ की शुरू की बात कोरी मिथ्या थी। वीणा में संगीत की रचना से उसमें अपने किसी रचाव का कोई आग्रह नहीं है। वह तो राजा का कृपाकांक्षी है। याचक है। कहता है –

‘‘तेरी लय पर मेरी सांसें/ भरे, पूरें, रीतें, विश्रांति पायें। / तू गा:/ मेरे अंधियारे अंतस में आलोक जगा/ स्मृति का/ श्रुति का -’’

और यह ‘स्मृति’ क्या है ? एक भरे-पूरे जीवन की फंतासी। ‘स्तब्ध विजड़ित करते चित्रों का संसार’।

कहना न होगा, फंतासी हमेशा आदमी की कामनाओं और उनकी पूर्ति के लिये प्रयत्नों के बीच की दीवार होती है। उद्यम तो यहां कवि के लिये भारी आतंक है।

‘‘हर स्वर-कम्पन लेता है मुझको सोख-/ वायु सा नाद में उड़ जाता हूं/ मुझे स्मरण है-/ पर मुझको मैं भूल गया हूं।’’

‘‘मैं नहीं, नहीं, मैं कहीं नहीं/ ओ रे तरु! ओ वन!/ ओ स्वर संभार।’’

जो खुद को याद तक नहीं करना चाहता, वह खुद का शोधन करेगा !

जो भी हो, अंत में भक्त की पुकार पर भगवान का अवतार हो जाता है। वीणा बज उठती है। चारो ओर से मंगल ध्वनियां, शंखनाद शुरू हो जाते हैं। राजा खुश और प्रियंवद - रानी की सतलड़ी ले - ‘तेरा तुझको अर्पित’ का वीतराग सुनाता हुआ लौट जाता है।

कविता की अंतिम सारवान पंक्ति है - ‘‘प्रिय पाठक ! यों मेरी वाणी भी / मौन हुई।’’

कहना न होगा, सब कुछ यूं ही घटता गया और दैव योग से ही निरुद्दम, हमारे मित्र नीलकांत जी की शब्दावली में, मृत सौन्दर्य के उपासक अज्ञेय हिंदी साहित्य की एक घटना बन गये ।